Friday, 26 June 2020

मुसलमान, हिंदुस्तान और हालात।

 
 



इंडियन मुस्लिम खुद ही अपने पतन के लिए पहले भी ज़िम्मेदार था और आगे भी रहेगा। खुद ही चिंगारी को हवा देके आग बना देते हैं, फिर चिल्लाते हैं जला दिया, देखो हमें जला दिया।

परी महक नामक रील मेकर पर एक्शन 

मुस्लिम मर्दों की ईगो को हर्ट हुआ की सिर्फ मुस्लिम नामक लड़कियां कैसे गंदपन, गाली गलौच सोशल मीडिया पर खुलके यूं कर सकती हैं। ये तो मर्दों के काम थे। सो एक मुस्लिम नाम के जोशीले मर्द वकील ने शिकायत करी। लड़कियां मुस्लिम थी तो फ़ौरन एक्शन लिया गया और इसकी वीडियो बनवा के वायरल किया गया जानबूझ कर। क्योंकि इससे पहले से जारी हिन्दू मुस्लिम एजेंडे को और हवा जो मिलती है। चिट - पट दोनो उनकी हुई। एक्शन के बाद मुस्लिम लौंडे खुश हो गए जिनमें अक्सर खुद ज़ाती ज़िंदगी और सोशल मीडिया पर इनसे भी ज़्यादा गाली गलौच करते हैं, सुबह शाम। बाकी इस्लाम और मुस्लिम को दिन रात गाली देने वाली रीलें भरी पड़ी हैं, संघी सोशल मीडया सेलिब्रिटी आज भी दिन रात यही कर रहे हैं। कोई शिकायत करने वाला नहीं और कोई कर भी दे तो आगे कोई एक्शन लेने वाला नहीं। आख़िर लें भी क्यों, अपना धंधा बंद थोड़ी करवाना है। मुस्लिमों को क्या हाथ लगा? कुछ नहीं। मुस्लिम औरतें अब शायद ऐसे काम कम करें। अच्छी बात है, मगर ये तो फिर सिर्फ मर्दो की अना पूरी हुई। कोई है जो मर्दों की गाली गलौच में बदलाव लाने के लिए कुछ करें? आखिर मर्द औरत बराबर हैं।
 

इस हमले के बाद बने माहौल पर मुसलमानों का रद्दे अमल?
 
इस अटैक को खुलके भारत के बदले की नज़र से ही देखना चाहिए। शायद इसमें वंहा कुछ बेगुनाह भी मरे हों। रिपोर्ट्स के मुताबिक़ उन्होंने भी हमारी ज़मीन पर कुछ जगह रैंडम हमले किये हैं, हमारे लड़ाकू प्लेन गिराए हैं। यंहा भी बेगुनाह मरे हैं।

इस्लाम के मुताबिक किसी भी बेगुनाह  (जो जंग में शामिल न हो) की जान जाना अफसोस नाक है। मगर हालात ऐसे बन गए हैं कि इंसान (न सिर्फ भारतीय के तौर पर) हम सिर्फ इंसानियत की बात नहीं कर सकते, हमें हर हाल में भारत के नज़रीये से ही स्टैंड लेना पड़ेगा। अगर हमने इंसानियत की बात करी तो देशद्रोही मान लिया जायेगा। (पाक की तरह से स्टैंड लेने की बिल्कुल बात नहीं है बल्कि इंसानियत की तरफ से स्टैंड लेने की बात हो रही है). जबकि पहलगवां में जो इस्लाम के नाम पर हुआ उसका मुसलमानों ने इंसानियत के नाम पर खुलके खंडन, विरोध किया। इन दो तरफा हमलों में हिन्दू भाई इंसानियत की बात करे तो उनका एक बार को चल जायेगा, हमारा नहीं।

वैसे भी मुसलमानों को सिर्फ इन हमलों पर नहीं बल्कि दुनिया में तमाम जगह हो रहे हमलों में मारे जान बेगुनाहों के साथ हमदर्दी होनी चाहिए। क्या हमास द्वारा मारे जाने वाले इजराइलियों के साथ हमदर्दी नहीं होनी चाहिए? इराक, अफगान, सिरिया वगैरह में मरने वालो के साथ बेशक हमदर्दी होनी चाहिए मगर दूसरे मुल्कों में आतंकियों के द्वारा मरने वालों के लिए भी क्या उतनी ही हमदर्दी हैं? शायद नहीं या अगर है तो दिखाई नहीं देती। मुसलमानों में यह समस्या रही है कि वो सिर्फ इस्लाम या मुसलमानों के पीड़ित होने नाम पर जज़्बाती हो जाते हैं। हालांकि यह समस्या अब हिंदू भाइयों में भी बड़े स्तर पर फैल चुकी है और वो बाद पीड़ित हिन्दू होने पर आग बबूला हो जाते हैं, बिना हक़ीक़त को जाने कि कौन गलत था और कौन सही। हिन्दू, मुसलमानों में ऐसी ही सोच या बर्ताव को कट्टरपंथ कहते हैं।

नबी ने क़ुरैश के साथ सुलैह हुदैबिया करी। एक शर्त थी कि क़ुरैश से भागे हुए लोगों को मदीना में पनाह नहीं दोगे मगर मदीना से भागे लोगों को क़ुरैश पनाह दे सकते हैं। ये ज़्यादती नबी ने मानी क्योंकि उन्हें बेहतर मुस्तक़बिल बनाना था, जबकि मुस्लमान इस वक़्त क़ुरैश से ज़्यादा ताकतवर थे। फिर जब अबु बसीर, अबु जंदल जैसे कई मुस्लिम क़ुरैश से भाग कर आये तो नबी ने उन्हें पनाह देने से मजबूरन मना करना पड़ा। ये ज़्यादती उनके साथ नबी ने होने दी क्योंकि ऐसा वादा था और बेहतर माहौल बनाने के लिए ज़रूरी था। वो लोग रोते पीटते हुए सेहरा में रहने लगे और क़ुरैश के काफिलों पर हमला करने लगे। क़ुरैश ने ये शर्त  खुद खत्म कर दी कि उन लोगों को मदीना बुला ले, वो बेहतर है, क़ुरैश को नुकसान उठाना हो रहा है। ऐसी कई ज़्यादती भरी शर्ते नबी ने मानी और कई लोगों के साथ नाइंसाफी होने दी क्योंकि आपको कुछ वक़्त तक अमन क़ायम रखना था। नतीजा ये हुआ कि इससे पहले के अनेकों सालों में जितने मुस्लिम नहीं बने थे, इस शांति के माहौल में उससे कई गुना तादाद में मुस्लिम बनने लगे।

ये है अल्लाह की ताईद और ये है सुनन्त। क्या मुस्लिम आज के माहौल में ऐसा करंगे? शायद कभी नहीं? मुसलमानों में बर्दाश्त की उतनी ताकत नहीं है, और न ही वो इतने दूरंदेशी है। हालांकि बहुत से मुस्लिम में अब बदलाव आ राह है मगर वो नाकाफी है। समस्या हमारी तरबियत, ज़हनियत, मज़हबी सिलेबस, असल दीन के टुकड़े करके बना लिए गए फैब्रिकेटेड मज़हब में हैं।

असल में जब देश आपस में लड़ते हैं तो कौन सही है और कौन गलत कहना मुश्किल होता है। अंदरूनी सच्चाई मालूम करना आसान नहीं होता। किसके पहले उकसाया, किसने क्या पहले साज़िश रची, इसकी हकीकत आम लोगों तक नहीं पहुँच पाती। इसलिए ऐसे मौकों पर जो सच दिखाई दे रहा है, उसे ही मान कर आगे बढ़ना चाहिए ताकि भविष्य में शांति हो। शांति होगी तो एक दिन हुई ज़्यादतियां भी दूर हो जायेगी और सच्चाई भी बाहर आ जायेगी। बाल में से खाल निकालना फिलहाल मुसलमानों के लिए फ़ायदेमंद नहीं है।

पहले इंसाफ होगा और फिर अमन ऐसा कहना जहालत है। पहले अमन क़ायम होता है और फिर इंसाफ भी मिलता है। यही दुनिया का दस्तूर है चाहे नबी की जंगे हो या दोनों आलमी जंगे या बाकी जंगे।

ज़ुल्म, तो किसी भी फौज से हो सकता है। ज़ुल्म के खिलाफ बोलना फ़र्ज़ है (अगर ये बस में नही हो तो कम से कम दिल मे बुरा जानना)। मगर कब कंहा कैसे ये बात करनी है, इसका शऊर होना बहुत ज़रूरी है। ऐसा नहीं हो सकता कि बिना जगह- वक़्त देखे बोलता फिरे। वरना कहने वाला बंदा ही सबका दुश्मन बन आएगा। इसलिए जंग के माहौल में अज्ञानता, नासमझी, जज़्बातों में न बहा जाए। ये जंग लड़ने वालों दोनो पक्षों और उनकी जनता सब पर लागू होती है। 


पहलगाम और आतंक।

पहलगांव में जो हुआ, वो बढ़ा भयावह है। दुवा है कि किसी को ऐसा दिन न देखना पड़े। हम सभी दुखी है और पीड़ितों के साथ हमदर्दी रखते हैं। दोषियों को दर्दनाक  मौत की सज़ा होनी चाहिए।

मगर इस दुख की घड़ी में राइट विंग आईटी सेल बेशर्मी से इतना सर्किय हो गया है कि आम लोग भी खुल कर इस्लाम, मुसलमानों के खिलाफ अपना ज़हर उगल रहे हैं। लोग कह रहे हैं कि जाति नहीं धर्म पूछ कर मारा गया है। ज़ाहिर है उनके लिए यह राजनीती रोटियां सेंकने का उपर्युक्त समय है।

एक वीडियो में ज़रूर एक ज़ख्मी लड़की ने बताया कि धर्म पूछा गया था मगर बहुत से विक्टिमस ने ये भी कहा कि नहीं पूछा गया था या उन्हें नहीं मालूम। ज़ाहिर है भगदड़ और फायरिंग में कंफ्यूजन हो ही जाती है। वैसे मरने वालों में एक लोकल मुस्लिम भी था जो आतंकवादियों से भिड़ने की कोशिश कर रहा था।

आतंकियों द्वारा लोगों का नाम- धर्म पूछना संभव है क्योंकि इसके बिना उनका मकसद पूरा ही नहीं होता। क्योंकि ये खबर फैलने से देश में धर्म आधारित खाई जो पैदा होगी। इधर और उधर दोनों तरफ के कट्टरपंथीयों के लिए ऐसे हमलों-हादसों धर्म ऐसे बीच में आने पर ही फायदा होता है। 

इसके पीछे किधर वाले हैं, कौन लोग हैं, हमेशा राज़ भी रह सकता है। राजनीति कुछ भी करवा सकती है। अमरीकी VP इंडिया दौर पर है। भारत को अपने खेमे में लेने के लिए ऐसी घटनाएं बेहद असरदार होती हैं क्योंकि राजनीतिक दबाव बनता है। 2020 में जब ट्रम्प आया था तब दिल्ली दंगों से देहलाई गयी थी। 2000 में बिल क्लिंटन के दौर के समय में भी कश्मीर में 35 सिक्ख मारे दिए गए थे। इसी 17 तारीख को PM की श्रीनगर विज़िट कैंसिल करी गई है जो 19 को होनी थी। पुलवामा की सच्चाई आज भी बाहर नहीं आ पाई है। क्या इन बातों को नजरअंदाज कर दिया जाए?

ऐसा प्रोपगंडा किया गया था कि नोटबन्दी, 370 निरस्ती के बाद आतंकवाद की कमर तोड़ी दी गई है। फिर हमला क्यों? दूसरी ओर सेना में भर्तियां बंद है, एक बल को डबल चार्ज संभालना पड़ रहा है। देश की सुरक्षा के साथ ये कॉम्प्रमाइज़ क्यों? रिपोर्ट्स बता रही हैं कि हमले के इनपुट्स पहले ही प्रापत हो चुके थे, आतंकी 2 हफ्ते पहले भारत की सीमा में घुसे थे, उन्होंने हमले से पहले वंहा रेकी भी करी थी, चालीस मिनट तक वो खुले आम गोलियां बरसाते रहें और फिर हमला करके सरहद पार पाक चले गए। क्या ये हमारी सुरक्षा एजेंसियों की असफलता नहीं है? कश्मीर में सबसे ज़्यादा सेना की तैनाती है। फिर भी इतने सेंसिटिव एरिया में जंहा 2000 लोग मौजूद थे, वंहा पर कोई सुरक्षाकर्मी नहीं होना, क्या गलती नहीं? ऐसे कई सवाल है जो मीडिया- संघियों में से कोई अपने आकाओं से पूछना नहीं चाह रहा। आम जनता तो पहले से ही व्हाट्सएप पर दिए जा रहे ज्ञान को परमसत्य मान के आगे बढ़ा रही है।

ऐसे हमलों से कश्मीरियत और वंहा के टूरिज़्म, जो बहुतों की कमाई का जरिया है, को बहुत बड़ा नुकसान होता है। वंहा के लोग इस हमले के खिलाफ हैं और पीड़ितों की भरसक मदद कर रहे हैं। होटल, गाड़ियों, खान पान वगैरह के पैसे माफ कर दिए हैं। वंहा फंसे टूरिस्ट कश्मीरियों का दिल से शुक्रिया अदा कर रहे हैं। जबकि वंहा वापसी के टिकट एयरलाइन्स ने 3 गुना तक बढ़ा दिए हैं। बताओ कौन है देशद्रोही?

अब कश्मीरियों को भी पूरी तरह अहसास हो चुका है कि उनका भला भारत के साथ ही है। वंहा हर जगह इस हमले की निंदा की जा रही है। देश का मुस्लिम समाज भी खुल कर इसके खिलाफ अपना गुस्सा जाहिर कर रहा है और दुवा कर रहा है। मगर संघियों को ये नहीं दिखता और न वो देखना चाहते हैं। व्हाट्सप्प उनके अपने धर्मांध फारवर्डस के लिए है बस।

इस्लाम का नाम लेके क़त्ल करने वाले लोग इस्लाम के दुश्मन हैं। मगर क्या ऐसे लोग सिर्फ इस्लाम धर्म मे हैं? पहले भी और खासतौर पर पिछले 10 सालों में क्या लोगों का धर्म, नाम पूछ कर मुसलमानों को नहीं मारा गया? क्या उनके कपड़ो, हुलिए, दाढ़ियों, टोपियों, हिजाबों वगैरह को देख कर नहीं मारा- पीटा गया? क्या मुसलमानों को हिन्दू धर्म के नारों को लगवा कर प्रताड़ित नहीं किया गया? ऐसे हत्यारें हिन्दू धर्म के ही दुश्मन हैं। क्या मुसलमानों के उनके धर्म के आधार हर तरह का अन्याय नहीं हो रहा? बिल्कुल हो रहा है, जिसे शक है गूगल कर ले।

धर्म के आधर पर हिन्दू मरे या मुस्लिम या सिक्ख या कोई और, इसे कभी बर्दाश्त नहीं किया जा सकता। न ही कोई भी धर्म मासूमों की हत्या की बात कहता है। हर धर्म के ऐसे हत्यारे, बलवाई इंसान कहलाने के लायक ही नहीं। शिक्षित, सभ्य समझदार लोगों की तरह व्यवहार करें। भावनाओ में न आये। सोच विचारे करें कि  जो आपको बताया या दिखाया जा रहा है, क्या वो पूरा सच है?


दिल्ली चुनावी नतीजे और मुसलमान।


भारत मे फिलहाल धर्म की राजनीति का बोलबोला है जो भाजपा की देन है। अगर कोई पार्टी इसी इस लाइन पर चलकर भाजपा की तरह सीट निकालने या सरकारें बनाने का गुमान रखती है तो यह उनकी बड़ी भूल है। इस रास्ते से अन्य पार्टियां बस अपनी डेमेज को कम कर सकती हैं, इससे बढ़कर कुछ नहीं। ये पार्टियां जितना ज़्यादा धर्म का ढोल पीटती हैं, अंतिम परिणामों में उतना फायदा भाजापा को होता है। यह भाजपा की पिच है, इस पर भाजपा ही स्कोर कर सकती है।

भारत में मुस्लिम अल्पसंख्यक हैं और साथ ही फिलहाल जारी धर्म के नाम पर करी जा रही राजनीति की आग का ईंधन हैं। इसलीए अगर कोई मुस्लिम नेता सेक्युलर पार्टियों में शामिल हुए बिना अलग से चुनाव लड़ते हैं या सेक्युलर पार्टियों के साथ में आए बिना अपनी आइडेंटिटी की बुनियाद पर राजनीति करता है तो इससे अंत में भाजपा को ही फायदा पहुंचता है। यंहा सेक्युलर मतलब सेक्युलर लाइन पर राजनीति करने वाली गैर भाजपाई पार्टियां से हैं, भले ही वो अंदर से सेक्युलर न हो। ऐसे मुस्लिम नेता और पार्टियां भाजपा की तरह ही धर्म की राजनीति करके भारत जैसे देश में आज के माहौल में मुसलमानों के लिए परेशानी बढ़ाने के सिवा कुछ नहीं कर सकती।

जो लोग कह रहे हैं भाजपा आने से मुस्लिम न डरे, या मुसलमानों ने भाजपा को हराने के ठेका नहीं ले रखा या मज़हब के आधार अपनी क़यादत खड़ी करो वगैरह वगैरह, ऐसे लोगो को चाहिए कि फिर वो मुसलमानों से सीधा सीधा कह दें कि भाजपा के वोटर बन जाये। क्योंकि इन दोनों रास्तों से परिणाम एक ही आना है। दूसरी स्तिथि में कम से कम भाजपा में मुस्लिम शामिल तो होंगे, जिसके बाद वो मुस्लिम इलाको में दौरे भी करंगे और शायद मुसलमानों को किया जा रहा राजनैतिक बॉयकॉट भी कम हो जाये क्योंकि ऐसे में मुसलमान भी भाजपा के वोटर होंगे। मगर ये लोग, ऐसा भी कभी नहीं कहंगे और अपना पुराना ही राग अलापते रहंगे। नतीजतन धर्म की राजनीति होती रहेगी जिसकी वजह से मुसलमानों राजनीतिक अछूत बने रहंगे, सामाजिक स्तिथि गिरती रहेगा और उनकी समस्याएं बढ़ती ही रहेंगी।

मुस्तफाबाद वाली सीट चली गयी। वंहा के लोगों की मर्ज़ी यही थी। ओखला की सीट जाने से बची। वंहा के लोगों ने बात संभाल ली। हर क्षेत्र के लोगों को हक़ है जिसे चाहे जितवाये, आख़िर अच्छा या बुरा उनको ही झेलना है। बाहरी लोगों को यह हक़ हासिल नही कि वो सोशल मडिया पर दिन रात चिल्लाते फिरे कि फला जगह से मीम को जितवाओ या फला जगह मज़लूमों को जितवाओ। इस चिल्ला पो से भाजपा का वोट और ज़्यादा कंसॉलिडेट होता है, उनकी सरकारें बनती हैं। कब्र का हाल मुर्दा ही जाने, ऐसे हालातो में उन्हें ही फैसला लेने दें। एक दो विधायक जितने भर से मुसलमानो की परेशानियां खत्म नहीं होने वाली। आखिर सरकारें ही सब कुछ निर्धारित करती हैं, अन्य पार्टियों के एक दो विधायक की कोई हैसियत नहीं। अब भाजपा सरकार ही हर फैसला लेगी दिल्ली में, वो जो चाहे करेगी। वो आप की सरकार की तरह नहीं होगी। मुस्लिम सोशल मीडिया वारियर ज़रा चैन की सांस ले, वो मुस्लमानो के ठेकेदार नहीं है जो चाहंगे, हम वह करंगे।  

