[भारतीय दर्शन]
दर्शन (फलसफा/फिलोसोफी) शब्द का अर्थ दृष्टि या देखना. भारतीय दर्शन में 9 दर्शन होते हैं, 6 आस्तिक (वेदों को मानने वाले) और 3 नास्तिक (वेदों को नहीं मानने वाले). भारतीय धर्म परम्परा या दर्शन में नास्तिक वो हैं जो वेदों (शब्द प्रमाण: वेद) को प्रमाण नहीं मानते जैसे चार्वाक, जैन, बौद्ध। ये 9 दर्शन हैं: न्याय, वैशेषिक, सांख्य, योग, पूर्व मीमांसा, उत्तर मीमांसा (वेदांत) और बौद्ध, जैन, चार्वाक.
ज्ञानमीमांसा केंद्रित सांख्य दर्शन (अब विलुप्त) और योग (योग तो प्राचीन था पर पतंजलि ने पुनः परिभाषित किया) दोनों समान दर्शन हैं. तत्वमीमांसा केंद्रित न्याय और वैशिषिक दोनों दर्शन भी समान हैं. मीमांसा और वेदांत (सर्वाधिक महत्वपूर्ण हो गया और आज भी है)। इन सभी दर्शनों के सूत्र या महावाक्य सारांश के तौर पर रचे गए जो हैं:-
अथातो धर्मजिज्ञासा। (पूर्वमीमांसा)
अथातो ब्रह्मजिज्ञासा। (वेदान्तसूत्र)
अथातो धर्मं व्याख्यास्यामः। (वैशेषिकसूत्र)
अथ योगानुशासनम्। (योगसूत्र)
अथ त्रिविधदुःखात्यन्तनिवृत्तिरत्यन्तपुरुषार्थः। (सांख्यसूत्र)
प्रमाणप्रमेयसंशयप्रयोजनदृष्टान्तसिद्धान्तावयवतर्कनिर्णय...श्रेयसाधिगमः। (न्यायसूत्र)
आसानी के लिए हम दर्शन की उत्पत्ति को कालक्रम (मतान्तर संभव) से समझने की कोशिश करेंगे. वेदों (1500 ई.पू. समीप) में उपलब्ध कर्मकांड के आधार पर जैसे ब्राह्मण और आरण्यक ग्रंथो की उत्पत्ति हुई, वैसे ही वेदों में उपलब्ध दर्शन के आधार पर उपनिषदों (800 ई.पू. समीप) का जन्म हुआ. उपनिषदों के आधार पर बाद में वैदिक दर्शनों का जन्म हुआ. फिर कर्मकांड, यज्ञबलि, कृषिप्रधानता के कारण भारत में दर्शन, आस्तिक (Orthodox) और नास्तिक (Heterodox) विचारधारों में बंट गया। सभी 9 दर्शनों की उत्पत्ति का कारण (600 ई.पू. समीप) वैदिक, बौद्ध, जैन, चार्वाकों में हुए संवाद, टकराव और प्रतियोगिता और को माना जाता है. षडदर्शन के सभी दर्शनों का लगभग आस-पास ही विकास हुआ और मैक्समुलर अनुसार इनकी उत्पत्ति 600-200 ई.पू. हुई. संभव है कि षडदर्शन में से कुछ दर्शन इस काल से पहले उपलब्ध रहे हो मगर फिर भी उनका स्वरुप वैसा नहीं हो सकता था, जैसा बाद में हुआ.
कुमारिलभट्ट (7वी सदी) नामक विद्वान ने बौद्ध दर्शन के
बढ़ते प्रभाव के कारण बुद्ध धर्म को स्वीकार करके बौद्ध दर्शन को सीखा ताकि
वैदिक दर्शन को उत्तर लायक बनाया जा सके और फिर वापिस वैदिक धर्म स्वीकार
करेक बौद्धों से शास्त्रार्थ करके हराया. बाद में बौद्धों ने कुमारिल को
गुरु-शिष्य परम्परा (गुरुओं से ज्ञान प्राप्त करके उसी ज्ञान की आलोचना) का
वास्ता दिया तो वो तब जाके रुके. कुमारिल भट्ट ने भट्ट शाखा शुरू करी और
इसके शिष्य प्रभाकर ने प्रभाकर शाखा शुरू करी.
