काफिर
In Quran (57:20) Kufr word has been used for Farmer as they conceal seeds in earth for growing crops. In an arabic idiom, skin of grapes has been called as kafir because it hides the grapes within it.
In Quran (76:3 & 27:40) Kufr word has been used for ungrateful people
Those who do not judge according to what Allah has sent down are the disbelievers (Kafir) ~ Quran 5.44.
In one chapter Quran (2:256) says 'Be Kafir of Evil and Acceptor of God.' So it literally means Rejector or Concealer.
God has separated the truth and untruth form by his sight of knowledge and ordered to believe in the truth and reject the untruth (become Kafir of untruth). परमेश्वर ने सत्य और मिथ्या के रूप को अपनी ज्ञान दृष्टि से पृथक कर दिया और आदेश दिया कि मिथ्या को नकार दो (मिथ्या के काफ़िर बनो) और सत्य में आस्था लाओ। ~ यजुर्वेद :19:77.
Kafir does not mean a Non Muslim. Kafir literally means the one who rejects or the one who conceals or the one who is ungrateful. Kafir word is made of root words Ka Fa Ra which make word Kufr which means rejecting or concealing. Kafir word is made from the word Kufr.
Basically Kafir in Quran refers to a particular group of people of prophet's time. Only God has the right to call anyone Kafir since only he knows who have really rejected him intentionally inspite of being convinced in the bottom of heart that there is only one Creator of all. Prophet Muhammad never called anyone as Kafir.
In Quran it refers to only those rejectors of Makka who were against muslims of Makka. Quran referrs to those rejectors as Kafir who had been told that there is only one God, they accepted it in the heart as they could not produce valid reasons and arguments against this. But they did not express it openly and simply denied the existence of God for their own gains and benefits. So quran said it's their choice as there is no compulsion and let them be on their belief if they desire so.
But later those people left no opportunity to abuse, harass, suppress, exploit, loot, torture, beat and even kill Muslims just because of their religious faith. They wanted muslims to leave islam because islam was against their beliefs, business, social system, reign and other practices which were in favour of only powerful.
So these enemies of Muslims were given warnings first but they didnt stop and continued doing injustice. Many times, they tried to fight a war with Muslims and sometimes wars took place. So Muslims did some treaties and agreements with them for peace but they broke one of them, then at last the permission to go into war with them given when there was no chance or scope left of get rid of them. But a war with a code of conduct. It was permitted as they were constantly not letting other people live as they want to peacefully.
क़ुरान में ऐसे ही कट्टर अत्याचारियों और दुश्मनों के खिलाफ़ आखिर में युद्ध करने का आदेश दिया गया है जब वो लाख समझाने के बाद भी मरने मारने को तैयार थे। ऐसे लोगों को क़ुरान ने काफ़िर (उस समय के कुछ खास इंकारी) और मुश्रिक (मुसलमानों के वो कट्टर दुश्मन जो बहुदेववाद और मूर्तिपूजा में विश्वास करते थे) कहा गया और उनसे अंत मे युद्ध करने को कहा गया है जब वो समझाने के बाद भी अपनी नापाक हरकतों से बाज़ नहीं आ रहे थे।
गीता में अर्जुन कहते की मैं अपने भाइयों, गुरुओ, संबंधियों और बड़ों को कैसे मारूँ। तो श्री कृष्ण कहते है ये नपुसंक विचार को मन से निकालो अर्जुन और सामने वाले को समाप्त करो, चाहे कोई भी हो, किसी के मरने जीने पर शोक नही करते और न विचलित होते है।
क्या गीता का उपदेश ठीक है? हां ठीक है क्योंकि युद्ध स्थल में दुश्मनों के विरुद्ध दिये गए आदेश है ताकि युद्ध जीतकर अन्याय और अत्याचार का अंत किया जा सके और न्याय और सत्य को स्थापित किया जा सके। यूद्ध में अत्याचारियों से लड़ने और दुश्मनों को मारने के आदेश नहीं होंगे तो क्या आत्महत्या करने के होंगे? नही न।
अगर गीता में लिखी बात ठीक है तो क़ुरान की भी ठीक है क्योंकी क़ुरान ने उन लोगो से युद्ध करने को कहा है जो लोगो को उनका धर्म मानने के लिए उनको जान से मार रहे थे, घर से निकाल रहे थे, स्त्री, बूढ़े बच्चो को सता रहे थे!
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7:51: काफिर की परिभाषा.
सुराह काफुरीउन में भी। जो नहीं समझेंगे अमलन.
