Tuesday, 4 August 2020

नमाज़, औरतों की जमात, इक़ामत, इमामत, रफायदेन, मसह, तयम्मुम, नेल पोलिश, टैटू, अज़ान।


इंसानियत की शुरवात से ही ध्यान ईश्वर से संपर्क बनाने का साधन रहा है। नमाज़ के रूप में यह ध्यान साधना सबसे कारगर रही है। हज़रत आदम से ही नमाज़ फ़र्ज़ रही है। मुहम्मद साहब ने आकर इसी नमाज़ को वापिस कायम किया। नमाज़ इंसान को अल्लाह से जोड़ती है। नबी और सहाबा को अल्लाह से ताल्लुक बनाये रखना बहुत पसंद था तो दिन में फ़र्ज़ नमाज़ों के अलावा भी अलग अलग वक़्त पर नफिल नमाज़ें पढ़ा करते थे। जब खाली समय या मौका मिलता अल्लाह के सामने नियत बांध कर खड़े हो जाते थे। क्योंकि उस वक़्त लोग इतने पढ़े लिखे नहीं थे कि दीन के इल्मी शोबों में हर कोई अपना पूरा वक़्त लगाने लगे, न ही उस वक़्त दीन में बाहरी चीज़ें दाखिल हो कर दीन का कंटेंट इतना फैला हुआ था कि इसे दुरुस्त करने में हर किसी को अपना बहुत सा वक़्त देना पड़े, तब तो दीन आसान और मुख्तसर था, इसलिए बहुत से सहाबा नमाज़ में ही अपना ज़्यादातर वक़्त लगाया करते थे और फिर उनकी नमाज़ें भी हमसे बहुत ज़्यादा असरदार रिजल्ट देती थी तो सहाबा वक़्त मिलते ही अल्लाह के सामने हाथ बांध कर खड़ा हो जाय करते थे।

नमाज़ में कुछ पोस्चर लाज़मी है। पढ़ने के मामले में सूरह फातिहा, उससे कोई सुरत मिलाना और तकबीरें लाज़मी है जो अरबी में भी पढ़ी जायँगी। इसके अलावा सजदे, रुके, तशह्हुद में आप अपनी मर्ज़ी से, अपनी जुबान में जो उन रूकुन में मुनासिब हो पढ़ सकते हैं।



फ़र्ज़, सुनन्त, नफिल, वाजिब नमाज़ का फ़र्क़।

रसूलल्लाह ने कभी वाजिब जैसी कोई टर्म इस्तेमाल ही नहीं करी। उन्होंने सिर्फ 2 टर्म कही है, फ़र्ज़ और नफिल। यह तो बाद में लोगों ने रसूलुल्लाह के अमल की बुनियाद पर वाजिब, सुन्नते मुअक़्क़दा, गैर मुअक़्क़दा जैसी टर्म बना ली। 

इबादतों के लिए असल में बुनियादी तौर पर सिर्फ दो टर्म है। एक फ़र्ज़ और दूसरी नफिल।  फ़र्ज़ इबादत का मतलब वो इबादत है जिनको नहीं करने पर गुनाह के हकदार है। इन फ़र्ज़ इबादतों के अलावा सभी नफिल (मतलब इज़ाफ़ी) है यानी करा तो सवाब और न करा तो कोई गुनाह नहीं, जिन्हें हम अमूमन सुनन्त कहते है।

जो नवाफिल रसूलुल्लाह ने आम तौर पर अक्सर पढ़ी उन्हें सुन्नत मोक्कदा कहा गया। जिन्हें कभी पढ़ लिया, कभी छोड़ दिया या किसी को ताक़ीद कर दी, उन्हें गैर मोक्कदा सुनन्त कह दिया गया। इन दोनों को मिलाकर ही सुनन्त कह दिया गया। जो आपने कभी नहीं पढ़ी, उन्हें नफिल कह दिया गया। 

नमाज़ 5 फ़र्ज़ है जिन पर सवाल होगा। सुनन्त (मोक्कदा या गैर मोक्कदा) पर सवाल नहीं होगा क्योंकिं बुनयादी तौर पर ये नफिल ही है। हालांकि इनकी बहुत अहमियत है पर छोड़ने पर कोई गुनाह नहीं है। नफिल नमाज़ पर सवाल न होने की पूरी उम्मत कायल है। मस्जिदों में लगे 12, 17 रक़ातों के बोर्ड बेबुनियाद है। 5 फ़र्ज़ के अलावा चाहो तो और पढ़ो और चाहे न पढ़ो। पढ़ोगे तो बेहतर है क्योंकि एक हदीस के मुताबिक आख़िरत में फ़र्ज़ नमाज़ कम रहने पर  गिनती नफिल (सुनन्त कहलें) से पूरी की जायेगी।

इंफ्रादी फ़र्ज़ (फ़र्ज़ ए ऐन) जैसे 5 नमाज़ों की तरह ही इश्तेमाई फ़र्ज़ (फ़र्ज़ ए कफ़ाया) भी होते है जैसे नमाज़े जनाज़ा पर बुनुयादी तौर पर ये फ़र्ज़ ही रहते है, उन्हें वाजिब का लक़ब नहीं दिया जा सकता। इन्हें कुछ लोग अंजाम दे दे तो सबका फ़र्ज़ उतर जाता है।

वैसे अरबी में फ़र्ज़ और वाजिब के एक मायने है। पर फ़िक़ह में वाजिब टर्म हनाफ़ की ईजाद है। हनाफ़ यानी हनफ़ी फ़िक़्ह मानने वाले। जहां इसका मतलब है वो इबादात जो फ़र्ज़ से थोड़ी कम अहमियत रखते है। हनाफ़ के लिए क़ुरान में आये फ़र्ज़ फ़र्ज़ है और हदीसों में आए फ़र्ज़ वाजिब। हनाफ़ के मुताबिक फ़र्ज़ का इनकार या तर्क कुफ्र है और वाजिब का इनकार या तर्क गुमराही बशर्ते लगातार न हो। हनफ़ी मज़हब में ईद की 2 नमाज़ें और ईदुल अज़हा की क़ुरबानी को वाजिब क़रार दिया गया है।
 
 
 
नमाजे जमा। 
 
जरुरत या मजूबुरी में 2 नमाज़ जमा की जा सकती है। जोहर और असर, मगरीब और ईशा। चाहे तो पहले नमाज़ के दूसरी जमा कर लें या फिर दूसरी वाली के साथ पहली।  
 
कुरान ने कहा कि हमने नमाज़ अपने वक़्त पर मुकरर करी है। इस आयात के तहत नमाजे जमा, कुरान के खिलाफ नहीं है क्योंकि इस आयात के मायने जनरल हैं। कुरान ने जगह जगह कहा कि ईमान लाओ और जकात दो। मगर इसे सामान्य नियम मान कर मुस्लिम सीधा सीधा अमल नहीं करते। बल्कि रिसालत में जारी जकात की शर्तों या निसाब को आधार बनाते है और सिर्फ सिर्फ चुनिंदा लोग ही जकात देते हैं। इसी तरह नबी की तारीख, सीरत, हादिसो, सुन्नत (हज के दौरान नमाज़ जमा करना) सभी यह साबित है।

