Tuesday, 4 August 2020

चांद देखने में इख़्तेलाफ़ और हिजरी कैलन्डर का जनक




ईद का चांद

अकसर अपनी मर्ज़ी चलाने के लिए और जल्दबाज़ी में कुछ जमातें चांद और ईद का ऐलान कर देते है। जिस से दूसरी जमातों पर भी दबाव पड़ जाता है। एक फ़िरक़ा, दुसरे फिरके वाले की गवाही नहीं मानता भले ही वह शख्स कितना भी तक़वेदार हो। हर जमात, मसलक इत्तेहाद की बात करते है पर चांद तक अलग अलग बना रखे है। इसलिए शायद इत्तेहाद कभी नही होगा। कई बार, अलग अलग जमाते आगे पीछे भी ईद मनाते हुए दिख जाते है हम। और ये मसला शव्वाल के चांद पर ही होता है, ज़ुल हिज्जा के चांद पर नहीं।

अभी हाल में ही, एक बार फिर से, अलग चांद डिक्लेअर कर दिए गए। कुछ मसलकों ने इत्तेहाद के लिए या देर रात तक चली तहक़ीक़ के वजह से ईद नमाज़ के इंतेज़ाम के लिए मिले कम वक़्त का हवाला देते हुए, अगले दिन रोज़ा न रखते हुए ईद उससे अगले दिन मानयी। यानी जिस दिन सभी मसलकों ने ईद मानयी थी।

यूनाइटेड रूअतऐ हिलाल कमिटी बनाने का भी कोई फायदा नही होगा अगर उसमे भी सिर्फ मौलवी मौलाना ही मेंबर बनेगे। एस्ट्रोनॉमर्स की बजाए, हर फिरके वाला खुद जगह जगह चांद देख कर या सिर्फ अपने ही फिरके के लोगो की शाहदत एक्सेप्ट कर जब तक ईद मनाते रहंगे तब तक मुसलमानो की हर जगह दो ईद मनाने पर हंसी ही उड़ेगी। एस्ट्रोनॉमिकल साइंस और उसकी केलकुलेशन के बिना सारी कमेटिया अक्सर बेकार साबित होंगी। एस्टरोनॉमिकल इल्म से कई सालों के कैलन्डर बनाये जा सकते है।

केलकुलेशन का मतलब है साइंटिफिक मेथड और टेक्नोलॉजी से ये जानना की नया चांद किस दिन हो जाएगा और कंहा कंहा दिखाई देगा।

आज नमाज़ के अवकात देखने के लिए सूरज की स्तिथि का दीवार पर टांट पर डालकर उसकी छांव से अंदाजा नहीं लगाया जाता जैसा हुज़ूर, साहाबा के और पुराने वक़्त में होता था। विज्ञान ने आपको सूरज की स्तिथि के अनुसार टाइम टेबल निकाल कर दे दिया और उसी से अब पूरी दुनिया मे नमाज़ पढ़ी जाती है। अगर नमाज़ के लिए साइंसी तरीका कुबूल हो सकता है तो फिर चांद के लिए क्यो नहीं। दोनों का ताल्लुक एस्ट्रोनॉमिकल बॉडीज से है।

लूनर कैलेंडर की बेहतर समझ के लिए इल्म चाहिए साइंस का और ये उन मौलानाओ की समझ मे देर से आएगा जो टेक्नोलॉजी और एस्ट्रोनॉमी में दूर रहते है। चांद की चाल जानने के लिए मौलवियों से ज़्यादा साइंस और एस्ट्रोनॉमी के एक्सपर्ट की ज़रूरत है। ये दुनियावी इल्म का मसला ज़्यादा है, न कि दीन का।

असल में आज चांद देखने का सबसेे बेहतर तरीका तकनीक है। सिर्फ एस्ट्रोनॉमर्स ही जिन्हें ये काम सौंपा जाना चाहिए। और ये आने वाले 20 से 50 सालो में ज़ुरूर होगा इंशाल्लाह, जब सारे मसलकों के मौलवी मौलाना इस बात पर एग्री करंगे या करवा लिए जायँगे की हमारे से बेहतर साइंस्टिस्ट है जो हमे चांद की सही पोज़िशन बात सकते है। जब तक ऐसा नहीं होता तब तक लड़ते रहो और आज के साइंस के दौर में नॉन साइंटिफिक चीज़े इस्तमाल करते रहो। किसी का एक रोज़ा कम और किसी का एक रोज़ा ज़्यादा रखवाते रहो।

