Wednesday, 4 June 2025

नमाज़ और विभिन्न धर्म


दुनिया के दीग़र मज़हबो में नमाज़ जैसी इबादात, अरक़ान, अवक़ात वगैरह की मौजूदगी


इस लेख में ध्यान पर अधिक जोर दिया गया  है क्योंकि यह आपको ईश्वर से सबसे अधिक भावनात्मक रूप से जोड़ता है। कई धर्मों, सभ्यताओं, संस्कृतियों में किसी न किसी तरह की पूजा या प्रार्थना के तरीके मौजूद हैं। या तो उन्होंने इसे पैगम्बरों और वंशजों से सीखा होगा या फिर अपने नफ़्स (आध्यात्मिकता की इच्छा) के कारण खुद से सीखा होगा क्योंकि ये तरीके प्राचीन नस्लों, आदिवासियों, जंगली लोगों में पाए गए हैं.  कई धर्मों में नमाज़ के समय के समान ही प्रार्थनाएँ होती हैं, भले ही उन्होंने किसी कारण से इन समयों पर प्रार्थना के प्रकार को बदल दिया हो। इस्लाम के अनुसार, कोई व्यक्ति अपने हाथों को छाती या नाभि पर रख सकता है, लेकिन हाथ जोड़कर। बहुत से धर्मों, सभ्याताओं में कियाम, रुकू, सुजूद आदि अवस्थाएं मिलती है. 

(Part-I) इस्लाम, यहूदियत, इसाईत, वैदिक, पारसी, सिक्ख, बौद्ध, जैन धर्म आदि में इबादात

शारीरिक उत्थान के अलावा, मनुष्य अपने आध्यात्मिक उत्थान के लिए भी अनेकों चीज़ें करता रहा है, भले ही उसे वो ईश्वर की ओर से मिली हो या उसने निर्मित करी हो।  विभिन्न धर्मों में ऐसी क्रियाएँ व साधनाएं विद्यमान हैं। अक्सर इबादतें 3 चीज़ो का संगम होती हैं - शारीरिक व्यायाम, मानसिक ध्यान और मंत्र उच्चारण/ तिलावत (ध्वनिक तरंगो से  शरीर और आत्मा दोनों पर प्रभाव पड़ता है).


■ वैदिक धर्म

साधना
साधना किसी लक्ष्य को पाने के लिए नियमित अभ्यास या प्रक्रिया है. ये कई प्रकार की हो सकती हैं. इनमें कुछ प्राचीन है और कुछ नयी हैं (इनकी उत्पति एक अलग विषय है). समाधि भी साधना जैसी होती है जिसमे व्यक्ति ध्यान में लीन हो जाता है और आत्मा का साक्षात्कार करता है. तपस्या, तप भी मन, शरीर का कष्ट सहते हुए, वैराग्य अर्थात सांसारिकता, भौतिकवाद से अलगाव करने का कठिन अभ्यास है.

योग 

योग का अर्थ है जोड़ना या जुड़ना। योग प्रकृति के माध्यम से मूलस्रोत ईश्वर से जुड़ने का साधन है। ये व्यायाम, ध्यान और उच्चारण का संगम है. महर्षि पतंजलि का योगसूत्र इसका मुख्य ग्रन्थ है (2वीं ई.पु. से 4वीं शताब्दी). निष्काम योग या कर्मयोग, गीता में वर्णित एक योग है जो कर्मों को बिना फल की इच्छा के, केवल कर्तव्य के रूप में करने की शिक्षा देता है।
(योग, सूर्यनमस्कार जायज़ हैं या नहीं, एक अलग विषय है)


ध्यान
 

मानसिक एकाग्रता, स्थिरता से चिंतन - मनन करने को ध्यान कहते हैं. 

प्रार्थना

इसमें ध्यान लगा कर दुवा करी जाती है.
 

उपासना, पूजा  

इन दोनों में अंतर है. उपासना का मतलब इबादत है जबकि पूजा का मतलब है सत्कार, सम्मान, उचित व्यवहार करना (ये एक अलग विषय है)


संध्या 

ये संधि का समय यानि दिन और रात के मिलन का समय जैसे प्रातः, सायं और रात्रि। ये दिन में 3 बार की जाती है. सूर्य उदय के समय जल में खड़े होकर मंत्र का जप करना संध्या का एक प्रकार है.
 

