Tuesday, 10 December 2024

चार शादी, तीन तलाक, हलाला, रजात


चार शादी


इस्लाम ने अनगिनत शादियां करने पर 4 शादियों की रोक लगाई है. किसी भी धर्म में ये रोक नही है. हिन्दू धर्म में यह रोक डॉक्टर अंबेडकर के लाये कानून के द्वारा लगी थी. क्योंकि इन्सान को एक से ज्यादा शादि करने की कभी भी ज़रूरत पड़ सकती है इसलिए इसकी अनुमति दी गयी है. हालाँकि ज़रूरत पड़ने पर एक से ज्यादा शादियों पर शर्ते या रोक सरकार लगा सकती है।


4.3: और अगर तुमको अन्देशा हो कि (निकाह करके) तुम यतीम लड़कियों (की रख-रखाव) में इन्साफ न कर सकोगे तो और औरतों में अपनी मर्ज़ी के मवाफ़िक दो-दो और तीन-तीन और चार-चार निकाह करो (फिर अगर तुम्हें इसका) अन्देशा हो कि (मुततइद) बीवियों में (भी) इन्साफ न कर सकोगे तो एक ही पर इक्तेफ़ा करो या जो (लोंडी) तुम्हारी ज़र ख़रीद हो (उसी पर क़नाअत करो). ये तदबीर बेइन्साफ़ी न करने की बहुत क़रीने क़यास है.

4.2: और यतीमों को उनके माल दे दो और बुरी चीज़ (माले हराम) को भली चीज़ (माले हलाल) के बदले में न लो और उनके माल अपने मालों में मिलाकर न चख जाओ क्योंकि ये बहुत बड़ा गुनाह है

2.241: इसके तहत खर्चा या मेनटेनेंस देना अनिवार्य है। शाह बानो केस का यही मुद्दा था।


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शादी-तलाक

इस्लाम में शादी एक कान्ट्रैक्ट है। मगर सबसे अहम कायम किया जाने वाले रिश्ता भी है. आने वाली नस्लों का दारोमदार इस पर ही है।  शादी के लिए दोनों की सहमति चाहिए। यह कन्यादान की तरह नहीं है क्योंकि निकाह में लड़की की सहमति चाहिए होती है। शादी को आधा धर्म माना गया है और इसे निभाने पर बहुत जोर दिया गया है। तलाक को हलाल कामों में सबसे ज़्यादा नापसंदीदा काम माना गया है। शादी को टूटने से बचाने के लिए झूठ बोलने तक को गुनाह नहीं माना जाता.  मगर जब दंपति के पास कोई चारा न हो तो तलाक किया जा सकता है. आखिरी दर्जे में इसे करने की हिदायत दी गयी है. मगर एक मुनासिब हद तक ही रोकने की कोशिश होगी, उसके बाद नहीं. क्योंकि शादी अनुबंध है तो एक व्यक्ति अगर साथ रहना बिलकुल न चाहे तो अलग हो जाने में कोई हर्ज़  नहीं है। औरत और मर्द दोनों अलग हो सकते हैं, बस दोनों के अलग होने का तरीका या प्रकिया भिन्न-भिन्न है। हिन्दू धर्म में तो तलाक का कांसेप्ट नहीं है और न ही इसके लिए ग्रंथों में कोई धार्मिक तौर निर्धारित शब्द है.

आज के दौर में तलाक का फैसला अदालत करती है। इस्लाम ने अदालत को तलाक का फैसला देने का अधिकार नहीं दिया बल्कि दम्पति को दिया है क्योंकि यह तो सिर्फ वो दोनों ही जानते हैं कि क्या और कंहा असल समस्या है। हो सकता है, बाहर वालों को कुछ अंदुरुनी बातें, बचकाना लगे मगर अक्सर मियाँ-बीवी के लिए वो बहुत बड़ी बातें होती हैं.  

अगर आपके पर्सनल या ज़ाती कानून वाकई फायदेमंद हैं तो पूरी दुनिया उन्हें कुबूल करेगी की वो सही है। अगर गलत हैं तो पूरी दुनिया उन पर सावल उठाएगी। कुरान में तलाक के बारे में बहुत तफसील से लिखा हुआ है मगर फिर भी मुस्लिम अनजान रहते हैं. कुरान में एक प्रक्रिया है जिसे समझने के बाद हर कोई कहेगा यह बेहतरीन तरीका है. दीन कोई गैर फितरी बात नहीं कहेगा.

 

तलाक का कुरानिक प्रोसीजर

4.19: बीवियों के साथ अच्छा सुलूक करते रहो और अगर तुम किसी वजह से उन्हें नापसन्द करो (तो भी सब्र करो क्योंकि) अजब नहीं कि किसी चीज़ को तुम नापसन्द करते हो और ख़ुदा तुम्हारे लिए उसमें बहुत बेहतरी कर दे.

2.225:  अल्लाह तुम्हें तुम्हारी ऐसी कसमों पर नहीं पकड़ेगा जो यूँ ही मुँह से निकल गई हो, लेकिन उन क़समों पर वह तुम्हें अवश्य पकड़ेगा जो तुम्हारे दिल के इरादे का नतीजा हों।

4.35: और यदि तुम्हें पति-पत्नी के बीच बिगाड़ का भय हो, तो एक फ़ैसला करने वाला पुरुष के लोगों में से और एक फ़ैसला करने वाला स्त्री के लोगों में से नियुक्त करो, यदि वे दोनों सुधार करना चाहेंगे, तो अल्लाह उनके बीच अनुकूलता पैदा कर देगा। निस्संदेह, अल्लाह सब कुछ जानने वाला, ख़बर रखने वाला है।

2.226:  जो लोग अपनी स्त्रियों से अलग रहने की क़सम खा बैठें, उनके लिए चार महीने की प्रतिक्षा है। फिर यदि वे पलट आएँ, तो अल्लाह अत्यन्त क्षमाशील, दयावानहै.

2.227: और यदि वे तलाक़ ही की ठान लें, तो अल्लाह भी सुनने वाला भली-भाँति जानने वाला है.

2.228:  और मुतललाक़ा (जिन औरतो को तलाक़ दी गई हो वोह) अपने आपको तीन महावारी के वक़्त तक इंतेजार में रखे, और उन जाइज़ नही है कि वो छिपाये जो गर्भाशय में है, और पति अगर इस वक़्त में उनकी वापसी चाहते है तो वो इसके ज़्यादा हक़दार है, अगर उनका इरादा इस्लाह करने का हो, तो उनके पतियों पर हक़ है जैसे उन पर पतियों के हक़ है.

2.231:  जब तलाक दे दो और इद्दत पूरी होने को आ जाए, तो फिर या तो भले तरीके से उन्हें अपने पास रख लो या फिर भले तरीके से उन्हें रुख़सत कर दो, उन्हे तक़लीफ़ पहुँचाने के लिए मत रोको, ये ज़्यादती होगी.

2.232:  जब तलाक़ दो और वो अपनी इद्दत पूरी कर ले, तो उन्हें अपने पहले शौहर से निकाह करने से मत रोको, जबकि वो दोनों)आपस मे भले तरीके से निकाह करने पर राज़ी हो.

65.1:  जब तलाक़ दो तो उनकी इद्दत के हिसाब से दो। और इद्दत की गणना करो और उन्हें उनके घरों से न निकालो और न वे स्वयं निकलें.

65.2:  वे अपनी नियत इद्दत को पहुँचे तो या उन्हें रोक लोया अलग कर दो। और अपने में से दो न्यायप्रिय आदमियों को गवाह बना दो.

दावूद 2186: एक सहाबी फरमाते है कि तलाक देते और वापिस लेते हुए किसी को गवाह बनाओ

Muslim 1471, दावूद 2181, 2182: उमर के बेटे अब्दुल्लाह ने बीवी को हैज़ के दौरान तलाक दिया, नबी ने कहा उसे वापिस लो और पाक होने पर तलाक दो, फिर अगले हैज़ के बाद चाहो तो रखो या छोड़ दो. (कुछ उलेमा मानते हैं कि देना नहीं चाहिए था मगर तलाक हो गया. जबकि इब्ने तय्य्मिया ने कहा है कि नबी ने फरमाया जिसने ऐसा अमल किया जो हमारे तरीके पर नहीं था उसे रद्द माना जायगा. तलाक कर तरीका कुरान में दिया है तो फिर यह अमल नहीं माना जायगा.)

