क्या ईशनिंदा की सज़ा मौत सही है।
ईशनिंदा जैसा शब्द का प्रयोग विवेकानंद भी करके गए है। ईश्वर की निंदा वास्तव में हो नही सकती। और अगर कोई करता है तो ईश्वर स्वयं उसका दंड निर्धारित करेगा। हम कौन होते है दंड देने वाले? ईशनिंदा करने वाले को पैदा भी ईश्वर ने किया है और उसका जुर्म भी ईश्वर के अस्तित्व से संबंधित है इसलिए उसको सज़ा देने का अधिकार भी ईश्वर के पास है, इंसानों के पास नहीं। ईशनिंदक को मौत आदि की सज़ा देना, क़ुरान और इस्लाम के ख़िलाफ़ है।
हर किसी देश को अपने लिए कानून लिखने की छूट है। भले ही कोई देश, नशे की सज़ा के लिए मृत्युदंड की सज़ा का कानून कोई लिखे, यह उसका अधिकार है, अगर वंहा के लोग ऐसा ही चाहते है तो या ऐसी ही ज़ुरूरत है तो।
पर किस धर्म का या ईश्वर के अपमान के लिए मृत्युदंड नहीं दिया जा सकता और न ही देना चाहिए। क्योंकि इसमें सबसे बड़ा खतरा इसके दुरुपयोग का है जिसके बाद किसी मासूम को ज़िंदगी वापिस नहीं करी जा सकती।
ईशनिन्दा पर किसी का सिर कलम करने की सज़ा ज़ुल्म है। अलबत्ता जुर्माना या उपयुक्त सज़ा देके सुधरने का मौका देना चाहिए। क्योंकि किसी को पूरा यकीन नहीं है कि ऐसे अपराध के लिए मौत की सज़ा देने वाले सभी के सभी देशो की न्यायपालिका और कार्यपालिका पूर्ण रूप से स्वतंत्र और बिना किसी भेदभाव के काम करती है। उनको निर्णयों में गलती की की गुंजाइश हो सकती हैं भारत, पाक, बंगलादेश आदि देशों की इन चीजों में व्यस्था कैसी है आपको पता ही होगा। आम क़ानून और मौत की सज़ा के कानून में बहुत बड़ा फर्क होता है। आम या कठोर सज़ा पाकर इंसान को सुधरने कर मौका मिलता है जबकि मौत की सज़ा के बाद मौका ही नहीं। प्रोसेस में 1% गलती होने पर मौत की सज़ा दे दी गयी तो जान जाने वाले कि जान वापिस नही आएगी। डेथ पेनलटी की सज़ा के लिय जुर्म बहुत ही संगीन होना चाहिए। अगर कानून बनाने वाले को ज़रा भी अंदेशा था कि इसका मिसयूज हो सकता है तो ऐसी भयंकर सज़ा को आम अपराधों में फिक्स न ही किया जाता तो बेहतर होता। रेयरेस्ट ऑफ रेयर का सिद्धांत इसके लिए प्रयोग हो सकता है।
गुस्ताखे नबी की सज़ा क्या है।
क़ुरान में गुस्ताखे रसूल की सज़ा मौत नहीं दी गयी है। बल्कि क़ुरान तो रसूलुल्लाह को इसके उलट कहता है कि जिसने आपकी हंसी उड़ाई है उनके लिए हम काफी है। क़ुरान में सिर्फ दो जुर्म पर मौत की सज़ा का ऐलान है। पहला क़त्ल के बदले। दूसरा फितना, फसाद फैलाने के जुर्म में। अल्लाह अगर इसकी सज़ा चाहता तो क़ुरान में गुस्ताख़ की सज़ा बात देता, जो नही बताई। मतलब यही है कि इसकी सज़ा वो खुद देगा जो यक़ीनन बहुत भयानक होगी।
सहीह हदीस में भी साफ साफ इसकी सज़ा मौत मुक़र्रर नहीं कि गयी है। रसूलुल्लाह ने कभी नहीं कहा कि फलां को मार डालो क्यूंकि उसने मेरी शान में गुस्ताखी की है। वैसे हदीसों में जिन लोगो के कत्ल करने का ज़िक्र है, उनका गुनाह फितना, जंग, सरकशी आदि से भी मुतालिक था। अक्सर सहाबा ने खुद अपने डिस्करेशनरी डिसीज़न पर ऐसे लोगों के क़त्ल का इरादा किया है या अंजाम दिया है। जिसका पूरा पसमंज़र क्या था हदीसों से पता नहीं लगता।
