Monday, 16 December 2024

तौहीद, आखिरत, रिसालत

 

 

[तौहीद]

ईश्वर एक है और निराकार है। उसका धर्म भी एक है। उसने अपने आदेश, शिक्षाएं, ग्रन्थ और संदेशवाहक विश्व के प्रत्येक भूभाग, प्रत्येक काल और प्रत्येक समुदाय में भेजे। ये शिक्षाएं हमेशा से बुनियादी तौर पर एक ही रही है। पर लोग स्वार्थ के कारण हर स्थान पर भेजे उसके एक ही धर्म में मिलावट करके अपने अलग धर्म बनाते गये इसीलिए आज सभी धर्म एक दूसरे से भिन्न दिखाई देते है। हालांकि उसकी मूलभूत मान्यताओं और सिद्धातों से छेड़छाड़ न कि जा सकी जो आज भी समान दिखाई देते हैऔर जो आज भी विभिन्न रूपों में प्रवाहित है। इसीलिए थोड़े से  बदले हुए शब्दों के साथ एक ही बात हर धर्म कहता है। संसार की सारी अच्छी शिक्षाओं का स्रोत एक निराकर ईश्वर ही रहा है।

गौर से देखने पर सभी धर्मों की शाखाएं एक ईश्वर से और सभी मनुष्यों की जड़े एक ही इंसानी जोड़े से जाकर मिलती है। उसके भेजे अनेकों संदेशवाहक या संदेष्टा भले ही किसी एक स्थान या समुदाय के लिए आये हो पर वो पूरे संसार के लिए आदर्श होते थे। इसीलिए उनमें से कुछ बहुत महत्वपूर्ण संदेशवाहको को संसार के विभिन्न ग्रंथो और सभ्यताओ में आसानी से खोजा जा सकता है जंहा उनके नामों और कथाओं में समानता ही समानता मिलती है। ईश्वर हमेशा मनुष्यों को चेतावनी और नसीहत के तौर पर ऐसे संदेष्टाओं की कथा सुनाता आया है। इसलिए ये कथा भी विभिन्न्न धर्मों और सभ्यताओं में हमारे पूर्वजों द्वारा आगे पहुचाने के कारण आज भी किसी न किसी रूप में जीवित बची हुई है।


[आखिरत]

एकेश्वरवादी हो, अनीश्वरवादी हो या बहुदेववादी, विश्व के लगभग सभी धर्मों में कर्मफल और परलोकवाद का सिद्धांत किसी न किसी रूप में पाया जाता है। भले ही इनकी धारणाएं विभिन्न प्रकार की हो। इस जीवन में अच्छे कर्म करने वाले या पुण्य-सवाब कमाने वाले इंसान, मृत्यु के पश्चात स्वर्ग के अधिकारी होंगे और बुरे कर्म वाले या पाप-गुनाह करने वाले नरक के अधिकारी होंगे। इन लोकों को ही जन्नत- जहन्नुम, हेवन- हेल या पैराडाइस- दोज़ख कहते है। ये जीवन एक टेस्ट है और इसका टर्म पूरा होने पर रिज़ल्ट आना है। एक दिन हमारे कर्मों का हिसाब किताब होगा। इसे ही विभिन्न धर्मों में अंतिम दिन, महाप्रलय का दिन, न्याय का दिन, बदले का दिन, आख़िरत, क़यामत, फैसले का दिन, हश्र का दिन, फाइनल डे, डुमस डे, जजमेंट डे आदि कहते है। जैसे माँ की कोख में पल रहे बच्चे के लिये गर्भावस्था के लघु जीवन के बाद बाहर एक अन्य लंबा और आश्चर्यजनक जीवन इंतज़ार करता है।