स्तुति 

इसका अर्थ है, कविता के माध्यम से प्रशंसा गुणगान करना.
 

भजन, कीर्तन
गान – संगीत के माध्यम से भक्ति करना भजन-कीर्तन कहलाता है.  
 

यज्ञ 
ये हवन (अग्नि को आहुति देना), पूजन का एक वैदिक विधि है.
 

आरती
इसमें धूप-दीप आदि से पूजा होती है. आरती भगवान की भी करी जाती है और स्वागत के दौरान इंसान की भी. इससे इंसानों की नजर भी उतारी जाती है. इंसानों वाली आरती शिर्क नहीं है (ये एक अलग विषय है).



■ इस्लाम – नमाज़/ सलाह

 
नमाज़ फ़ारसी शब्द है, अरबी में सलाह कहते हैं जो कुरानीक शब्द है। सलाह बना है सिलह या सिल्ला से जिसका मतलब है जमा या to connect. सलाह भी अल्लाह से जोड़ने का तरीका जैसे योग है। ये मश्क, कसरत और तिलावत का मेल है जैसे योग। 


■ बौद्ध - विपश्यना

 
विपश्यना भी एक योग साधना है। इसमें ध्यान लगया जाता है.

■ जैन - साधना
 
 
जैन धर्म में भी साधना (योग, ध्यान) का अस्तित्व है


■ सिक्ख धर्म- अरदास/ सिमरन
 
अरदास का मतलब है प्रार्थना करना और सिमरन का मतलब है याद करना. 


■ यहूदियत
 
Tefillah यहूदियों की इबादत का नाम है जो Synagogue या घर, दोनों जगह की जाती है.



■ इसाईत
 
प्रेयर (ग्रीक, लेटिन, रोमन में नाम अलग हैं जो बाइबिल की मूल भाषा है) का मतलब प्रार्थना है. सर्विस चर्च में एक इश्तेमाई प्रेयर या सेवा है. 



■ पारसी धर्म (जरथुस्त्र धर्म)
 
Yasna (यसन) – यसन में आग, पानी, घी, होम (sacred plant), मंत्रो का प्रयोग होता है. यह हिन्दू यज्ञ की तरह ही पारसियों की मुख्य पूजा है. ये एक सर्वशक्तिमान दाता के लिए, शैतानी शक्तियों के विरुद्ध करी जाती है. इनके अग्नि मंदिरों में अग्नि सदैव प्रज्वलित रहती है पर मूर्तिपूजा नहीं होती। इनमें अग्नि, जल, वायु आदि को पवित्र मानकर पूजा की जाती है। 

(Part-II) विभिन्न धर्मों में इबादतों का वक़्त


■ इस्लाम अनुसार मानवता की शुरवात से ही 5 समय की उपासना अनिवार्य रही है जिनको समय के साथ साथ लोग घटा कर 3 करते रहें हैं। जैसे इस्लाम धर्म के शिया सम्प्रदाय में 3 वक़्त पर कुल 5 नमाज़ पढ़ी जाती है, सुबह, दुपहर और शाम। हालांकि मजबूरी के हालातों में सुन्नी भी 5 वक़्त की नमाज़ को घटा कर 3 वक़्त पढ़ सकते हैं जो है, सुबह, दुपहर या शाम में और सूर्यास्त या रात में। क़ुरान के अनुसार मुहम्मद साहब से पहले से ही नमाज़ पढ़ी जाती रही है। हज़रत आदम से ही नमाज़ फ़र्ज़ रही है। मुहम्मद साहब ने आकर इसी नमाज़ को वापिस कायम किया। हदीसों से पता लगता है कि अबु ज़र गिफ्फारि मुहम्मद साहब से मिलने से पहले ही नमाज़ पढ़ रहे थे। इस्लाम धर्म में 5 वक्त पर नमाज़ पढने का विधान है। नमाज़ से पहले वुज़ू (आंशिक गुसल या स्नान) अनिवार्य हैं।  


इनके अलवा कई समय पर स्वैच्छिक नमाजें होती हैं। स्वैच्छिक नमाज़ों में, रात के अंतिम पहरों में उठ कर पढ़ी जाने वाली तहज्जुद की नमाज़ को बहुत ही महत्वपूर्ण और लाभकारी बताया गया है। इसी समय को हिन्दू धर्म में ब्रह्ममुहूर्त कहते है और इस काल में संध्या की बहुत महत्वता है।  ब्रह्ममुहूर्त और तहज्जुद एक सामान ही हैं। 


