ऊंटनी का दूध और पिशाब का ज़िक्र करने वाली हदीस और वाक़या।
हदीस के अलग अलग तुर्क बताते हैं कि मदीना में एक कबीला मुसलमान होकर दीन सीखने आता है। उनको मदीने की आबो हवा रास नहीं आती और उनकी तबियत खराब हो जाती है। उनके पेट फूल जाते हैं और चमड़ी पीली पड़ जाती है (नसाई 306, 4035) यानी पेट का रोग और संभवत चर्म रोग हो जाता है। सो उन्होंने बताया कि वे किसान नहीं है बल्कि चरवाहे हैं और इसलिये मदीना से दूर मवेशी माहौल में रहना चाहते हैं (बुखारी 5727, 4192; नसाई 305)। ज़ाहिर है 1400 साल पहले के चरवाहों का रहन सहन भी ऐसे ही माहौल में होता था जंहा उन्हें ऊंटों, दूध, मूत्र, गोबर आदि के बीच ही रहने की आदत होती थी। बीमारी के बाद उन्हें ऊंटनी का ताज़ा दूध पीने की ज़रूरत महसूस हुई।
इस पर (सहीह मुस्लिम 1671b, 4354) नबी फरमाते है कि मदिना से बाहर फलां जगह चले जाओ जंहा हमारे चरवाहे और ऊंट हैं और वंहा मौजूद "दूध और पिशाब का प्रयोग करो" (यंहा पीने की नहीं बल्कि इस्तेमाल करने की बात कही गई है)।
आगे इसी हदीस में (सहीह बुखारी 1501, 5686 में भी) कहा गया है कि वो वंहा गए और उन्होंने ऊंटनी का "दूध पिया और पेशाब'' (यंहा पीना लफ्ज़ सिर्फ दूध के साथ आ रहा है, पेशाब के साथ नहीं)।
जबकि बुखारी 5085 में रावियों ने सिर्फ दूध का ज़िक्र किया है, पेशाब का नहीं और नसाई 4030, 4031 में भी सिर्फ दूध का ज़िक्र है, सिवाय एक रावी के जिन्होंने पेशाब का भी ज़िक्र किया है। इसी तरह दावूद 333 में भी सिर्फ दूध का ज़िक्र है और रावी को पिशाब लफ्ज़ कहे जाने का याद नहीं है, और इसके सिर्फ एक तुर्क में पिशाब का जिक्र है, मगर अजीब बात यह है कि इसके मुताबिक यह वाकया किसी क़बीले के साथ नहीं बल्कि सिर्फ एक आदमी के साथ पेश आया था।
उन लोगों ने ऐसा ही किया और जब वे ठीक हो गए, तब उन्होंने मुस्लिम चरवाहे को मार दिया और ऊंट लूट कर चले गए। इसके बाद उन्हें पकड़ कर इबरत्नाक सज़ा देते हुए मृत्युदंड दिया गया।
इस हदीस पर आम मौकिफ़।
सबसे पहले हम इस हदीस के उन्हीं मायनों में समझने की कोशिश करते हैं जो आम तौर पर प्रचलित हैं। जिनसे से पता लगता है कि ये कोई आम सलाह नहीं थी बल्कि कुछ विशेष लक्षण देख कर सिर्फ कुछ लोगो को दी गई सलाह थी, वो भी उस व्यक्ति के द्वारा जो चिकित्सा के भी माहिर थे यानी मुहम्मद साहब। ज़ाहिर है नबी के समय की प्राचीन अरबी परमरागत चिकित्सा पद्धति उत्कृष्ट थी, जिसके आधार पर ये आदेश दिया गया था।
ये सलाह सभी के लिए नहीं थी जैसे की हमारे यंहा खुले आम लोग गौमूत्र पीते या गोबर मलते दिखते है। मनुसमृति में गौमूत्र पीने और गोबर खाने के आदेश लिखे हुए है। आयुर्वेद में मूत्र का औषधिय प्रयोग नई बात नहीं है। हिन्दू ग्रंथों में गौमूत्र को दिव्य स्थान प्राप्त है जबकि इस्लाम में ऊंट मूत्र का कोई धार्मिक महत्व नहीं है।