 

तलाक की शर्तें

जैसे शादी के लिए दो गवाह चाहिए, वैसे ही तलाक के लिए 2 गवाह चाहिए होते है। साथी है कुछ शर्ते हैं जैसे की सबसे पहले दोनों अपनी शादी बनाए रखने की पूरी कोशिश करेंगे। बात न बनी तो दोनों ओर से एक एक व्यक्ति को मध्यस्त बना कर हल निकालने की कोशिश करंगे यानि हकम मुकर्रर हो जो सुलह की कोशिश करें। फिर भी बात नहीं बनी तो तलाक दिया जाएगा। तलाक देने के बाद घर में ही रखना है। यह वक्त 3 महीने का है। और साथ ही अच्छे तरीके से औरत को रखने का हुकूम है। इस दौरान मेनटेनंस देना है। अगर बाद में मन बदला तो दो 2 गवाहों के साथ तलाक को वापिस लिया जा सकता है। और अगर अगले 3 महीने मे रुजू नहीं किया तो तलाक हो जायगा।

बुखारी की रिवायत है कि अमल का दामोदार नियत पर है. ईमाम शाफी ने कहा की 1/3 दीन इसी में है. नियत न हो या मज़ाक में कहा हो तो तलाक नहीं होता, जैसे निकाह भी नहीं हो सकता.  ध्यान रखना होगा कि तलाक देने वाला नशे या गुस्से में न हो। गुस्से के हल्के भाव में जब आदमी को अच्छी तरह पता हो कि वो क्या कह रहा है, तब तलाक मानी जाएगी। औरत के हेज (माहवारी) के दिनों में तलाक नहीं दे सकते। उसके गर्भवती होने की हालत में इददत तब तक होगी जब तक वो बच्चे को जन्म न दे दे। अगर किसी और के जरिए बनाई गई झूठ या गलत बुनियाद को सच मानकर तलाक दिया जाता है तो भी तलाक नहीं होता। यानि तलाक के लिए नियत हो, गवाह हो, पाकी की हालत हो. 

दोनों खानदान के दो लोगों को शामिल करना और तलाक देते या वापिस लेते हुए दो गवाह बनाना शर्त है। हालंकी उलेमाओं को ये भी मानना है कि तलाक देने या वापिस लेने के बाद किसी को गवाह कर लेना भी स्वीकार्य है। ज़ाहिर है हम बिस्तरी के जरिए हुआ रुजू अकेले में ही हो सकता है। कुरान (65.2) की दी हिदायत कि तलाक देते हुए या वापिस लेते हुए दो गवाह बना लो, इसे उलेमा की अकसरियत एक recommendation and preference मानते है। हालंकी इस बारे में कुरान की आयात साफ है।

 

नसाई 3559: हजरत अब्दुल्ला बिन उमर ने अपनी पत्नी को तब तलाक दे दिया जब वह मासिक धर्म से गुजर रही थी, और उमर पैगंबर के पास गए और उन्हें इसके बारे में बताया। उन्होंने उसे तब तक वापस लेने का आदेश दिया जब तक कि वह शुद्ध न हो जाए।

दावूद 2186: हजरत इमरान इब्न हुसैन से एक ऐसे व्यक्ति के बारे में पूछा गया जो अपनी पत्नी को तलाक देता है और फिर वापिस लेता है, लेकिन वह न तो उसके तलाक के लिए और न ही उसकी बहाली के लिए कोई गवाह बनाता है। तो उन्होंने कहा कि तुमने सुन्नत के विरूद्ध तलाक दिया और सुन्नत के विरूद्ध ही वापस लिया। इसलिए तलाक और वापसी की गवाही देने के लिए किसी को बुलाओ और इसे कभी दोबारा न दोहाराना।


तीन तलाक

पहले तलाक के बाद फिर दोनों चाहे तो वापिस आपस में शादी कर लें या किसी दूसरे से शादी कर ले। मान लो फिर से दोनों ने आपस में नए मेहर के साथ शादी कर ली और फिर से तलाक की नौबत आ गई तो फिर से तलाक का यही procedure इस्तेमाल करना होगा। तीन महीने बाद जब ये दुबारा तलाक होगा तो यह दूसरा तलाक होगा। इसके बाद दोनों ने फिर से आपस में तीसरी बार शादी कर ली और फिर से तीसरी बार तलाक की नौबत आ गई तो अब तीसरी बार तलाक होने के बाद वो वापिस आपस में शादी नहीं कर सकते हैं। क्योंकि इन्होंने शादी को हंसी-मज़ाक, खेल बना दिया है। अब दोनों को अलग अलग लोगों से शादी करनी होगी। पुराने पति या पुरानी पत्नी से अब तीसरी बार शादी हलाल नहीं होगी। 

एक बार तलाक कहने के बाद और इददत खतम होने से पहले दूसरी या तीसरी बार तलाक कहने के बावजूद भी एक ही तलाक माना जायगा मगर तब जब यह इददत पूरी हो जाए और तलाक वापिस न लिया जाए। दूसरा तलाक तभी होगा जब वो पहले तलाक के बाद वापिस शादी कर ले। वैसे ज़यदातर उलेमा इसे तीन तलाक ही मानते है।

हालांकि शेख  उथयमीन कहते हैं कि एक बार में तीन तलाक नहीं होता बशर्ते कि आदमी तलाक दे, फिर इददत से पहले वापिस ले ले, फिर तलाक दे दे या फिर तलाक दे और इददत खतम हो जाए, इस तरह दूसरा तलाक वाकई तलाक माना जायगा और फिर इसके बाद फिर से शादी कर ले और फिर से तलाक दे दे और इसी तरह तलाक तीन बार हो जाए, इसके अलवा तीन तलाक माने जाएंगे। यही शेख इबने तेयमिया का था (Ash-Sharh al-Mumti 13/94).  शेख इबने तेयमिया कहते हैं कि पहले तलाक देने के बाद अगर वापिस नहीं लिया, और फिर से तलाक दे दिया और फिर वापिस नहीं लिया और फिर तीसरी बार तलाक दिया और वापिस नहीं लिया तब ये तीन तलाक नहीं माने जाएंगे क्योंकि इसके लिए तलाक वापिस लेना या फिर से फिर से शादी करने के बाद होगा।

[नोट: हालाँकि असल मत यह है कि पहली बार तलाक कहने के बाद अगर इद्दत के दौरान वापिस रुजू हो ला जाते हैं, तो यह व्यवहारिक तौर पर पहला तलाक नहीं होगा मगर इस तरह मर्द ने अपना 3 तलाक के हक में से 1 जाया कर दिया है, इसलिए अब उसके बाद सिर्फ 2 मौके और बचे हैं. अगर आइन्दा भी वो ऐसे ही दूसरी और तीसरी बार तलाक देकर रुजू कर लेता है तो तीसरी बार वो रुजू नहीं कर सकता और अब औरत की किसी और से शादी लाज़मी हो जायगी. यानि पहला तलाक देके इददत में वापिस ले लिया और फिर दूसरा देके भी इददत में वापिस ले लिया और फिर तीसरा दिया तब ये तीन तालक माना जायगा। जावेद अहमद गामिदी का यही  मओकिफ़ है। हालांकि सय्यद अब्दुल्लाह तारिक का मओकिफ़ है कि हर तलाक के बाद शादी होगी तभी यह तीन तलाक मांगे जाएंगे।]



मर्रातान तलाक: (वापसी योग्य) तलाक – डबल है या दो बार है?

2:229 : (वापसी योग्य) तलाक 2 बार है. फिर (तीसरी बार) रोक लिया जाये या विदा कर दिया जाए  (यंहा 2 बार के लिए मर्रतान लफ्ज़ आया है). 