पूर्व मीमांसा नाम वेदों के कर्मकांड (शुरुआती हिस्से, संहिता, ब्रह्माण, आरण्यक) पर आधारित होने के कारण पड़ा. पूर्वमींमांसा का वेदों से अधिक घनिष्ठ संबंध है। मीमंसा ने सृष्टि की व्याख्या के लिए ईश्वर को आवश्यक नहीं माना है. इसे अनेकेश्वरवादी बताया गया है.
7. गीतादर्शन भी वैदिक षडदर्शनों के समकालीन है। गीता का कर्मयोग उपनिषदों के ब्रह्मवाद के बाद एक महत्वपूर्ण मौलिक दर्शन है। सभी वैदिक दर्शनों ने कर्मयोग का महत्व स्वीकार किया है।
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प्राचीन भारतीय नास्तिक दर्शन
वैदिक धर्म के विरुद्ध 7वीं सदी ई.पु. में 63 तरह की नास्तिक विधर्मी (heterodox) विचारधारायें शुरू हुई जो आपस में प्रतिद्वंद्वी भी थी. इनमें 7 बेहद प्रमुख थी जैसे:-
महावीर: अहिंसा व कर्म सिद्धांत
अजित केशकंबली: उच्छेदवाद / भौतिकवाद (लोकायत/ चार्वाक)
मक्कलि गोशाल: नियतिवाद (आजिवक) [ 5वीं सदी ई.पु.]
संजय बेलट्ठिपुत्त: अज्ञेयवाद / अज्ञानवाद (agnosticism)
पकुध कात्यायन: सप्तधातु सिद्धांत/ शाश्वतवाद/परमाणुवाद
पूरण कश्यप: अकर्मवाद
ये सभी मिलकर श्रमण परम्परा कहे गए. श्रमण वह व्यक्ति होता है जो किसी उच्च, धार्मिक उद्देश्य के लिए श्रम, तपस्या (austerity) करता है या साधक, तपस्वी (ascetic) होता है. आजीविक भी त्यागी-भिक्षु (renunciates) हुआ करते थे.
ये सभी लगभग एक दुसरे के समकालीन थे. इनमें बुद्ध और महावीर (6ठी और 5वीं सदी ई.पु. में) को छोड़कर, अन्य सभी को को किसी न किसी हद तक अक्रियवाद (amoral-ism) का समर्थक माना जाता है अर्थात वो जो कर्म (अच्छे या बुरे) का कोई फल या सम्बन्ध नहीं मानता. बौद्ध के ग्रन्थ पाली त्रिपिटक के सामञ्ञफल (सामंनफल) सुत्त में बुद्ध के समकालीन अन्य 6 श्रमणों के विचार बुद्ध विरोधी होने के कारण, विधर्मी या तीर्थिक (झूठे) शिक्षकों के रूप में उल्लेखित हैं.
संभवतः श्रमण, आजीविक विचारधाराएँ 8-9वी सदी ई.पु. में भी उपलब्ध थी. बौद्ध और जैन लोग तो पहले ही पूर्वर्ती बौद्धों और तीर्थंकरों को मानते हैं.
1. बुद्ध को इन्हें तथागत, शाक्यमुनि या सिद्धाथ गौतम के नाम से भी जाना जाता है. यह कुल 29 में से 28वें बुद्ध (जाग्रत / प्रबुद्ध) माने जाते हैं.
2. महावीर स्वामी को महावीर जैन, वर्धमान या निगंठ नटपुत्त (निर्ग्रन्थ नाथपुत्त) के नाम से भी जाना जाता है और यह जैन धर्म के 24वें तीर्थंकर (सर्वोच्च उपदेशक) थे.
