Tuesday, 4 August 2020

अवतारवाद, पुनर्जन्म और कर्मफल क्या है।


अवतारवाद

शब्द अवतार बना है 'अव' यानी नीचे और 'तरण' यानी गमन या उतरना से।  इसलिए अवतार का शाब्दिक अर्थ है नीचे उतरना या धरती पर आना। ऐसा कहा जाता है कि महान संस्कृत व्याकरण ज्ञाता पाणिनि ने अपनी पुस्तक अष्टाध्यायी में इस शब्द (तृ से तार और तार से तरण शब्द बना है) का अर्थ ऐसे ही लिखा है। 

ईश्वर के अवतार की धारणा वेदों या वैदिक समय में विद्मान नहीं थी। अवतार शब्द भी वेदों, उपनिषद आदि में नहीं है बल्कि सर्वप्रथम पुराणों, महाभारत, रामायण आदि उत्तर वैदिक ग्रंथो में आता है। 

ईश्वर स्वयं आकाश से मानव रूप में अवतार बनके धरती पर आये, ऐसा मानना तार्किक नहीं लगता। बल्कि ऐसा लगता है कि संभवतः उसके द्वारा नीचे भेजे गए उसके भक्त और महापरूष को ही सर्वप्रथम अवतार कहा गया होगा और फिर बाद में यह शब्द बिगड़ कर प्रचलित अवतारवाद की धारणा में ढल गया होगा, जिसके साथ साथ पौराणिक कथाएं भी समय के उत्पन्न होती गई होंगी।

पंडित श्रीराम शर्मा आचार्य कल्कीपुराण, भविष्यपुराण आदि की भूमिका में बताते हैं कि समाज का उद्धार करने के वाले महापुरुषों और महामानवों को ही अवतार की संज्ञा दी जाती रही है। स्वामी दयानंद सरस्वती जैसे विद्वान भी प्रचिलित अवतारवाद में विश्वास नहीं रखते थे। 

सबसे पहले वैष्णव सम्प्रदाय ईश्वर या विष्णु के अवतारों की मान्यता में विश्वास रखते थे और इनकी देखम देख शैव सम्प्रदाय भी अवतारों को मानने लगा। इनके बाद शाक्त आदि जैसे लगभग सभी हिन्दू सम्प्रदाय प्रचलित अवतारवाद में विश्वास रखने लगे। 


अवतारवाद के विरुद्ध निम्नलिखित तर्क बौद्धिक स्तर पर खरे उतरते है।

1.
विष्णु जी के अवतारों को सर्वाधिक माना जाता है। शिव जी के अवतारों को भी माना जाता है। मगर ब्रह्मा जी के अवतार नहीं माने जाते (ब्रह्मा को निराकार ब्रह्म का साकार रूप माना जाता है)।  ऐसा तर्क दिया जाता है कि क्योंकि ब्रह्मा जी तो सृष्टि की उत्पत्ति करके मुख्य भूमिका से हट गया इसलिए धरती पर जारी जीवन या धर्म के ह्रास आदि में उनकी कोई भूमिका नहीं। मगर इसमें प्रश्न यह उठता है कि इस तरह तो शिव जी की भी भूमिका भी तो इस तरह सृष्टि के अंत में महत्वपूर्ण होनी चाहिए, न कि बीच में। शिव जी अगर धरती पर मानवों के हित हेतु आ सकते हैं तो फिर ब्रह्मा क्यों नहीं। इस प्रकार त्रिदेवों में से केवल दो देवों के अवतार धारण करने की कथाएं तार्किक नहीं लगती हैं।

2.

असत्य, अधर्म और पाप बढ़ने पर अवतार आते हैं। यानी जब पाप कम होते थे तो अवतार कम आने चाहिए थे और जब पाप अधिक हों तो अवतार अधिक आने चाहिए। पर हुआ इसका उलट है। सतयुग यानी जिस युग के चारों के चारों भाग में सत्य का बोलबाला था, उसमें 4 अवतार हुए हैं। त्रेतायुग यानी जिसके 3 भाग में सत्य प्रचलित था और केवल एक भाग में असत्य, उसमें 3 अवतार हुए। द्वापरयुग के दो भाग में सत्य और दो भाग में असत्य का चलन रहा, उसमें 2 अवतारों का आगमन हुआ। कलयुग जिसमें केवल एक भाग ही सत्य का है और तीन असत्य के, उसमें केवल एक अवतार आना है जिसे कल्कि अवतार कहते हैं। कहने का तात्पर्य यह है कि इस दृष्टि से अवतारवाद का आधार ही यंहा असंगत मालूम पड़ता है।

3.

सबसे प्रसिद्ध विष्णु के दस अवतार माने जाते हैं, अगर ये वास्तव में विष्णु (संसार चलाने वाला यानी ईश्वर या उसका एक रूप ही सही) के अवतार होते तो इन्हें केवल भारत में ही नहीं जाना और माना जाता बल्कि संसार के सभी हिस्सों में भी इनके मानने वाले होते। ये सभी अवतार भारत की धरती पर आए, इसमें से कोई एक तो विश्व के अन्य विस्तृत भाग में भी अवतरित होना चाहिए था। संसार के कोने कोने में लोग इन सभी की बजाए एक निराकार ईश्वर या गॉड को अवश्य जानते और मानते हैं यानी ईश्वर सभी जगह स्वीकार्य है। इसलिए ऐसा हो ही नहीं सकता कि ईश्वर अवतार लेके केवल एक ही देश, सम्प्रदाय, समुदाय में आये और विश्व का शेष भाग और लोग उससे वंचित रहें।

4.

अवतारवाद बात का सबसे बड़ा खंडन बुद्ध हैं, सामान्यतः अधिकतर हिन्दू सम्प्रदाय द्वारा बुद्ध को विष्णु के 10 अवतारों में से 9वां अवतार माना जाता है (कुछ सम्प्रदाय बुद्ध की बजाय बलराम को अवतार मानते हैं)। पुराणों में बुद्ध के विष्णु अवतार होने के प्रमाण भरे पड़े हैं। जबकि बुद्ध के प्रवचनों से स्पष्ट है कि वह ईश्वर में स्पष्ट रूप से विश्वास नहीं करते थे। इसलिए एक नास्तिक ईश्वर का अवतार या रूप कैसे हो सकता है? इसके अलावा बुद्ध की वाणी से स्पष्ट है कि वह वैदिक धर्म के विरुद्ध खड़े हुए थे। सो फिर वह उसी वैदिक धर्म के अवतार कैसे हो सकते हैं?