■ हिन्दुधर्म में भी 5 बार भजन (उपासना का एक बदला स्वरुप) करने का विधान है:- सूर्योदय के पूर्व ब्रह्मुहुर्त में, स्नान के बाद, मध्यानकाल में, सायंकाल में, रात्री में निद्रा से पूर्व। इसी प्रकार मुख्यता त्रिकाल संध्या अर्थात 3 काल की संध्या मानी जाती है:- प्रातः काल (जो सूर्योदय से पूर्व सर्वोत्तम है), मध्यानकाल में, सायंकाल में (सूर्यास्त के समय)। यधपि वैसे कुल 4 संध्या होती हैं:- चौथी संध्या है, तुर्य संध्या (मध्यरात्रि में)। चारों संध्या में से जितनी बार भी संध्या करें, भक्त को पूर्व स्नान (जैसे ग़ुस्ल) करना अनिवार्य है। ये सभी भजन या संध्या आदि के समय एंव प्रकार जगद्गुरू पुरी शंकराचार्य जी महाराज द्वारा भी धर्मादेश सिद्ध हैं। 

हर हिन्दू को दिन में पाँच बार भजन करना ही चाहिए - जगतगुरु शंकराचार्य जी

https://www.youtube.com/watch?v=Kn3mFPnozFU

सन्ध्या किस समय करें - जगतगुरु शंकराचार्य जी

https://www.youtube.com/watch?v=oxMR7tABdO8

 

■ ईसाइयत में आम तौर पर चर्च  द्वारा 7 समय तक प्रार्थना करने का आदेश दिया जाता रहा है मगर प्रोटोस्टेंट (16th Cent.), ऑर्थोडॉक्स (11th Cent.), केथोलिक (1st Cent.) इस संख्या में कमी करते रहे हैं. पर आज अक्सर ईसाई व्यवहार में 3 समय ही प्रार्थना करते हैं (सुबह,शाम, रात)। जबकि बाईबिल से संकेत मिलते हैं कि यीशु भी संभवत वही प्रचलित 5 समय प्रार्थना करते थे. इसके अलावा बाइबिल से यीशु की जो दिनचर्या पता लगती है, उससे स्पष्ट है कि उनका जब मन करता था वह तब प्रार्थना कर लेते थे। 

[Dawn] 

Mark 1:35: Very early in the morning, while it was still dark, Jesus got up, left the house and went off to a solitary place, where he prayed.

[Afternoon] 

Matthew 26:36-46: Going a little further, he fell with his face to the ground and prayed. Then he returned to his disciples and found them sleeping. (This time may also be afternoon since in olden times, people used to have a nap at this time but night is most appropriate) 

Matthew 27:46: About three in the afternoon Jesus cried out in a loud voice, My God, my God, why have you forsaken me (while hanging on cross).

[Late Afternoon/Just Before Evening]

Matthew 14:15, 21, 23, 25: The evening approached. Those who ate was about five thousand. After he had dismissed them, he went up on a mountainside by himself to pray. Later that night (also translated evening by some but it is indeed night), he was there alone. Shortly before dawn, Jesus went out to them. (This time may be very late afternoon since it was the time for dining when the evening just started)

[Dusk/Evening]

Matthew 14:15, 21, 23, 25: The evening approached. Those who ate was about five thousand. After he had dismissed them, he went up on a mountainside by himself to pray. Later that night (also translated evening by some but it is indeed night), he was there alone. Shortly before dawn, Jesus went out to them.

Luke 6:12-13: One of those days Jesus went out to a mountainside to pray, and spent the night praying to God. (This time may also be evening but night is more suitable) 

[Night] 

Luke 6:12-13: One of those days Jesus went out to a mountainside to pray, and spent the night praying to God. 

Matthew 26:36-46: Going a little further, he fell with his face to the ground and prayed. Then he returned to his disciples and found them sleeping.

[Others]

Psalm 119:164: (David states) Seven times a day I praise you for your righteous laws.


 
■ यहूदीयत में 3 समय इबादत करते हैं (सुबह, दुपहर और शाम या रात में)। मगर शनिवार (शब्बाथ) और छुट्टी वाले दिन 5 समय इबादत करी जाती है. 