मेंडाइज़्म (साबीइन) धर्म में भी स्वर्ग नरक की मान्यता पाई जाती है। ग्रीक माइथोलॉजी में एलीज़ियम (Elysium) स्वर्ग का और टार्टर्स (Tartarus) नरक का ही नाम है।  कन्फ्यूशियनिज़्म, ताओइज़्म और चीनी पौराणिक मान्यताओं में  स्वर्ग को टीआन (Tian) और नरक को दीऊ (Diyu) कहा गया है। प्राचीन पर्शियन माइथोलॉजी में स्वर्ग को पेरेडाज़ा या पेरीडाज़ा और नरक को दुज़ख कहा गया, इन्ही से बाद में नए शब्द बने। विश्व की बहुत सी मायथोलॉजी और सभ्यताओं में स्वर्ग का कॉन्सेट पाया जाता है जैसे मेसोपोटामिया, हत्ती, मेक्सिकन, माओरी और पोलीनिशियम आदि। नरक का कांसेप्ट यूरोपियन सभ्यताओं जैसे केल्टिक -नॉर्स, अमेरिकी सभ्यताओं जैसे माया- एज़्टेक, प्राचीन मिस्री, अफ्रीकी और सुमेरी सभ्याताओं में भी पाया गया है।

न्याय इंसान की दृढ़ इच्छा और मूल आवश्यकता है। इसलिए अगर इस लोक में पूर्ण न्याय नहीं है तो किसी अन्य लोक में होगा। कर्म की जानकारी और फल की संतुष्टि होना पूर्ण न्याय मिलने का आधार है। पर इन दोनों बातों का इस लोक में आभाव है इसलिए यंहा पूर्ण न्याय या पूर्ण कर्मफल मिलना संभव ही नहीं है। मुक्ति, मोक्ष, निर्वाण, फलाह या साल्वेशन सभी एक अंत की ओर ले कर जाते है इसलिए जीवन और समय चक्र नहीं बल्कि एक रेखा है।

 

[रिसालत]

ईश्वर ने प्रकृति में एक नियम रखा है जिसके अंतर्गत जब कोई चीज़ बिना किसी देखभाल या देखरेख के यूं ही छोड़ दी जाती है तो वह चीज़ बहुत ही जल्दी बिगड़ जाती है या अव्यवस्थित हो जाती है। उदाहरण के लिए अगर किसी बग़ीचे को यूँ ही छोड़ दिया जाए तो वो जल्द ही जंगल के समान बन जायगा। इसीलिए बग़ीचे में एक माली रखा जाता है जिससे बगीचा (उसके फूल, पौधें, क्यारियां, सुदंरता आदि) भली भाँति सुरक्षित रहे। इसी नियम अनुसार अगर ये धरती भी यूँ ही छोड़ दी जाती तो यंहा भी मानव समाज और मानवीय मूल्य आदि पूरी तरह बिखर कर समाप्त हो जाते। पर ईश्वर ने प्रत्येक काल व प्रत्येक स्थान में इन सिद्धांतों को स्थापित रखने के लिए अपने संदेशवाहकों को भेजने का प्रबन्ध किया जिन्हें ईशदूत या संदेष्टा कहते है। क्योंकि ईश्वर न तो दिखाई देता है और न हम से बात करता है इसलिए वह हम में से ही कुछ सर्वोत्तम मनुष्यों को चुनाव करके उनके माध्यम से हमारा मार्गदर्शन करता है। ये मार्गदर्शक हम साधारण मानवों को ईश्वर की आज्ञानुसार जीवन जी कर दिखाते है कि सत्य के मार्ग पर चलना किसी भी मनुष्य के लिए कठिन काम नहीं है। ये सभी महापुरुष हमें धर्म का पाठ पढ़ाते है कि मनुष्य के लिए क्या सही है और क्या बुरा, किन कार्यों से मुक्ति, निर्वाण, मोक्ष, कल्याण या उद्धार है और किन से नहीं.

