Tuesday, 10 December 2024

धर्म, आस्था के अर्थ, इस्लाम के स्तम्भ



धर्म क्या है।

सभी धार्मिक समस्यों की जड़ धर्म नही है बल्कि धर्म की समझ है जो व्यक्ति के चरित्र से संचालित होती है। जैसी सोच वैसे धर्म का अर्थ। धर्म एक कोड ऑफ कंडक्ट है। जो सही मानेगा वो किसी को दुख न पहुंचाएगा। जो सही नही मानेगा वो पहुंचाएगा। जैसे कानून मानने वाला किसी का अहित नहीं करता और कानून को फालतू चीज़ मानने वाले हेमशा उसे तोड़ते रहते है।

धर्म बना है ध्र धातु से जिसका अर्थ है धारण करना। इससे अर्थ सहायता, पकड़ना, अपनाना से भी लिए जाते है। इसलिए धर्म का पूरा मतलब होता है जिसे धारण किया जाए। धर्म के कई प्रकार के होते है जैसे कर्तव्य, नियम, प्राकृतिक नियम, आचरण, सिद्धांत।  जैसे अग्नि का धर्म जलाना है, मनुष्य का धर्म मनुष्यता का पालन करना है।

ईश्वरीय जीवन सिद्धांतो को इसलिए सनातन धर्म कहा गया है या दीने इस्लाम। प्राकृतिक धर्म यानी प्रकृति के नियम। दीने फितरत यानी जिसकी मांग फितरती हो। इस्लाम स्लम शब्द से बना है जिसका अर्थ है शांति। तो इस्लाम के अर्थ है शांति प्राप्त करना या समर्पित होना, शांति के लिए। 

धर्म या दीन या धम्म, सदा से आरम्भ से ही एक रहा। पर मनुष्य उसमें अपने जोड़ घटा मिलाके करप्ट करता गया। और धर्म बंटते बंटते मतो, रिलिजन, इज़्म, फिलोसोफी में बंट गया। और आज इतने रिलिजन (which are wrongly called Dharam) दिखाई देते। ये उसी तरह है जैसे 3 करोड़ साल पहले ये पृथ्वी की संपुर्ण भूमि एक साथ जुड़ी थी जिसे आज साइंस pangea कहती है। और नैचुरली धरती टूटते टूटते आज इतने सारे महाद्वीप उपमहाद्वीप या आइलैंड्स में बंट गयी। बाकी फिर इंसानों ने अपने जोड़ घटा किए और इनको भी बांट कर देश बना दिए। यानी धरती का वैसे ही विभाजन किया जैसे धर्म का किया। इसीलिए सभी मनुष्य एक ही धरती और एक ही धर्म के हुए। विभाजन तो हमने खुद किये। सच्चा धर्म न तो सिर्फ अरब का है,  न भारत का है। वो तो पूरी पृथिवी और सभी मनुष्यों का है जिसे हमने बदल बदल कर सिर्फ अपने भूभाग का बना लिया है। एक धर्म से दूसरे धर्म कभी जाय ही नही जाता। बल्कि एक मत में से धर्म मे या दूसरे मत में जाया जाता है। क्योंकि मत अनेक है पर धर्म सिर्फ एक और जब ये धर्म आया तब न तो अरब था न भारत और न ही अफ्रीका। तब ये नाम ही नहीं थे। एक ही धरती मानी जाती थी जिनमे अनगिनत राजा राज्य होते थे।


धर्म

धर्म का अर्थ धारण करना है तो धर्म अलग अलग नहीं हो सकते। बल्कि धर्म से अलग अलग कट कर तो संप्रदाय बनते चले गए।

इस्लाम का अर्थ है सलामती। ईमान शब्द की मूल धातु शब्द का अर्थ है शांति, अयुद्ध, जिससे ईमान शब्द बना है। अगर मुस्लिम में शांति नजर नहीं आ रही या जो नतीजे बताए गए थे वो नहीं निकल रहे तो मुस्लिम ईमान पर नहीं है। आज मुस्लिम शब्द के सही अर्थों पर मुस्लिम फिट नहीं बैठते हैं। इसलिए सच में मुस्लिम जिन्हे कहा जाए वो लोग तो बहुत ही कम हैं। असल मुस्लिम तो अब minority में है, बल्कि जैनियों से भी कम है।

आस्था या विश्वास:

