Wednesday, 4 June 2025

कुछ इस्लाम संबंधित मुद्दों, गलतफहमियों पर वज़ाहत

 


कुरबानी तक नाखून, बाल नहीं कटवाना.
सुन्नत नमाज़ के लिए फ़र्ज़ जमात छोड़ना

क़िबला रुख बाज़ काम करना 
खड़े हो कर पेशाब करना।  
नमाज़ी के आगे से गुजरना। 
क्या रमजान में शैतान वाकई कैद हो जाता है।
जिन्नात, असरात।
झाड़, फूंक, तावीज़, गंडे, रुक्या
नबीयों की इश्तेहादि गलती. 
ऊपर वाले ने बचा लिया या मार दिया, कहना. 

बीवी की इजाजत के बिना दूसरा निकाह 

जेहरी और सिर्री नमाज़ होने के पीछे कारण

क्या नमाज़ में नबी पर सलाम कहना गैरुल्लाह को पुकारना है

कोई बिजनिस डील मज़बूरी में तोड़ने का गुनाह

ऑफ़ सीज़न में माल खरीदकर पीक सीजन में ऊँचे दामों पर बेचना

इन्सान के वजूद का हिस्सा हैं अखलाकियात 

क्या कर्ज़दार का जनाज़ा पढ़ाना मना है?  

दरगाह पर अशोक एम्ब्लेम वाले सरकारी बोर्ड का विरोध 

Masturbation 

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कुरबानी तक नाखून, बाल नहीं कटवाना.

यह रसूल का उसवाए हसना है। यानी दीन के अमल को आपने जिस खूबरसूरती से अंजाम दिया, उसे नबी का बेहतरीन नमूना कहा जाता है। जैसे गैर हाजी क़ुरबानी करने वाला जिस्मानी तौर पर क्या क्या करे या क्या न करे, ये नबी ने बताया। कुरबानी करने वाले शख्स के बाल, नाखून न कटवाने के पीछे दिए हुकुम के पीछे हिकमत है ताकि वो भी अपने मुकामों पर रहते हुए हज की मनोस्तिथि महसूस कर पाए। इसलिए ये हुकुम हज और उमराह करने वालों पर लाज़मी है पर बाकियों  पर मुस्तहब है। हालाँकि कोई गैर हाजी इसे नहीं करता तो भी उसकी कुरबानी कुबूल हो जाएगी.  खैर, जो इस तरीके से आपके उसवा पर अमल करेगा, उसे इसका अजर मिलेगा।  जो किसी भी वजह से नहीं करेगा (नबी की मुखालफत की नीयत नहीं रखनी बस क्योंकि यह कुफ्र है, बाकी कोई भी वजह से इंसान नहीं करना चाहता या नहीं कर पाता तो वो सब जायज़ है), उसकी कोई पकड़ नहीं होगी।

 

सुन्नत नमाज़ के लिए फ़र्ज़ जमात छोड़ना

पाँच नमाज़ों में कोई भी नमाज़ ऐसी नही है जो सुन्नत/ नफिल छोड़ने पर नहीं पढ़ी जा सकती। यंहा तक कि वित्र के बगैर भी ईशा पढ़ी जा सकती है। वित्र भी एक सुन्नत/ नफिल नमाज़ है. अल्लाह ने सिर्फ फ़र्ज़ नमाज़े ही लाज़मी करी है. सुन्नत/ नफिल छोड़ने का कोई गुनाह नहीं है,  हालाँकि पढेंगे तो अजर और फायदे हैं.  इसलिए जब जमात खड़ी हो जाये उसके बाद अपनी कोई सुन्नत/ नफिल पढ़ना सही नहीं है। बल्कि कोई पढ़ भी रहा हो और जमात खड़ी हो जाये तो अपनी नमाज़ बीच में ही तोड़ कर जमात में शामिल हो जाये या (कम से कम यही करे कि) अपनी नमाज़ जल्द से जल्द खत्म करके जमात में शामिल हो जाये।  फज्र में अगर वक़्त निकलने वाला है तो सिर्फ फज्र की फ़र्ज़ पढ़ें,  जब सूरज निकल जाए तब आप चाहें तो फर्ज की सुन्नत पढ़ सकते हैं। हालांकि अगर आप फज्र की सुन्नत नहीं पढ़ पाए और जमात के साथ आपने फज्र के फ़र्ज़ पढ़ लिए हैं तो जमात के बाद भी आप इन सुन्नतों को अदा कर सकते हैं, इसमें कोई गुनाह नहीं है क्योंकि सूरज निकलने में अभी वक्त बाकी है। यह भी साबित है, हालांकि यह तरीका आम नहीं है। इसे मस्जिद में पढ़ने पर लोग खमख्वा भोंवे चढ़ाएंगे इसलीए घर जाकर भी सुन्नत वक्त निकलने से पहले पढ़ सकते हैं। सुन्नतें या नफिल घर (मस्जिदों में भी) में उसी तरतीब से पढ़ें जैसे रसूल पढ़ते थे या जैसा बता कर गए हैं, यही बेहतर है। मगर इस तरतीब में  किसी वजह से बदलाव कर लें तो भी कोई गुनाह की बात नहीं है। वजूहात के चलते, सुन्नत नफिल आगे पीछे करने में कोई गुनाह की बात नहीं है। 