माना अमानतुल्लाह ने करप्शन किया मगर आप पार्टी में वो मुसलमानों की आवाज़ रहा है और बहुत से काम सरकार से उसने मुसलमानों के लिए करवाये हैं। यह सही है कि ताहिर और शिफा पर जुल्म हुआ है मगर क्या उन्हें चुनाव जितवाने से इलाके की या इनकी परेशानियां खतना हो जायेगी, क्या उनके मुकदमे खत्म हो जायँगे, क्या वो अपने क्षेत्र के काम करवाने के लिए रिहा कर दिए जायँगे, नहीं, इनमें से कुछ नहीं होना था। उनकी मदद के दूसरे उपाय किये जाने की ज़रूरत थी, न चुनाव लड़ाई जाने की क्योंकि उन्हें सभी या ज़्यादातर ब्लॉक से वोट मिलना ही नहीं था। 2 सीट पर की गई यह जज़्बाती हवाबाजी देश के आने वाले तमाम चुनावो में मुसलमानों की स्तिथि को और कमज़ोर करेंगे, ये यकीनी है। इसका मतलब यह नही है कि मुसलमानों की वजह से दिल्ली में हार हुई है। मुसलमानों ने आप को भी पूरी तरह वोट दिया है। हिन्दू वोट धड़ा ही आप से छिड़का है। मगर मुसलमानों में इस चुनाव में बड़ी गैरजिम्मेदारी और जज़्बातों से हिस्सा लिया है और आज के हालातों में इससे होने वाले नुकसान हिन्दू तबका तो बर्दाश्त कर सकता है मगर मुस्लिम कभी नही क्योंकि हाशिये पर वही हैं।

दिल्ली में इस बार भाजपा ने धर्म की बजाय अन्य मुद्दों को आधार बनाया मगर नींव में धर्म ही था। क्योंकि यही दिल्ली वाले ऐसे ही मुद्दों पर मोदी सरकार को नहीं कोसते हैं मगर केजरी की सरकार को ठेल देते हैं। इनकी आंखें भाजपा की ओर से बंद हैं। 2024 के दिल्ली के चुनावी आंकड़ों से ही मालूम पड़ गया गया था 2025 में क्या होने जा रहा है। तब भी भाजपा ने यंहा सारी सांसद सीटें आसानी से निकाली थी जबकि अन्य कई राज्यों में भाजपा को झटके लगे थे। जबकि दिल्ली वालों को पढ़ा लिखा वोटर माना जाता है मगर ये सैफ कहने भर की बात है, यंहा इतनी जहालत है कि यही लोग दिल्ली के दंगों में खेल समझ कर कूद गए थे क्योंकि आंखों पर कट्टरता की पट्टी जो चढ़ी हुई है। दिल्ली के अंधभक्त महज़ 10 महीनों में अंधभक्ति नहीं छोड़ेंगे, यह साफ था। ईवीएम मशीन और वोटर लिस्टों में गड़बड़ी से ज़्यादा लोगों के दिमागों में दक्षिणपंथी विचारों ने गड़बड़ी कर रखी है। हालांकि आप की वोट संख्या ज़्यादा नीचे नही गयी है।

यह सही है कि केजरीवाल ने दिल्ली दंगों में वैसा नहीं किया जैसा किया जाना था। मगर ये काम तो आज हर पार्टी कर रही है। कोई भी खुलकर मुस्लिमों का पक्ष लेने वाला नही है। किस किस से रूठेंगे और किस किस के पास जायँगे। कोई 20 है तो कोई 18, आपको फैसला लेना है कि आपका नुकसान करने वालों को सत्ता में लाना है या उन्हें जो आपको ज़मीन में गाड़ने को आमादा है। हिंदुत्व का जवाब निष्पक्ष हिन्दू ही हैं, न कि मुसलमान।

यह सही है कि केजरीवाल संघ का ही मोहरा था जो आंदोलन के बाद सही मौका पाते ही संघ का खेमा छोड़कर, अपनी पार्टी खड़ी करके सिंहासन तक पंहुचा और उन्हीं के सामने है। इसी तरह यह भी सही है कि ओवैसी भाजपा का मोहरा नहीं है मगर दोनों के बीच कोई अघोषित करार ज़रूर है। क्योंकि ओवैसी को तमाम भारतीय मुसलमानों का नेता बनना है और भाजपा को हिंदुओं के एकजुट रखने के लिए मुसलमानों के नाम पर राजनीति करने वाले ओवेसी जैसे नेताओं की सख्त जरूरत होती है। असल में ये दोनों एक दूसरे से पूरक है। इसलिए भाजपा कभी ओवेसी के खिलाफ एक्शन लेते हुए नहीं दिखती और मजलिस हमेशा मुस्लिम बहुल इलाकों में ही टिकट बांटती हुई दिखती है। केजरी हो या ओवेसी, सियासी या जाति फायदों के लिए दोनो भाजपा से डील कर सकते हैं, कोई दूध का धूला नहीं है। इसलिए जज़्बात से हटके मुसलमानों के अपने अस्तित्व के लिए सेक्युलर दलों में ही रहना फायदे का सौदा नज़र आता है क्योंकि उनके साथ नुकसान कम है।

दिल्ली में लगभग दर्जन भर सीट में कांग्रेस को जितना वोट मिला अगर वो आप को मिलता तो आप जीत जाती। इसके अलावा आधा दर्जन सीट ऐसी है जिनमें आप और कांग्रेस दोनों का वोट मिलाकर, भाजपा के वोट से 2-4 हज़ार ही कम है, ज़ाहिर दोनो का अलायंस होता तो भाजपा की रुख जाने वाले वोटर इधर ही रुकते और ये सीटे भी भाजपा के पास नहीं जाती। यानी कम से कम 40 सीट आप, कांग्रेस निकाल ही लेते आसानी से। केजरीवाल ने अलायंस को ठुकराया, या कांग्रेस ने यह अलग मुद्दा है, कम कोई नहीं है, बस यह समझ लें।

सेक्युलर दलों की ज़मीन में ज़्यादा स्पेस नही है इसलिए इन्हें मिल जुल कर ही लड़ना होगा जिसके लिए ये लोग कभी तैयार नहीं होते हैं। जबकि भाजपा टॉप पर होने के बावजूद कम ही सही, अपने सहयोगियों को सीट देने को राजी हो ही जाती है। इस तरह से भाजपा को सत्ता में लाने के असल दोषी यही सेक्युलर पार्टियां हैं। मगर इनको चुनने के अलावा मुसलमानों के पास और रास्ता ही नहीं है क्योंकि एक तरफ दलदल है तो एक तरफ मौत का कुँवा। खाई से वापिसी हो सकती है, मौत के कुंवे से नहीं।

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इस बार के दिल्ली चुनाव में मीम के उम्मीदवार जीते या आप के मुस्लिम नेता, जो कुछ हो रहा है, उसके मद्देनजर मुस्तक़बिल में मुसलमानों की ओवरआल राजनैतिक स्तिथि और ज़्यादा बदहाल होते हुए नज़र आ रही है।

 

भाजपा का तीसरी बार आना

चुनाव के आँकड़े आ गए हैं। भारत का वोटर टर्नाउट रेशों की गिरा है और यूपी, दिल्ली में भी, कारण पर पहले ही बात हो चुकी है। यूपी फिर से धुरी साबित हुआ है। चुनाव से पहले बहुत से आशावादी लोगों को लग रहा था की विपक्ष ही सरकार बनाएगी। मगर जैसी उम्मीद थी, भाजपा सहयोगियों के संग सरकार बनाने जा रही है। इसी की ही अधिक संभावना थी। अब तथ्य और नम्बरस भी यही बता रहे हैं। कोई भी दुबारा चुनाव में जाना गांवरा नहीं करेगा। जोड़ तोड़, लेन देन भारतीय राजनीति में एक आम बात है। कॉंग्रेस आदि की सरकार बनना एक चमत्कार ही होगा और ऐसा न ही हो यही हर तरह से बेहतर होगा क्योंकि विपक्ष की मिली-जुली सरकार से ज्यादा भाजपा की मिली जुली सरकार ही जनता को होश में ला सकती है। 

नतीजे कुछ भी हो मगर मोदी की लोकप्रियता में कमी नहीं आई है। भाजपा ने 2014 के बाद 2019 में काफी बड़ा वोट शेयर बढ़ाया था। इस चुनाव में जादुई आंकड़ा न छूने के बावजूद भाजपा ने केवेल 1% वोट शेयर खोया है। मगर जिस पर लोगों का ध्यान नहीं जा रहा है, वो यह है कि इस चुनाव में भाजपा ने पिछले चुनाव के मुकाबले 70 लाख वोट अधिक पाए हैं। इसका मतलब है जनता की अंधभक्ति अभी भी पूरी तरह खतम नहीं हुई है। एमपी, गुजरात, झारखंड, छत्तीसगढ़, बिहार, उत्तराखंड, हिमाचल, दिल्ली, असम जैसे राज्य पूरी तरह भाजपा के ही रंग में रंगे दिखे। इसके अलावा, ओडिसा, तेलांगाना, आंध्रा में भी भाजपा ने झंडे गाड़े हैं। जबकि यूपी, हरियाणा, राजस्थान, महाराष्ट्र, कर्नाटक, बंगाल, आदि राज्यों में भाजपा बेहद कमजोर हुई है मगर खतम नहीं हुई है। भाजपा ने बड़े स्तर पर ईवीएम में गड़बड़ी करी होती तो नतीजे ये नहीं होते, असल में भाजपा ने जनता के दिमागों में गड़बड़ कर रखी है। 

कॉंग्रेस को पहले से ही इन नतीजों आभास था। असल में कॉंग्रेस 2024 के जरिए 2029 को भेदने के उद्देश्य पर काम कर रही था जो दूरंदेशी बात है। यही वजह है कॉंग्रेस मैनिफेस्टो और भाषणों में हवाई वादे किये गए थे क्योंकि उन्हे कभी पूरा करने की नौबत ही नहीं आने वाली थी। हालांकि इन्होंने यूपी आदि राज्यों की जनता का मन पढ़ लिया गया था मगर भारत में अन्य राज्य भी मौजूद हैं जो भाजपा के साथ ही जाते हुए दिख रहे थे। नतीजे विपक्ष के लिए जीत से अधिक राहत लेके आए हैं। 

दिल्ली के नतीजे चौंकाने वाले हैं। लगता है दिल्ली वालों के दिलों में मोदीजी और हिंदुत्व गहरा बेस हुए हैं। मगर फ्री का पानी, बजली, बस भी चाहिए तो केजरीवाल को क्षेत्रिय तौर पर वोट दे देते हैं। यही कारण है कि पिछले विधानसभा चुनावों में केजरी को जितवाते ही दिल्ली की एक आबादी दंगों में हिन्दुत्वादियों का साथ देने के लिए फ़ौरन सड़को पर आ गयी थी।

भाजपा के खिलाफ, महंगाई, बेरोज़गारी, आरक्षण विरोधी, संविधान विरोधी जैसे मुद्दे काम करे हैं। आम आदमी, मज़दूर, किसान, पहलवान जैसे वर्गों ने भी हवा बदलने में अपना असर छोड़ा है। आनन फानन में राम मंदिर प्राणप्रतिष्ठा, आंदोलन का पूरा श्रेय लेना, खास लोगों को कार्यभार सौंपना, और इन सबके विरुद्ध शंकराचार्यों की खुली नाराजगी ने यूपी आदि की जनता को भाजपा की नियत को समझाने में अहम भूमिका निभाई है। यूपी के कई इलाकों की जनता पूजा विधि, विधान और पीठों से गहरा जुड़ाव रखते हैं। 

आने वाले समय में गडकरी, योगी और शाह का टकराव संभव है। पीएम मोदी नहीं बन पाएंगे या 75 वर्ष के बाद रेटायर हो जाएंगे, ऐसा सोचना ही अपरिवपक्वता है। मोदी जी फिलहाल कहीं नहीं जा रहे और न जल्दी से जाएंगे। मोदी को योगी पसंद नहीं है और शाह की रणनीति के आधार पर ही मोदी ने योगी से टकराव को टाल दिया था। योगी को जनता दिल दिए बैठी है, इसलिए योगी का कद छोटा करने की मोदी और शाह की कोशिशें वोट बैंक पर असर डालती हैं, इन्डरेक्ट ही सही। योगी और संघ में हुई डील के तहत योगी अपना काडर खतम करके ही योगी सीएम बने थे। संघ योगी का हो चुका है मगर योगी पूरी तरह संघ के अभी तक नहीं हुए है। आने वाले समय में संघ योगी को ही भार देगा। क्योंकि मोदी संघ को पीछे छोड़कर आगे निकल चुके हैं और संघ के हाथ से बाहर हैं। यही कारण है नड्डा ने कहा था की भाजपा को संघ की जरूरत नहीं है।  गडकरी संघ और सभी दलों के चाहिते हैं मगर फिलहाल उनका कुछ नहीं हो सकता जब तक मोदी खेमा पूरी तरह कमोजर नहीं होता और जब तक ऐसी नौबत नहीं आती की अन्य पार्टियों के समर्थन के बिना भाजपा सरकार कतई न बना पाए। रही बात अमित शाह की  तो जब तक मोदी का शाह पर हाथ है तब तक शाह है, मोदी के बाद अमित शाह की पार्टी में कीमत 0 होगी क्योंकि शाह का तानाशाही रवैया खूद भाजपा नेताओं के गले नहीं उतरता और वे केवल मजबूरी में शाह को झेल रहे हैं। 

मिलीजुली सरकार धक्का स्टार्ट होती हैं, चलती बंद होती रहती है। इसलिए आने वाले 2/3 साल में समीकरण बदलेंगे। महाराष्ट्र, बिहार जैसे राज्यों में जहा भावी चुनाव होंगे, तब नए समीकरण बनना ही है। सरकार, पीम, गठबंधन बदलना ऐसे समय में कोई अचंभे की बात नहीं है और एक पार्टी के नेताओ में जारी की अंदुरुनी प्रतिस्पर्धा आदि भी अपना काम करती है। 
 

नाम तैमूर और बौद्धों, जैनियों पर अत्याचार

तैमूर शब्द का अर्थ लोहा है। अर्थ और उच्चारण की वजह से तैमूर नाम में एक आन झलकती है। इसीलिए शानो शौकत में लोग ऐसा नाम अक्सर रखते भी हैं। तैमूर लंग का यही नाम था इसलिए उसकी वजह से इस नाम में कोई खराबी पैदा नहीं हो गयी है। यह नाम तो उससे पहले से रखा जा रहा था। खराबी तब तो हो सकती है जब कोई मां बाप, बच्चे का नाम तैमूर लंग के कारण रखें, न कि इस नाम के अच्छे होने के कारण। भारतीय मुसलमान उसकी वजह से तैमूर नाम नहीं रखते हैं। अक्सर लोगों को तो पता भी नहीं होता कि तैमूर नाम का कोई राजा था या उसका इतिहास क्या था।

किसी राजा तैमूर कोई सिर्फ और सिर्फ हिन्दूओं का दुश्मन नहीं था, वो एक आक्रमणकारी लुटेरा राजा था। उसने मुस्लिम शासकों के खिलाफ भी युद्ध किये और मुस्लिम बहुल इलाक़ों जैसे अफगान, तुर्की, ईरान, इराक पर भी हमले किये। भारत में भी उसने हिन्दू राज्य होने के नाते नहीं बल्कि लूट के उद्देश्य से तुगलक सल्तनत पर हमला किया था।

अगर किसी बुरे व्यक्ति के कारण वो नाम बुरा हो जाता है तो क्या नाथूराम गोडसे के कारण राम नाम रखना गलत होगा? धरती को क्षत्रिय विहीन करने वाले परशुराम के कारण राम नाम रखना भी क्या गलत होगा? बहुत से समुदायों और विद्वानों द्वारा आर्यों को विदेशी आक्रमणकारी माना जाता है, तो क्या आर्य या आर्यन नाम रखना भी गलत होगा? हिटलर द्वारा स्वस्तिक चिन्ह का प्रयोग किये जाने से यह चिन्ह हिंसा, क्रूरता, नरंसहार का प्रतीक नहीं बन जाता।

गौड़ (बंगाल) के शासक शशांक ने 7 सदी में बौद्धों पर बहुत अत्यचार किये। हुन शासक मिहिरकुल ने भारत पर 5-6 सदी में आक्रमण किया और तबाही मचाई। दीपवंश, महावंश, राजवली और चीनी ग्रंथों में इसके द्वारा की बौद्धों की हत्याएं और बौद्ध स्थलों की बर्बादी उल्लेखित है। इसी तरह पुष्पमित्र शुंग ने 2 सदी ईसापूर्व बौद्धों पर कहर ढाया। महावंश, दिव्यवदन, अशोकवदन, कई बौद्ध सूत्र ग्रंथों और जैन आगमों में इसका उल्लेख है। इसने जैनियों पर भी बहुत अत्याचार किये थे। सिवस्कन्दरवर्मन, कृष्णदेवर्य, चोला साम्रज्य द्वारा भी जैनियों पर ऐसे ही अत्याचार करने के तथ्य पेश किए जाते हैं। तो फिर लोग इनके नामों में आ रहे शब्दों वाले नाम भी क्यों रखते हैं?

अंतिम बात, वेदों के अनेकों भाष्यकार हुए हैं, उनमें से एक रावण नाम के विद्वान भी थे जिन्होंने लगभग 1460 ई० में ऋग्वेद और यजुर्वेद का भाष्य किये थे। वह मेवाड़ के रहने वाले एक बड़े संस्कृत और धर्म के ज्ञाता थे। क्या किसी को इनका नाम रावण होने के कारण, इनका या इनके माता-पिता का अपमान करने का अधिकार मिल जाता है?

 

जय श्री राम नारा और लंगर आयोजन

लंगर शब्द फ़ारसी भाषा का है जिसका मतलब होता है, नाव या जहाज़ का एंकर जिससे पड़ाव डाला जाता है। जब मुस्लिम सूफी संत भारत आये तो रास्तों में जगह जगह पड़ाव डालते और कई जगह स्थायी डेरा भी डालते थे। हर जगह सूफी संत अपने मिलने वालों के लिए या आस-पास के ज़रूरतमंदों के लिए लंगर लगवाते थे, जो हर धर्म वालों के लिए होता था। गुरुदेव नानक जी भी सूफी संत सम्प्रदाय से थे। उन्होंने भी इस लंगर नामक व्यवस्था और नाम को आगे बढ़ाया और फिर एक समय बाद मुसलमानों को पीछे छोड़ते हुए सिक्खों ने इस लंगर व्यवस्था को इतना प्रचलित कर दिया कि लंगर और सिक्ख शब्द एक दूसरे के लगभग पर्यायवाची बन गए। कई जानकरी रखने वाले सिक्ख स्वयं यह बात कहते हैं कि सिक्खों ने लंगर मुसलमानों से लिया है।

भूखों, ज़रूरतमंदों को खाना खिलाना हर धर्म की मूल शिक्षाओं का अंग रहा है। किसी भी धर्म में ऐसी कोई शर्त नहीं लगाई गई है कि केवल अपने धर्म वालों को खिलाना है या उनसे कोई धार्मिक कार्य करवा कर मदद करनी है।

मुसलमानों ने कभी भी किसी सामाजिक सेवा के बदले अपने धर्म के नारे कहलवाने की शर्त नहीं रखी। कोरोना काल में मुसलमानों ने बिना किस भेदभाव के सभी धर्म-जाति के ज़रूरतमंदों की मदद करी, एक ऐसे वक्त में जब लोग अपने परिवार वालों तक की अर्थीयों तक को हाथ लगाने को तैयार नहीं थे।

किसी की मदद करते हुए, उससे अपने धर्म की कोई उद्घोषणा करवाना एक निहायत ही नीच कार्य है। अगर यही काम किसी मुस्लिम ने किया होता कि बोले अल्लाह हुकबर या मुहम्मद रसूलुल्लाह तो बवाल मच गया होता। ईसाई, सिक्ख आदि भी ऐसा कर रहे होते तो किसी को गंवारा नहीं होता। हालांकि एक सच्चा हिन्दू कभी ऐसा कोई नारा नहीं लगवाता है। ये तो हिन्दुत्वादियों की मानसकिता है जो ऐसा काम कर रहे हैं। हिन्दू और हिंदुत्वादी में बहुत अंतर है, एक धार्मिक उदारता का नाम है और दुसरा नफरती राजनीति का।

मेरे जानकर कट्टर भाजपाई है, वो बच्चों में धर्म के प्रति रुचि पैदा करने के लिए एक केम्पेन चलाते हैं  (मंशा भले ही राजनैतिक हो) जिसमें वो बच्चो से कोई भी मंत्र, श्लोक सुनके, उन्हें एक गिफ्ट देते हैं मगर जब उनके पास कोई मुस्लिम बच्चा आता है तो वो उससे अपने मज़हब, क़ुरान की कोई आयात, कलमा सुनाने को कहते हैं। यह भी तो एक तरीका है राजनीति और सेवा के साथ साथ दुसरो को भावनाओ का खयाल रखने का।

जो लोग यह कह रहे हैं कि उस महिला को जय श्री राम बोल देना चाहिए था या लाइन से हट जाना चाहिए था, सो ठीक है, ऐसा किया जा सकता था मगर वो लोग यह नहीं समझ रहे हैं कि अगर हर कोई सेवा से पहले अपने धार्मिक नारे बुलवाने लगा तो यह इंसानियत की मौत होगी और इन शर्तों का कोई अंत नहीं होगा, बात कंही जा कर नहीं रुकेगी ही नहीं। कल को संघी लोग वितरण से पहले कहे कि फला-फला धर्म के ईष्ट या महापुरुष या ग्रंथ को गाली दो तो उन्हें कौन रोकेगा? क्योंकि आज भी ये लोग अपनी सभाओं, भाषणों, विडीयो में और सोशल मीडिया पर गालियां दे रहे हैं। धार्मिक नारे तो छोड़िए, क्या भाजपा के लोग अन्य पार्टीयों के कार्यकर्ताओं के जनता लंगर में जय गांधी, जय नेहरू, जय केजरीवाल, जय ममता कह देंगे, अगर वो कहलवाने पर आएं?