जैसे दिन में दवाई की 3 बार डोज़ लेने की बजाए ट्रिपल डोज़ एक साथ ले लो तो फायदा नहीं, नुकसान होगा। जैसे मेहमान ने 2 गिलास लगातार पानी पिया तो कहंगे पानी पिया, न कि 2 बार पानी पिया. अगर वक़्ती फ़ासलों पर 2 बार पानी पीया होता तो कहते कि 2 बार पानी पिया.


मर्रह/मर्रतन– 1,  मर्रतान/मर्रतेन – 2,  मर्रात – 3

●  9.126: हर साल 1 या 2 बार अजमाइश में डाले जाते हैं. (यंहा 1 के लिए मर्रह/ मर्रतन लफ्ज़ हैं और 2 के लिए मर्रतेन लफ्ज़)

[जैसे बुखार आया, जिसके बाद थोडा ठीक हुआ मगर फिर टायफायड हो गया. तो इसे कहेंगे कि एक बार बीमार हुआ।]

17:4 :बनी इस्राइल को कहा कि तुम 2 बार फसाद फैलाओगे. (यंहा भी 2 बारे के लिए मर्रतेन लफ्ज़ है)

एक बार फसाद ह. दावूद के दौर में हुआ और एक बार ह. ईसा के दौर में. The gap between first and second Israeli Rampage was of 650 years.

जैसे कंही 4 दिन झगडा हुआ और 1 दिन रुका और फिर शुरू हुआ अगले 5 दिन चला तो कहंगे 10 दिन चला, न कि कहंगे कि 2 बार झगडा हुआ. 

24:58: तुम्हारे पास 3 समयों पर अनुमति लेके आये (यंहा 3 के लिए मर्रात लफ्ज़ आया है)

 

एक बार में तीन तलाक

रसूल और अबू बक्र के जीवनकाल में 3 तलाक (एक ही समय में) को 1 ही माना जाता था. नबी ने अपने सामने आए ऐसे केस में ऐसे दी गई 3 तलाक को 1 ही माना था और कहा था कि क्या अब मेरे सामने ही अल्लाह की किताब के साथ खेला जायगा। लेकिन जब उमर के खिलाफत (पहले दो साल) के दौरान लोग बार-बार तलाक कहने लगे तो उन्होंने उन्हें ऐसा करने की अनुमति दी (एक बार में 3 तलाक की घोषणा को 1 तलाक के रूप में मानने के लिए). फिर हज़रत उमर ने एक केस में एक ही समय में दी गई 3 तलाक को 3 ही माना, सज़ा देने के तौर पर।

इसलिए लोग एक बार में 3 तलाक बोल देते हैं या दे देते हैं तो आज ज्यादातर उलेमा इसे 1 नहीं बल्कि 3 तलाक ही मानते हैं.

अगर तलाक की कोई शर्त पूरी न हो पाए तो भी उलेमा की अकसरियत इसे तलाक मानती है, जबकि असल में ऐसे केसेस की फाइनल औथोरीटी नबी या उनके representative के पास होती है या फिर इस्लामी हुकूमत के पास या उसकी representative court के पास। ये लोग या इदारे हालात, वजूहात वगैरह की तह तक जाके फैसला देंगे। जबकि बाज़ उलेमा का ऐसा भी मानना है कि तलाक की कोई भी शर्त रह जाने पर तलाक नही होगा। नबी ने इसी तरह के केसेस में तलाक नहीं माना था जबकि ह. उमर ने माना था।  इसलिए ये फैसले (नियत, मजाक, गुस्सा, नशा, हैज़, गवाह, तीन तालक) क़ाज़ी वगैरह को लेने चाहिए जो हालात, वजूहात के मद्देनजर केस टू केस ऐसे फैसले लेगा जैसे नबी और हजरत उमर ने किये थे।

नसाई 3401: किसी के एक बारे में 3 तलाक देने पर नबी ने गुस्से में कहा कि अभी मैं तुम्हारे दरमियान मौजूद हूँ और अल्लाह की किताब से खेला जा रहा है. एक सहाबी ने कहा की उसकी गर्दन उड़ा दूं?

दावूद 2196, 2197: नबी ने एक बार में कही गयी 3 तलाकों को 1 ही माना.

दावूद 2199, 2200: नबी, ह. अबु बकर के दौर में और उमर के शुरवाती दौर में एक बार में कही 3 तलाक 1 ही मानी जाती थी.

(उमर ने इसे रोकने पर जोर दिया और इसे रोकने के लिए एक कानून भी लाये. वो 3 को 1 मान कर कोड़े भी लगवाते थे)

फतह अल-बारी, तलाक का बाब: सईद बिन मंसूर ने अनस से बयान किया है कि जब कोई व्यक्ति उमर के सामने पेश किया जाता था जो अपनी पत्नी को 3 तलाक देता था, तो उमर उसकी पीठ पर कोड़े लगवाते थे।

नसाई 3557: इब्ने उमर ने कहा कि यदि यह पहला या दूसरा तलाक है, तो पैगंबर उससे कहेंगे कि उसे वापस ले लो और उसे तब तक रखो जब तक कि वह फिर से मासिक धर्म न कर ले और खुद को शुद्ध न कर ले, फिर उसके साथ संभोग करने से पहले उसे तलाक दे दे। लेकिन अगर यह एक साथ 3 तलाक था, तो आपने तलाक के तरीके के संबंध में अल्लाह की अवज्ञा की है और आपकी पत्नी अपरिवर्तनीय (अब वापसी नहीं) रूप से तलाकशुदा हो गई है।

कुछ कहते हैं कि एक पाकी की हालत में एक तलाक दो, दूसरी पाकी में दूसरा तलाक और तीसरी पाकी में तीसरा तलाक दो. यानी इद्दत ख़तम न होने दो. यह ऐसे ही जैसे किसी को नौकरी से निकालने का टर्मिनेशन लेटर दे दिया और फिर दो बार और लैटर दे दिया, तो वो कहेगा पहले काम पर रख तो लो फिर बार बार टर्मिनेट करना।

{एक वक़्त में 3 बारे कही तलाक को 1 ही मानने वाले यह समझे लें कि पहली बार लफ्ज़ तलाक कहते ही अगले सेकंड से इद्दत शुरू हो गयी है. दूसरा तलाक तो अब बाद में होगा.}


हलाला

तीसरे तलाक के बाद औरत ने किसी नए मर्द से शादी करी और शादी के बाद नए जीवन में भी बात नहीं बनी और वंहा भी procedure के बाद तलाक हो गया तो फिर अब वो वापिस अपने पुराने पति के साथ शादी कर सकती है। यानि पुराना पति अब उस पर हलाल हो गया। यही हलाला है। अगर तलाक का सही प्रोसीजर इतेमाल करे तो हलाला की तौबत कभी आयगी ही नहीं. तलाक के प्रोसिजर के गलत इस्तेमाल के बाद ही हलाला की नौबत आती है.

अब होता यह है कि यह तीन तलाक, तीन बार में होना था यानि तीन बार शादी और तीन बार ही तलाक। मगर जहालत में लोग और उलेमा इसे 3 मान लेते हैं जिसकी वजह से अब वो वापिस शादी नहीं कर सकते और औरत को अब नय पति के साथ, सच्ची नियत से शादी करनी होगी। मगर किसी और से शादी उस औरत और उस आदमी को बर्दशात नहीं होता तो वो किसी अपने जानकार से temporary शादी करवा देते हैं और वो उससे तलाक दिलवा कर खुद आपस में फिर से शादी कर लेते है। यह temporary शादी का काम आग कुछ उलेमा भी करने लगे है क्योंकि कई बार temporary शादी करने वाले ने बाद में नियत खराब होने पर तलाक देने से मन कर दिया। पाक में अब तो इसके लिए बाकायदा एजेंसिया बन चुकी है. एक बार में दी गई 3 तलाक को सभी मसलक वाले गलत मानते हैं मगर फिर उसे फॉलो भी करते हैं। सवाल ये उठता है कि अगर तीन तलाक वाकई बुरी बात है तो फिर धर्म का हिसा क्यों बना रखा है? दूसरी तरफ ये temporary शादी के मुद्दे को लेकर अगर आप किसी भी मुफ्ती से तलाक की बात का बिलकुल भी जिक्र न करते हुए यह पूछेंगे कि 3 दिन की नियत से निकाह करना चाहता हूँ तो मुफ्ती आपको भगा देगा कि ये तो हराम है। मगर यही मुफ्ती तलाक के मुद्दे पर इसी शादी या हलाला को करने की इजाजत दे देता है। इसी तरह शियाओ में मुता (temporary marriage) का मामला है, मुता के मायने enjoyment or use से है. 