Daniel 6:10: He (Prophet Daniel in Babylonian, 6th Cent. BC) got down on his knees three times a day and prayed and gave thanks before his God, as he had done previously.
 

■ पारसी (Zoroastrianism) धर्म में भी 5 समय की उपासना होती है जो हैं सुबह, दुपहर, शाम, सूर्यास्त और रात में। 
 
■ मेंडाइज़म (Mandaeism/ Sabians) 
में भी 3 समय की पूजा का विधान है (सुबह, दुपहर, शाम)।

■ मेनिकीज़्म (Manichaeism) में Elect (समर्पित अनुयायी) को 7 बार इबादत करने का आदेश दिया गया था जबकि Hearers (सामान्य अनुयायी) 4 बार इबादत करते थे (ये समय अंदाज़न थे, भोर/सूर्योदय, दोपहर, साँझ/शाम, सूर्यास्त, रात)। पूजा की शुरुआत से पहले पानी से वज़ू होता था, अगर पानी उपलब्ध न हो तो इस्लाम के समान अन्य पदार्थ प्रयोग होता था। पूजा में ज़मीन पर सजदा करना और पूजा के दौरान 12  बार उठना होता था। पूजा के दौरान ये दिन में सूर्य की ओर और रात में चंद्रमा की ओर रुख करते थे और चंद्रमा दिखाई न दे तो उत्तर की ओर रुख करते थे।

■ सिक्ख धर्म में 5 समय अरदास की जाती है जिसे नितनेम भी कहते हैं। 
 
■ लोग बौद्ध धर्म (विशेषकर मठों में) में, जैन धर्म में, ताओइज़म 
में भी अधिक से अधिक 3 समय तक (सुबह, दुपहर रात) प्रार्थना करते हैं मगर वैसे कोई गिनती फिक्स्ड नहीं है. 

■ कन्फ्यूशियनिज्म और शिन्तोइज़्म में भी प्रार्थना की कोई गिनती फिक्स्ड नहीं है. शिन्तोइज़्म में साप्ताहिक धार्मिक सर्विस नहीं होती है मगर श्रद्धालु हर सुबह मठ में श्रद्धा अर्पित कर सकते हैं। शिन्तोइज़्म में कियोमे मठ के प्रवेश द्वार पर की जाने वाली एक प्रथा है, जिसमें भक्त देवताओं के पास जाने से पहले हाथ और मुंह धोते हैं।

 

 (Part-III) इबादतों के आसन


■ इस्लाम धर्म - सजदा: नमाज़ में सबसे अच्छा आसन
 
■ हिन्दू धर्म- साष्टांग: साष्टांग आसन का बहुत महत्व है. इसमे 8 अंगों को धरती से स्पर्श करके नमन किया जाता है, जो हैं 2 पैर, 2 घुटने, 2 हाथ, 1 नाक और 1 माथा। साष्टांग और सजदा एक से हैं.
  
■ योग के एक आसन को भी साष्टांग कहा जाता है पर वह इबादत का आसन नहीं लगता है.
 
■ दण्डवत: आम जन में दंडवत को साष्टांग माना जाता है जबकि दंडवत तो पुरे शरीर को धरती पर चित लिटाकर नमन को कहते हैं।
 
■ ईसाईत – Orthodox Prostration (called Metanoia means repentance in Greek)
 
■ यहूदीयत - Karaite Bowing (during Hishtakhvah/ Hishtachavaya or Neflet Apayim and Sigd prayer): ये पहले बेहद प्रचलित था पर अब कम किया जाता है.
  
{Picture: Jehu, a king of Israel bowing, on an obelisk from the year 842 BCE}


■ सिक्ख धर्म - मत्था टेकना 
 
■ बौद्ध – पाणिपात: ये पाली भाषा का शब्द है जो पाणि (हाथ) और पात (झुकाना, गिराना) से बना है. इसका अर्थ होता है हाथ जोड़कर श्रद्धा पूर्वक नमन करना. Buddhist prostration (Pali: Panipata, Chinese: Libai, Japanese: Raihai) is a gesture used to show reverence to the Triple Gem (Buddha, his teachings and spiritual community) and other objects of veneration.
      
■ जैन धर्म – णमोकार प्राणाम  या नमस्कार: ये णमोकार मंत्र सहित किया जाता है, जैन सिद्धातों हेतु. 
           