कुरान (7:25): वहीं (धरती में) तुम्हें जीना और वहीं तुम्हें मरना है और उसी में से तुमको निकाला जाएगा। 
[मुस्लिम क्या इस आयात को भी लिटरल लेते हैं, नहीं। क्योंकि जो स्पेस में मर जाते हैं, वो न तो वो जमीन में मरते हैं और न ही फिर यंहा से निकाले जाएंगे।]
 
सफर, बीमारी, बारिश, खतरे, जरुरत या मजूबुरी वगैरह में आप नमाज़ कसर, यानि 4 की बजाए 2 (मगरीब को छोड़ के) पढ़ सकते हैं। जमा कर सकते हैं। सवारी पर नमाज़ पढ़ सकते हैं। बैठ कर, लेटे हुए, इशारों से पढ़ सकते हैं। अगर कोशिश के बावजूद छूट जाए या भूल जाओ तो जैसे ही वक़्त मिले पढ़ लो। 
 
जुराबों पर मसह कर सकते हो। टिशू, टोवेल से वउजु कर सकते हो। 
 


वित्र नमाज़ 

वित्र के मायने है ऑड या ताक़। नबी ने फरमाया है कि रात की आखिरी नमाज़ को ताक़ रकअत में पढ़ो। यानी ये नमाज़ ईशा के बाद या रात में कभी या तहज्जुद में पढ़ी जाने वाली आख़री नमाज़ होगी। ये 1, 3 या ज़्यादा भी पढ़ सकते है। वित्र की नमाज़ भी नफिल है और इसे सुन्नत भी कह सकते हैं लेकिन इसे वाजिब समझा जाता है जबकि ये असल में सोने से पहले पढ़ी जाने वाली आखिरी रकाते हैं। हदीसों में वित्र की बहुत फज़ीलत बयान हुई है और नबी ने फरमाया कि अगर वित्र रह जाए तो वह बाद में कज़ा भी पढ़ सकते हैं।

तहज्जुद, सलातुल लयल, कियामुल लयल, तरावीह।

दूसरे नबियों की तरह ही हमारे नबी पर तहज्जुद की नमाज़ फ़र्ज़ थी। तहज्जुद और नफिल नमाज़ आप अपने घर मे ही पढ़ा करते थे। आपको पैरवी के तौर पर साहब भी इसे नफिल की शक्ल में बड़े शौक से पढ़ा करते थे। एक बार रमज़ान में लैलतुल कदर की रात में आप किन्ही नामालूम वजूहात के चलते मस्जिद के उस कोने से जंहा आप एतकाफ में बैठे थे, वंहा से निकल कर मस्जिद में खुले में आके तहज्जुद के वक़्त तहज्जुद पढ़ने लगे। क्योंकि आम तौर पर ये नमाज़ थोड़े तेज़ आवाज़ में पढ़ी जाती है। साहाबा ने देखा और पीछे आके जमात बना ली (नबी ने जमात का हुकुम नहीं दिया था)। अगली लयतुल में आप फिरसे मस्जिद में तहज्जुद अदा करने आये। लोगो फिर से पीछे पढ़ने लगे। बात सब जगह फेल चुकी थी, जिससे नमाज़ी रात को बढ़ने लगे। तीसरी लयतुल में फिर यही हुआ। चौथी रात को मस्जिद में बहुत बड़ा मजमा इक्कट्ठा हो चुका था। आप हुजरे से बाहर नहीं आये। अगले दिन फरमाया कि मुझे डर था कि तुम्हारा शौक देखते हुए कंही अल्लाह तुम पर ये नमाज़ फ़र्ज़ न कर दे। आपने इस नमाज़ पर ये भी कहा कि फ़र्ज़ नमाज़ों के अलावा नमाज़े घर पर अदा करना बेहतर है (बुखारी 7290)।

नबी के वक्त में कुछ सहाबा ऐसे भी होते थे जो दिन भर मजदूरी करते थे और रात तक बहुत थक जाते थे उन्होंने इसके मद्देनजर नबी से पूछा कि क्या वो तहज्जुद ईशा के बाद पढ़ कर सो जाएं करे क्योंकि रात को नींद नहीं खुल पाती, आपने फरमाया पढ़ लिया करो। जिन्हें क़ुरान कम याद था, ऐसे लोगों ने ज़्यादा क़ुरान न पढ़ पाने की भरपाई के तौर पर रकाअत में इज़ाफ़ा करना शुरू कर दिया।

लोग इसे घरों में भी पढ़ते थे। बहुत से लोगो के घरों में जगह नहीं होती थी वो ये नमाज़ मस्जिद में आके पढ़ते थे।  फिर दो-चार के ग्रुप बना कर पढने लगे। क्योंकि इस नमाज़ में ज़्यादा से ज़्यादा क़ुरान पढ़ना पसन्दीदा अमल है सो जिसको ज़्यादा क़ुरान आता था, उसे लोग अपना ईमान बना लेते थे। 

बुखारी (2010)में है कि नबी के जाने के बाद एक बार हज़रत उमर ने देखा की रात के शुरवाती हिस्से में ईशा के बाद लोग यही नमाज़ मस्जिद के अलग अलग हिस्से में छोटी छोटी जमात बना के पढ़ रहे है। जब एक ही जगह कई कई नमाज़ होगी, थोड़ी बुलंद आवाज़ें आएंगी, किरात सही से नहीं सुनी जायगी। इसी बद निज़ामी के कारण ह. उमर ने कहा ये क्या माजरा है और एक सहाबी को इमाम बनाके सबको उनके पीछे खड़ा कर दिया। अगले दिन इसे देख कर हज़रत उमर ने इसे बिदअत ए हसना पुकारा और कहा कि मैंने क्या खूब बिदअत ईजाद की है। हालांकि ह. उमर ने ये भी कहा कि इसका असली वक्त और इससे बेहतर वही रात की नमाज़ है जब ये लोग सोए होते हैं यानी जब नबी पढ़ा करते थे। चारों खलीफा में से किसी ने इस नमाज़ को ईशा के फौरन बाद नहीं पढ़ा बल्कि असल वक्त पर ही पढ़ते थे। तब से ये तरावीह की नमाज़ इसी तरह पढ़ी जा रही है। तरावीह का मतलब है बैठना। क्योंकि अरब लोग इस नमाज़ में चार रकअत बाद थोड़ी देर बैठे रहते हुए ही आराम करते थे। ये नफिल तहज्जुद की ही नमाज़ है। नबी से यह नमाज़ 11 रकअत साबित हैं (8+3), ये सबसे मजबूत मौकिफ़ है। 13 रकाअत की भी बाज़ रिवायतें मौजूद हैं। साहबा के ज़रिए एक ईमाम के पीछे यह 23 रकअत पढ़ी जाने लगी। क्योंकि रमज़ान में लोगों को ज़्यादा से ज़्यादा नमाज़ और क़ुरान पढ़ना पसंद था। बाद के ज़माने में, यानी इमाम मालिक के वक़्त में इसके 40 से ज़्यादा रकअत तक पढ़ने के सबूत मिलते हैं। इस नमाज़ को 3 से लेके जितना मर्ज़ी तादात में पढ़ा जा सकती है। 

