जिहाद शब्द बना है मूलधातु, ज ह द से जिसका अर्थ है जद्दो जहद करना यानी संघर्ष करना। इस्लामी फ़िक़्ह में जिहाद का अर्थ है जीवन में लगातार, निरंतर प्रयास या संघर्ष करना, शांति के लिए। ईश्वर और उसके सत्य मार्ग में भी संघर्ष करना पड़ता है। इसलिए असल मे जिहाद एक पॉजिटिव वर्ड है जिसे मीडिया द्वारा नेगेटिव बना दिया गया है।
जिहाद का अर्थ होली वॉर नहीं होता बल्कि होली वार को तो अरबी भाषा मे हरबू मुक़दस्सा कहते है जो क़ुरान या हदीस में एक बार भी नहीं आया है। सबसे पहले पवित्र या धार्मिक युद्ध शब्द का प्रयोग ईसाई क्रूसेडर के लिए हुआ था। अरबी में लड़ाई या युद्ध के लिए किताल या गज़वा शब्द आता है।
उसी तरह मजबूर किए जाने पर अगर सशस्त्र संघर्ष करना पड़े या आत्मरक्षा में तो उसे भी जिहाद कहा जाता है क्यूँकि वो भी एक संघर्ष है शांति प्राप्त करने के लिए। पर लड़ाई या युद्ध के लिए किताल या गज़वा ही मूल शब्द है।
इसलिए जिहाद के इच्छुक शख्स से मुहम्मद साहब ने फ़रमाया तुम्हारी माँ ज़िंदा हैं तो उनकी सेवा करो, उसी में तुम्हारी जन्नत है। तुम्हारे लिए वही जिहाद है। मुहम्मद साहब ने तो ये भी कहा है कि दुष्ट शासक के सम्मुख कटु सत्य कह देना भी एक जिहाद है। इस्लाम मे सबसे बेहतरीन या सबसे बड़ा जिहाद, खुद की नफ़्स यानी खुद की इच्छाओं के विरुद्ध लड़ने को कहा गया है।
यंहा
तक की 1857 की आज़ादी की क्रांति भी एक जिहाद थी। अंग्रेजों के खिलाफ जिहाद
का फ़तवा मौलाना फ़ज़्ले हक़ खैराबादी ने दिया था और मुसलमानों ने इस जिहाद
में बढ़ चढ़ कर हिस्सा लिया और जानों की कुर्बानी दी जो कि मूलतः एक अन्याय
के विरुद्ध संघर्ष ही था।
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निरंतर शांति के लिए गए प्रयास या संघर्ष को जिहाद कहते है। कभी शांति स्थापित करने के लिए सशस्त्र संघर्ष करने को भी जिहाद कहते है। क्योंकि ये भी एक शांति का प्रयास हुआ। हालांकि लड़ाई को अरबी में जिहाद नहीं बल्कि किताल शब्द आता है।
मुहम्मद सल्ल को खबर मिली कि रोमन सेना मुसलमानों पर हमला करने वाली है। मुसलमानों ने तबूक नामक सीमा पर जाके पड़ाव डाल दिया कि लड़ाई होनी है तो सीमा पर हो। बड़ी मुश्किल से वंहा भूखे प्यासे रहे थे। 21 दिन बाद वंही रहे। ये समय सीमा पर बीत गया था। कुछ दिन बाद दोनों सेना वापिस लौट आए बिना लड़े क्योंकि रोमी भी लड़ाई नहीं कर पाए। तकलीफ़ उठा के गए थे और वापिस आते थे बहुत लंबा समय था। इस पूरे कार्य मे लगभग दो-ढाई महीने लग गए थे।
बस्ती में वापिस दाखिल होते हुए नबी ने कहा कि अब हम जिहादे असगर (छोटे) से जिहादे अकबर (बड़े) में जा रहे है। यानी रोज़मर्रा की ज़िंदगी सही से जीना है। अपनी जान, नफ़्स से जिहाद करना है।
