Tuesday, 10 December 2024

तय्यिबात, खाबाईस, मशीन-अहले किताब का ज़बिहा, क्रिसमस केक। उतुअल किताब और निकाह।

 

तय्यिबात और खाबाईस

दीन का कंटेन्ट चारों चीजों में है, एक इबादते, दूसरा बदन की तहारत, तीसरा खाने पीने की पकीगजगी और चौथा अखलक। इसलिए हलाल और हराम की बहस सिर्फ खान पान और अखलाक में पैदा होती है। अखलाक के बारे में कुरान ने 5 चीजों को हराम कर दिया और खाने पीने पर भी खबाइस और तय्यिबात पर बता दिया है. तमाम खबाइस खाना हराम है और तमाम तय्यिबात खाना हलाल है। इनके खाने लायक न होने के पीछे वजह यही मालूम होती है कि जो खाने के लायक है वही खायी जाए और खाने की सिफ्तें खाने वाले पर असर भी डालती हैं वगैरह वगैरह, बाकी अल्लाह बेहतर जानता है.

खाबाईस वो हैं जो चीर फाड़ और हेवानियत, दरिंदगी करते हैं. दरिया और खुश्की दोनों के दरिंदे नहीं खाने चाहिए। तय्यिबात वो हैं जिन्हें आम तौर पर खाया जाता है या खाने के लिए पाला जाता है. कुछ जानवर दूसरे कामों जैसे सवारी वगैरह के लिए काम आते हैं जैसे घोड़े, गधे, इनका फैसला आप अपने माशरे और अपनी तबियत के हिसाब से कर सकते है. इन दोनों में सुवर क्या है जब इस पर सवाल पैदा हुआ तो फिर सुवर का नाम लेकर ही सीधा बता दिया गया कि यह हराम है. असल में सुवर बकरी की प्रजाति से मगर मांस भी खाता है. आपके इलम के मुताबिक अगर असल उसूल या हकीकत खत्म हो गई तो सुवर भी हलाल हो जाएगा और अगर किसी और जानवर में पैदा हो गई तो वो हराम हो जायगा। ऐसे जानवरों में से सुवर को अल्लाह ने ही हराम कर दिया और गो या गुवाना (एक अरबी रेगीस्तानी छिपकली) के हलाल होने पर रसूल ने वाज़ेह कर दिया मगर उसे खुद खाना पसंद नहीं किया.

दरिदों और चरिदों के बीच की कई मुशतबिहात चीज़ें हैं जिन पर हमें फैसला लेना है. बेहतर यही है इनसे बचा जाए क्योंकि नबी का यही तरीका रहा है. मगर इसमें इश्तिहाद करना भी सही है.  इन दोनों के दरमियान वाले ऐसे जानवरों पर इंसानी फितरत के मुताबिक फैसला कर लें जैसे उनसे घिन्न न आये, खाने का दिल करे। इसके अलावा क्या खाबाईस हैं और क्या तय्यिबात है, ये लोग खुद अपने इल्म, अकल, संस्कृति, सभ्यता वगैरह की बुनियाद पर फैसला करेंगे.

शुद्ध माँसाहारी, जहरीले जानवर, बिच्छू, सांप, चूहा, बंदर आदि तो पहले से ही खबाइस में शामिल हैं। क्योंकि इनके नुकीले दांत भी होते हैं, घृणास्पद होते है, मांसाहारी होते हैं। हालंकी मालिकी फिकह के मुताबिक सांप को जहर रहित ज़िबह करके खाने में कोई हर्ज नहीं है। कुछ फिकह में लक्कड़बग्गा, लोमड़ी, कव्वा जायज़ है और कुछ में नहीं. गो छिपकली हलाल है मगर मकरूह। बहुत से जीवों पर इखतेलाफे राय है। इसलिए बहुत जीवों के हलाल-हराम के मामले स्थान, समय, समाज आदि पर निर्भर करते हैं. हादिसो में कुछ को ममनू किया गया है। जबकि बाज़ वक़्त ये मुमानियत हराम होने की बुनियाद पर नहीं बल्कि दूसरे कारणों से की गई है।

Tirmizi (851) में लक्कड़बग्घा को खाना जायज़ बताया गया है. कुछ उलेमा इसे दरिंदा मानते हैं और कुछ नहीं. तबे ताबिइन के वक्त ये मदीना में बिकता था. हालाँकि यह दरिंदा है मगर हदीस में इसका ज़िक्र आ रहा है. इसलिए या तो वंहा पाए जाने वाले लक्कड़बग्घा वैसे दरिन्दे नहीं होते (शायद खास पाले हुए होते हो) या फिर इस हदीस में गड़बड़ी है (शायद इसी की वजह से यह बिकना शुरू हुआ हो) और इसे कुरान की रौशनी में ही समझा जायगा. वैसे कई तुर्क देखने पर लगता है कि किसी ने एक सहाबी से पुछा कि खेल के तौर पर लक्कड़बग्घा को मारने की इजाज़त है, उन्होंने कहा हाँ मगर जब इहराम में न हो तो.  ये भी पुछा की क्या ऐसा नबी ने कहा है, उन्होंने कहा हां. इसलिए हो सकता है इन बातों में शायद किसी ने ये सवाल-जवाब भी मिला दिया हो कि क्या इन्हें खाया जाता है और नबी ने कहा हाँ. इन्हीं और ऐसी ही हदीसों में आता है की लक्कड़बग्घा (hyena) या लोमड़ी (fox) या कव्वे (crow) को खाने के सवाल पर नबी ने बस यही पुछा कि क्या उन्हें खाया भी जाता है? शायद लक्कड़बग्घा, लोमड़ी, कव्वे वाले मामले गो वाले मामले की तरह ही हो.