दूसरी बात, जय श्री राम अक्सर मुसलमान इसलिए नहीं कहते क्योंकि श्री राम को विष्णु जी का अवतार माना जाता है और पूजनीय के रूप में उनकी जय-जयकार करी जाती है। जबकि इस्लाम धर्म में केवल एक ईश्वर को ही पूजा के योग्य बताया गया है और केवल उसी की भक्ति करने को कहा गया है। मुसलमान अपने धर्म के विरुद्ध नहीं जाना चाहते, यह उनका अधिकार भी है। इसलिए अक्सर मुसलमान दूसरे धर्मों के भगवानों (ईश्वर से इतर) की भक्ति, गुणगान आदि में सम्मिलित नहीं होते, हालांकि अन्य सभी धर्मों और मान्यताओं का सम्मान करते हैं और किसी के देवी-देवता को बुरा नहीं बोलते। वैसे जय श्रीराम नारे में कोई शिकरिया बात नहीं है मगर ज़बरदस्ती बुलवाना ही क्यों? बल्कि श्रीराम के नाम पर ऐसे काम करो कि लोग खुद ही मन से जय श्री राम कह दें, मगर ऐसे काम संघी करेंगे नहीं।

तीसरी बात यह है कि जय श्री राम असल में एक धार्मिक नहीं बल्कि राजनैतिक नारा है। कुछ दशकों पहले यह नारा प्रचलित नहीं था। बल्कि राम-राम, जय सियाराम जैसे नारे प्रचलित थे। यह नारा संघ द्वारा राजनैतिक उद्देश्य के तहत जारी किया गया राम मंदिर के संबंध में। आप कभी भी इन लोगों को धार्मिक सद्भाव उत्पन्न करने वाले नारे लगाते हुए या लगवाते हुए नहीं देखोगे क्योंकि उनसे इनकी राजनैतिक रोटियां नहीं सिकती।

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डॉक्टर ZN और उनकी ओपन डिबेटस में वापसी - एक विश्लेषण।

ताज्जुब की बात है कि डॉक्टर साहब में पिछले एक दशक में एक 'तथाकथित' इस्लामी वक्ता या उपदेशक के रूप में ज़रा भी सुधार नहीं आया है। जिस स्टाइल से वो पहले तकरीर देते थे, आज भी वैसे ही देते हैं बल्कि उनके स्तर में पहले के मुकाबले गिरावट आयी है। यंहा तक कि उनके साहबज़ादे जो अब न जाने कैसे शेख कहलाते हैं, उन्होंने भी कुछ बेहतर करने की बजाए, अपने वालिद साहब का 30 साल पुराना स्टाइल हूबहू कॉपी कर रखा है जो कि आने वाले वक्त के लिए कतई अच्छा संकेत नहीं है। इसके अलावा सवाल पूछने वालों के प्रति डॉक्टर साहब का व्यवहार आज भी बिना किसी बदलाव के पहले जैसा ही रूखा है। अक्सर गुस्सा भी कर रहे हैं और माइंड प्रोसेसिंग भी पहले जैसा नहीं दिख रही है। इनके सबके पीछे कई वजह हो सकती हैं जैसे उम्र का बढ़ना, वक़्त के साथ बदलने की ज़रूरत न समझना, दूसरी अच्छी फिकरों से कुछ खास न सीखना,वगैरह। इनमें कुछ वजह काबिले कुबूल हैं मगर सभी नहीं।

डॉक्टर साहब की दीन की समझ या फ़हम भी पहले से बेहतर नहीं हो पाया है, इसकी वजह शायद वो ठहरी हुई सलफ़ी फिक्र या नज़रिया है, जिससे वो शुरुवात से ही जुड़े भी रहे हैं और देश छोड़ने के बाद जिसकी सीधी छत्रछाया में जाने के अलावा डॉक्टर साहब के पास और कोई चारा भी नहीं था।

आज दुनिया बदल चुकी है, लोगों को अपने धर्म पर उठने वाले सवालों के जवाब, धर्म परिवर्तन में इस्तेमाल होने वाले पैतरों का इल्म है। ये बातें सोशल मीडिया घर घर तक पहुँच चुका है। एक्स मुस्लिम, मुल्हिदों और हिंदुत्वादी प्रोपगेन्डिस्ट लगातार सालों से इस्लाम, मुसलमानों के खिलाफ काम करने में लगे हुए हैं और लोग उनका काम सराह रहे हैं। आज के दौरे में लिबरल मुस्लिम रिवायती मज़हब और कमज़ोर अक़ाइद की धज्जियां उड़ा रहे हैं, वो अलग, हालांकि वो ठीक कर रहे हैं। ऐसे में डॉक्टर साहब या किसी भी पुराने विचारों के दायी, आज काठ की हांडी फिर से नहीं चढ़ा सकते। अब ये बहस तो कर सकते हैं मगर पहले की तरह बल्क में रिवर्ट नहीं। डॉक्टर साहब यह समझने में नाकाम रहे हैं कि अब यह वो 25 साल पुरानी दुनिया भी नहीं है।

मुक़म्मल दाई के तौर पर डॉक्टर साहब में हमेशा से ही कई मूलभूत बातों की कमी थी इसलिए वो शुरवात से ही एक दायी कम बल्कि एक डिबेटर ज़्यादा थे। यह बात मौलाना वाहिद्दुदीन खान सहाब जैसे कई उलेमा साफ कह चुके हैं। इस्लाम की अच्छी जानकरी रखने वाला कोई भी इंसान डॉक्टर साहब के इल्म में गहराई और तहक़ीक़ की कमी साफ उंगली रख कर बता सकता है। मगर फिर भी उन्होंने जज़्बाती मुसलमानों के दिलों में अपना एक खास मुक़ाम बनाया है और दुनिया में अपनी एक छाप छोड़ने में कामयाब रहे हैं, इसका इनकार नहीं किया जा सकता। उन्होंने लोगों की सबसे ज़्यादा दावत की तरह तवज्जो दिलवाई है, मगर साथ ही गलत दावती तरीको को और कॉपी पेस्ट वारियर को बढ़ाने का काम भी किया है। उनके द्वारा रिवर्ट हुए कई लोग और उनके स्टूडेंट्स तक ऐसा मानते हैं जो पछताने के बाद उनसे अब दूर हो चुके हैं।

जैसा कि सुनते आए हैं कि अमूमन हर सदी में एक बड़ा आलिम होता है। उसी तरह जिस वक्त डॉक्टर साहब का टाइम था, उस टाइम और माहौल के हिसाब से वो ओवरऑल लाजवाब थे। आज के दौर में डॉक्टर साहब से हर लिहाज से बेहतर उलेमा, मुहक्कीक और दायी मौजूद हैं और आज लोग इन्हें  सुन रहे हैं, पढ़ रहे है। मगर फिर भी इनकी ताईद करने वाले लोग कम हैं। इनकी तरफ लोगों की तवज्जो इसलिए ज़्यादा नहीं है क्योंकि वो रिवायत के तौर पर चले रहे महजब की हदों को तोड़कर सही इस्लाम पेश कर रहे हैं जो करना ही चाहिए। जबकि डॉक्टर साहब अक्सर इन रिवायती मज़हब की दीवारों को फांद नहीं पाए या शायद चाहा ही नहीं।

डॉक्टर साहब का पाक जाना उनके लिए एक भूल और वंहा ऐसे (शरीयत का नफ़ाज़, इस्लामिक मुल्क वगैरह जैसे कई आपत्तिजनक) बयान देना भारतीय मुसलमानों के लिये एक गलती साबित हो सकता है। ऐसे माहौल (जब चुनाव का वक़्त भी था) में उनके पाक जाने की टाइमिंग भी हैरान करने वाली है। इन सब बातों से भारत में चल रहे सांप्रदायिक तनाव में और ज़्यादा बढ़ोतरी हो सकती है। शायद जल्द ही हम इसके दुष्परिणाम देखने को मिले।

सूचना के लिए बता दूं कि मैं उन्हें 2002-2003 से सुनता-पढ़ता आ रहा हूँ, जब वो इतने लोकप्रिय नहीं थे और लगभग अगले 10 साल तक उनकी हर वीडियो और किताब से गुज़र चुका हूँ।

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बंगलादेश उपद्रव (राजनैतिक या धार्मिक) में दिखाई देते हिन्दू- मुस्लिमों के दोहरे मापदंड।

 

हिन्दुत्वादियों का हमेशा से भारतीय मुसलमानों से यह प्रश्न रहा है कि तुम दूसरे देश के मुस्लिमों के लिए चिंतित क्यों रहते हो, उनसे लगाव क्यों रखते हो। जबकि यही काम हिन्दू भी करते हैं, वो आज बंगलादेश के हिंदुओं के लिए बेहद परेशान हैं और मुहिम चला रहे हैं। इससे पहले भी पाक, अफगान आदि देशों के अल्पसंख्यक हिंदुओ के लिए भारतीय हिन्दू आवाज़ उठाते रहे हैं।

हिन्दुत्वादियों के द्वारा हमेशा से भारत में दक्षिणपंथी शासन स्थापित करने की और धर्मनिरपेक्ष पार्टीयों को निशाने पर रखने की पुरजोर मेहनत होती रही है। मगर यही लोग बंगलादेश में दक्षिणपंथी लोगों के द्वारा धर्मनिरपेक्ष रुख रखने वाली सरकार (तथाकथित ही सही।शेख हसीना तानाशाही की राह पर चल पड़ी थी और उनके विरोधी भी धर्म आधारित राजनीति कर रहे थे।) को उखाड़ फेंकने पर आज चिल्लम-ची मचा रहे हैं।

राजनैतिक अस्थिरता में सरकारी या निजी संपत्ति की लूटपाट गलत बात है मगर यह एक आम बात भी है। हिंदुत्वादीयों द्वारा बांग्लादेश में जारी इस तरह की छीना-झपटी पर मज़ाक उड़ाया जा रहा है जबकि भारत के हिन्दू खुद अपने देश में मौका मिलने पर ऐसी उठाईगिरी अक्सर दिखाते आये हैं। आज भी सड़क पर एक्सीडेंट के बाद किसी गाड़ी का सामान भारतीय दो मिनट में सफ़ा चट कर देते हैं। अपने प्रतिद्वन्दियों के प्रतीकों का (विशेषकर स्त्रियों का) अपमान भी लोग हर जगह करते ही हैं जो कि गलत है। इसलिए हिन्दुत्वादियों को चाहिए इन घटनाओं को धर्म के चश्में से न देखें और अपने गिरेबान में भी पहले झांके कि वो भी यही करते हैं।

बंगलादेश में अल्पसंख्यकों नरसंहार नहीं हो रहा है जैसा हिन्दुत्वादियों का हमेशा की तरह फर्जी प्रचार किया जा रहा है। यह सत्य है कि वंहा के मुसलमानों ने बहुत से हिंदुओ और उनके स्थानों की रक्षा करी है।  मगर छोटे मोटे स्तर पर वंहा हिंदुओ का उत्पीड़न तो रहा है और पलायन भी, इसका इनकार नहीं किया जा सकता। इसके दो कारण हैं जो ऐसे माहौल में हमेशा होते ही हैं, पहला कि यह अधिकतर राजनैतिक हिंसा है (क्योंकि पूर्व सरकार को वंहा के अल्पसंख्यकों का समर्थन प्राप्त था और अधिकतर सरकार से जुड़े मुस्लिम-हिंदुओ पर हमला हुआ है। शेख हसीना के भारत आने के बाद हिंदुओ पर हमलों में इज़ाफ़ा हुआ है।) और दूसरा कारण है, मुस्लिमों में विद्मान कट्टरता।  मुस्लिम में भी दूसरे धर्मों के खिलाफ अक्सर ऐसी कट्टरता निकलती हुई कई मुस्लिम बहुल देशों में देखने को मिल जाती है (सभी धर्मों के अनुयायियों में कट्टरता विद्मान है, कंही कम कंही ज़्यादा)। इसलिए मुस्लिमों को बंगलादेश में ऐसी छुटपुट अल्पसंख्यक विरोधी हिंसा की कड़ी निंदा करनी चाहिए और नज़र अंदाज़ नहीं करना चाहिए जिस तरह वो भारत में हर छोटी से छोटी अल्पसंख्यक विरोधी हिंसा की निंदा और विरोध करते हैं।

पूरे विश्व की राजनीति पर आज दक्षिणपंथ छाया हुआ है। इससे आमतौर पर हिन्दू, मुस्लिम, ईसाई बहुल कोई देश नहीं बच पाया है। हर धर्म के अनुयायियों को यह समझना होगा। और विश्व स्तर पर सबसे पहले मुस्लिमों को यह समझने की ज़रूरत है कि इस्लामिक हुकूमत जैसी कोई चीज़ बनाने को इस दीन या दुनिया में खुदा ने नहीं कहा है और भारत के स्तर पर हिंदुओं को यह समझना चाहिए कि रामराज्य या हिन्दूराष्ट्र जैसी कोई चीज़ भी अल्पसंख्यक का दमन करके कभी नहीं बनाया जा सकती।

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 वक़्फ़ बिल और मुसलमान


वक़्फ़ एक बेहतरीन सिस्टम था। पर आज ये भ्रष्टाचार से भर चुका है। इस्लाम के नाम पर भ्रष्टाचार पर अज़ाब आना तय है। सरकार की मंशा सही नहीं है। इस पूरी क़वायद से सरकार दो फायदे हैं, पहला वक़्फ़ जैसी तमाम ज़मीनों को कब्जे में लेना और इसके नाम पर राजनीति की रोटियां सेंकना। उन्होंने इज़के ज़रिए एक तीर से दो निशाने साधे जो सही जगह लगे। 

मुसलमानों को अपने हक़ के लिए लड़ने का पूरा हक़ है। डेमोक्रेटिक तरीके से प्रोटेस्ट करने का भी। अपनी क़ौम के मसाइल पर स्टैंड लेना हर मुसलमान की ज़िम्मेदारी है। इसलिए सरकार को अपनी राय भेजना भी जायज़ तरीका है और अपनी आपत्ति जताना भी अच्छी बात है। मगर मुसलमानों की एक और ज़िम्मेदारी भी है। वो यही है कि मुसलमान इस बात का खास खयाल रखें कि इस तरह के सभी एक्शन से उन्हें नतीजे के तौर पर मक़सद हासिल हो जाये, न कि उल्टा हो जाये, और फायदे की बजाए नुकसान हो जाये। 

सरकार द्वारा मांगे गए सुझावों की पहल को रेफरेंडम में बदल देना, अपीलें करना, रैलियां करना, केम्पेन चलना, इनसे मुसलमानों को आज के माहौल में नुक़सान हो रहा है और आगे भी होगा। यंहा उन्हें सोचने की ज़रूरत है कि अपना प्रोटेस्ट कैसे बेहतर तरीके से दर्ज करवाये ताकि बात बढ़ने की बजाय, खत्म होने की तरफ जाए। हमेशा से ही मुसलमानों को अपने मसाइल पर इसी तरह का सेल्फ गोल बेस्ड रद्दे अमल रहा है। बिना सोचे समझे, जज़्बात में घरों से निकलना, काम कम हल्ला ज़्यादा करना। पिछले कई सालों में हमने अपनी तरफ उछाले गए छोटे से छोटे मुद्दे पर इस तरह से जवाब दिया कि बात का बतंगड़ बन गया और पूरी क़ौम का नुकसान हुआ। मुसलमानों ने इस बार भी फिर से इसे दोहराया है। क़ौम उनके प्रोपगंडा में फंस गई और अक़्ल से ज़्यादा जज़्बातों का सहारा लेके वक़्फ़ के मुद्दे पर भिड़ गयी। जवाब में उनकी तरफ से गांव गांव इतना प्रोपगंडा हुआ कि भाजपा ने हालिया चुनाव में जो ताकत खोई थी, वो फिर से लगभग वापिस हासिल कर ली है। 

क़ौम ने इस पर भी अपना वक़्त, पैसा, एफर्ट्स जाया करे हैं, उनके मेल से कोई नतीजा निकलना नहीं है और ही सरकार का फैसला बदलना है। अगर वाकई क़ौम अपने मसाइल को हल करना चाहती है तो बहुत से काम है करने वाले, बहुत से तरीक़े हैं। मगर वो सब इन्होंने छोड़ रखा है क्योंकि उसमें मेहनत लगेगा। ये आसान तरीका था खुद को मुसलमान साबित करने का कि बस एक क्लिक करके मेल भेज दिया और हो गयी ज़िम्मेदारी पूरी और बता दिया कि हमारे साथ गलत किया जा रहा है, शाबाश। इस ढीलेपन से तो काम नहीं बनेगा।

वर्क के लेक्चर, दरस, खुतबों, मीटिंग, डिस्कशन में कितनी बार बताया जा चुका है कि मुसलमान को भड़काया और बरगलाया जाता है, इस चाल को समझना है और   यूज़लेस काम नहीं करने हैं। इसके बाद भी हर बार जब कुछ वर्कर इसको नहीं समझ पाते हैं तो हंसी आती है जो बाद में गुस्से में बदल जाती है।

There is a difference between Referendum and Suggestion or campaign and legal opinion.

ये रायशुमारी नहीं ली जा रही है. जो ऐसा कह रहे हैं सबको अपनी दुकान चलानी है। इससे जल्दी ही बजप अपनी हाल ही में खोई ताकत वापस पा सकती है. ऐसे ही मुसलमानों तीन तलाक मुद्दा खड़ा करा था. 

ये सबसे आसान काम है. एक क्लिक किया और खुद को मुसलमानों ने साबित कर दिया। एक मैसेज फॉरवर्ड किया इमोशनल होकर और ज़िम्मेदारी उम्मत के फर्द के नाते पूरी हो गई। We are not here to do the bare minimum.
 