अंधविश्वास में ईमान लाना असल ईमान नहीं है। कुरान ने सबसे ज्यादा, 100 से भी अधिक बार बुद्धि और विवेक को प्रयोग करने को कहा है। कुरान कहता है कि उसकी आयतों को भी आँखें बंद कर नहीं मान लेना है। उसकी आयतें ब्रह्माण में भी फैली है, लेकिन अकल वालों के लिए। इसलिए पढ़ने वाली आयतें सिर्फ पढ़नी नहीं है, समझना भी है। आयात का अर्थ है वो करामात जो सिर्फ खुदा कर सके। कुरान (7.179) कहता है कि वो नरक वाले होंगे जो अकल, विवेक का इस्तेमाल नहीं करते। कुरान ने कहा सबसे निचले प्राणी वो है जो अकल से काम नहीं लेते। यानि चाहे मुस्लिम हो या गैर मुस्लिम धर्म के मामले में भी अक्ल से काम लोगे। सिर्फ मुस्लिम के घर में पैदा होने वाला मुस्लिम नहीं होगा।

मुहम्मद साहब के बेटे की मौत पर सूर्य ग्रहण हुआ था। जिस पर आप ने कहा था कि किसी के जीने-मरने से ग्रहण का कोई लेना देना नहीं है। जबकि कोई और होता तो लोगों को कहता कि ग्रहण मेरी वजह से हुआ है। एक बार एक नजूमी ने कहा कि फला दिन बारिश होगी और वाकई उस दिन बारिश हो गई। फिर भी नबी अपने घर मे से बर्तन भर भर के पानी बाहर निकालते जाते और कहते रहते कि वो नजूमी झूठा है। यानि आप ने कभी अंधविश्वास का समर्थन नहीं किया।

जिस चीज के रिजल्ट्स 100% सही नहीं हो तो उसे मानना अंधविश्वास हो सकता है। तारों, ग्रहों के आधार पर भविष्यवाणी की जाती हैजबकि सब जानते है कि इसमे अधितकर अंदेशे ही मारे जाते हैं। सभी ज्योतिषों के रीजल्ट्स अगर एक ही आ रहे हैं और वैसा ही भविष्य में हो भी रहा है तो ज्योतिष शास्त्र को वैज्ञानिक fact माना जाएगा। ये भी अल्लाह की आयात हो जायगा। जैसे सूरज और चंद्र ग्रहण होने वाला है, इस पर सभी वैज्ञानिक एक राय रखते हैं और और वैसा ही होता है तो यह ग्रहण भी अल्लाह की आयात है।

वाणी:

कुरान में general guidelines भी है जैसे जमीन पर वो ठहरता है जो फायदेमंद होता है। यह भी कहा कि कोई भी कौम तब तक नहीं बदलती जब तक वो अपने सोचने के ढंग को नहीं बदलते। और कहा कि तुम चाहो तो जल्दी मिलने वाला नफा ले लो या फिर आने वाले फायदे पर नजर रखो।

ये उसूल कोई भी धर्म वाला अपना सकता है, ये सभी के लिए एक जैसा ही काम करते हैं। अगर किसी गैर मुस्लिम ने ऐसे सिद्धांत कुरान से नहीं बल्कि कही बाहर से लियातो भी उसे फायदा होगा क्योंकि ये प्राकृतिक हैं। इन सिद्धांतों पर प्रैक्टिकल अमल मुहम्मद साहब ने करके बताया।

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इस्लाम ने शिक्षाओ पर आधारित समाज को बनाने के लिए 4 चीज़ रखी थी। नमाज़, रोजा, हज, ज़कात।

 

नमाज़: 

नमाज़ के लिए कुरानी शब्द सलाह है। इसमें आसान, पाठ और meditation होता है। नमाज़ से अब meditation यानि आत्मा निकल गई है और शव बाकी रह गया। नमाज़ के जो असल फायदे हैं, वो नहीं मिले पा रहे है। नमाज़ को एक ritual  बना दिया गया है। नमाज़ सब follow करते हैं मगर दिलों में नहीं उतर पा रही है क्योंकि सही से अदा नहीं कर रहे हैं। जब नमाज़ ही वैसी ही नहीं अदा हो रही है जैसी होनी चाहिए तो फिर असली शक्ल में इस्लाम भी दुनिया में कही नजर नहीं आ रहा है। कुरान ने कहा की नमाज़ को कायम करो यानि नमाज़ को स्थापित कर दो।