समुंदरी जीवों एक मत है कि वो सारे के सारे हलाल हैं, चाहे शार्क ही क्यों न हो क्योंकि कुरान ने इन पर कोई कैद नहीं लगायी. जबकि बहुत से उलेमा इन सभी को हलाल नहीं कहते. एक मत ये भी है की जो पानी के बाहर नहीं बिलकुल नहीं जी सकते उन्हे खाना जायज है जबकि जो पानी के बाहर जी सकते हैं, वो जायज नही। हालांकि मगरमच्छ (कछुए, मेंडक भी) आदि पानी के बगैर लंबा जीवन जी ही नहीं सकते। यह भी मत है की तय्यिबात में से जो पानी के बाहर आ जाते हैं उनका ज़िबिया करके खाना जायज़ है. वैसे मगरमच्छ को अक्सर हराम माना जाता है. यह भी मत है की जो समुद्नरी जीव ज़मीन वाले हराम जीवो से मिलते हैं वो भी हराम है. हालंकि कुछ उलेमा समुंदरी सांप और कछुवों को जायज़ कहते हैं. आम तौर पर मेंढक को नाजायज़ माना जाता है जबकि उस हदीस में खाने के लिए मारने की बात ही नहीं हुई है बल्कि सिर्फ न मारने का हुक्म दिया है. हुक्म के पीछे कुछ भी वजूहात हो सकती है. एक वजह हदीस में ही है उनके जिस्म से दवाई निकालने के लिए मारा जाना था. शायद नबी को दवाई के लिए मेंढक मारना सही न लगा हो या उन्हें ये अंदाज़ा हो की ऐसे दवाई नहीं बनेगी या वो नहीं बना पायेगा.

घरेलू गधा एक डोमेस्टिक ऐनिमल है और ज्यादातर माशरों में डोमोस्टिक ऐनिमल को खाना अच्छा नहीं माना जाता क्योंकि इनका इस्तेमाल होता है और एक सदस्य की तरह भी यह घर में रहते हैं। हालांकि इन्हे खाना हराम नहीं है। असल में सारी खाबाइसस चीजें ममनू हैं। गधा खाबाइस नहीं है। जो चीजें खबाइस और तैय्यब के बीच में पाई जाती हैं, उन पर इखेतलाफ़ हो ही जाता है। खेबर के  मौके पर साहबा ने जब घरेलू गधों को ज़िबह करके हांडी पर चढ़ा दिया तो नबी ने इसे करने से मना किया था क्योंकि ये माले गनीमत का हिस्सा था और पहले यह तकसीम होता और फिर हलाक किये जाते। घरेलू गधे के हलाल होने पर कुछ उलेमा जायज मनाते हैं क्योंकि ये चारीदों और दरीदों के बीच में आता है। कुछ कहते हैं की पहले ये हलाल थे फिर इसे खैबर के मौके पर हराम करार दे दिया गया। हालांकि बुखारी 5492 और मुस्लिम के मुताबिक जंगली गधे खाना हलाल है। 

Ibn Qudamah (may Allah have mercy on him) said: “Most of the scholars believe that the meat of domesticated donkeys is haram. Ahmad said: Fifteen of the Companions of the Prophet (peace and blessings of Allah be upon him) regarded it as makruh (in the sense of being haram). Ibn ‘Abd al-Barr said: There is no difference of opinion among the Muslim scholars today concerning the fact that it is haram.” (Al-Mughni, 9/324).

किसी की जान अल्लाह की नेमत है। उससे छीनने का हक़ सिर्फ अल्लाह के मुताबिक होगा चाहे ज़मीन के जानवर हो या पानी के । चौपायों को खाने के लिए मारना जायज है और इसका उसूल यह है की इसमे दरिंदगी पैदा न हो। इसमे दरिंदगी दो तरह से होती है, एक खून बहने से से और दूसरा जान लेते हुए हुए जानवर के साथ होने वाली चीर फाड़ से है, खींचम खाच से, उठा पटक से, उस पर पिल पड़ने से. यानि वो भगने की कोशिश करता है और हम उसे दबोचने की जैसे शेर हिरण के गले में दांत गाड़ता है और हम छुरी चलाते हैं। इसलिए इन दोनों दरिंदगी की निशानी को दूर करने के लिए तथीर होगी  यानि तजकिया (खून से पाक) और तसमिया (अल्लाह के ज़िक्र से) किया जायगा।  इसलिए खून को बहा दिया जाता है और अल्लाह का नाम लिया जाता है। ज़िबह के लिए कोई भी तरीका हो सकता है और कोई भी मज़हब वाला कर सकता है, बशर्ते खून निकल जाए और अल्लाह का नाम लिया जाए। शिकार करने वाले कुत्तों के लिए भी यही हुक्म दिया (सीखाये हुए कुत्तों को अल्लाह का नाम लेके शिकार करने के लिए चोधे जाने पर हासिल हुआ जानवर हलाल है) कोई भी कौम यह काम कर दे तो जायज है।