  

2024 और 2026

2019 आम चुनाव से पहले सेक्युलरवादी और मुस्लिम लोगों ने 2014 की तरह ही यह हवा बनानी शुरू करी कि भाजपा जा रही है। मगर इसके उलट पिछली बार से भी ज़्यादा सीटों के साथ भाजपा बनी रही। 2019 चुनावो से काफी पहले से ही हम तब भी यही कह रहे थे कि भाजपा कंहीं नहीं जा रही है। पिछले 2 बार के कई  राज्य चुनावों जैसे यूपी में भी हमारा यही मानना था कि भाजपा ही आ रही है और ऐसा ही हुआ।

2019 में भी कहा था कि अगर एक बार को मान भी लिया जाए कि भाजपा जा रही है तो वो आने वाले अगले चुनावों में और बड़ी जीत के साथ वापसी करंगे। क्योंकि एक तो उनका एजेंडा और प्रोपगंडा कभी बंद नहीं होगा जिसमें वो हिंदुओं को सेक्युलर सरकार (मुस्लिम हितैषी कहकर) के खिलाफ लामबंद करते रहंगे और दूसरा एन्टी इनकंबेंसी भी अपना काम करती है जैसे 2014 में कांग्रेस के खिलाफ भी किया था। 

इनके आइटिसेल के पास ऑन रिकॉर्ड 50 लाख से ज़्यादा व्हाट्सअप्प ग्रुप हैं। अनोफिशल और लोकल ग्रुप्स अलग हैं। देश की लगभग आधी वयस्क जनता इनके मेसज पढ़ती हैं। शाह ने 2018 में ही कहा था कि वो सच्चे -जूठे किसी भी मेसज को वायरल कराने की क्षमता रखते हैं. कहने का मतलब है कि इन्होंने evm मशीन से ज़्यादा लोगों के दिमाग हैक कर रखें हैं। 

पिछले चुनावों वाला हाल आज फिर से है, लोगों को लग रहा है भाजपा आसानी से सब खोने को तैयार बैठी है। जबकि राजनीति नेताओं का बिजनेस होता है और कोई भी इंसान आसानी से अपना धंधा बंद नहीं करता। हम पिछले कई महीनों से कहते आ रहे हैं कि भाजपा कंहीं नहीं जा रही है। इस चुनाव में उनके लिए दिक्कत ज़रूर है मगर वो साम दाम दंड भेद से फिर से सत्ता में आने ही हैं। इसके लिए मशीन में सीमित स्तर पर गड़बड़ी, कई बूथों पर गुन्डागर्दी व सेटिंग, हर कीमत पर इंडिपेंनडेन्ट व एक्स भाजपाइयों की खरीद फरोख्त, दूसरी पार्टियों से लोगों को पैसे व पावर से तोड़ना जैसे कई हथियार हैं। पार्टी से अंदरूनी खबरें आ रही हैं कि इस बार जोड़ तोड़ के लिए मोईजी अन्धाधुंध पैसा खर्च करने को तैयार है। बाकी सरकारी एजेंसिया तो है हीं। भाजपा शीर्ष नेताओं की निराशा उनके भाषणों में दिखाई ज़ुरूर दी है मगर अब वे शांत हैं। अगर अशांत लोग शांत हैं तो यकीनन कुछ पक रहा है। अभी एग्ज़िट पोल आयंगे और भाजपा को विनर दिखा देंगे, पहले भी ऐसा हुआ है।

इस बार वोटर टर्नआउट रेशो जो कम चल रहा है, उसका एक ही कारण है कि इनके जिन भक्तों का इनसे थोड़ा सा मोह भंग हुआ है (मगर पूरी तरह नहीं) वो इनको फिर वोट देना नहीं चाहते हैं मगर कांग्रेस को भी नहीं देना चाहते हैं (क्योंकि प्रोपगंडा द्वारा इनके दिमागों में राहुल को पप्पू और कांग्रेस को देशद्रोही जो साबित कर दिया गया है), इसलिए ये लोग वोट देने ही नहीं निकल रहे। अगर इस बार भाजपा चली भी जाती है तो इनका प्रोपगंडा रुकने वाला नहीं है। ये इतना प्रोपगंडा करंगे कि गैर भाजपा सरकार का 2014 से पहले वाला ही हाल हो जायेगा। आखिर इनके आईटी सेल और व्हाट्सएप्प ग्रुप खत्म थोड़े ही किये हैं। ऊपर से जज़्बात दबाए बैठी मुस्लिम कौम भी अपनी आदतें और हरकतों को मुज़हायरा करेगी। यानी इनके यही नाराज़ भक्त फिर से इनको अगले इलेक्शन में बढ़ चढ़कर वोट देने को तत्पर बैठे होंगे और वो भी कई टर्म्स (10-20 साल या ज़्यादा) के लिए यानी फिर से इनको वापिस ले आयंगे भारी बहुमत के साथ क्योंकि इनको लगेगा कि 2024 में इन्होंने बहुत बड़ी गलती कर दी दूसरों की सरकार बनवा कर।

इसलीए इन आधे भक्तों के हिसाब से देखें तो भाजपा को सत्ता में फिर से वापिस आना ही चाहिए तभी अगले 5 साल में इनका पूरी तरह भाजपा से मोह भंग होगा और फिर सड़कों पर दौड़ा दौड़ा कर इनके लीडर्स को पेला जायगा कि तुमने धर्म की राजनीति ने बाकि सभी ज़ुरूरी मुद्दे खत्म कर दिए है और जनता को कंहा लाकर खड़ा कर दिया है। जितना समय लोगों के दिमागों में फितूर भरने में लगा है आखिर उतना या उससे ज़्यादा समय उस फितूर को खत्म करने में भी तो लगेगा। मुस्लिम के हिसाब से भी यही ठीक होगा कि इनकी सरकार आएं और जनता 5 साल और इन्हें झेलें और खुद ही इनका सूपड़ा साफ कर दे। 

मगर अगले 5 साल ये अपने सारे मंसूबे पूरे करंगे, ये भी सच है। लोकतंत्र, संविधान, संसद, एजेंसिया, चुनाव आदि कुछ सही सलामत नहीं रहेगा। मगर हमें ये नहीं भूलना चाहिए कि इमरजेंसी के वक्त में भी यही हुआ था ज़ब जनता इंदिरा से इतना त्रस्त हो गयी थी खुद ही सड़को पर निकल आयी थी और कांग्रेस को उखाड़ फेंका था। इसके बाद बनी मोरारजी की सरकार ने इंदिरा के बिगाड़े गए सारे कानून और तंत्र, संसद के द्वारा ही वापिस ठीक कर दिए थे और वो भी इस तरह की दुबारा कोई उनके साथ ऐसे न खेल सके। इसलिए फिर से यही होगा कि भाजपा की तानाशाही से जनता इतनी त्रस्त हो जायगी (अंधभक्त भी) कि जनता खुद क्रांति लाएगी और इनका तखता पलट कर देगी। हर फासीवादी ताकत के साथ अंत में यही होता आया है।

2026 क्रांति. अगर भाजपा सरकार आती है जो आनी ही है तो ऐसा लगता है कि 2026 में इनकी लीडरशिप बदलेगी या सरकार ही गिर जाएगी। इसके बाद पुनः जोड़तोड़ से या नयी पार्टी की सरकार आएगी। इसके कारण अनेकों हो सकते हैं जिनमे से कई अभी भी दिख रहे हैं और उसके बाद इनका अजेंड क्या होगा, इन सब बिंदुओं पर चर्चा फिर कभी करंगे। इसका उलट भी एक हद तक संभव है जब 2024 में गैर भाजपा किसी तरह सरकार बना ले मगर उस केस में ऐसा लग रहा है जैसे 2026 में भाजपा फिर किसी तरह अपनी सरकार बना लेगी।

दोनों ही केस में उम्मत के लिए 2026 एक बुनियाद बनती दिख रही है। अब ऐसी बुनियाद को मुस्लिम कैपिटलाइज़ करें या अपनी आदत से मजबूर मुस्लिम हमेशा की तरह इसे ज़ाया कर दें, ये उन पर है। ये मौका अज़ाब के एन्ड या एक्सटेंशन के लिए बुनियाद साबित होगा। 

यह एक ज़ाती राय और सोच है। इसमें गलती भी हो सकती है और ज़रुरी नहीं हर कोई इससे इत्तफाक ही करे। 


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योग हिन्दू धार्मिक क्रिया, तंत्रविद्या व योग.  नमाज़ का मकसद. शिर्क व सुन्नह.

योग अगर हिन्दू धर्म की धार्मिक क्रिया है और सिर्फ ईश्वर और आत्मा का मिलन ही है तो फिर नास्तिक बौद्धधर्म और जैन धर्म में इसकी स्वीकार्यता कैसे है? वैसे आगर योग वाकई ईश्वर और आत्म का मिलन करता है तो प्रत्येक मुस्लिम को योग करना चाहिए। क्योंकि नमाज़े तो हमारी अब केवल दिखावा और रिवाज़ और उठक बैठक रह गयी हैं। नमाज़ के साथ योग द्वारा भी ऊपरवाले से सम्बंध बने तो सबको करना चाहिए।  अगर संबध बनते हैं तो नमाज़ के साथ योग से ईश्वर से संबध  बिल्कुल बनाने चाहिए। हर वो चीज़ जिससे ईश्वर और मानव का संबध बने मनुष्य को अवश्य करना चहिए। इस्लाम हर ऐसी चीज़ की पूरी इजाज़त देता है।  जो लोग अपनी नमाज़ों को दुरुस्त करने की बजाए दूसरों के योग पर ध्यान दे रहे हैं, उनको चाहिए ध्यान अपने पर और सही जगह लगाये.  भारतीय दर्शन अनुसार नहीं बल्कि हिन्दू धर्मानुसार बोद्ध और जैन नास्तिक मत हैं जैसा स्मृतियों और रामायण में भी उल्लेख है। जैन और बोद्ध भारतीय दर्शन का अंग है। मुस्लिम और ईसाई आदि नास्तिक नहीं बल्कि मैलेच्छ धर्म हैं मूलतया उनके अनुसार। हालांकि अगर वेदों को भी आप मानते हो परन्तु प्राचीन धर्म परम्परा को नहीं मानते तो वे आपको नास्तिक कह सकते हैं परंतु उसे मूल ग्रंथों से नास्तिक या ईश्वररहित मत सिध्द नहीं कर सकते। ईश्वर से संबध और मूर्ति पूजा में अंतर है। तांत्रिक जब सिद्धि करता है तो वो ईश्वर से नहीं बल्कि शैतानियत से संपर्क साधता है।  योग को बाद में तंत्र विद्या से जोड़ दिया गया होगा। यह सामान्य व्यवहार है। इससे उसकी उत्पत्ति तांत्रिक नहीं हो जाती। ऐसा मूल ग्रंथो में भी प्रमाण नहीं है। ब्रिटिश काल प्राचीन काल नही है। रूकिया जैसी चीजों का जब मुस्लिम जादू टोना या असल में कहे तो सिहर से जोड़ सकते हैं तो दूसरे सम्प्रदाय या धर्म वाले भी ऐसा कर सकते हैं।

कुरान तो कहता है कि यकीनन नमाज़ शर्मनाक और अन्यायपूर्ण कामों से रोकती है (कुरान 29:45). इसलिए अगर इतने सालों तक नामज़े पढ़ने के बाद भी अगर आपमें (उम्मत की अक्सरियत) बेहयाई और नाइंसाफी से दूर रहने का माद्दा पैदा नहीं हुआ तो जाहिर आपको योग से ध्यान हटा कर अपनी नमाज़ें दुरुस्त करनी चाहिए। क्योंकि क़ुरान में  एक बात तो क्या एक लफ्ज़ भी गलत नहीं और अगर आपकी नमाज़ें आपको क़ुरान के बताए हुए रिजल्ट नहीं दे रही है तो यकीनन आपकी नमाज़ों और दीन में भारी कमी है। बरसो में नमाज़ी बन न सका। मइसलिए आज क़ौम ज़िल्लत उठा रही क्योंकि बात बात में फतवे देने का काम बहुत बढ़िया करते हैं। वो बेनामाज़ी, वो काफिर, यह मुल्हिद, वो गुमराह, ये मुनाफिक।  इसलिए हमारे पीछे अल्लाह ने आज़ाब के तौर पर किसी को लगा दिया है 8 साल पहले। वही सुधारेंगे हमको अब अल्लाह के हकूम से।

किसी भी चीज़ को शिर्क अपने आप नहीं समझना है। बल्कि उसमें शिर्क की सिफ़ात होनी चाहिए, तब समझना चाहिए। आप लोगों (खासतोर पर सल्फी या अहले हदीसों) की यही समस्या है कि दीन को उल्टा पकड़ते है। हराम को छोड़कर हर चीज़ हलाल माननी चाहिए। जबकि कट्टर लोग हलाल चीजों में हलाल मानने के लिए दलीले ढूंढते हैं। बरेलवी देबन्दी सब फिरके ऎसी ही कट्टरता के शिकार है। योग को उसकी असलियत और शुरवात के बजाए आप नफरत और प्रेज्यूडिस से उसे समझने का काम कर रहे है। उसूल ये कहता है कि हर धर्म की चीजों की व्याख्या उसी धर्म के लोगों के द्वारा जो मान्य है वो लो जायगी, न कि अपने मन मुताबिक। यही उसूल से चलना चहिये। इसके अलावा खुले दिमाग से चीज़ें समझनी और देखनी चाहिए। जब मुहम्मस सल्ल. ने जब तबलीग की शुरवात की तो मक्का में इब्राहिम अलैह की लगभग  हर सुन्नत में सुन्नत शिर्क शामिल हो चुका था। तो आपने उनको तर्क नहीं किया बल्कि उनमें से शिर्क निकाल कर उन्हें वापिस तौहीद से जोड़ दिया,  कुछ को ऐसे ही लिया, जंहा मिलावट थी उन्हें दुरुस्त किया और जंहा कमी पेशी की ज़ुरूरत थी वो किया। यही तरीका हमें इस्तमाल करना चाहिए।  अगर कब्रिस्तान या मज़ारों पर जाने से शिर्क होना शुरू हो गया है तो उससे कब्रों पर जाना नाजायज़ नहीं हो जाता बल्कि ऐसे कामों को दुरुस्त करने की ज़रूरत होती है। ऐसे कितने ही काम है उम्मत के जिनमें शिर्क शामिल हो चुका है, उनसे वो काम हराम नहीं हो जाते बल्कि उन कामों में शामिल शिर्क ही गलत रहता है।


सेल्फ प्रेजर व सेल्फ हेटर


सेल्फ प्रेज़र से लाख गुना बेहतर है सेल्फ हेटर (पॉजिटिव हेटर जो अपनी बुराइयों से नफरत करें और उन्हें सुधारने में लगा रहे)। ऐसा सेल्फ हेटर होना सुन्नत पर चलना है। अपनी कमियों, अपनी बुराइयों को नोटिस करके उन्हें सुधारना ही अल्लाह और नबी का संदेश और रास्ता है। अपनी तारीफ तो हर आदमी कर लेता है। खुद की हर बात पर झूठा घमंड और फक्र बेहद गलत है.  

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क्या सत्ता के लिए अखलाक़ों से समझौता जायज़ है। 

मतकुछ लोग है वो कहते हैं अख़लाक़ अच्छे करो, दुनिया तुम्हारे साथ बुरा व्यवहार करती है क्यूंकि तुम्हारे अख़लाक़ ख़राब हैं। अख़लाक़ अच्छा रखना चाहिए इसलिए नही के दुसरो को इम्प्रेस करना है बल्कि इसलिए के अल्लाह का हुक्म है। अगर आप किसी फर्द या क़ौम को इम्प्रेस करने के लिए अख़लाक़मंद बने हुए हैं तो ये रियाकारी है और रियाकारी को शिर्क ए असग़र कहा गया है अर्थात छोटा शिर्क। और सबसे अहम बात के आपके अख़लाक़ अच्छे हो जाने से लोगों का आपके बारे में जो बर्ताव है वो नही बदलेगा, अख़लाक़ के बल पर आप इंडिविजुअल और छिटफुट बदलाव शायद ला सकते हैं मगर किसी समाज मे सामूहिक बदलाव सिर्फ क़ानून व्यवस्था के बल पर लाया जा सकता है, जो ज़ालिम समाज है वो आपके अख़लाक़ को देखकर ज़ुल्म करना बंद नही करेगा, इतिहास में ऐसा कभी नही हुआ है और न ही कभी होगा, इसलिए अगर कुछ मूर्ख लोग ये समझते हैं के अख़लाक़ अच्छा रखने से वो किसी समाज के ज़ुल्म से बच जाएंगे तो वो खुद को और दूसरों को बेवक़ूफ़ बना रहे हैं। आप अल्लाह के रसूल स की सीरत पढ़िए, अल्लाह के रसूल से बेहतर अख़लाक़ वाला पूरे मक्का में कोई नही था, पूरे मक्का के लोग उन्हें सादिक़ और अमीन कहते थे, अपनी अमानत उनके पास रख जाते थे, यहां तक के जिस रात अल्लाह के रसूल स मक्का छोड़कर हिजरत करने पर मजबूर हुए उस वक़्त भी उनके पास कुछ लोगों की अमानत थी जिसे लोगों ने रख छोड़ा था, आप बताइए अल्लाह के रसूल स से बेहतर अख़लाक़ वाला शख्स इस दुनिया मे कोई हुआ?? नही हुआ ...उसके बावजूद उन्हें भी मक्का छोड़कर हिजरत करना पड़ा, बताइए उनके अख़लाक़ से समाज का रवैया बदला ?? नही बदला... बताइए उनसे बेहतर अख़लाक़ है आपका ?? आप उनसे ज़्यादा होशियार चंद हैं ?? पूरे समाज का रवय्या तब बदलता है, जब सत्ता चाहती है जब लॉ एंड आर्डर मेंटेन होता है ... आप अच्छे अख़लाक़ से समाज को नही बदल सकते, जो लोग अख़लाक़ के बल पर आपको समाज सुधार करने की सलाह देते हैं वो बेवक़ूफ़  दरअसल आपको चम्मच से समुंदर सुखाने को कह रहे हैं। हमेशा क़ौम में गलतियां देखने वाले सेल्फ हेटर है। जावेद जमील ने अपनी किताब में बताया है कि मुस्लिम क़ौम सबसे ज़्यादा अख़लाक़ वाली क़ौम है।


