Wednesday, 4 June 2025

कुरान में मिस्र के हाकिम, इब्राहीम के नाम, सहिफे, मिल्लत व उनक हनीफ, उम्मत होना

 

कुरान में ह. युसूफ के वक़्त को हाकिम को मलिक और ह. मुसा के वक़्त के हाकीम को फिरोन कहना.

कुरान में ह. युसूफ के वक़्त के हाकिम को मलिक और ह. मुसा के वक़्त के हाकीम को फिरोन लिखा गया है क्योंकि फिरोन लफ्ज़ बाद में इस्तेमाल में आया था. 

कुरान ह. यूसुफ के काल (17वीं Cent. BC) के शासकों के लिए राजा (कुरान 12:43 में मलिक) और ह. मूसा के काल (13वीं Cent. BC) के दौरान फैरोह (कुरान 28:4, 20:24 में फिरौन) शब्द का प्रयोग करता है। यह इस बात का संकेत है कि फिरौन शब्द ह. यूसुफ के समय में शासकों के लिए प्रचलित नहीं था, ये शब्द तो बाद में ह. मूसा के समय में प्रचलित हुआ। आज, हम जानते हैं कि सबसे पहला, फिरौन (मतलब Great House) प्राचीन मिस्र के पहले राजवंश के Narmer उर्फ़ Menes (31st Cent. BC) माना जाता है। लेकिन इस शब्द को 18वें राजवंश (15th Cent. BC) तक एक शाही उपाधि के रूप में इस्तेमाल नहीं किया जा रहा था, उससे पहले शासकों को Kings or Lords of the two lands ही कहा जाता था। सातवीं शताब्दी में जब कुरान अवतरित हुआ, तब अरब में यह मिस्र के  बारे में इतना बारीक ज्ञान ज्ञात नहीं हो सकता था, ये तो हमें आज मालूम पड़ता है। ये कुरान का मोजज़ा है. नबी को ये ज्ञान कोई इंसान नहीं दे सकता था.


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कुरान में ह. इब्राहिम का नाम लिखने के लिए दो तरह की स्पेलींग का इस्तेमाल 

 
कुरान में ह. इब्राहिम का नाम लिखने के लिए दो तरह की स्पेलींग का इस्तेमाल हुआ है. 


कुरान में सभी जगह इब्राहीम (إِبْرَٰهَـم) को ''या'' के साथ लिखा गया है सिवाए सूरह बकरह के. पूरी सूरह बकरह में इब्राहीम (إِبْرَاهِيم) नाम का इस्तेमाल अरबी ''या (ي)'' के बिना किया गया है. इसलिए यंहा सवाल उठता है कि सिर्फ सूरह बकरह में ही ऐसा क्यों लिखा गया है? 

ह. इब्राहीम नाम का उल्लेख 25 सूरह की 57 आयतों में 69 बार किया गया है। सूरह बकरह में इसका उल्लेख 15 बार किया गया है। 

इसका पहला कारण यह बताया जाता है कि यह उच्चारण या अर्थ को प्रभावित नहीं करती है और यह भिन्नता उसमानी मुसहफ में एक अनोखी वर्तनी विशेषता है।  मगर ह. उस्मान ने कुरान खुद नया नहीं लिखावाया था बल्कि कुरान की वैसे ही कापियां बनवाई जैसे नबी लिखवा कर गए थे.  नबी के बाद जो मुसहफ में बदलाव में किये गए जैसे ज़ेर ज़बर पेश ( diacritic marks) लगाना, सात मंजिलें, तीस पारों में तकसीम ये सब तारीख से मालूम चल जाता है, कब क्यों कैसे किया गया मगर इस लिखावट के बारे में कुछ ठोस नहीं मिल रहा है.  इसलिए कुछ लोग कहते हैं कि चूँकि कातिब पैगंबर के निर्देशों के अनुसार कुरान लिखते थे, उनमें से, जिन्होंने सूरह बकराह लिखा था, वे इब्राहिम नाम लिखने की इस शैली को जानते थे और इसलिए उन्होंने इसे ऐसे लिखा। यकीनन ये नबी ने ही यूँ लिखवाया था मगर सवाल अब भी बाकी है कि क्यों? कुरान की लिखावट भी अल्लाह की तरफ से है या नबी की तरफ से?

इसका दूसरा कारण यह भी बताया जाता है कि यह स्टैण्डर्ड सामान्यता मान्यता प्राप्त है, जो हिब्रू नाम Avraham को दर्शाता है। यह उनके नाम का प्राचीन अरामाइक रूप भी है। इसीलिए उनका नाम सूरह बकराह (मदनी और सबसे लंबी सुरत) में इस तरह लिखा गया है क्योंकि यह तब की बात है जब पैगंबर मुहम्मद मदीना चले गए (622-624 ई.) और जब उनका वहाँ यहूदियों और मुनाफिकों से वास्ता पड़ा। यहूदी इस तरह से इब्राहिम का नाम लिखने के आदी थे और वो इन वर्तनी को ज्यादा पहचाने थे। हालाँकि, इस दृष्टिकोण के विरुद्ध यह कहा जाता है कि कुछ सूरह मदीना में यहूदियों और अन्य लोगों को संबोधित करने वाली ऐसी भी नाजिल हुई थी जिनमें पैगंबर इब्राहिम का नाम ''या'' के साथ भी लिखा गया है।

