Tuesday, 10 December 2024

नासिख और मंसूख

 


नासिख और मंसूख


कुरान को समझने (उसूले तफ़सीर) के 18 उलूम बताए जाते हैं, जिनमें एक नासिख और मंसूख का इल्म, इखतलाफे किरत का इल्म जिसे 7 तरह का माना जाता है बल्कि 1000 जगह ऐसा फर्क माना जाता है मगर इन्हें कोई छापता नहीं है, छापा वही जाता है जो हमारे पास है।

नासिख आयात वो होती है जो बाद में आ कर किसी आयात को मंसूख कर देती है। कुरान में कितनी आयतें मंसूख मानी जाती है, इस पर अलग अलग राय है, जो लिस्ट शुरुवात में 500 से लेके अब 5 तक आ गई है।  शाह वलीउल्लाह दहलवी ने अल फौजूल कबीर में बताया कि सिर्फ 5 आयतें ऐसी हैं। हो सकता है बाद में ये 5 भी बाकी न रहे। रसूल ने कभी नहीं कहा की फला फला आयात मंसूख हो गई है। उन्हें ऐसा करने का हक भी नहीं था। 

कुरान मे 2 बार मंसूख लफ़्ज़ आया है। 3 तरह की मंसूख आयत मानी जाती हैं: तिलावत बाकी हुकूम मंसूख, तिलावत मंसूख हुकूम बाकी, तिलावत हुकूम दोनों मंसूख। 

नबी ने कभी नहीं कहा कि फला आयात मंसूख हो गई। नबी ने कभी किसी आयात की तशरीह, तफसीर भी नहीं करी क्योंकि कर देते तो उस आयात के मायने सिर्फ वैसे ही जाम हो जाते.


इस टॉपिक पर 2 बड़े मौकिफ है:-

(1) कुरान में नासिख और मंसूख आयतें है, मगर बेहद कम. क्योकि कुरान ने एक वक्त में कुछ हुक्म दिया और फिर जब उस हुकूम की जरूरत खत्म हो गई तो वो हुकूम खतम कर दिया।

कुरान एक जिंदा कलाम है। यह अपने नजिल होने वाले वक्त में अपने सामने मौजूद लोगों के साथ खिताब करता था और बाद वालों के लिए भी हिदायत का जरिया बनना था। इसीलिए कुरान में ऐसी बातें भी रिकॉर्डिड है जो उस वक्त पेश आ रही थी।

(2) कुरान में कोई आयत नासिख, मंसूख नहीं है. जो ऐसा मानते हैं, वो गलती पर है. कुरान में कभी कोई बदलाव नहीं हुआ और न ही कुरान में कोई विरोधाभास है. अगर मंसूख आयते होती तो 23 साल में जो अहकाम बदले, ऐसे अहकाम 400 साल में तो और ज़्यादा बदलने चाहिए थे. नासिख मंसूख मानने वालों को कुरान के मुनिकर क्यों न माने?

न्यूटन हमेशा फादर ऑफ मॉडर्न साइंस रहेगा। हालांकि आगे आने वाले साइंस्टीस्ट उसकी बहुत सी बातें गलत साबित करते जाएंगे। कोई भी समझदार इंसान न्यूटन को एक फिजूल या बेकार साइंस्टीस्ट नहीं कह सकता। क्योंकि उसने जब काम किया तब ऐसा दौर और जराये नहीं थे। यही सुलुक दीनी उलेमा के साथ भी करना होगा। कुरान ने जगह जगह ऐसे लोगों की रद्द करी है जो कहते हैं कि ये तो हमारे बड़ों से चला आ रहा है.

 

नासिख मंसूख पर कुरान से दी जाने वाली दलीलों का जायज़ा

16:101: जब हम किसी आयत की जगह दूसरी आयत बदलकर लाते हैं - और अल्लाह भली-भाँति जानता है जो कुछ वह अवतरित करता है - तो वे कहते हैं, "तुम स्वयं ही घड़ लेते हो!" नहीं, बल्कि उनमें से अधिकतर लोग नहीं जानते।

2:106: हम जिस आयत (और निशान) को भी मिटा दें या उसे भुला देते हैं, तो उससे बेहतर लाते हैं या उस जैसी दूसरी ही। क्या तुम जानते नहीं हो कि अल्लाह को हर चीज़ की सामर्थ्य प्राप्त है?