3. अजित केशकंबली संभवतः बुद्ध और महावीर के समकालीन दार्शनिक थे और भारतीय भौतिकवाद (materialism) के आरंभकर्ता. लोकायत संप्रदाय के सिद्धांत काफी हद तक इन्हीं की शिक्षाओं से लिए गए लगते हैं। क्योंकि इनकी एतिहासिक व्यक्ति के तौर पर पुष्टि हो जाती है इसलिए इन्हें ही लोकायत संप्रदाय
का अग्रदूत (Forerunner) माना जाता है. इनका दर्शन भौतिकवाद, नास्तिकता और इन्द्रियों के आनंद पर जोर देता है। यह
प्रत्यक्ष अनुभूति, अनुभववाद (empiricism) और सशर्त अनुमान (inference) को
ज्ञान के उचित स्रोत के रूप में मानता है, दार्शनिक संशयवाद (skepticism)
को अपनाता है और कर्मकांड को अस्वीकार करता है।
चार्वाक/लोकायत/बृहस्पति: चार्वाक या लोकायत भारतीय भौतिकवाद का एक नास्तिक संप्रदाय है। चार्वाक का अर्थ, मीठे बोली बोलने वाला होता है, जो चारू (मीठा) और वाक् (वचन) से बना है। चार्वाक शब्द का अर्थ, चबाने या खाने वाला भी होता है। वैसे दोनों अर्थ भौतिकवाद की ओर संकेत हैं. इस दर्शन को लोकायत (इहलोक को माने वाले) भी कहा जाता है. लोकायत का एक और अर्थ है, सामान्य रूप से लोगों में पाया जाने वाला। लोकायत कोई व्यक्ति नहीं थे। कुछ विद्वानों का मानना है कि चार्वाक भी इस सम्प्रदाय का नाम नहीं बल्कि कोई व्यक्ति रहे होंगे, संभवतः बृहस्पति के शिष्य। बृहस्पति को इस दर्शन का प्रवर्तक (Promoter) थे और उनका नाम प्राचीन ग्रंथों में उपलब्ध है। बृहस्पति को बृहस्पति सूत्र (विलुप्त) का लेखक माना जाता है, जिसे चार्वाक स्कूल का केंद्रीय ग्रन्थ कहा जाता है। चार्वाक और बृहस्पति ऐतिहासिक व्यक्ति सिद्ध नहीं हो पाते हैं. कुछ लोग मानते हैं कि बृहस्पति वत्सायान (कामसूत्र के लेखक) भी हो सकते हैं. सामन्यतः ऐसा माना जाता है कि बृहस्पति और चार्वाक (ऐसी बातें करने वाले विद्वान) अनेकों थे. इसलिए इस दर्शन का कोई औपचारिक संस्थापक नहीं माना जाता है. इनके बारे में विरोधियों के लेखन में जानकरियां मिलती हैं. इनका लिखा नष्ट हो गया या शायद नष्ट कर दिया गया होगा. इस दर्शन का प्रसिद्ध वाक्य का मर्म है: जब तक जियो, सुख से जियो। चाहे ऋण लेकर ही घी पियो।
4. मक्खलि गोसाल (मसकारिन/ मंखलिपुत्त/ मंथलिपुत्र गोशालक): प्राचीन भारत के एक तपस्वी आजीविक शिक्षक थे। ये महावीर के साथ शुरवात में रहें फिर स्वयं का नियतिवाद (Determinism) चलाया जो कहता है कि सब पहले से तय है.