सबसे पहले ऐसे महापुरुष प्रथम मानव ही थे।सनातन धर्म में इस प्रथम पुरुष को स्वयम्भूमनु (आदम भी) और इस प्रथम स्त्री को शतरूपा (हव्यवती भी) कहा गया है। इस्लाम धर्म में इन दोनों को आदम और हव्वा कहा गया है। ईसाई धर्म में इन्हें एडम और ईव कहा गया है। यहुदी धर्म में  इन्हें आधाम और ख़व्वाह कहा गया है। सिख धर्म इनको आदम और हव्वा ही पुकारता है। पारसी धर्म मे इन्हें मश्य और मश्यान कहा गया है। शिंतो धर्म या जापानी पौराणिक कथाओं इन्हें इज़ानागी और इज़ानामी कहा गया है। जैन धर्म के आदिनाथ और आदम में भी कुछ समानताएं पाई जाती है।श्रीलंका में एक पहाड़ी की चोटी का नाम एडम्स पीक है और ये जगह बुद्ध, मुस्लिम, ईसाई और हिन्दुओ के लिए पवित्र स्थान है। यंहा एक जोड़ा पांव के निशान पत्थर में उकरे हुए है। मुस्लिम और ईसाई इसे आदम के पांव के निशान मानते है। हिन्दू इसे शिवजी के पांव के निशान मानते है (पुराणों में शिवजी और आदम की कहानी में कई समानता पाई जाती है)। वंही बुद्धिस्ट लोग इसे बुद्ध के पांव के निशान मानते है.

ऐसे दूसरे बड़े महापुरुष थे नौका वाले महर्षि।  एक प्राचीन कथा है जो सनातन धर्म, इस्लाम धर्म, ईसाई धर्म, यहूदी धर्म, पारसी धर्म, कई पौराणिक दंतकथाओं और प्राचीन सभ्यताओं में अनेकों समानताओं के साथ विभिन्न रूप में पाई जाती है। यानी दुनिया की तीन चौथाई से भी अधिक आबादी इस घटना में विश्वास रखती है। आज वैज्ञानिक और पुरातात्विक रिसर्चों से ये सिद्ध हो चुका है कि इस कथा में वर्णीत बाढ़ जैसा ही एक बहुत बड़ा पानी का सैलाब इतिहास के किसी कालखंड में पृथ्वी के एक भूभाग पर आया थी जिसमें वंहा सब कुछ डूब गया था। कथा ये है कि एक सत्यवान ईश्वरभक्त थे। धरती के एक बड़े भूभाग पर पाप बहुत बढ़ चुका था। ईश्वर के प्रकोप व दंड स्वरूप जलप्रलय के द्वारा समस्त पापीयों का वंहा नाश होने वाला था। ईश्वर ने अपने उस भक्त को बताया कि यंहा जलप्रलय में सब डूब जाएगा इसलिए अपने लिए एक विशाल नौका बनाओ और जब जलप्रलय आएगी तब उसमें खाद्य सामग्री, अपने निष्ठावान लोग, आवश्यक जीवों और वस्तुओं को लेकर चढ़ जाना। सो उन्होंने एक विशाल नौका का निर्माण किया। जलप्रलय आई और वे सब नौका में सवार हो गए। वो धरती जलमग्न हो गई। ईश्वर की कृपा से केवल नौका सवार जीवित बच पाए। फिर नौका एक पर्वत पर जा कर रुकी और जल स्तर घटने लगा। अंत में वे सब भी नीचे उतर आये। इसके बाद धरती पर जीवन फिर से आरंभ हुआ और आगे फैला।  इस महामानव को विभिन्न धर्मों में मिलते जुलते नामों से पुकारा जाता है जैसे:-  सनातन धर्म में न्यूह या मनु।  इस्लाम धर्म में नूह।  ईसाई धर्म में नोवाह।  यहूदी धर्म में नोअख़।  पारसी धर्म में यीमा।  सुमेरियन गाथाओं में ज़ियासुद्र। अक्काडीन महाकाव्य में अत्राहासीस।  मेसोपोटामिया के गिलगमिश महाकाव्य में उतनापिशटिम।  ग्रीक मायथोलॉजी में ड्यूकेलियन आदि।  सनातनी धर्म ग्रंथो में इनके कुछ अन्य नाम है:-  न्यूह, महामनु, महाराज मनु, वैवस्वत मनु, सप्तऋषि वाले मनु, महाजल प्लावन (महाजल प्रलय) वाले मनु, नौका वाले मनु, मछली वाले मनु, मत्स्यावतार वाले मनु, श्राद्धदेव मनु या सत्यव्रत मनु। इस महाजलप्रलय से मिलते जुलते कई प्रकार के मिथक व प्रंसग बहुत सी प्राचीन सभ्यताओं, विभिन्न जनजातियों व देशों में आज भी आसानी से देखे जा सकते है जैसे:- Waynaboozhoo or Nanabozho from Lac Courte Oreilles, K'iche' or Maya जलप्रलय मिथक, चीनी पौरणिक कथाओं में Gun-Yu, नॉर्स पौराणिक कथाओं में Bergelmir, उत्तरी अमेरिकी मूलनिवासियों की Ojibwa जनजाति में, दक्षिणी अमेरिका के Muisca लोगों में, वेल्श, तंजानिया, कोरिया, बर्मा आदि।