5.
ईश्वर सर्वशक्तिशाली है। क्या किसी कार्य को करने के लिए उसे मनुष्य या कुछ और बनने की आवश्यकता है? नहीँ है। ईश्वर तो बिना धरती पर आए ही सब कुछ कर सकता है तो फिर धरती का संचालन ठीक करने के लिए उसे धरती पर आने की आवश्यकता ही नहीं है।

6.

हमारी बुद्धि यह बात मानने को तैयार ही नहीं होती कि ईश्वर के अवतार हो सकते हैं क्योंकि अवतार मानव योनि में जन्म लेके मनुष्यों के गुण पायेगा और मानव देश-काल से सम्बंधित है, सीमित हैै, शक्तिहीन है, तुच्छ है, कमियों का पुतला है। अवतार जन्म-मरण, जीवन चक्र आदि के फेर में संलिप्त है, इसलिए ईश्वर के अवतार कैसे हो सकते हैं? ईश्वर तो अजन्मा, अजर, अमर, असीमित, अकाल, अनंत, अनादि, आत्मनिर्भर, सर्वशक्तिशाली और निराकार है।

7.

ईश्वर जिन कार्यो से परे है, वो सभी कार्य अवतारों को करने पड़ते हैं जैसे जन्म लेना, मृत्यु होना, मां-बाप, पत्नी-संताने होना, बीमार होना, दूसरों की मदद या सहारा लेना, सोना, आराम करना, शौच करना, नग्न होना, यौन संबंध बनाना आदि इत्यादि। इसलिए ईश्वर कभी अवतार रूप नहीं लेगा क्योंकि ये सभी तुच्छ कार्य ईश्वर को शोभा नहीं देंगे। क्या ईश्वर मनुष्य के अपवित्र बीज या तरल से अस्तित्व में आ सकता है? नहीं।

8.

क्या ईश्वर इतना कमज़ोर और असहाय है कि सत्य की स्थापना या पापियों का सर्वनाश करने के लिए स्वंय अवतार लेके धरती पर आएगा? एक छोटी से फ़ैक्ट्री का मालिक भी अपनी फ़ैक्ट्री में नौकरों से सही प्रकार से काम करवाने के लिए स्वयं नौकर बनकर उनके साथ मशीनों पर कार्य करना शुरू नहीं करता है बल्कि एक आज्ञाकारी नौकर को ही सुपरवाइजर बना के उनके ऊपर बिठा देता है ताकि काम सही प्रकार से चल सके। और खुद फिर सारी गतिविधियां मॉनिटर करता है। यही सुपरवाईज़िंग का कार्य ईश्वर अपने संदेशवाहकों से करवाता है। 

9.

ईश्वर अगर अवतार ले लेगा तो वो देश- काल तक सीमित हो जाएगा। किसी एक समय, स्थान में ईश्वर का अवतार आने पर ईश्वर केवल उसी समय, उसी स्थान तक सीमित हो जाएगा। एक मनुष्य एक समय में एक स्थान पर एक ही कार्य कर सकता है। अगर ईश्वर अवतार रूप में भारत में पैदा होता है तो वह भौतिक रूप से यंहा उपलब्ध होगा और ऐसी स्तिथि में वह संसार के अन्य भागों का कार्यभार कैसे संभालेगा? इसलिए ईश्वर अवतार लेकर स्वयं को सीमति नहीं करेगा क्योंकि वह असीमिति है। एक समय पर सीमिति और असीमिति दोनों होना विरोधाभासी है।

10.

प्रत्येक मनुष्य की एक शक्ति सीमा होती है। अगर ईश्वर मनुष्य के रूप में अवतार लेगा तो उसकी शक्ति की भी सीमा हो जाएगी। ऐसी स्थिति में ईश्वर मनुष्य के रूप में पृथ्वी पर मौजूद सभी जीवों का, प्रकृति का, संसार का, ब्रम्हांड आदि का संचालन कैसे कर पाएगा? ये मानव शरीर की शक्ति से बाहर की चीज़ें हैं।

11.

यह देखा गया है कि बाहर देशों जैसे पाकिस्तान, नेपाल आदि में जन्म लिए व्यक्तियों की आमतौर हम भारतीय अधिक इज़्ज़त नहीं करते। 

इसी प्रकार अगर कोई अवतार विदेशी धरती पर जन्म लिया हुआ होता या कभी जन्म लेगा तो क्या हम उसमें उतनी श्रद्धा रख पाएंगे? उसी प्रकार हमारे देश में जन्म लिए हुए अवतार से क्या दूसरे देश वाले भी वैसा ही जुड़ाव, लगाव, अपनापन महसूस कर पाएंगे, जैसा हम करते हैं?

अपने देश में पैदा हुए बहुत से महापुरुषों जैसे गांधी, अम्बेडकर आदि तक का तो हम पूरी तरह आदर- सम्मान कर नहीं पाते तो फिर दूसरे देशों में पैदा हुए अवतारों का सम्मान भी कैसे कर पाते? आज भी ईसा मसीह, मुहम्मद साहब जैसे धर्मपुरुषों तक पर हमारे देश के लोग कीचड़ उछालते हैं तो सोचिए किसी विदेशी अवतार के साथ क्या करते?

इसलिए इस प्रकार से धरती पर किसी विशेष भाग में ईश्वर का अवतार का आना, अज्ञानी गों के लिए ईश्वर से कटने का कारण बन जाता। 

12.

हाल के वर्षों में ओशो और सत्यसाईं आदि जैसे बाबाओं को भी उनके अनुयायियों के द्वारा एक प्रकार का अवतार (ईश्वर रूप, भगवान आदि भी) माना गया है। महाराष्ट्र में ओशो के आश्रम पर लिखा हुआ करता था कि फलां जन्म तिथि से फलां मरण तिथि तक भगवान रजनीश संसार का भ्रमण करने आये थे। जबकि 21 देशों ने ओशो को एक समय वीज़ा देने से मना कर दिया था। क्या एक अवतार को कोई देश में जाने के लिए वीजा की आवशकता है? अमेरिकी प्रशासन ओशो के पीछे हाथ धो के पड़ा हुआ था और उन्होंने ओशो को भगा कर ही छोड़ा। क्या अवतार के साथ आम इंसान ऐसा कर सकते हैं?