खंडन:  पहली बात ये की इस्लाम ये नहीं कहता कि अख़लाक़ से दुनिया की पावर आपको मिल जायेगी या आप अख़लाक़ से हुकुमत बन जाओगे। अखलाक का वास्ता पावर से नही  बल्कि इंसानी रिश्तों से है। क़ुरान बुराई का बदला भलाई से देने को कहता हैं। ये सर्वोत्तम व्यवहार है। पर ये अनिवार्य नहीं है क्योंकि अगर आपके साथ बुरा किया गया है तो आपको नियमानुसार उसके विरुद्ध बदला लेने, कंप्लेंट करने आदि का अधिकार है। बदला लेने में बस ज़्यादती न हो जाये, इसकी क़ुरान हिदायत देता है।  कानून तोड़ने या ज़ुल्म करने वालो को सज़ा का प्रावधान और हुकुम भी है। दीन और तमाम अम्बिया की सबसे शुरआती और अहम बुनियादी सुन्नत अख़लाक़ है। अख़लाक़ के बिना न दावत कुबल हो सकती और न लोग करीब आ सकते है। बिना अख़लाक़ के दीन ही अधूरा है लोगों का। इसको छोड़ के दुनिया तो पा सकते हो पर दीन को और अल्लाह को नही। और जब अल्लाह ही साथ नहीं तो पावर पा तो लोगे पर दुनिया का दिल न जीत पाओगे और न ही तारीफ पा पाओगे। ये पावर भी वक़्ती ही होगी। अगर लंबी चली तो उसके लिए ज़ुल्म करना पड़ेगा और ज़ुल्म करोगे तो अल्लाह के यंहा अज़ाब होगा जिसका एक हिस्सा यंहा भी झेलना पड़ेगा। ज़रा सोच के देखें कि अगर नबी के पास अख़लाक़ न होते तो क्या उनकी बात मानी जाती? अगर उनके अख़लाक़ अच्छे न होते तो क्या उन्हें पैगम्बर माना जाता है। मक्का वाले तो उनके किरदार और अख़लाक़ देख के यही कहते थे कि तुम हो तो अच्छे इंसान और तुम्हारी सारी बातें सर आँखों पर तुम्हारा लाया नया दीन नहीं मानेंगे, इसके बदले जो चाहिए वो करँगे बोलो।रही बात मक्का वालों के ईमान न लाने की तो ये बात इल्म की दुनिया मे साफ है कि उनके ईमान न लाने के पीछे उनकी परम्परावादी श्रेष्ठता, खानदानी और कौमी ऐतबार से अफज़ल समझना और वर्चस्ववादी व्यवस्था बनाये रखना आदि था। जबकि मदिना वालो का ईमान लाने का सबब उनजे यंहा यहूदियों का अकीदा था कि उनके नबी आने वाले है। मुस्लिम जिसे भी राज्य, खित्ते, देश मे गए, चाहे हिजरत के कारण हो, व्यापार के कारण, या जंग जीतने के कारण वंहा सबसे असरदार कारण मुस्लिम के अख़लाक़ और हक़ की दावत ही रहे है। सेकंडरी चीज़ों में हुकुमत का मज़हब और दूसरे कारण रहे है क्योंकि इनसे भी नेचुरल बेहवीयर प्रभावित होता है। आप मानोगे नहीं पर इस्लाम और मुस्लिम समाज मे गिरावट का सबसे बड़े कारणों में उनके अख़लाक़ में आई कमी भी है। अख़लाक़ अच्छे तो दुनिया तारीफ करती है और समर्थन करती है। बहुत से वेस्टर्न मुल्क और जापान जैसे देश अख़लाक़ की बुनियाद कितना बेहतर समाज बना पाए, दुनिया जानती है। 100 साल पहले वो कैसे थे, उसकी बात नहीं कर रहा, बल्कि पिछले कुछ दशकों में आये बदलाव की कर रहा हूँ। उनकी नैतिकता किस स्तर देखिये। बाकी नैतिकता के पैमाने हर समाज के अलग अलग होते है। पर बुनियादी बातें समान रहती है।वन्ही दूसरी तरफ हमारे कुछ मुस्लिम देशों के हालात देख लो अख़लाक़ी तौर पर बैंकरपट हो चुके जैसे पाक और बंगलादेश आदि। सब आपस मे ही लड़ मर रहे है लूट रहे है। भारत भी ऐसा ही है। अब ये बताये की इन देशों के पास भी जब अख़लाक़ नहीं है तो ये कौन से वैश्विक स्तर पर सुपर पावर बन गए। अख़लाक़ पावर नही समाज बनाने में सहायक होते है।  वैसे आप पर जुल्म हो रहा है इस देश में। तो कभी ये जानने की कोशिश भी करो कि क्या तुम्हरी भी कमियां रही है कुछ? ऐसा क्या किया तुमने की पूरी दुनिया तुम्हारी दुश्मन हो गयी? गिरेबन में झांकिए तो सही? कब तक दुसरो में गलतियां ढूढ़ते रहोगे। अगर अल्लाह की मर्जी से पत्ता नहीं हिलता तो अल्लाह क्यों मुस्लिमों को पूरी दुनिया मे ज़लील और ख्वार करवा रहा है? तुम्हारी भी गलती रही होगी?अख़लाक़ से पावर नहीं समाज और रिश्ते बनते है। जो बड़े मक़सद को पाने में यकीनन सहायक होते है। अख़लाक़ के बिना न तो दुनिया मे बड़ी और असरदार क़ौम बन पाओगे और न ही दीन को मुक़ममल फॉलो कर पाओगे। धोबी का कुत्ता न घर का न घाट का कहानी बन जाओगे। फिर तुम पर भी वैसे ही उंगलियां उठेंगी जैसे तुम हिन्दुत्वादियो के अख़लाक़ रहित दोहरे चरित्र पर उठाते हो। सेल्फ हेटर, सेल्फ एगोईस्ट से लाख गुना बेहतर है जो आप है। अपनी कमिया जानने और मानने वाला सुधार करेगा यही सुन्नत भी और दीन की हिदायत भी है। और जो अपनी नज़र खुद ही दंभ और गुरुर से भरा है और ख़ुद को त्रुटिरहित मानता है, उसका ज़वाल लाज़िम है वो भी ज़िल्लत भरा। यही आपकी क़ौम के साथ हो रहा है। और आप जैसे लोग इससे निकालने की बजाए उनमें जाली और झुठी श्रेष्ठता भर रहे है जो खुदखुशी से कम नही। डॉक्टर जावेद जमील ने मज़हबी तौर पर या कौमी तौर पर आंकलन किया है, ये वो जाने। बाकी दुनिया के लिए ये साफ है कि मुस्लिम किस कदर अख़लाक़ी तौर पर गिरे हुए है। अधिकतर मुस्किम मुल्क का क्या हाल है। जापान और दूसरे तरक्की याफ्ता देश के मुक़ाबले अपनि क़ौम और मुल्क के हालात देखो। सिवाए रुसवाई के कुछ न दिखेगी। जबकि आपके पास इस्लाम, क़ुरान और नबी है। इनके बावजूद आप सबसे नीचे वालों में है। यही है अल्लाह का अज़ाब तुम पर।
 
 
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नुपुर शर्मा और हंगामा 
 
 
हदीसों में मुहम्मद सल्ल. और ह. आएशा के निकाह और सोहबत की बात लिखी हुई है। मुस्लिम को गुस्सा नही आया। नूपुर शर्मा बदतमीज़ लहज़े और गलत शब्दों के साथ यही बात दोहराती है। मुस्लिम पाजामे से बाहर आ जाते है। मुस्लिम के कुछ दिन हाय हल्ला किया और कुछ न हुआ।सर से तन जुदा करने की धमकियां दी। इससे हिन्दू और एकजुट हुए। अरबियों को तरस आया इस्लाम पर तो मोर्चा खोला, एक्शन लेने को मजबूर किया। अरबी फिर वापिस खोल में घुस गए। इतनी ही हैसियत है यंहा के मुस्लिमों की फिर दिखा दिया। हिन्दू अंदर अंदर ही सुलगता रहा और ज़्यादा से जायस एकजूट होता रहा। इससे पहले की धर्म के नाम पर ही भाजपा कुछ नया खोज कर लाती और अपना एजेंडा वापिस बढ़ाती, उससे पहले ही. अग्निवीरों ने देश भर की खबरें और भाजपा का ध्यान पलट दिया भी। इससे निपटते निपटते महाराष्ट्र के छींकें में बिल्ली को सेंध लगाने का मौका मिला और भाजपा उधर मूड गई। ये सब जब लगभग सेटल हो चुका तो. भाजपा वापिस आक्रामक मोड में आई और वापिस वही मुद्दा भुनाया गया जो पिछले कई दिन जारी था। जुबेर को डाल दिया अंदर। ऐसा करते ही व्हात्सप्प मशीनरी वापिस अपने काम पर लग गई क्योंकि जुबेर पर धार्मिक भावनाओं को आहत करने का और मुद्दा वापिस मुस्लिम के गले में डालने का यह रास्ता अच्छा था। इसी बीच बहुत से मुस्लिम में सदियों से मौजूद कट्टरता और गुस्ताखे नबी की सज़ा का फर्जी और जाहिलाना मुद्दे पर दो जानवर खड़े होकर एक हिन्दू को मार देते है। भाजपा जो मुद्दा बनाने के लिए पुलिस, मीडिया, आईटिसल  वैगरह का इतनी मेहनत से इस्तमाल करती है, वो मुद्दा खुद मुस्लिम ने उनकी झोली में डाल दिया। अब न उन्हें झूठी खबरें बनानी है और न मुस्लिम को आतंकी साबित करना है। हमने खुद कर दिया। इसे कहते है उड़ता तीर लेना। यह तो होना ही है। आने वाले वक्त में यह घटना मुस्लिमों की बची कुची चूलें हिलाने वाला है। शायद ताबूत में आखिरी कील।
 
 

वसीम रिज़वी, हंगामा और हल।

आज के मुसलमानों की यही परेशानी है। नए जमाने में तरीक़े पुराने है। वसीम रिज़वी जैसे लोग जिस फेम- माइलेज के लिए ये सब करते है। मुसलमान उसे वही चीज़ 2 दिन में करके दे देता है। जितना ऐसे लोगों का खुल के विरोध करोगे, उतनी इन्हें पब्लिसिटी मिलेगी और उतना ही ये बढ़ चढ़ कर ऐसे काम फिर करेंगे। आप ध्यान देना छोड़ दिजीये, ऐसे लोग फिर कोने में बैठे मिलेंगे जहाँ इनके सरपरस्त भी इन्हें पूछने वाले न होंगे। उन्हें पता है कि मुसलमान की दुखती रग क्या है, इसलिए वो उसे ही दबाते है और मुसलमान इतना चिल्लाता है कि उन्हें मज़ा आ जाता है। कभी दर्द सहन करके भी देखिए, अगली बार वो भी कह उठेंगे की छोड़ो इन्हें, कुछ और करते है। उनका मकसद हंगामा खड़ा करना है और हमें हंगामी लोग साबित करना है और इसमे हम कोई कसर नहीं छोड़ते। विरोध करने का हक़ है करिए पर तरीके दुरुस्त कर लीजिए। कोई अल्लाह को गाली दे दे, कोई क़ुरान में छेड़छाड़ करे, कोई रसूल की तौहीन कर दे, फौरन निकल पड़ते है की मार डालो, काट डालो, गर्दन उड़ा के 1 करोड़ इनाम लेलो। फिर आपके दुश्मन ही ऐसी स्टेटमेंट हाईजैक करके आपके खिलाफ़ और नफरत बढ़ाते। ये वो दौर नहीं है जब आपके विरोध को देख कर आपका पक्ष लिया जाएगा। ऐसी कोई गलतफहमी हैं तो दिल से निकल दीजिए। इस बात पर ध्यान दें कि अगर हंगामा खड़ा करने से आपका और ज़्यादा नुकसान हो रहा है तो हंगामा खड़ा न करे बल्कि दूसरे तरीके ईस्तमाल करे। इग्नोर करे, बॉयकॉट करे, कोर्ट केस लड़े आदि और या फिर सबसे बढ़िया बाहर निकलिए लोगों के राब्ता क़ायम कीजिये उन्हें बताइए कि हमारा दीन वैसा नहीं बल्कि ऐसा कहता है। उन्हें दवात दीजिए। अपना किरदार और मामलात दुसरुस्त कीजिये और उन्हें सोचने पर मजबूर करिये की इस्लाम और मुसलमान तो बहुत अच्छे होते है। आपको देख वो कहने लगे कि लोग इनके बारे में गलत सोच रखते है। पर ये सब आप नहीं करँगे क्योंकि इसमें मेहनत 3 है। आप बस व्हाट्सअप पर फारवर्ड करना जानते है और फेसबुक पर शेयर करना। बस ये किया और ज़िम्मेदारी पूरी। वो अब वक़्त दूर नहीं जब आपको हर गली गली में दौड़ाया जाएगा और आप की ऐसी हालत कर दी जाएगी कि नागरिक अधिकार ही छीन लिए जायँगे। फिर करते रहना विरोध। एक पार्टी की कट्टर राजनीति देख के सभी पार्टियां अब कट्टर राजनीति करने को मजबूर है, माहौल ही ऐसा बन गया है। क्योंकि सभी पार्टियों एमक मक़सद आखिर सत्ता पाना है। इसलिए समाधान यक़ीनन राजनीति में तो नहीं है क्योंकि सब पार्टियां खरबूजे के तरह रंग बदल रही है। आप को पहले ही बता दिया गया है कि फिर समाधान कंहा छुपा है।

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आज़ादी के वक़्त की सियासत।

जिसे देखो हिसट्री का ऐसे आंकलन करता है जैसे वो वहीं मौजूद था। हालांकि मौजूद होता भी तो कोई भी आंकलन सौ प्रतिशत सही नही होता अपवाद रहित। लोगो को भी क्रिटिसिज्म नाम का कीड़ा ऐसे काटा हुआ है कि सब में सिर्फ कमिया नज़र आती है। खुद को वंहा रख कर सोचने वाले कम है। लोगों को सो कॉल्ड मुस्लिम बादशाहों की करनी तो जस्टीफ़ाइड लगती है पर मुस्लिम आज़ादी रहनुमाओं की नही।

आज़ादी के वक़्त ज़्यादातर ने मौलाना आज़ाद की नही, अपने दिल की मानी, जो फितरत है वही मानी, यानी अपनी जगह से मोहब्बत जिन पर भारी पड़ी, वो यंही रुके। जो चले गए वो अधिकतर अपनी वजहों से गये।

आज भी यही होता है।

रहनुमा सिर्फ, चेहरा होता है। होता वही जो लोग चाहते है। नॉर्मकली डिमांड एंड सप्लाई नियम चलता है। जैसी पब्लिक होती है वैसे ही रहनुमा भी पैदा होते है। 

इतिहास से किसी को जज करना बहुत मुश्किल है। इसलिए अक्सर, इसिहास मन मुताबिक चलता है। जैसे कांग्रेस और सेकुलरिज्म आज वैसा नही रहा जैसा कभी रहा था। वैसे ही जैसे हमारी क़ौम भी वैसी नही रही। बाकियों के साथ भी यही हुआ।

अभी भी वक़्त है क़ौम को सुधारना है, रहनुमा आप सुधार जाएंगे। क़ौम न सुधरी तो वही होगा जो दूसरों के साथ हो रहा है, जिन्होंने सियासी उरूज तो पा लिया पर अख़लाक़ी तौर पर इनका बड़ा धड़ा खाली हो चुका है, तभी ये अपने आमाल पर दो रुख अपना रहे है। हमारे साथ भी यही होगा यकीनन , क्योंकि रास्ता एक ही अपनाये है। जबकि हमें सिर्फ रास्ते नही, अपनी मंज़िल भी देखनी है। मौत।

जिन्नाह के लगभग सभी निष्कर्ष बिल्कुल सही थे जो आज भी साबित हो रहा है और आगे भी होते रहेंगे। पर उन निष्कर्षों के आधार पर लिया उनका निर्णय उतना ही गलत था जो आज भी साबित हो रहा है और आगे भी होता रहेगा।

पाकिस्तान और बांगलादेश के मुकाबले भारत में अल्पसंख्यकों पर कम अत्याचार होने या उन्हें थोड़ी अधिक छूट होने का सबसे बड़ा कारण, उनकी जनसँख्या है। अगर भारत मे भी मुस्लिम की आबादी वंहा के हिन्दू की तरह अधिक कम होती तो यंहा भी बहुसंख्यक उतना ही अधिक अत्यचार कर रहे होते जितना वंहा कर रहे है। 

दूसरी बात अपने धर्म या प्रतीकों के लिए हिंसा पर उतर आना यंहा सबकांटिनेंट के लोगों के खून में है चाहे वो किसी भी समाज का है। मंदिर मस्जिद की तरह ही.. गुरु रविदास मंदिर या बाबा साहेब की मूर्ति टूटने या आरक्षण पर हमला होने पर दलित समाज भी आग बबूला होके सड़कों पर हिंसा अंजाम देता है।

इसलिए मैं फिर कहूंगा कि मानसिकता असल कारण है। अज्ञानता कंही अधिक है कंही कम। बुरे लोग कंही ज़्यादा है कहीं कम। अच्छे लोग हर जगह है बस संख्या कम है।


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दिल्ली दंगो और कोरोना के लिए मुसलमानों को कटघरे में खड़ा करके अपना हित साधना।

दिल्ली के हुए दंगो से देश का मुसलमान उभर भी नहीं पाए थे कि कोरोना आ गया। और दिल्ली दंगो की तरह *कोरोना का ठीकरा भी मुसलमानों पर फोड़ा जा चुका है*। अब तो डैमेज कंट्रोल भी नामुमकिन है। *नफरतो से लगभग सभी के दिमागों को अब पूरी तरह भरा जा चुका है*। पहके तो जल्द ही कोरोना खत्म हो जाये, अल्लाह से दुआ है। पर आज मीडिया और सोशल मीडिया देख कर ये भी अंदाज़ा लगाना पड़ेगा कि *आगे क्या होने जा रहा है और उसका असर मुसलमानों पर क्या पड़ेगा।*

लॉकडाउन जितना लंबा चलेगा उतनी ही लोगो की जमा पूंजी खत्म होती चली जाएगी। लोगो के पास परचेसिंग पावर नही होगी। दुकानों पर ग्राहक नही होंगे। बाज़ार खाली होंगे। छोटे मोटे काम धंधे दुबारा खड़े नहीं हो पाएंगे। छोटे से लेके बड़े बड़े बिज़नेस लड़खड़ा जायँगे। कामगार, मज़दूर तबका, दिहाड़ी मजदूर को काम नहीं मिलेगा। कारीगर और नौकरी पेशा खालीं बैठेंगे। स्कूल और कॉलेज की फीस, किराया, बैंक ब्याज देने के लिए पैसे नही होंगे। कंपनीयों में छंटनी शुरू होगी। सरकारी और प्राइवेट नौकरों की तनख्वाह काटी जाएगी। बेरोज़गारी चरम पर होगी। ऐसे माहौल में क्राइम बढ़ेगा। बीमारियां बढेंगी। सभी बैंक बंद होने के कगार पर आ जाएंगे।  *देश की इकॉनमी नोटबन्दी और जीएसटी के बाद तीसरा हार्ट अटैक झेले कर आईसीयू में पड़ी होगी*। सड़े गले सिस्टम और सरकारों से किसी खास मदद की उम्मीद भी मत रखिएगा।

चारो तरफ हाहाकार होगा। *पर सरकार की नाकामियों और निकम्मेपन पर कोई सवाल नहीं होंगे बल्कि सवाल मुसलमानों से होगें*। क्यूंकि मीडिया और सोशल मीडिया में जो मुसलमान को बलि का बकरा बनाया गया है, ये परसेप्शन लोगो के दिमाग़ पर छाया रहेगा। ये किया ही इसलिए जा रहा है की लोग याद रखें और मुसलमानो को ही देश में मची अफरा तफरी का गुनहगार माने। उस वक्त *हर आदमी अपनी हर पेरशानी की वजह कोरोना का देगा और सिर्फ मुसलमान को ही कोरोना फैलाने की वजह बताएगा।* दंगो के बाद शुरू हुआ मुसलमानों का दोष देना और बॉयकॉट करना, कोरोना कहर के कारण और ज़्यादा बढ़ता ही जाएगा। हर जगह ऐसे ही ज़िल्लत, रुसवाई, गुस्सा, इल्ज़ामात देखने को मिलेगें। बात समझना तो दूर कोई हमारी बात या सफाई सुनेगा तक नहीं। *न्यूट्रल लोग तक उस तरफ खड़े मिलेंगे।*

यही वो वजह होंगी जिनसे कारण मुसलमानो पर *कल होने वाले हर ज़ुल्म चाहे, वो NRC हो, बॉयकॉट हो, लीचिंग हो या दंगे हो, सब को वो लोग सपोर्ट करंगे। कहँगे की इनके साथ सही हो रहा है, ये इसी लायक़ है, ये देश के दीमक है।* और उन्हें ऐसा कहते हुए शाहीन बाग़ और दंगो के मसलों पर आप देख ही चुके हो।

अब करना क्या है, ये हम सब जानते हो, पर करते नही है बस। *सारे हल और तरीके क़ुरान और सुन्नत में मौजूद है।* अभी भी थोड़ा वक्त बाकी बचा है। हम सब मुसलमान उनको जितनी जल्दी हो अमल में लें आए वरना बर्बादी भी उतनी ही दूर है, जितनी दूर मौत।

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बहुसंख्यक तुष्टिकरण के लिए कोरोना का ठीकरा मुसलमानों पर फोड़ना।

*एक ही समुदाय के वायरल किये गए वीडियो की मानसिकता और प्रोपग्रन्डा समझिए*

झूठे, फेक और पुराने वीडियो को ताज़ा बना कर जिन लोगो ने भी बिना इनकी सच्चाई जाने इन्हें आगे फोवार्ड किया उन्होंने बेवकूफी, साम्प्रदायिक और नफरत ज़ाहिर की है एक समुदाय के खिलाफ।

एक वीडियो में मुस्लिम सामूहिक रूप से छींक रहे हैं। वह इबादत की एक सूफी पद्धति है। जिसमे ऐसे ही उच्चारण किया जाता है। यह वीडियो पुराना है। उनका अपना एक धार्मिक तरीका है जैसे दूसरे धर्म मे छींक से बच्चा पैदा करने की दंतकथा है।

एक वीडियो में लोग बर्तन चाट कर कोरोना फैला रहे हैं। यह वीडियो दाउदी बोहरा लोगो का है जो खाने की बर्बादी नहीं करने के लिए अक्सर बर्तन चाट कर साफ करने की परम्परा निभाते है। यह वीडियो भी पुराना है। ये एक्सट्रीम तरीका है जिससे अधिकतर मुसलमान भी पसंद न करे। पर ऐसा होता है जिससे दूसरों के तरीकों को देख कर हमें घिन्न आती है और उन्हें वो ठीक लगता है। जैसे यंहा तो गरीबों के कूड़ेदान में पड़े खाने को खाते हुए वीडियो है। अघोरियों क्या क्या खाते इसके भी वीडियो है।