 

क्या किब्ला रुख हो कर पीठ, शोच, पीठ, पाँव करना, थूकना, टॉयलेट बनवाना नाजायज़ है?

नबी ने किबले की ओर थूकना, पीठ करना और किब्ला की ओर शोच करने से मना किया था. इसीलिए कम इल्म वाले उलेमा आमतौर इन अमल को और क़िबला रुख मुंह या पीठ करके शोच या टाइलेट बनावाने को हराम बताते हैं।  मगर बहुत से बड़े उलेमा किबले की ओर पीठ या रुख करके हाजत पूरी करने को जायज़ कहते हैं, बशर्ते यह काम बंद दीवारों में हो या काबा और इन्सान के बीच में कोई आड़ हो। क्योंकि कुछ हदीसों से पता लगता है कि नबी एक बार किबला रुख हो कर और एक बार क़िबला रुख पीठ करके फारिग हुए थे। उलेमा का मानना है ये तब हुआ होगा जब उनके और काबा के बीच  कोई आड़ थी या आप किसी इमारत के अंदर थे। इसलिए जब आड़ बीच में हो, या काबा से दूर इलाकों में ऐसा करने में कोई हर्ज नहीं है। हालांकि ज्यादातर उलेमा खुले आसमान के नीचे, किबले की ओर रुख करके शोच करने से मना करते हैं, चाहे दोनों में कितना भी फासला हो। दरअसल निष्पक्ष उलेमा के मद्देनज़र यह भी जायज़ है, बस क़ाबा आप की निगाह की हद में नहीं होना चाहिए। असल में अरबवासियों के दरमियान काबा के एहतराम, पाकीज़गी को बनाये रखने के ऐतबार से किबला रुख करके ऐसे अमल करने से मना किया गया था जो कि प्रतीकात्मक रूप से अल्लाह का घर है. हदीसों का जायज़ा लेने से मालूम पड़ता है कि किबले की ओर थूकना जो मना किया जाता है वो भी दरअसल नमाज़ के दौरान थूकने का मना किया गया है, न आम वक़्त के दौरान क्योंकि नमाज़ में खुदा से बात हो रही होती है, उसके सामने खड़े हुए होते हैं. शैख़ आसिम अल हकीम का भी यही मौकिफ है. किबले की ओर पाँव करने की तो कोई भी मुमानियत नहीं है क्योंकि ऐसा किसी हदीस में नहीं है. 

बाकी किबला की ओर थूकना, पाँव, पीठ, शोच करने या टॉयलट बनवाने की इजाज़त अगर किसी का दिल नहीं देता तो यह बहुत अच्छी और अदब की बात है मगर यह तमाम मुसलमानों पर लाज़मी हुकुम नहीं है. 

इसी तरह कुरान की ओर पाँव करना भी मना किया जाता है. असल में जब कुरान किसी ऊपरी जगह रखा है तब तो यह बिलकुल जायज़ है पर अगर यह नीचे रखा हुआ है तो भी इसकी इजाज़त है जब बीच में कोई आड़ हो या दोनों इतने करीब न हो कि वाकई यह एक बेअदबी वाली बात हो या इरादतन हो. 