मछली का जबिया नहीं होता और इसलिए उसका तजकिया और तसमिया नहीं होता। न तो उसमें ऐसे खून बेहता है और न ही उसमें मछली पर पिल पड़ते हैं। वो तो सफ़ोकेशन से मर जाती है। अगर किसी को लगता है मछली में भी वैसे ही खून होता है तो फिर उसे तजकिया और तसमिया दोनों करने पड़ेंगे मगर वो इसे दूसरे के लिए हदफ़ नहीं बना सकता क्योंकि ये असल  हुकूम और हकीकत के खिलाफ है। यह उसका इश्तेहाद है। कोई चाहे तो मछली पकड़ते हुए  बिस्मिल्ला पड़े तो कोइ हर्ज नहीं, क्योंकी उसका ताल्लुक तथीर से नहीं है। बेहतर यही है कि जाल को बिस्मिल्लाह कह कर फेंका जाए और मछली की जान लेने का तरीका भी कतई दरिंदगी भरा न हो। हर जायज़ काम को बिस्मिलाह कह कर शुरू करना चाहिए। मछली को भी बिस्मिल्लाह कह कर पकड़ना या ज़िबह करना चाहिए, अगर कहना रह जाये तो बाद में भी बिस्मिल्लाह कह कर खा सकते हैं क्योंकि मछली के साथ जानवरो जैसा मामला नहीं हो रहा होता। मछली में लगा हुआ थोड़ा बहुत खून माफ है क्योंकि रगों का बहता हुआ खून मना है। मगर वो नई पाई गई मछलियां जिनमें काफी खून होता है तो उनका तज़किया ही होगा। जैसे सधाए हुए कुत्ते या दूसरे जानवरों को बिस्मिलाह पढ़ कर छोड़ा जाता है और वो जायज़ है। उसने कोई टुकड़ा लेके शिकार को फड़फड़ाता हुआ छोड़ दिया है तो उसका तज़किया करना होगा।



5:96: तुम्हारे लिए जल का शिकार और उसका खाना हलाल है.

5:4: तुम्हारे लिए सारी अच्छी स्वच्छ चीज़ें हलाल हैं और जिन शिकारी जानवरों को तुमने सधे हुए शिकारी जानवर के रूप में सधा रखा हो - जिनको जैसे अल्लाह ने तुम्हें सिखाया है, सिखाते हो - वे जिस शिकार को तुम्हारे लिए पकड़े रखें, उसको खाओ और उस पर अल्लाह का नाम लो।

7:157: उनके लिए अच्छी-स्वच्छ चीज़ों को हलाल और बुरी-अस्वच्छ चीज़ों को हराम ठहराता है।


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मशीनी स्लॉटर

इसमें अल्लाह हुकबर की रेकॉर्ड आवाज़ टेप पर चला कर मशीन से ज़बिहा कर दिया जाता है। बाकी 2 शर्त पूरी हो रही होती है। इस गोश्त को ममनू माना गया है क्योंकि अल्लाह नाम लेने वाला तौहीद पर होना चाहिए।  (हालांकि तब क्या होगा जब अवाज़ रिकॉर्ड करने वाला मुस्लिम ही होगा? शायद एक दौरे आएगा जब अज़ान देने की बजाय रेकॉर्डड अज़ान चला दी जायेगी ऐसे ही।)

 

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क़ुरान 2:173: उसने तो तुम पर केवल मुर्दार और ख़ून और सूअर का माँस और जिस पर अल्लाह के अतिरिक्त किसी और का नाम लिया गया हो, हराम ठहराया है। इसपर भी जो बहुत मजबूर और विवश हो जाए, वह अवज्ञा करने वाला न हो और न सीमा से आगे बढ़ने वाला हो तो उस पर कोई गुनाह नहीं।... 