[कुछ कहते हैं कि ये इसी कुरान की आयातों के बारे में है. जबकि दुसरे कहते हैं कि इस कुरान में कुछ मंसूख नहीं हुआ और यह असल में पिछली किताबों में जो आयतें थी उनके बारे में है, जिन्हें भुला दिया गया या उन जैसी दूसरी आ गई जो आने वाले वक्त के लिए ज्यादा बेहतर थी।]

22:52: तुमसे पहले जो रसूल और नबी भी हमने भेजा, तो जब भी उसने कोई कामना की तो शैतान ने उसकी कामना में विघ्न डाला। इस प्रकार जो कुछ भी शैतान विघ्न डालता है, अल्लाह उसे मिटा देता है। फिर अल्लाह अपनी आयतों को सुदृढ़ कर देता है।

[ये कुरान के बारे में बल्कि पिछले अंबिया के बारे में है क्योंकि कुरान की हीफाजत की गारंटी ली गई है। एक पैगंबर के जाने के बाद उनकी बात में शैतान मिलावट कर देता था, मगर अगला पैगंबर आके आयतों को पक्का कर देता था।]

4:82: क्या वे क़ुरआन में सोच-विचार नहीं करते? यदि यह अल्लाह के अतिरिक्त किसी और की ओर से होता, तो निश्चय ही वे इसमें बहुत-सी बेमेल बातें पाते।

[मतलब कलाम की एक आयात से दूसरी आयात कैन्सल नहीं हो सकती]

 

नासिख मंसूख आयात नंबर 1 (तारिक साहब):

2:219: तुमसे शराब और जुए के विषय में पूछते हैं। कहो, "उन दोनों चीज़ों में बड़ा गुनाह है, यद्यपि लोगों के लिए कुछ फ़ायदे भी हैं, परन्तु उनका गुनाह उनके फ़ायदे से कहीं बढ़कर है।"

[शराब की बुराई बता दी गई है यंहामगर रोका नहीं गया. शराब आम थी, एक दम से छोड़ना मुमकिन ही नहीं था]

4:43: नशे की दशा में नमाज़ में व्यस्त न हो, जब तक कि तुम यह न जानने लगो कि तुम क्या कह रहे हो। और इसी प्रकार नापाकी की दशा में भी (नमाज़ में व्यस्त न हो), जब तक कि तुम स्नान न कर लो, सिवाय इसके कि तुम सफ़र में हो। और यदि तुम बीमार हो या सफ़र में हो, या तुममें से कोई शौच करके आए या तुमने स्त्रियों को हाथ लगाया हो, फिर तुम्हें पानी न मिले, तो पाक मिट्टी से काम लो और उसपर हाथ मारकर अपने चहरे और हाथों पर मलो।

[यंहा एक पाबन्दी लगायी गयी है. वैसे जो तुम अरबी पढ़ते हो वो भी तुम्हें समझ नहीं आ रहा होता/ यंहा तयम्मुम की हिदायत भी दी है]

5:90: ये शराब और जुआ और देवस्थान और पाँसे तो गन्दे शैतानी काम हैं। अतः तुम इनसे अलग रहो, ताकि तुम सफल हो।

[शराब से मनाही को हल्के हल्के बताया गया है]


नंबर 2 (तारिक साहब):

2:180: जब तुममें से किसी की मृत्यु का समय आ जाए, यदि वह कुछ माल छोड़ रहा हो, तो माँ-बाप और नातेदारों को भलाई की वसीयत करना तुम पर अनिवार्य किया गया। यह हक़ है डर रखनेवालों पर।

तीरमीजी: वारिस के लिए वसीयत नहीं है।

[हमेशा इसे कमजोर कहा गया है। बलकि खुद इमाम तिरमीजी ने इसे गरीब हदीस कहा है। ये हदीस कुरान के खिलाफ होने पर नहीं मानी जाएगी]

तारिक साहब का मानना है कि ऐसी स्थति आती हैं जब एक औलाद को कुरान में बताए प्रतिशत से ज़्यादा देने की ज़रूरत होती है क्योंकि उसके वक़्त तक बाप उसके लिए उतना नहीं कर पाया जितना दूसरी औलादों के लिए कर चूका है.


नंबर 2 (मिर्ज़ा साहब):

कुरान ने पहले वसीयत को लाज़मी करार दिया और फिर बाद में विरासत के अहकाम आ गये (हालाँकि ये भी मौकिफ है कि वसीयत उसे कहते हैं जो पहले ही खुद कर दी जाए और जो बचे वो तो कुरान के दिए कानून के मुताबिक ही तकसीम होगी.)