वैसे इस्लाम कहता है कि आपातकालीन स्तिथि में जो चीज़े मना है वो भी खा-पी सकते हैं। इस्लाम के अनुसार मरते हए आदमी के लिए हर इलाज जायज़ है। आम मान्यता यही है कि जिन जानवरो का मांस खाना जायज़ है, उनका मल मूत्र हराम नहीं है।
आज कुछ रीसर्च कहती है कि ऊंट का मूत्र कैंसर समाप्त करने में सहायक है। हम जानते है कि आज कुछ दवाइयों में कुछ जानवरों के मूत्र का प्रयोग होता है। ऐसी दवाई डॉक्टर भी लक्षण देख कर प्रेस्क्राइब करता है। वैसे आयुर्वेद के अनुसार प्रत्येक चीज़ का औषधीय प्रयोग हो सकता है।
रही बात मूत्र पी कर इलाज करने की, तो ये हो सकता है कि ऊंट के मूत्र में कुछ मेडीकल प्रोपेटीज़ हो (जैसा कुछ मेडिकल रिसर्च पेपर सिद्ध करते हैं) जिससे शायद कोई बीमारी ठीक हो सकती हो या किसी का बाई चांस कैंसर आदि ठीक हो भी गया हो, जैसा कुछ अरबी और रिसर्च पेपर दावा करते हैं। वो कहते हैं कि ऊंट के दूध और मूत्र का मिश्रण का सेवन करने से कैंसर मरीजों को फायदा होता है।
पर आज ये बात तब तक अतार्किक, अप्रमाणिक, अवैज्ञानिक, बेवकूफी और घिन्न (गंदी) ही मानी जाएगी जब तक विज्ञान ये साबित न कर दे की यह या इससे बनी दवाई कारगर है और कब, कैसे, कितनी और किस प्रकार लेनी है या फिर यूनानी, आयुर्वेदिक आदि जैसी पारंपरिक चिकित्सा पद्धित इसे प्रामाणित कर दे। ज़ाहिर है आज कोई चिकित्सा पध्दति किसी भी जानवर के पिशाब से किसी बीमारी के ठीक होने की तस्दीक कर दें तो वो करना जायज़ होगा मगर ये इलाज साबित होना चाहिये।
इस हदीस पर तार्किक मौकिफ़।
★ ये हदीसें नबी की दूसरी हदीसों से टकरा रही है। क्योंकि नबी ने जो इसमें हकूम दिया वो नबी के दुसरो हुकुमो से टकरा रहा है। इस हदीस में नबी ने कुछ लोगो को पेशाब पीने को कहा है जबकि दूसरी कई हदीसों में नबी ने पेशाब को नजिस या गंदा बताया है यानी पेशाब को पीना जायज़ नहीं है। तिर्मिज़ी (2045) हदीस में ख़बाइस इलाजों से मना किया गया है।
इसलिए उसूले हदीस के मुताबिक जब 2 हदीसों में टकराव हो जाये तो दोनों में से किसी भी हदीस को मानने की पाबंदी लोगो पर कतई नही है। इसलिए इस हदीस को बेशक तरक किया जा सकता है और करना भी चाहिए।
★ इन हदीसों में से कुछ में सिर्फ दूध का ज़िक्र है, न कि हर जगह दूध के साथ पिशाब का भी। उसूलन ऐसी रिवायतों में वही बात पूरी तरह काबिले क़ुबूल होती है जो कॉमन है। जो ज़ायद लफ्ज़ हैं, वो उस दर्जे में काबिले कुबूल नहीं होते हैं।
इसलिए सिर्फ दूध वाली बात ही मानी जानी चाहिए क्योंकि यंहा भी हदीसों के लफ़्ज़ों में टकराव पैदा हो गया है।
इस हदीस पर रायज मौकिफ़।
उसूल के मुताबिक अगर दो टकराव वाली हदीसों की तावील करके किसी ऐसे नतीजे पर पहुँचा जा रहा है जिसमें दोनों हदीसो के अर्थ सही साबित हो रहे हैं तो ऐसी तावील में कोई हर्ज नहीं है।