हक़ीक़तन क़ुरान का मतलब अरबी क़ुरान है, न की क़ुरान के तर्जुमा से। इसलिए बेहतर यही है अरबी सीखी जाए मगर ये सबके लिए मुमकिन नही होता। इस्लाम के मुताबिक क़ुरान पढ़ना और सुनना दोनों बराबर है। क्योंकि अरबो की ज़ुबान अरबी है। वो तरावीह में क़ुरान समझ सकते हैं, मगर गैर अरबियों को तर्जुमे से ही क़ुरान समझ आएगा। यह क़ुरान का हक़ है कि उसे समझा जाये, ज़ुबान अरबी हो या गैर अरबी। 

इसलिए आप नमाज़ में पढ़ी जाने वाली सूरतों के मायने नमाज़ से पहले ही समझा सकते हैं ताकि लोगों का ज़हन पहले ही बन जाये और नमाज़ में उन्हें जुड़ाव पैदा हो। आप नमाज़ में पढ़ी गयी सूरतों के मायने नमाज़ के बाद भी समझा सकते हैं। आप चाहें तो घर में अकेले या घरवाले के साथ जमात बना कर यह नमाज़ पढ़ सकते हैं। आप खुद मुसहफ हाथ में लेके यह नमाज़ पढ़ सकते हैं। कान में हेडफोन लगा कर रिकॉर्डेड क़ुरान सुनते हुए भी आप इस नमाज़ को पढ़ सकते हैं यानी तरावीह में सूरह फातिहा खुद पढ़ कर, फिर आगे रिकार्डेड क़ुरान सुन सकते हैं। आप अरबी क़ुरान के साथ साथ मायने भी नमाज़ में पढ़ सकते हैं। आप क़ियाम में फातिहा और क़ुरान की सूरह मिलाने के बाद, क़ुरान का तर्जुमा भी पढ़ सकते हैं। गैर अरबी मुल्कों में यह एक बेहतर अमल हो सकता है। हम कुछ जगह तो ऐसा कर ही सकते हैं ताकि लोग ज़िन्दगी में एक बार क़ुरान मायनो से मुकम्मल कर सके।

यह बात सही है कि तरावीह सिरे से कोई नमाज़ नहीं है यानी बुनियादी तौर पर अल्लाह और नबी ने असलम नमाज़ के तौर पर इसे जारी ही नहीं किया। जो जारी करी गयी थी वो तहज्जुद की नफिल नमाज़ थी। बाद में नबी के अमल, कौल, मसाइल के हल, सवालों के जवाब की बुनियाद पर ये नमाज़ बना ली गयी जो एक अच्छी बात थी। इस पर यही राय हज़रत उमर ने क़ायम करी मगर खुद कभी इसे ईशा के साथ नहीं पढ़ा बल्कि तहज्जुद ही पढ़ी। 

फिलहाल जारी तरावीह से गैर अरबी अरबी मुसलमानों को कितना फायदा है ये भी सोचने की बात है। तरावीह की लंबी लंबी नफिल नमाज़ों से क्या हासिल होता है, यह समझना नहीं चाहता। एक नमाज़ जो लोगों ने ज़्यादा से ज़्यादा क़ुरान सीखने सीखाने (क्योंकि सुनने सुनाने वाले अरबी जानते थे) के लिए इस्तेमाल करी जाने लगी थी, आज वही नमाज़ गैर अरबी मुल्कों में रफ्तार से अदा करते हुए रस्म की तरह ढोई जा रही है। फ़र्ज़ नमाज़े तो फ़र्ज़ है और रब के सामने लाज़मी हाज़री है। मगर नफिल नमाज़ों को इतनी तवज्जो और ऐसी पाबंदी ज़रूरी नहीं है कि लोग इसे अंधाधुंध पढ़े जाए। वैसे भी लोगों का रुझान से साफ है कि कुछ सालों में तरावीह के नमाज़ी कम से कम होते जायँगे।

रही बात तरावीह के ज़रिए हिफ़्ज़, क़ुरान को आगे बढ़ाने की तो आज के दौरे पर इसके कई और तरीके भी हो सकते हैं। आज हुफ़्फ़ाज़ के सीनों के अलावा, डिजिटल मॉड में, फीज़ीकल फॉर्म में भी क़ुरान की हिफाज़त हो रही है, यंहा तक कि यूक्लियर हमलों के दौरान सेफ्टी बंकर तक में चीज़ों की हिफाज़त करी जा सकती है। आज वो दौर नहीं है जब किसी किताब को महफूज़ रखने का तरीका सिर्फ और सिर्फ हिफ़्ज़ था। आधुनिक युग के बाद दुनिया की बेशुमार किताबें आज भी अपनी असल शक्ल में मौजूद है। क़ुरान को हिफ़्ज़ करना वाकई एक बहुत अच्छी बात है। वैसे भी क़ुरान के हुफ़्फ़ाज़ कम तो हो सकते हैं मगर पूरी तरह खत्म नहीं, खासतौर पर अरबी मुल्कों में। 




हदीसें और दलीलें

अगर सुनन्त या नफिल चीज़ें फ़र्ज़ का दर्जा ही रखते है तो फीर तहज्जुद पढ़ने पर इतना ज़ोर क्यों नही दिया जाता जितना सुन्नतों पर दिया जाता है जबकि तहज्जुद तो नबी पर फ़र्ज़ थी। नबी की तरह नमाज़ से मिस्वाक करने को भी ज़ुरूरी कर दिया जाए। नबी की तरह हर पीर और जुम्मेरात के रोज़े क्यों नहीं रखवाए जाते है।

वो रिवायत ज़ईफ़ है जिसमे नबी ने फरमाया है कि वित्र हक़ है जो वित्र नहीं पढ़ता वह हममे से नहीं और ये  हदीस इस मुद्दे के मुताल्लिक़ बाकी सहीह हदीसों से टकराती है।

एक हदीस है जो बुखारी, मुस्लिम, नसाई समेत तकरीबन हदीस की तमाम किताब में मौजूद है। ये हदीस का महफूम है कि नबी पास एक अक्खड़ सा बद्दु आता है और आप से पूछता है कि मुझपर क्या क्या फ़र्ज़ है। आपने बताया कि 5 नमाज़ फ़र्ज़ है और इसके अलावा नफिल जितनी चाहो पढ़ो। फिर आगे बताया कि फ़र्ज़ सदक़ा सिर्फ ज़कात है इसके अलावा नफिल सदक़ा जितना चाहो करो, रमज़ान के रोज़े फ़र्ज़ है इसके अलावा नफिल जितने चाहो रखो। ये सुनके उस बद्दु ने कहा कि इन फ़र्ज़ में कोई कमी नही करूँगा और इन फ़र्ज़ से ज़्यादा कुछ न करूँगा। इस पर नबी ने कहा कि अगर ये अपनी बात पर कायम रहा तो जन्नत का हक़दार होगा। इस वक्त तक हज के अहकाम नाज़िल नही हुए थे इसकिए यइस हदीस में हज का ज़िक्र नहीं है पर हम जानते है कि इसी तरह ही हज फ़र्ज़ है और उमराह नफिल।