सत्यसाईं ने अपनी मृत्यु 96 वर्ष में होने की भविष्यवाणी की थी पर वह 84 वर्ष में ही सीधार गए। क्या कोई अवतार ऐसा गलत तथ्य दे सकता है? उनको बहुत सी बीमारियां थी, अंतिम समय वेंटिलेटर पर भी रहे थे और मल्टी ऑर्गन फेलियर के कारण उनकी मृत्यु हुई थी। क्या ये सब अवतारों के साथ हो सकता है? नहीँ हो सकता।


ऊपर उठाये गए सभी बिंदु जब आप वर्तमान प्रचलित अवतारों पर परख कर देखोगे तो आपको बेहद आसानी से उन सभी अवतारों की वास्तविकता का आभास हो जायेगा। यंहा यह साबित होता है कि अवतारों की मान्यता आधारहीन है और ईश्वर के साकार अवतार लेने की मान्यता भी तर्कहीन है। हालांकि इन अवतारों में से जो मनुष्य थे, उनके बारे में यह स्वीकार किया जा सकता है कि वो संभवतः ईश्वरभक्त महान मनुष्य रहे होंगे। ईश्वर अपने महामानवों और महापुरुषों को आम जन को धर्म की शिक्षा देने के लिए भेज सकता है जिन्हें इसी संदर्भ में अवतार कह सकते हैं। वास्तव में अवतार शब्द का प्रयोग ईश्वर के भेजे संदेशवाहकों और महापुरुषों के लिए ही होता था जिन्हें बाद में ईश्वर का साकार स्वरूप घोषित कर दिया गया। ईश्वर निराकर है और केवल एक है, उसका कोई साकार रूप नहीं ले सकता। इसीलिए इन महान मनुष्यों को ईश्वर का दूत कहँगे, न कि ईश्वर का रूप।  





पुनर्जन्म

पुनर्जन्म क्या होता है और बार बार जन्म लेने की मान्यता में क्या दोष हैं, आइये समझते हैं।

God is not the author of confusions (Bible: 1 Corinthians: 14:33)

 
 
1.
पुनर्जन्म दो शब्द से बना है पुनः और जन्म। पुनः यानी दुबारा और जन्म यानी पैदाइश। पुनः का अर्थ बार बार नहीं होता है बल्कि दुबारा होता है। इसलिए पुर्नजन्म का अर्थ है मृत्यु के बाद फिर से एक बार जीवित हो उठना है, अर्थात दुबारा, न कि बार बार जन्म लेना।  बार बार जन्म लेने के सिद्धांत को आवागमन या समसारा प्रथा कहते है, जो मूलतः जैन-बौद्ध धर्म का सिद्धांत है। इसी तरह आवागमन या आवगवन शब्द संस्कृत शब्द गमा से बने हैं जिसका अर्थ है जाना। ये दोनों शब्द सही हैं।

2.
वैदिक साहित्य में उल्लेखित पुर्नजन्म का अर्थ भी दुबारा जन्म लेना है, न कि बार बार जन्म लेना। बल्कि वेद तो शुद्ध शाब्दिक तौर पर बार बार जन्म लेने वाली विचारधारा को मानने वालों को विजित करने को कहते हैं. इसके लिए ऋग्वेद 1:92:10 के शाब्दिक अर्थ देखिए। वेदों में पुनर्जन्म संबंधित स्पष्ट मंत्र नहीं हैं। वेद, उपनिषद आदि में कई स्थानों पर पुनः पुनः शब्द दो बार एकसाथ आता है, यहाँ इसका अर्थ बार-बार किया गया है, न कि दुबारा। (ऐसे सभी वैदिक मंत्रो की समीक्षा एक अन्य ब्लॉग में दी गयी है।)

3.
महापंडित राहुल सांकृत्यायन ने दर्शन दिग्गदर्शन में लिखा है कि छान्दोग्यउपनिषद में पहली बार पुर्नजन्म सिद्धान्त को बार बार जन्म लेना माना गया और ऐसे लिखने वाले को तनिक भी अंदेशा नहीं हुआ कि वह क्या भ्रम फैलाने जा रहा है। कई अन्य विद्वान जैसे सर्वपल्ली राधाकृष्णन आदि ने भी बार बार जन्म लेने के सिद्धांत के विरुद्ध वैदिक काल से प्रमाण दिए हैं।

4.
गरुड़पुराण के प्रेतकल्प खंड में आत्मा को मरने के बाद कहा जाता है कि तुझे यमदूत कर्मानुसार सीधा स्वर्ग या नरक लेके जायंगे अर्थात यंहा वापिस बार बार धरती पर आने की बात नहीं कही गयी है। साथ साथ वंही आत्मा के कर्मो पर विभिन्न प्रकार की टिप्पणियां भी की गई है जिनके आधार पर उसके लिए परलोक का निर्धारण हुआ है। यह बात आम हिन्दू इसलिए नहीं जानते हैं क्योंकि मृतक की तेहरवीं में इस पाठ को पंडित जी संस्कृत में आकर बिना अर्थ बताए पढ़ते हैं। इससे ज्ञात होता है कि मनुष्य के इसी एक मात्र जन्म में किये गए कर्मों का हिसाब होगा और परलोक का निर्णय होगा।

5.
बार बार जन्म लेने का सिद्धांत कहता है कि मनुष्य मर कर कर्मानुसार जीवों, वनस्पतियों आदि में जन्म लेता रहता है। अगर ऐसा है तो जब धरती पर मनुष्य नहीं थे, तब यंहा जो वनस्पतियां ही वनस्पतियां थी, वो किसका पुनर्जन्म थी? वसनपतियों के बाद इस धरती पर जीव-जंतु पैदा हुए, वो किसका पुर्नजन्म थे? डायनासौर किसका पुर्नजन्म थे? मानव तो सबसे अंत में धरती पर पैदा हुआ है। आर्य समाजी का तर्क है कि पिछली सृष्टि के पापों के भोगी हैं ये पेड़ पौधे मगर इस तरह पीछे ही पीछे जाने लगे तो फिर हम regressive में चले जाएंगे।

6.
सनातन धर्म अनुसार सृष्टि के आदि में परमात्मा ने अग्नि, वायु, आदित्य तथा अंगिरा नामक चार ऋषियों की आत्मा में एक-एक वेद का प्रकाश किया और वे चार ही सब जीवों से अधिक पवित्रात्मा थे। अब यहाँ प्रश्न यह उठता है कि सृष्टि के आदि में पूर्व पुण्य कहाँ से आये? वो कौन थे जिन्होंने सृष्टि से पूर्व ही इतने अच्छे कर्म किये थे कि उन्हें इस धरती पर ऋषियों का जन्म मिला? उन्होंने ये कर्म कब और कंहा किये थे?

