Thursday, 19 June 2025

हदीस ग़दीरे खुम्म, किरतास, शूरा द्वारा खिलाफ़त।

 

 

ग़दीरे खुम्म ईद मनाना और शूरा द्वारा खलीफा चुनना  

इस्लाम में सिर्फ 2 ईदेन हैं। और वो इबादात से जुड़ी हुई हैं। हर साल वो इबादात आती हैं और उनके साथ वो ईदेन। ग़दीरे खुम्म नामक कोई ईद नहीं होती, न ही ईद मिलाद।  ये दोनों ही मुसलमानों के बनाये हुए त्योहार हैं. ये कोई इबादत या दीन के अहकामों से जुड़ी हुई नहीं हैं इसलिए कोई अल्लाह की तरफ से खास मुक़र्रर दिन भी नहीं है। कोई मानना चाहे तो रोक भी नहीं है मगर ऐसे मनाए जैसा इस्लाम मुसलमानों से अमल चाहता है। ग़दीरे खुम्म अभी हाल ही में ज़्यादा मक़बूलियत पाया दिन है, खास तौर पर शियाओं द्वारा मशहूर किया जा रहा है क्योंकि इससे उनके मैकिफ़ को मजबूती मिलती है। उम्मत हमेशा से ही असल काम करने की बजाय बेमानी चीजों को तवज्जो देती आई है, चाहे सुन्नी हो या शिया। शियाओं में तो इस क़दर दिनों को मनाने का चलन है कि गैर मुस्लिम भी ताकते रह जाए क्योंकि साल भर शिया बस यही कर रहे होते हैं, मजिलिसे, महफिलें, जलसे। हज्जतुल विदा के बाद ग़दीर खुम्म के मक़ाम पर नबी ने लोगों से फरमाया था कि जैसे मैं तुम्हारा मौला/वली हूँ, वैसे ही अली है। क्योंकि इस वाकये से पहले ह. अली पर एक सहाबा ने बुग्ज़ की वजह इल्ज़ाम लगाया था उहोने माले ग़नीमत को अपने हक़ में ग़लत तक़सीम किया है। इस वाकये से ऐन पहले ह. अली यमन में जंग जीत के आये थे और माले गनीमत को अल्लाह के हुकुम के मुताबिक तक़सीम किया था और ख़ुद भी रखा था। इस इल्ज़ाम की वजह से नबी ने ऐसा कहा था और ह. अली के हक़ पर होने की बात लोगों में वाज़ेह करी थी। यानि ये बताया था कि उन पर इलज़ाम तराशी, शक मत करो, वो मेरे जैसे ही हैं.  इसका खुतबे का मतलब ये नहीं था कि आप उनके जानशीन या खलीफा होंगे बाद में। अगर नबी को वाकई किसी को ख़लीफ़ा डिक्लेअर करना होता तो नबी ने आपने आखिरी सबसे मशहूर और बड़े खुतबे में ऐसा कहा होता या अपनी वफ़ात के वक़्त। शियाओं द्वारा इस हदीस और वाकये को जानभुझकर और ज़बरदस्ती ह. अली की पहले खलीफा होने की दावेदारी से जोड़ा जा रहा है। 

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अल्लाह ने क़ुरान (42:38, 3:159) में अपने फैसले अमरूहुम शूरा बयनाहूम की बुनियाद पर लेने को कहा। इसिलए नबी और खुल्फ़ा ए राशिदीन में से किसी ने अपना जानशीन खुद अपने फैसले से नियुक्त नहीं किया बल्कि राय मशवरे से किये. ह. अली पहले खलीफा होने चाहिये थे, ऐसा मानने वाले सीधे सीधे ह. अबु बकर, उमर, उस्मान के किरदार पर सवाल उठा रहे हैं। इनमें से कोई भी अपनी ज़ात के लिए खलीफा नहीं बन सकता था।