"किसी इलाके से एक शख़्स नबी करीम के पास आया और इस्लाम के मुतालिक पूछा तो नबी करीम सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फरमाया कि इस्लाम में दिन रात के अंदर 5 नमाजे फ़र्ज़ हैं, उस शख़्स ने पूछा कि इसके अलावा तो तो कोई नमाज़ नहीं, आप सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फरमाया कि इसके अलावा नफिल नमाज़ हैं अगर तुम अपनी खुशी से पढ़ना चाहो।" (सुनन निसाई -हदीस 459)।

हज़रत अली रज़ी अल्लाहु अन्हू ने फरमाया: "वित्र की नमाज़ फ़र्ज़ नमाज़ की तरह वाजिब नहीं है बल्कि ये सुन्नत है जिसे नबी करीम सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम  ने जारी किया।" (सुनन निसाई -हदीस 1677)

"अबू मुहम्मद एक ताबई थे उन्होंने एक बंदे को कहा कि वित्र वाजिब है, इस बंदे को ये बात अजीब लगी तो वो एक सहाबी हज़रत उबादा बिन सामत रज़ी अल्लाहु अन्हा के पास आ गया और बताया कि अबू मुहम्मद वित्र को वाजिब कह रहा है सहाबी ने कहा अबू मुहम्मद ने गलत कहा है, वित्र वाजिब नहीं है जैसा की फ़र्ज़ नमाज़ लाज़िम है बल्कि ये तो सुन्नत है और मैं गवाही देता हूं नबी करीम सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फरमाया अल्लाह ने तुम पर पांच नमाज़ ही फ़र्ज़ की हैं।" (सुनन अबू दाऊद -हदीस 425)

बरोज़ कयामत अगर किसी की फ़र्ज़ नमाज़ में कमी रह गई तो अल्लाह उसकी नफिल नमाज़ों में से वो कमी पूरी कर देगा।
(जामे तिरमिज़ी -413)





अज़ान

अगर एक बार आस पास की मस्जिद में अज़ान हो गई है तो बिल्कुल भी ज़रूरत नही अज़ान देने की जैसे अकसर हम मस्जिद में जमात होने के बाद दुबारा बिना अज़ान दिए बाकियों की जमात बना लेते है। इक़ामत भी होती है।क्योंकि अज़ान दी जाती है आस पास के लोगो को नमाज़ के लिए बुलाने के लिए। इसलिए अगर ये मक़सद नही है तो, खुद कुछ लोगो को ही पढ़नी है तो अज़ान ज़ुरूरी नहीँ, चाहे मस्जिद हो या घर। पर अज़ान देना बहुत फ़ज़ीलत की बात है।  किसी भी नामज़ का ताल्लुक उसकी अज़ान से नहीं बल्कि वक़्त से होता है।  अज़ान फ़र्ज़ नहीं है। वो हो या न हो, नमाज़ का वक़्त हो गया हो तो अकेले नामज़ बिल्कुल पढ़ सकते है।

सबसे अफ़ज़ल ये है कि अकेले नमाज पढ़ने वाला आज़ान भी दे और इक़ामत भी।

 

इक़ामत

रही बात इक़ामत की तो इसमें दो मौकिफ़ है। पहला ये की इक़ामत देना चाहिए चाहे छोटी सी ही जमात हो क्योंकि ये सुन्नत ए मुक़द्दा है ,अक्सरियत यही मानती है। दूसरा मैकिफ़ ये है कि इक़ामत ज़ुरूरी तो है फ़र्ज़ नहीं इसलिए बिना इसके भी जमात हो सकती है, इसके मानने वाले बहुत ही कम है।




औरतो का मस्जिद जाना, औरत-मर्दो की एक साथ जमात, औरतों से बात करना या हाथ मिलाना


नबी ने ताक़ीद करी थी औरतों को मस्जिदों में आने से न रोको, रात में भी नहीं, हालांकि उनके लिए घर में नमाज़ को बेहतर बताया था। आपने ये भी कहा था कि इत्र वगैरह लगा कर न जाये  जाहिर है नमाज़ का मक़सद अल्लाह की तवज्जो हासिल करना है, लोगों की नहीं। नबी ने यह भी फरमाया कि मर्दों के लिये आगे की सफे सबसे बेहतर और पीछे की सबसे बुरी है जबकि औरतों के लिए पीछे की सफे सबसे बेहतर और आगे की सबसे बुरी हैं। अल्फाजों से ज़ाहिर है कि ये कोई जायज़- नाजायज़ का मसला नहीं है बल्कि पसिंदिदगी का है क्योंकि अगर मर्द पीछे की सफो में नमाज़ पढ़ते हैं तो उनकी नमाज़ रद्द नहीं हो जाती। आपने पीछे खड़ी औरतों को मर्दों के बाद सजदे से उठने की हिदायत दी ताकि उनका सत्र न दिख पाए। आपने औरतों के निकलने के लिए एक दरवाज़े भी मख़सूस किये थे। ये सब हिदायतें औरतों और मर्दों के गैर जरूरी मेल-जोल से बचाने के मद्देनज़र थे।
 
हज़रत आएशा ने फरमाया था कि आज औरतों जो कुछ कर रही हैं, जो नई चीज़ें उन्होंने ईजाद करली है, अगर नबी ये सब देखते तो इनका मस्जिद में जाना बंद करवा देते जैसे बनी इसराइरल की औरतों का करा गया था। इन हदीसों से साफ मालूम पड़ता है कि ये एक अनुमान है और औरतों को फ़िज़ूल की चीज़ें छोड़ने के लिए एक नसीहत।


नबी के पीछे मर्दों ने फिर बच्चों ने फिर औरतों ने सफ़ बनाई, ऐसा वाकया हदीसों में है। नबी का अमल था कि वो औरतों के जाने के बाद मस्जिद से निकला करते थे (बुखारी 849, 850)। उन्होंने मर्दों को यह ताकीद की थी कि औरतों के जाने के बाद मस्जिद से निकला करो, ऐसा हमें मालूम पड़ता है। रिवायतों से साबित है कि नमाज़ों में मर्द और औरतें दोनो शामिल होते थे। मस्जिदे नबवी में पार्टीशन के साथ आज भी नमाज़ होती है।

घर में औरतें अपने मेहरम के साथ तो एक ही सफ़ में भी नमाज़ पढ़ सकती है। मस्जिद में डिवाइडर या पार्टीशन के साथ, एक तरफ औरतें की और दूसरी तरफ मर्दो की जमात हो सकती है। अगर आड़ नहीं है तो औरतें मर्दों के पीछे वाली सफों में नमाज़ पढ़ सकती है। हालांकि अगर ज़रूरत हो और बीच में आड़ या पर्दे का मुनासिब इंतेज़ाम हो तो औरतों की आगे और मर्दो की पीछे, सफे बनवाई जा सकती है। 