2:230: फिर अगर तीसरी बार भी औरत को तलाक़ (बाइन) दे तो उसके बाद जब तक दूसरे मर्द से निकाह न कर ले उस के लिए हलाल नही हाँ अगर दूसरा शौहर निकाह के बाद उसको तलाक़ दे दे तब अलबत्ता उन मिया बीबी पर बाहम मेल कर लेने में कुछ गुनाह नहीं है अगर उन दोनों को यह ग़ुमान हो कि ख़ुदा हदों को क़ायम रख सकेंगें और ये ख़ुदा की (मुक़र्रर की हुई) हदें हैं जो समझदार लोगों के वास्ते साफ साफ बयान करता है

प्लान के साथ किया गया हलाला जायज़ नहीं है. नबी ने ऐसे मर्द और औरत पर लानत करी है जो हलाला करते हों. ह. उमर ने अपने दौर में प्लांड हलाला करने वालो को पत्थरों से मार मार कर मौत की सजा का ऐलान किया था.

 

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रैप या हलाला विक्टिम

 

एक सच्चे केस में ससुर ने रैप किया, उलेमा ने शौहर से शादी टूट गयी का हुकुम दिया और ससुर के पल्ले बाँध दिया. जबकि कुरान में साफ़ है कि:

24:33 जो शख्स उनको मजबूर करेगा (जिना) तो इसमें शक नहीं कि ख़ुदा उसकी बेबसी के बाद बड़ा बख्शने वाले मेहरबान है.

2:173 जो बहुत मजबूर और विवश हो जाए, वह अवज्ञा करने वाला न हो और न सीमा से आगे बढ़ने वाला हो तो उसपर कोई गुनाह नहीं (खाने पीने के बारे में हलाल हराम पर हिदायत मगर यह एक जनरल रूल भी है)

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औरतों के लिए एक से ज़्यादा पति रखना नाजायज़ क्यों?

औरतों की 4 शादी जायज़ नहीं होने के पीछे दिए कुछ तर्क दिए जाते हैं जैसे मर्द का नेचुरली polygamist होना है या वल्दियत का मालूम नहीं पड़ना। हालांकि ये तर्क अब पुराने हो चुके हैं मगर आज भी एक हद तक ये सही हैं. असल में मर्द को फितरतन कई औरतों की ज़रूरत नहीं होती है। यह एक गलत धारणा है। आदम के लिए एक हव्वा थी। मगर फिर भी पूरी दुनिया में मर्द ही ज़्यादातर एक से ज़्यादा शादियां करते हैं। इसी तरह बच्चे के बाप का पता करने के लिए आज डीएनए टेस्ट मौजूद है मगर फिर भी दुनिया की ज़्यादातर आबादी के पास आज भी इसे इस्तेमाल करना मुश्किल है जिसकी वजह हैं गरीब या अल्पविकसित होना। जबकि आज से कुछ दशक पहले तक बच्चे के बाप का पता लगाना मेडिकली बिल्कुल असम्भव था। 

इन तर्कों के अलावा भी कुछ तर्क हैं जैसे आम तौर पर औलाद को बाप से ही निसबत किया जाता है इसलिए बाप का नाम एक ही होना बहुत ज़रूरी है। दुनिया भर के समाजों में विवाह, खानदान आदि के मामलों में मर्द को ही वरीयता प्राप्त है इसलिए माशरे में पहले से चले आ रहे निजाम के गड़बड़ाने के इमकान पैदा हो जायंगे। ऐसे बच्चों को समाज द्वारा बुरा-भला कहा जाता (बास्टर्ड या दोगला जैसी गालियों से पुकारा जाता है) जिससे उनकी शक्सियात पर गलत असर पड़ता है। घर के रख-रखाव और बच्चों की देखभाल-परवरिश की ज़िम्मेदारी औरत निभाती है और ऐसी स्थिति में इतने सारे घर-परिवारों का ख्याल रखना उसके लिये आसान नहीं होगा। शादी के बाद औरत ही अक्सर अपना घर छोड़ कर आती है, न कि मर्द इसलिए कौन, कब, कितना, किसके साथ रहेगा जैसी ब मुश्किल हल होने वाली मसलिहतें पैदा हो जायँगी। एक औरत के लिए अपना काम-काज, घर-बार छोड़कर बार-बार अलग-अलग पतियों के पास जाना एक कठिन काम है। एक गर्भवती औरत से उसके सभी पति कई महीनों तक जिस्मानी ताल्लुक नहीं बना सकते, ऐसे में पतियों की ज़रूरत पूरी नहीं होगी। 

कुछ और भी अहम वजह मौजूद हैं जैसे खानदान का इदारा एक जोड़े से बनता है, औरत घर की बुनियाद होती है। ऐसे में कोई एक घर भी सही से बन ही नहीं पायेगा। जबकि एक मर्द की कई बीवी होने के बावजूद एक पत्नी एक घर की मालिक होती है और दूसरी अपने घर की मालिक होती है जिससे अलग अलग घर वजूद में आ जाते हैं। मर्द की ज़िम्मेदारी कमाने और खर्चे की होती है इसलिए उसके लिए कई घर चलाना तुलनात्मक तौर पर आसान है। औरत को शोहर की वसीयत में हिस्सा मिलता है और इस वजह से गलत या आपराधिक नीयत वाली औरतें या परिवार, कई शादियों के जरिये अलग अलग पतियों जायदात इकट्ठा कर सकते हैं।

आसान शब्दों में यह समझ लीजिए कि जिस तरह एक इंसान चार कंपनियों का सरबरा हो सकता है मगर चार कंपनियों का मुलाजिम नहीं, उस तरह एक मर्द तो कई औरतों का पति हो सकता है मगर एक औरत कई पतियों की पत्नी नहीं हो सकती। यह वैसे ही जैसे एक मोमिन और मुशरिक की शादी नहीं हो सकती।


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रजात

Muslim 1453a: I see on the face of Abu Hudhaifa (signs of disgust) on entering of Salim (who is an ally) into (our house), whereupon Allah's Apostle () said: Suckle him. She said: How can I suckle him as he is a grown-up man? Allah's Messenger () smiled and said: I already know that he is a young man. In the narration of Ibn 'Umar (the words are): Allah's Messenger () laughed.

यंहा पर नबी के हंसने की बात कहना असल में आप पर बेहयाई का इलज़ाम है (हालाँकि इसके सभी तुर्क देखे जाए तो बात वाज़ेह हो जायगी).

2:233: बच्चो को दो साल दूध पिलायें

31:14: उसको दो साल लगे दूध छोड़ने में.

46:15: ढाई साल हमल और रजात में लगे.

यानी 30 में से 9 महीने हमल के हटाओ तो 21 से लेके 24 महीने में दूध छुडवाना है. इसके बाद दूध नहीं पिलाना तो फिर कैसे किसी वयस्क को दूध पिलाया जा सकता है.

