Tuesday, 4 August 2020

क्या हज में सोशल डिस्टेनसिंग रखना गलता और हिना खान द्वारा धार्मिक बन जाना पब्लिसिटी स्टंट है?


बोद्ध अनुयाइयों द्वारा ये प्रश्न किया गया कि क्या कोरोना अल्लाह से बड़ा हो गया क्यूँकि मक्का जो अल्लाह का घर है , में हज सोशल डिस्टनसिंग का पालन करते हुए किया गया।

इस सृष्टि के निर्माता, जिसे आम भाषा मे सुप्रीम बीइंग कहँगे और आम वैज्ञानिक जिसे नेचर कहता है, ने संसार को नियमानुसार चाल पर रखा है। जिसमे प्राकृतिक कानून आम तौर पर एक्शन रिएक्शन की चाल पर चलते है। जैसे परवाह न करने पर बीमार हो जाना और इलाज करवाने पर सेहतमंद हो जाना। इस कानून का पालन भी उसका एक और अन्य नियम और शिक्षा है।  इसलिए मक्का जो उसका घर कहा जाता है या हम कहते है, पर जंहा वह रहता नहीं है, वो जगह भी इन नियमों से परे नहीं है और न ही उसके भक्त। ये कोरोना भी उसका एक प्रकृतिक नियम या बीमारी है और बीमारियों से बचना भी उसी की एक शिक्षा।


महान संविधान द्वारा समाप्त की गयी अश्पृश्यता को एक अदने से वायरस ने दुबारा स्थापित कर दिया। अब क्या वायरस संविबधान से बड़ा माना जायेगा? जिस तरह संविधान अश्पृश्यता समाप्त कर चुका है पर लोग ऐसा करे तो संविधान का दोष नही होगा, भले ही उस स्थान में हो जंहा संविधान बना है यानी संसद। उसी तरह उस महाशक्ति का आदेश स्वयं को बीमारी से बचाना है, भले वंहा हो जिसे उसका घर कहा जाता  है। और खुद का कोई न बचाये तो उसमे उसका दोष नहीं।

धर्म या हज को अन्धविशवास कहने वाले यह समझ ले कि अंधविश्वास एक सब्जेक्टिव इशू है। सबके लिए अलग अर्थ लिए हुए। एक सुपरनैचुरल पावर को मानना आप के लिए अंधविश्वास हो सकता है और उस पावर को न मानना, मेरी नज़र में अंधविश्वास हो सकता है। जिस तरह एक अस्तित्व को मानने के लिए पुख्ता सबूत चाहिए, उसी तरह उसका अस्तित्व न मानने के लिए भी ठोस सबूत चाहिए।  जैसे सदैव मन मे घृणा लिए व्यक्ति को प्रेम के गुणों में नुक्स दिखाई देते है। उसी तरह सदैव मन में प्रेम लिए व्यक्ति के लिए घृणा के अस्तित्व में  कमीयां दिखाई देती है।


एक्ट्रेस हिना खान द्वारा फिल्मी दुनिया छोड़ने पर इस्लाम की तरफ घर वापसी करने पर बोद्ध अनुयाइयों द्वारा यह तर्क दिया गया कि इतनी देर से खुदा का ध्यान आया और इससे पहले क्या कर रही थी। सेलिब्रिटी बनने के बाद धार्मिक होना तक नौटंकी है जिसका उद्देश्य पब्लिसिटी है।

इस कुतर्क का जवाब है कि अकल आने की कोई उम्र नहीं होती। सत्य अपनाने की भी सीमा नहीं होती। भगवान बुद्ध को ज्ञान पाने में 30 वर्ष लग गए थे और बाबा साहब अम्बेडकर को आधिकारिक तौर पर हिन्दू धर्म त्याग के बौद्धधर्म अपनाने में 60 वर्ष। यंहा तक कि हिन्दू धर्म त्यागने का वादा भी उन्होंने 45 वर्ष का जीवन जीने के बाद किया। भगवान बुद्ध को भी जवानी जीने के बाद समझ आया कि वो अज्ञानी है और सत्य की तलाश करनी चाहिए। रही बात खबरों में आने की तो बाबा साहब को भी देश, समाज और राजनीति में शोहरत पाने के बाद यह अहसास हुआ कि बौध्द धर्म अपनाना कितना आवश्यक है। हो सकता है इसी तरह के इल्ज़ाम उस समय लोगों ने भगवान बुद्ध और बाबा साहब का मनोबल गिराने के लिए उन पर लागये हो।

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