Tuesday, 10 December 2024

ग़ज़-हिद की हक़ीक़त

 

 

गज हिद


सबसे पहली बात यह है कि कुछ दशको पहले किसी मुस्लमान ने यह गज हिद का नाम ही नहीं सुना था. सिर्फ कुछ हदीसो के जानकार लोग इस नाम से परिचित थे. ये तो फिर पाक कट्टरवादियों ने इस नाम को उछालना शुरू किया भारत-पाक युद्द स्थितिओं में, जिसके बाद भारतीय कट्टरवादियों ने इसे लपक लिया. सियासत में  मज़हब का इस्तेमाल भारतीय महाद्वीप में आम बात है. भारत के आगे पाक शक्तिहीन है. वैसे एक बार को मान भी लें कि पाक यंहा हमला करके जीत भी गया तो संभाल नहीं पायेगा क्योंकि पाक पहले से ही बुरे और फटे हाल में है। असल में लोग इस मुद्दे को गलत समझ रहे हैं. सबसे पहले इन रिवायतों पर नज़र डाल लेते हैं:- 


हदीस 1 - नसाई 3175, मुसनद 37/81 (दोनों, हसन दारुस्सलाम द्वारा और सहीह अल्बानी द्वारा): उम्मत में दो जमात जहननम की आग से आजाद होंगे। एक जो गहिद में शिरकत करेंगे और एक जो ईसा के साथ होंगे। [ये दोनों अलग अलग वाकयात है और एक ही दौर की बात नहीं है।]

हदीस 2 - नसाई 3174 , मुसनद 12/28 (दोनों, जईफ): एक साहबी कहते हैं कि गज हिद का वादा है, अगर मैंने उसे पाया तो मैं उसमें जान-माल सब लगा दूंगा. अगर मर गया तो शहीद होऊंगा और अगर वापिस आया तो जहन्नुम से आज़ाद होऊँगा।

हदीस 3 - नसाई 3173, मुसनद 14/419 (दोनों, जईफ): एक साहबी कहते हैं कि गज हिद का वादा है, अगर मैंने उसे पाया तो मैं उसमें जान-माल सब लगा दूंगा. अगर मर गया तो शहीद होऊंगा और अगर वापिस आया तो जहन्नुम से आज़ाद होऊँगा। 

[इनमें गालिबन सिंध और हिन्द दोनों लफ्ज़ इस्तेमाल हुए हैं.]

हदीस 4 - ज़रूर तुम्हारा एक लश्कर हिद से जंग करेगा। अल्लाह उन को फतह अता करेगा, यहाँ तक के वह उन के बादशाहों को बेड़ियों में जकड़ कर लायेंगे। अल्लाह इन की मग़फिरत फरमाएगा। फिर जब वह वापस पलटेंगे तो ईसा को शाम में पायेंगे। इस पर अबू हुरैरा ने कहा के अगर मैंने वह ग़ज़वा पाया तो अपना नया और पुराना माल सब बेच दूंगा और इस में शिरकत करूँगा। फिर जब अल्लाह हमें फतह अता कर दे और हम वापिस पलट आयें तो मैं एक आज़ाद अबू हुरैरा होऊंगा जो शाम के मुल्क में इस शान से आएगा के वहां ईसा को पायेगा। उस वक़्त मेरी शदीद ख्वाहिश होगी के मैं उनके पास पहुँच कर उन्हें बताऊँ के मैं आप का सहाबी हूँ। यह सुन कर रसूलअल्लाह मुसकुरा पड़े और हंस कर फरमाया, बहुत मुश्किल, बहुत मुश्किल।

हदीस 5 - बैत अलमुक़द्दस (यरूशलेम) का एक बादशाह हिद की तरफ एक लश्कर रवाना करेगा। वो सरज़मीन-ए-हिन्द को पामाल कर डालेंगे। उस के ख़ज़ानों पर कब्ज़ा कर लेंगे, फिर वह बादशाह उन खजानों को बैत अलमुक़द्दस की आराइश (सौन्दर्यकरण) के लिए इस्तेमाल करेगा। वह लश्कर हिद के बादशाहों को बेड़ियों में जकड़ कर अपने बादशाह के सामने पेश करेगा। वो बादशाह के हुक्म से मशरिक और मग़रिब (पूर्व और पश्चिम) के दरमियान (बीच) का सारा इलाका फतह कर लेंगे और दज्जाल के खुरुज (निकलने) तक हिद में कयाम करेंगे।