 


खड़े हो कर पिशाब करना क्या जायज़ है?

हज़रत आयेशा ने फ़रमाया है कि उन्होंने कभी नबी को खड़े हुए पिशाब करते हुए नहीं देखा और जिसने ऐसा कहा वो झूठा है. मगर हमें ऐसी कई सहीह हदीसें मिलती हैं जिनमें सहाबा ने फरमाया कि उन्होंने नबी को खड़े होकर पेशाब करते देखा था जैसे बुखारी 224, 226, 2471, माजह 306 वगैरह. 

जब हम इन दोनों तरह की हदीसों को मिलाकर देखते हैं तो यही समझ में आता है कि नबी आम तौर पर या घर में बैठ कर ही पिशाब करते थे (ह. आयेशा ने घर की बुनियाद पर ही ऐसी बात कही होगी). मगर कभी कभी आपने खड़े हो कर भी पिशाब किया या जब ऐसी जगह बाहर जंहा बैठ के पिशाब करना उचित नही हो (सहाबा ने ऐसी ही किसी जगह आपको पिशाब करते देखा होगा). 

इसलिए खड़े हो कर भी पिशाब किया जा सकता है. हमेशा भी किया जा सकता है. बस पाकी का ख्याल रखना है. हालांकि बैठ कर करना बेहतर है.


नमाज़ में किसी के आगे से गुज़रना।

इस्लाम में इबादतों में नमाज़ की अहमियत सबसे ज़्यादा है क्योंकि यह अपने हक़ीक़ी मालिक से जोड़ कर रखती है। इसलिए इसमें तवज्जो टूटने का मतलब है ,रब से ही राब्ता टूटना। यही वजह है कि सजदे की जगह की हद में से किसी का निकलना सख्त मना किया गया है। यह वैसा ही जैसे दो लोगों की जारी बातचीत में ज़बरदस्ती बीच में घुस जाना।

इस्लामी साहित्य से पता लगता है कि पहले की क़ौमों ने नमाज़ को प्रैक्टिकली वो तवज्जो या अहमियत नहीं दे रखी थी जो देनी चाहिए थी जो उनके ज़वाल की एक वजह थी।

इसी तरह की नबी के वक़्त में मुसलमानों के दरम्यान मुनाफिकों ने भी नमाज़ को दिखावटी अहमियत दे रखी थी, जो क़ुरान से भी मालूम पड़ता है। इसके अलावा इस्लाम में बद्दु अरबी लोग भी शामिल हो रहे थे मिजाज़न गंवार, ठेठ किस्म के थे। इसके साथ ही नए और आम मुसलमानों में भी नमाज़ जैसी पाकीज़ा और उपयोगी चीज़ को सीखने सीखाने का दौर जारी था। यानी अल्लाह से राब्ते को गंभीरता से लेने का (हल्के में न लेने का) अमल चल रहा था।

इन सबके मद्देनज़र ऐसा अंदाज़ा होता है कि शायद नमाज़ पढ़ने वाले और आस पास मौजूद लोगों, दोनों को नमाज़ की एकाग्रता का हर हाल में ख़्याल रखने के लिए, नबी ऐसा हकूम दिया कि सामने से गुजरने वाले अगर बाज़ न आये तो उन्हें ताक़त या ज़बरदस्ती से रोकने की कोशिश करो ताकि लोगों को यह बात समझ आए और आदत पड़ जाए, भले ही इससे आपकी नमाज़ में खलल पैदा हो जाय जो की उसके गुजरने पर पैदा होना ही था। ज़ाहिर है यह एक हिदायत है, न कि कानून, जिसको ठीक लगे वो ये कर सकता था। किसी के गुजरने पर जिनकी नमाज़ों में खलल पैदा नहीं होता, उनके लिए ये ज़रूरी मालूम नहीं पड़ता कि बनी बनाई एकाग्रता को जानभुझ कर तोड़ कर गुजरने वालों से जिस्मानी ज़ोर ज़बरदस्ती करी जाए।