5. संजय बेलाथिपुत्र (वैरातिपुत्र),
एक भारतीय तपस्वी दार्शनिक थे और अज्ञान (Ajnana) विचारधारा के समर्थक थे।
अज्ञान प्राचीन
भारतीय दर्शन और कट्टरपंथी भारतीय संशयवाद के नास्तिक या विधर्मी स्कूलों
में से एक था। यह एक श्रमण आंदोलन था और बौद्ध धर्म, जैन धर्म और आजीविक का
एक प्रमुख प्रतिद्वंद्वी था। इनके बारे में उल्लेख बौद्ध और जैन ग्रंथों
में दर्ज किये गए है। उनका मानना था कि आध्यात्मिक (metaphysical)
प्रकृति का ज्ञान प्राप्त करना या दार्शनिक प्रस्तावों (propositions) के
सत्यमूल्य का पता लगाना असंभव था; और यदि ज्ञान संभव भी था, तो यह अंतिम
मोक्ष के लिए बेकार और नुकसानदेह था। वे अपने स्वयं के किसी भी सकारात्मक
सिद्धांत का प्रचार किए बिना ही खंडन (refutation) करने में विशेषज्ञ थे।
6. पकुधा काकयान (कचयान/कच्चायन) एक शिक्षक और दार्शनिक थे, जो महावीर और बुद्ध के समकालीन थे। वह एक
परमाणुवादी (atomist) थे जो परमाणुवाद (atomism) में विश्वास करते थे,
जिसके अनुसार सब कुछ सात शाश्वत तत्वों - पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, सुख,
दर्द और आत्मा से बना है। उनकी शिक्षाएँ शाश्वतवाद (Eternalism) और
श्रेणीवाद (categoricalism) या सत्सत्ववाद या सत्तकायवाद थीं.वे मानते थे
कि पदार्थ, सुख, दर्द और आत्मा शाश्वत हैं और आपस में एक दूसरे से नहीं
मिलते।
शाश्वतवाद (सत्सत्व-दृष्टि), अर्थात शाश्वतवाद, एक तरह की
सोच है जिसे बुद्ध ने निकायों और आगमों (बौद्ध ग्रंथों) में खारिज कर दिया
था। इसका एक उदाहरण यह विश्वास है कि व्यक्ति में एक अपरिवर्तनीय आत्मा
होती है। बुद्ध के समय में इस तरह के विचार विभिन्न समूहों में हुआ करते
थे। तार्किक और ज्ञानमीमांसा (epistemic) के आधारों पर बुद्ध ने इस विचार
और उच्चेदवाद (annihilationism/ विनाशवाद) की विपरीत अवधारणा को खारिज कर
दिया। उन्होंने इन चरम सीमाओं के बीच एक मध्यम मार्ग प्रस्तावित किया, जो
ontology पर नहीं बल्कि causality पर निर्भर था। शाश्वतवाद में यह विश्वास
शामिल था कि चीजों के विलुप्त होने का मतलब है उनकी सुप्तता (latency) और
चीजों के उत्पादन का मतलब है उनकी अभिव्यक्ति - यह बुद्ध के मध्य मार्ग के
सिद्धांत का उल्लंघन करता है।
7. पुराण कश्यप एक भारतीय तपस्वी शिक्षक थे जो महावीर और बुद्ध के समकालीन थे। उनकी शिक्षाएँ अनैतिकता (अकिरियावाद या नत्थिकावाद) थीं। इसके अनुसार अच्छे या बुरे कर्मों के लिए कोई पुरस्कार या दंड नहीं है।
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Jainism
अनेकात्मावाद: अनेकों आत्माएं या जीव हैं.
अनेकान्तवाद: कोई भी वस्तु या सत्य एक ही दृष्टि से पूर्ण नहीं समझा जा सकता.
स्यादवाद: अनेकान्तवाद की अभिव्यक्ति कि हर कथन के साथ “स्यात्” (शायद/किसी दृष्टि से) जुड़ा होता है.
नयवाद: सत्य को समझने के आंशिक दृष्टिकोण
अपरिग्रह: आसक्ति और संग्रह से बचना
पंचपरमेष्ठी: जैन धर्म में पाँच पूज्य हैं, अरिहंत, सिद्ध, आचार्य, उपाध्याय, साधु.
कैवल्य: निर्वाण, मोक्ष.
Buddhism
अनात्मवाद: आत्मा का निषेध.
शून्यवाद: सभी वस्तुएँ स्वभावतः शून्य हैं, उनका स्वतंत्र अस्तित्व नहीं.
