कुरान 9:1: हुदेबिया की शांति संधि जोकि 10 साल की थी, लेकिन बनू बक्र कबीले ने बनू खुजाअ पर हमला किया 20 22 लोगों की हत्या की, जिसमे कुरैश ने इस उपद्रव में बनू बक्र कबीले का साथ देकर संधि का उल्लंघन किया। संधि का उल्लंघन करना साफ साफ युद्ध के लिए ललकारना है। इसमें बनू खुजाअ कबीला जोकि मुसलमानों का साथी था गैरमुस्लिम ही था. अगर आज के दौर में भी अगर कोई देश या कौम शांति समझौते का उल्लंघन करता है तो उस देश से साफ संधि विच्छेद का ऐलान किया जाएगा क्योंकि अब वह भरोसेमंद नहीं रहे।
कुरान 9:2: अतः तुम लोग (संधि के उल्लंघनकारी) देश मैं चार महीने चल फिर लो और सचेत रहो कि तुम अल्लाहू को विवश नहीं कर सकते और यह कि अल्लाह अवज्ञाकारीयों को अपमानित करने वाला है। अर्थात संधि विच्छेद के एलान के साथ साथ युद्ध की घोषणा भी की जाएगी जिसमे शत्रु को 4 महीने (वर्जित महीने) की मोहलत दी जायेगी।
कुरान 9:3: घोषणा है अल्लाह और उसके संदेष्टा की ओर से बड़े हज के दिन लोगों के लिए कि अल्लाह और उसका संदेष्टा मुश्रिको से मुक्त है। अब यदि तुम ( संधि के उल्लंघन करने वाले ) तौबा करलो ( अर्थात अपनी हरकतों से पलट जाओ) तो तुम्हारे लिए बेहतर है । और यदि विमुख होगे तो समझ लो तुम अल्लाह को विवश नहीं कर सकते। और अवज्ञा करने वालों को कठोर यातना की शुभ सूचना दे दो।
कुरान 9:4: लेकिन
जिन मुश्रिको ने तुमसे समझौता किया था, फिर उन्होंने तुम्हारे साथ कोई कमी
नहीं की और न तुम्हारे विरूद्ध किसी की सहायता की तो उनका समझौता उनकी
अवधि तक पूरा करो। बेशक अल्लाह सदाचारियो को पसंद करता है । इस आयत से भी
यह साफ है कि युद्ध का एलान सिर्फ उनसे है जिन्होंने संधि का उल्लंघन किया।
कुरान 9:5: फिर जब वर्जित महीने गुज़र जाए (लेकिन संधि उल्लंघन करने वाले मुश्रिको की नीतियों में कोई सुधार न आए ) तो इन मुश्रिको का ( युद्धभूमि में ) कत्ल करो जहा पाओ और उनको पकड़ो और उनको घेरों और बैठो उनकी घात में। फिर अगर वे तौबा करले और नमाज़ कायम करे और ज़कात अदा करे तो उन्हे छोड़ दो । अल्लाह माफ करने वाला, दयावान है। तौबा का अर्थ होता है पलट जाना, अर्थात वे अब बाज़ आ जाए और नमाज़ ज़कात आदि अदा करके व्यावहारिक तौर पर इस्लामी निज़ाम अपनाकर आइंदा साजिश या संधि न तोड़ने का यकीन दिलाए, तो फिर उन्हें छोड़ दो यानी युद्ध रोक दो.
कुरान 9:6: और यदि मुशरिकों में से कोई तुमसे शरण माँगे, तो तुम उसे शरण दे दो,
यहाँ तक कि वह अल्लाह की वाणी सुन ले। फिर उसे उसके सुरक्षित स्थान पर
पहुँचा दो, क्योंकि वे ऐसे लोग हैं, जिन्हें ज्ञान नहीं । यानी अगर लड़ाई
के दौरान कोई दुश्मन यह दरख्वास्त करे कि उसे इस्लाम को समझने का मौका दिया
जाए तो मुसलमानों को चाहिए कि वह उसे सुरक्षा की ज़मानत दे और उसे अपने
यहां आने की इजाज़त दे. फिर उन्हें इस्लाम को समझाने के लिए उसके सामने
इस्लाम पेश करना चाहिए। यदि अगर वह इस्लाम नहीं अपनाता है तो वे उसे
सुरक्षित उसके स्थान पर पहुंचा दें।
कुरान 9:13: क्या तुम न लड़ोगे ऐसे लोगों से जिन्होंने अपने समझौते को तोड़ दिया
और रसूल को निकालने का दुस्साहस किया और वही है जिन्होंने तुमसे युद्ध की
पहल की.
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