इसी के मद्देनजर उलेमा ने यह मौकिफ़ बनाया कि यह हुकुम जुज़वी था, यानी अल्लाह की तरफ से दिया गया था सिर्फ उन खास बीमार लोगों के लिए, न कि कुल्ली हुक्म था यानी सबके लिए नहीं था। इसलिए किसी भी सहाबा ने ऊंट का पिशाब पीने के हुक्म पर अमल किया हो, ऐसा कंही नहीं मिलता है (भले ही आज कुछ अरबी ऐसा करते दिख जाते हों)। यानी सहाबा ने भी इसे खास हुकुम ही माना था।
मगर इस तरह की तावील में एक सवाल यह उठता है कि अल्लाह ने नबी को जब इस बीमारी का इलाज बताया तो ये क्यों नहीं बताया कि वो लोग चरवाहे को मार देंगे और ऊंट लेके भाग जायँगे? इसलिए ज़ाहिर है कि ऐसे इलाज का हुक्म अल्लाह की तरफ से नहीं माना जा सकता बल्कि यह नबी के ज़ाती क़दीम इल्मे तिब्ब की बुनियाद पर ही माना जाएगा।
और अगर वाकई इन दो टकराने वाले हदीसों को सही तावील के तहत समझना है तो हमें इस हदीस में गहराई से झांकना होगा और खास लफ़्ज़ों, मायनों वगैरह के मद्देनज़र इसे समझकर क़ुबूल करना होगा। वही इस हदीस का असल मायने या मौकिफ़ होगा।
इस हदीस पर असल मौकिफ़
★ सबसे पहली बात की रसूलुल्लाह सल्लo इंसानी फितरत, पाकी और तहारत के खिलाफ हुक़ूम नहीं दे सकते। इसलिए यह हुक्म मूत्र पीने के बारे में कभी नहीं हो सकता अलबत्ता त्वचा पर लगाने के लिए ज़रूर हो सकता है।
हम जानते है कि प्राचीन काल से ही मूत्र को प्रोसेस करके उसका प्रयोग चर्म रोग में लगाने के लिए होता रहा है जो अरब में भी उस वक़्त मौजूद था। बल्कि आज भी बहुत से हकीम और वैद्य इसका इस्तेमाल करते है। इस आधार पर हम यह मान सकते हैं कि...
● या तो ये पूरी हदीस और वाक्या ही गलत है. कुछ उलेमा उन लोगों की दी गयी इबरत्नाक सज़ा की वजह से भी ऐसा मानते हैं (इसकी चर्चा नीचे करी गयी है)। क्योंकि इसमें बताया गया है कि नबी ने उनकी आँख, नाक कटवा दिए थे मगर नबी तो वो रहमत थे, न कि ज़हमत।
● या इस हदीस में दूध के साथ रावियों ने शायद पेशाब लफ्ज़ को भी जोड़ दिया है (जैसा कि ऊपर बताई गई नसाई की हदीसों से इशारा मिल रहा है)।
● या फिर नबी ने दूध और पेशाब को "इस्तेमाल" करने को कहा था यानी दूध पीने के लिए और पेशाब सिर्फ त्वचा पर लगाने के लिए उपचार के तौर पर (जैसा कि ऊपर मुस्लिम की हदीसों में कहा गया है)। मगर बाद में रावियों ने शायद इसमें पीने के लफ्ज़ भी जोड़ दिए होंगे।
● या मूत्र 'लगाने' के अल्फ़ाज़ सुरक्षित न रह पाए हो। यानी नबी ने लगाने की बात कही हो मगर रावि शायद गलती से या अपने चिकित्सा ज्ञान अनुसार इस लफ्ज़ को आगे नहीं बढ़ा पाए।
● या असल में पूरे वाकये से यह साफ वाज़ेह हो रहा है कि वो लोग चरवाहे थे, उन्हें ऊंट, दूध, गोबर, गन्ध आदि के वातावरण की आदत थी और इसीलिए नबी ने फरमाया होगा कि इन्हें वंहा जाकर दूध, पिशाब आदि की अपनी प्यास (भूख, तड़प, चाह, ये लफ़ज़ मुहावरतन भी ज़रूरत के मायनों में इस्तेमाल होते हैं) भुझाने दो यानी उनसे फायदा उठाने दो। ज़ाहिर है फिर बाद में रावियों से बयान करने में लफ़्ज़ों में फ़र्क़ आ गया हो।