क्षणिकवाद: सब कुछ क्षण-क्षण बदलता है.
प्रतित्यसमुत्पाद: हर वस्तु कारण-कार्य संबंध से उत्पन्न होती है.
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भारतीय - पश्चिम दर्शन
सामन्यतः पश्चिम दर्शन में केवल विचार होते हैं, तर्क प्रधान होता है और जानना ही अन्तिम उद्देश्य होता है. जबकि भारतीय दर्शन में विचार और साधना का संगम होता है और यह तर्क (तत्त्वमीमांसा का तार्किक विश्लेषण), अनुभूति, अध्यात्मवाद, मुक्ति प्रधान होता है. भारतीय दर्शन में हमें आत्मा का दर्शन प्राप्त हुआ जबकि पाश्चात्य दर्शन में सामान्यतः मानववाद पाया जाता है। पाश्चात्य दर्शन का उद्भव 'स्वयं को जानो' (Know thy self) से हुआ है।
भारत - यूनान दर्शन
प्राचीन यूनानी दर्शन बेहद शानदार था मगर भारतीय दर्शन को कोई जवाब नहीं है. यूनानी
दर्शन संभवतः अपने शुरुआती चरणों के दौरान स्वतंत्र रूप से विकसित हुआ, न
कि भारत के प्रभाव में। बाद में ग्रीस और भारत के बीच बने संबंधों ने,
विशेष रूप से सिकंदर की विजय के बाद, दर्शन के आदान-प्रदान को सुगम बनाया।
ग्रीक दर्शन की शुरुआत 6वीं शताब्दी BC में हुई थी, जो पौराणिक कथाओं से
तर्कसंगत जांच की ओर बढ़ रहा था। पहला ग्रीक दार्शनिक आमतौर पर Thales of Miletus (624-
546 BC) को माना जाता है। उन्हें अक्सर "दर्शन का पिता" कहा जाता है
क्योंकि उन्होंने पौराणिक कथाओं से हटकर ब्रह्मांड के क्रियान्वन के लिए
तर्कसंगत और प्राकृतिक व्याख्याएँ पेश कीं। भारत - यूनान के दर्शन में कुछ
समानताएँ दिखाई देती हैं जैसे:-
Monism: यह अद्वैतवाद के
समान एक दार्शनिक दृष्टिकोण है कि सभी वास्तविकता मूल रूप से एक आवश्यक
substance, principle, entity से बनी है। वेदांत में ब्रह्म एक अकेली
ultimate reality का विचार है. यूनानी दर्शन में भी एक singular origin,
principle called Arche की अवधारणा है. दोनों विचार आपस में बहुत
मिलते हैं. Arche शब्द का अर्थ है, प्रारंभ, मूल, प्रथम सिद्धांत,
प्राथमिक पदार्थ। सुकरात से पहले के दर्शन में यह एक बुनियादी अवधारणा थी
जो अंतर्निहित पदार्थ या सिद्धांत को संदर्भित करता थी जो सभी वास्तविकता
का आधार है। कुछ लोगों ने प्रस्तावित किया कि पानी आर्क है, क्योंकि यह
जीवन के लिए आवश्यक है, कुछ ने हवा को कहा, कुछ ने आग और कुछ ने पृथ्वी का
प्रस्ताव रखा। हालाँकि, Anaximander (610-546 BC) ने सुझाव दिया कि आर्क एपीरॉन है अर्थात अनंत, असीम, शाश्वत, अनिश्चित पदार्थ है जो हर चीज को जन्म देता है।
Determinism (नियतिवाद):
ये एक दार्शनिक दृष्टिकोण है कि सभी घटनाएँ, जिनमें मानवीय क्रियाएँ और
निर्णय शामिल हैं, पूर्व कारणों और प्राकृतिक नियमों द्वारा निर्धारित होती
हैं। आजीविकों का एक निश्चित ब्रह्मांडीय व्यवस्था में विश्वास और Stoic (Stoicism) का भाग्य और प्राकृतिक नियम में विश्वास, मिलता जुलता है।
Reincarnation (पुनर्जन्म): आत्मा के पुनर्जन्म के बारे में पाइथागोरस (570
BC) के विचार समसारा और कर्म की भारतीय अवधारणाओं के साथ समानता रखते हैं।
कुछ इतिहासकारों का सुझाव है कि पाइथागोरस मिस्र के रहस्यवाद (mysticism)
या भारतीय दर्शन से प्रभावित थे। कहा जाता है कि पाइथागोरस ने मिस्र की