7.
पुनर्जन्म नियमानुसार पाप जितना बढ़ता है, मनुष्यों की संख्या उतनी ही कम होती चली जाती है क्योंकि पापी लोग भिन्न भिन्न जानवर या वनस्पति बनते चले जाते हैं। सतयुग से होता हुआ कलयुग आ चुका है जिसमें सर्वाधिक पाप कर्म हैं जबकि पहले लोग कम पापी थे। परन्तु मनुष्यो की संख्या तो हज़ारो सालों से बढ़ती ही जा रही है, जबकि पुनर्जन्म सिद्धान्त अनुसार तो मनुष्य जनसँख्या कलयुग में कम होती जानी चाहिए थी। इसी तरह दुनिया में आज तक इन्सान कुछ अरबों की संख्या में हुए हैं, मगर वेजीटेशन, लिविंग एन्टीटीस तो अरबों-खरबों की संख्या में हुए हैं, तो फिर ये बाकी किनका पुनर्जन्म थे?

8.
अगर हम मनुष्य अपने पूर्व जन्म के कर्मों का फल भुगतने इस धरती पर जन्म ले रहे हैं, तो हम किसी के इस कर्म भुगतान या जीवन में हस्तक्षेप क्यों करें? क्यों किसी मरीज़ का इलाज करें जो बीमारी के रूप में पूर्वजन्म का फल भुगत रहा है? क्यों किसी अनाथ को सहारा दें जो पूर्व कर्मों का फल भुगत रहा है? क्यों किसी गरीब को खाना खिलाएं जो? क्यों किसी अबला स्त्री के रेप का केस लड़े? जब ऐसे सभी लोग अपने पूर्व जन्म के कारण ही इस जन्म में कष्ट झेल रहे हैं तो फिर इनकी सहायता करके ईश्वर के बनाये प्लान में हम इंसान टांग क्यों अड़ाएं? इस तरह तो किसी की मदद करना ऐसा होगा जैसे जैल काट रहे किसी अपराधी की गैरकानूनी तौर पर मदद करना। असल में मनुष्य को यह अवस्थाएँ या कष्ट पूर्व जन्म या पूर्व कर्मों के बदले नहीं बल्कि इस एकमात्र जीवन में चालू उसकी परीक्षा हेतु मिलती हैं।

9.
न्याय का सिद्धांत कहता है कि दोषी को दंड से पहले उसका दोष बताया जाना चाहिए, उसको खुली अदालत में सिद्ध किया जाना चाहिए, उसके केस की निष्पक्ष जांच होनी चाहिए, उसे अपना पक्ष रखने की पूरी छूट दी जानी चाहिए। पर पुर्नजन्म सिद्धान्त में इनमें से कोई भी अधिकार किसी मनुष्य को अपने पूर्व कर्मो के संबंध में नहीं मिलता है। यंहा तक किसी को अपना पिछले जन्म की मूलभूत बातें तक मालूम नहीं होती है जैसे कि वह कंहा, कब, कैसे, किस योनि में जन्मा था और उसके कर्म क्या, कैसे थे। इस प्रकार पुर्नजन्म सिद्धान्त में न्याय के सिद्धांतों (प्रिन्सिपल ऑफ नेचुरल जस्टिस) की अवहेलना होती है और ईश्वर अन्याय नहीं कर सकता।

10.
अगर सभी लोग बार बार जन्म लेने के सिद्धांत को सही मानने लगे तो इसकी संभावना अधिक हो जायगी कि लोग अच्छे कर्म करना कम कर दें। क्योंकि वो जानते हैं कि इस जन्म में न सही तो अगले जन्म में और अगले में न सही तो उससे अगले जन्म में वो अच्छे कर्म कर लेंगे और मोक्ष पा लेंगे। पुनर्जन्म सिद्धांत अप्रत्यक्ष तौर पर मनुष्यों को संदेश देता है कि कर्म सुधार के अवसर हर जन्म में संभव हैं, इस जीवन में नहीं तो अगले जीवन में सुधार कर लेना। ऐसे सिद्धांत को मानने से मनुष्य आलसी, चिंतारहित और भोगी हो जाता है। इंसानी जन्म भोग योनि, कर्म योनि दोनों होती है। जबकि बाकी दोनों योनि केवेल भोग योनि होती है। क्योंकि इनमें कर्म से सुधार नहीं किया जा सकता।
 
11. आवागमन का सिद्धांत गरीबों, यतीमों, बीमारों, लाचारों, अपंगों आदि में हीन, तुच्छ भावना पैदा करता है कि पिछले जन्म में वो बहुत बड़े पापी थे और इसलिए इस जन्म में उन्हें ऐसा कष्टदायक या हीन जीवन मिला है। साथ ही, दूसरे लोग भी उन्हें दुर्भावना से देखते हैं कि ये तो पिछले जन्म के बुरे लोग हैं। इसलिए यह नियम ईश्वर या सत्य धर्म का नहीं हो सकता।

12. ऐसा माना जाता है कि मोक्ष प्राप्त किया हुआ महामानव या महापुरुष मनुष्य योनि में ही पुनर्जनम लेता है पर बहुत समय बाद। मगर मनुष्य योनि को तो पहले ही छुटकारा पाने लायक सिद्ध किया जाता है तो फिर इस योनि में किसी महापुरुष का आने का कोई औचित्य ही नहीं रहा, उसे तो इससे श्रेष्ट योनि मे आन चाहिए अगर वाकई पुनर्जन्म है और उसके सिद्धांत यही हैं तो।

13. अगर पिछले जन्म के सारे दोष समाप्त हो चुके हैं और मानव योनी में जन्म मिला है तो मनुष्य योनि में मिलने वाले कष्ट क्यों हैं? 