क़ुरान 5:3-5: तुम्हारे लिए हराम हुआ मुर्दार, रक्त, सूअर का मांस और वह जानवर जिस पर अल्लाह के अतिरिक्त किसी और का नाम लिया गया हो और वह जो घुटकर या चोट खाकर या ऊँचाई से गिरकर या सींग लगने से मरा हो या जिसे किसी हिंसक पशु ने फाड़ खाया हो - सिवाय उसके जिसे तुमने ज़बह कर लिया हो - और वह किसी वेदी पर ज़बह किया गया हो। और यह भी (तुम्हारे लिए हराम है) कि तीरों के द्वारा क़िस्मत मालूम करो।... वे तुमसे पूछते हैं कि उनके लिए क्या हलाल है? कह दो, तुम्हारे लिए सारी अच्छी स्वच्छ चीज़ें हलाल हैं और जिन शिकारी जानवरों को तुमने सधे हुए शिकारी जानवर के रूप में सधा रखा हो - जिनको जैसे अल्लाह ने तुम्हें सिखाया है, सिखाते हो - वे जिस शिकार को तुम्हारे लिए पकड़े रखें, उसको खाओ और उसप र अल्लाह का नाम लो।... आज तुम्हारे लिए अच्छी स्वच्छ चीज़ें हलाल कर दी गईं और जिन्हें किताब दी गई उनका भोजन भी तुम्हारे लिए हलाल है और तुम्हारा भोजन उनके लिए हलाल है और शरीफ़ और स्वतंत्र ईमान वाली स्त्रियाँ भी, और वे शरीफ़ और स्वतंत्र ईमान वाली स्त्रियाँ भी जो तुमसे पहले के किताबवालों में से हों, जबकि तुम उनका हक़ (मेहर) देकर उन्हें निकाह में लाओ। न तो यह काम स्वछन्द कामतृप्ति के लिए हो और न चोरी-छिपे याराना करने को।... 

क़ुरान 6:118-121: अतः जिसपर अल्लाह का नाम लिया गया हो, उसे खाओ; यदि तुम उसकी आयतों को मानते हो।... और क्या आपत्ति है कि तुम उसे न खाओ, जिस पर अल्लाह का नाम लिया गया हो, बल्कि जो कुछ चीज़ें उसने तुम्हारे लिए हराम कर दी हैं, उनको उसने विस्तारपूर्वक तुम्हें बता दिया है। यह और बात है कि उसके लिए कभी तुम्हें विवश होना पड़े।... और उसे न खाओ जिसपर अल्लाह का नाम न लिया गया हो।... 

क़ुरान 6:145-146: कह दो, जो कुछ मेरी ओर प्रकाशना की गई है, उसमें तो मैं नहीं पाता कि किसी खाने वाले पर उसका कोई खाना हराम किया गया हो, सिवाय इसके कि वह मुरदार हो, या बहता हुआ रक्त हो या, सुअर का मांस हो - कि वह निश्चय ही नापाक है - या वह चीज़ जो मर्यादा से हटी हुई हो, जिस पर अल्लाह के अतिरिक्त किसी और का नाम लिया गया हो। इसपर भी जो बहुत विवश और लाचार हो जाए परन्तु वह अवज्ञाकारी न हो और न हद से आगे बढ़नेवाला हो... और उन लोगों के लिए जो यहूदी हुए हमने नाख़ून वाला जानवर हराम किया था और गाय और बकरी में से इन दोनों की चरबियाँ उनके लिए हराम कर दी थीं, सिवाय उस (चर्बी) के जो उन दोनों की पीठों या आँखों से लगी हुई या हड्डी से मिली हुई हों। यह बात ध्यान में रखो। हमने उन्हें उनकी सरकशी का बदला दिया था और निश्चय ही हम सच्चे हैं।

क़ुरान 16:115: उसने तो तुम पर केवल मुर्दार, रक्त, सुअर का मांस और जिसपर अल्लाह के सिवा किसी और का नाम लिया गया हो, हराम ठहराया है। फिर यदि कोई इस प्रकार विवश हो जाए कि न तो उसकी ललक हो और न वह हद से आगे बढ़नेवाला हो...

क़ुरान 22:34-37:
और प्रत्येक समुदाय के लिए हमने क़ुरबानी का विधान किया, ताकि वे उन जानवरों अर्थात मवेशियों पर अल्लाह का नाम लें, जो उसने उन्हें प्रदान किए हैं... (क़ुरबानी के) ऊँटों को हमने तुम्हारे लिए अल्लाह की निशानियों में से बनाया है। तुम्हारे लिए उनमें भलाई है। अतः खड़ा करके उन पर अल्लाह का नाम लो। फिर जब उनके पहलू भूमि से आ लगें तो उनमें से स्वयं भी खाओ और संतोष से बैठने वालों को भी खिलाओ और माँगने वालों को भी... हमने उनको तुम्हारे लिए वशीभूत कर दिया है, ताकि तुम कृतज्ञता दिखाओ। न उनके मांस अल्लाह को पहुँचते हैं और न उनके रक्त। किन्तु उसे तुम्हारा तक़वा पहुँचता है। इस प्रकार उसने उन्हें तुम्हारे लिए वशीभूत किया है, ताकि तुम अल्लाह की बड़ाई बयान करो...

6:138-139: और वे कहते हैं, "ये जानवर और खेती वर्जित और सुरक्षित हैं। इन्हें तो केवल वही खा सकता है, जिसे हम चाहें।" - ऐसा वे स्वयं अपने ख़याल से कहते हैं - और कुछ चौपाए ऐसे हैं, जिनकी पीठों को (सवारी के लिए) हराम ठहरा लिया है और कुछ जानवर ऐसे हैं जिन पर अल्लाह का नाम नहीं लेते। यह सब उन्होंने अल्लाह पर झूठ घड़ा है...  और वे कहते हैं, "जो कुछ इन जानवरों के पेट में है वह बिल्कुल हमारे पुरुषों ही के लिए है और वह हमारी पत्नियों के लिए वर्जित है। परन्तु यदि वह मुर्दा हो, तो वे सब उसमें शरीक हैं।" शीघ्र ही वह उन्हें उनके ऐसा कहने का बदला देगा... 