बहुत पहले मैंने शायद कंहीं पढ़ा या सुना था कि अहले किताब अपनी इबादतों में इतना कैजुअली रखते थे कि उसे बार बार किसी काम के लिए तोड़ना या बीच मे छोड़ना मामूली बात समझते थे (मेरे लिए इसका सबूत देना मुश्किल है और इसकी सच्चाई साबित करना भी)। शायद ये हकूम इस वजह से भी था कि मुसलमान अपनी इबादतों का स्तर उनकी तरह न गिरा लें। हालांकि मुसलमानों को नमाज़ बीच में छोड़ कर किसी छोटे मोटे ज़रूरी काम को फौरन खत्म करके वापिस नमाज़ वंही से जॉइन करने की इजाज़त है जैसे बच्चे को गिरने से बचाना वगैरह। इसके अलावा इमरजेंसी हालतों में नमाज़ तोड़ी भी जा सकती है जैसे किसी को हार्ट अटैक आना। ऐसा करने में कोई गुनाह नहीं है।
 


क्या रमजान में शैतान वाकई कैद हो जाता है?


हदीसों में ऐसा लिखा है कि सरकश शैतान रमज़ान में कैद कर लिए जाते हैं। मगर इंसानी तजुर्बा हमेशा इसके उलट निशानियां देता है। ऐसी टकराव की स्तिथि में हदीसों को क़ुरान और अक़्ल की रोशनी में तशरीह की जाती है। इसीलिए उलेमा की अक्सरियत ने यही माना है कि शैतान कैद नहीं होता है । शैतान तो जिन्न और इंसान दोनो में होते हैं। मगर यक़ीनन रोज़ेदारों, परहेज़गारों के लिए रमज़ान में उस तरह से बुराई (शैतानियत या शैतान) अपनी और नहीं खींचती है जैसी आम दिनों में। उसके वजह है कि जब कोई मुस्लिम रोज़े रखता है, इबदातों, अज़कार, नेकियों में बढ़ोतरी कर देता, उसका माहौल रमज़ान के नेमतों से रंग जाता है, पूरा माहिना यही कुछ हो रहा होता है तो ऐसे में उसकी नफ़्स उसे बुराई की तरह ले कर जाने में पस्त हो जाती है। बड़ी बुराइयों की ओर से जिस्म में ताक़त और ज़ेहन में रग़बत कम हो जाती है। ये सब असरात उनके लिए काम करते हैं जो वाकई अल्लाह की ओर इस महीने में रुजू करते हैं।


जिन्न के असरात या दिमागी बीमारी?

कभी कभी जानभुझकर भी लोग खुद को ऐसी बीमारी का मरीज दिखाते हैं, जिसके पीछे उनकी अपनी वजह होती हैं। सबसे पहले इसकी सच्चाई जानने की कोशिश करी जाए कि क्या ऐसा कुछ तो नहीं है। ज़्यादातर तो ऐसे केसेस में मेडिकल और साइकोलॉजिकल प्रॉब्लम ही होती हैं। मैंने खुद देखा है लोगों को ऊपरी असर बताते हुए और जब इलाज करवाया तो पता लगा कि बॉडी में कोई केमिकल डेफिशिएंसी थी बस जो बाद में दवाइयों से ठीक हो गयी। इसलिए फिर मरीज मेडिकल इलाज करवाया जाए। जिन्न, असरात, जादू वाकई होता है मगर इसको करने वाले और उतारने वाले सच्चे लोग आज कल बहुत ही कम मिलते हैं। हो सकता है इस केस में भी ऐसा कुछ हो, इसलिए इस इल्म के किसी माहिर और नेक इंसान से मिल कर इलाज करवा सकते हैं। हर किसी के पास नहीं जाया जाए। पाक के एक बड़े आलिम है इस सब्जेक्ट के Shaikh Muhammad Iqbal Salfi, उनके वीडियोज़ से इस बारे रहनुमाई मिल सकती है।

अक्सर कुछ लोगों को नींद में महसूस होता है कि कोई उनके सीने पर बैठ गया है, साँस नहीं आ रही है, हिला डुला नहीं जा रहा ह वगैरह वगैरह. इसके पीछे sleep paralysis बीमारी, ख्वाब के साईकोलोजिकल इफेक्ट, जिन्नात का हमला जैसे कारण बताए जाते हैं. ऐसे में मेडिकल/साईकोलोजिकल ट्रीटमेंट के अलावा अज्कार किये जाए जैसे अयातुल कुर्सी पढना वगैरह (बहुत से उलेमा की इस पर हिदायतें मौजूद हैं, देख लीजिये) और रुक्या भी कर सकते हैं. आम तौर पर जिन्न इन्सान से बढ़कर नहीं होते हैं.

