क्या मुसलामनों को हिन्दू धर्म अपना ले चाहिए क्योंकि वो पहले हिन्दू ही थे।
धर्म परिवर्तन पर दोहरा रवैया क्यों।
आर्य या सनातन धर्म में कोई ईसाई या मुसलमान वापिसी करें तो लोगों को बड़ी खुशी होती है। पर जब कोई हिन्दू, दलित, आदिवासी, ईसाईयत या इस्लाम अपनाता है तो उस पर हाय हल्ला और नेगेटिव दुष्प्रचार होता है। आखिर दोनों ही केसेज़ में अपनी मर्ज़ी से धर्म परिवर्तन होता है तो एक में दुख और दूसरे में सुख क्यों होता है। ऐस दोगला रवैया और दोहरा चरित्र क्यों है। दो अलग मापदंड क्यों?
घर वापसी कंहा करें।
किस धर्म में वापस आएं? क्योंकि आपका एकेश्वरवादी धर्म जो स्वामी दयानंद जी के 150 वर्ष पुराने वेदार्थ पर आधारित है वो तो आर्य समाजी धर्म तो इस्लाम के बहुत बाद में पैदा हुआ। आर्य सामजी धर्म से तो इस्लाम ही प्राचीन है तो आर्य समाजियो इस्लाम क्यों नहीं अपना लेते। जबकि स्वामी जी से पहले सभी विद्वानों का वेदार्थ बहुदेववादी था जो सदियों से माना जाता आ रहा है। कोई उस बहुदेववादी धर्म को मानने लगा तो स्वामी जी के मत और शिक्षा का विरोधी हो जाएगा जो यह कहती है कि आरम्भ में सनातन धर्म एकेश्वरवादी था। इन दोनों में बड़ी कंफ्यूजन है की सत्य धर्म कौन सा है।
आखिर कौन से धर्म में वापसी करें, पौराणिक धर्म में या आर्य धर्म में। उस में जिस में हनुमान जी को वानर माना जाता है? या जिस में उन्हें केवल एक मानव माना जाता है? किस हिन्दू धर्म में वापिस आये, उस में जिस में राम जी एक ईश अवतार माने जाते है? या उस में जिस में उन्हें सिर्फ एक मनुष्य माना जाता है। कौन से सनातन धर्म में वापसी करें। जिस मे श्रीकृष्ण को परब्रह्म माना जाता या जिस में उन्हें केवल महामानव माना जाता है। सत्य ये है कि आपको पता ही नहीं कि आपका सही धर्म कौन सा है? कोई भी मनुष्य या पशु आराध्य नहीं हो सकता, यही वेदानुकूल मत है। क्योंकि आराध्य या उपासनीय केवल एक निराकर ईश्वर है और कोई नहीं।
विज्ञान के आधार पर चले तो सब पहले आदिमानव थे यानी अधार्मिक तो आपके तर्क़ अनुसार पूर्वजो को अनुसरण करना है तो आप क्यों नहीं घर वापसी करते और धर्म छोड़ के आदिमानव जैसा जीवन बिताते? लाखों करोड़ों वर्ष पहले आपके पूर्वज, आदिवासी थे और किसी धर्म को न मानने वाले थे। घर वापसी के तर्क से चले तो फिर क्या लोगो को धर्म छोड़कर अपने सबसे पहले मत को अपनाना लेना चाहिए यानी आदिवासी बन जाना चाहिए या आदिमानवों वाली प्रवत्ति अपना लेनी चाहिए। आप कब वापिसी कर रहे है? रही बात पूर्वजों की तो वैज्ञानिक तौर कोई भी यह सिद्ध नहीं कर सकता कि उसके पूर्वज कौन थे या किस धर्म पर थे।
घर वापसी पर कौन सा वर्ण मिलेगा।
अगर ईसाई लालच देकर और मुस्लिम दूसरों को डरा कर परिवर्तन करते है। तो आर्य और स्वर्ण लोग क्यों नहीं प्रेम भाव से 1 भी शुद्र का वर्ण, जाति परिवर्तन या हिन्दू धर्म छोड़के गए अधिकतर लोगों का वापस धर्म परिवर्तन क्यों नहीं कर पाए। क्योंकि उन्हें दूसरे धर्मों में बराबरी और आत्मसम्मान मिला। क्योंकि यंहा तो ऋग्वेद के पुरूष सूक्त में लिखा है कि ब्रह्मण्ड मुख से और शूद्र पैरों से उत्पन्न हुआ और यही कारण है की सदियों तक शुद्रो के साथ लूटपाट, बालात्कार, हत्या और अत्याचार हुए। हिन्दू धर्म में अगर कोई वापस आए या घर वापसी करे तो कौन सा वर्ण या जाती दी जाएगी? यह भी बताएं।
हिन्दू कोई धर्म ही नही तो वापसी कैसी।
हिन्दू कोई धर्म नहीं है। किसी भी धर्म ग्रंथ में हिन्दू शब्द है ही नहीं। इस नाम का कोई धर्म ही नही है। और वेदो में सनातन धर्म नाम का भी कोई धर्म या शब्द नहीं है। पहले इस शब्द को दिखाया जाए तब यह माना जायेगा कि हिन्दू धर्म एक धर्म है वर्ना हिन्दू धर्म या सनातन धर्म में बुलाने का कोई औचित्य नहीं है।
हिन्दू प्राचीनतम धर्म होने का मिथ।