इसके लिए तीसरा कारण यह दिया जाता है कि उनका नाम इस तरह से लिखा गया है क्योंकि बाइबिल के स्रोतों के अनुसार वे अपने जीवन और प्रवास यात्रा के दौरान अक्सर अपना नाम और पहचान बदलते रहते थे। यहूदी परंपरा में उनके नाम परिवर्तन का उल्लेख है (Abram से Abraham), जो उनका कौमी पिता बनने का प्रतीक है। लेकिन कुरान में ऐसा कोई उल्लेख नहीं है, हालाँकि इस्लामी इतिहास में उनके परिवर्तन के बारे में भी बताया गया है। हम जानते हैं कि इब्राहिम ने अपने जीवन में मूर्तिपूजा से एकेश्वरवाद और इराक से फिलिस्तीन, मिस्र और मक्का तक आध्यात्मिक और भौगोलिक बदलाव देखें हैं। हालाँकि, इस दृष्टिकोण के विरुद्ध यह कहा जाता है कि उनकी ज़िन्दगी के बदलाव कुरान में बहुत सी सुरह में दर्ज है, न कि सिर्फ  सूरह बकरह में. 

इसके पीछे एक और कारण दिया जाता है कि यह कुरान की stylistic and phonetic शैली है, जो संभवतः प्राचीन या दीगर उच्चारणों को दर्शाती है। ये कुरान के numerical and rhythmic balance का हिस्सा है इसलिए ऐसा लिखा गया है. 

अल्लाहु आलम 

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Zabur (meaning Scripture primarily as per Quran but also means Pslams and/or the Book given to Prophet David)
Suhufe Ula [also used in place of Zabur Awwalen but] of Abraham and Moses

 

● Quran 26:196: It has indeed been foretold in the Scriptures of those before (Zubure- Scriptures & Awalin- earliest, first, former, previous, ancient).


Quran 21:105: We have already written in the Zabur (Scripture) after the Reminder (mention) that the earth will be inherited by My righteous servants.

Quran 4:163, 17:55: We gave the Zabur (Psalms/Scripture) to David.

Quran 87:18-19: This is certainly mentioned in the former Scriptures (Suhufe Ula scrolls  of earliest, first, former)- the Scriptures (Suhufe) of Abraham and Moses.

Quran 53:36–37: Or has he not been informed of what is in the Scripture of Moses and Abraham (Suhufi Musa wa Ibrahima).



● Quran 6:25: They say, These are tales of the former peoples which he has written down (Asatiru Awalina).

Quran 8:31: This Quran is nothing but tales of the former peoples (Asatiru Awalina).

Quran 16:24: When it is said to them, What has your Lord revealed? They say, tales of the former peoples (Asatiru Awalina).

 

● Quran 22:78: उसने तुम्हारे बाप इबराहीम के दीन को तुम्हारे लिए पसन्द किया। उसने इससे पहले तुम्हारा नाम मुस्लिम रखा था.
Quran 3:67: इबराहीम न यहूदी था और न ईसाई, बल्कि वह तो हनीफ था। वह मुशरिकों में से न था। 
Quran 16:120: निश्चय ही इबराहीम एक उम्मत था.
Quran 2:135, 3:95, 16:123: मिललते इबराहीम (तरीके) का अनुसरण करो, जो हनीफ था और मुशरिकों न था।


● चंद लोग साबीन को कुरान में आये Hanif (pl. Hunafa) समूह से भी जोड़ते हैं. हनीफ इस्लाम से पहले के अरबियों को संदर्भित करता है जो अब्राहमिक एकेश्वरवादी थे, यहूदी धर्म या ईसाई धर्म से जुड़े नहीं थे या जिन्होंने इस्लाम से पहले यहूदी धर्म या ईसाई धर्म को अस्वीकार कर रखा था. इनमें अब्राहम के बाद के सभी पैगम्बर, असहाबे कहफ़, कई एकेश्वरवादी अरबी कवि (जैसे Zayd ibn Amr, Quss Ibn Saida al Iyadi, Umayyah ibn Abi as Salt), मुहम्मद सल्ल. और मक्कावासियों के बाज़ पूर्वज-रिशेदार (जैसे Ilyas ibn Mudar, Khaled bin Sinan) और अन्य नाम (जैसे Uthman ibn al-Huwayrith, Ubayd Allah ibn Jahsh - ये इस्लाम छोडके इसाई हो गए थे) (वरकाह इब्न नौफ, Bahira - हालाँकि इन्हें इसाई भी माना जाता है) शामिल करे जाते हैं। इनमें से कई नाम इब्ने इसहाक जैसे इतिहासकार लिखके गए हैं. इनके नामों- धर्मों पर मुस्लिम-गैर मुस्लिम विद्वानों में मतभेद है.

 

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Matching of Prophets, Communities, Books names 

Muhammad, Isa, Musa, Ibrahim, Nooh (Names of Prophets mentioned together in Quran)

Muslim, Nasara, Yahud, Majus, Sabeen (Names of Communities mentioned together in Quran)

Quran, Torah, Injil, Suhuf Ibrahim, Zubure Awalin, Zabur (Names of Divine Books mentioned together in Quran) {Suhuf of Moses is also mentioned in the Quran but his book's specific name is also mentioned there as Torah)

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