इनके बाद जो बड़े महापुरुष हुए। वो हैं अबिराम, राम, मुशा, कृष्ण, ईशा, जीसस, महामद, मुहम्मद हुए हैं।  जोरोस्टर, कन्फ़ुशियस, सुकरात वगैरह।  बुद्ध, महावीर, गुरु नानक देव को भी ऐसा ही सम्मान प्राप्त है।


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इस्लाम का दर्शन और उद्देश्य 

इस्लाम के अनुसार मनुष्यों को धरती पर 2 चीजें माननी और करनी थी। आस्था और कर्म। आस्था होगी तो कर्म होगा। दोनों एक दूसरे से जुड़े है।

आस्था या ईमान में 3 चीजें है: एकेश्वरवाद, परलोकवाद, ईशदूतवाद

 

 एकेश्वरवाद: 

सृष्टि नेबुला से शुरू हुई. नेबुला कंहा से आया, कंहीं से तो आया है. समय यंहा से शुरू हुआ. किसी ने 'कुछ नहीं' से 'कुछ' शुरू किया. आरंभ हुआ तो अंत भी होगा. जिसका आरंभ नहीं, उसका अंत भी नहीं होगा.

ईश्वर एक है और उसके जैसे कोई नहीं। वो आदि, अनादि है। इसलिए प्रार्थना और उपासना उसी की ही होगी। उसके कानून कभी न बदलने वाले होंगे क्योंकि वो अतीत और भविष्य जानता है। सत्ता और विधान सब उसी का है।

यंहा evolution और creation दोनों है. इन्सान evolve नहीं create हुए हैं. सबमें एक law रखा जो कभी नहीं बदलेगा (exception भी इस law का ही part है). सारे natural laws उसके कानून है. उसके कानून को आयत भी कहते हैं. आयत का मतलब वो चीज़ जो उसके सिवा कोई और न कर सके. आयात का मतलब निशानी या प्रतीक भी होता है.

जब यंहा environment रहने लायक हो गया तो मानव यंहा आया. उसे समाज के रूप में बसाया. क्योंकि उस इच्छा दी थी, जबकि बेजानों में इच्छा नहीं थी. जीवों में उसका intuition है। निर्जीव में उसके laws है। जानवर का ज्ञान उसके अंदर रख दिया गया है जैसे कोई चिप फिट हो और इसीलिए जानवर का बच्चा पहले से ही दूध पीना जानता है। जबकि इन्सान को बिना ज्ञान के बनाया और उसे ज्ञान बाहर से मिलना था. इंसानों 2 तरह से ज्ञान मिलता है, एक दुनिया से, दूसरा दुनिया बनाने वाले से. उसे ईश्वर से मार्गदर्शन मिलना था. इंसान के बच्चे को दूध पीना सीखाया जाता है। जैस मुर्गी का कुड़क होना, मुर्गी को कोई नहीं सीखाता और कछुए के बच्चों को समुद्र की ओर दौड़ना कोई नहीं सीखाता (हालांकि ये लक्षण DNA में शामिल हो सकते हैं)।