जिन हदीसो में कुछ लोगो को मौत के घाट गुस्ताखी के मद्देनजर उतारा गया, कई आलिमों का मानना है कि उन हदीस के बुनियाद पर और क़ुरान के इस मसले पर खामोश रहने के मद्देनजर, इस गुनाह की सज़ा मौत नहीं ठहराई जा सकती है।
मुस्लिम होने से पहले अधिकांश सहाबा नबी और इस्लाम की निंदा में कोई कमी न छोड़ते थे। देखा जाए तो इनमें से अधिकतर गुस्ताखे नबी भी थे। अगर इनकी सज़ा मृत्यु ही होती तो यह कभी इस्लाम नहीं ला पाते। सुहैल बिन अम्र, खालिद बिन वालिद, हज़रत उमर कितने बड़े दुश्मन थे नबी के सब जानते हैं।
मुसलमान खत्मे नबूवत के इनकारी को गुस्ताख़ मान रहे है। दुनिया मे ज़्यादातर जनसंख्या गैर मुस्लिम है। वो हमारे नबी तो क्या नबूवत के कांसेप्ट को ही नहीं मानते। तो क्या सबको मार डाले? और अगर वाकई मार डाला। तो उसे सुधरने का मौका भी नहीं मिलेगा।
ब्लासफेमी या गुस्ताख़ी का क्राइटेरिया कौन डिसाइड करेगा। क्यूंकि ईशनिंदा तो एक सब्जेक्टिव इशू है। बरेलवी देवबंदी को गुस्ताख़ कहते है और देवबंदी उन्हें। शिया सुन्नी को और सुन्नी शिया को। इस तरह तो हर कोई एक दुसरे को क़त्ल करने पर आमादा हो जाएगा।
अगर गुस्ताख़ी की सज़ा मौत के नाम पर गैर मुस्लिमो या कादियानियों को मौत की सज़ा देना सही है तो हिन्दू राष्ट्र में वो जो गायों के कत्ल के बदले मुसलमानो को मार रहे है, उस पर रोना बंद करिए। उनके लिए गाय पूजनीय है, उनके लिए व्व गुस्ताख़ी ही है।
अगर कोर्ट ये सज़ा दी तो फिर तो ये एक उचित व्यवस्था है। पर आज दुनिया मे शायद ही कंही कोर्ट स्वन्त्रता से काम करती हो। उन पर राजनीति और अवाम का प्रेशर हमेशा रहता है।
इस जुर्म के बदले किसी एक मुसलमान द्वारा ली गयी किसी जान के कारण, पूरे समुदाय को कटघरे में खड़ा करने वालों को ये समझना चाहिए कि समय के साथ, इंसानी मूल्य में गिरावट हर समुदाय में आई है। मुसलमान जंहा बेहतर से बदतर होता गया। वंही हिन्दू धर्म मे भी सतयुग से कलयुग तक इंसानियत में गिरावट आती गयी। नास्तिकता भी इससे अलग नहीं। जंहा बुद्ध के समय के नास्तिक अहिंसक थे, और आज माओ, स्टालिन, मांसहारी जैसे होते जा रहे है यानी गिरावट वंहा भी बदस्तूर जारी है। यही हाल मुसलमानों का भी रहा है जो कट्टर और जाहिल बनते गए और जा रहे है।जैसे मानवता और मनुष्य दो अलग चीज़ें है, वैसे ही इस्लाम और मुस्लिम दो अलग चीज़ें है।
ऐसे तो मुस्लिम खुद अमलन नबी की बेअदबी करते है।
रसूल की शान में गुस्ताखी या बेअदबी की सज़ा क्या मौत है। नहीं। क्योंकि कंही न कंही नबी की शान में बेअदबी लगभग हर मुसलमान कर रहा है। नबी की कही हर बात को हक़ मानने के बाद भी, उन पर अमल न कर के। नबी की नाफरमानी और बेअदबी ही हो रही लगभग हर जगह आज। जैसे बाप की बात न मानने पर बेटे को नाफ़रमान और बेअदब कहा जाता है। जब बार बार हम अल्लाह और रसूल की कही बात नहीं मानेंगे तो ये बेअदबी में ही शुमार किया जाएगा। अल्लाह और रसूल के हुकुम को सिरे से इनकार करने और अमलन इनकार करने में ज़्यादा फ़र्क़ नही है। सोच के देखो। लगभग सभी मुस्लिम अमलन इन्कारी ही है, खुदा और नबी के हुक़ूमों के।