2:180: जब तुममें से किसी की मृत्यु का समय आ जाए, यदि वह कुछ माल छोड़ रहा हो, तो माँ-बाप और नातेदारों को भलाई की वसीयत करना तुम पर अनिवार्य किया गया।

4:11: अल्लाह तुम्हारी सन्तान के विषय में तुम्हें आदेश देता है कि दो बेटियों के हिस्से के बराबर एक बेटे का हिस्सा होगा; और यदि दो से अधिक बेटियाँ ही हों तो उनका हिस्सा छोड़ी हुई सम्पत्ति का दो तिहाई है। और यदि वह अकेली हो तो उसके लिए आधा है। और यदि मरने वाले की सन्तान हो तो उसके माँ-बाप में से प्रत्येक का उसके छोड़े हुए माल का छठा हिस्सा है। और यदि वह निसंतान हो और उसके माँ-बाप ही उसके वारिस हों, तो उसकी माँ का हिस्सा तिहाई होगा। और यदि उसके भाई भी हों, तो उसकी माँ का छठा हिस्सा होगा। ये हिस्से, वसीयत जो वह कर जाए पूरी करने या ऋण चुका देने के पश्चात हैं। तुम्हारे बाप भी हैं और तुम्हारे बेटे भी। तुम नहीं जानते कि उनमें से लाभ पहुँचाने की दृष्टि से कौन तुमसे अधिक निकट है। यह हिस्सा अल्लाह का निश्चित किया हुआ है। अल्लाह सब कुछ जानता, समझता है।

4:12: और तुम्हारी पत्नियों ने जो कुछ छोड़ा हो, उसमें तुम्हारा आधा है, यदि उनकी सन्तान न हो। लेकिन यदि उनकी सन्तान हों तो वे जो छोड़ें, उसमें तुम्हारा चौथाई होगा, इसके पश्चात कि जो वसीयत वे कर जाएँ वह पूरी कर दी जाए, या जो ऋण (उनपर) हो वह चुका दिया जाए। और जो कुछ तुम छोड़ जाओ, उसमें उनका (पत्नियों का) चौथाई हिस्सा होगा, यदि तुम्हारी कोई सन्तान न हो। लेकिन यदि तुम्हारी सन्तान है, तो जो कुछ तुम छोड़ोगे, उसमें से उनका (पत्नियों का) आठवाँ हिस्सा होगा, इसके पश्चात कि जो वसीयत तुमने की हो वह पूरी कर दी जाए, या जो ऋण हो उसे चुका दिया जाए, और यदि किसी पुरुष या स्त्री के न तो कोई सन्तान हो और न उसके माँ-बाप ही जीवित हों और उसके एक भाई या बहन हो तो उन दोनों में से प्रत्येक का छठा हिस्सा होगा। लेकिन यदि वे इससे अधिक हों तो फिर एक तिहाई में वे सब शरीक होंगे, इसके पश्चात कि जो वसीयत उसने की वह पूरी कर दी जाए या जो ऋण (उसपर) हो वह चुका दिया जाए, शर्त यह है कि वह हानिकर न हो। यह अल्लाह की ओर से ताकीदी आदेश है और अल्लाह सब कुछ जाननेवाला, अत्यन्त सहनशील है।


नंबर 3 (गामीदी साहब):

जैसे बाज वक्त मुनाफिक नबी से अकेले में बात करने की कोशिश किया करते थे। नबी इतने सभ्य थे की आप अकले उनकी बात सुनने के लिए अकेले में भी चले जाते थे। फिर मुनाफिक गलतफहमियाँ फैलाते थे कि नबी ने फला बात कही थी और फला नहीं कही थी। इसलिए अल्लाह ने इन्हें रोकने के लिए सदके की शर्त लगा दी। इसके बाद गरीब सहाबा को दुख हुआ। फिर अल्लाह ने यह शर्त हटा दी क्योंकि जिनको तवज्जो दिलानी थी, उन्हें तववज्जो दिला दी गई थी।

58:9-11 : ऐ ईमान लानेवालो! जब तुम आपस में गुप्त वार्ता करो तो गुनाह और ज़्यादती और रसूल की अवज्ञा की गुप्त वार्ता न करो, बल्कि नेकी और परहेज़गारी के विषय में आपस में एकान्त वार्ता करो।...  वह कानाफूसी तो केवल शैतान की ओर से है, ताकि वह उन्हें ग़म में डाले जो ईमान लाए हैं।...  जब तुमसे कहा जाए कि मजलिसों में जगह कुशादा कर दो, तो कुशादगी पैदा कर दो। अल्लाह तुम्हारे लिए कुशादगी पैदा करेगा। और जब कहा जाए कि उठ जाओ, तो उठ जाया करो।