वैसे बेहतर यही है कि औरतों और मर्दों की सफ अलग अलग ही बनवाई जाए। ताकि हर किसी भी गलत चीज़ के इमकान ही सिरे से खत्म हो जाये। मगर हमें यह भी ध्यान रखना है कि औरतें और मर्दों की साथ में एक ही सफों में नमाज़ पढ़ने पर अल्लाह की तरफ से कोई पाबंदी नहीं है। क़ुरान ने इसे मना नहीं किया और न ही रिसालत में इसे मना किया गया। इसीलिये बाज़ उलेमा तो दोनों की एक साथ सफ़ बनाना भी जायज़ बताते है अगर इस्लाम द्वारा औरत और मर्द के बीच ख्याल रखी जाने वाली हिदायतों या शर्तों को पूरा किया जाए। ये अदब वही हैं कि नियत या आँखों में बेहयायाई न हो, तवज्जो दूसरी जिंस पर न हो, जिस्मानी टच से लुत्फ़नदोज़ी न हो वगैरह वगैरह।

अल्लाह के नबी अक्सर कई मौकों पर औरतों से खिताब करते थे और खुतबों के बाद उनकी परेशानीयां भी सुनते थे। ज़रूरत पड़ने पर मर्द औरतों को देख भी सकते हैं, उनसे बातचीत भी कर सकते हैं और उन्हें उचित तौर पर छू भी सकते हैं जैसे हाथ मिलाना वगैरह। हज के दौरान तवाफ़ और सई में मर्द और औरतें साथ में अरकान अदा करते हैं। हरम में अक्सर दोनों एक साथ दोनों साथ में जमात से नमाज़ अदा करते हैं। यंहा इसकी इजाज़त होने के पीछे भीड़भाड़ या हज में पाक ज़हनियत होने की दलील दी जाती है। मगर असल दलील यह है कि हर जगह इस मिक्सिंग की इजाज़त है बस मर्दों औरतों के मिलने में उन अदब का ख्याल रखा जाए या मौका, महल ऐसा हो कि इन अदब के टूटने के इमकान ही खत्म हो जाये। जो चीज़ हरम या मक्का में जायज़ है, वो पूरी दुनिया में भी जायज़ है। वैसे ही जैसे जिसकी नमाज़ जायज़ है, उसकी इमामत भी जायज़ है। 

अरब में नबी के वक़्त में और बहुत से देशों में कुछ सदियों पहले तक यही सामाजिक रिवाज था कि औरतों और मर्दों के हर जगह अलग अलग इंतेज़ाम ही किया जाता था। ये सब कल्चर और ट्रेडिशन का पार्ट थे। पर अब जब वक़्त बदल चुका है तो ज़रूरत के तहत एक साथ इंतेज़ाम भी किया जा सकता है मगर मर्द और औरत दोनों अपनी हदों में रहना होगा। 

मेडिकल वजूहात या बड़ी मजबूरीयों में जैसे डूबने से बचाना वगैरह में तो तमाम उलेमा मर्द को औरत को छूने की इजाज़त देते हैं। हज के दौरान औरत मर्द का टच हो जाना भी जायज़ है। क़ुरान ने ज़िना, बेहयायी, बदनीयती वगैरह को मना किया है, ज़ुरूरत के तहत छूने या छुए जाने को नहीं।

यही वजह है कि जिस हदीस में नबी ने फरमाया की औरतों को छूने से बेहतर है अपने सिरों में कील गढ़वाना, उस हदीस में दरअसल नापाक इरादों के तहत छूने की बात कही गई है, न कि आम ज़रूरत के तहत छूने की। वैसे यह रिवायत हदीसों की बड़ी किताबों में मौजूद नहीं है। 
 

देखना, सुनना या छूना कब बेहयाई माना जाता है पर एक दूसरी हदीस से वज़ाहत हो जाती है, देखिए:

मुस्लिम 2758: आँखों की बेहयायी हवस से देखना है, कानों की बेहयायी हवस (गीत या बातचीत) सुनना है, जीभ की बेहयायी वासना के भाषण है, हाथ की बेहयायी हवस से पकड़ना (आलिंगन) है, तथा पैरों की बेहयायी उस राह पर चलना है जहाँ बेहयायी करने का इरादा है।

बुखारी 6072, माजह 4177, मिश्कात 5809, रियाजुसलिहीन 604: मदीना की कोई भी महिला गुलाम रसूल का हाथ पकड़ सकती थी और उन्हें जहाँ चाहे ले जा सकती थी (यानी निचले से निचले तबके के लोगों को नबी ने ख़ुद के ऊपर इतना हक़ दे रखा था. यंहा औरतों द्वार नबी को छूने की अनुमानित बात आ रही है)।

इसे हदीस में छूने के लिए आये लफ्ज़ से मुराद जिस्मानी ताल्लुक ही हैं है क्योंकि आम ज़ुबान में इसके लिए हम इसके लिए छूना लफ्ज़ इस्तेमाल करते हैं।  इसी कॉन्टेक्स्ट यानी जिस्मानी ताल्लुक़ के लिए क़ुरान में भी छूने का लफ्ज़ 2 बार आया है जैसे मरयम ने कहा कि मुझे तो किसी मर्द ने छुवा भी नहीं है (19:20) और जैसे मर्दों को कहा गया कि अगर औरत को बिना छुवे ही तलाक दे दो तो कोई इद्दत नहीं है (33:49)।  
 
नबी औरतों से बयत करते हुए हाथ नहीं मिलाते थे, सिर्फ ज़ुबानी बयत दिलवाते थे। इसमें सिर्फ आपका तरीका बयान हो रहा है, मनाही नहीं। दूसरी बात क्योंकि आप नबी थे तो हर अमल को उसकी बेहतरीन सूरत में करते थे, साथ ही इससे आपके किरदार पर मुख़ालिफ़ों द्वारा किये जा सकने वाले औरतों से संबंधित मामूली दर्जे तक के ऐतराजों के इमकान भी जड़ से खत्म हो जाते थे।

नसाई 5809 (ज़ईफ़ हदीस), दावूद, मिश्कात: नबी ने पर्दे के पीछे से आये एक औरत के हाथ से ख़त लेने से मना कर दिया था जब देखा कि उसके नाख़ून की दिखावट सही नहीं है और फिर उसे इसे बदलने को भी कहा (मेहंदी से)।

नबी ने मर्द और औरतों अकेले मिलने की मनाही करी थी, वो भी इसीलिए थी कि अकेले में दोनों के बीच कुछ भी गलत चीज़ आने या होने के इमकान खत्म हो जाये। औरतों से हाथ मिलाना, न मिलाना, बातचीत करना, न करना, मिलना, न मिलना वगैरह, ये सब हर जगह के अलग अलग कल्चर और ट्रेडिशन का हिस्सा होते थे और आज भी हैं, जो करना चाहे करे, जो न चाहे न करे, बस अपने हुदूद का हर हाल में ख़्याल रखें। बेहतर यही है कि मर्द और औरत एक दुसरे से इन मामलात में जितनी मुमकिन हो दूरी ही रखें मगर ज़रूरत पड़ने पर इन्हें कुछ बुनियादी बातों का ख्याल रखते हुए किया जा सकता है. 