क़ुरान के शूरा का उसूल नबी ने रिसालत में ही अमल करके दिखा दिया था। एक जंग के कैदियों के भविष्य को लेके जब आपने लगभग कई हज़ार लोगों से राय मांगी तो राय वाज़ेह नहीं हो पाई, मशवरा गडमड हो गया, तो आपने तमाम लोगो को कहा कि अपने क़ायद को चुनो और उनसे अपने फैसले आगे बढ़ाओ ताकि ऊपर से आखिरी फैसला किया जाए. फिर सबने ऐसा ही किया. नतीजतन कबीलों,  लोगों में ज़िम्मेदार उस वक़्त में ही तय हो गए थे। ये ज़िम्मेदार अपने लोगों के लिए तो अपनी राय पहुचाने के लिए तो थे ही, साथ ही तमाम मुसलमानों में ये बेहद तक़वेदार, एहतराम के लायक थे, न कि सिर्फ अपने लोगों में। ऐसे ही और भी बड़े सहाबा थे जिन्हें लोगों ने अपना क़ायदा मान रखा था और उनकी राय, फैसले अपने सर आखों पर बिठाते थे। यही सब लोगमिलकर शूरा कहलाये और हमेशा मदीना में रहे, राय मश्वरे में शामिल रहे। जब भी कोई फैसला करना होता ये फ़ौरन इकट्ठा हो जाते थे। ये उस वक़्त का House of Representative था। इनेक ज़रिये लोगों की राय अपने जिम्मेदारों के ज़रिए ऊपर तक आती थी. उस वक़्त हमारी तरह हर एक से राय लेना संभव नहीं था, इसलिए ऐसा निज़ाम बनाया गया, यही तरीका फिर दुनिया भर में मशहूर हुआ. ये तरीका आज भी चालू है, विभिन्न परिषदों के सदयस, प्रधानमंत्री, राष्ट्रपति ऐसे ही चुने जाते हैं, जब जनता के बदले उनके चुने गए, विधायक, सांसद आगे नेता चुनते हैं।

नबी की वफात के फोरन बाद ही आपके जानशीन या खलीफा के लिए बहस शुरू हो गई। कोई 40-50 बड़े लोग सकिफ़ पर इकट्ठा हो कर चिंतन करने लगे। तमाम कुरबानियों के बाद अंसार चाहते थे कि उन्हें ये मनसब मिले मगर ये मनसब मक्का वालों के लिए खास हो गया था जिन्हें पूरे अरब में इसके एहल और मुनासिब माना जाता था, आखिर पूरे अरब को इस औहदें के मातहत रहना था (नबी ने भी ऐसा फरमाया था)। 
फितना भांप कर, ह. उमर ने ह. अबू बकर का नाम खिलाफत के लिए प्रोपोज़ किया था। उमर के नज़दीक अबु उबैदा बिन ज़ररह और मुआज़ बिन जबल भी इसके लायक थे पर अबु बकर सबसे ऊपर थे। इसीलिए उनके नाम पर ज्यादातर लोगों ने फौरन हामी भर दी थी। बाकी लोगों ने सोच विचार कर बाद में हामी भर दी और इस तरह शूरा द्वारा वो खलीफा चुन लिए गए। उस वक़्त ह. अबु बकर के नाम पर किसी ने भी शूरा में से सवाल नहीं किया। अंसार के क़ायद अबुल्लाह बिन उबादह ने इस पर इख़्तिलाफ़ ज़ाहिर करा और उन्हें खलीफा मानने से इनकार कर दिया मगर ये अलगाव सिर्फ वैचारिक ही रहा। 