● इनके अलावा, इस हदीस को समझने में अक्सर एक ग़लतफ़हमी होती है। जैसा ज़्यादातर हदीसों के अल्फ़ाज़ से साबित हो रहा है कि नबी ने कहा वंहा दूध पीना और "पेशाब"। यानी वंहा दूध पीने के लिए मिल जायेगा और मूत्र (लगाने के लिए) मिल जाएगा, न कि मूत्र पीने के लिए। इन्ही हदीसों में यह भी बताया गया कि उन्होंने वंहा दूध पिया और पिशाब (लगाया)। नबी के यह कहने के बाद कि वंहा दुध और मूत्र है, सहाबा ने स्वयं इसका अर्थ अपनी समझ अनुसार यह बयान करना शुरू कर दिया कि मूत्र भी पीने के लिए ही कहा था।
ये बात कहने का एक, अरबी भाषा का तरीका था। आज भी हमारी और बहुत सी भाषाओं की ऐसी ही शैली है बात कहने की। क्योंकि जो बात कॉमन और अंडरस्टुड होती है, उसे कहा नहीं जाता है। जैसे हम कहे कि उन्होंने खाना और पानी पिया। यानी खाना खाया और पानी पिया। या जैसे कि कोई हमसे पेन मांगे तो हम उससे कहँगे की ये रहा पेन लिखने के लिए और पेपर। यानी पेन जिससे लिखना है और पेपर (जिस पर लिखना है)। या जैसे किसी मेहमान के आने पर हम नौकर से कहते है कि पीने के लिए कोल्ड्रिंक ले आओ और ओपनर भी (बोतल खोलने के लिए), इसका मतलब यह नहीं होता कि ओपनर भी पीना है। क़ुरान में भी ऐसी शैली में कई बातें कही गयी है, जैसे एक आयात में कहा गया है: Those who settled here (in Medina) and faith (strengthened their). इसलिए नबी सल्लo ने एक आलरेडी अंडरस्टुड बात (यानी ऊंट मूत्र से त्वचा उपचार) को इस तरह कहा जो कि प्रचलित शैली थी।
इस मौज़ू पर तहक़ीक़ करने वाले कुछ उलेमा का कहना है कि दूध से इलाज के लिए उन लोगो ने खुद पूछा था और नबी ने ये डिटेल नहीं बताई थी कि दूध या पिशाब कैसे, कितनी मात्रा, किस प्रकार प्रयोग करना है क्योंकि वो चरवाहे थे और ये बातें वो खुद भी जानते थे, आखिर दूध और पिशाब से किया जाने वाला यह एक प्राचीन उपचार था और इसलिए उन्होंने वंहा सिर्फ दूध ही पिया।
■ मेडिकल पक्ष
पहले ज़माने में परम्परों या प्राचीन ज्ञान के आधार पर जो इलाज की पद्धति चली आ रही थी, वो तजुर्बे के कारण बनी थी, न की साइंस के द्वारा। जो बहुत खरी होती थी और आज भी है। और इसलिए हमेशा से ही वैज्ञानिक, पुराने नुस्खों के आधार पर ही बहुत सी मॉडर्न मेडिसिन बनाते आये है। ये नुस्खा भी यक़ीनन उसी ज्ञान पर आधारित था जिसे अभी तक साइंस ने एक्सपेरमिंट नहीं किया है।
हम आज साइंस के द्वारा ये बात जानते है कि मूत्र में एन्टी बैक्टीरियल तत्व होते है। पर फिर भी इसका मतलब ये नहीं है की हर कोई बिना किसी साईंटिफिक एविडेन्स के मूत्र का प्रयोग, स्किन इन्फेक्शन या सभी प्रकार के त्वचा के रोग के लिए करने लग जाये। जब तक विज्ञान ये साबित न कर दे कि किस बीमारी में, किस के मूत्र से, कितनी मात्रा में, अन्य तत्वों के साथ मिलाकर, किस प्रोसेस से बनी दवाई के प्रयोग करने से उपचार हो जाएगा, तब तक किसी व्यक्ति को इसका प्रयोग नहीं करना चाहिए। और अगर फिर भी कोई करता है तो उसे सिर्फ टोटका कहा जाएगा। भले ही उससे कोई ठीक हो जाये, उसे इलाज नहीं कहा जा सकता।