क़ुरान 40:79: अल्लाह ही है जिसने तुम्हारे लिए चौपाए बनाए ताकि उनमें से कुछ पर तुम सवारी करो और उनमें से कुछ को तुम खाते भी हो।

क़ुरान 36:712: और उन्हें उनके बस में कर दिया कि उनमें से कुछ तो उनकी सवारियाँ हैं और उनमें से कुछ को वे खाते हैं।

क़ुरान 2:196-197: और हज और उमरा जो कि अल्लाह के लिए हैं, पूरे करो। फिर यदि तुम घिर जाओ तो जो क़ुरबानी उपलब्ध हो पेश कर दो। और अपने सिर न मूँडो जब तक कि क़ुरबानी अपने ठिकाने पर न पहुँच जाए, किन्तु जो व्यक्ति तुम में बीमार हो या उसके सिर में कोई तकलीफ़ हो तो रोज़े या सदक़ा या क़ुरबानी के रूप में फ़िदया देना होगा। फिर जब तुम पर से ख़तरा टल जाए, तो जो व्यक्ति हज तक उमरे से लाभान्वित हो, तो जो क़ुरबानी उपलब्ध हो पेश करे, और जिसको उपलब्ध न हो तो हज के दिनों में तीन दिन के रोज़े रखे और सात दिन के रोज़े जब तुम वापस हो, ये पूरे दस हुए। यह उसके लिए है जिसके बाल-बच्चे मस्जिदे-हराम के निकट न रहते हों... हज के महीने जाने-पहचाने और निश्चित हैं, तो जो इनमें हज करने का निश्चय करे, तो हज में न तो काम-वासना की बातें हो सकती हैं और न अवज्ञा और न लड़ाई-झगड़े की कोई बात। 

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कुरान ने अहले किताब का ज़बिहा जायज़ इसलिए लिखा था क्योंकि यहूदी आज भी क़ुरबानी पर खुदा का नाम लेते हैं (मगर ईसाईयों ने ये मसीह के बाद बंद कर दिया था जो आज तक वैसा ही है). हालाँकि ऐसा माना जाता है कि प्रारंभिक ईसाइयों ने खुदा के नाम पर ज़बिहा का त्याग नहीं किया था और पैगंबर मुहम्मद सल्ल. के समय तक में या अरब इलाकों में कई ईसाई समुदाय संभवतः अल्लाह का नाम लेते थे या नैतिक वध प्रथाओं का पालन करते थे।

इस्लाम : कुछ विद्वानों का मत है कि अगर कोई मुसलमान ज़बह करते समय अल्लाह का नाम लेना भूल जाता है, तो भी मांस जायज़ है क्योंकि यह जानबूझकर नहीं किया गया था और उस पर अल्लाह के अलावा किसी और का नाम नहीं लिया गया है। इसके अलावा, मुसलमानों में खाने से पहले बिस्मिल्लाह कहने का रिवाज़ है। 

कुछ विद्वानों का कहना है कि ईसाइयों के मांस खाने की इजाज़त है, भले ही वे इस पर अल्लाह का नाम न लें और  भले ही समय के साथ उनकी प्रथाएँ बदल गई हों क्योंकि क़ुरान में स्पष्ट रूप से "अहले किताब का ज़बिहा" लिखा है. 

बहुत से विद्वानों का कहना है कि इस्लामी कानून में सामान्य नियम यह है कि चीज़ेंt तब तक हलाल हैं जब तक कि अन्यथा सिद्ध न हो जाएँ। इसलिए जब तक ईसाईयों द्वारा मांस गैरुल्लाह को नहीं चढ़ाया गया हो, तब तक अल्लाह का नाम न लेने पर भी यह जायज़ हो सकता है। 

हालाँकि ज्यादातर विद्वान  कहते हैं कि इसकी इजाज़त नहीं है, क्योंकि आज ईसाई आम तौर पर वध के समय अल्लाह का नाम नहीं लेते और जैसा कि क़ुरान कहता है: "ऐसी चीज़ न खाओ जिस पर अल्लाह का नाम न लिया गया हो।

यहूदियत: Shechita (हलाल) पुराने नियम में जानवरों और मुर्गियों (बिखरे खुर वाले जुगाली करने वाले जानवर, कई पक्षियों की अनुमति है। लेकिन केवल fins and scales  वाली मछली की अनुमति है। सूअर का मांस और shellfish की अनुमति नहीं है) को ज़बह करने की यहूदी विधि है, इसलिए मांस खाना जायज़ (Kosher) है। इस विधि में तेज़ चाकू से गला काटना, खून निकालना शामिल है। Shochet (ज़बह करने वाला) को यहूदी प्रार्थना करनी चाहिए जिसका अनुवाद इस प्रकार है, "Blessed are You, Lord our God, King of the Universe, who has sanctified us with His commandments, and commanded us to slaughter".