एक सवाल उठता है कि वो सम्पूर्ण है तो वो चाह क्यों रखता है। हमारे लिए वो सम्पूर्ण है। वो असीम है। उसके बारे में हम सब कुछ नहीं जानते। उसने कहा कि उसने चाहा। समय आने पर वही बताएगा कि उसने क्यों चाहा।

दूसरा सवाल होता है कि टेस्ट क्यों? असल में इस पर हमारा कोई जोर नहीं है कि हमें क्यों बनाया। जैसे computer सवाल नहीं कर सकता कि उसे क्यों बनाया गया। ये तो वक्त आने पर सही सही पता लगेगा।

शुरू से ही इंसान ऐसे सवाल करके अपनी महदूद अक्ल से समझना चाहता रहा है। जबकि ऐसे सवाल के जवाब जब नहीं मिले तो विभिन्न दर्शन और बहसे पैदा हुई। उलझने और बढ़ती गई। वो कैसा है, उसने क्यों चाहा जैसे सावलों पर अलग अलग मत हैं और मतभेद भी। इन्सान को ऐसे सवाल आखिरत के लिए बचा के रखना चाहिए जिनके जवाब उसे इस दुनिया में नहीं मिल सकते.

 

परलोकवाद: 

अगर किसी चॉइस दी जाए तो वो अच्छा और गलत दोनों कर सकता हैं। चॉइस के साथ ही दण्ड और पुरुस्कार दोनों जरूरी हो जाएगा। ये मिलकर अब टेस्ट और रिजल्ट हो गया। मनुष्य के हाथ में कर्म रखे गए है मगर उन सभी कर्मों के रिजल्ट नहीं.

मनुष्यों का एक उद्देश्य है, इसलिए मनुष्य यंहा है। कर्मों के नतीजे लगातार आते रहते हैं, मगर इकट्ठे होते जाते हैं। कुछ सामने आ जाते हैं और कुछ आगे चले जाते हैं और कुछ बहुत बाद में आते हैं। हर कर्म का एक effect होगा, पर वो फ़ौरन नहीं मिलेगा. उसे भी महसुसू हो गया है किस कर्म का रिजल्ट कब मिलता है. चाहे दुनिया के laws हो या धर्म के. जैसे ब्लड प्रेशर या सुगर के effect accumulate होते रहते हैं. रिजल्ट प्रत्यक्ष रूप में नहीं  fix time तक नहीं आएगा. उस चीज़ की fix limit cross होने पर ही results सामने आते हैं. Limit cross होने तक ही बच सकते हैं. एक समय के बाद के बाद कोई वापसी या सुधार या माफ़ी नहीं है. यह मौत है यानि अंत. असली रिजल्ट क्या हैं, वो तो वंही जा कर पता लगेंगे.

समय कोई circle या cycle नहीं है जिसमें हर चीज़ लौट के आना चाहिए (जिसमें बार बार जन्म हो सकता है.) मगर समय एक लाइन है, जिसके 2 सिरे हैं. इस लाइन पर एक बॉर्डर आता है उसे पार कर करके जीवन आगे बढ़ जाता है, वापिस या ख़त्म नहीं होता. दूसरे लोक में जीवन आरंभ होगा। इस टाइमलाइन में पृथ्वी ख़तम तो यंहा जीवन ख़तम. सृष्टि का कण कण जब इसी सृष्टि में रहेगा तो फिर फिर दुबारा assemble करना कोई अचम्भा नहीं होगा.

बाज़ लोग अल्लाह की मार्फत हासिल करने चले जाएंगे और वहा बदले में सुख भी मिलेगा मगर वहा ऐसी भौतिक बॉडी नहीं रहेगी। यंहा बॉडी material नहीं बल्कि non material होगी. जो वहा नहीं जा पाएंगे, बच जाएंगे उनको waste, throw, recycled or some other use कर लिया जाएगा।

सारा रिकॉर्ड universe में available है. मरने के बाद वो यानि जीवन playback कर दिया जाएगा। उसके आधार पर नयी लाइफ तय होगी. उसे ये बता दिया गया है और वो  खुद भी ये समझता है. हवा में बहुत सारी waves messages घूम रहे हैं। मगर इन waves को सिर्फ वही पकड़ सकता है जो सही frequency पर system set कर ले। इस तरह हमारी recording इस सृष्टि में मौजूद है। उन्हे catch कर लिया जाएगा और दिखा दिया जाएगा। टेस्ट में पास हुए उनके लिए इनाम, आनंद और परलोक है.