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जिहाद और क्रूसेड लफ़्ज़ों पर प्रोपगंडा
जिहाद शब्द का अर्थ होता है शांति के लिए निरंतर संघर्ष करना। अगर शांति स्थापित करने के लिए कभी जंग की नोबत आ गयी तो उसे भी जिहाद कहा गया क्योंकि वो भी एक संघर्ष है। हालांकि अपनी इच्छाओं के विरुद्ध संघर्ष करने को सबसे बड़ा जिहाद कहा गया है। बीमार मां की सेवा करने को और निर्दयी राजा के सामने कटु सत्य कहने को भी जिहाद कहा गया है। इसमें पहली खता ख़ुद मुसलमान है जिन्होंने जिहाद को उसके असली मायनों से ज़्यादा जंगी मायनों में ईस्तमाल किया और वंहा से इस्लामोफोबिया के शुरआती प्रचारक इस लफ्ज़ को ले उड़े।
फिर उन्हींने ऐसा घमासान प्रचार किया गया कि जिहाद का अर्थ केवल और केवल पवित्र युद्ध होता है। एक जाली प्रोपगैंडा खड़ा किया गया और इसे एक नेगेटिव शब्द बना दिया गया। आज जिहाद और आतंकवाद एक दूसरे के पर्यायवाची बन चुके है।
वंही दूसरी और इसका उलट हुआ। ईसाईयों द्वारा सदियों तक मध्यकाल में लड़े गए भयंकर धर्म युद्धों को क्रूसेड कहा गया जिनमें भारी कत्लेआम हुआ, जिसका इतिहास गवाह है। पर आज इस शब्द को पॉज़िटिव रूप में प्रयोग होता है क्योंकि ऐसा नैरेटिव खड़ा किया गया। मीडिया ने इसमें अहम रोल निभाया। क्रुसेड अगेंस्ट करप्शन, क्रुसेड अगेंस्ट कैंसर, क्रुसेड अगेंस्ट ट्यूबरक्लोसिस, क्रुसेड अगेंस्ट सेल्वेरी, क्रुसेड अगेंस्ट ड्रिंक जैसे जुमले और टाइटल बनाये गए जिससे क्रूसेड शब्द की छवि साफ की गई। क्रूसेड में आए क्रूस शब्द के कारण इसकी पवित्रता बनाये रखने में सहायत मिली।
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जिहाद किसी को करने की इजाज़त नहीं है. सिर्फ इस्लामिक state ही यह declare कर सकता है.
कोई इस्लामिक state है ही नहीं आज.
जिहाद लड़ाई को नहीं कहते है. हक़ के लिए मौके आते हैं जब हथियार उठाने पड़ जाते हैं.
जैसे कृष्ण ने कहा था कि अब लड़ना पड़ेगा.
कुरान के मुताबिक बिना ऐलान के जंग नहीं छेढ़ी जायगी या हमला नहीं किया जायगा.
सिर्फ 3 जगह सशस्त्र संघर्ष की इजाज़त, एक selfdefence, दूसरा जब कंहीं सामूहिक अत्याचार हो रहा है तो वंहा जाके अल्लाह की राह में लड़ते क्यों नहीं है. तीसरा इस्लामे में संधि को बहुत महत्व दिया गया है. अगर सामने वाले संधि तोड़ दे तो लड़ सकते हो.
इसके बाद अगर वो बाज़ आ जाये तो युद्द रोक देना. फिर कहा कि युद्द में दुश्मन शांति की बात पेश करे तो कुबूल कर लेना. दुशमन तभी करेगा जब दब रहा होगा. अगर धोखा देने का इरादा हो तो भी अल्लाह के लिए कर लेना. शरण मांगने वाले को सुरक्षित जगह पंहुचाना.