ईसाइयत: आज, ईसाई धर्म (कैथोलिक धर्म, प्रोटेस्टेंट धर्म, Eastern Orthodoxy) में पशुओं की कुर्बानी के लिए कोई विशिष्ट अनुष्ठान नहीं हैं और ईश्वर के नाम का उल्लेख लेने का भी कोई विधान नहीं है। ईसाई रीति-रिवाजों के अनुसार, लोग भोजन करने से पहले आशीर्वाद के लिए एक सामान्य प्रार्थना करते हैं जिसे Saying Grace कहा जाता है, लेकिन यह कुर्बानी करने का अनुष्ठान नहीं है। यीशु और यरूशलेम में प्रेरितिक परिषद (प्रेरितों के काम 15) के बाद, अधिकांश ईसाई अब पुराने नियम के इन आहार नियमों का पालन नहीं करते। नया नियम इस विचार पर ज़ोर देता है कि भोजन अपने आप में पवित्र या अपवित्र नहीं है। 

In the Apostolic Council in Jerusalem (Acts 15), a meeting held in 50 AD of early Christian leaders, including Peter and Paul, to resolve a major dispute over whether Gentile converts needed to follow Jewish law, some decesions had been taken such as:- 


Bible: Acts 10:9–16: (Peter's vision) Peter went up on the roof to pray. He became hungry and wanted something to eat, and while the meal was being prepared, he fell into a trance. He saw heaven opened and something like a large sheet being let down to earth by its four corners. It contained all kinds of four-footed animals, as well as reptiles and birds. Then a voice told him, “Get up, Peter. Kill and eat.” “Surely not, Lord!” Peter replied. “I have never eaten anything impure or unclean.” The voice spoke to him a second time, “Do not call anything impure that God has made clean.” This happened three times, and immediately the sheet was taken back to heaven. 

St. Paul (Saul of Tarsus) was a Jewish Pharisee who converted to Christianity. He spread the faith among non-Jews (Gentiles). His letters (epistles) make up a large portion of the New Testament. Paul's teachings de-emphasized ritual laws (Yahudi Shariyat). He considered that Jesus' death replaced the need for animal sacrifices or temple rituals. Paul is teaching that Old Testament ritual laws (like food laws and festivals) were symbolic and no longer binding under the New Covenant in Jesus. His main message was that faith in Jesus is more important than following old ritual laws (Torah). Similarly, Paul taught that circumcision was not required for Gentile Christians. Paul on Dietary Laws (Meat) and Circumcision:-

Bible: 1 Corinthians 10:25-26: Eat anything sold in the meat market without raising questions of conscience, the earth is the Lord’s and everything in it.
[Paul is saying Christians can eat meat even if they don’t know whether God's name was said over it, as long as it's not meat explicitly sacrificed to idols.]

Bible: Colossians 2:16-17: Do not let anyone judge you by what you eat or drink... These are a shadow of the things that were to come; the reality, however, is found in Christ.

Bible: Galatians 5:6: For in Christ Jesus neither circumcision nor un-circumcision has any value. The only thing that counts is faith expressing itself through love.

Bible: 1 Timothy 4:3–5:
They forbid people to marry and order them to abstain from certain foods, which God created to be received with thanksgiving... For everything God created is good, and nothing is to be rejected if it is received with thanksgiving, because it is consecrated by the word of God and prayer.
 

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अहले किताब का जाबिहा।

जानवर का गोश्त हलाल होने के लिए 3 शर्ते हैं: जाबिहा करने वाला एक अल्लाह को मानने वाला हो (तौहीद), अल्लाह का नाम लिया गया हो (तसमिया) और खून बहा दिया गया हो (तज़किया)। क़ुरान ने अहले किताब का जाबिहा खाना जायज़ बताया है क्योंकि वो भी अल्लाह को मानने वाले हैं मगर इसका मतलब यह नही है कि उनका बिना अल्लाह का नाम लिए और बिना खून बहाए किया गया जानकर का ज़िबह जायज़ हो जायेगा। इसी लिए ज़्यादातर उलेमा उन्हीं अहले किताब का जाबिहा हलाल मानते हैं जो इन बाकी दो शर्तो को भी पूरा करे। अगर यह न मालूम हो कि इन दोनो बातों पर अमल हुआ है या नहीं, तो इसके हलाल होने पर उलेमा का इख़्तेलाफ़ है, इसलिए कुछ इसे हलाल कहते हैं और कुछ हराम।

जब तसमिया या तज़किया का अमल भूल से रह जाए या मालूम न हो पाए कि वाकई हुआ है या नहीं, इस मामले में तमाम उलेमा ने इसे नाजायज़ कहा है, सिवाए इमाम शाफ़ई के जिनका मौकिफ़ है कि ऐसे मामले में बिस्मिलाह कह कर खा लिया जाए।


Quran 22:34: And for every nation We have appointed a rite [of sacrifice] that they may mention the name of Allah over what He has provided for them of [sacrificial] animals. For your god is one God, so to Him submit. And give good tidings to the humble.