इसी तरह ह. अब बकर ने अपनी वफात से पहले कहा कि अगर मैं तुम्हें खलीफा चुन कर दे दूं तो? इस पर सभी ने हामी भरी और कहा इससे बेहतर और क्या होगा. फिर अबु बकर ने उमर का नाम पेश किया और सभी से राय मांगी। यानी ह. उमर का नाम प्रोपोज़ किया (फाइनल डिक्लेअर नहीं किया)। उनके नाम पर सबने अच्छी ही राय दी. सिर्फ चंद लोगो के ह. उमर के सख्त मिजाज़ को लेके सवाल थे (ऐतराज़ उनकी ख़िलाफ़त पर नही था)  तो इनके सवालों के जवाब ह. अबु बकर ने तसल्ली बक्श दिए ( जैसे आज कैम्पेनिंग में दिए जाते हैं). इसके बाद  शूरा के सभी सदस्यों ने उनके नाम पर हामी भर दी तो उन्हें खलीफा डिक्लेअर कर दिया गया। साफ़ है कि इन दोनों खलीफा का नाम पेश करने के बाद लोगो से राय ली गयी थी और फिर आखिरी फैसला किया गया था. आक की राजनीति में भी यही तरीका जारी है. ये प्रोपज़ल, इलेक्शन, अपोइन्टमेंट का मामला था। । ह. अबु बकर और ह. उमर सबसे बड़े सहाबा थे, इसलिए ख़िलाफ़त के लिए इनसे ऊपर तो किसी का नाम नहीं था  खलीफा के लिए पेश करने या चुनने के लिए। मगर ह. उमर की मृत्यु के समय खलीफा बनाने के लिए खुल रूप से इतने एकतरफा फाइनल नाम नहीं थे यानी काफी कंपीटिशन था। इसलिये उन्होंने किसी का नाम पेश नहीं किया बल्कि शूरा से कहा कि आप खुद एक घर में जाये और 3 दिन में फैसला कर लें कि अगला खलीफा कौन होगा। इस वक़्त तक शूरा के लगभग 13 में से आधे लोग इंतेक़ाल कर चुके थे और 6 ही बचे थे। इन्हीं 6 की तरफ तमाम मुसलमान क़यादत के लिए देखती थे। चुनाव में इन 6 में से ह. ऑफ, ह. उस्मान और ह. अली के नाम आखिरी रह गए. फिर ह. औफ़ ने ह. उस्मान के हक़ में वोट कर दिया (वो घर से बाहर आये, लोगों से मशवरा किया और ह. उस्मान को खलीफा ऐलान कर दिया)। इस तरह इनमें से हर किसी चुनाव आखिरी सतह पर राय मश्वरे पर ही हुआ। अली पहली बार ख़िलाफ़त की रेस में आये इसी वक़्त आय थे, इससे पहले उनसे बड़े सहाबा के नाम ही इस मनसब के इर्द गिर्द ज़ेरे बहस आते थे। अली ने कभी पिछले किसी खलीफा के नाम पर इख़्तेलाफ़ नहीं किया।

बुखारी (4240) और मुस्लिम (1759) की हदीसें बताती हैं कि ह. अली ने अनु बकर की बयत 6 महीनें तक नहीं करी थी क्योंकि वो नाराज़ थे कि खिलाफत के मसले पर उनसे अहले बयत होने के नाते राय नहीं ली गयी थी (यानि उनके खुद के खलीफा बनने की चाह बुनियाद नहीं थी) और इस दौरान 6 महीने तक ह. फातिमा की तीमारदारी में लगे हुए थे जो बीमार थी और फिर इन्तेकाल कर गयी थी. ये हदीसें सनदन दुरुस्त है मगर मतन के मुताबिक काबिले ऐतबार नहीं है, क्योंकि इनमें बेहद गलत बातें बयान हुई हैं. रिवायत कहती है कि ह. फातिमा और अबू बकर में माले गनीमत पर अनबन हो गयी थी और वो उनसे गुस्सा हो गयी थी इसलिए उन्होंने अगले 6 महीने तक यानि मरते दम तक अबू बकर से बातचीत नहीं करी थी (क्या वो ऐसा कर सकती हैं? वो नबी की बेटी थी). अली ने फातिमा की मौत  की खबर अबू बकर को दिए बिना ही खुद नमाज़े जनाज़ा पढ़ा कर दफन कर दिया  था (ऐसा कैसे हो सकता है? वो नबी के चहरे भाई थे ). रिवायत आगे कहती है कि फातिमा की हयात के दौरान मुसलमान अली की ज्यादा इज्ज़त करते थे पर उनकी मौत के बाद अली ने देखा की लोग अब वैसी इज्ज़त नहीं कर रहे (क्या सहाबा ऐसा कर सकते हैं? वो सबसे तकवेदार पीढ़ी थी) इसलिए अली ने सोचा की अबू बकर से सुलह और बयत कर ली जाए (क्या बकवास है? वो दुनिया के तलबगार नहीं थे). ये हदीसे सीधे सीधे सवाल उठा रही हैं कि जब तमाम साहबा बयत कर चुके थे तो ऐसा कैसे हो सकता है कि अली सबसे बड़े मुखालिफ बनके खड़े हो और बयत ना करें? अली तो ऐसे फैसलों में अव्वलींन में से थे, वो तो शुरा में शामिल थे. 