औरत इमाम

सबसे मक़बूल मौकिफ़ तो यही है कि औरत, औरतों की जमात की ही इमाम बन सकती है। दूसरा है कि औरत अपने घरवालों की इमाम बन सकती है।

एक और मौकिफ़ है कि ज़रूरत पड़ने पर वो दोनो की जमात की भी इमामत कर सकती है क्यूंकि नबी सल्लo ने एक सहाबिया उम्मे वरक़ा को उनके दार (घर/एरिया) की मस्जिद का इमाम होने के नाते, उनके लिए एक मुअज़्ज़िन आदमी मुसल्लत किया था (अबु दावूद : 591 - 592).  ये कई साल इमाम रही। इन्ही को हज़रत उमर ने बाद में मदीना की मार्किट के मामलात की निगरानी की ज़िम्मेदारी भी दी थी। इन्हें मक्का के बाज़ार कमिटी की ज़िम्मेदारी भी मिली थी।

[ऐसी कोई सहीह हदीस नहीं है जिसमें औरतों की इमामत को मना किया गया हो। सिर्फ एक हदीस इब्ने माजाह में मिलती है जो बेहद कमज़ोर या ज़ईफ़ है जिसमें कहा गया है कि औरत मर्दो की, बद्दु मुहाजिर मोमिन की और भ्रष्ट आदमी एक तकवेदार की इमामत नहीं कर सकता।  नबी ने कभी नहीँ कहा को औरत की मर्दो में इमामत हराम है। उलेमाओं ने भी इसी को सही माना जबकि ये बेबुनियादी मौकिफ़ है। यह तो लोगों ने उस वक़्त के ऐतबार से कभी ठीक नहीं समझा औरत को ऐसे ज़िम्मेदारी देना।  ज़ाहिर आज भी आमतौर पर ऐसा न किया जाए क्योंकि इससे कई मसले और शर पैदा हो सकती है मगर अगर ज़रूरत हो या मजबूरी हो तो औरत को मर्दो का इमाम बनाया जा सकता है बाकी सभी ज़ुरूरी चीजों का ख्याल रखते हुए।

उम्मे वरका की हदीस में जो लफ्ज़ दार आया है उसके मायने घर, खानदान, हवेली, कबीला या इलाका वैगरह होता है। जबकि सुन्न दारमी में इसी हदीस के लफ़्ज़ों से साफ हो जाता है कि इसके मायने यंहा घर के लिए ही है। वैसे हदीसों में लफ़्ज़ों के बदलाव होने में कोई नई बात नहीं और न ही ये आखिरी तौर पर कहा जा सकता है कि किसी हदीस के अल्फाज़ असलन वही है जो कहे गए थे। हालांकि ज़्यादातर उलेमाओं ने माना है कि वो नमाज़ अपने खानदान, पड़ोस, रिश्तदारों और दोस्तों और जानकारों को पढ़ाती थी पर सिर्फ औरतों को। इसी की वजह औरतों में औरत को इमाम मानने से किसी को अक्सर ऐतराज नहीं है। जबकि एक बात साफ है कि उन्होंने मुअज़्ज़िन की मांग रखी थी तो जाहिर है आस पास के लोगों को नमाज़ का वक़्त हो गया बताने के लिए ही कि थी। क्योंकि घर के मेंबर्स के लिए मुअज़्ज़िन की ज़रूरत नहीं होती। दूसरी बात उस वक़्त घर भी बहुत बडे नहीं होते थे। हालांकि उन्होंने अपने घर के एक हिस्से को मस्जिद ही बना दिया था। वो क़ुरान की हाफ़िज़ और आलिम भी थी।

पर यंहा एक बात समझने लायक है कि एक तो उनका मुअज़्ज़िन एक मर्द था जो बूढ़े थे। ज़ाहिर वो उनके पीछे नमाज़ पढ़ते होंगे। जबकि आम उलेमा कहते है कि नहीं वो आज़ान देके  मस्जिद ए नबवी में मर्दों के साथ नमाज़ पढ़ते होंगे। यह बात अपने आप में ही अजीब लगती है क्योंकि इसका मतलब हुआ कि वंहा एक से ज़्यादा आज़ान होती होगी और लोगो को यह फर्क करना पड़ता होगा कि यह औरतों की आज़ान है और मर्दो की जमात की आज़ान है। दूसरी बात अगर मस्जिदे नबवी में आदमी जाते थे तो औरत भी उस वक़्त में मस्जिद में नमाज़ पढ़ती थी फिर दूसरी आज़ान या जमात की ज़रूरत क्यों? यानी इससे यही लगता है कि उनका घर मस्जिदे नबवी के करीब बिल्कुल नहीं था। तीसरी बात यह समझने वाली है की उनके घरवालों के लिए अगर यह नमाज़ होती थी तो उनके कोई बच्चे नहीं थे और न ही पति पर एक गुलाम मर्द और एक लौंडी औरत उनके साथ रहती थी। ज़ाहिर है ये दोनों मर्द उनके पीछे नमाज़ पढ़ते होंगे।

इसी की बुनियाद पर फ़िक़ह हंबली वाले औरत की इमामत करने के हक़ को तस्लीम करते है पर सिर्फ नफ्ली या तरावीह नामज़ में। इमाम अहमद के बारे में ऐसा अज़ ज़रकशी ने भी लिखा है। हदीस एक्सपर्ट डॉक्टर हमीदुल्ल्लाह ने उम्मे वरका को मर्द और औरत दोनो की इमामत करने वाला इमाम बताया है। शेख यूसुफ अल करदावी और जावेद गमीदी ने औरतों के मर्दो पर इमाम होने की बात को जायज़ करार दिया है। तबरी अपनी तारीख में एक वाक्या लिखते हैं कि गज़ाला जो ख़्वारीजो की लीडर थी, उसने कूफ़ा में जीत के बाद एक दिन पड़ाव डाला और अपनी सेना कि नमाज़ में इमामत की 699 AD में। इसी तरह के चंद वाकये और भी मिलते हैं तारीख में।]
 
Umar appointed Ash-Shifaa bint Abdullaah Al Adawiyyah as an accountant for Al Madeenah market. Ibn Hajar reported this in a biography about Ash Shifaa and Aaishah was appointed to take care of orphans. 
 