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 फतवा

नबी के वक्त सेही काजी का औदा चला आ रहा था यानि judge का जो लोगो के बीच फैसले करवाता था। काजी खुद कोई cognizance नहीं लेता था। बाद में समाज बढ़ा तो सवाल जवाब बढ़ने लगे क्योंकि नए नए लोग इस्लाम में आ रहे थे। तो फिर मुफ्तीमुफ्ती पद पैदा हुए जो ऐसे जवाबात देते थे। मुफ्ती नाम की कोई post नहीं थी। पूछना के मायनों से मुफ्ती लफ़्ज़ बना है। फिर लोग इन मुफ़तीयों से दूसरों पर राय लेने लगे।  जबकि इन्हें दूसरों से कोई मतलब नहीं होना चाहिए था।  फिर ये मुफ्ती खुद cognizance लेने लगे। ये मुफ्ती इस्लाम और मुस्लिम के बीच के लोग बन गए। जबकि लोग खुद इस्लाम का मुताला करके फैसला कर सकते हैं कि क्या सही है और क्या गलत। दीन तो है ही फितरत का नाम। 

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तलाक के मुद्दे को 3 हिस्सों में  बांट कर समझ सकते हैं

(A) इस्लाम के तलाक पर दिए कानून और हिदायतें. (B) मुस्लिम उलेमा द्वारा इनका निफाज़. (C) गैर मुस्लिम समाजों या अदालतों में तलाक सम्बंधित नियम और क्रियाएं.

●(A) पहला इस्लाम के तलाक पर दिए कानून और हिदायतें.

1. इस्लाम के मुताबिक मर्द को घर का सरबरा बनाया गया है और उसको ज़िम्मेदार बनाया गया है. इसलिए उसे तलाक का सुविधाजनक पहला हक दिया गया है. इस्लाम के मुताबिक औरत पर घर को चलाने की जिम्मदारी नहीं रखी गयी है, ये उनके लिए एक सहूलत है. मगर तलाक का हक उन्हें भी दिया गया है, पर यह मर्दों के तरीके से अलग हैं.

2. इस्लाम ने तलाक पर ने मर्दों के लिए एक प्रक्रिया और निर्देश दिए हैं. घर का खर्चा चलाने के अलावा, निकाह के बाद मर्द को औरत को मेहर देना, निकाह पर वलीमा करना, तालाक पर मता (2:236, 2:241) (यानी मुनासिब खर्चा-हर्जाना) देना ज़रूरी है यानी उस पर कई माली जिम्मेदारियां आ पड़ती है. इस्लाम ने तलाक पर औरतों के लिए भी एक प्रक्रिया और निर्देश दिए गए हैं.  ये तरीका मर्दों से अलग इसलिए है क्योंकि निकाह के बाद उन पर कोई माली ज़िम्मेदारी नहीं आती है बल्कि मेहर, वसीयत, गिफ्ट वगैरह मिलते हैं.

3. मर्दों के तरीके में निर्देशों के पुरे होने की स्तिथि में तलाक बिना किसी अथॉरिटी के मुक़म्मल हो जाता है. अगर किसी निर्देश के मुताबिक उसने तलाक नहीं दिया है तो अथॉरिटी पुरे केस का जायज़ा लेगी और उसकी नियत, हालत वगैरह जैसी वजूहात के मद्देनज़र फैसला देगी. अगर दोनों साथ रहने की इच्छा रखते हैं यानी सुधार चाहते हैं तो इन बातों को वजूहात को अहमियत दी जायगी और तलाक लागू नहीं होगा. पर अगर केस ऐसा है कि सबूतों की बुनियाद पर सुधार और बेहतरी इसी में है कि दोनों अलग हो जाए तो दोनों को अलग कर दिया जायेगा. औरत को मर्द से खुला लेना पड़ेगा, जो भी शर्ते तय हो उन पर. अगर मर्द नहीं देता तो अथॉरिटी के पास जा कर निकाह फस्ख करवा सकती है. इसके लिए जायज़ वजह चाहिए. अगर केस ऐसा है या वजह छोटी है मगर जायज़ है तो मेहर वगैरह वापिस भी लिया जा सकता है ताकि किसी के साथ ज्यादती न हो. (जैसे औरत का सिर्फ मेहर के लिए शादी करना और कोई भी कारण देकर अलग हो जाना).

4.  यंहा यह कहना ज़रूरी है कि तलाक के लिए मर्द के पास मुनासिब कारण होने चाहिए, वरना आखिरत में उसकी पकड होगी. औरत के पास मुनासिब कारण होने चाहिए, वरना आखिरत में उसकी भी पकड होगी.

5. क्योंकि निर्देशों के तेहत सारे जतन करने के बाद दोनों (खुसुसन मर्द) साथ रहना ही नहीं चाह रहे तो अलग होना ही बेहतर है.

6. अगर मर्द गलत है और उसने साफ़ बोलके कि उसे अपनी औरत पसदं ही नहीं या झूठ के बहाने तलाक दिया तो औरत के साथ ज्यादती हुई और इसका हर्जाना मर्द आखिरत में भरेगा ही और अल्लाह चाहे तो दुनिया में भी भुगत सकता है (ऐसे केसेज़ में अगर समाज, हुकूमत चाहे तो कानून बना कर मर्द पर मुनासिब सज़ा, हर्जाना लगा सकते हैं - जैसे गलत तरह से दिए 3 तलाक के कानून में हुआ, हम इसका समर्थन करते हैं, भले ही कानून में कमिया हो). नबी के वक़्त में ऐसा शायद कोई केस नहीं आया होगा वरना उस मर्द की खैर नहीं थी. अगर औरत गलत है और साफ बोलके कि उसे अपने मर्द के साथ रहना ही नहीं है (जैसा एक औरत ने कहा था और मैहर वापिस करके खुला ले लिया था) या झूठ कुछ बोलके वो खुला मांग रही है तो इसका नुकसान वो आखिरत में भरेगी और अल्लाह ने चाहा तो दुनिया में भी. इसलिए ऐसे केसेस में अगर साफ़ नज़र आ जाता है कि कोई खास, बड़ी वजह के बिना ही खुला मांगा जा रहा है तो मेहर वापिस लेके मर्द के साथ होने वाली ज्य्दाती को रोक लिया जाता है. नबी के वक़्त में ही ऐसा केस आ गया था तो आपने अमलन तरीका करके दिखा दिया.

7. चाहे औरत सही हो या गलत, या चाहे मर्द सही हो या गलत, अगर कोई भी दुसरे के साथ रहना ही नहीं चाह रहा पर रहने को मजबूर कर दिया जाए तो भी दोनों  ज़िन्दगी जहन्नुम होनी है (इसे कोई समाज, कानून, प्रशासन, कोर्ट ठीक नहीं कर सकती. ज़ाती ज़िन्दगी में दोनों दुखी ही रहेंगे.)। इसलिए अगर आखिर तक बात नहीं बन रही तो अलग ही कर दिया जाना चाहिए।

(B) मुस्लिम उलेमा द्वारा इनका निफाज़.

आम उलेमा की दिक्कत ये है कि वो इन प्रोसीजर और शर्तों के पूरा न होने के बावजूद ऐसे तलाक को ख़िलाफ़े क़ुरान और शरीयत तो बताते हैं मगर ये भी मान लेते हैं कि तलाक तो हो ही गया, गलत तरीके पर ही सही। इनके मुताबिक हालात कुछ भी बस मुंह से तलाक निकलने की देर है, ये रिश्तों पर तलवार चलाने के लिए बैठे हैं, भले ही कपल कितनी भी सफाई पेश कर दें। यही दीन में तंगनज़री है। हालाँकि चंद उलेमा का ऐसा भी मानना है कि तलाक की कोई भी शर्त रह जाने पर तलाक नही होगा। दिक्क्कत यह है हमारे दीन का सही फ़हम, जुज़ नहीं समझते हैं. दीन को मुश्किल बनाये बैठे हैं. दीन फितरत का नाम और ये लोग दीन पर गैर फितरी फैसले देते रहते हैं. उलेमा हदीसों में आये वाक्यात को पुरे कॉन्टेक्स्ट या सभी रिवायतों को इकठ्ठा करके नहीं समझते हैं. न उनकी हिकमत समझते हैं. हदीसों को ज्यों का तत्यों या लफ्जन फिट करके केस को बर्बाद कर देते हैं. इसलिए आज तलाक, 3 तलाक, हलाला जैसे मसलें इतने बड़े और भयंकर हो गए हैं कि गैर इनकी हंसी उड़ाते हैं और कानून बनाते हैं. मुस्लिम कपल जो फैसला करवाने जाते हैं, इनकी जिंदगियां तबाह हो जाती है. इस्लाम की तलाक पर दी हिदायतें बेहतरीन है। दिक्कत है  हमारे मुफ़्ती हज़रात में, इदारों में, मदारिस सिलेबस में, मुसलमानों के फ़हम में। इनको सुधारने के लिए कड़े कदम उठाये जाने चाहिए। तब तक लोगों को सही फ़हम के मुफ़्ती, उलेमा के फतावा की बुनियाद पर तलाक के डिस्प्यूट हल करने चाहिये, अगर ज़िन्दगी आसान करनी है तो।

(C) गैर मुस्लिम समाजों या अदालतों में तलाक सम्बंधित नियम और क्रियाएं.