■ पारसी धर्म - Parvenu/ Parvast and Neman: अगर कुछ पवित्र चीज़ हाथ में नहीं है तो पारसी भी सजदा कर लेते हैं, हालाँकि ये उनकी इबादत का मूल हिस्सा नहीं है इसलिए ये एक अनौपचारिक शब्द हैं.

■ मेनिकीज़्म धर्म - इबादत में ज़मीन पर सजदा करना बेहद आवश्यक अंग था।

 

(Part-IV) ऐतिहासिक सबूत


■ स्कवेयर टेम्पल, मेसोपोटामिया (इराक़) से लगभग 2500-3000 BC की 12 मूर्तियां (सुमेरियन वरशिपर नामक) मिली हैं जिन्हें इबादत की मुद्रा में दिखाया गया है। इन मूर्तियों में लोग एकाग्रता या सचेत मुद्रा में खड़े हुए हैं और उनका दायां हाथ, बाएं हाथ के ऊपर बांधने की स्तिथि में है और दोनों हाथ छाती के ऊपर टिकाए हुए हैं। ऐसी ही स्तिथि नमाज़ के प्रथम आसन में होती है। इसके अलावा निनेवेह व एस्सर (Nineveh & Assur, Iraq) में 1000 BC के चित्र बने हुए मिले हैं जैसे सन गॉड टेबलेट आदि जिनमें लोग दोनों हाथ ऊपर उठाकर दुआ- प्रार्थना करते हुए दिखाई देते हैं।

  

  


 
          
■ मिस्र की मूर्तियों और चित्रों में लोग Osiris Pose में दिखाई देते हैं, जिसमें हाथ छाती के पास होते हैं.  Osiris जन्म और मृत्यु देवता है और उसकी यह अवस्था शायद एक ममीकृत कफन को दर्शाती है. इसी तरह Amarna art के चित्रों में, विशेष रूप से सूर्य भगवान Aten की पूजा करते हुए लोगों की मूर्तियाँ में, हाथ उठाकर प्रार्थना करते हुए दिखाई देते हैं.


 

 

 

■ पारसी धर्म की प्राचीन कलाकृतियों में फरावहार (Faravahar, अच्छाई, नेक रूह, दिव्यता आदि का प्रतीक) की आकृति के सामने, लोग हाथ उठाकर प्रार्थना करते हुए दिखते हैं।


 

   
■ यहूदी धर्म में भी दोनों हाथों को ऊपर उठाकर प्रार्थना करने की प्रथा मिलती है.
 
■ बाइबिल में उल्लेखित एक मुद्रा है जिसमें लोग हाथ ऊपर उठाकर प्रार्थना करते हैं. इसे ओरांते पोज़ (Orans pose) कहते हैं.  प्रारंभिक इसाई कलाकृतियों में ये बेहद दिखाई देती है.  

■ जापान की शिंतो परंपरा में भी लोग हाथ जोड़कर और झुककर प्रार्थना करते हैं। 

■ कई भारतीय हिन्दू, बौद्ध, योग मुद्राएँ (gesture) हैं जो ईसा मसीह के प्राचीन चित्रों में उनके द्वारा करती हुई पायी गयी हैं जैसे अंजलि मुद्रा (हाथ जोड़ने की मुद्रा) और प्रार्थना की अन्य मुद्राएँ. ये भारत में पूजा में आज भी प्रचलित हैं। कई और भी भारतीय मुद्राएँ (अभय, ध्यान आदि) भी हैं जो ईसा मसीह के चित्रों में पायी गयी हैं.  

चीन की हान और तांग काल की मूर्तियों में भी लोग ध्यान मुद्रा में बैठे हुए दिखते हैं, विशेष रूप से बौद्ध धर्म के प्रभाव में। इस मुद्रा को ध्यान मुद्रा कहा जाता है, जो बाद में जापानी ज़ेन बौद्ध धर्म में भी देखी गई। 


 









          
                      

(Part-V) सवाल- जवाब 

क्या नमज शब्द की उत्पत्ति संस्कृत से नहीं है?