यात्रा की थी। उपनिषदों (8-6th Cent. BC) ने पहले ही समसारा और कर्म की
अवधारणा को स्पष्ट कर दिया था। आजीविकों, जैनों और बौद्धों ने भी पुनर्जन्म
और जीवन चक्र से मुक्ति के विचार को सिखाया।
Asceticism (तपस्या):
भारतीय तपस्वी परंपराएँ Cynics जैसे यूनानी दार्शनिकों की कुछ प्रथाओं से
मिलती जुलती हैं। उनकी जीवनशैली अपरंपरागत थी और वे सामाजिक मानदंडों को
अस्वीकार करते थे। ये प्रथाएं दोनों देशों में समान रूप से साथ साथ चल रही
थीं।
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इस्लामिक मान्यताओं के करीब यूनानी दार्शनिक
Xenophanes of
Colophon (570-475 BC), एक यूनानी दार्शनिक ने ग्रीक पौराणिक कथाओं के
मानव रूपी (anthropomorphic) देवताओं को खारिज कर दिया और एक एकल, शाश्वत,
सर्वशक्तिमान और सर्वव्यापी देवता का प्रस्ताव रखा। ईश्वर की उनकी अवधारणा
अब्राहमिक ईश्वर या हिंदू ब्रह्म के समान है. उन्होंने इस बात पर जोर दिया
कि यह ईष्ट मनुष्यों या मानव के गुणों जैसा नहीं है, और वह शुद्ध विचार के
माध्यम से ब्रह्मांड को नियंत्रित करता है।
Xenophanes
(570–475 BCE) proposed a radical, non-anthropomorphic conception of the
divine, often described as a formless, single, supreme God. He was a
pioneer in criticizing the traditional Greek view of gods as human-like,
flawed, and multiple Gods.
Plotinus (204-270 AD) ने भी "The One' की अवधारणा पेश की, जो सभी अस्तित्व का एक अवर्णनीय और पारलौकिक स्रोत है। Cleanthes (330-230 BC), एक Stoic दार्शनिक, Zeus को
ultimate divine principle के रूप में मानते थे, लेकिन Zeus के बारे में
उनकी समझ ग्रीक पौराणिक कथाओं के मानवरूपी देवता से काफी अलग थी। Cleanthes
और अन्य Stoic के लिए, Zeus, "Logos" का प्रतीक था जो कि एक
universal, rational, divine शक्ति है जो ब्रह्मांड को नियंत्रित करे और
कायम करे रखती है। Cleanthes ने Zeus की प्रशंसा ब्रह्मांड के निर्माता,
पालनकर्ता, शासक (Generator, Operator, ruler) के रूप में करते हैं। वह
Zeus को सभी अस्तित्व के पीछे एक दिव्य शक्ति के रूप में वर्णित करता है।
उसके लिए, Zeus केवल कई देवताओं में से एक नहीं था, बल्कि ultimate divine
reality थी।
माना जाता है कि Hermes Trismegistus मिस्र में
Hellenistic काल (3rd cent. BC to 3rd cent. AD) में एक पौराणिक व्यक्ति
के रूप में उभरा था। Hermeticism एक all encompassing, सर्वव्यापी, दिव्य
स्रोत के अस्तित्व पर जोर देता है, जिसे "One, All, Nous" (divine mind) के
रूप में संदर्भित किया जाता है। Hermes ने इसे एक अकथनीय और सर्वव्यापी
प्राणी और सभी अस्तित्व के अंतिम स्रोत के रूप में वर्णित किया। ये दोनों
तरह से अंतर्निहित (हर चीज में मौजूद) और पारलौकिक या transcendent (मानव
समझ से परे) है।
Plato, Aristotle, Anaximander, Heraclitus, Anaxagoras, Epictetus, Stoics आदि जैसे कई यूनानी दार्शनिकों द्वारा भीअच्छाई, divine intelligence या Logos के एक universal divine principle का विचार जो ब्रह्मांड को नियंत्रित करता है, स्वीकार किया गया है.