कुछ रिवायत जिन्हें आम तौर पर कमज़ोर माना जाता हैं (इमाम बयहकी की सुनन अल कुबरा 8/143, इमाम हाकिम की मुस्तदरक अल हाकिम 3/80), कहती हैं कि जब अबू बकर ने बयत ली तो अली दिखाई नहीं दिए तो अबू बकर ने उन्हें बुलाकर कहा कि आपके बिना ये मामला अधूरा था और आपकी राय क्या है. अली ने इस पर सहमत होते हुए पहली ही बार में उनसे बयत कर ली. ये हदीस इब्ने हिब्बान ने भी दर्ज करी हैं. इमाम इब्ने खुजैमा (इमाम मुस्लिम के उस्ताद) ने इस हदीस पर कहा था ये रिवायत बहुत मजबूत है. इमाम हाकिम/इमाम ज़हबी ने इसे बुखारी-मुस्लिम की शर्तों पर सहीह करार दिया है. इब्ने कसीर ने भी इस रिवायत को कुबूल किया है और माना है कि अली ने पहली बार में ही बयत करी थी. हिस्टोरियन मुहम्मद सल्लाबी ने भी यही माना है. 

सिर्फ सनद के ऐतबार से हदीसों के मानने वाले उलेमा इस मसले को हल नही कर पाते. इसलिए दोनों हदीसों की साथ में तवील करी जाएगी कि अली ने पहली बार में ही बयत करी थी मगर क्योंकि लम्बे अरसे तक वो फातिमा कि देखभाल में लगे थे और हर जगह आगे आगे दिखाई नहीं दे रहे थे तो लोगों के सवालो, शुबह की वजह से एक बार फिर से खुल कर बयत लेने की ज़रूरत महसूस हुई और फिर ऐसा ही किया गया.

खिलाफ़त के मौजू पर शुरा के मेम्बरान में हुई आपसी हर बातचीत के रिकार्डेड मौजूद नहीं है, ज़ाहिर है ज्यादतर मौकों पर ये आसानी से सहमति पर ख़त्म होती है. जंहा थोड़ा इख़्तिलाफ़ होता था, उनका रिकॉर्ड ज़रुर मिल जाता है और जो मिलना भी चाहिए. ये चंद इख्तिलाफात ऐन मौके पर ज़ाहिर नहीं होते थे बल्कि बाद में निकल कर आते थे. जैसे ह. अब्बास (शुरा में नहीं थे) का अबु बकर पर ऐतराज़ था मगर ये बात उन्होंने नकी वफ़ात के बाद खोली। यानी इख़्तिलाफ़ होते थे मगर सामने नहीं आ पाते थे। जैसे आज भी संसद में पास हुए बिल के खिलाफ कुछ राय मौजूद होती हैं.  
 
 
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हदीसे किरतास 
 
इस हदीस में लिखा है कि आखिरी वक़्त में जब नबी ने कुछ लिखना चाहा कि तुम आइंदा भटको नहीं ( शिया मानते हैं कि यंहा नबी ह. अली के खलीफा बनने की वसीयत करना चाहते थे) तो ह. उमर खुद ये फरमाते हुए कागज़- कलम देने से मना कर देते हैं कि हमारे पास क़ुरान मौजूद है और वो काफी है। 