नमाज़ शब्द फारसी है, अरबी नहीं. मगर फारसी में नम लफ्ज़ का माद्दा या मसदर मौजूद नहीं है. फारसी में नम लफ्ज़ तो गीले के लिए इस्तेमाल होता है, न कि इबादत के लिए. इस शब्द का मूल केवल संस्कृत में मिलता है. नमाज़ शब्द बना है, संस्कृत के नम+अज से. नम यानी झुकाना और अज यानी अजन्मा (वेदानुसार). नमज का मतलब हुआ अजन्मे के सामने झुकना. ये फिर बाद में फारसी में नमज से नमाज़ बना. इरान, अफगान, भारतीय उपमाद्वीप और आगे साउथ ईस्ट एशिया के देशों में नमाज़ शब्द ही इस्तेमाल होता है. जबकि मिडल ईस्ट, अरबी देशों में और आगे यूरोपीय, पश्चिम देशो में सलाह शब्द इस्तेमाल होता है. इसकी वजह यह है कि ये शब्द अखंड भारत में प्रचलित था. नमाज़ शब्द अखंड भारत का सबूत है.  

संस्कृत व्याकरण के आधार पर ऐसा कहा जा रहा है कि नमाज शब्द संस्कृत के नम+अज से नहीं बना है. लेकिन यह पूरी तरह से सही नहीं लगता है। नमाज शब्द निश्चित रूप से संस्कृत से ही होना चाहिए या कम से कम संस्कृत और अवेस्तन की प्रोटो भाषा से (दोनों का मूल मार्ग एक ही होने की संभावना है या दोनों में से कोई एक दूसरी से रचियित है)। बाद में गलत उच्चारण होते हुए 'नमाज़', 'नमाज़ो' (फारसी में) या 'नमोजाये' (संस्कृत में) से नमाज़ हो गया। हमारे पास ऐसे कई संस्कृत शब्दों के उदाहरण हैं जो फ़ारसी में बोले जाने पर थोड़े बदल गए जैसे हस्थ, वर्षा, सप्ताह आदि। संस्कृत और फारसी में बहुत से शब्द मिलते जुलते हैं. 

नमन करने अर्थात् झुकने के अर्थ में संस्कृत में नम् धातु है तथा फारसी और अवेस्ता में भी नम शब्द है।  भारत-ईरानी में नमस्वति, प्राचीन ईरानी नमह्वति, अवेस्ता में नमख़्वति, संस्कृत में नमस्वति, ऐसे ही प्राचीन ईरानी में नमहन/ नमह्वन है।


क्या ब्रह्ममुहूर्त तहज्जुद से नकल किया गया है?

क्या ब्रह्ममुहूर्त इस्लाम से लिया गया है? नहीं। ये समय विश्व भर में ध्यान आदि के लिए प्रसिद्द है. यह समय हिंदू धर्म में भी सदियों से प्रचलित है। इस मुहूर्त को हिंदू विद्वानों द्वारा प्राचीन प्रथा के रूप में स्वीकार किया जाता है। यह सबसे लाभकारी मुहूर्तों में से एक है, जैसा कि विभिन्न पुस्तकों में उल्लेख किया गया है. हिंदू संस्कृति में मनुस्मृति (4:92), भागवत पुराण (10:70:4 - श्री कृष्ण इस समय ध्यान करते थे) में इसका उल्लेख है और भावप्रकाश (1:4 ), अष्टांग हृदयम (2:1) जैसे आयुर्वेदिक ग्रंथों में भी इसका उल्लेख है. कई शास्त्रों, ग्रंथों में इसका उल्लेख है। अष्टांग हृदयम में इसका उल्लेख है, जो वाग्भट्ट द्वारा लिखित आयुर्वेद का एक बहुत प्रसिद्ध ग्रंथ है। चीनी यात्री इत्सिंग (7वीं शताब्दी) ने कहा है कि अष्टनाग हृदय पूरे भारत में व्यापक रूप से लोकप्रिय था। यह भी लिखा गया है कि वाग्भट ने इस तरह के ज्ञान और प्रथाओं को पहले के महान विद्वानों से लिया था। 