58:12: ऐ ईमान लानेवालो! जब तुम रसूल से अकेले में बात करो तो अपनी गुप्त वार्ता से पहले सदक़ा दो। यह तुम्हारे लिए अच्छा और अधिक पवित्र है। फिर यदि तुम अपने को इसमें असमर्थ पाओ, तो निश्चय ही अल्लाह बड़ा क्षमाशील, अत्यन्त दयावान है।

58:13: क्या तुम इससे डर गए कि अपनी गुप्त वार्ता से पहले सदक़े दो? तो जब तुमने यह न किया और अल्लाह ने तुम्हें क्षमा कर दिया तो नमाज़ क़ायम करो, ज़कात देते रहो और अल्लाह और उसके रसूल की आज्ञा का पालन करो। और तुम जो कुछ भी करते हो अल्लाह उसकी पूरी ख़बर रखता है।


नंबर 4 (मिर्ज़ा साहब):

ज़ानी औरत को घर में कैद करने का हुकुम दिया जब तक कोई अगला हुकुम न आ जाये फिर कोड़े मारने की सज़ा आ गयी.

4:15: और तुम्हारी स्त्रियों में से जो व्यभिचार कर बैठें, उनपर अपने में से चार आदमियों की गवाही लो, फिर यदि वे गवाही दे दें तो उन्हें घरों में बन्द रखो, यहाँ तक कि उनकी मृत्यु आ जाए या अल्लाह उनके लिए कोई रास्ता निकाल दे।

24:2: व्यभिचारिणी और व्यभिचारी - इन दोनों में से प्रत्येक को सौ कोड़े मारो और अल्लाह के धर्म (क़ानून) के विषय में तुम्हें उनपर तरस न आए, यदि तुम अल्लाह और अन्तिम दिन को मानते हो। और उन्हें दंड देते समय मोमिनों में से कुछ लोगों को उपस्थित रहना चाहिए।


नंबर 5 (मिर्ज़ा साहब):

पहले कुरान ने एक मुस्लिम को 10 पर भारी कहा और फिर जब मुस्लिम अबु बकर, उमर, उसमान, अली, अव्वलीन जैसे नहीं रह गये तो एक को 2 पर भारी कहा.

8:65: यदि तुम्हारे बीस आदमी जमे होंगे, तो वे दो सौ पर प्रभावी होंगे और यदि तुममें से ऐसे सौ होंगे तो वे इनकार करने वालों में से एक हज़ार पर प्रभावी होंगे, क्योंकि वे नासमझ लोग हैं।

8:66: अल्लाह ने तुम्हारा बोझ हल्का कर दिया और उसे मालूम हुआ कि तुममें कुछ कमज़ोरी है। तो यदि तुम्हारे सौ आदमी जमे रहने वाले होंगे, तो वे दो सौ पर प्रभावी रहेंगे और यदि तुममें से ऐसे हज़ार होंगे तो अल्लाह के हुक्म से वे दो हज़ार पर प्रभावी रहेंगे।


कुछ अन्य

आयतें रजम (ज़ानी  की सज़ा) और आयाते रज़ात ए कबीर (व्यस्क को दूध पिलाना)।

इमाम राजी ने कुरान की आयात मंसूख कर दी (लकुम दिनीकूम वलयदीन)

हज़रत उमर ने कुछ हेडस में ज़कात बंद कर दी थी। जाहीर उनकी जरूरत खतम हो गई होगी। 

 

नासिख मंसूख हदीसे:

हदीसो में भी नासिख मंसूख माना गया है:-

Muslim 353 & 354: नबी ने कहा की आग पर पकी चीज़ों के बाद वुज़ू करो और फिर अगली हदीस (बाब का नाम देखें) से पता लगा की आपने आग पर पका गोश्त खा कर वुज़ू नहीं किया.

Muslim 2026 & Bukhari 5616: नबी ने खड़े हो कर पानी पीने को मना करा और उलटी करने को कहा. फिर एक हदीस में अली ने कहा उन्होंने नबी को खड़े होके पानी पीते देखा था.

(दरअसल ये नासिख मंसूख नहीं बल्कि हदीसों को गलत समझने का मसला ज्यदा लग रहा है)


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