हर क़ौम को जाबिहा का हुक्म दिया गया था। यहूदी आज भी इसका ख्याल रखते हैं। मगर ईसाइयों ने इसे भुला दिया और आज वो जाबिहा से पहले किसी का नाम ही नहीं लेते हैं हालांकि दोनों की किताबों में इसका हुक्म मौजूद है कि गैरुल्लाह के नाम का ज़िबह और खून हराम है।


Quran 5:5: This day [all] good foods have been made lawful, and the food of those who were given the Scripture is lawful for you, and your food is lawful for them...

नबी के वक़्त में यहूदियों ने हलाल और हराम खाने की अपनी ही फेहरिस्त बना रखी थी। बाज़ हलाल को हराम और बाज़ हराम को हलाल कर रखा था। इसकी वजह से मुसलमानों में भी नए नए सवाल खड़े होते रहते थे। उनके दिये जाने वाले खाने को लेकर भी असमंजस थी।

हलाल हराम खानपान के मसले पर क़ुरान और नबी वक़्त वक़्त पर इसकी वज़ाहत करते जाते थे। जब यह वज़ाहत पूरी तरह मुक़म्मल हो गयी तो ये आयात उतरी की हर तय्यब चीज़ तुम्हारे लिए हलाल कर दी गयी है और अहले किताब के खाने भी। इसका मतलब है उनके दिए तय्यब खाने तुम्हारे लिए जायज़ है, यानी अब सोच विचार करने की ज़रूरत नहीं हैं कि उनके यंहा क्या हलाल क्या हराम है। यानी मुसलमानों को सिर्फ इस्लाम के हिसाब से ध्यान रखना है। जैसे यहूदी अगर खनज़ीर, गैरुल्लाह का ज़बिहा, खाबाइस पेश करते हैं तो वो नहीं खाना है बाकी सभी तैईबात खा सकते हैं। इस आयत के कॉन्टेक्स्ट से यह बात ज़ाहिर भी हो रही है।

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क्रिसमस के केक में अल्कोहोल मिला होना।

क्रिसमस पर बनाये जाने वाले केक अक्सर वाइन, रम, ब्रांडी वगैरह मिलाकर बनाये जाते हैं। उसमें स्वाद के लिए और लॉन्गर एक्सपाइरी के लिए शराब मिलाई जाती है। ड्राई फ्रूट को भी वाइन में डुबाकर केक में डाला जाता है। तो क्या उसे खाना जायज़ है?

सबसे पहली बात यह है कि ज़रूरी नहीं है कि हर जगह क्रिसमस केक में अल्कोहल मिलाया जाता है क्योंकि क्रिसमस केक का इस्तेमाल बच्चें, बुजुर्ग, नॉन ऐल्कॉहॉलिक भी करते हैं और इसे अपने परिचितों में गिफ्ट, मिठाई के तौर पर भी बांटा जाता है।

इसलिए इन तरह के केक के बारे में आप अपने जानकर लोगों या देने वालों से पूछ सकते हैं कि क्या इसमें अल्कोहल मिला हुआ है। अगर मिला हुआ है तो आप इसे प्यार से समझा कर खाने से मना कर सकते हैं। ईसाई मुस्लिमों के अक़ीदों को अच्छे से जानते हैं, उन्हें इसका बुरा नहीं लगेगा।

पर अगर आपको यह पता करना मुश्किल हो कि इसमें अल्कोहल है या नहीं तो भी आप उसे खा सकते हैं क्योंकि ऐसे बने केक में नशा नहीं होता है और ये केक नशे के लिए बनाये भी नही जाते हैं। असल में केक में अक्सर मामूली से मिक़दार में शराब इस्तेमाल करी जाती है और वो मिक़दार भी बेकिंग के दौरान एवोपोरेट हो जाती है। इसी तरीके से बाज़ दवाइयों (खासतौर पर कफ सीरप) में अल्कोहल मिला होने के बावजूद वो जायज़ होती है।

इस्लाम में नशा माना है और अगर किसी भी खाने की चीज़ से अगर अल्कोहल का रिज़ल्ट, असर, एफेक्ट, हैसियत पूरी तरह खत्म हो गया है तो वो चीज़ जायज़ हो जाती है। गामिदी साहब का यह मौकिफ़ है और शैख़ आसिम अल हक़ीम का भी यही मानना है कि अगर अल्कोहल में से इंटॉक्सिकेशन गायब हो गया है (जैसा बाज़ वक़्त अलोकोहल मिली ड्रिंक को खुले रखने पर हो जाता है) तो उसकी गलेन्स तक पी सकते हैं। यह वैसे ही जैसे पोर्क जेलेटिन (जानवर के अंगों को उबाल कर प्राप्त किया एक प्रोटीन) कैंडी अगर लैब या फैक्ट्री में इस तरह बनाई गई है कि पोर्क मांस की असलियत, हक़ीक़त, फितरत, नेचर वगैरह पूरी तरह से तब्दील हो चुकी है तो उसे खाया जा सकता है (यंहा ज़िबह का मसला भी पैदा नहीं होगा)। यानी पोर्क मांस में केमिकल चेंज आ चुका है जैसे गिलाज़त को ज़मीन में दफनाने से या उससे सिचांई करने पर पौधा निकल आता है।