 

झाड़, फूंक, तावीज़, गंडे, रुक्या

तावीज़, गंडेवग़ैरा नफ़्सियाती उलूम का हिसा है। ये नफ़्सियाति इलाज़ करते हैं। इस्लाम के मुताबिक इंसान दो चीज़ों का मिश्रण है, जिस्म और नफ़्स। नफ़्सियाति इलाज़ करवाने में कोई हर्ज नहीं। नफ़्सियाती इलाज़ क़दीम ज़माने से चला आ रहा है। इसमे मुस्लिम, गैर मुस्लिम दोनों को विशेषज्ञता हो सकती है। इस इल्म का इस्लाम का कोई ताल्लुक नहीं है.  हमें बस यहीं ख्याल रखना है कि इसमे किसी भी तरह का शिर्क या इस्लामी मुमानियत शमिल नहीं होना चाहिए। साथ ही ये भी कि इसे करना वाला इंसान धोखेबाज़ ना हो क्योंकि आज कल लोग इसमे ज़्यादा धोखा देते हैं। 

झाड़-फूंक की ही एक किस्म तावीज़, गनडे वग़ैरग हैं। ये सब इलाज बुरी नज़र, जादू, असरात, जिन्नात, नफसी/रूहानी बीमारी या बाज़ वक़्त जिस्मानी तकलीफ को भी दूर करने के लिए किया जाता रहा है, नबी के पहले से ही। क्योंकि नबी के पहले अल्लाह का कलाम मौजूद नहीं था, इसलिए गैरुल्लाह के नाम पर, बुतों से, गैर इस्लामी जुमलों वगैरह के ज़रिए किया जा रहा था। इसलिए हमें ऐसी हदीसे मिलती हैं जंहा नबी ने तावीज़, गंडो को हराम कहा क्योंकि हर जगह ये शिरकीया, कुफ़्रिया अंदाज़ में हो रहा था। एक बुखारी हदीस (3886) का मफ़हूम है कि नबी इसकी इजाजत दी अगर इसमें कोई गैर इस्लामी बात नही है तो। यानी इस तरह के इलाज जायज़ है इस शर्त के साथ। यानी इन्हें आजमाया जा सकता है अगर मॉडर्न इलाज से फायदा नहीं हो रहा हो तो। मगर ऐसे इलाज साबित होने के बाद ही करना बेहतर है। क्योंकि ज़्यादातर आजकल ठग हैं लोग। इस्लाम के बाद लोगों ने ऐसे तादाबीरों में क़ुरान की आयतों का इस्तेमाल शुरू किया तो ये रुकयाह कहलाने लगा।  क्योंकि नबी का तरीका था कि वो अव्वल तो अपने दौर में मौजूदा सही इलाज करते थे और साथ साथ क़ुरानी आयतें पढ़कर, दुआएं मांगकर, हाथों में फूंक मार कर, जिस्म पर रगड़कर, ऐसे मर्ज़ों से खुद की हिफाज़त करते थे।

 नबीयों की इश्तेहादि गलती

नबी मासूम से मतलब है कि जानभुझकर कोई गुनाह करने की गलती नही होगी। इश्तेहादि गलती यानी फैसले की गलती हो सकती है, कोई फैसला गलत हो सकता है मगर अल्लाह पहले ही रोक देता है या बाद में तम्बी कर देता है कि आइंदा न करना। यानी खूब सोच समझ कर कोई फैसला लिया जो गलत साबित हुआ या हो सकता था। 


जब कोई एक्सीडेंट में बच जाता है तो लोग कहते हैं कि उपरवाले ने बचा लिया मगर जब कोई मर जाता है तब कोई नहीं कहता कि उसने मार दिया, क्यों?