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उम्मत में जारी हर तरह की वितर नमाज़ जायज़ है। सभी नबी से इज्मा, तावतुर या हदीसों के ज़रिए साबित है। ये साहब जो मौकिफ़ बता रहे हैं वो उन मसलकों का है जो हदीस को सुन्नत के ऊपर तरजीह देते हैं। वितर और क़ियाम में हाथ कंहा बाँधने और राफ़ायदेन न करने के मामले में ईमाम हनीफा का मौकिफ़ सबसे ज़्यादा दुरुस्त है जो आज भी हनाफ़ में क़ायम है। इन मामलों में बाकी इमाम भी गलत नहीं हैं वैसे क्योंकि ये जायज़ नाजयज़ के मसाइल नहीं है। मगर इनमें ईमाम अबु हनीफा ज़्यादा रसूल की सुन्नत के करीब है. ईमाम अबु हनीफा ने अपने दौर में पहले से चली आ रही सुन्नतों को ज्यों का त्यों आगे बढ़ाया जैसे कि रफ़ायदेन नहीं करना, वितर को (जैसे आज भी हनाफ़ अदा कर रहे हैं) यूँही पढ़ना वगैरह वगैरह। उन्होंने हदीसों में आए दीगर तरीको को यानी हदीसों को सुन्नत (इज्मा तावतुर से मुंतकिल) पर तरजीह नहीं दी। सुन्नर पर लाखों लोग आम ज़िन्दगी में लगातार अमल कर के आगे बढ़ा रहे थे जबकि हदीसों को बस चंद अफ़राद आगे बढ़ा रहे थे। बेशक इस्लाम में सुन्नत को क़ुरान के बाद दूसरा मुक़ाम हासिल है दीन अखज़ करने का। हदीसें क़ुरान और सुनन्त के बराबर नहीं है। जबकि दीगर फ़क़ीह, इमानों, ने हदीसों में आई ऐसी बात, बयानों, तरीकों को उम्मत में जारी पहले से रसूल की सुन्नतों और ऐसे तरीको पर तरजीह दी (जैसे रफ़ायदेन करना, वितर अलग तरीके से अदा करना वगैरह) क्योंकि जैसे सुनन्त रसूल का अमल है, वैसे ही हदीसे उनका क़ौल या उनके अमल का बयान है। इसलिए दोनों तरह के मोक़िफ़ सही हैं, गलत कोई भी नहीं है। मगर नबी के करीब वही है जो सुनन्त को ज्यों का त्यों अदा कर रहा है आज तक। नबी ने हदीसें नहीं बल्कि उम्मत में क़ुरान और सुनन्त को जारी किया था तमाम कयामत के लिए, अल्लाह के हुक्म से। क़ुरान और सुनन्त नस्ल दर नस्ल हम तक भी पहुँची है और आगे भी ऐसे ही पहुँचेगी। इसीलिए पहले मैं हनाफ़ के तरीके पर पढ़ता था। फिर हदीसों का मुताला करके अहले हदीस तरीके पर पढ़ने लगा। फिर जब सुनन्त पर ग़ौर किया था वापिस उसी तरीक़े पर चला गया।  हनाफ़ का राफ़ायदेन न करना, हाथ नाफ़ पर बांधना, तशह्हुद में उंगली वंही उठाना, ईद की नमाज़े, वितर वगैरह सब सुनन्त के क़रीबतर है। फिक़ही किताबो, रिवायतों, बहसों में ये बात साफ वाज़ेह है कि ईमाम अबु हनीफा ने सुनन्त को ज्यों का त्यों आगे बढ़ाया है। जैसे क़ुरान भी चला आ रहा था और आगे बढ़ा। उनके वक़्त तक ये तरीक़े उम्मत में लगभग हर जगह ऐसे ही रायज़ थे। क्योंकि ईमाम अबु हनीफ से लेके उनके शागिर्दों और उनके बाद आये उलेमा के रिकॉर्ड मौजूद हैं। ये बातें बड़े उलेमा में भी आम हैं। ये तो सबूत हुआ उन तक, नबी के वक्त से चली आ रही सुन्नतों के यूँही सही पहुचने का। रही बात उनके बाद में किसी तबदीली का। तो इसका सबूत भी वही है, कि जो अबु हनीफ़ा के वक़्त में चला आ रहा था वो फिक़ही किताबो में उनके दौर में ही दर्ज हो गया था और आज भी वही हनाफ़ में चला रहा है। तब के अब तक के रिकॉर्ड मौजूद है कि यही वो तरीके हैं। बड़े उलेमा ये जानते हैं। जैसे नबी का जारी किया हुआ क़ुरान लगभग हर जगह एक ही तरह से दोहराया, याद किया, सुनना सुनाना जारी था, नस्ल दे नस्ल, लाखों लोग द्वारा। उसी तरह सुनन्त भी लाखों लोगों द्वारा आगे बढ़ रही थी। अगर किसी हदीस में कोई ऐसी बात आ गयी क़ुरान के मुताल्लिक जो क़ुरान के खिलाफ न हो तो उस को कुबूल किया गया और जो क़ुरान के खिलाफ थी (जैसे आयतों का खोना, लफ़्ज़ों का बदलना वगैरह) उन्हें कुबूल नहीं कर गया। इसी तरह ईमाम अबु हनीफा ने चली आ रही सुन्नतों या रिसालत में जारी नबी के तरीकों के खिलाफ जा रही हदीसों का तरजीह नहीं दी यानी जो हदीसें रायज़ तरीको से अलग बात बता रही थी। यानी हदीसों में आये तरीक़े, नबी के वक़्ती तरिके वगैरह माने गए (ये कब, किस तरह सहाबा ने नबी को करते देखें, ये अलग बहस है जो फिर कभी)। पर जो आपने रिसालात में तरीके जारी किये वो वहीं हैं जो आपके दौर से ही अमल में लाये जा रहे थे इमाम हनीफा के दौरे तक, नस्ल दर नस्ल। 

वित्र में दुआ ए क़ुनूत भी पढ़ सकते हैं और नहीं भी। बस मगरिब की नमाज़ से थोड़ा अंतर पैदा हो जाए नमाज़ में यही नबी की ताकीद और तरीका था। नमाज़ में दुआ कोई सी भी पढ़ी जा सकती है। यंहा तक कि अपनी जुबान में भी। दुवा वही करी जाए जिसमें इंसान के जज़्बात शामिल हो। इसलिए बेहतर है अपनी दुवा की अरबी समझ कर पढ़ी जाए या अपनी जुबान में कर ली जाए। अरबी ज़ुबान में ही दुवा करना, नमाज़ का लाज़मी अरकान नहीं है। इसलिए इसमें सबको इख़्तियार हासिल है जो मुनासिब लगे, वो करें, इससे नमाज़ की कुबूलियत, वैलिडिटी पर कोई फर्क नहीं पड़ता। ये दुवा नबी से साबित नहीं है कि उन्होंने ये वितर में पढ़ी (कुछ दूसरी दुवाएं पढ़ी)। मगर यह ह. उमर से साबित है। ज़ाहिर है खुल्फ़ा ए राशिदीन के जारी किए गए तरीक़े, नबी के मूताबिक ही थे। इसलिए कोई सी भी दुवा पढ़ी जा सकती है। अपनी बनाई हुई भी।
 
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जुमा 

जुमे को नमाज फ़र्ज़ है अगर इस्लामी हुकूमत है तो। और साथ ही हुकूमत का प्रतिनिधि खुतबा दे, ये ज़रूरी है। अगर ऐसा नहीं है तो जुमा पढना फ़र्ज़ नहीं है। इसके बदले असल नमाज़ यानी ज़ोहर अदा करी जाएगी. पर अगर कंही पहले से जुमा का इंतेज़ाम कर जा रहा है तो जुमा ही पढ़ना चाहिए जैसे आज कल हर देश में हो ही रहा है। दोपहर की नमाज़ तो पहले ही सब पर फ़र्ज़ है। वो पढनी है. फिर इलाके या क्षेत्र के अनुसार बड़े स्तर पर इकठ्ठा हो कर एकता और समस्या का समाधान करने के लिए और हुकूमत के लिए अपने नेताओं से मार्गदर्शन के लिए है, जुमा नमाज़ है. इसलिए इसमें खुतबा होता है. साप्ताहिक एक बार. खुतबा है इसिलिये 2 रकअत घटा दी गयी है ताकी खुतबे के लिए वक्त निकल पाये। खुतबे के बाद मिली मार्गदर्शन, निर्देश पर अपने अपने इलाकों में जा कर अमल करना चाहिए.  
 