न्यू मून तो पहले ही हो (एक दिन पहले भी) जाता पर सूरज की रोशनी में नहीं दिख पाता। जब सूरज डूबने लगेगा तभी ये न्यू मून दिखता है। जब ये दिखता है नंगी आँखों से तभी हिलाल या करेसेन्ट कहलाता है। आने वाले वक्त में ऐसी भी तकनीक आ जायेगी जब सूरज को रोशनी में भी न्यू मून को देखा जा सकेगा। तो क्या उसी को हिलाल मान लिया जाएगा। इसका हल यही है कि आम आदमी आंखों से देख सके (तेज़ निगाह वाला शक्स नहीं जिसके पास एक्स्ट्रा ऑर्डिनरी सलाहियत है) बिना किसी ऑप्टिकल ऐड, हेलीकॉप्टर वैगरह से।

कम से कम इतना तो कर ही सकते है की अपनी आंखों से चांद देखें, पर उसमें एस्ट्रोनॉमर द्वारा किये गए आंकलन को भी ध्यान दिया जाए और उनके द्वारा दिये गए तारीख़ और पूरे भूभाग का मुक़म्मल जायज़ा लेके फिर ऐलान किया जाए।

जब तक ऐसा नहीं होता तब तक तमाम आलिमो और रुयते हिलाल कमिटी के लिए फैसले को मानिए, भले ही इख़्तेलाफ़ आप रख सकते है पर इसके खिलाफ नहीं जाना चाहिए, यही इस्लाम का तकाजा है। आपके लोकल एरिया पर हुए फैसले के अनुसार ईद मानये ताकि उम्मत में इज्मा पैदा हो न कि इनतेशार या इख़्तेलाफ़।
 
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अस्ट्रॉनिनिकल कैल्कुलेशन के उलट चाँद का दिखना

जम्मू कश्मीर, लद्दाख, केरल, कन्याकुमारी, मंगलोर और पाक में भी चाँद दिख गया है। इन्होंने सऊदी को देख कर चाँद डिक्लेर नहीं किया है। अस्ट्रॉनिनिकल कैल्कुलेशन के अनुसार इन सभी जगह और यंहा तक पकि पूरे हिंदुस्तान में ही मौसम साफ रहने पर चांद दिखना यकीनी था। हालांकि हाई ऑप्टिकल ऐड की मदद से भी यंहा चांद देखा जा सकता था। कुछ साउथ ईस्ट एशियन देशों जैसे सिंगापुर, थाईलैंड, इंडोनेशिया में चांद दिख गया है जबकि वंहा चांद दिखने के चांस, इन सभी जगह से कम थे। क्योंकि वंहा सिर्फ ऑप्टिकल ऐड की मदद से चाँद देखा जा सकता था। जब उत्तर और दक्षिण भारत में चांद नज़र आ गया है और जॉग्राफिकेली हमसे पीछे रहने वाले देशों तक मे चांद नज़र आ गया है जैसा कि अस्ट्रॉनिनिकल कैल्कुलेशन के अनुसार दिखना ही था तो फिर पूरे भारत में या आस पास वाले देशों में किसी भी नेक इंसान की गवाही पर चांद घोषित कर देना चाहिए था, भले ही वो किसी भी मसलक का हो। इस तरह साइंसी ऐतबार और इंसानी गवाही दोनों की बुनियाद पर ईद का ऐलान हो जाता।