एक वीडियो में एक मुसलमान खाना देने से पहले उसमें थूका रहा है। शायद थैली में फूंक मार के फूला के थैली में समान ज़्यादा दिखाना चाह रहा है। यह वीडियो भी पुराना है। ऐसा कोई भी घटिया आदमी कर सकता है। इनकी कंही कमी नही है। हमारे यंहा तो सफाई न रखने वालो के खाने में बाल, कॉकरोच पाए जाते है। झूठे बर्तन सही से नही धोए जाते। चूहे घूम रहे होते है होटल में।  केमिकल के दूध, फल, सब्ज़ी आदि बेचे जाते है। बॉस के खाने, कॉफ़ी में थूकने वाले मिल जाते है।

एक वीडियो में एक मुसलमान फलों पे थूक लगा रहा है। ये 16 फरवरी से पुराना वीडियो है। जिसमे कोई गंदा बूढ़ा शायद थूक से फल चमका रहा है। यंहा तो बहुत से पटरी या ट्रैफिक सिग्नल पर कुछ गंदे लोग फलों के साथ यही करते मिल जाते है। ऐसे गंदे लोग यंहा भरे पड़े है। नालों के पानी से सब्ज़िया और बर्तन धोते हुए रेहड़ियों वालों के कई वीडियो नेट पर पड़े है। गंदा पानी पिलाते हुए ग्रहको को और उसी पानी से ही चाय, खाना भी बनाते है।

कुछ वीडियो में मुसलमान थूकते नज़र आ रहे है। इनमे ज़्यादातर तो पुराने है जब थूकना दुनिया में पाप नही था। पान गुटका खाने वाले सभी धर्मों में है। पर इन्हें आज का बना के फैलाया गया वो भी सिर्फ मुसलमानो के वीडियो।

एक वीडियो में बहादुरगढ़ में पुलिसवाली और मुसलमान लडक़ी लड़ रही है कि कोरोना फैला रही थी। अब ये लड़ाई शुरू क्यों हुई वो जांच का विषय है। दोनों में कोई भी गलत हो सकता है। पुलिस से दूसरे धर्म वालो की भिड़न्त कई जगह हुई है।

रीवा से विडीयो आता है की SP आबिद खान पुजारी को पीट रहे है जिसने मंदिर में भीड़ लगवाई थी। वो पीटने वाला थाना प्रभारी राजकुमार निकलता है। बदनाम मुसलमान होते है।

कुछ वीडियो आयी लोगो मस्जिद में नमाज़ पढ़ते हुए। भारत की लगभग सारी मस्जिदे बंद है। सिर्फ कुछ एक में बेवकूफ लोग नमाज़ पढ़ रहे थे जो अपवाद थी। जिससे ये लग रहा था कि सारी मस्जिदे चालू है। एक जगह मस्जिद के बाहर तो मुसलमान खुद डंडा लेके खड़े हुए ऐसे ज़िद्दी लोगो को भगाने के लिए पर उनकी फोटो वायरल नही करी गयी क्योंकि उनमे मुलसमान को कोसने का सुख नहीं था। वैसे ही कुछ मंदिर भी खुले थे, खासतौर से रामनवमी पर। अंधभक्त लोग हर जगह होते है। पत्थर फेंकने वाले और गोली मारने वालो की वीडियो दिल्ली दंगों में दोनों तरफ के लोगो की सामने आई थे। जिनमे मरने वाले 75 परसेंट मुसलमान थे। पर दोष भी मीडिया में सारा मुसलमानो पर डाला गया। ऐसे ही क्या सिर्फ जमात वाले ही बाहर घूम रहे थे क्या। *कौन सड़को पर थाली बजा रहे थे, दिए जला रहे थे। कौन बस अड्डो पर आ गए थे?* क्या मसुलमान थे?

दीपक चौरसिया खबर चलता है की जमात पर टिप्पणी करने वाले का किसी मुसलमान ने खून कर दिया। प्रयागराज पुलीस उसे टैग करके कहती है दोषी का जमात से कोई संबद्ध नहीं। एक खबर पर सहारनपुर पुलिस प्रेस रिलीज़।में कहती है कि जमातीयो द्वारा न तो नॉन वेज मांगा गया है और न ही खुले में शौच की गई है, सब झूठ है। सोशल मीडिया पर कई दिल्ली के एक पेरा मेडिकल स्टाफ और डॉ के मैसेज आते हैं की उनको तो जमाती बहुत शांत स्वभाव के लगे क़वारंटाईन के समय। जमातियो के अस्पताल के सफाई करने के वीडियो भी आये। पर ये सब वायरल नही किया गया सिर्फ उनकी नेगेटिव चीजें दिखा कर पूरी कम्युनिटी पर निशाना साधा गया।

एक वीडियो में मुसलमान डॉ की टीम को मार मारके भगा रहे है। इसकी वजह ये थी की वंहा एक मैसेज वायरल हुआ था कि मुसलमानो को जांबजूझ कर कोरोना के नाम पर घर से उठाया जा रहा है। फिर भी इनको सज़ा मिलनी चाहिए। पर ऐसी ही मारपीट हिंन्दू बस्तियों में भी कई जगह हुई है। जिसकी खबरें देख लो..

*एमपी में ही मोरना में प्रधान के घर से हटाने भीड़ को पुलिस जाती है, लोग पुलिस वालो पर जानलेवा हमला करती है और उन्हे अस्पताल ले जाया जाता हैं। नाहर सिंह और अन्य कई आरोपी है।*

*एमपी में ही रानीपुर में चेकिंग पे गयी डॉ के साथ मारपीट पर मुकेश और राहुल राणा के साथ कई अन्य पर केस दर्ज।*

*30 मार्च को सुरत में गणेश नगर और तिरुपति नगर के लोग जो पलायन करना चाह रहे थे, पुलीस पर हमला करते है, पथराव करते है, 93 गिरफ्तार होते है।*

*देवरिया में मां आदिशक्ति के आश्रम में भीड़ हटाने गई पुकिस से लाल साड़ी में देवी, तलवर हाथ मे लिए, भक्तो के साथ पुलिस से झड़प करती है, धमकाती है।*

*शोलापुर, महाराष्ट्र में भी मंदिर पर रथयात्रा निकाली गई जिसको रोकने पर पुलिस पर पत्थरबाजी हुई, 6 पुलिस वाले घायल,100 पर एफआईआर होती है।*

*एक सेना के जवान शैलेन्द्र कुमार ने तो उस रोज़गार सेवक की भाभी को ही गोली मार दी जिसने उसका नाम गांव से बाहर से आने वालों में लिखा था।*

कई राज्यो में डॉ के साथ मारपीट हुई है।

पर ये सभी वीडियो वायरल नही किये गए क्योंकि इनमें मुस्लिम नहीं थे।

मुसलमानो के क्लिप चलते है कि वो तो कोरोना को धर्म और धार्मिक रीतियों से कर्मकांडो से हरा देंगे। ऐसा तो हिन्दुओ ने भी कहा है! कोरोना से बचाव और इलाज के बीच मे धर्म तो हिन्दू भी लेके आये पर लोगो ने उनको वायरल नही किया। जैसे की..

*बहुत लोग कहते नज़र आये की गोबर और गौमूत्र से कोरोना ठीक गो जाएगा।*

*कुछ ने कहा कि हनुमान चालीसा पढ़ने वाले को कोरोना नहीं होगा।*

*एक बाबा, भक्तों को कहता है नाक में गौमूत्र डालो कोरोना नही होगा*

*श्री हुनमान सेवा परिवार, हवन करता है कोरोना भागने के लिए।*

*हिन्दू महासभा भी हवन और गौमूत्र पार्टी करती है कोरोना भागने के लिए।*

*राममंदिर ट्रस्ट के अध्यक्ष नृत्यगोपाल दास कहते है रामनवमी पर भक्त मंदिर आये कोरोना कुछ नही बिगाड़ पाएगा।*

*पूर्वाचल यूनिवर्सिटी चान्सलर राजाराम कहते है घंटे की आवाज़ से कोरोना दूर रहेगा।*

*संत गोपाल मणि ने गौमूत्र व गोबर से स्नान करके कहा इससे नही होगा कोरोना।*

*बाबा ओम कह रहा है कि वो दैवीय शक्ति से कोरोना भागा देगा।*

*अयोध्या में भक्त कहते है कि रामभक्तों को कोरोना नही होता।*

*कंही बाबा विश्वनाथ की शरण मे भक्त पहुंचते है कोरोना भागने के लिए।*

*कंही भगवान जगन्नाथ की ट्रॉली, हॉस्पिटल के वार्ड, ओपीडी में घुमाई जाती है ताकि लोग दर्शन करके कोरोना से दूर रहे।*

*कहीं मां दुर्गा को कोरोना संघारक दिखाते हुए चित्र भी बनाये गए।*

*भाजपा एमएलए हरिप्रिया और महेंद्र भट्ट कहते है कि गौमूत्र और गोबर कोरोना का इलाज है।*

पर लोगो के पास ऐसी खबरें या वीडियो नही आये क्योंकि बोलने वाले मुसलमान नही थे।

क्या सिर्फ मुसलमान कोरोना फैला रहे है या लापरवाही कर रहे है। *जबकि ताली व थाली बजाने वाले दिन लाखो लोग सैकड़ो पर आ जाते है।  दिया जलाओ वाले दिन, हज़ारो लोग फिर से सड़कों पर आ जाते है।* लोगो ने ढोल ताशों से दिए जलाके बारात निकाली, कंही मशालों को लेके निकले, बच्चे भी लेके निकले, कंही पुतले जलाए गए। एक आदमी ने मुंह से आग निकलने के करतब दिखाते हुए मुंह ही जला लिया। कोई सिलिंडर से सीधी आग लगा रहा है। अनेको जगह आग लगी और जानवर जले। *भाजपा एमएलए राजा सिंह ने कई लोगो को इकट्ठा करके नारे लगवाए। इनमे कंही भी सोशल डिस्टनसिंग का खयाल नही रखा गया।* अब इनसे जो कोरोना फैलेगा वो किस धर्म वाले है।

देखिए किस एक समुदाय के खिलाफ ऐसा महौल बनाने से क्या होता है कि लोगो उनसे कटने लगने थे, बहिष्कार करने लगते है। इसी कोरोना के दौरान दिल्ली के अलीपुर में मस्जिद में तोड़ फोड़ दी जाती है नफरत के कारण ही। कई जगह मुसलमानो पर हमले हुए, गालियां दी गयी, भगाया गया। हिमाचल में एक जमाती ने कोरोना के तानो से तंग आकर खुदखुशी करली जबकि वो नेगेटिव पाया गया है। राजस्थान में गर्भवती मुस्लिम महिला को अस्पताल और डॉ लेने से मना कर देते है, कंही और जाते हुए बच्चा पैदा होता है और मर जाता हैं। इन सबके ज़िम्मेदार वही हैं जिन्होंने ऐसे फेक वीडियो फॉरवर्ड किए। बिना जांच के वीडियो फारवर्ड न करे। दिलों से एक समुदाय के लिए भरी नफरत निकाले। अच्छे और बुरे लोग हर तरफ होते है। तभी तो कहते है कि गिरेबान में भी झांकना चाहिए और सिर्फ दूसरो पर ही उंगली नही उठाते रहना चाहिए।

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तब्लीगी जमात और मरकज़ के नाम पर साम्प्रदायिकरण।

सबसे पहली बात मैं तब्लीगी जमात का सपोर्टर नही हूँ। पर जमात को निशाना बना कर पूरे मुस्लिम समुदाय पर हमला किया जाए मैं इसको भी सपोर्ट नहीं कर सकता।

निज़ामुद्दीन मरकज़ भारत के तब्लीगी जमात का हेड क्वार्टर है जंहा पूरे साल ही हज़ारों लोग रोज़ आते है और आगे दूसरों शहरों में जाते रहते है। जो आगे जाते है वो वापिस लौट कर भी यंही आते है।  इसे एक एयरपोर्ट हब जैसा मान सकते हो।  यंहा 13 से 15 मार्च को एक प्रोग्राम होता है, 4000 लोगो का। फिर कुछ दिन बाद लॉकडाउन होता है। उसके बाद, वंहा से आगे जाने वाले लोग और वापिस आने वाले इक्कठा होते चले गए। वंहा पहले से रुके हुए लोग तो थे ही। जिनको उन्होंने किसी तरफ 1500 को अपने घरों को भेजा जो आस पास के थे। 23 मार्च तक फिर भी वंहा 1000 रह गए थे जो मरकज़ वाले कह रहे थे कि हम तो हटाना चाहते है पर इन्हें कैसे भेजे, ये दूसरे शहरों के है और विदेशी भी। वो इनके लिए व्यक्तिगत पास मांग रहे थे या गाड़ियों की परमिशन। इसी कार्यवाही में कई दिन निकल गए। पुलिस से एसडीएम, इस अधिकारी से उस अधिकरी में लटके रहे। मरकज़, प्रशासन और सरकार तीनों की लापरवाही साफ दिखती है। एसएचओ द्वारा जारी किए गए क्लिप में देख ही चूके हो कि वो कैसे मरकज़ वालों से हड़का के बात कर रहा है, उन्हें बोलने नही दे रहा, ताकि पुलिस की गलती सामने ना आ जाये।  ये लोग छिपे नहीं थे बल्कि फंसे थे। क्योंकी लोक डाउन अचानक हुआ कि जो जंहा है वो वही रुक जाए। अब ये बाहर जाते तो कानून का उल्लंघन और इतने लोग अदंर ही रुके रहे तो नियमो का उलंघन। करे तो क्या करे।

इनके यंहा विदेशी थे, ये बात छुपाना बिल्कुल गलत है क्यूंकि प्रशासन को यंहा रुके हर विदेशी की एक एक खबर हमेशा रहती ही है। पर इन्होंने लोगो की संख्या कम बताई जो बाद में 2300 निकली। वो गलती है। सबसे बड़ी गलती यही है कि इन को कई दिन पहले ही मरकज़ सबके लिए बंद कर देना चाहिए था। ये बहुत बड़ी लापरवाही है। पहले ये भी मस्जिदे बंद करने को तैयार नहीं थे जो बहुत बड़ी गलती थी, जिसके ऑडियो वायरल हुए पर बाद में जब ये बंद करने को तैयार हुए जिसके बयान बाद में जारी तो हुए पर वायरल नहीं हुए क्योंकि वायरल करने वाले BJP IT Cell इनके सुधार नहीं सिर्फ गलतियां दिखाना चाहते थे दुनिया को जो लोगो को पसंद भी है।

पर ये धार्मिक संस्थाएं बंद न करने वाली गलती तो दूसरे धर्मों के लोग, संस्थाएं भी बहुत बाद तक, यंहा तक कि लॉक डाउन के बाद भी करते रहे। क्यूंकि हमारे यंहा बेवकूफी, अंधभक्ति करने वालों की कमी नही है। चाहे कोई  समुदाय हो या नेता। सब समझते है कि नियम तो दूसरों के लिए है।

13 मार्च को सरकार कहती है कोरोना कोई स्वास्थ संकट नहीं है।

16 को धार्मिक स्थान बंद करने का दिल्ली में नोटिस आता है।

*16 को दिल्ली में ही हिन्दू महासभा की हज़ारो लोगो को गौमूत्र पार्टी होती है।*

*17 को 40 हज़ार लोग तिरुपति में होते है।*

*18 को भी 40 हज़ार लोग तिरुपति में होते है।*

*18 तक हरिद्वार में गंगा आरती चालू रहती है।*

18 को राष्ट्रपति, सांसदों को घर बुलाते है नाशते पर।

19 तारीख को पीएम कहते है सोशल डिस्टेंस बना के रखा जाए।

22 को पहला जनता कर्फ्यू  लगता हैं।

*22 को सरकार द्वारा दूरी बनाने का संदश देने पर भी लाखों लोग सड़कों पर थाली बजाते, गरबा करते, रैली, बाइके  निकलते हुए आ जाते है। तब कोरोना नही फैलता। क्या ये लापरवाही नही।*

*23 तारीख तक संसद चलती है जिनमे 800 सांसद है।*

*23 तारीख को ही एमपी में BJP शपथ ग्रहण होता है 300 लोगो में। जिसमे कोरोना के मरीज़ थे।*

24 को पूरा लॉक डाउन की धोषणा होती है। 

*25 को योगी आदित्यनाथ और सैकड़ों लोगों राम मंदिर पहुंच जाते है सार्वजनिक पूजा करने। किसी पर एफआईआर हुई क्या।*

आनंद विहार बस अड्डे पर 60 हज़ार से भी ज़्यादा लोग आ जाते है। कौन जिम्मेदार है। उनसे कोरोना नही फैला। *मनोज तिवारी खुद भीड़ में ही घुस कर मास्क सैनिटाइजर बाँटते है, नियमो का उल्लंघन करते है।*

धार्मिक स्थलों की बात करे तो क्या क्या खुला था इस दौरान। *कालका मंदिर, तिरुपति बालाजी,  सिद्धिविनायक मंदीर, उज्जैन का महाकालेश्वर मंदिर, शिरडी का साईबाबा मंदिर, शनि शिंगणापुर मंदिर, वैष्णोदेवी मंदिर। यंहा तक की काशी विश्वनाथ मंदिर भी 20 तारीख को जाके बंद होता है। रामेशवरम रामनाथस्वामी मंदिर भी 21 से बंद होता है।* उससे पहले देश के सब बड़े मंदिर खुले थे। सिर्फ छोटे बंद थे।

न्यूज़ नेशन की वीडियो आती है कि *अयोध्या में मंदिर में दर्शन चालू रहते है। कोई नियम नही मानता। भक्त कहते, राम, श्रद्धा, आस्था वालों पर कोई वायरस नही आ सकता।*

*एक जगह पूरे पंडाल में कथा में पुलिस ऑफिसर खुद कथावाचक का माइक लेके जनता को भीड़ हटाने को कहता है बंद के कारण, घर जाके भगवान से मिलने को कहता है।*

*कटिहार में  छठ पूजा के लिए घाट पर हज़ारो इक्कट्ठा होते है। सोशल डिस्टनसिंग  की धज्जियां उड़ती है।*

*शोलापुर, महाराष्ट्र में भी मंदिर पर रथयात्रा निकाली गई और काफी भीड़ हुई जिसको बाद में पुलिस रोकने लगी तो पत्थरबाजी हुई। 6 पुलिस वाले घायल, 100 पर एफआईआर।*

*बंद के बाद मेरठ के औघड़नाथ मंदिर में कुछ लोग इकट्ठा होते है । हवन करवाते है।*

*रामनवमी के अवसर पर शिरडी में मंदिर में पूजा के लिए लोग आते है। मंदीर का सीईओ परिवार के साथ आता है। कोई मास्क नही लगता। सोशल डिस्टनस के नियम टूटते है।*

*रामनवमी पर ही भद्राचलम मंदिर, तेलंगाना में कानून की धज्जी उड़ाकर पूजा की जाती है। तेलेंगाना के 2 मिनिस्टर्स रामचंद्र स्वामी के मंदिर में लोगों के साथ आते है।*

*रामनवमी पर ही बंगाल में हज़ारो भक्त मंदिर में आते है। जयश्रीराम का नारा भी लगाया जाता है।*

*रामनवमी पर बरियातू मोहराबादी में सुबह सुबह ही मंदिरों के बाहर जम कर पूजा सामग्री बिकती है लोगो में।*

*वैष्णो देवी में 450 के करीब लोगो के फंसने की खबर आती है। कोर्ट उनकी।देखभाल के आर्डर देती है।*

दिल्ली मजनू के टीले गुरुद्वारे में 400 लोग फंसे होते है, जमातियों की तरह अपने शहर नहीं जा पाते बंद के कारण। गोवा में 2 हज़ार विदेशी पर्यटक भी फंसे हुए है बंद के कारण। इंडियागेट पर विदेशियों की खुलेआम बस घूमती दिखती है। *संत जग्गी वायुदेव के आश्रम में 150 विदेशी छुपे होते है।* और ये तो वो मामले है जो सामने आ गए। न जाने कितने तो ऐसे मामले सामने आए ही नही। छिपा लिए गए। कोई धार्मिक स्थान अछूता नही रहा। पेरिस तक मे एक चर्च में  हुए प्रोग्राम से 2500 को कोरोना हुआ है।