पहले मामले में हम अल्लाह का शुक्रिया अदा करते हैं और नेकी कमा लेते हैं। दूसरे मामले में लोग सब्र करते हैं क्योंकि हर कोई सब कुछ जानता है। जीना, मरना और बचाना, सब कुछ उसके हाथ में है। वह सब कुछ कर रहा है या होने दे रहा है। अलग-अलग स्थितियों में बोलने का तरीका और नज़रिया अलग-अलग हो जाता है। चाहे कोई कहे,  कि अल्लाह ने मारा दिया या अल्लाह ने वापस बुला लिया, दोनों का मतलब एक ही है, बस कहने का फ़र्क है।

 

बीवी को बताये बिना या उसकी इजाजत के बिना दूसरा निकाह

पहली बीवी की इज़्ज़त नहीं होने की वजह से दूसरे निकाह की पवित्रता पर कोई फ़र्क नहीं पड़ेगा और वो निकाह जयाज़ ही मानेगा और ऐसे निकाह से निकलने वाले हर तरह के रिश्ते भी जयाज़ ही होंगे। मगर बाज़ मामलों के बिना पहली बीवी की इजाज़त के दूसरा निकाह करना गुनाह का सबब ज़रूर बन सकता है। क्योंकि दूसरी शादी क्यों की जा रही है, इस फैसले के पीछे क्या हालात क्या वजुहात हैं, ये बहुत अहम चीजें होती हैं। ये वजह जायज और नाजायज दोनों हो सकती है। इसलिए ये मामले अलग-अलग व्यक्ति के हिसाब से अलग-अलग होते हैं। इस मामले का फैसला या अल्लाह के यहां उसका बदला, इसकी योग्यता पर होगा। हर मर्द और औरत को इसका ख्याल रखना चाहिए। हमारे माशरे में अक्सर पहली बीवी की इजाज़त लेना तो दूर पर, दूसरी शादी के बारे में उसे बताया तक भी नहीं जाता। अगर ना बताने के पीछे भी जायज़ वजुहांत ना हो तो ये अमल एक धोखेबाज़ी (गुनहा का सबब) होगा, हलांकी निकाह फिर भी जायज़ रहेगा। कभी-कभी ऐसे हालात आ जाते हैं इंसान की जिंदगी में जब पहली बीवी को बताना मुमकिन या मुनासिब नहीं होता। पुराने दौर में ऐसी स्थितियाँ ज्यादा आम थीं (ये स्थितियाँ क्या हैं, इन पर कभी और बात की जा सकती है)। मगर आज के दौर में और आज मुस्लिम समाज में बहुविवाह के मामले देखते हुए, मुसलमानों को दूसरी शादियां यूँही केज़ुअली नहीं करनी चाहिए और इन्हें सरल निर्णय बनाना चाहिए कि लोग इसकी और नरमी का रुख करें और इसे अंजाम देने में खास गौरो फिक्र ना करें। 

 

जेहरी और सिर्री नमाज़ होने के पीछे कारण

जेहरी और सिर्री नमाज़ होने के पीछे कारण ये है कि रात की खामोशी में तेज पढ़ने पर ही आवाज सबको अच्छी तरह सुनाई देगी, दिन के शोर शराबे में कितना भी तेज पढ़ो, सबको सुनाई नहीं दे पाएगा। जेहरी और सिर्री तरीका सुन्नत से जारी है।
 

क्या नमाज़ में नबी पर सलाम कहना गैरुल्लाह को पुकारना है?

क़ुरान में खुद कई पैगम्बरों पर सलामती भेजी गई है, यंहा तक कि बाज़ पैगम्बरों के पैदा होने वाले दिन पर भी (इसी के मुताबिक जन्मदिन मनाने में कोई हर्ज़ नहीं है)। नमाज़ में हमारे नबी पर सलामती भेजना ज़रूरी हिस्सा है। सलामती भेजने की दुआ करने का मलतब किसी की इबादत करना नहीं होता। 

 

कोई बिजनिस डील मज़बूरी में तोड़ने का गुनाह

इसका सच तो वो इंसान ही सही जानता है कि वाकाई ऐसा कुछ हुआ था कि समझौता तोड़ना मजबूरी हो गया। सच्ची से अपने पार्टनर को बात बतानी चाहिए। पार्टनर को भी इसकी सच्ची और झूठ को जान कर फैसला लेने का हक है। ऐसे में दोनों से जो भी ज्यादा कर रहा है अल्लाह ही उस पर आखिरी फैसला लेगा। 