दूसरी पिक्चर में सऊदी को उनक्लर्ड एरिया में दिखा रहा है यानी यंहा चांद को देखा जाना हाई ऑप्टिकल ऐड की मदद से भी नहीं देखा जा सकता था, ये नाममुकिम था क्योंकि इस दिन चांद इतनी रोशनी रेफेलेक्ट ही नहीं कर सकता कि उसे देखा जा सके। फिर सऊदी ने ये कैसे किया, कोई सवाल नहीं करता? मगर कोई अस्ट्रॉनोमीकली चांद की पॉज़िशन देख कर, किसी की गवाही की बुनियाद पर उन जगहों पर चांद का एक साथ ऐलान करवाने की बात कर दे तो उस पर लोग फ़ौरन सवाल उठा देते हैं।

अगर सऊदी में चांद वाकई नंगी आखों से देखा गया। तो आपकी गवाही और साइंटिफिक डेटा मैच नहीं हो रहे। कहीं कुछ गड़बड़ है। अगर ऐसा है तो ये जितने भी मुस्लिम अस्ट्रॉनिनिकल सेटअप पर खरबों रुपए खर्च हो रहे है, ये सब फ़िज़ूल ज़ाया हो रहे हैं। ऐसा न कहे कि स्पेस से चाँद दिखना ही दिखना है तो वंहा से देख कर भी डिक्लेअर कर दिया करो. ये कैलेंडर इस्लाम के अनुसार फॉलो किया जाना है यानी ये इंसानों के लिए है और इस जमीन के लोगों के लिए। तो चांद को ज़मीन के कोरेलशन में ही देखा जायेगा, स्पेस से जोड़ कर नही।
 
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क्या तथाकथित इस्लामिक (अरबी लूनर) कैलन्डर किसी मुशरिक का बनाया हुआ है?

पहली बात कोई भी को इस्लामिक नहीं होता है। इस्लाम दीन इन सब बातों के लिए नहीं नाज़िल हुआ। ये सब इंसानो को अपने फ़ैसले हैं। हज की तारीख तो इब्राहिम अलैह. चली आ रही है। और महीनों के नाम भी नबी से बहुत पहले से ही थे। मगर क्या सबूत है कि ये महीनों के नाम किसी मुस्लिम ने (इब्राहिम अलैह. की नस्लों में से किसी मोमिन ने) नहीं बल्कि किसी मुशरिक ने ही रखे थे.  ये कैसे पता जब ये कैलन्डर बना तब मुस्लिम मेजोरिटी में नहीं थे? और माइनॉरिटी थे तो भी जिन मुस्लिम ने बनाया क्या पता वो कुछ मुस्लिम ही धार्मिक पेशवा हो, या फलकियात के माहिर हो या एरोस्टोक्रेट क्लास के हों तभी उन्होंने इसे बनाया और लोगों ने आगे बढ़ाया जो नबी तक भी पहुंचा। और हो सकता है यह तब की बात हो जब काबा की बुनियाद दूबारा से बनाई गयी और हज की इबादत धीरे धीरे बक्का से पूरे अरब में फैली और उसी दौरान मुस्लिम ने इसे ईजाद किया हो और ज़ाहिर उस वक़्त आस पास में इतनी आबादी ही नहीं थी। अगर मुस्लिम कम थे या उनके रिवाज ज़माने में मनवाना मुश्किल था तो ये बताएं कि हज कैसे पूरे अरब में स्वीकार हो गया। यह भी इब्राहीम अलैह ने पुनर्स्थापित किया था। हमारा यह दावा ही नहीं है कि यह अरबी कैलन्डर किसी मुस्लिम ने बनाया है या किसी मुशरिक ने। दावा आपने खुलेआम किया है कि मुशरिक ने बनाया है। सबूत आपके पास एक भी नहीं है। अनुमान कोई सबूत नहीं होता। अनुमान को अनुमान की तरह ही लिखा और पोस्ट किया जाता है, हक़ की तरह नहीं। इसलिये कृपया आप यह बात रखें कि ये इस्लामिक कैलेंडर नहीं है, बस यंही तक। न कि अनुमानों के आधार पर गलत बात साबित करने में लग जाएं की यह मुशरिकों का है। इस तरह से तो इस कैलन्डर को इस्लामी मानने वाले और इसे मुशरिको का मानने वाले दोनों एक ही लेवल और पायदान पर खडे हैं। वजह यही है कि दोनों के पास सबूत नहीं है सिर्फ दावा है।
 



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