14. कई बार नवजात शिशु कीरिटिकल कंडीशन में लंबा समय बिताता हैं, क्यों? या कोई बच्चा क्यों मृत्यु को जल्दी प्राप्त हो जाता है। आवागमन में विश्वास रखने वाले इन बातों को न्याय बताते हैं। जबकि असल में देखा जाए तो ऐसे नवजात या दिव्यांग बच्चें असल में अपने माता पिता या अन्य लोगों के लिए एक टेस्ट होते हैं। आवागमन के अनुसार अगर कोई छोटा बच्चा कष्ट सह कर मरता है तो लोगों को यह कहना चाहिए की यह पहले पापी था मगर ऐसा कोई नहीं कहता क्योंकि सबको एहसास है कि ऐसा नहीं हो सकता। 

15. किसी को कर्म की सजा उतनी ही मिलनी चाहिए जितना बुरा वो कर्म हो। छोटे से पाप के लिए जीवन भर की सजा नहीं हो सकती। हालांकि ये सिद्धांत अच्छे कर्म में लागू होना न्यायोचित लगता है क्योंकि एक अच्छा कर्म जीवन भर का सुख दे दे, इसे तो हर कोई स्वीकार कर सकता है।




सही अर्थ और मत।

पुनर्जन्म का सही अर्थ है, एक बार मर कर फिर से दुबारा जीवित होना ताकि मृत्यु के बाद अपने कर्मो का हिसाब किताब दिया जा सके, जंहा से मनुष्य को कर्मानुसार सीधा स्वर्ग या नर्क में भेजा जाएगा। वास्तव में देखें तो यह जीवन अनंत है जो जन्म होने के बाद सदैव चलेगा, पहले धरती पर जीवन फिर परलोक में। इसमे केवल एक छोटा सा ब्रेक या पॉज है जिसे मृत्यु कहते हैं। यानी मृत्यु केवल एक नींद भर है जिसके बाद अनंत काल का जीवन शुरू होना है।

पुनर्जन्म के सम्बन्ध में इस संसार में तीन मत पाए जाते हैं। पहला नास्तिकों का है कि मरने के बाद कोई जीवन नहीं है। दूसरा भारतीय धर्मों का है कि बार बार मरना है और बार बार जीवन है और इस प्रकिया का कोई अंत नहीं है। तीसरा मत इन दोनों मतों के बीच का एक बैलेंस्ड मत है जो इब्राहीमी मज़हबों का है जैसे यहूदी, ईसाई और मुसलमनों का। वह मत यह है कि मरने के बाद भी जीवन है परंतु केवल एक बार, जैसे मृत्यु से पहले भी एक बार ही था। यानी इस लोक में पर जन्म के बाद मृत्यु एक एक छोटा सा ठहराव है और फिर दूसरे लोक में जीवन जारी रहेगा। यही एकमात्र मत है जो ऊपर बताए गए पुनर्जन्म के सही अर्थों से मेल खाता है।
 

कुछ प्रश्न।

1- पुनर्जन्म लेने वाले यह क्यों नहीं कहते की वे पिछले जन्म में मुर्गा, गधा, ऊंट या अन्य कोई पशु, पक्षी थे? सभी पिछले जन्म में मनुष्य योनि में जन्म लेने का क्यों कहते हैं?

2- आज तक किसी मुस्लिम या ईसाई का पुनर्जन्म क्यों नहीं हुआ? ये पुनर्जन्म लेने वाले हिन्दू आदि ही क्यों होते हैं?

3- आज तक कोई अंतराष्ट्रीय स्तर पर पुनर्जन्म क्यों नहीं हुआ अर्थात किसी सऊदी अरब के नागरिक ने भारत के किसी गाँव में पुनर्जन्म क्यों नहीं लिया? किसी भारतीय का किसी ब्रिटिश राज्य में पुनर्जन्म क्यों नहीं हुआ? पुनर्जन्म के जितने भी किस्से होते हैं वे मृतक के और पुनर्जन्म लिए बच्चे के निवास स्थान से निकट इलाकों में ही क्यों होते हैं? दोनों ही परिवार वाले किसी न किसी तरह से एक दूसरे से परचित होते हैं।

4- याद रखने की शक्ति केवल मस्तिष्क में होती है, मृत्यु के बाद मस्तिष्क नष्ट हो जाता है। आत्मा को निर्लेप चेतन बताया गया है फिर वह स्मृति कैसे रख सकती है? क्या आत्मा का भी मस्तिष्क होता है जो शरीर से अलग होता है और डेटा उसमें स्टोर होता है? 

5- मृतक की आत्मा ने जिस व्यक्ति के रूप में जन्म लिया होता है, क्या ऐसा उस आत्मा की मर्जी से होता है? यदि आत्मा अपनी मर्जी ' से जन्म ले सकती है तो वह अपनी मर्जी से मर भी सकती है? यदि आत्मा अपनी मर्जी से जन्म ले सकती है तो सारे गरीब इंसानो की आत्माओं को अमीर के घर जन्म लेना चाहिए था जबकि हमें ज्यादातर पुनर्जन्म के किस्से मध्य या गरीब परिवार में ही सुनने को मिलते हैं।
 
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सनातन धर्म में आत्मा के बार बार विभिन्न शरीरों में जन्म लेने का यानी आवागमन का विचार प्रचलित है जिसे पुनर्जन्म कह दिया जाता है जबकि दोनों अलग हैं। आर्य समाजियों के लिए प्रकृति, ईश्वर, आत्मा और जीव अनादि है और ये भी स्वर्ग नरक इसी दुनिया के दुख सुख का नाम हैं, ये मत अब आम हिन्दू समाज में अपनी जगह बना रहा है हालांकि शास्त्र इसके विरोधी हैं। आम तौर से हिन्दू भाई वेदों से पुनर्जन्म सिद्ध करने की कोशिश करते हैं जबकि मैंने उन सभी मंत्रो का जायज़ा लिया था तो पाया था कि कोई भी पुनर्जन्म सिद्ध नहीं कर रहा। ब्लॉग देता हूँ अपनी रीसर्च का।

आवागमन बाद की उपज है, संभवतः जैन, बौद्ध, आजीविकों (इन धर्मों या सम्प्रदायों के आरंभिक धार्मिक अग्रदूतों) से प्रेरित होने की बाद उपनिषद काल में।

हिन्दू धर्म अनुयायियों के मानना है कि पुनर्जन्म होता रहता है जो खबरों में भी आता रहता है। मगर ये खबरें बहुत ही कम आती है जबकि ये तो हर साल करोड़ो में आनी चहिए थी अगर पुनर्जन्म सच होता तो। और जो खबरें आती भी हैं, उनमें से ज़्यादातर फेक साबित हो जाती है और बाकी पर सही से तहक़ीक़ नहीं हो पाती। इसलिए उनकी सच्ची उजागर नहीं हो पाती। इस पर दलीलें चाहिए तो एक ब्लॉग देता हूँ, बड़े काम का।