नमाज़ में सबसे कट के खड़े होना था जैसे वो तुम्हें देख रहा हो और इसकी 40 दिन में प्रैक्टिस हो जानी चाहिए थी क्योंकि ऐसा मुहम्मद साहब ने कहा था। जैसे बिना सड़क पर ध्यान लगाए बाइक चलाने की प्रैक्टिस हो जाती है। जैसे अंधेरे में बच्चा भी साथ हो तो हौसला बढ़ जाता है जबकि बच्चा एक liabilityहै। जैसे इंसानों को अंधेरे से डर लगता है और अगर किसी इंसान को सिर्फ बता दो कि अंधेरे से तुम्हें घबराना नहीं है क्योंकि गार्ड्स झाड़ियों में में चल रहे हैं। तब इंसान अंधेरे से नहीं डरेगा, भले ही गार्ड्स साथ न चल रहे हो। और गार्ड्स झाड़ियों में हो मगर उस इंसान को बताओ नहीं तब वो जरूर डरेगा। क्योंकि दुख अंदर से आता है और डर बाहर से। जो नमाज़ से यह सीख जाएगा कि वो सर्वशक्तिशाली उसके साथ में है तो फिर वो दैनिक जीवन की हर फील्ड में यही मान कर जीएगा कि वो साथ में है और सब देख रहा है। नमाज़ से यह मनोस्तिथि बन जाती है कि वो साथ में हैं। ये प्रैक्टिस है और इससे संपर्क पैदा होता है.

हर इंसान रोज अपना ध्यान केंद्रित करता है। जब वो कोई फिल्म, खेल आदि देख रहा होता है। उस समय कोई सामने या बगल से निकल जाए तो पता ही नहीं लगता। उसका सारा ध्यान टीवी पर होता है। इसे ही trans कहते हैं। इसी तरह ब्रह्मकुमारी वाले राजयोग करवाते हैं जिसमे वो व्यक्ति को सबसे काट देते हैं।

नमाज़ बुलंद आवाज से और शांत रहकर दोनों तरह से पढ़ी जाती है ताकि दोनों तरह की प्रैक्टिस हो जाए कि ये वाणी अल्लाह की तरफ से है। तेज उच्चारण से पढ़ कर concentration बनाने की प्रैक्टिस हो जाए और खामोशी से पढ़ कर भीप्रैक्टिस हो जाए। नमाजों में किरात इमाम के पीछे भी दोहराते है और नफली में खुद पढ़ते हैं ताकि कुरान की वाणी part  and  parcel of  life बन जाए।

{जेहरी और सिर्री नमाज़ होने के पीछे कारण ये है कि रात की खामोशी में तेज पढ़ने पर ही आवाज सबको अच्छी तरह सुनाई देगी, दिन के शोर शराबे में कितना भी तेज पढ़ो, सबको सुनाई नहीं दे पाएगा। जेहरी और सिर्री तरीका सुन्नत से जारी है।}

इस्लाम में हर चीज में समूहिकत रखी गई थी। इबादतों में भी सामूहिकता रखी गई है। इससे समूहकिता आ गई। हालांकि ये सामूहिकता इंसान जैसा चाहे उस तरफ मूड सकती है, यानि सही और गलत, दोनों तरफ।नमाज़ से सामूहिकता और अपनापन भी पैदा होती है। सब साथ पढ़ते हैं। पहले आने वाले पहले स्थान पाते हैं। कोई आगे नहीं जाता है, चाहे बड़ा हो या छोटा। कोई अमीर गरीब नहीं होता। नमाज़ के लिए खड़े हुए लोग मिल मिल कर खड़े होते हैं, बीच में gap नहीं रख सकते। एक आदमी अकेला नहीं खड़ा होगा, आगे की लाइन पूरी करेगा।  सबके लिए समय एक ही रखा गया है ताकि लोग अलग अलग मस्जिद नहीं पहुंचे। नबी के वक्त में मस्जिद में ही सारे मसले हल होते थे। मस्जिदों में मेहमान रुकते थे। मस्जिदें community center हुआ करती थी ।