सबके सामने इंसाफ इसलिए होगा क्योंकि इंसाफ वो है जो सबके सामने हो, बंद कमरे में न हो। ताकि किसी को शक न रहे और कोइ पक्षपात का आरोप न लगे।

underage बच्चों का टेस्ट नहीं होगा। retarded का टेस्ट नहीं होगा। मगर लोग उन्हें पत्थर मारते हैं, परेशान करते हैं क्योंकि असल में वो दूसरों के लिए टेस्ट बनके आते हैं। बीमारियां भी अक्सर हमारे कमियों को यंही माफ़ करने के लिए दी जाती है.

कोई बच्चा अंधा या retarded हो तो लोग सोचते हैं कम से कम इसकी आखें होती या थोड़ी समझ होती तो अच्छा होता। मगर वो ये नहीं सोचते कि अगर इसकी आखें होती तो यह दूसरों को देख कर और ज्यादा तड़पता और अगर थोड़ी अकल होती तो भी बाहर की चीजें देख कर भी और ज्यादा तड़पता।

कब्र के इतने अज़ाब है तो क्या जलने वाले बच जाएंगे। ये बीच की जीवन की बातें हैं, बीच और बाद वाले जीवन की सभी बातें मुशाबिहात है.

 

ईशदूतवाद:

ईश्वर ने श्रेष्ट मानवों को अपना संदेश दिया।  ये संदेश श्रुति थी जिसे बाद मे लिख लिया गया। उसके कानूनों पर अमल करने में थोड़ा थोड़ा बदलाव होता रहा है। कोई प्रथम दूत हुआ और कोई अंतिम और कुछ बीच में। इन सभी दूतों में आस्था मुस्लिम आस्था रखते हैं और इन सभी को रोल मोडल मानते हैं। अंतिम इसलिए क्योंकि पहले रेकॉर्ड्स या संदेश शुद्ध नहीं रह पाता था। मुहम्मद साहब के बाद रिकार्ड को सही तरह रखना संभव हो गया। जैसे आज कोई भी किताब में मिलावट होती है तो पता लग जाती है। मुहम्मद साहब के बाद पेपर का आविष्कार होने जा रहा था और दुनिया एक global village होने जा रही थी यानि Globalization का दौर शुरू होने वाला था। मुस्लिम चीन गए और कागज का इल्म लाए। कागज की इंडस्ट्री मुस्लिम वर्ल्ड में डवेलप हुई। मुहम्मद साहब ईश्वर की वाणी को साथ साथ लिखवाते जाते थे। पहले के दूत भी ईश्ववाणी लोगों को पहुंचाते थे। इन सभी संदेशों में समानता होती थी। इसलिए अलग अलग ग्रंथों से इन समानता को ले और इसे ईश्वर वाणी माने। 

नबियों,रसूलों को इंसानों को ईमान वाला बनाने के लिए नहीं भेजा जाता. कुरान ने तो मुहम्मद साहब को सिर्फ अपना काम करने का हुकुम दिया. मुहम्द साहब के वक्त में ही बेशुमार इन्सान आपकी हिदायतों को तिरस्कार करते रहे. हिदायत तो उन्ही कानूनों के तहत मिलेगी जो बनाये गये है, यानि हक की तलाश करने वाले के लिए सही रास्ता आसान कर दिया जायगा और हक़ को दरकिनार करने वाले के लिए एक सीमा के बाद गुमराही का रास्ता खोल दिया जायेगा. अम्बिया तो ऐसे हक की तलाश करने वालो के लिए हक वाज़ेह करने के लिए आते थे.

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