अल्लाह ने तलाक को सबसे ना पसंदीदा अमल माना है. मगर आखिरी उपाय के तौर पर करने कि इजाज़त भी दे ताकि लोग घुट घुट के न मरे. गैर मुस्लिम समजो और कानूनों में इसे इतना मुश्किल, लंबा, मेहंगा, उगाई का जरिया बना दिया है कि लोग तलाक फाइनल हुए ही बरसो बिता देते हैं अलग अलग. दूसरी जगह शादी नहीं कर पाते और कर ली तो छिपाते फिरते हैं. बाज़ कपल तो इसीलिए बिना ओफीशीयल तलाक के ही अपने अलग घर बसा के ज़िन्दगी काट देते हैं. बच्चो की ज़िन्दगी अलग तबाह हो जाती है.

इसलिए इस्लाम ने इसे मुश्किल नहीं बल्कि आसान रखा है मगर प्रक्रिया और निर्देशों से गुजरने के बाद. जब भी ये प्रक्रिया या निर्देश टूटेंगे समस्या होगी. समस्या हल करने वाले उलेमा हक हैं तो का निदान इस्लाम में मौजूद मिलेगा और फैसले करवाने वाले उलेमा ए सू है तो ज़ख़्म नासूर बन जायगा.


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अगर तलाक की कोई शर्त पूरी न हो पाए तो भी उलेमा की अकसरियत इसे तलाक मानती है, जबकि असल में ऐसे केसेस की फाइनल औथोरीटी नबी या उनके representative के पास होती है या फिर इस्लामी हुकूमत के पास या उसकी representative court के पास। ये लोग या इदारे लोगों के हालात, वजूहात वगैरह की तह तक जाके फैसला देंगे। जबकि बाज़ उलेमा का ऐसा भी मानना है कि तलाक की कोई भी शर्त रह जाने पर तलाक नही होगा। नबी ने इसी तरह की कोई शर्त रह जाने के केसेस में तलाक नहीं माना था जबकि ह. उमर ने माना था।  इसलिए अब ये शर्तें  फैसले क़ाज़ी वगैरह को लेने चाहिए सबसे पहले नबी के तरीक़े की बुनियाद पर फैसले लेने की कोशिश करें और अगर ऐसा उचित या संभब न हो तो फिर हालात, वजूहात के मद्देनजर केस टू केस ऐसे फैसले लें जैसे हजरत उमर ने किये थे।

 

औरतों को तलाक लेने का तरीका अलग क्यों है?


इस्लाम में मर्द और औरत के तलाक लेने के तरीक़े हिकमतन अलग अलग हैं। जैसे कि अगर एक गलत औरत भारी मेहर लेके अगले दिन पति को तलाक कह देती तो कितनी बड़ी नाइंसाफी होती। ऐसी और भी कई फ़ितने हो सकते थे।

औरत अगर चाहे अपने शौहर से तलाक मांग सकती है। यह खुला है। शोहर चाहे तो उसे खुला दे सकता है। मेहर छोड़ सकता है या कम या ज़्यादा या उतना भी वापिस भी ले सकता है, जो भी दोनों में तय हो जाये। अगर निकाह के दौरान अलग होने की कोई जायज़ शर्त ठहराई गयी थी तो उस शर्त को पूरा करना होगा। शोहर कोई नई शर्त भी रख सकता है। खुला लेने के लिए औरत के पास शरीयतन मुनासिब वजह होनी चाहिए। नबी ने फरमाया था कि जिस औरत ने अपने शौहर से गैर ज़रुरी तौर पर तलाक मांगी वो जन्नत में नही जायेगी। वजह मुनासिब न हो या शर्तें जायज़ न हो तो क़ाज़ी फैसला करेगा कि दोनों को अलग करें या न करें। हो सकता है मर्द औरत को परेशान करने की नीयत से खुला देना ही नहीं चाहे। अगर शौहर खुला नहीं दे रहा है तो औरत क़ाज़ी के पास जाकर निकाह फस्ख करवा सकती है। इसके लिए मेहर छोड़ा, कम या ज़्यादा या उतना ही वापिस भी लिया जा सकता है। ये केस टू केस डिपेंड करता है। क्योंकि ज़्यादती मर्द के साथ भी हो सकती है। हो सकता है कोई औरत बड़े मेहर की वजह से निकाह करे और मेहर मिलने के बाद तलाक लेके अलग होना चाहे। क़ाज़ी का फर्ज है वो किसी के साथ ज़्यादती न होने न दे। उसका मकसद  न तो तलाक को करवाना है और न रुकवाना, उसका काम है इंसाफ करना। इसलिए उसे सारे पहलू, वजूहात, हालात देख कर फैसला करना चाहिए। 

एक बार एक औरत ने नबी से आके कहा था कि उसे अपने शौहर से तलाक चाहिये सिर्फ इसलिए कि वो उसे पसंद नहीं है हालांकि उसमें कोई खामी नही है, बस उसे डर है कि वो इस्लाम की हदों से बाहर न चली जाए। नबी ने उससे मेहर में मिला बाग वापिस देने को कहा था। वो राजी हो गयी तो नबी ने अलग करवा दिया। ज़ाहिर है नबी का फैसला इंसाफ पर मबनी था क्योंकि औरत की वजह बहुत बड़ी नहीं थी मगर अलग होना उसकी चाह थी तो मर्द पर भी ज़्यादती न हो और उसका दिया भारी मेहर उसे वापिस मिल जाये, आखिर उसे भी दुबारा घर बसाना होगा।

मर्द द्वारा तलाक देने पर गलत तरीका इस्तेमाल करना. 

असल में अल्लाह ने क़ुरान और रिसालत में नबी के ज़रिए मर्द को तलाक के लिए पूरा प्रोसीजर और शर्तें (नियत होना, गुस्से, नशे, हैज़ मजाक में न होना, गवाहों का न होना आदि इत्यादि) दी है। इनके पूरे होने पर ही तलाक को अल्लाह के हुक्म के मुताबिक माना जाना चाहिये और इसके बाद ही बंदे को अल्लाह के अज़ाब से खुद को एक बार को आज़ाद समझना चाहिए। इन शर्तों के मामले में जानभुझ कर करी गयी गलतियों पर अल्लाह पकड़ करेगा।

नबी ने इसी तरह की कोई भी शर्त रह जाने के केसेस में तलाक नहीं माना था। ये आपका उसवा हसना था, आपके ज़रिए शरीयत का सही निफ़ाज़ था और अपनी उम्मत को रिश्तों को बचाये रखने की नसीहत थी। मगर ह. उमर ने शर्ते रह जाने के बावजूद तलाक हुआ मान लिया था। क्या उन्होंने नबी के खिलाफ अमल किया? नहीं। क्योंकि उन्होंने केस टू केस फैसला लिया था जो पूरी तरह से वैसे नहीं थे जैसे नबी के सामने आए थे। नबी और खुल्फ़ा ए राशिदन ने लोगों के हालात, वजूहात, नियतों, मंशाओं वगैरह की तह तक जाके फैसला लिये जो बिल्कुल सही थे।

असल में इस्लाम का इल्मी और अक्ली जायजा लेने पर यह बात साफ हो जाती है कि तलाक की कोई भी शर्त पूरी होने से रह जाए तो ऐसे केसेज में हालातों, वजूहात वगैरह के मद्देनज़र आखिरी फैसले लेने का हक़ किसी हकम को है। नबी की मौजूदगी में इसके लिए फाइनल ऑथरिटी नबी ही हो सकते थे। खलीफाओं के वक़्त में ये उनका काम हो गया। मुस्लिम हुकूमतों में ये हुक्मरान या उनके प्रतिनिधियों का काम हुआ। फिर काज़ी, उलेमा आये और आज ये जजों, कोर्ट्स की ज़िम्मेदारी है। इसलिए इन सभी को चाहिए की सबसे पहले नबी के तरीक़े की बुनियाद पर फैसले लेने की कोशिश करें यानी अल्लाह की दी तमाम हिदायतों का ख्याल रखें। पर अगर केस ऐसा हो कि शर्तें टूटने के बावजूद बेहतरी इसी में है कि दोनों अलग हो जाये तो वैसे ही फैसले करे जैसे हजरत उमर ने किये थे।

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1. इस्लाम में मर्द और औरत दोनों को तलाक लेने का बराबर हक है. मगर तरीके अलग हैं. उन तरीकों में दोनों के लिए कुछ चेक एंड बैलेंस भी रखे हैं, जो कुछ कमी रह जाने पर इंसाफ करने के लिए हैं. 