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 कुरान ईश्वरीय पुस्तक/धर्मग्रंथ के लोगों या समुदायों के लिए दो शब्दों का प्रयोग करता है - अहल अल किताब और उतु अल किताब [3:100, 4:47, 5:5, 5:57, 9:29 आदि]। आमतौर पर दोनों शब्दों को एक ही माना जाता है। लेकिन यह भी माना जाता है कि दोनों शब्द संबंधित होते हुए भी अर्थ में थोड़ा अलग हैं। अहल अल किताब का अर्थ है "किताब वाले लोग" यानी जिनके पास किताब हैं (अभी भी)। वे मुख्य रूप से यहूदी और ईसाई हैं जिन्हें कुरान के अनुसार क्रमशः तोराह और इंजील दी गई थी। उतु अल किताब का अर्थ है "जिन्हें किताब दी गई थी"। कुरान में मजुस (ज़ोरोस्ट्रियन/पारसी) [22:17] और साबियन (अस्पष्ट एतिहासिक साबीन या संभवतः हिंदू) [2:62, 5:69] को भी उस समय के विभिन्न धार्मिक समूह के रूप में उल्लेख किया गया है। हालाँकि कुरान में उन्हें स्पष्ट रूप से अहले किताब नहीं कहा गया है लेकिन माना जाता है कि वे कोई ना कोई इल्हामी किताब वाले एकेश्वरवादी लोग हैं (अभी भी, आंशिक ही सही) या तब थे (हो सकता है बाद में तौहीद और किताब खो गयी हो) क्योंकि कुरान में बाज़ जगह यहूदियों और ईसाइयों के साथ इनका भी उल्लेख किया गया है। इसीलिए ऐसा साफ लगता है कि उतु अल किताब में सभी अहले किताब शामिल हैं मगर अहले किताब में उतु अल किताब शामिल नहीं है। ऐसा भी कहा जाता है कि क्योंकि अरबवासी इन चारों समुदायों से परिचित थे (भले ही साबीन से बेहद कम परिचित थे) इसलिए इनके नाम कुरान में साफ़ तौर पर आये हैं.

कुरान एक मुस्लिम पुरुष को उतु अल किताब (जिन्हें किताब दी गयी) की महिला से विवाह करने की अनुमति देता है, लेकिन बहुदेववादियों या गैर ईमान वालो (गैर मोमिन) के साथ विवाह को वर्जित करता है। जैसे दो पहिया वहान में एक पहिया ट्रक का नहीं लगाया जा सकता. क्योंकि इस्लाम चाहता है कि पुरुष और महिला वैचारिक रूप से समान हों, खासकर धर्म, आस्था और मान्यताओं के संदर्भ में ताकि विवाह और जीवन दोनों सही प्रकार चला कर, परलोक के अंतिम उद्देश्य को आसानी से प्राप्त किया जा सके। कुरान से स्पष्ट रूप से प्रतीत होता है कि उतु अल किताब एकेश्वरवाद और ईश्वर के ग्रन्थ वाला एक समुदाय था या रहा होगा। हिंदू धर्म अनुयायी दावा करते हैं कि उनके पास वेदों के रूप में ईश्वर का वचन है लेकिन व्यवहार में वे एकेश्वरवाद का बिल्कुल भी पालन नहीं करते हैं, सिवाए आर्य समाजियों को छोड़कर। हालाँकि वे सभी एक सर्वोच्च ईश्वर से परिचित हैं लेकिन वे उससे बिलकुल भी जुड़े हुए नहीं हैं (अंश मात्र भी नहीं)। दूसरी ओर यहूदी और ईसाई मूलतः एकेश्वरवादी हैं हालाँकि भले ही वास्तविक अर्थ में न सही और उनके अकीदे में कुछ गड़बड़ियाँ हैं मगर कुरान ने उन्हें साफ़ तौर पर अहले किताब माना है। 

इसलिए यह कहा जा सकता है कि एकेश्वरवादी मुसलमान का हिंदू बहुदेववादी से विवाह जायज़ नहीं है, जब तक वह सही अकीदे पर नहीं आ जाती। बाकी फिर भी कोई विवाह कर ले तो उसका मामला अल्लाह के सुपुर्द कर देना चाहिए. उलेमा और लोंगो को फतवेबाजी और तानों से बचना चाहिए. 

क़ुरआन (5:5): तुम्हारे लिए ईमान वालों में से पवित्र स्त्रियाँ और तुमसे पहले जिन लोगों को किताब दी गयी थी (उतु अल-किताब) उनमें से पवित्र स्त्रियाँ विवाह के लिए हलाल हैं।
क़ुरआन (2:221 और 60:10): बहुदेववादियों या गैर ईमान वालो के साथ विवाह को मना करता है।

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