सनातन धर्म में कोई आख़िरत, क़यामत, हिसाब किताब के दिन का इस तरह से कांसेप्ट मौजूद अब नहीं है जैसा इस्लाम में है। प्रलय के प्रकार हैं मगर जीवन निरंतर भी है। मोक्ष के बाद भी जन्म होने को मान्यता मौजूद है। इस बारे बहुत से मतभेदी नज़रीये हैं। हर सम्प्रदाय अपने अपने हिसाब से व्याख्या करता है। 

आज तक मेरी नज़र में कोई भी हिन्दू धार्मिक गुरु ऐसा नहीं आया जो इस्लाम धर्म अनुसार पुनर्जन्म मानता हो। पहले कुछ हुए हैं जिन्होंने अपनी किताबों में आवागमन का खंडन किया है (वेदों के आधार पर) मगर वो कोई धार्मिक गुरु नहीं थे जैसे शंकराचार्य आदि बल्कि वे बड़े विद्वान थे जैसे राधाकृष्णन, सांकृत्यायन (पहले बौद्ध फिर हिन्दू)। शायद फिर इन दोनों को ही बाद में 
सुरेंद्रनाथ दासगुप्ता, के.एन तिवारी, डॉ रमेन्द्र, आदि ने कॉपी किया और अपनी किताबों में लिखा कि वैदिक काल में आवागमन नहीं पुनर्जन्म (एक जन्म धरती पर, एक परलोक में) था।  आज भी ऐसे मिल जायँगे मगर वो  हिन्दू धर्म, शास्त्र, इतिहास विशेषज्ञ होंगे, न कि कोई सम्प्रदाय गुरु।
 
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ऐसे पुनर्जन्म वाले मामले आसानी से झूठ साबित हो जाते हैं. बहुत से Psychological मामले भी होते हैं. कुछ में जिन्न वैगरह का दखल होता है. कुछ ऐसे भी हो सकते हैं जिन्हें वैज्ञानिक तौर पर हम अभी समझ नहीं सके हैं.  लेकिन दिक्कत ये है कि पुनर्जन्म में यकीन रखने वाले ऐसे मामलों से फोरन कन्विंस हो जाते हैं और हम मुस्लिम बिलकुल नहीं. सबसे महत्वपूर्ण बात, 1 करोड़. लोगो में 1 व्यक्ति का तथाकथित पुनर्जन्म सही भी है, तो उसे ये साबित नहीं किया जा सकता कि दुनिया के तमाम इंसान जन्नत जहन्नुम की वापसी के लिए पुनर्जन्म लेते हैं या लेंगे।

अब तक ऐसे सभी मामले बहुत पूर्व नियोजित और गुप्त रूप से स्क्रिप्टेड रहे हैं, और उनमें से ज्यादातर को खारिज कर दिया गया। जिनकी तहकीक आखिरी तक नहीं पहुंच पाई, वही मामले आज भी पुनर्जन्म के झूठ का हवाला देते हैं। ऐसे मामले अक्सर एक जैसी भाषा बोलने वालों में होते हैं और उनमें कोई ना कोई त्रासदी होती है। उनमें ऐसे और काई संकेत होते है।
 

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विभिन्न धर्मों में मृत्यु के बाद की अवस्था पर मान्यताएं।

पुनर्जन्म पर विभिन्न धर्मों की विभिन्न मान्यताएं हैं और प्रत्येक धर्म में उसके मानने वाले विभिन्न समुदाय के भी आपस में भिन्न भिन्न मत हैं। सभी धर्म मानते हैं कि यह जीवन अनंत है। अंतर केवल यह है कि इस लोक में है या परलोक में।

इस्लाम मानता है कि मृत्यु के बाद स्वर्ग या नरक में जायंगे। जीवन में कुछ कर्मों का फल मिलता है परंतु पूर्ण न्याय तो अंतिम दिन ही होगा। मौत का मतलब खात्मा नहीं है, मौत का मतलब है एक ज़िंदगी से दूसरी  ज़िंदगी में दाखिल होना है।
 
ईसाइयों में अधिकतर यही मान्यता है कि एक समय के बाद न्याय होगा। कुछ ईसाई ऐसा भी मानते हैं कि थोड़ा बहुत न्याय तो मरने पर हो जाता है मगर असली न्याय ईसा मसीह के दुबारा आने के बाद होगा। ज़रथरुष्ट्री यानी पारसी मानते हैं कि मरने के 3 दिन बाद लोक का निर्धारण होता है।
 
 
जैन धर्म पुनर्जन्म और आत्मा में विश्वास रखता है। जैनी लोग जीव और पुद्गल (भौतिक पदार्थ) को मानते हैं कि अगले जन्मों में वही जीव होता है जो बार बार जन्म लेता है। जैन धर्मी कहते हैं कि कुछ लोग मर के अधोलोक में जांयगे जो धरती के नीचे है, जंहा 7 प्रकार के नरक हैं और कुछ लोग उद्धोलोक में जांयगे जो ऊपर की तरफ है, जंहा 16 प्रकार के स्वर्ग हैं।

बौद्ध धर्म भी पुनर्जन्म में विश्वास रखता है, भले ही भारतीय नव बौद्धधर्मी अनुयायी न रखें। बौद्ध धर्म आत्मा को नहीं मानता है। इसलिए बौद्ध धर्म कहता है कि जिसका जन्म हुआ, वो जीव अलग होता है और उसका पिछले वाले से कोई सम्बंध नहीं होता है। बौद्ध लोग मानते हैं कि मरने के तुरन्त बाद पुनर्जन्म होगा। जबकि तिब्बती या ज़ेन (जापान में) बौद्ध सम्प्रदाय मानते हैं कि कुछ समय के बाद दुबारा जन्म होगा। 

आम हिन्दू मानते हैं कि मृत्यु के तुरंत बाद पूनर्जन्म होगा जबकि कुछ समुदाय जैसे स्वाध्याय परिवार (संस्थापक बाबा पांडुरंग शास्त्री) मानते हैं कि पुनर्जन्म तुरंत भी हो सकता है और 5-100 दिन तक में भी हो सकता है। यह समय कर्मों के आधार पर निर्धारित होता है। ऐसा कैसे हो सकता है कि आपके जीवन की सबसे बाद ईवेंट होने जा रहा है और ईश्वर ने आपको एक डेफनिट जवाब नहीं दिया कि मरने के बाद क्या होगा?