2. यकीनन तलाक की चाह रखने वाला मर्द खुद अपने स्तर पर ही फैसला करके तलाक को फाइनल कर सकता है, बिना किसी अथॉरिटी के, अगर प्रक्रिया, निर्देश पालन हुए हैं तो (क्योंकि वो घर नाम के इदारे का सरबरा है). ये इस्लाम कि रियायत है. इसमें समझदार इंसानों को प्रक्रिया अनुसार मिडीयेटर और गवाह बनाना भी अपने ऊपर एक हद तक अथॉरिटी खड़े करने जैसा ही है. पर अगर प्रक्रिया, निर्देश फोलो  नहीं हुए तो औरत अथॉरिटी के पास जा सकती है. तब वो सही फैसला करेंगे और न्याय देंगे. वो सही प्रकिया, निर्देश पालन करवाएंगे (नियत भी देखी जाएगी, तलाक की न नियत नहीं थी तो वैसे ही तालाक नहीं होगा).  
ये सही बात है कि मर्द बिना किसी वजह के भी औरत को तलाक दे देता हैं (जो उसूलन गलत है क्योंकि उसके पास जायज़ वजह होनी ही चाहिए वरना अज़ाब झेलेगा, और समाज में कानूनन सजा मौजूद है तो वो भी झेल सकता है), वो किसी को वजह बताता भी नहीं है. तो इस वजह को जानने का काम वही, मिडीयेटर, फाइनल अथॉरिटी करेंगी. जंहा मर्द को समझा बुझा के रुजू करवाना मुमकिन होगा करवायंगे, जंहा रुजू मुमकिन नहीं होगा, वंहा वो कुछ नहीं कर पाएंगे. मर्द की मर्ज़ी ही साथ रहना नहीं है तो कोई कुछ नहीं कर सकता. जैसे मॉडर्न कोर्ट भी ज़बरदस्ती मर्द को रहने का आदेश दे, तो भी दोनों का ख़ुशी से साथ रहना नामुमकिन है. इसलिए मर्द के पास तलाक देने की कोई जायज़ वजह न हो, तो मुस्लिम समाज या हुकूमत चाहे तो इसके लिए कानून, सज़ा बना सकती हैं, गैर बना दे तो भी चलेगा. मगर यकीनन तलाक की चाह रखने वाली औरत को वजह बताना ज़रूरी कर दिया गया है  (क्योंकि वो घर की सरबरा नहीं है) पर ज़रूरी नहीं है कि वो वजह बहुत बड़ी ही हो. जैसा हदीस से साबित है, छोटी मोटी वजह से भी वो खुला हासिल कर सकती है, बस मेहर वापिस करना होगा. 

3. सबसे पहली बात रिश्ता करने से पहले लडको की इमानियत, किरदार वगैरह सही तरह जांचना चाहिए. हम दौलत, ज़ात पर जितना ध्यान देते है, इस पर नहीं देते. इसके बाद भी इस्लाम में हमेशा से ही औरतों के भविष्य को सुरक्षित करने के लिए निकाह नामा में किसी भी तरह की जायज़ शर्त रखवाने की इजाज़त देता है, जिसके बिना तलाक नहीं होगा. अगर कॉन्ट्रैक्ट ब्रीच हुआ है तो अथॉरिटी तलाक रद्द कर देगी. 

4. नियत होगी तो तलाक माना जायेगा, नही होगी तो नहीं (चाहे 1 हो या ज्यादा). गुस्से, नशे वगैरह में मर्द ने जुमले बोल दिए हैं तो वो नाकाफी हैं. वो इस पर उलेमा से फतवा भी ले सकता है. उलेमा को भी नियत देखना चाहिए, जो वो देखते नहीं (ह. उमर जैसा वो मामला अपवाद हैं). इसलिए हमें ज़रूरत हैं आम उलेमा के फ़हम और अपने चल रहे टेढ़े निजाम को बदलने की. अल्लाह की दी हुई तलाक की हिदायतें तो अपने आप में काफी हैं.

5. ह. उमर ने 3 बोली गयी तलाक को 3 करार, नियत या जुमले के आधार पर नहीं बल्कि उस कपल (खुसूसन मर्द) की शरियत के साथ करी जा रही हंसी मज़ाक, ढिलाई, खिलवाड़ पर किया था. ये उनकी सजा थी और लोगों को नसीहत. इस वाकये की तफसील मौजूद होती तो ये केस पानी की तरह साफ़ हो जाता. फिर भी हमें  ह. उमर के फैसले पर ऐतमाद है, वो कपल शायद इसी लायक थे. ऐसा भी हो सकता हैं कि औरत मर्द के साथ किसी भी कारणवश रहना ही नहीं चाह रही हो और इसके इस तरह तलाक देने के बाद औरत को मर्द से ज़िन्दगी भर का छुटकारा मिल गया अपने आप, बिना खुला या कोई शर्त पूरी करे हुए. अगर आज भी ऐसी स्तिथि आ जाए तो शरियतन शादी जोड़ने की नहीं बल्कि तोड़ने की जद्दोजहद करी जायगी.

6. नबी ने एक ही वक़्त में दी गयी 3 तलाक को 3 ही माना था, मुझे ऐसा कुछ नहीं मिला. मेहेरबानी होगी अगर मिल जाए तो. फिर उस केस का जायज़ा लेके इस पर आगे बात होगी. अगर ऐसा हुआ भी था तो यकीनन मर्द की नियत 3 की ही होगी, इसलिए नबी ने 3 करार दिए होंगे. अगर वो मर्द ही साथ रहना नहीं चाह रहा तो कौन मजबूर कर सकता है? नबी अथॉरिटी के तौर पर मजबुर कर भी देते तो क्या होता, वही होता शायद जो आज मॉडर्न कोर्ट के ऐसे फेसलों के बाद होता है यानि मर्द नहीं मानता. 


7. हदीसों में आये केसेस में लोग नबी तक मामले इसलिए पहुचे थे कि कमी रह गयी थी, जो उन तक नहीं पहुचे उम्मीद है वो ज्यादातर सही प्रर्किया, निर्देशों में ही हुए होंगे.  

8. एक बहुत एहम बात नबी के वक्त में कुरान के ज़रिये एहकाम नाजिल हो रहे थे, सीखने सीखाने का समझने समझाने का दौर चालू था, लोग पूरी तरह से वाकिफ नहीं थे, आदि हो रहे थे. वो दौर इन्फोर्मेशन या ग्लोबलाइजेशन का नहीं था. इसलिए ऐसे केस नबी के सामने आते थे जो तलाक की प्रर्किया, निर्देशों अनुसार नहीं थे और नबी उन्हें सही कर देते थे.  जबकि ह. उमर की खिलाफत तक तो एक लंबा वक़्त बीत चुका था, लोग तरबियत पा चुके थे. इसलिए उनके वक़्त में प्रर्किया, निर्देशों का उल्लंघन करने वाला वाकई बड़ा मुजरिम था और सज़ा का हक़दार.