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जहद
गैर मुस्लिम के खिलाफ जंग छेड़ना जहद नहीं। जहद का अर्थ लड़ाई नहीं बल्कि अच्छे काम के लिए लगातार संघर्ष करते जाना है। लड़ाई को किताल कहते हैं। कभी शांति के लिए कोई लड़ाई मजबूरी में करनी पड़ जाए तो उसे भी जहद कहते हैं। जैसे गीता, वेद आदि में आवश्यकता पड़ने पर हिंसा अपनाने के आदेश दिए गए हैं और जैसे आत्मसुरक्षा में हिंसा जायज होती है। इसमें भी लड़ाई पहले सामने वाले शुरू करेंगे। इस्लाम फैलाने के लिए हथियार नहीं उठाए जा सकते। इस्लामी हुकूमत बनाने के लिए भी जंग नहीं शुरू करी जा सकती। कुरान तो जगह जगह कहता है कि चाहे इस्लाम मानों या न मानो। ये तो विचारों की बात है। कुरान तो कहता है कि धर्म के मामले में कोई जबरदस्ती नहीं, अगर अल्लाह चाहता तो सब ईमान वाले होते, तो क्या अब तुम जबरदस्ती करोगे, तुम्हें कोई दरोगा बनाके नहीं भेजा गया है।
● सशस्त्र संघर्ष के लिए कुरान में 3 शर्ते दी गई हैं, केवल इन्हीं स्तिथि में सशस्त्र संघर्ष किया जा सकता है:
1st शर्त में लड़ाई की शुरुवात ही अनुमति शब्द से हो रही है...
22:39-40 : अनुमति दी गई उनको जिनके विरुद्ध युद्ध किया गया, ज़ुल्म किया गया, जिन्हे अपने घरों से नाहक निकाला गया केवल इसलिए कि वे कहते थे, हमारा रब अल्लाह है।
[यह आत्मसुरक्षा की बात है। पूरी दुनिया में आत्मसुरक्षा के लिए हिंसा सर्वमान्य और स्वीकार है, चाहे court हो या UNO हो।]
2nd शर्त में कुरान ने offensive लड़ाई करने को कहा है...
4.75: तुम्हें क्या हो गया है कि उन कमजोर पुरुषों, औरतों, बच्चों के लिए युद्द क्यों नहीं करते जो प्राथनाएं करते हैं कि उन्हें उनकी बस्तियों से निकालो जहा लोग अत्याचारी है।
[जब बड़े स्तर पर कही, किसी भी धर्म वाले पर अत्याचार हो रहा है और कोई रास्ता न हो सिवाये लड़ाई के तो उन ज़ालिमों से लड़ना है। तुम ताकत रखने के बावजूद भी अगर हाथ पर हाथ धर के नहीं बैठ सकते। ऐसी लड़ाई को इस्लाम शांति के अर्थों में लेता है क्योंकि इससे मज़लूमों के लिए शांति आती है]
3rd शर्त के मुताबिक लड़ाई जायज है जब कोई आपसे संधि तोड़ लें। मगर इसमें आपकी मर्जी है कि उससे चाहो तो युद्द करो और चाहे न करो...
9.4: सिवाये उन मुशरीकों के जिन्होंने तुमसे समझौते किये और पूरे किये।
[इस्लाम में संधि को बहुत महत्वता दी गई है क्योंकि यह एक विश्वास तोड़ना, धोखा देना बहुत बड़े बड़े फ़ितने पैदा करता है]
अक्सर जो आयतें कुरान की हिंसा पर पेश की जाती है, वो युद्ध क्षेत्र की है। जाहीर है युद्द में ऐसे ही आदेश आएंगे जब दुश्मनों को समाप्त करने की बात होगी. जैसे श्रीकृष्ण ने गीत में लड़ने के आदेश दिए, जैसे बड़े बड़े Generals लड़ाई के आदेश देते हैं। मगर कुरान के इन आदेशों के साथ या इनके बाद में आने वाली guidelines को छोड़ दिया जाता और उन्हें पेश नहीं किया जाता है। इस्लाम के खिलाफ भड़काने वाले और आतकी बनाने वाले दोनों इन आयतों को दिखा कर दिमाग हरते हैं। पूरी बात नहीं बताते। पृष्ठभूमि भी नहीं बताते। इस्लाम का नाम लेकर आतंक करने वाले खुद इस्लाम के सबसे बड़े दुशमन और दोषी हैं। अपने हितों या कामों को धर्म का रंग दे देते हैं और दूसरे लोग समझते हैं यह धर्म कह रहा है।