अल्लाह या नबी की गुस्ताखी या बेअदबी और नाफरमानी में बारीक़ फर्क हैं। किसी का अल्लाह और रसूल की बातों को दिल में फायदेमंद मानना और अमलन नुकसानदेह तो वो क्या होगा। यानी आज का लगभग हर मुसलमान नाफ़रमान और कंही न कंही बेअदबी कर ही रहा है।
जैसे बाप बार बार कहे कि शराब न पीना, ज़िना न करना। और बाप के सामने ही शराबकारी और ज़िना करे तो इसे सिर्फ नाफरमानी नही, बेअदबी और शायद गुस्ताखी भी कहँगे। यही काम अल्लाह की ज़ात के साथ हम कर रहे है। वो देख रहा है और हम शराबकारी, जुएबाज़ी, ज़िनाकारी, हरामखोरी, सब कर रहे है। ये बेअदबी और गुस्ताख़ी नहीं तो और क्या है?
रोज़ ज़ाहिरन हम चोरी कर रहे है, हक़ मार रहे है, ज़ुल्म कर रहे है, ज़िना कर रहे है, गालियां दी रहे हैं, हर हराम काम करे, यह जानते हुए भी की अल्लाह देख रहा है। अल्लाह और रसूल के खिलाफ ऐसा क्या है जो हम नहीं कर रहे है। अल्लाह की जगह दौलत, शोहरत और नफ़्स को खुदा माने बैठे है जिसके मुताबिक रोज़ खुले में अल्लाह के खिलाफ अमल करते है। किसी और कि गुस्ताखी तो गुनाह है जिसकी सज़ा मौत के लायक और हमारा गुनाह, माफी के लायक है, वाह।
अल्लाह और नबी कह रहे है कि वो ही आखिरी नबी है। कोई ये मानने से इनकार कर दे। तो ये नाफरमानी हूई या गुस्ताखी? अगर दोनों हुई तो उसी तरह खत्मे नबूवत का इनकार ज़्यादा बड़ा गुनाह है, या अल्लाह की ज़ात का इक़रार करके भी उसके हुकुम को मानने से इनकार कर देना? कौन सा बड़ा गुनाह है? कौन सज़ा का ज़्यादा हक़दार हो सकता है?
क्या मूर्तियां तोड़ना नाजायज़ है।
मूर्तियों को तोड़ना नाजायज़ है। हिन्दू मूर्तियों को प्रतीक मानते है। पर किसके प्रतीक? आम हिन्दू सभी देवताओं और भगवानों को ईश्वर के अवतार या रूप या अधीनस्थ आदि मानते है। और अधिकतर देवताओं और भगवानों को ईश्वर से पृथक अस्तित्व। इन पृथक अस्तित्व को ही एक रूप दे दिया गया और उनकी मूर्तिया बना ली गयी। जैसे नबी से पहले क़ाबा में रखी 360 मूर्तियां अल्लाह के बेटे बेटियों की ही मानी जाती थी। इसलिए ये कहना अधिक उचित है कि वो उन्हें ईश्वर का इनडारेक्ट प्रतीक मानते है। इसलिए हिन्दुओ लिए काफिर नहीं बल्कि मुश्रिक लफ्ज़ प्रयोग करना चाहिए।
मूर्तिपूजा न करने वालो को पत्थरों में भगवान या खुदा नहीं दिखाई देता बल्कि उसका उलट दिखाई देता है। इसका आधार उनकी मूल धार्मिक धारण होती है। जैसे सिम्पली हर धार्मिक मत, विपरीत मत में अविश्वास रखता है।
मूर्ति आदि तोड़ने का किसी अन्य धार्मिक गिरोह का अधिकार नहीं। पर उसी मत के लोग मिलकर ऐसा करे तो अलग बात है। क्योंकि जिसने बनाया है तोड़ने का अधिकार भी उन्ही का है। ये वैसा ही है जैसे कोई आवश्यकता न होने पर, पुराना घर तोड़कर नया बनाले, या बेच के शिफ्ट हो जाये या वनाश्रम चला जाये, या साधु हो जाये।