अगर कोई नमाज़ में नहीं आया तो पता लग जाता है कि उस व्यक्ति को कोई परेशानी है। उससे मिलकर बीमारी का हाल चाल पूछा जा सकता है और उसकी समस्या का हल निकाला जा सकता है। यह एक तरह से indication है किसी की खैर खैरियत लेने का। कोई भूखा है तो उसका सेल्फ रीस्पेक्ट क्यों हर्ट हो और वो अपनी हालत लोगों को बताए। ये तो हमे पता लगाना था कि कौन भूखा है और कौन किस परेशानी में है। मुहम्मद साहब ने पड़ोसियों के बहुत से हक बताए थे, उनकी भूख का ख्याल रखने को कहा था भले ही अपना सालन पतला करके उन्हे भी साथ खिलाना पड़े। एक हदीस में मुहम्मद साहब ने तीन बार कहा कि वो मोमिन नहीं है जिसका पड़ोसी भूखा रखे और वो खुद खाना खा ले। मुहम्मद साहब सबसे बड़े मुफ्ती है, फिर ऐसे लोगों के पास ईमान कहा रहा। आप ने ही बताया था कि आस पास के 40 घर आपका पड़ोस है।

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इंसान का जेहन एक बार में एक ही चीज़ सोच सकता है, दो नहीं। अगर एक के बारे में सोच रहा है तो दूसरे के बारे में सोचने के लिए पहले से कटना पड़ेगा। हमारे यंहा से ध्यान में से रूह निकल गई, जिस्म बाकी रह गया है। हिन्दुओ के यंहा से ध्यान की रूह तो बाकी रह गई है मगर जिस्म बदल गया है।

मुहम्मद साहब ने कहा था कि बंदगी ऐसे करो जैसे कि तुम उसे देख रहे हो। यह आसानी से न कर पाओगे। इसलिए पहले ये सोच कर करो कि तुम उसे नहीं बल्कि वो तुम्हें देख रहा है।   

हिन्दू धर्म में प्रथा यह शुरू हुई कि निराकार का ध्यान कैसे करें, कोई न कोई आकार तो सामने आ ही जाता है। इसलिए शूरवात मे एक बिन्दु बना दिया कि इसपर ध्यान लगाना। फिर इसकी जगह एक पत्थर रख दिया। फिर उसके गुणों को रूप दे दिया। जैसे किसी के 4 हाथ या 3 सिर नहीं होते, मगर अलंकृत भाषा में उसके अनेकों हाथ और अनेकों सिर कहे जाते हैं क्योंकि वो हर कार्य कर सकता है और हर जगह देख सकता है। इसलिए इस पत्थर को फिर कई हाथ और कई सिर बना दिए गए। इसलिए ब्रह्मा, विष्णु, शिव देवी देवता हो गए। इनकी पत्नियाँ और कहानियाँ हो गई। यानि इन गुणात्मक नामों को अलग अस्तित्व के देवी देवता मान लिया। 

 

रोजा:

व्रत उपवास रोज़ा सौम कुर्ब. व्रत का अर्थ होता हैं ईश्वर के प्रति कोई संकल्प, प्रण, प्रतिज्ञा करना, व्रत के अंतर्गत ही उपवास आते है. उपवास का अर्थ उप यानि निकट समीप और वास का अर्थ है रहना, यानी ईश्वर के निकट आना. रोज़ा तो पर्शियन वर्ड है जिसे कुरान में अरबी भाषा में सौम कहा गया है. रोज़े रखो ताकि अल्लाह का कुर्ब हासिल हो सके यानी खुदा के करीब जा सको, तो दोनों धर्मों में फास्टिंग से एक ही उद्देश्य प्राप्त हो रहा है.

रोज़ा फ़ारसी लफ्ज़ है, जो लफ्ज़ रोज़ (दैनिक) से बना है। अरबी में रोज़े को सौम कहते हैं जिसका मतलब है रुक जाना या रोक लेना। यानी खुद को उन बातों से रोक लेना जिनकी इंसान को मनाही करी गयी है (सभी बुराइयां वगैरह)। आम दिनों में भी यह मनाहियां लागू होती है मगर साथी ही रमज़ान में खाने पीने संबंधित पाबंदीयां भी लागू हो जाती है। क़ुरान कहता है रोज़े से तक़वा पैदा होता है और तक़वे के मायने है परहेज़ करना है यानी ईश्वर की नाफरमानी करने से परहेज़ करना। रोज़ो से अल्लाह का कुरब भी हासिल होता है यानी ईश्वर की निकटता।