 

ऑफ़ सीज़न में माल खरीदकर पीक सीजन में ऊँचे दामों पर बेचना

मुनासिब रेट से ज्यादा पैसा लेना जायज़ नहीं है। धोखेबाज़ी है. नेक्सस बना कर या जमाखोरी से कृत्रिम कमी बना कर व्यापार करना भी वैसा ही है। बिल्डर्स, डीलर्स भी यही करते हैं। किसी चीज को ऑफ सीजन या शुरुआती चरण में सस्ती कीमत के लेना और फिर सही वक्त आने पर बेच देना जायज़ है। ये आपके जल्दी निवेश किये जायेंगे पैसे पर ग्रोथ है। जो बाद में खरीदेगा, जाहिर है उसने उस चीज़ में पैसे पहले नहीं निवेश या फंसा कर नहीं रखे तो बाद में ज्यादा ही देगा। बस इसमे ख्याल फिर से मुनासिब रेट रखने का है और धोखा ना देने का है। असल वजह यही है कि ज्यादा प्रतिबंध लगाना बिजनेस में नामुमकिन है, वरना लोग पैसा खा भी नहीं पाएंगे। दुनिया में यही निज़ाम चलता आ रहा है (ऑफ सीजन में बिक्री खरीद पर) तो इस्मे अनावश्यक प्रतिबंध लगाने से जिंदगी, काम धंधे रुक जाएंगी। सिर्फ इस्लाम के बेसिक्स का ख्याल रखते हुए लेन देना है। इस्लाम की नैतिक बंदिशें खास तौर पर।

एक राय ययह है कि अर्थशास्त्र का एक सिद्धांत है मांग और आपूर्ति। डिमांड बढ़ेगी या सप्लाई घटेगी तो रेट ऊपर जाता है। इसमें कोई मुद्दा नहीं है जब तक इसमें मानवीय हस्तक्षेप नहीं है। लेकिन जब कोई जान बुझ कर सप्लाई कम करदे या माल होल्ड करके रखले रेट बढ़ा कर बेचने के लिए तो इसकी इजाजत नहीं है. कोई ऐसा प्रोडक्ट जिसकी मार्केट में डिमांड ज्यादा है और सप्लाई कम है, उसे होल्ड करना और फिर हाई रेट पर बेचना जब उस चीज के लोगो को सबसे ज्यादा जरूरी है, वो भी गलत है. ऑफ़ सीजन में खरीद कर फिर सीजन में बाजार दर पर बेचने पर भी कोई हर्ज नहीं है अगर वह बुनियादी जरूरतों के सामान में न हो जैसे कोई दवा या जरूरी राशन की चीज। इसका कारण एक ये है कि अगर स्टॉक सीज़न में बिका नहीं, तो वो घाटे पर डिस्काउंट पर भी बेच सकता है। या फिर सुख और समृद्धि के समय इसकी इजाज़त है मगर अभाव और कठिनाई के समय में नहीं है. 

 

इन्सान के वजूद का हिस्सा हैं अखलाकियात

इस्लाम से पहले, अखलाकियात इंसान के वजूद का हिस्सा है। अल्लाह ने बुरे अच्छे की समझ इंसान की फितरत में डाल दी है, चाहे किसी धर्म का हो इंसान। बस इससे पर्दा डाल देते हैं लोग अपने फायदे के मुताबिक। अखलाकियात की समझ, सलाहियत इंसान के वजूद का हिस्सा है। तभी तो वो तब ज़ाहिर होती हैं जब उसको तरबियत, माहौल मिलता है। फेरेल चाइल्ड ये माहौल नहीं मिलता तो ये ज़ाहिर नहीं हो पाती। आदिवासी ट्राइब में इनका ज़हूर होता है क्योंकि उनके पास इसके ज़ाहिर करने का माहौल होता है, वो भले ही आम इंसानो से अलग होता है। वजूद में होने का सबसे बड़ा सबूत ये है कि जब किसी के साथ बुरा होता है तो उस बुरा लगता है, जब उसके अच्छा होता है तो उसे अच्छा लगता है। यानी अच्छाई और बुराई के समझ उसके वजूद में है। मतल्बं जब कोई इंसान दुसरे के साथ कोई बुराई करता है तो उसकी नेचर पर भले ही वो उस वक़्त पर्दा डाल के उसे बुरा न समझे मगर जब उसके साथ वही होता है तो उसे बुरा लगता है। मैं जिन अखलाकियात की बात कर रहा हूँ वो बुनियादी अखलाकियात है यानी basic morality. ये इंसान के वजूद है। ये बात क़ुरान ने ही बताई है। मैं गैर बुनियादी अखलाक की बात नहीं कर रहा। 