यही इस हदीस से भी साबित है कि तब नबी ने जो इलाज बताया वो उन्ही तजुर्बों या नुस्खों के आधार पर था। उस समय मॉडर्न साइंस तो थी नहीं। पूरी दुनिया लोकल चिकित्सा पद्धिती का प्रयोग करती थी जो तजुर्बों पर आधारित होता था। खास लक्षण देख कर, खास लोगो को खास स्किन डिज़ीज़ के लिए इसे खाल पर लगाने का तरीका बताया गया था पर किस प्रकार की स्किन डिज़ीज़, ये हदीस से मालूम नहीं पड़ता है। पर हदीस से साबित है कि ये तरीका कारगार रहा। इसलिए विज्ञान तहक़ीक़ करके पता लगा सकता है कि ऊंट के मूत्र के स्किन एप्लिकेशन के द्वारा किस प्रकार के स्किन इन्फैशन का इलाज हो सकता है।
■ तिब्बे नबवी
असल मे तिब्बे नबवी जैसी कोई खास चीज़ नहीं थी। क्योंकि आप सल्लo के ताल्लुक़ात अरब के कोने कोने से, लाखों लोगों से था तो उनके पास एक से एक बेहतरीन इलाज के नुस्ख़े आते थे, जिनमें रसूल सल्लo का इल्म शामिल हो जाता था। इसलिए हज़रत आएशा एक जगह फरमाती है कि बीमारी के वक़्त में हूज़र के पास दूर दराज़ से हर जगह से लोग खैरियत लेने के लिए आते थे और आके नुस्खे बताते थे तो हज़रत आएशा ही नबी के लिए तैयार करती थी। इसीलिए हज़रत आएशा से भी बहूत से नुस्खे हम तक रिवायतों से पहुंचे है। हिजामा भी असल में इसी तरह का 2 हज़ार साल पुरानी चीनी इलाज पद्धिति है जो अरब में भी उस दौर में मशहूर थी।
■ मृत्युदंड।
इस घटना पर ये संभावना भी जताई जाती है कि उन लोगों का इरादा दरअसल ऊंट लूटना ही था, इसलिए उन्हीने यह नहीं कहा कि हमें यंही दूध आदि दो बल्कि यह कहा कि शहर से दूर किसी स्थान पर चरवाहों के माहौल में भेज दो। यानी वे बीमार थे ही नहीं क्योंकि वे कुछ ही समय में चरवाहे को मार कर ऊँट लूट कर चल दिये थे। जबकि जैसे बयान किया गया है, उनकी तबियत जितनी बिगड़ी थी, वैसे उन्हें ठीक होने में कई दिन लगने चाहिए थे।
रही बात मृत्यु दंड कि तो अगर कोई किसी के घर मेहमान बनके आये और खूब खिदमत करवाये और बीमार होने पर देखभाल भी करवाए। इसके बाद तोड़े से लालच में देखभाल करने वाले लोगों के घर के सदस्य को ही मार कर औके लूट कर भाग जाए तो ऐसे लोगों को मृत्युदंड ही दिया जाएगा और वो भी ऐसा खतरनाक कि कोई भी बद नियत आदमी आगे ऐसा कर्म करने से पहले हज़ार बार सोचे।
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The Messenger said: Why don't you go to our camels along with our shepherd, and make use of their milk and urine. They said: Yes. They set out and drank their milk and urine and regained their health (Muslim 1671b).
The Messenger said: Why don't you go out to our camels and drink their milk. One of the narrators Qatadah said: And their urine (Nasai 4030, 4031).

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