सनद के ऐतबार से कमी

गज़ हिद के नाम से ये कुल 5 रिवायत मिलती हैं। अगर ध्यान से जायज़ा लिया जाए तो यह असल में एक ही रिवायत है जिसके अलग-अलग हिस्सों को इन पाँच रिवायतों में बयान किया गया है। इसमें सिर्फ शुरवाती 3 हदीसे हैं जिन्हें सेहत के ऐतबार से देखा जा सकता है, जो असल में मतन के ऐतबार से 2 ही हैंये 2 मतन 6 सनदों से हम तक पहुचें हैं और इन सभी के रावियों में कमजोरी है. बाकी आखिरी की 2 रिवायत बिलकुल काबिले कुबूल नहीं है और उनकी सनदो में भी बड़ी कमजोरी है. देखिये कुछ लिंक:-

https://www.studyislam.in/the-hadith-of-ghazwa-e-hind-an-analysis/

https://www.studyislam.in/ghazwa-e-hind-hadith-analysis-hindi/

https://islamqa.info/en/answers/145636/hadith-about-the-conquest-of-india

 

मतन के ऐतबार से कमी


इन हदीसों में “एक लश्कर” का ज़िक्र आया है लेकिन इस रिवायत को अपने सियासी मकसद के लिए इस्तेमाल करने वाले इसका अनुवाद गलत तौर पर “लश्करों”(बहुवचन) कर रहे हैं। ये लोग गज हिद को भारतीय उपमहाद्वीप में कयामत तक होने वाली सारी लड़ाइयों पर लागू कर रहे हैं।

एक हदीस में “सिंध” शब्द का भी प्रयोग किया गया है जबकि सिंध तो इस वक़्त भी मुसलमानों ही के पास है। इसलिए इस पर फ़ौज भेजने का क्या मतलब ही नहीं बचता. इसको दुबारा जीतना मुरादकैसे हो सकता है.


इनमें भविष्य के ऐसे ज़माने का उल्लेख है जब कयामत की  निशानियाँ बिलकुल साफ़ हों गी। अगर इसे एक बार को सच भी माने तो इस जंग की अभी दूर-दूर तक कोई संभावना नहीं है। यही वजह थी ह. अबू हुरैरा की ह. ईसा से मुलाकात की बात सुन कर नबी हँसे थे. 

इतिहास से ज्ञात होता है कि पुराने ज़माने और आज के ज़माने में स्थानों के नाम, सीमाएं, तसव्वुरात बदलती रहे हैं. आज से पन्द्रह सौ साल पहले सिर्फ अरब प्रायद्वीप (Arabian Peninsula) को सरज़मीने अरब कहा जाता था। आज की अरब दुनिया का उससे कहीं ज़्यादा क्षेत्र (रकबा) और आबादी है। उस ज़माने के चीन और आज के चीन में बहुत बड़ा अंतर है।  इस मुद्दे से राजनीतिक अर्थ लेने वाले कुछ गुट इसमें आये हिन्द शब्द से आज का भारत मुराद लेते हैं। जबकि नबी के ज़माने में इससे मुराद सिर्फ भारत नहीं बल्कि बर्मा, थाईलैंड, लाओस, कंबोडिया, वियतनाम, मलेशिया, इंडोनेशिया आदि यह सब देश थे। यही हाल सिंध शब्द का है। उस ज़माने में  हिन्द से क्या अर्थ लिए जाते थे इसके संबंध में “उर्दू दायरा-ए-मारिफ-ए-इस्लामी”-भाग-23 पेज-173 पर दर्ज है: प्राचीन मिस्र के मुसलिम भूगोलशास्त्री हिन्द शब्द को सिंध के पूर्वी क्षेत्रों के लिए इस्तेमाल करते थे। हिन्द से दक्षिण पूर्व एशियाई देश भी मुराद लिए जाते थे। इसलिए जब हिन्द के बादशाह और हिन्द के इलाके कहा जाता था तो उससे सिर्फ हिन्द ही मतलब नहीं था, बल्कि इसमें इंडोनशिया, मलाया आदि शामिल समझे जाते थे और जब सिंध कहा जाता था तो इसमें सिंध, मकरान, बलूचिस्तान, पंजाब का कुछ हिस्सा और पश्चिमोत्तर सीमांत प्रांत शामिल समझे जाते थे। ऐसा कोई एक नाम नहीं था जो पूरे हिंदुस्तान के लिए लिया जा सके। हिन्द और सिंध मिलकर हिंदुस्तान को प्रदर्शित करते थे। अरबी और फारसी में हिंदुस्तान का भौगोलिक हाल बयान किया जाता था तो इसमें हिन्द और सिंध के हालात शामिल होते थे। यह भी कहा गया है की मुसलमानों के हिंदुस्तान में आने से पहले कोई नाम ऐसा न था जो पूरे देश पर लागू हो। प्रत्येक प्रांत का अपना अलग नाम था। फारस वालों ने जब इस देश के एक प्रांत पर कब्जा कर लिया तो उस दरया के नाम पर जिसे अब सिंध कहते हैं, हिन्धू नाम रखा क्योंकि प्राचीन ईरान पहलवी भाषा और संस्कृत में स और ह को आपस में बदल लिया करते थे, इसलिए फारस वालों ने हिन्धू कहकर पुकारा। अरबों ने सिंध को तो सिंध ही कहा, लेकिन इसके अलावा हिंदुस्तान के अन्य क्षेत्रों को हिन्द कहा और अंत में यही नाम पूरी दुनिया में फैल गया। फिर ह का अक्षर अ में बदल कर यह नाम फ्रेंच में इंड और अंग्रेजी में इंडिया की सूरत में प्रसिद्ध हो गया.