उपवास का अर्थ है ईश्वर के निकट वास करना (रहना)। जबकि उपासना का अर्थ है ईश्वर के निकट आसान करना (बैठना)। रहना या ठहरना हमेशा बैठने से अधिक समय के लिए होता है इसीलिये उपासना थोड़ी देर के लिए की जाती है और उपवास पूरे दिन के लिए। व्रत का अर्थ होता है संकल्प, प्रण, प्रतिज्ञा करना। ऐसे संकल्पों में एक संकल्प उपवास रखना भी हो सकता है और आंशिक समय या कुछ शर्तों के साथ रखे गए छोटे उपवासों को इसीलिए व्रत भी कहते हैं।

उपवास या रोज़ो से मनुष्यों में धर्म और आत्मन संबधित गुणों के पैदा होने के अलावा, शारीरिक और मानसिक तौर पर होने वाले लाभ अलग हैं, जिन्हें विज्ञान आज सिध्द कर चुका है बल्कि भूखे रहने पर शरीर में शूरू होने वाले लाभदायक सेल Regeneration and Maintenance प्रोसेस Autophagy पर रिसर्च करने के लिए Japanese Scientist Yoshinori Ohsumi को 2016 में Nobel Prize in Medicine भी मिल चुका है। दुनिया के कई अन्य धर्मों जैसे ईसाइयत, जुडाइज़्म, बौद्ध, जैन आदि में उपवास रखने की प्रबल धारणा मौजूद है)]

रोज़ा का मतलब है फास्ट. रोज़ा फ़ारसी लफ्ज़ है जो रोज़ लफ्ज़ जिसके मायने होते है डेली, से बना है. रोज़े के लिए कुरानी शब्द सौम है। अरबी में सौम का मतलब है रुक जाना या रोक लेना. कुरान के अनुसार सौम से तकवा पैदा होता है. तकवा के मायने है परहेज़ करना यानि ईश्वर की नाफरमानी से परहेज़ करना. महीने भर के रोज़े फर्ज किए गए हैं। फाकाह यानि भूखे रहना भी रोजा भी होता है, मगर रोज़े में तर्बियत होती है इसलिए रोजा फाकाह से अलग है। रोज़े से हर बुराई से रुकना आ जाता हैं। मगर आज कल बुराई से लोग नहीं रुक पा रहे। क्योंकि हम रोजा भी सही से नहीं रख रहे हैं। हम में बहुत कमियाँ हैं।

एक दिन का रोज तो बहुत से गैर मुस्लिम मित्र भी रख लेते है और बहुत से ऊपरी मुसलमान भी। मगर सिर्फ आस्था वाले ही पूरे महीने रोज़े रख पाते हैं और वो भी हर साल। असल में रोजेदार को किसी भूखे को देख कर तड़प लगनी चाहिए थी और उसका शुक्र अदा करना चाहिए था। मगर रोजा खत्म होते ही हम खाने पर टूट पड़ते थे। हम रोज़े की रूह तक नहीं जा पा रहे। रोज़ों से ईश्वर की रजा के लिए भूखे रहने की, गलत बातों से दूर रहने की प्रैक्टिस हो जानी चाहिए थी, अंदर से सफाई हो जानी चाहिए थी जो अब नहीं हो पा रही है। रोज़ों से या भूखे रहने से सेहत पर पड़ने वाले फायदे अलग हैं।


जकात:

ज़कात एक तरह का लाज़मी दान है। मगर फिर भी ज़कात दान नहीं है। क्योंकि दान में दूसरों की मदद करने की श्रेष्ट भावना आती है। जबकि ज़कात आपकी liability है और दूसरों का हक़ है। जो जो चीजें बढ़ती है उन पर ज़कात देनी होती है जैसे पैसा, पैदावार, जानवर।आपके माल में दूसरों का हक़ रखा गया है। जिसे कम मिला और जिसे ज्यादा दिया गया, दोनों की परीक्षा चल रही है।  औरों का धन भी आपके पास भेज दिया गया है। जैसे आपके बच्चों या पत्नी का गिफ्ट भी आपके पास लोग भेज देते हैं।