कुरान में कफफरु – जिन्होंने बिल्कुल भी नहीं माना।
कुरान में कजज़बू – जिन्होंने जाना और माना मगर अमल से झुठलाते थे।
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Those who do not judge according to what Allah has sent down are the disbelievers.
कुरान (5.44) इस आयत में किसको काफिर कहता है जान लो। दुनिया के ज़्यादातर मुसलमान क़ुरान को बुनियाद बना कर फैसले नहीं करते है। बल्कि ऐसा कौन सा गैर इस्लामी काम नहीं है जो आज का मुसलमान न करता हो। चोरी, जीना, हक़ तल्फ़ी, ज़्यादती वैगरह, लिस्ट बहुत लंबी है। फिर तो क्या आज के ज़्यादातर मुसलमान भी काफ़िर हुए ??
आज तो हर फ़िरक़ा दूसरे फिरके को काफ़िर कह रहा है तो क्या सारे मुसलमान काफ़िर हो गए। बरेलवी, देवबंदी और अहले हदीस को काफिर कह रहा है। देवबंदी, बरेलवी को काफिर कह रहा है। अहले हदीस शिया और सूफी को काफिर कह रहा है। खुद का काफिर का तमगा लिए घूम रहे हो और दूसरे को काफिर कह रहे हो।
गैर मुस्लिम को अरबी में काफ़िर कहा जाता है तो फिर तो इस्लाम आने से पहले अरब के सारे गैर मुस्लिमों को काफ़िर कहते होंगे? लाओ कोई हदीस जिसमे नबी ने किसी को काफ़िर कह कर पुकारा हो? कभी नहीं पुकारा।
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काफ़िर लफ्ज़ के तीन मतलब होते हैं-
1. छुपाने वाला, नाशुक्री करने वाला और इंकार करने वाला. अल्लाह ने जो नेमतें, जो इल्म, जो हिदायत, जो दीन और जो उसूल दुनिया के इंसानों के लि ए भेजा है उसको लोगों से छुपाना, उसको अप नी जागीर समझ लेना, उसकी नाक़द्री करना, उसका सही हक़ नहीं अदा करना, उसको हक़ मानने से इंकार करना कुफ्र कहलाता है।
काफ़िर गैरमुस्लिम को नहीं कहते। जो कुफ्र करता, वह काफिर कहलाता है। आसान शब्दों में समझे तो कुफ्र यानि अधर्म । कुरान ने कुफ्र / काफिर की कई ने विशेषताएं बताई है जो हर कौम के लोगों पर लागू होती है।
कुरान 5:44: जो लोग उसके मुताबिक़ फ़ैसला न करे जो अल्लाह ने नॉज़िल किया तो वही लोग काफिर है
कितने ऐसे मुसलमान है जो कुरआन के मुताबिक फैसले करते हैं? आज मुसलमानों मैं इतने फिरके है और इनमे आपस में कई मामलों में मतभेद है, लेकिन ये क्यूं कुरान को Final authority नहीं बनाते और उसके नाम पर एक हो जाए।
कुरान 2:256: हर बुरी बात का काफिर होना अच्छी बात है.
धर्म के संबंध में कोई जबरदस्ती नहीं । सन्मार्ग,(हक) पथभ्रष्टता (बातिल) से अलग हो चुका है। अतः जिस मनुष्य ने तागत नैतिक सीमाओं का उलंघनकारी) से इंकार [कुफ़ किया और ईमान लाए उसने ऐसा ठोस सहारा पकड़ लिया जो टूटने वाला नहीं है।
2. कुरान ने नाशुक्रे को भी काफिर कहा है।
कुरान 76:3: हम ने उसे मार्ग दिखा दिया, चाहे कृतज्ञता दिखाने वाला बने या अकृतज्ञता (नाशुक्री/ कुफ्र करने वाला।
कुरान 12:87: अल्लाह की रहमत से मायूसी भी कुफ्र है, यानी काफिर जल्द ही अल्लाह पर उम्मीद और यकीन तोड़ कर मायूस हो जाते है. अल्लाह की रहमत से तो काफिरों के अलावा और कोई न उम्मीद नहीं होता।
निष्कर्ष यह है कि कुफ्र की विभिन्न श्रेणियां [CATEGORIES] है और किसी न किसी श्रेणी के अंतर्गत सभी धर्मों के कुछ न कुछ लोग आए बिना नहीं रह सकते, मुलहिदो
[अनीश्वरवादियो / ATHEIST) के अतिरिक्त जितने समूह या जातियां है, वे आंशिक जुज़वी) रुप से काफ़िर है।
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