एतिहासिक पक्ष

असल में ये सब मनगढ़ंत बातें है और अगर ये भविष्यवाणी थी भी तो पूरी हो चुकी है क्योंकि मुहम्मद कासिम या महमूद गजनी का हमला ही गज था (जैसा इब्ने कसीर ने अल बिदाया में लिखा है) जो कि नबी के जाने के बाद जल्दी ही पेश आया था। इसमें भी नबी मौजूद नहीं थे हम जानते हैं कि  हादिसो में मिलने वाली नबी की अधिकतर भविष्यवाणी फोरन बाद के लिए ही थी जैसे तीन मुल्को कि फतह को एक चट्टान को तीन चोटों से तोड़ने वाले वाकये में तमसील शक्ल में भविष्यवाणी करना, या 5 शुरवाती खलीफाओं का खिलाफत का वक़्त बताना। अगर कोई इन भविष्यवाणियों हदीसों में जाती फायदों के लिए वाक्यात होने से पहले या बाद में मिलाया गया है तो फिर इसे मुहम्मद कासिम के सिंध अभियान से जोड़ना सही मालूम होता है. हालांकि इसके खिलाफ यह दलील दी जाती है कि उस इलाके को हिद नहीं सिंध कहते थे इसलिए यह गज अभी भी होना बाकी है।


तार्किक पक्ष

●   नबी की छोटी-बड़ी मिलाकर लगभग 47 जंगे हुई और उनसे कुछ बातें साफ हैं:- गज का मतलब है वो जंग जिसमें नबी खुद शामिल हो। कुल 9 गजवात हुए (कोई अपवाद नहीं या केवल एक अपवाद के साथ) जिनमें नबी खुद शरीक हुए (तकरीबन 50 हदीसो से वाज़ेह है). बाकी दूसरी जंगों को सरिया कहा जाता है। सरिया में नबी खुद शरीक नहीं हुए, मगर काफिले भजें (20-30 से हादिसो से वाज़ेह है). नबी ने ये लफ़्ज़ इस्तेमाल नहीं किए, सभी हादिसो में साहबा ने ये लफज़ कहे। गज तूबउक में आप गए थे मगर आखिर में कोई जंग नहीं हुई तो ऐसे ही वापिस आ गए. हालांकि उससे रिजल्ट्स जो चाहिए थे वो हासिल हो गए थे. हादिसो में फतह मक्का को गज ए मक्का कहा गया है। जंगे मुतह रोमन के साथ हुई। नबी खुद शरीक नहीं हुए। मगर इसके लिए दोनों लफ़्ज़ इस्तेमाल किए गए हैं। इसमें नबी दिमागी तौर पर बहुत ज़्यादा शामिल थे. इसलिए अब कोई गज हो ही नहीं सकता क्योंकि अब नबी मौजूद ही नहीं है. 

अगर इसे सच भी माना जाये तो यह जंग की नहीं बल्कि दावत की बात है जैसे सूफीयों में हिंदुस्तान में इस्लाम कि तालीमात पेश करी। क्योंकि नबी की गज़ हिद में रूहानी शिकरत ही मुमकिन है, जिसमानी नहीं. जैसे जंगे उहद और जंगे बदर में फरिश्तों ने शिरकत करी थी। यानी नबी की presence अब तमसीली ही possible है तो जंग भी तमसीली ही होगी यानि वैचारिक, न कि हथियारों के साथ। फिर हिद दुनिया को रास्ता दिखाएगा और दुनिया को जीतेगा। कुरान हदीस से साबित है कि एक कौम तब्दील हो कर आएगी। आपकी तलीमात यंहा से फिर आगे पूरी दुनिया में फैलेगी। वैसे शब्द गज का अर्थ सफर और शांति यात्रा भी होता है.

● आखिरी बात यह है कि यह ज़रूरी नहीं कि हिद पर ही हमला होगा, हो सकता है हिद ही किसी पर हमला करके गज कर दे.


 

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