9. वो हदीस कि मज़ाक में निकाह, तलाक, रुजू सीरियस माने जाते हैं, उससे उलेमा हज़रत गलत नतीजे निकालते हैं। उसका ऐसा मतलब न तो निकाल सकते हैं और न ही निकलता है।

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रुकनाह इब्न अब्दी यजीद ने अपनी पत्नी को एक बार में तीन बार तलाक दिया था। पैगंबर (स.व.) ने पूछा : तुमने उसे कैसे तलाक दिया?” उसने जवाब दिया: मैंने उसे एक बार में तीन बार तलाक दिया। पैगंबर (स.व.) ने फिर पूछा : तुम्हारा इरादा क्या था?” उसने जवाब दिया कि वह उसे एक बार ही तलाक देना चाहता था। पैगंबर (स.व.) ने उससे कहा कि वह कसम खाकर जवाब दे, जो उसने दिया और फिर कहा : अगर यही मामला है तो उसे वापस ले लो। सिर्फ एक तलाक लागू किया गया है। रुकनाह ने कहा : ऐ अल्लाह के पैगंबर! मैंने उसे तीन बार तलाक दिया था। पैगंबर ने कहा: "मुझे पता है, उसे वापस ले लो और यह पत्नी को तलाक देने का उचित तरीका नहीं है। अल्लाह ने कहा है कि अगर किसी को अपनी पत्नी को तलाक देना ही है, तो उसे 'इद्दत' को ध्यान में रखते हुए ऐसा करना चाहिए।" [सुनन अबू दाउद, खंड 2, 267, 270, (संख्या 2196, 2206); इब्न माजा, सुनन, खंड 2].  यानी (1) यदि तलाक निर्धारित प्रक्रिया के अनुसार नहीं दिया गया है, लेकिन उल्लंघन के लिए सुधार करने की संभावना है, तो कानून की मांग है कि सुधार किया जाए। (2) किसी व्यक्ति को अपने बयानों की व्याख्या करने का अधिकार है। यदि वह कहता है कि कोई विशेष बयान उसके द्वारा फला इरादे से कहा गया था, तो उसका स्पष्टीकरण स्वीकार किया जा सकता है। (3) यदि कोई व्यक्ति कहता है कि उसने अपनी पत्नी को तीन बार तलाक दिया है जो उसके फ़ैसले की गंभीरता और तीव्रता को दर्शाता है। इसलिए जिस अर्थ में उसने इनका इस्तेमाल किया है, उसके बारे में वक्ता का कोई भी स्पष्टीकरण भी स्वीकार्य होना चाहिए। हालाँकि, इसका मतलब यह नहीं है कि अगर दिए गए स्पष्टीकरण के विपरीत सबूत मौजूद हैं, तो ऐसे स्पष्टीकरण को स्वीकार किया जाना चाहिए। एक अदालत को इस तरह के स्पष्टीकरण को अस्वीकार करने का पूरा अधिकार है अगर वह संतुष्ट नहीं है। नतीजतन, जब उमर ने देखा कि लोग अब तलाक़ का फ़ैसला सुनाने में सावधानी नहीं बरत रहे हैं, तो उन्होंने घोषणा की कि वह पति से स्पष्टीकरण का बयान भी स्वीकार नहीं करेंगे और तीन तलाक़ों को तीन के रूप में गिना जाएगा। [मुस्लिम, अल-जामी अल-सहीह, 630, (सं. 3673)।] {Meezan: Javed Ghamidi}

 

 Divorce in Anger, Intoxication, by Slip of tongue or mistake or without proper Intention or due to a lie.

The Messenger said that there is no divorce and no manumission at the time of coercion {interpreted as Anger}. (Majah 2046)

[Some say divorce takes place when the anger is mild or low. This understanding is also applied on intoxication. This is also applied when on give Talaq by slip of tongue or by mistake or without proper Intention]

There is no sin on you concerning that in which you made a mistake, except in regard to what your hearts deliberately intend [Quran 33:5].

Allah has forgiven for me my nation their mistakes and forgetfulness, and what they are forced to do (Majah 2043, 2045 under Book of Talaq)

The Prophet said that actions are to be judged only by intentions and a man will have only what he intended (Dawud 2201 under Book of Talaq)

Al-Ghazaali said, concerning unclear intention when uttering the words of divorce: The first type is when a person’s tongue runs away with him; when the words divorce is uttered in conversation or when he is asleep, divorce does not take place (Al Waseet by al Ghazaali 5/385).

Most of the Ulema believe that when a person give Talaq on the basis of a lie furnished to him about his wife, the divorce will not take place.

Divorce in Joking

The Messenger said that there are three matters in which seriousness is serious and joking is serious: Nikah, Talaq and Ruju (Majah 2039).

[This is interpreted wrongly. Because when you marry in films, serials, the objective is entertainment and joking is also for entertainment.]

The Messenger said that Allah has forgiven my nation for what they think of to themselves (the evil suggestions of their hearts), so long as they do speak of it or not act upon it or for what they are forced to do. (Majah 2040, 2044, under the Book of Talaq)

[Majority of Ulema accepts divorce said in joking but some do not do so if joke as a slip of tongue or without proper intention or deliberation]

 Divorce without Witnesses

Bring to witness two just men from among you and establish the testimony for Allah (Quran 65:2).

A man divorced his wife then had took her back but there were no witnesses to his divorcing her or his taking her back. Hzrt. Imran said that you have divorced and taken back in a manner not according to the Sunnah. Bring people to witness your divorcing her and taking her back and do not repeat it. (Majah 2025, Dawud 2186)

Divorce in Menses

When you divorce women, divorce them at their prescribed period (Quran 65:1).

A man divorced his wife when she was menstruating. The Messenger said to take her back. (Majah 2019, 2022, 2023, Tirmidhi 1176)

Three Divorce

Divorce is twice. Then, either retain them in an acceptable manner or release them with good treatment (Quran 2:229).

Hazrat Ibn Abbas reported that the saying of three divorces during the lifetime of Allah's Messenger and that of Abu Bakr and two years of the caliphate of Umar was treated as one. But then Umar said that verily the people have begun to hasten in the matter in which they are required to observe respite. So if we had imposed this upon them, and he imposed it upon them (so let us enforce it on them and he made it count as three) (Muslim 1472 a)

It says three years of caliphate of Umar. (Muslim 1472 a)

During the caliphate of Umar people began to pronounce divorce frequently, he allowed them to do so (to treat pronouncements of three divorces in a single breath as one). (Muslim 1472c)

Prophet said a man to take your wife. He said that he has  divorced her by three pronouncements. Prophet said that he knows it but still take her back. He then recited the verse: "O Prophet, Divorce them at their appointed periods (Dawud 2196).

Anas reported that whenever a man was brought to Umar, who had divorced his wife three times in one sitting, he would flog his back.  (Sharḥ Maani al Athar 4488, Sahih)

A man had divorced his wife with three divorces together. He got up in anger and then said, "Do you play with the Book of Allah Almighty while I am among you?"  (Nasai 3401, Bulugh al Maram 8:126/1083) [However, some say it is still binding when it is done all at once.]

 Others

A woman said: I do not blame my husband for defects in his character/behavior or his religion, but after becoming Muslim, I dislike to behave in un-Islamic manner (if I remain with him). I cannot endure to live with him. All that he has given me is with me.  The Messenger asked to her to give back the garden which her husband gave her (as Mahr)? She agreed. So the Prophet asked to separate them. (Bukhari 5273, 5275 Nasai 3462, Muwatta 29:31) [In  Majah 2057- Zaeef Hadith, the words are that He was an ugly man and Her wife said that if were it not for fear of Allah when he enters upon me I would spit in his face.]

Fatimah bint Qais said: My husband divorced me three times when he was leaving for Yemen, and the Messenger allowed that (3 Talaq). (Majah 2024, Zaeef)

Divorce according to the Sunnah means divorcing her with one divorce in each cycle when she is pure, then when she becomes pure the third time, then he pronounces divorce again, and after that she must wait one more menstrual cycle. (Majah 2021)

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