क़ुरान और इस्लाम किसी की मूर्ति या पूजास्थल तोड़ने की आज्ञा नहीं देता। अगर कोई दूसरे धर्म का व्यक्ति ऐसा करता है तो ये उसका अपना व्यक्तिगत फैसला है। यही हमेशा हुआ भी है और और आज भी होता है। और शायद आगे भी होता रहे। इसका कारण इंसान का जज़्बाती, अंहकारी और वर्चस्ववादी होना है। ये हमेशा से होता आया है, बड़ा छोटे का दमन करता आया है जो कि सरासर गलत है। चाहे सामाजिक हो या धार्मिक।
बौद्ध, अपने धर्म और स्थलों के विनाश का दोषी सनातनियों को मानता है। जैनी भी सनातनियों को अपने मंदिरों को नुकसान पहुंचाने का दोषी मानते रहे हैं। सनातनी, मुसलमानो को मूर्तिभंजक मानता है। और मुसलमान म्यंमार, चीन, श्रीलंका आदि में बौद्धो को इस्लाम मिटाने वाले मानते है। ऐसा ही आलम ईसाई और यहूदीयों के साथ भी है।
ये बात हर जगह है। यही एस्टेब्लिशड या ज्ञात इतिहास में भी हर जगह मिलता है। प्री हिस्टोरिक टाइम में भी यही होता होगा जिसकी हमे फिलहाल जानकारी नहीं है पर इस बात की जानकारी है की मानव का स्वभाव हमेशा यही रहा है। धर्म के नाम पर दमन होता आया है। कंही ज़्यादा, कंही कम। किसी का कम, किसी का ज़्यादा। किसी के द्वारा कम और किसी के द्वारा ज़्यादा।
प्रतीक और पूजा या उपासना का अर्थ अलग है। प्रतीक होने और आराध्य या पूजनीय होने में बहुत अंतर है। प्रतीक कुछ भी हो सकता है। उनसे आस्था हो सकती हैं, उनका सत्कार सम्मान आदि हो सकता है। पर वो धार्मिक प्रतीक स्वयं संसार का सृष्टा, संचालक, संहारक आदि आदि नहीं हो सकता। उसी प्रकार उन प्रतीकों को ईश्वर नहीं कहा जा सकता, न वो आपकी प्रार्थना याचना स्वीकार करने वाले है। वो ऐसे धार्मिक प्रतीक है जो निर्जीव है या उनके है जो मृत हो चुके है।
जैसे देश का झण्डा जो सिर्फ एक साधारण कपड़ा होता है पर देश का प्रतीक होने के कारण बहुत सम्मानीय होता है। पर फिर भी वह स्वयं देश नहीं होता। वास्तव में धर्म इस तरह के नमाज़, हज, परिक्रमा आदि जैसे अनुष्ठान मनुष्यों का ईश्वर के प्रति प्रेम प्रदर्शित करते है। ये सारे संस्कार सिम्बोलिक होते है। क्योंकि मनुष्य तो इस जीवन मे ईश्वर से मिल नही सकता तो उसके प्रति भावनाएं दिखाने का यही सबसे बहेतरीन तरीका है। उसी तरह जैसे एक इंसान दूसरे इंसान से मिलने पर हाथ मिलाता है, गले लगता है या माथा चूमता है। ये सांकेतिक भाषा है।
अगर किसी मुसलमान की धार्मिक भावनाएं मूर्तियों को देख कर आहत हो जाए क्योंकि उनमें ईश्वर नहीं रहता और वो उन्हें तोड़ देता है तो यह गलत है। यह उसी तरह से गलत है जैसे किसी हिन्दू की भावनाएं हजरे अस्वद को या क़ाबा की दीवारों को देख कर आहत हो जाये क्योंकि वो इन दोनों को स्वर्ग का पत्थर और ईश्वर का घर नहीं मानता और उन्हें तोड़ने की कोशिश करता है। इसलिए किसी की धार्मिक भावनाओं को आहत करने वालों को सख्त से सख्त सज़ा होनी चाहिए और किसी को भी उनका समर्थन नहीं करना चाहिए।
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