असल में ये मनघडंत रिवायतें हैं जो हदीस बना कर डाल दी गयी हैं।  क्योंकि इस वाकये पर ढेरों सवाल खड़े हो जाते हैं जैसे कि क्या ऐसा हो सकता है कि एक बेहद बीमार इंसान कोई बात बोलने की बजाय लिखना चाहे, मतलब किसमे ज़्यादा ताकत चाहिए? और जबकि आप को तो ज़्यादा पढ़ा लिखा भी नहीं माना जाता है (उलेमा इसकी तावील करते हैं कि किसी और से  लिखवाना चाहा होगा वगैरह)। नबी कलम मांगे, तो क्या किसी भी सहाबा की इतनी हिम्मत हो सकती है, वो ऐसा न करे? ह. उमर नबी के बारे में ऐसी बात कह दे कि वो बीमारी में ऐसा करहरा रहे हैं? नबी के बारे में कोई ज़रा सा भी बेढंगा बोल देता तो उमर तो खुद सबसे पहले उसकी गर्दन उतारने की इजाज़त मांगते थे। इस वाकये के बाद भी नबी 2/3 दिन ज़िंदा रहे थे, उन्हें वाकई कलम चाहिए थी तो आप किसी और से भी मंगवा सकते थे। अगर नबी को वाकई कुछ हिदायत/ नसीहत लिखनी थी तो लिखने की बाजए, आप किसी को बता देते, कान में ही सही? नबी के आखिरी वक्त में वंहा लोग नबी की सुनने के लिए खड़े थे या फिर इसलिए कि वो जो भी कहे, उस पर गिरोहबाज़ी करके इग्नोर करना है?

इस तरह की रिवायतें गढ़ी ही इसलिए गई थी कि मुस्लिम टुकड़ों में बंट जाए और वही हुआ और आज भी ऐसी हदीसों को मानने वाले बंटे हुए हैं और बंटे ही रहंगे जब तक खुद को इन खुराफातों से बालातर नहीं कर लेते। उस दौर में इस्लाम में दाखिल हुए लोगों ने अपने अपने गिरोह, विचारधारों, बदले की भावनाओं वगैरह की वजह से वाक्यात घड़े और सच्चे वाक्यात को अपने मुताबिक बयान भी किया। तारीख अक्सर बयान करने वाले के मौकिफ़ के हिसाब से रिकॉर्ड करी जाती है। तमाम मुस्लिम और खासतौर पर शिया - अहले हदीस जैसे मसलक (फिरके)  जितनी जल्दी रिवायतों के दीन से निकलकर खुद को क़ुरान - सुनन्त के दीन की तरफ ले आयंगे, उतना जल्दी उम्मत में सुकून आ जायेगा।

इसके अलावा इमाम बुखारी की एक दूसरी हदीस की किताब अलअदब अलमुफ़रद जिसमे नबी के तौर -तरीके बयान हुए हैं, उसमे एक हदीस में ह. अली खुद कहते हैं कि नबी ने आम हिदायत ही इस वक़्त दी,न की खिलाफ़त पर कुछ काहा था. इस हदीस से तो ह. उमर की ओर मंसूब करी जा रही बात बिलकुल गलत और उलटी साबित हो जाती है. 

अलअदब अलमुफ़रद 156: अली इब्न तालिब ने बताया कि जब पैगंबर की बीमारी गहरी हो गई, तो उन्होंने कहा, "अली! मुझे एक पन्ना लाओ जिस पर मैं अपने समुदाय के लिए कुछ लिख सकूं जिसके बाद वे गुमराह नहीं होंगे।" अली ने कहा, "मुझे डर था कि वह ऐसा करने से पहले ही गुज़र ना जाएँ, इसलिए मैंने कहा, 'मैं कागज से बेहतर याद रखूंगा।' नबी का सिर मेरी बांह और मेरे पैर के बीच था। उन्होंने नमाज़, ज़कात और गुलामों के साथ दयालु व्यवहार की सलाह दी। वह मरने तक इसी तरह बोलते रहे।" उन्होंने उसे गवाही देने का आदेश दिया, "अल्लाह के अलावा कोई इलाह नहीं है और मुहम्मद बन्दे और रसूल हैं। जो कोई भी इसकी गवाही देता है वह आग से बच जाता है।
 

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