ग़ाज़ियाबाद में बस अड्डो पर हज़ारो की भीड़ लगती है। फरीदाबाद में मंडी में हज़ारो की भीड़ दिखती है। बंद के बाद भी भीड़। सरकार की नाकामी है ये। इनके क्लिप आये क्या। इनके नहीं आएंगे क्योंकी ये मुसलमानो के नही थे।

कोरोना का सबसे पहला केस भारत मे 30 जनवरी को पाया जाता है। सरकार ने बाहर से आने वालों 15 लाख लोगों पर रोक नही लगाई। स्वास्थ्य को लेके कोई बड़ी तैयारी नही शूरु होती। खतरा देश मे आ चुका था पर सरकार सो रही थी। मरीज़ बढ़ते गए। जमात के मरीज तो बहुत बाद में आये सामने। उससे पहले ही कोरोना पसरना शुरू हो चुका था। कनिका कपुर पॉजिटिव होती है और कितने ही लोगो को मिल चुकी होती है। पर सारा ठिकरा जमात पर फोड़ा गया। क्योंकि कोई बली का बकरा चाहये था जिससे सरकार और प्रशासन की बदइन्तेज़ामी, लापरवाही, निकम्मेपम को छुपाया जा सके और इसके लिए मुसलमान' से अच्छा बकरा कोई हो ही नही सकता आज। जबकि मुसलमान भी उतने ही लापरवाह है जितने हिन्दू। अस्पताल, डॉक्टर, स्टाफ, मेडिकल इक्विपमेंट्स के लिए आज भी सरकार से भीख मांग रहा है। सुविधाओ की कमी में रेनकोट, हेलमेट, गॉगल्स पहनना पड़ रहा है। पर ये न्यूज़ कंही नहीं है। बिना तैयारी के लॉक डाउन होता है और लाखों मज़दूर सड़क पर दिखाई देते है और करोड़ों गरीब घरों में भूखे होते है।   काला बाज़ारी होती है। किस की गलती है। अनुमान है कि 12 करोड़ लोग सड़कों पर है। इस अव्यवस्था को छुपाना है। मीडिया में ये सब नहीं दिखाना है तो बना दो कोरोना को मुसलमान।

*मुरैना में एक पति पत्नी पॉजिटिव पाए जाते है। ये 1500 लोगों को तेरवीं का भोज कराते है। 23 में से 10 रिश्तेदार भी पॉजिटिव आते है।*

*पंजाब में पूर्व हाज़री बाग को कोरोना होता है और वो 100 लोग के साथ कीर्तन करते है।*

*एक महिला ने 1500 लोगों के के साथ सत्संग किया जो कोरोना मरीज़ निकली अभी मुंबई में भर्ती है।*

*अयोध्या में ही 500 लोग कोरोना ग्रसित है।* वंहा कौन सा मरकज़ हैं। वो क्या जमात ने फैलाया है।

मानता हूं कि जमात भी इसे फैलाने में एक कैरियर बनके सामने आई है। पर सारा दोष जमात का नही है। कोरोना पहले से भी फैल रहा था। सरकार तो अपनी कमियों के कारण सबसे बड़ी दोषी है। पर दूसरों का भी दोष है। जंहा जंहा देश मे भीड़ इकट्ठा हुई है, वो सभी भीड़ दोषी है जमात जितनी ही। बस उन सभी भीड़ को पकड़ पर चेक नही किया गया  वरना हर जगह, हर भीड़ में कोरोना मरीज़ मिलता। कमी तो किसी धर्म, किसी समुदाय वालों ने नही छोड़ी। पर फंसाया गया सिर्फ और सिर्फ जमात के बहाने मुसलमान को। असल में साम्प्रदायिकता और धुर्वीकरण के कारण किया गया है। ये तो वही बात हुई कि जो पकड़ा गया वो चोर और जो बाकी बच गए या बचा लिए गए, वो सारे साहूकार।   

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कोरोना और लॉकडाऊन से सबक।

ज़रा सोचो क्या घुटन होगी जब जातिवाद पर पिछड़ों का बहिष्कार किया गया, नस्लवाद पर यहूदियों को कॉनसन्ट्रेशन कैम्प में रखा गया, क्षेत्रवाद पर कश्मीरियों को राज्य में सीमित कर दिया गया। धर्मवाद पर दिल्ली में 1984 में, कश्मीर में 1990 में, गुजरात में 2002 में, अल्पसंख्यकों को छुपके रहना पड़ा। नार्थ ईस्ट दिल्ली में हालिया दंगों में लोग बेसहाय घरों में दुबके रहे।

अपने धर्म, मज़हब, जाती, देश, भाषा, संस्कृति, परंपरा, नस्ल आदि पर लोग खुद को बड़ा समझ रहे थे और दूसरों को छोटा।

ये हमारे देश के नहीं, इन्हें देश से बाहर निकालो। ये हमारे धर्म का नहीं, इन्हें पाकिस्तान भेज दो। ये हमारी जाती का नहीं, इसे समाज से निकालो। ये नार्थ ईस्ट राज्य के है, इन्हे शहर से निकालो। इनकी भाषा अलग है, इन्हें राज्य से निकालो। ये समुदाय देश की दीमक है, इन्हें घरों से, नौकरी से, कामों से निकलो। 

दूसरों के लोकडाउन पर मज़े लेने वाले आज खुद लोकडाउन है। नफरतों के कारण किसी को बेघर करना, किसी को कैंपों में डाल देना, किसी का बहिष्कार करना, किसी के अधिकार छीन लेना, किसी को इंसान ही नहीं समझना, ऐसा सोचना भी अमानवीय है। गड्डा खोदने वाले गड्ढे में गिरते है। 

प्रकृति किसी से भेदभाव नहीं करती। प्रकृति सुविधा हो या प्रकोप सबको बराबर देती है। कोरोना ने समझा दिया की सब एक जैसे है। 

दिन रात, हिन्दू मुस्लिम, मंदिर मस्जिद, भारत पाकिस्तान चाहने वाले आज हॉस्पिटल, डॉक्टर्स, पेरा मेडिकल स्टाफ, मेडिकल इक़वीमेंट्स, सेफ्टी मांग रहे है। लॉकडाऊन में खाने पीने का समान, यातायात, आमदनी, आसरा मांग रहे है। 

प्राथमिकता समझो। कोई धर्म-मज़हब संकट में नहीं है। कोई हिंदू-मुसलमान खतरे में नहीं है। सिर्फ इंसान है खतरे में है। धर्म के नाम पर आपको बरगलाने वालो से अपने लिए सुविधाएं, अस्पताल, स्कूल, स्वास्थ्य, सडकें, पानी, रोटी, मकान, रोज़गार, व्यापार, स्टेबल इकोनॉमि, भविष्य मांगो।

नफरत नहीं, प्रेम बाटों। सब इंसान है। सब बराबर है। सब के अधिकार समान है।

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दंगे, सज़ा या आज़माइश।


*दिल्ली के दंगे मुसलमानों के लिए सज़ा या आज़माइश।*

अगर आप अल्लाह को मानते हो तो यक़ीनन ये भी मानते होंगे कि अल्लाह की।मर्ज़ी के बिना पत्ता भी नही हिलता। तो फिर आपको ये भी मानना पड़ेगा कि अल्लाह को मर्ज़ी के बिना, न दंगा हो सकता, न CAA आ सकता और न NPR या NRC.

पर ये सब हो रहा है। तो सवाल ये है कि फिर अल्लाह हमारी आज़माइश ले रहा है या सज़ा-आज़ाब दे रहा है।

सज़ा और आज़माइश में फ़र्क़ करने का कोई क्लियर कट तरीका नही है। ये तो सेल्फ इंट्रो स्पेक्शन का इशू है यानी खुद में  झांकने कर जवाब लेने का।

सज़ा या आज़ाब और आज़माइश में फ़र्क़ ये है कि..

जब आप अल्लाह, सुन्नत, दीन पर चलोगे और चलने के कारण जो मुश्किलें, तकलीफे, रुकावटे बीच मे आएंगी वो सब आज़माइश में मानी जाती है। जैसा कि हुज़ूर सल्ल०, सहाबी या दूसरे पैग़म्बर झेलते थे। आज़माइश जितनी बढ़ती जाती है, ईमान और ज़्यादा पुख़्ता, निखरता चला जाता है। अल्लाह के करीब और करीब जाने का महसूस होता रहता है। 

आज़माइश का एक रूल ये भी है कि आज़माइश देते हुए रास्ता दिखता रहता है। मंज़िल तो पता होती ही है। मंज़िल भी की कंहा से मिलेगी ये भी दिखता है। कैसे इससे निकलेंगे ये भी मालूम होता चला जाता है। अल्लाह पर यक़ीन बढ़ता चला जाता है। तसल्ली और मुतमयिनी रहती है। एक पाजिटिविटी रहती है। इससे निकलने के बाद आप का मुक़ाम ऊंचा हो जाता है। इसके बाद इनाम है, ख़ासतौर पर आख़िरत में।

पर सज़ा या आज़ाब मिलता है अल्लाह, सुन्नत, दीन को छोड़ने पर। इनको छोड़ देने पर जो आती है वो सब सज़ा हैम जो इंफ्रादी तौर पर मिलेंगी वो सज़ा है। ईशतिमायी तौर पर जो मिलेगी वो आज़ाब होगा। इनमे रास्ता नही दिखता। मंज़िल तो पता ही नही होती। चीज़े हल होती हुई नहीं दिखती है। बेसब्री रहती है। डर रहता है। नेगेटिविटी रहती है। इसके बाद आप का मुक़ाम ऊंचा नही होता बल्कि आप दूसरों के लिए इबरत बनते हो। इसके बाद आख़िरत में भी सज़ा है।

किसी आज़ाब में किसी के लिए आज़माइश भी हो सकती है। 

हमे खुद सोचना है कि हम अल्लाह, सुन्नत, दीन से दूर है या पास। हमे खुद में झांक कर सोचना है कि ये सज़ा है या अज़ामिश? इंफ्रादी है या इश्तिमाई? इसके आने से पहले हम अल्लाह से दूर होते जा रहे थे या पास। इसका हल है हमारे पास या नहीं। जवाब आपको मिल जाएगा।

जब पहले आप ये समझ जाओगे की ये आज़माइश है या सज़ा या आज़ाब। यक़ीनन इन सबका इलाज, मंज़िल, रास्ता, हल वैगरह कंहा से मिलेगा, कैसे मिलेगा, सब बातें आप को सामने साफ साफ़ दिख जाएगी इंशाअल्लाह।

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दिल्ली दंगे और मुसलमान।


*दंगो के बाद मुसलमानों के लिए अब आगे का रास्ता क्या होगा?*

अमित शाह  2002 में गुजरात के गृहमंत्री थे। यूपी में उनको बीजेपी का इंचार्ज बना के भेजा गया और जाते ही 2013 में मुज़फ्फरनगर के दंगे होते है जिस पर चढ़ कर अगले साल केंद्र में बीजेपी सरकार बनती है। अमित शाह का एक खास स्टाइल है काम करने का जो गुजरात मॉडल का हिस्सा है जिसे विकास नाम के रैपर कवर में लपेट कर सामने लाया जाता है।

राजधानी दिल्ली में दंगे होते है। दिल्ली में कभी किसी ने  नही सोचा था दंगे होंगे। ऐसा लगता था की देश मे दंगे अगर किसी शहर में हुए तो सबसे आखिरी शहर दिल्ली होगा।

आज केंद्रीय गृहमंत्री है। काम का स्टाइल वही है। मॉडल भी वही रहता है यानी दंगे, दमन, साम्प्रदायिकता, ध्रुवीकरण। 

जर्मनी, रवांडा, म्यांमार। दुनिया के हर जनोसाइड, नर संघार के पीछे एक ही स्ट्रेटेजी काम कर रही होती है। जिसमे बड़ी आबादी को ये बताया जाता है कि फला क़ौम आपके संसाधन खा रही है और आपके ही टिकड़ों पर पल रहीं है। यंहा भी हिन्दुओ को लोन सफ़रर और मुसलमानों को देश की दीमक दिखाया जा रहा है। 

गुजरात हो या दिल्ली, मॉडस ओपेरंडी वही रहती है। कोई नेता भड़काता है, दंगों की तैयारी पहले से होती है, पुलिस को छूट दी जाती है। पुलिस अल्पसंख्यों को दबाती है, बहुसंख्यको को मदद करती है। कोर्ट नाम मात्र के लिए खानापूर्ति करती है और आगे और ज़्यादा करेगी। सिक्योरिटी फोर्सेज भी पक्षपात करती है।  दिल्ली में दंगों के लिये बाहर से लोग आते है। शराफत का चोगा पहने साम्प्रदायिक लोकल्स अपनी असलियत में आ  जाते है। लोगो के  दिलो में नफरत पहले से बैठी थी, वो उल्टी करते हुए बाहर आ जाती है। डायरेक्टली और इंडारेक्टली, लोगो को सालों की मेहनत द्वारा  एक खास ज़हर से ज़ेहनी तौर पर स्पून फीड किया जा चुका है और जारी है आगे भी रहेगा। आप कुछ नही कर सकते। इसे नहीं रोक सकते।

दिल्ली में भी दंगों का केंद्र वहीं रहता है जंहा बेजेपी की ही सीट्स है। यानी जंहा पहले से ही ओपोर्चुनिटी को एक्सप्लोर या भुनाना आसान होता है। कपिल मिश्रा को इनाम मिलेगा, हीरो बन जायेगा या शायद राज्य सभा सांसद भी।

दिल्ली में लगभग  85% हिन्दू है। इन्ही वोटर्स ने आप पार्टी को वोट दिया था सुविधाओं के आधार पर। अब क्योंकि फ़्री पानी बिजली वाली सरकार बन चुकी है तो अधिकतर यही लोग साम्प्रदायिक माहौल में चिंगारी मिलने पर आग बन गए है। 

केजरीवाल, आप पार्टी, उनके एमएलए, निगम पार्षद, कार्यकता, आप देख ही चुके है। कोई काम नही आया। क्यूंकि मुसलमानों के हक़ में खड़ा होना तो दूर अगर कुछ बोल भी देंगे तो हिन्दुओ के वोट खोने का खतरा है। बीजेपी का वोट शेयर चुनाव में बढ़ा है। ट्रैक रिकॉर्ड बताता है कि अमित शाह इन चीजों से कभी पीछे नही हटता। भले ही नुकसान दोनों तरफ बराबर हुआ है। अभी 4 साल बाकी है। आगे दंगे नही हो सकते ऐसा सोचना ही बेहवक़ूफ़ी है। अगर राजधानी सेफ नही तो देश का कोई कोना सेफ नही है। अब क्या प्लान है आपका। 

दंगे रुक गए है। छुटपुट घटनाये थोड़े दिन और होती रहेगी। अब बेतुकी गिरफरफ्तारियाँ होगी। मुसलमानों की ज़्यादा। हिन्दुओ की भी होंगी पर कम या नाम मात्र की ताकि दुनिया के सामने बैलेंस बना रहे। गीरफ्तारियों में भी हिन्दुओ पर मुक़द्दमे हल्के बनगे। उनके लिए क्राउड फंडिंग होगी। पोलिटिकल प्रेशर भी लगातार बीजेपी पर बना कर उन्ही की रिहाईया भी करायी जाएगी। रिहाई पर मालाएं पहनाई जाएंगी, झुलस निकाला जाएगा। मुस्लिम मोहल्लों में मुखबिर, मुसलमानों को पकड़वाएँगे। बिज़नेस दुबारा खड़ा करने में संघी मानसिकता वाले लोग मुसलमानों का बॉयकॉट करेंगे। यानी हमारी पेरेशानी अभी खत्म होंने वाली नही बल्कि और ज़्यादा बढ़ेगी।

मीडिया सारा दोष मुसलमानो पर डालेगा। एक मुस्लिम चेहरे की तलाश होगी जिस पर दोष मढ़ा जा सके। जो उन्हें मिल भी गया है। लोगो के दिलो में बिठा दिया जाएगा कि उन्होंने जो मुसलमानों के साथ किया सही किया। ये इसी के लायक है।

ये सोचने वाली बात है कि दंगा क्या इसलिए शुरू हुआ कि मुसलमानों ने सड़क बंद, चक्का जाम कर दिया था जिससे लोग आग बबूला हो गए या नही। मान लिया अगर नही भी किया था तो भी किसी न किसी तरफ दोनों पक्षों की भिड़ंत तो होनी ही थी, कुछ ही दिन जा रहे थे। अब नहीं तो कुछ दिन बाद ये होना तो था। क्योंकि संघ, मीडिया, सोशल मीडिया आदि उनके घरों में ज्वालामुखी बना चुका है। अभी तो सिर्फ नार्थ ईस्ट में फटा है।

होना तो ये चाहिए था कि अगर मसुलमान कंही किनारे पर या सड़क पर प्रदर्शन कर रहे है तो प्रशासन उसे हटाये। पर प्रशासन के कोई एक्शन लेने से पहले ही पब्लिक घरों से बाहर आ जाती है। समझाने नहीं, बल्कि मार काट करने। चोट सबसे ज़्यादा मज़दूर और गरीब तबके को पड़ी है। जो होता ही है। और जो थोड़े से घरों के साथ बहुसंख्यों के मोहल्लों में रहते है। ऐसे लोगो को तुरंत मुस्लिम बहुल इलाकों में या उसके पास शिफ्ट कर जाना चाहिए, क्योंकि आगे वक़्त मुश्किल से मुश्किल होता जाएगा। 

रिहैबिलिटेशन के अलावा, अब सवाल ये है कि क्या प्रोटस्ट जारी रहेगा। क्या रास्ता बंद, चक्का जाम जैसा आत्मघाती फैसला फिर से लिया जायगा। क्या सरकार हमारी मांग मान लेगी?