The Khutbah (sermon) has two parts: First Khutbah & Second Khutbah (Khateeb  sits briefly for a few seconds in between). It should begin by praising Allah (Hamd), then Sending Salawat (Durood) upon the Prophet, Advising Taqwa, Give a reminder or exhortation about obeying Allah, Recitation of at least one verse from Quran. In either the first or second khutbah (according to most scholars, both is better), Supplication (Dua) for the Believers. 
 

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वुजू करने के बाद जुराबें इसी नियत के साथ पहन लो तो आपको अगले एक दिन (24 घंटों) तक वुजू में पांव धोने की ज़रूरत नहीं है. इस तरह पाँव का वुजू हो रखा है. जुराब आपको उतारनी नहीं है. वुजू में मौजों पर बस गीली उँगलियों को ऊपर की और फेर लेंगे और आपका वुजू मुक़म्मल हो जायेगा. अगर सफर में है तो ये रियायत तीन दिन (72 घंटों) तक के लिये हो जाती है. ये तयम्मुम के उसूल पर ही दी गयी रियायत है. मुश्किल पेश आने पर इबादात में ऐसे ही रियायतें मिलती हैं. जुराबें कोई भी कपडे की हो सकती हैं, चमड़े की होना ज़रूरी नहीं है, उलेमा ने इस पर अपने मौकिफ बयान करे हैं, अरब में ऐसे ही चमड़े के जुराब चलते थे, कपडे के जुराब वंहा कारगर नहीं थे. 

इसी तरह आप मुश्किल हालत में गीले रुमाल से, वाईप से या स्प्रिंकलर बोटल से वुजू कर सकते हैं. इसमें आपको गीलापन सिर्फ  मुंह, हाथों, सिर, पांवों पर फेर लेना है. अगर वुजू के बाद जुराबें पहनी थी तो जुराबों पर मसह किया जा सकता है. कुल्ली, नाक में पानी, सिर का मसाह करना वुजू का लाज़मी हिस्सा नहीं है. तीन बार धोना नबी का तरीका है, एक बार भी धोया जा सकता है. वुजू के अरकान की तरतीब नहीं बदली जा सकती. 

पानी नया होने पर, तयम्मुम में मिट्टी, दीवार (किसी भी खुश्क जगह पर) पर हाथ फेर कर उसे चेहरे और हाथों पर मल लें. ज्यादा मिटटी, धुल लग जाये तो झाड ले पहले उलटी हथेलियों को टकरा कर. नमाज से पहले वुजू सिर्फ एक अलामत है. इसमें सिर और पाँव पर हाथ फेरना नहीं है. 
 
वुजू के साथ गुसल भी हो जाता है मगर वुजू की तरतीब पूरी अदा करनी चाहिए. 

नेल पोलिश कोई हराम चीज़ नहीं है. इसमें एक लेयर चढ़ जाती है इसलिए वुजू करके नेल पोलिश लगा लो फिर जब तक पोलिश है तब तक उस पर वुजू करते रहें. ये एक इश्तिहाद है. क्योंकि नबी ने कभी मेहँदी उतारने को नहीं कहा और औरतें बिना वुजू के ही मेहँदी लगाती थी और उस पर वुजू करती रहती थी. 
 
जिस तरह वुज़ू कर के मौज़े पहनने के बाद अगर मौज़े न उतारे और अगली बार वुज़ू की ज़रूरत पङ जाए तो मौज़ों पर मसह हो सकता है, इसी तरह औरतों के लिये नेल-पालिश का मामला है! {इज्तिहाद -जावेद अहमद ग़ामिदी}

टैटू हराम नहीं है. नबी के वक़्त में अफ़्रीकी औरतों शिर्क से जुड़े टैटू बनाती थी, भंवे और बाल उस तरह तरशवाती थी, इसलिए इसके बारे में ग़लतफहमी पैदा हो गयी. 

कुरान 5:6: When you rise up for prayer, wash your faces and your hands up to the elbows, wipe your heads, and wash your feet to the ankles. If you are in a state of full impurity, then take a full bath. But if you are ill, on a journey, or have relieved yourselves, or have been intimate with your wives and cannot find water, then purify yourselves with clean earth by wiping your faces and hands.
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अज़ान सुनते हुए या खाना खाते हुए सलाम
 
अज़ान सुनते हुए, सलाम कर सकते हैं और किसी के सलाम का जवाब भी दे सकते हैं। वैसे अज़ान बोलते या सुनते हुए बीच वक्फे आते हैं, कुछ सेकंड्स के सो इनके दौरान सलाम का जवाब देना दखलंदाजी नहीं होगी. खाना खाते हुए को भी सलाम कर सकते हैं और किसी के सलाम का जवाब भी दे सकते हैं। वैसे ही चबाना रोककर भी जवाब दे सकते हैं. यंहा तक कि नमाज़ पढ़ रहे इंसान को भी सलाम कर सकते हैं और नामज़ पढ़ते हुए वो जवाब भी दे सकते हैं मगर बेहतर है, हाथ के इशारे से जवाब दे दे। इन पर हदीस मौजूद है। वैसे नमाज़ पढ़ने वाले को सलाम न ही करे तो बेहतर है क्योंकि नमाज़ इसकी वजह से ध्यान भटक सकता है. बाकी कोई कुरान पढ़ रहा हो तो उसे बेहिचक सलाम कर सकते हो. असल मसला ये है कि दुसरो को परेशान करने से बचना चाहिए बस। मगर सलाम करना कहीं ज़रूरी लगे तो सलाम हर जगह कर सकते हैं। पहले नबी नमाज़ में सलाम का जवाब भी देते थे और सहाबा भी। फिर नबी ने इशारों से जवाब देना शुरू कर दिया ताकि तवज्जो न टूटे।

हज़रत सुहैब ने कहा: मैं अल्लाह के रसूल के पास से गुज़रा जो नमाज़ पढ़ रहे थे। मैंने उन्हें सलाम किया और उन्होंने अपनी उंगली से इशारा करके जवाब दिया। (अबू दाऊद 925)
 


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