इस ग्रंथ की तिथि पैगंबर मुहम्मद के समय से बहुत पहले की है। मनुस्मृति और ऐसे आयुर्वेद ग्रंथ पैगंबर से भी पुराने हैं। अगर आप कहते हैं कि यह श्लोक प्रक्षेप (interpolation) हो सकता है तो यह भी हो सकता है कि प्रक्षेप न हो, इसलिए आप पुष्टि नहीं कर सकते। यह कहने के लिए ठोस सबूतों की आवश्यकता है (जो कि नहीं है) कि यह प्रथा हिंदू धर्म या उसके ग्रंथों में इस्लाम या मुहम्मद साहब से ली गई थी, जबकि इसके उलट सबूत मिल रहे हैं। अधिकांश मुसलमान अज्ञानता के कारण यह मानने के लिए बिल्कुल भी तैयार नहीं हैं कि इस दुनिया में इस्लाम से पहले भी महान सभ्यताएँ, कलाएँ, प्रथाएँ, ज्ञान आदि थे। वे सोचते हैं कि पूरी दुनिया जाहिलियत में जी रही थी। अवश्य ही ईश्वर ने ये सनातन धर्मियों को दिया होगा जब वो भी भी सत्य धर्म पर थे.

क्या योग ईश्वर के लिए होता ही नहीं है?

पतंजलि के योगसूत्र या योग दर्शन में ईश्वर का उल्लेख किया गया है। इसमें दिए सूत्रों से स्पष्ट होता है कि पतंजलि ने ईश्वर को एक महत्वपूर्ण तत्व केरूप में स्वीकार किया है और उसकी भक्ति या समर्पण से योग साधना में उन्नति का मार्ग प्रशस्त होता है। ईश्वर की प्राप्ति भी पतंजलि के योगसूत्र में वर्णित है। 

कैवल्य: योगसूत्र के अनुसार, चित्त की वृत्तियों का निरोध अंततः कैवल्य या मोक्ष की ओर ले जाता है। यह आत्मा की स्वतंत्रता की स्थिति है, जहां आत्मा सभी प्रकार के कष्टों और बंधनों से मुक्त हो जाती है। आस्तिक दर्शन में मोक्षसे ही ईश्वर प्राप्ति है।


इंसानी आवाज़ से अज़ान और जुमे का दिन  कैसे निर्धारित हुए?  

इस्लाम में इसी नमाज़ रूपी प्रार्थना को करने से पहले अज़ान दी जाती है ताकि लोगों को पता लग जाए की ईश्वर की उपासना का समय हो गया है। इस्लाम ने इंसानी आवाज़ को ईश्वर की ओर बुलाने के लिए चुना गया जबकि ईसाईयों में घन्टे और यहूदियत में तुरही (सींग/ Shofar) से लोगों को इबादत के लिए पुकारा जाता था. 
इसी तरह इबादत के लिए इस्लाम में शुक्रवार को सबसे महत्वपूर्ण दिन छुना गया जबकि इसाइयत में इतवार और यहूदियत में शनिवार का दिन महत्पूर्ण हैं. 


------------------------------------------


संप्रेक्ष्य नासिकाग्रं स्वं दिशश्चानवलोकयन् [गीता 6:13]
योगी ऐसे योग करें की स्वयं अपनी ही नाक के अग्र भाग पर इस प्रकार दृष्टि जमाए, ध्यान केंद्रित करें, कि किसी अन्य दिशा में न देख सके।
(उसे शरीर, गर्दन और सिर को सीधा रखते हुए और आँखों को हिलाए बिना नासिका के अग्र भाग पर दृष्टि स्थिर करनी चाहिए।)

हे मनुष्यों। जिस परमेश्वर की योगी जन उपासना करते हैं, उस की आप लोग भी उपासना करो। [ऋग्वेद: 6:16:46] 

भूथिषठानते नमउक्तिम विधेन [यूजर्वेद: 40:16]
हम तुझे बहुत बड़ी नमस्कार-उति (ऐसी उक्ति जो नम करके, झुक कर अर्पित की जाएगी - नमाज़) करते है।?

सदिन्न भिज्ञउ पत्नीवंतो नमस्यम नमस्यन (ऋग्वेद: 1: 72:5)
वे पत्नियों के साथ, उसके सामने झुक कर उपासना करते है।
{अभिज्ञउ नमस्य- offering adoration kneeling upon their knees, रुकू की तरह)?

ज्ञउवाधेनमसा सदेम (ऋग्वेद: 6:1:6)
{Kneeling upon our knees with adoration - आदर भाव के साथ घुटनो पर झुकना}?


No comments:

Post a Comment

दर्शन विज्ञान और ईश्वर

   दर्शनशास्त्र की 3 शाखाएँ हैं:- I. तत्वमीमांसा/ तत्वज्ञान (Metaphysics - beyond physics/theory of reality) [तत्व, अस्तित्व, वास्तविकता का ...