संभवत इस्लाम ने ही सबसे पहले गरीबी रेखा बनाई थी। खाने, पीने, पहनने, रहेने जैसे ज़ाती आवशयकताओं के अलावा अगर 7.5 तौले सोने के बराबर आपके पास धन नहीं है तो आप गरीब माने जाएंगे। अगर इतना या इससे ज्यादा है तो आप अमीर है और आपको compulsory दान यानि ज़कात देनी होगी। आपकी savings का 2.5% गरीबों को देना होगा। अगर कुछ धन, आभूषण रखें है और प्रयोग में नहीं है तो भी उन पर ज़कात देनी होगी ताकि stagnation न हो जाए। economy और circulation चलता रहे। जमाखोरी न हो पाए और माल, संपत्ति बेकार न पड़ी रहे। लोगों धन दौलत इकट्ठा करके नहीं रख सके। लोग या तो business में invest करे या फिर दान देते रहे। ज़कात देने से पैसा घटता नहीं बल्कि पैसा बढ़ता है क्योंकी एकनोकमी बढ़ती है।

भारत में लगभग 25000 करोड़ हर साल ज़कात निकलती है। जबकि सब नहीं देते हैं और बहुत काट पीट कर भी देते हैं। सही जगह देने की बजाए, अक्सर दिखावे में देते हैं। जबकि भारत में ज्यादातर मुस्लिम गरीब है। इस पैसे से हर साल 1 करोड़ लोगों को 25000 रुपए देके ठेला-फड़ लगवा सकते है यानि कोई भी छोटा  मोटा काम शुरू करवा सकते हैं।सही से ज़कात खर्च की जाए तो8 साल में गरीबी नहीं बचेगी, ऐसा पहले हो चुका है।  कुरान की बतायी गई सही जगह पर ज़कात खर्च नहीं हो रही है। यह बस 8 मदों में लगनी थी। मदरसों, मस्जिदों में नहीं लगवानी थी। फिलहाल इसका तीन चौथाई हिस्सा मदरसे वाले ले जाते हैं। सही से दी जाए तो गरीब बच्चे ही मदरसे मेंनहीं पढ़ेंगे, वो खुद पैसे देके पढ़ेंगे।

ज़कात की 8 जगह दी जानी थी, इनमें से 4 हकदारों को डायरेक्ट दी जानी थी और 4 मदों में दी जानी थी। वो 4 हकदार हैं: 1) गरीब को, 2) जिनकी ज़िंदगी रुक-ठहर हो गई उनको, 3) ज़कात इककट्ठा करने वाले को, 4) गैर मुस्लिम जरूरतमंदों को।  और वो 4 heads हैं: 1) किसी का कर्ज उतारने के लिए, 2) किसी की गर्दन, बँधवा मजदूरी, झूठे मुक़द्दमों में से छुड़ावने के लिए, 3) इस्लाम के मुखालीफ़ों को रोकने के लिए, 4) मुसाफिरों के लिए।

 

हज:

जीवन में कम से कम एक बार इसतीतात वाले को हज करना होता है। एक तरह से तीर्थ यात्रा है। इसमें परिक्रमा भी करनी होती है। हर धर्म में परिक्रमा का concept मौजूद है। परिक्रमा करने में centipedel force के कारण रूहानी फायदे होते हैं। हज में कफन जैसा यानि सफेद लिबास पहना जाता है यानि अब दुनिया के लिए नहीं जीवित हैं, अब सिर्फ ईश्वर के लिए बाकी हैं। हज में ईश्वर से जोड़ने वाली और इतिहास को याद करने वाली चीजें करनी होती है। इसमे सभी हाजियों को एक मैदान में मिलने का provision रखा गया था। वहा जिक्र करने को कहा गया था। यानिअलग अलग जगह से आए लोगों को एक साथ मिलकर दुनिया के लिए कुछ फायदेमंद करना था। साथ बैठ कर अपने अपने इलाकों की समस्याओं का हल निकाल सकते थे। कही अकाल है, वहा मिलकर पैसा भेज सकते थे। ये लोग हर साल बदलते रहते हैं औरअमीर वर्ग से भी होते हैं। इनके लिए हल निकालना बड़ी बात नहीं होती। असल में एक जगह लोगों को इसलिए इकट्ठा किया गया था।

जैसे रोज की नमाज़ में इकट्ठे हुए किसी मुहल्ले के नमाज़ी अपने मुहल्ले के मसाइल हल कर सकते हैं, जुमे की नमाज़ में किसी इलाके के, ईद की नमाज़ में शहर के और हज के मौके पर पूरी दुनिया के।

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