Socrates को एक divine reality or moral force में विश्वास था जिसका अर्थ है एक divine moral order जो ब्रह्मांड को आदेश देती है लेकिन वह व्यक्तिगत ईश्वर नहीं है।
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फलसफ़ी को बहस के अंदर ख़ुदा मिलता नहीं, डोर को सुलझा रहा है और सिरा मिलता नहीं।
मुसलमानों के पास कुरान-इस्लाम नहीं होता तो वो भी गैर मुस्लिम फल्सफियों की तरह खुदा-कायनात-हक़ को समझने के लिए तीर-तुक्के मार रहे होते, कंट्रैडिक्शन और कंफुज़न का आलम होता, नतीजों (मंजिल) पर पहुँचने की बजाय, ज़िन्दगी भर गुमानों (रास्तों) पर टहल रहे होते. दीन/पैगमबर होते ही इसलिए हैं कि हर उस आम इंसान को आसान जुबान में हकीकत समझा दी जाये जो खुद नहीं जान सकता किसी से भी वजह से (जैसे वक़्त, अक़ल, ज़रायें की कमी. हालाँकि ये सब लगा कर भी हर कोई हक़ जान ही लेगा ये भी ज़रूरी नहीं है).
Philosophical sects in Islam
Mutazilah was a rational group founded by Wasil ibn Ata (8th Cent.) but earlier attached to Hzrt. Ali and became prominent around 10 Cent. in Iraq. He withdrew from Hasan al Basri over a theological disagreement. So Mutazilah means to withdrew or separate. They were influenced by Greek philosophy based around fundamental principles: Tawhid & Adl of God, human free will and creation of Quran. They believed that God cannot cause evil yet evil exists. Moral actions are either good or evil and humans should use their reason to work out which is which. Humans have total free will. The reward or punishment that God gives out can only be just if it is given to creatures who truly have free will. If someone commits evil, it's their choice and not fate or divine will. A grave sinner is not a believer nor a disbeliever but in a between state. Allah has no attributes. Early Mutazilites believed that hadith were susceptible and the matn of the hadith not just the isnad ought to be scrutinized for doctrine and clarity.
Asharism was Sunni school of theology founded by Abu al Hasan al Ashari (9-10th cent.) when he broke away from the Mutazilites after disagreements on different theological issues. Asharites gradually replaced Mutazilites. They believed that humans have some freedom of action and total freedom of thought but only God has the power to create actions. God may send a person to Hell or Heaven even though it seems unfair to human beings. Everything God does is fair but much of it is beyond human understanding. God may forgive the sins of the people in Hell. They believed in advent of Jesus and Dajjal.
Atharism was a Sunni school of theology that rejected rationalistic theology in favor of strict textualism in interpreting Quran and hadith. They believed that Zahir meaning of the Quran and the hadith are the sole authorities. They opposed the use of Tawil regarding the anthropomorphic descriptions and attributes of God based on philosophical principles and metaphorical interpretation. It emerged among hadith scholars who eventually merged into a movement called Ahl al Ḥadith by Ahmad ibn Hanbal (780–855). It is the school of theology used by Hanbalis.
Maturidism was a Sunni school of theology by Abu Mansur al Maturidi (9-10th cent.), contemporary to Asharism and Atharism in the Hanafi school of jurisprudence
Qadariyyah was a derogatory term designating early theologians who rejected predestination asserted that humans possess absolute free will. They reject the prior knowledge of God and deny that God wrote the decrees concerning His creation before He created heavens and earth. Some of their doctrines were adopted by the Mutazilis and rejected by the Asharis. Qadariyah were called the Magi of Ummah.