क्या कर्ज़दार का जनाज़ा पढ़ाना मना है? 


नबी कर्ज़दार मृतक का जनाज़ा पढ़ाने से मना कर देते थे ताकि लोगों को कर्ज़ न लौटने की अहमियत पता लगे। दूसरी बात ये लोग सहाबा थे और नबी के हमसाये थे, इसलिए ऐसे लोगों की आख़िरत को लेके नबी काफी ग़मज़दा थे तो खुद या किसी से उनका कर्ज़ अदा करके ही जनाज़ा पढ़ाते थे। हालांकि दुसरो को उनका जनाज़ा न पढ़ाने को मना नही करते थे। न ही आपने जनाज़े पढ़ने के लिए मना किया बल्कि क्योंकि आप नबी थे तो आपको ही पढ़ाना होता था सो मना कर देते थे। कोई कर्ज़दार मर जाए तो आम लोगों को कोई रोक नही है। इसे नबी का उसवा ए हसना समझ सकते हैं। जो मना कर रहे हैं, वो कम इल्म लोग हैं। खुद मना करने वाला तकवे के तहत ऐसा करे तो कोई बात नहीं मगर वो अपनी लाइफ की हर फील्ड में वकाई बहुत नेक इंसान होना चाहिए, जो आज होना इम्पॉसिबल है। क्योंकि सब पापी हैं, कोई नबी-सहाबा सा नहीं। अगर सब मुसलमान किसी कर्ज़दार का जनाज़ा पढ़ाने से मना कर देंगे तो फिर कर्ज़दारों का जनाज़ा पढ़ाएगा कौन? (खास तौर पर जिनके बड़े-बड़े कर्ज़ हैं)। और किसी पर वाकई कर्ज़ था, इसका फैसला करना भी आसान नहीं है, किसी के मरने के बाद,वो भी आज के झूठे दौर में। अगर किसी आलिम ने किसी की जनाज़े की नमाज़ पढ़ाने से पहले किसी कमज़ोर को उसका कर्ज़ चुकाने की ज़िम्मेदारी दे थी तो उसने दूसरी गलती करी.

 

दरगाह पर अशोक एम्ब्लेम वाले सरकारी बोर्ड का विरोध 

दरगाहों पर जो रुपये, सिक्के (अशोक एम्ब्लेम छाप वाले) चढ़ाए जाते हैं, मुरीद जेबों में वो भरे रहते हैं, वो क्यों जायज़ है?  उससे कोई खतरा नहीं? वो शिर्क की निशानी नहीं? वो मूर्तीपूजा से मिलती जुलती नहीं? नेशनल एम्ब्लेम के तौर पर छपे निशान, मूर्तियों का ताल्लुक मूर्तिपूजा से नहीं है। वो अशोक का राजसी चिंह अधिक था। बौद्ध धर्म से भी जुड़ा है मगर उस समय भी बौद्ध धर्म अनीश्वरवादी और मूर्तिपूजा रहित धर्म था।
 

Is Masturbation Haram? 

Masturbation is not Haram or prohibited. The Quran has explicitly stated the Haram things. It is not among those Haram things. A sin must harm others or self (physically/mentally/spiritually). It does not do either. But sometimes, a permissible thing may make you habitual or lead you to wrong path, that is why its better to avoid it like intermingling with women unnecessarily. Watching nudity (others naked or having intimacy) is prohibited and a sin. Off course, Zina is greater sin than watching professional nudity (porn). Similarly, watching a couple secretly while making relations without their consent, may also be a greater sin.  

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