● ऐसे कुछ उदाहरण इस प्रकार है:
2.190: अल्लाह की राह में उनसे लड़ो, जो तुमसे लड़े, लेकिन ज्यादती न करना। अल्लाह को ज्यादती पसंद नहीं है।
2.191: जहा भी उन पर काबू पाओ, उनका कतल करो, और जहा से उन्होंने तुम्हें निकाला तुम भी उन्हें वहा से निकालोंक्योंकि फ़ितना, कतल से भी गंभीर है। लेकीन मस्जिद हराम के निकट उनसे नहीं लड़ो जब तक वो खुद युद्ध न करे। और अगर वो युद्ध करे तो उनका कत्ल करो।
2.192: अगर वो बाज आ जाए (यानि लड़ाई से रुक जाए) तो अल्लाह भी क्षमावान है।
2.193: तुम उनसे लड़ो जब तक फ़ितना शेष न रह जाए (यानि फसाद रुक जाए) और दीन अल्लाह के लिए हो जाए। मगर वो बाज आ जाए तो अत्याचारियों के सिवाय किसी के खिलाफ कदम उठाना ठीक नहीं (यानि फिर लड़ाई नहीं करनी है)।
8.61-62: अगर वो संधि की ओर झुके तो तुम भी झुक जाओ। अगर वो तुम्हें धोखा देना चाहे तो तुम्हारे लिए अल्लाह ही काफी है।
[हमला उन्होंने किया था यानि वो संधि तभी करंगे जब वो हार रहे होंगे मगर फिर भी संधि करने का आदेश दिया गया है।]
● अगर इन शर्तों के साथ कोई लड़ाई छिड़ गई तो युद्ध में क्या आचरण होगा, ये कुरान बताता है जैसे:
कुरान ने कहा संधि टूटने पर दुशमन को मौका देना होगा यानि 4 महीने का समय दोगे तैयारी के लिए। जाहिर है, इतने लंबे समय के बीच में सुलह भी आसानी से हो सकती है। यानि इस्लाम ने छापेमार यानि गोरिल्ला वार करना भी मना कर दी है। पहले युद्द का ऐलान होगा और अचानक हमला नहीं होगा।
मुहम्मद साहब ने कहा की युद्ध में महिला, बच्चों, बूढ़ों, मजदूरों को नहीं मारा-पीटा नहीं जाएगा। जबकि ज़ाहिर है कि मजदूर युद्द में हथियार उठाने वाले होंगे, महिला nursing कर रही होंगी, बच्चें भी back-end पर मदद कर रहे होंगे।
मुहम्मद साहब ने कहा कि युद्ध में जानवरों को नहीं मारा जाएगा और फलदार वृक्ष भी नहीं काटे जाएंगे।
All is fair in war में इस्लाम यकीन नहीं रखता। इसलिए दुश्मन के हिमायतियों पर हमला नहीं किया जा सकता जब तक की वो दुश्मन के साथ मिलकर खुद लड़ नहीं रहे हो या लड़ाई में किसी तरह से दुशमन की मदद नहीं कर रहे हो।
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होली वॉर या मुकद्दस जंग का मतलब होता है धार्मिक मकसदों के लिए जंग। इस्लाम में इसके लिए कोई सही शब्द नहीं है और न ही कोई कॉन्सेप्ट। कोई इसे कुरान की बताई 3 शर्तों पर हुई जंगों को होली वॉर कहना चाहे तो कह सकता है। मगर कुरान की बताई 3 शर्तों में जंग मुकद्दस जंग नहीं है, बल्कि न्याय और नैतिकता के लिए हैं। हालांकि अगर इस्लाम की कुछ शुरुआत (फतह मक्का के बाद) जंगों को इत्मामे हुज्जत की नज़रिए से (जैसे ग़ामिदी साहब) देखोगे तो पवित्र युद्ध बन जाता है। फिर कोई इन्हें धर्मयुद्ध से मिलाकर भी देख सकता है।
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