वैसे हिन्दू ग्रंथों में मरने के बाद का सर्वाधिक उल्लेख गरुड़पुराण में है। उसमें लिखा है कि मरने पर यम के दूत आते हैं और कहते हैं कि अगर मरने वाले ने अच्छे कर्म किए हैं तो वह स्वर्ग में जायेगा और बुरे कर्म किए हैं तो वह नरक में जाएगा। मृतक पहले यमपुरी में जाते हैं, जंहा चित्रगुप्त के आधार पर हिसाब होता है। इसका मतलब है कि ग्रंथो के अनुसार फ़ौरन जन्म नहीं होता जैसा आम हिन्दू मानते हैं। हालांकि बहुत से हिंदू मानते हैं कि इस नरक स्वर्ग को भोगने के बाद दुबारा जन्म मिलेगा। वेदों में योनियों का नहीं बल्कि परलोकवाद का उल्लेख है। वेदों में परलोक शब्द आता है यानि कोई दूसरा लोक। वेदों में पशु, वनस्पति योनि में जन्म लेने का कोई उल्लेख नहीं है। आर्य समाज नहीं मानते हैं, आम पौराणिक भी नहीं मगर परंपरावादी मानते हैं। आर्य समाज मानते हैं सभी सृष्टि और जन्म के बाद जब किसी के पाप बिल्कुल क्षीण हो जाते है तब उसे जन्म नहीं मिलेगा, अब उसे मोक्ष मिल जाएग। जिसे मोक्ष मिल गया तो फिर बहुत समय के बाद वो फिर से मानव बनके आएगा। जबकि इसी जन्म को आप दुख बोल रहे हो।  

जैनी, बौद्ध आदि नास्तिक लोग ईश्वर को नहीं मानते हैं, मगर फिर भी इनकी मृत्यु पश्चात जीवन से सबंधित धारणाएं एक दूसरे से अलग-अलग हैं। यदि ईश्वर का अस्तित्व नहीं है तो इनकी मान्यताएं एक क्यों नहीं हैं?
 
निष्कर्ष यह है कि मुस्लिम, ईसाई, यहूदी मिलकर सबसे बड़ी धार्मिक आबादी हो जाती है। इन सबका मानना एक ही है कि इन जन्म के बाद परलोक है। मगर हिन्दू, जैन, बौद्ध, सिक्ख में इस जन्म के बाद क्या होगा, अलग अलग मान्यता है। कुछ कहते हैं, उसी मे लीन हो जाता है, कुछ कहते हैं वापिस आ जाता है, कुछ कहते हैं स्वर्ग अनंत है मगर नरक नहीं इसलिए नरकवासी वापिस आ जाएंगे, कुछ इस जन्म को ही स्वर्ग नरक मानते हैं, कुछ दोनों जन्मों के बीच समय अंतराल को मानते हैं।

इसमें एक बात तो सत्य है कि मृत्यु के बाद चाहें स्वर्ग-नरक हो या बार-बार जन्म हो या कोई जन्म ही नहीं हो, जो भी होगा, होगा सभी के साथ एक जैसा ही। 
 
हिन्दू धर्म अनुसार बुरे कर्म का फल अनंत है जो मिलता ही रहेगा। इस्लाम अनुसार बुरे कर्म का बदल उतना ही है जितना बुरा वो कर्म। उससे बढ़ कर नहीं मिल सकता। जबकि अच्छे कर्म का बदला दस गुना भी मिल सकता है।
 

 

जैसे कुरान में सूरह नूह में नूह अल्लाह से कह रहे हैं कि मैंने अपनी कौम को यह बताया था (71 : 14,17) कि उसने तुम्हें विभिन्न अवस्थाओं से गुजारते हुए पैदा किया और तुम्हें जमीन से वनस्पति के समान उगाया। हो सकता है कि कभी सनातन धर्मियों को भी ऐसी ही या यही बात ईश्वर की तरफ से अवतरित हुई हो जिसे उन्होंने लिटरल अर्थों में ले लिया हो और आवागमन की धारणा पैदा हो गई हो।  यह मजहबी इस्टेलाही जुबान होती है। हज़रत नूह को भारतीय कौम की तरफ ही भेजा गया था। जैसे बनी इस्राइयल में यह मजहबी टेरमिलोजी थी कि नेक इंसान परमेश्वर के बेटे हैं और बुरे इंसान शैतान के बेटे हैं। ईसाइयों ने इसे लिटरल अर्थों में ले लिया और ईसा को परमेश्वर का बेटा बना दिया।  जैसे कुरान में अल्लाह का हाथ और अल्लाह का तख्त कहा गया है। बहुत से मुसलमान ने इसे लफ़ज़ी मायनो में ले लिया और कहा कि उसक हाथ और तख्त हैं मगर कैसा है, पता नहीं।  जबकि ये तमसीली मिसाल है जैसे कामयाबी में हाथ होना, तख्ता पलट होना वगैरह।  
 

अभी तक अधिकतर पुनर्जन्म के केसेस झूठे साबित हुए हैं, आखिर में वैज्ञानिक तौर पर ये सिद्ध नहीं हो पाते हैं। इनमें साइकिएटरिक केसेस भी होते हैं। जो झूठे अभी तक सिद्ध नहीं हो पाए हैं, वंहा कुछ और कमियां रही है. अब तो पुनर्जन्म के केसेस बहुत कम ही रिपोर्ट हो रहे हैं। देखा जाए तो जितने पहले होते थे, अब भी उतने ही होने चाहिए, अगर पुनर्जन्म वाकई एक सच होता तो।  पुनर्जन्म के केसेस में वॉयलेंट या एक्सीडेंटल मौत बहुत ज़्यादा कॉमन पाई गई हैं। आज 8 अरब लोगों में पुनर्जन्म के केसेस नाम मात्र के हैं। पिछले कई दशकों में 50 अरब लोग धरती पर आ चुके हैं। अक्सर बच्चों में पुनर्जन्म के केसेस मिलते हैं मगर बड़े होते होते, वो पुनर्जन्म के केस नहीं रहते हैं। 