ये सरकार आपकी बात कभी नही मानेंगी। चक्का जाम विरोध से उनका बल, वोटर और मजबूत हुआ है और हो रहा है। ऐसे ही रिजल्ट आते गए तो दूसरी सभी पार्टिया भी धीरे धीरे प्रोटेस्ट से दूरी बना लेंगी। तो फिर मुसलमानों के लिए हल क्या है। ज़िंदा क़ौमे 100 साल का प्लान बना के चलती है। हमारे पास कल तक का नही है। तो क्या करे।

जिस तरह कलमा पढ़ कर कोई मुसलमान बन जाता है और उसी कलमे का इनकार करके काफ़िर। उसी तरह अगर संघ लोगो के दिल में जगह बनाता जा रहा है तो हमें लोगो के दिल में जगह बनानी पड़ेगी। ग़रज़ आपकी है उनकी नहीं। विरोध जारी रखिये पर हिकमत से। पर अल्लाह की मर्ज़ी के बिना विरोध कामयाब हो जाएगा क्या। अगर अल्लाह चाहता तो दंगे ही नही होते। पर हुए।  वो होने दे रहा तभी तो हम पिट रहे है हर जगह।

तो फिर अल्लाह हमसे चाहता क्या है। ये आज़माइश नही बल्कि सज़ा या आज़ाब चल रहा है। ज़ाहिर है हम तो दीन से बहुत दूर है। दीन पर आ जाइये, अल्ल्लाह की मदद आना शुरू हो जाएगी। रास्ते बनते चले जायेंगे। उसके प्लान के आगे किस का प्लान चलता है। खुद को सच्चा मुसलमान बनाइये, तक़वा अपनाईये, रहमत बन जाइए, अपनी ज़िम्मेदारिया निभाइए, लोगो को उसका तार्रुफ़ कराइये, दावाह का काम करिए। 

*क़ुरान कहता हैं कि अगर तुम ईमान वाले हो तो तुम ही ग़ालिब होगे*

आज हमारा ईमान सिर्फ नाम भर का है तभी आज हम दुनिया पर ग़ालिब नही आ पाए। ईमान पुख्ता करिए, दुनिया के तख्त तुम्हारे होंगे।

*आपके सामने एक तरफ विकास का मॉडल उर्फ गुजरात का मॉडल है। और दूसरी तरफ अल्लाह का मॉडल है। जो बेहतर लगे चुन लीजिये।*

*कल जुम्मा नमाज़ है। मुसलमान सड़को पर निकेलगा। कल भी खास ध्यान रखा जाए। टकराव का चांस है।*


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CAA, NPR, NRC और मुसलमान।

मुस्लिम तुष्टिकरण प्रोपेगंडा, लव जिहाद, गौहत्या, लीनचिंग से होते हुए हज सब्सिडी, ट्रिपल तलाक़, 370 पार करते हुए बाबरी पर राममन्दिर बनाने तक पहुंच गए है।

CAA के बाद अभी NPR, NRC बाकी है।

फिर Uniform Civil Code (समान कानून सभी के लिए खासतौर पर मुसलमान), Population Control Bill (केवल 2 बच्चे पैदा करने का कानून)

मदरसा बंद, बुर्का बंद, बकरा ईद पर क़ुरबानी बंद, लाउडस्पीकर पर अज़ान बंद, सड़कों पर नमाज़ बंद, टोपी-दाढ़ी बंद आदि।

NRC न हुई तो ये उससे हल्का कुछ लाएंगे मसुलमानों को तंग करने के लिए, नही तो कुछ और नही तो कुछ और। इनके पास कमी नही है। लिस्ट बहुत लंबी है। उनके प्लान खत्म नही होंगे।। 

वो वक़्त भी आएगा जब वो कहँगे की नमाज़ पढ़ो पर सड़कों पर नही, अज़ान दो पर स्पीकर पर नही, बच्चे करो पर 2 से ज़्यादा नही, शादी करो पर 1 से ज़्यादा नहीं, तलाक दो पर 3 नहीं, क़ुरबानी करो पर बकरा ईद पर नही, मीट खाओ बड़े का नही, टोपी लगाओ पर खुले में नहीं, वैगेरह।

कानून से नही तो ऐसा माहौल बना दिया जाएगा कि पब्लिक मुसलमानो को मजबूर कर देगी ये बंद करने के लिए। हालांकि वो खुद अपने लिए सड़के और लाउडस्पीकर का इस्तेमाल करते रहेंगे। वैसे तो इनमे से कुछ काम पर हमे खुद ही ध्यान देना था। थोड़ा ध्यान दिया भी है। पर वो ये सब काम पूरी तरह करंगे ही।

अपने मंसूबों पर वो लगभग 100 साल से काम कर रहे है। पर अब काम तेज़ हो चुका है। अभी और तेज़ होना बाकी है। हिदू राष्ट् और राम राज्य का मक़सद 2025 तक पाने का है फिलहाल। वो आप जानते ही हो। इनके पास दशकों प्लान है। 

अगर किसी तरह आप विरोध करके उन्हें रोक भी देते हो NRC न लाने के लिए तो भी ज़्यादा समय नही लगेगा जब वो फिर NRC को वापिस ले आएंगे जब उनके पास एक अच्छा  बहुमत होगा संसद में  और पब्लिक में भी। क्यूँकि मुसलमानों से छुटकारा पाने का सबसे कारगर तरीका NRC साबित हो चुका है असम में, बाकी धर्म वालो को बचा लेंगे जेसे तैसे। हालांकि वो भी इनकी बाद वाली हिटलिस्ट में है।

उन्हें जिस काम के लिए जितवाया गया है, उन प्लान पर वो आखिरकार अब ज़ोर शोर से काम करना शुरू कर चुके है। क्यूंकि वो जानते है लोग उनके साथ बढ़ते जा रहे है और ऐसे ही काम करते रहे तो और बढ़ते जाएंगे। मोदी की उम्र बढ़ रही है तो कल के लिए योगी को PM पद के लिए पहले ही प्लांट किया जा चुका है। अमित शाह के नाम और काम में वो बात नही जो योगी में है। 

अगर हमारे साथ गैर मुस्लिम विरोध में जुड़ रहे है तो उनके साथ भी दिन ब दिन और जुड़ते जा रहे है। उनकी मशीनरी अपना काम बखूबी कर रही है मुसलमानों के खिलाफ एक जुट करने में। जिसका सहारा वो ले रहे है विरोध में हुई हिंसा, पाकिस्तानी हिन्दुओ को मज़लूम दिखा कर और मुसलमानों के खिलाफ पहले से दिलों में बैठी नफरत को चिंगारी को हवा दिखा कर और भी बहुत वजह है। इनका प्रोपोगंडा चालू है। किताबों से इतिहास, जगह के नाम भी बदलना चालू है। और मुसलमानों के बनाये मोनुमेंट्स को हिन्दू बताना भी चालू है। साइकोलोजिकल गेम चालू है, आगे भी रहेगी।

पब्लिक को वो हमसे ज्यादा तेजी से अपनी तरफ करते जा रहे है। नोटबन्दी, GST आदि में भी यही हुआ था, शुरू में उनके चाहने वाले लोगों ने नोटबन्दी को ज़रूरी बताया, फिर नोटबन्दी में हालात देख कर नोटबन्दी को कोसा भी पर कुछ महीने बाद इसे भूल कर फिर से नोटबन्दी करने वालो की वाहवाही करने लगे। असल मे उन्हें अपनी चोट से ज़्यादा मुसलमानों को चोट लगने पर मज़ा आता है आजकल।

तभी तो वो सरकार से थप्पड़ खाते भी जा रहे है और भक्ति भी करते जा रहे है क्योंकिं उनके दिलों में ये बैठ चुका है और बिठाया जा रहा है कि मुसलमान दीमक थे, है, रहंगे, पूरी दुनिया मे।

हर बंदा अगर एक को इन्फ्लुएंस कर सकता है तो आज अगर 100 लोगों में से 15 मुसलमान है और वो अपनी तरफ 15  हिन्दू भाइयों को ले आते है विरोध में, इन मुद्दों को गलत साबित कर कर। तो उनके 35% वोटर भी अपनी तरफ कम से कम 35 लोगों को लाने को कोशिश कर रहे है और कामयाब भी हो रहे है। ज़ाहिर हमसे से ज़्यादा उनको तरफ लोग इकट्ठा होंगे जो ये सारे बिल का समर्थन करंगे। यानी मेजोरिटी उनके पास कल भी रहेगी। आप देख लीजिए ग्राउंड लेवल और सोशल मीडिया पर भी लोग हमारे विरुद्ध धीरे धीरे बढ़ते जा रहे है।

अगली बार हम गैर भाजपा पार्टियों का समर्थन कर के गैर भाजपाइ सरकार बना भी देते है तो भी बीजेपी,आरएसएस की मशीनरी चालू है, जैसे 2014 से पहले चालू थी, वो फिर से एन्टी इनकंबेंसी (सरकार विरोधी लहर, जैसा 2014 में भी बनाई थी, जो बनाना बड़ी बात नही क्यूंकि सभी पार्टियां करप्ट होती है और उपर से उसमे हिन्दू मुस्लिम का तड़का लगा दो तो बननी ही बननी है) बना देगी और वो फिर से पावर में लौट आएंगे। वो भी 10 साल के लिए। क्योंकि पब्लिक में ये भरोसा बना चुके है अपनी मुस्लिम विरोधी रणनीति के कारण, की सिर्फ 5 साल का टर्म इन्हें देना लोगो को कम लागत है।

उसके बाद, आप फिर से दूसरी पार्टियों के साथ मिल कर गैर भाजपा पार्टियों को चुनाव जिताएंगे, ये फिर से एन्टी इनकंबेंसी बना कर फिर वपिस आएंगे। ये चूहे बिल्ली का खेल खत्म नही होगा। संघ सोच की सरकारें आती रहेंगी बार बार क्योंकि संघ अपनी पैठ लोगो के घरों और दिमागों में बना चुका है।

वैसे भी केंद्र सरकार के विरुद्ध कोई भी गठबधंन बना लो, वो चुनाव से पहले टूट ही जाता है जिसकी वजह इसमे जुड़ी पार्टियों का पुराना भ्रष्टाचार, CBI, ED, अंदुरुनी राजनीति, भविष्य में बड़ा पद, स्वार्थ आदि होते है। इतिहास यही है कि सभी पार्टियां राजनेता खुदगर्ज़  है, जो समय और ज़रूरत के मुताबिक जगह और सोच बदलते है।

ये ऐसे ही चलता रहेगा क्योंकि मुसलमान इसका इलाज रद्दे अमल (reaction) में ढूढं रहे है अमल (action) में नही। रद्दे अमल फौरी तौर पर तो फायदा दे सकता है पर हमेशा के लिए नही। रद्दे अमल से ज़्यादा अमल की ज़रूरत है। वही अमल जो दीन आपको ज़िन्दगी के हर हिस्से, हर उम्र, हर जगह करने के को कहता है जिसमे से ज़ालिम और ज़ुल्म के खिलाफ आवाज़ बुलुन्द करना तो है ही। पर और भी बहुत कुछ है।

जब हम ये कहते है कि अल्लाह की मर्ज़ी के बिना पत्ता भी नही हिल सकता तो बिना अल्लाह की मर्ज़ी से ये कैसे हो सकता है कि भाजपा आरएसएस 10 साल तक राज करंगे। यानी अल्लाह ने ही इन्हें सत्ता पर काबिज होने दिया है। जो चीज़ ये कर रहे है, वो अल्लाह इन्हें करने दे रहा है। क्यों? क्योंकि यही शायद आज़ाब है। यही वो सज़ा है जो हमें दीन से दूर जाने पर मिल रही है।

यही वो वक़्त है जब हमें आने अमालों को सही करना है। सिर्फ इस्लाम को दूसरों को समझाना नही बल्कि उन्हें जी कर दिखाना है कि ऐसे होते मुसलमान और ऐसा दिखता है इस्लाम। बोलने से नही करके दिखाना है। प्रोटेस्ट भी करना है।

आज मुलसमान, अल्लाह से ज़्यादा पैसे को अपना इलाह मानता है, नमाज़ पढ़ता नही, पढ़ता है तो ज़ेहन कंही और होता है, बेईमानी की कमाई खा कर नमाज़ रोज़े करता है, रोज़ों में कोई बुराई करने से नही छोड़ता है जैसे झूट धोखा आदि, ज़कात बचाने के लिए जुगाड़ लगता है, ज़कात किसी को भी दे देता है, 10 बार हज उमराह करता है और उसी का पड़ोसी या रिश्तेदार हज़ार रुपए के लिए तरसता है। बकरा ईद पर क़ुरबानी करता है और पूरे साल पड़ोस में कौन भूखा सोया जानना भी नही चाहता, चाय की दुकान चौपालों पर गप्पे हांकता है। फिरकेबाज़ी गालीबाज़ी इश्कबाज़ी बेहयाई करता है। पर्टीबाज़ीयाँ शराब ज़िना ब्याज़ झूट लूटमार चोरी क्या नही है हमारे अंदर।

मिलावट करता है।  नाजायज़ मुनाफा कमाता है। नाजायज़ कीमतें रखता है। गबन करता है। पैसे मरता है। हक़ मरता है लोगों के रिश्तेदारों के। शायद ही ऐसी कोई बुराई दुनिया मे हो जो आज मुसलमान के दामन पर न लगी हो। बदमाशी करता है। करप्ट पॉलिटिक्स करता है।

हराम कि कमाई जेब मे डाल कर हलाल गोश्त की दुकान ढूंढता है। रोज़ा नमाज़ को ज़रूरी नही, इफ्तार करने को ज़ुरूरी मानता है। दूसरे के हक़ मारता है पर गोश्त खाना अपना सबसे बड़ा हक़ मानता है।  आज मुसलमान, इंसान को इंसान नही मानता। 

आज कोई किसी को तब तक नही चाहता जब तक वो उसके किसी काम का न हो। मुसलमान क़ौम से आज किसी के काम की नही क्योंकि हमने लोगो को फायदा पहुंचाना बंद कर दिया है। तो गैर मुस्लिम भी हमें क्यों चाहेंगे। अब हम ख़ैरे उम्मत नही रही। जो लोगों के लिए फायदेमंद वही ज़मी पर बाकी रहता है।

अभी भी वक़्त सुधरने का। खुद को सुधारने का। बिना अल्लाह के हुकुम माने, अल्लाह की मदद आ जायेगी क्या? और बीना उसकी मदद के कोई जंग जीती जा सकती है क्या? तो अपने अमाल ठीक करो, अख़लाक़ ठीक करो, अपनी ज़िम्मेदारीया निभाओ, अपनी इबादतें ठीक करो, पूरी करो, अपना व्यवहार, बातचीत, लेनदेन ठीक करों, गैर मुस्लिम को कर के दिखाओ की इस्लाम मुसलमान कैसे होते है। उन् तक अल्लाह का पैग़ाम दावत पहुंचाओ। हुज्जत क़ायम करो। ज़ुल्म के खिलाफ आवाज़ उठाओ चाहे अपने लिए हो या किसी और के लिए। उम्मत की जिम्मेदारी निभाओ।

दमदार क़ौमे सदियों तक का प्लान करके रखती है। हमारे पास क्या प्लान है? जबकि हमें तो दीन ने कभी न खत्म होने वाली ज़िन्दगी का प्लान देखने को कहा था और उसके लिए अपने काम दुरुस्त रखने का हुक्म दिया था।

दुश्मनों को पलटना है तो पहले खुद को पलटना होगा। दूसरों को बदलने से पहले खुद को बदलना होग। आप दीन के रास्ते पर आओ आपके दुश्मन अपने आप रास्ते पर आ जाएंगे। इस्लाम के लिए मर के बाद में दिखाना पहले इस्लाम के लिए जी कर दिखाओं, इस्लाम पर चल कर दिखाओ दूसरों को इस्लाम सिर्फ मुंह से नही बल्कि अपने अमालों से दिखाओं। आज की परेशानी का हल किसी और से मांगने की बाजए आपके हाथ में रखा है, मुठ्ठी खोलिए तो सही.

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दिल्ली चुनाव 2019

यंहा हम दिल्ली चुनाव का विश्लेषण, वोटर नम्बर्स या सीटों में नही, बल्कि पपरसेंटेज में करेंगे ताकि पब्लिक के मूड में आये बदलाव को समझा जा सके।

बीजेपी का वोट शेयर 38% से ज़्यादा आया है। 2015 में 32% और 2013 में 33% था। यानी एक तिहाई से ज़्यादा भक्त हमेशा रहै है दिल्ली में जो बढ़ रहे हैं अब, जबकि दिल्ली देश की राजधानी है और पढ़े लिखों का शहर माना जाता है।दिल्ली से कम डेवेलप शहरों, दूर दराज़ और गांव दिहातों में संघ और बीजेपी की भक्ति और इनके प्रोपगंडा का क्या आलम होगा आप समझ सकते है। जो 2014, 2017, 2019 में देख चुके है।

1993 के बाद ये बीजेपी का सबसे अधिक है वोट शेयर है। 1993 में 48% आया था। हमें नही भूलना चाहिए कि बाबरी मस्जिद और दंगों के बाद 1993 में देश और दिल्ली में किस तरह का माहौल था। 

इस बार बीजेपी का वोट शेयर 2015 के मुकाबले लगभग 20% बढ़ गया है। जिसकी वजह सिर्फ और सिर्फ बीजेपी की कम्युनल पॉलिटिक्स और उनके द्वारा शाहीन बाग़ का मुद्दा अपने प्रोपग्रन्डा के हिसाब से उठाना है। दिल्ली में आप पार्टी के बोलबाले के बाद भी, सिर्फ 1 महीने के अंदर ही इस मुद्दे को भुनाने के बाद, इतना वोट बढ़ना यही बताता है कि इस तरह के मुद्दे आगे और ज़ोर शोर से उठेंगे।

वंही आप पार्टी का लगभग 1.5% कम हुआ है (जबकि ये बढ़ना चाहिए था क्योंकि भारत में तथाकथित इतनी फ्री सब्सिडी, फैसिलिटी आदि किसी राज्य में नही दी जारी है)। 

आज भी आप सोशल मीडिया उठा के देख लो, लेस एजुकेटेड, मिडिल और लोअर क्लास के आप वोटर्स, बीजेपी के इस बहकावे में तो आये की शाहीन बाग़ में देशद्रोही काम हो रहा है। पर उन्होंने इसके लिए उन्होंने अमित शाह को ज़िम्मेदार माना और ये भी कहते रहे कि पुलिस उन्हें वंहा से जानभूज कर नहीं हटा रही है, इलेक्शन होने तक, और इलेक्शन के बाद हटा देगी और हटने भी चाहिए। ऐसे लोगों पर शाहीन बाग का मुद्दा नेगेटिव काम तो किया पर इतना नही की वो केजरीवल से उनका मोह भंग हो जाये। यानी ये लोग फ्यूचर में बीजेपी के पोटेंशियल वोटर हो सकते है अगर हिन्दू मुस्लिम मुद्दे यूँही चकते रहे।

केजरीवाल और सिसोदिया शाहीन बाग न तो गए और न उस पर कुछ खुल कर बोले तब जाके ये वोटो में गिरावट 1% से ज़्यादा रही। अगर वो शाहीन बाग को सपोर्ट कर देते तो यकीनन इसमे बहुत गिरावट आ जाती। और वो ये बात जानते थे इसलिए उन्होंने वंहा से दूरी बनाए रखी। यंहा तक कि केजरीवाल इस पूरे वक़्त हनुमान चालीसा, हनुमान भक्त और हनुमान मंदिर का ज़िक्र करते रहेत ताकि बीजेपी उन पर एन्टी हिन्दू का दाग न लगा पाए यानी पब्लिक को इनडायरेक्टली धर्म की डोज़ देते रहे।  वो जानते है कि आम पब्लिक को आम तौर पर भाजपा की पॉलिसी भाती है, तभी तो सेंटर के इलेक्शन में बीजेपी सबको धर्मं और देशभक्ति की आर्टिफीसियल हवा में बहाये ले जाती है जिसे मोदी लहर कहा जाता है।

वंही कांग्रेस का शेयर पिछले दिल्ली चूनाव के मुक़ाबले लगभगब 57% कम हुआ।  यानी कांग्रेस का वोट, बीजेपी को ट्रांसफर हुआ है। हालांकि कांग्रेस ने आखिरी पड़ाव मे ढीला प्रचार भी किया जानभूज कर और मजबूरी में हार देखते हुए।

मलतब निष्कर्ष ये है कि हम कितना भी बीजेपी, संघ, NRC, NPR, CAA का विरोध कर ले, हमारे से ज़्यादा भीड़ उनकी तरफ इकट्ठा हो रही है। ये तो बस देखने का फेर है। हमे सिर्फ अपनी तरफ खड़े लोग दिख रहे है और ये लग यह  लग यह लग रहा है कि गैर मुस्लिम हमारे साथ आ रहे है। ये सच है कि आ रहे है हमारे साथ पर उससे ज़्यादा उनकी तरफ जा रहे है। 

पहले दिया हुआ लॉजिक दुबारा देता हूँ कि हर बंदा अगर एक को इन्फ्लुएंस कर सकता है तो आज मुसलमान की आबादी 15% है (इसमें वो सब भी शामिल है जो वोट नही करते)।


अगर 100 लोगों में से 15 मुसलमान है और वो अपनी तरफ 15 हिन्दू भाइयों को ले आते है समझा कर की उनके साथ गलत हो रहा है और हमारे साथ दीजिये इन मुद्दों और विरोधो में।


तो  वो लोग 80% आबादी है और वोटरो में उनके वोटर 38% थे 2019 में (ये भी 2014 से लगभग 20% से ज़्यादा था, ये भी बढ़ रहा है)।

अगर NDA (बीजेपी को सींचने वाली पार्टिया जिनकी विचारधारा भी हिंदुत्व के आस पास धूमती है ) के भी जोड़ो तो 45% वोटर्स है। यानी वो 45 लोगो अपनी तरफ 45 लोगों को ला रहे है। उनकी गिनती ज़्यादा है । ज़ाहिर है उनकी तरफ भीड़ ज़्यादा हो रही है और होती रहेगी। 

आखिरी बात ये है कि दिल्ली इलेक्शन रिज़ल्ट एक रिलीफ तो है पर ये नेशनल लेवल पर कुछ खास पोलिटिकल डिस्कोर्स नही बदल पायेगा जो पिछले 6-8 साल से चल रहा है। उसी तरह जैसे मुसलमानों का अभी जारी विरोध टेम्पररी रिलीफ तो देगा पर परेशानी का बुनियादी हल नहीं दे पाएगा। मुसलमानों के लिए मुक़म्मल हल कंही और रखा हुआ है।

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