Zahirism is a Sunni school of jurisprudence named after Dawud al Zahiri (9th cent.), characterized by strict adherence to literalism and reliance on Zahir meaning of Quran & Hadith, Ijma of the first generation of Muhammad's closest companions for sharia and rejection of Qiyas and societal custom or knowledge (urf).
Jahmiyya, the followers of Jahm bin Safwan (d. 746) who advocated the denial or negation of God's divine attributes (taṭil)[2] and affirming God's transcendentness from limits, following late antique Neoplatonist currents.
Jabriyya was a group that believed that humans are controlled by predestination, without having choice or free will, forced or coerced by destiny means humans have no real choice.
Murjiah/Murjias (meaning postpone) were a sect that held the opinion that God alone has the right to judge whether or not a Muslim has become an apostate and that Muslims should practice postponement of judgment on committers of major sins and not make charges of disbelief (takfir) or punish accordingly anyone who has professed Islam to be their faith.
Ahlal-Ray meaning rationalists was a group advocating for the use of reason for theological decisions and scriptural interpretation in the second century of Islam alongwith its opponent Ahl al Hadith.
Anti-social Groups
Khawarij was a group of supporters of Hzrt. Ali which left him beacuse he agred to the artbiratiton with Hzrt. Muawaiyyah in the battle of Siffin (657 AD). Muwaiya, governor of Syria, demanding justice for the murder of Caliph Uthman who was his relative also and that the killers be punished before pledging allegiance to Ali. Ali maintained that justice must be carried out in order, and not before stabilizing the state. Kharijites were initially divided into 5 major branches: Ibadis (only surviving branch), Sufris, Azariqa, Najdat, Adjarites.
Muhakkima/Al-Haruriyya a group who rejected arbitration between Ali and Muawiya. They are also seen as an extension to Kharijites.
Batiniyyah was a Shia groups that distinguish between an outer, exoteric (zahir) and an inner, esoteric (batin) meaning in Islamic scriptures.
Ibadism is a moderate subsect whose roots go back to the Kharijite that has persisted and led to the creation of Ibadi communities.
The 3 main branches of Shiaism
Ithna Ashariyya is the largest branch of Shia comprising about 85%. They believe in 12 Imams and that their last Imam, Mahdi lives in Ghayba and will reappear with Isaa.
Ismailiyya get their name from their acceptance of Imam Ismail ibn Jafar as the appointed Imam to Jafar al Sadiq wherein they differ from the Twelver Shia who accept Musa al Kazim, the younger brother of Ismail as the true Imam. It later split into Nizari and Mustali and the Mustali further divided into Ḥafizi and Tayyibi. Tayyibi Ismailis, also known as Bohras, are split between Dawudi Bohras, Sulaymani Bohras, and Alavi Bohras.
Zaydiyya refers to as Fiver Shiism that emerged in the 8th cent. following Zayd ibn Ali's unsuccessful rebellion against the Umayyad Caliphate.
The 4 main Hind Sufi orders
Chishtiya is a Sunni Sufi order of Sunni Islam named after the town of Chisht, Afghanistan where it was initiated by Abu Ishaq Shami. The order was brought to Herat and later spread across South Asia by Muinudin Chishti (12th Cent.) in the city of Ajmer.
Naqshbandi is a Sunni Sufi order within Sunni Islam, named after its founder Bahaal Din Naqshband (14th cent).
Suhrawardi is a Sunni Sufi order founded by Abul Nadjib Suhrawardi (d.1168) and was inspired by Junayd of Baghdad (d. 910), a Persian mystic scholar from Baghdad. It eventually divided into various branches.
Qadiriyya/Qadiri is a Sunni Sufi order founded by Abdul Qadir Gilani (11th Cent.) who was a Hanbali scholar from Gilan, Iran.
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