हाज़रात: नाखून वाला जादू। यह बच्चों के साथी ही होता है। कमजोर दिमाग वालों के साथ। दूसरे असरात भी आते हैं। कुछ दिखा जरूर है और इसी तरह की बातें, खदू इन बच्चों के घरवाले बढ़ा देते हैं।

सांकृत्यायन ने लिखा है कि पुनर्जन्म सिद्धांत आसल में शूद्रों को उनकी स्तिथि में बनाए रखने की नीति है क्योंकि यह जन्मजात हैं और पिछले कर्म का नतीजा है। इस ब्राहमण नीति भी कह सकते हैं।

देखिये पुस्तक - अवगामीनय पुनर्जन्म: मो अहमद (श्रीवास्तव – MMI Pub. )

 
 



कर्मफलवाद

कर्मफल कर्मों के अनुसार निश्चित फल मिलने के सिद्धांत का नाम है। सनातन धर्मी इसके दो सामान्य अर्थ निकालते हैं। पहला कि सभी कर्मों के फल इसी जीवन में मिल जाते हैं। दूसरा कि कर्मों का फल आने वाले पुनर्जन्म में मिलता है। कमाल कि बात यह है कि इस सिद्धान्त में नास्तिक धर्मों का भी विश्वास है।

असल में कर्मों का फल कब, कंहा, कैसे मिलेगा, यह फल देने वाला निर्णय करेगा। कर्मफल अपने आप नहीं चल सकता। इसमें विश्वास रखने के लिए आपको किसी सर्वशक्ति में विश्वास रखना ही पड़ेगा। नास्तिक लोग तो इसे प्रकृति के देते हैं मगर कर्मफल सिद्धान्त के लिए जो विशेषताएं चाहिए वो सभी प्रकृति में उपलब्ध नहीं है। अगर उस फल देने वाले ने कोई अन्य लोक बना रखा है तो फिर फल वंहा भी मिलेगा बल्कि वास्तविक फल तो वंही पर मिलना चाहिए। अनुभव, ज्ञान और समीक्षा के आधार पर यह कहना उचित है कि कर्मों का सारा फल या बदला इस जीवन में ही मिलना, कंही से भी तार्किक नज़र नहीं आता।

अगर कर्मफल है तो कर्मों का फल देने वाला भी कोई होना चाहिए। कौन है जो कर्मों को मापता- तौलता, जांचता-परखता है? कौन निर्णय करता है और कैसे निर्णय होता है कि किसी ने वाकई अच्छा कर्म किया है या बुरा। यह संसार या समाज तो हमारे सारे कर्म देख नहीं पाता है, हमारी सोच की बुराइयां भी सबको दिखाई नहीं देती हैं। बहुत से कर्म एकांत में भी किए जाते हैं। सोच या मानसकिता में भी दोष पाए जाते हैं। तो यदि जैसा कर्म किया वैसा ही फल मिलता है तो फिर यह फल कौन देता है? कौन इसके मापदंड बनाता है? कैसे कर्मों और उनके फल में संतुलन बनाया जाता है कि अंश मात्र भी फल में त्रुटि न रह जाए। यह कर्म जज या आंके कैसे जाते है? कुछ लोग जवाब में इसके पीछे का कारक प्रकृति को बता देते है, जबकि फिर एक अन्य प्रश्न खड़ा हो जाता है कि क्या प्रकृति कोई जीवित शय है, क्या उसमें बुद्धि, तर्क, अच्छे बुरे की समझ है, क्या उसमें पूर्ण न्याय की क्षमता है? क्या प्रकृति इंसान के अंदर और बाहर हर जगह देख रही है? अगर हाँ तो फिर शायद ऐसे लोग अनजाने में ईश्वर को ही प्रकृति कह रहे हैं।

अगर सारा फल इसी जन्म में मिल जाता है तो फिर 60 लाख यहूदी को तड़पा कर मारने वाला हिटलर का केवल एक झटके में मर जाना न्याय नहीं नज़र आता क्योंकि ऐसी आसान मौत तो उसके कर्मो का फल नहीं होनी चाहिए थी। और उसने अगर अगले जन्म में फल भुगता होगा तो इसका कोई प्रमाण उपलब्ध नहीं है। ऐसी करतूतों वाले लाखों लोग मिलंगे जिनके कर्मो का पूरा फल उन्हें यंहा मिला ही नहीं है। दुनिया में करोड़ो बेईमान लोग हुए हैं और आज भी हैं जो लोगों का हक़ खा कर चैन की ज़िंदगी बिता कर जाते हैं। उनको यंहा फल कंहा मिल पाता है. जैसे भगत सिंह थे जिन्होंने देश के लिए जवानी में ही फांसी के तख्ते पर स्वयं चढ़कर अपने प्राण त्याग दिए। क्या उन्हें इनका बदला इस जीवन में मिला? क्या सरहद पर जान देने वाले सैनिक अपने जीवन में कर्मों का फल प्राप्त कर पाते हैं? नहीं कर पाते हैं।

इसलिए यह सिद्धान्त टोटल फैल है कि फल सिर्फ यंहा पर ही मिलने वाला है। अगर यंही सारा फल मिलना है, कंही और नहीं तो परलोक किस लिए है, नरक स्वर्ग किस लिये हैं। और अगर  स्वर्ग नर्क वाकई नहीं हैं तो लोगों को चाहिए कि वो अपने ऐसे सभी ग्रंथों का पल्ला झाड़ लें जो स्वर्ग नरक की व्यवस्था का उल्लेख करते हैं। क्योंकि एक तरफ यम ग्रंथों में उनका अस्तित्व भी मानना है और दूसरी तरफ उनको अलंकारिक कह कर उनका इनकार भी कर देना है।

सच यह है कि अधितकर लोगों को यंहा पूरा फल नहीं मिलता है। बाद के लिए बहुत कुछ फल या बदला बाकी होता है। देने वाला कुछ कर्मों का फल यहीं देता है और बाक़ी बचे हुए अधिकतर कर्मों का परलोक में। ऐसा भी होता है कि कुछ कर्मों का थोड़ा फल यंहा मिल जाये और उसका बाकी बचा फल परलोक में। इसके कई रूप और फार्मूले हो सकते है जो देने वाले की तत्वदर्शिता या हिकमत पर निर्भर करता है। वास्तव में इसका सही ज्ञान ईश्वर को है कि फल किस को, कितना, कंहा, किस प्रकार, किस रूप में और कैसे मिलना है या मिलेगा।


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