हिन्दू की तरह अन्य सभी धर्म वाले भी यही कहते है की सबसे पुराना धर्म उनका है जैसे इस्लाम या ईसाई जिनका मानना है कि प्रथम मानव एडम थे। तो उनके धर्मों में जाना भी घर वापसी क्यों नहीं हुई? क्योंकि चाहे वो हो या आप, कोई भी आर्कियोलॉजिकल प्रमाणों से ये साबित नही कर सकता कि सबसे पुराना धर्म उसका है। दूसरी बात, सनातनियों का ये दावा भी सहित्य और माइथोलॉजि के आधार पर है। और मुसलमानों का दावा उनके साहित्य के आधार पर है। तो दोनों के दावों में अंतर कंहा रहा। जिस तरह धार्मिक साहित्य के आधार पर आप सनातन धर्म को सबसे पहला धर्म बता रहे हो। इसी तरह मुसलमान अपने धार्मिक साहित्य के अनुसार इस्लाम को सबसे पहला धर्म बता रहे है। तो दोनों के दावों में बराबर भार हुआ।
पहले दुनिया के सभी लोग सनातन धर्म के नही थे। बुद्ध, जैन, नास्तिक भी थे। सिद्धार्थ गौतम थे और अन्य 27 बुद्ध भी हुए है। महावीर स्वामी थे और अन्य 23 तीर्थंकर भी हुए है। ये सब किस धर्म के थे? चार्वाक- लोकायुक्त जैसे अनगिनत नास्तिक विद्वान भी थे। इन सभी की परम्पराएं, घराने और अनुयायी थे। यंहा तक कि लोग अधर्मी भी थे जिन्हें वेदों और स्मृतियों में वेदनिन्दक, ब्रह्मद्विष और नास्तिक कहा गया है। दूसरे देशों में रहने वाले या दूसरे धर्म के लोगों को मलेच्छ, अनार्य, असुर, शुद्र आदि कहा गया है। सनातन धर्म से युद्ध करने वालों को चंडाल, राक्षस, पिशाच, दैत्य, दानव आदि कहा गया है। वेदो सनातन धर्म के न मानने वालों को दस्यु धर्म वाला कहा गया है। इसलिए ये कहना ठीक नहीं है कि पहले सभी एक ही धर्म पर थे। अथर्ववेद के 12वे कांड के 1 सूक्त का 45 मंत्र साबित करता है कि वैदिक काल में भी विभिन्न प्रकार के धर्म थे।
क्या वेद प्राचीनतम ग्रन्थ है।
सबसे पुराना ग्रन्थ ऋग्वेद है, इसका कोई पुरातत्विक प्रमाण नहीं है। यह केवल एक मान्यता है। जेंद अवेस्ता से लगभग 450 शब्द ऋग्वेद में प्रयोग हुए है। और ये बात एक वैज्ञानिक सत्य है कि अवेस्ता भाषा के सबूट 4 हज़ार साल से पुराने मिल चूके है पर संस्कृत के 2 - 2.5 हजार से पुराने लेख या पुरातात्विक प्रमाण नहीं मिले है। यानी आपका प्राचीन ग्रँथ और धर्म मानने का आधार केवल आपकी मान्यता है। यही मान्यता दूसरे धर्मों की भी। तो फिर सब मे अंतर कंहा रह गया। आपका भी केवल दावा हुआ और अन्यो का भी।
दूसरी बात वेद ही प्रथम और अंतिम ईश्वरीय ग्रन्थ है यह बात किसी तरह से भी वेदो में साबित नहीं होती है। जिसका अर्थ ये हुआ कि वेद के बाद भी ईश्वरीय ज्ञान आना था इसलिए वेदों ने वेद को अंतिम ग्रन्थ बताकर कोई रोक नहीं लगाई। यानी बाद में वेदो के अपडेटेड वर्ज़न आने थे जैसे तनख, बाइबिल आदि और फिर अंतिम क़ुरान। न ही वेदो में यह कंही दावा किया गया है कि वेद दुनिया में एकलौता सत्य रहेगा हमेशा।
जबकि क़ुरान साफ कहता है कि यही शिक्षाएं तुम से पहले आये लोगों को दी गयी है और दुनिया की हर क़ौम में संदेश भेजा गया है। ज़बूर, तौरेत, इंजील, सुहुफे और ज़ुबुरुल अव्वलीन (जिसका अर्थ है प्राचीनतम ग्रन्थ) जैसे ग्रंथों के नाम भी बताए है जो पहले के इसानों को दी गए थे।
वेद प्रथम और अंतिम ईश्वरीय ग्रन्थ है।
यह तर्क दिया जाता है कि ईश्वर बार बार धर्म नहीं भेजता और इसलिए बाद में आई सारी ईश्वरीय कही जाने वाली किताबे गलत है। इसलिये केवल सृष्टि के आदि में दिए जाने वाला धर्म और वेद सही है। पर इस तर्क में सबसे बड़ी कमी यही है कि अगर एक बार भेजा गया ग्रन्थ ही अंत तक के लिए काफी था तो बार बार वेदो का अवतरण क्यों हुआ और क्यों एक के बाद एक वेद आते रहे और अंत में 4 हो गए? इस तर्क से चले तो यही सवाल उठेगा की क्या पहला वेद, अंतिम दिन या महाप्रलय तक के लिए काफी नही था? जो बार बार अपडेट होता रहा। बहुत से विद्वानों का मानना है कि वेद एक ही था अर्थात ऋग्वेद, जिसके अंश करके 4 भागों में बंटा गया और 4 वेद वजूद में आए। जबकि भाषा विद्वानों ने सिद्ध कर दिया है कि ऋग्वेद से अथर्वेद तक आते आते इनकी संस्कृत कम जटिल और कम प्राचीन होती चली जाती है जो इनके क्रमवार निर्माण को दर्शाता है। यंहा तक कि ऋग्वेद की कई ऋचाओं का प्रयोग अन्य वेदों में हुआ है उसी तरह जैसे संसार में सामान्यतः उत्तम भाषा और श्रेष्ठ लेखन आगे कॉपी होता है।
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