Tuesday, 4 August 2020

दीन के माखज़, सुन्नत, फिकह, फ़िरके, फहम की क़िस्म




दीन के स्रोत क़ुरान और सुन्नत।

दीन के सिर्फ दो स्रोत है, क़ुरान (या अल्लाह के कलाम) और सुन्नत (नबियों के अमल-बातें)। अल्लाह के कलाम और अम्बिया को, दीन क्या है बताने के लिए किसी इज्तेहाद की ज़रूरत नहीं और न ही कभी पड़ी। अगर इज्तिहाद भी दीन का स्रोत है तो लाओ कोई ऐसा दीन का एहकाम या अरकान जो आपको क़ुरान और सुन्नत (हदीस नहीं, क्योंकी सुन्नत और हदीस में फ़र्क़ है, जैसे हदीस और सहीह हदीस में फ़र्क़ होता है।) में नहीं मिला और आपने इज्तिहाद करके उसे दीन साबित कर दिया हो।

अमल के मसाइल और दीन के एहकाम या अरकान में फ़र्क़ करना सीखिए। दीन के सारे एहकाम दीन में बताए जा चुके है, उन्ही दो स्रोत के ज़रिए। जो सवाल अक्सर सामने आते है वो मसाइल का हिस्सा है। मसाइल को हल करने के स्रोत क़ुरान, सुननह, हदीस, इज्मा, इज्तिहाद या क़यास वैगरह हो सकते है। क्योंकि दीन मुक़म्मल हो चुका है इसलिये अब कुछ नया उसमे दाखिल न होगा। मसाइल पैदा होते रहंगे जिन्हें हल भी किया जाता रहेगा।

इसलिए दोनो में फ़र्क़ करिये। दीन अलग है और मसाईल अलग। दीन का ए टू ज़ेड आपको बताया जा चुका है यानी एहकाम। इन एहकाम पर यानी दीन पर अमल करते हुए जो मसले पेश आते है वो खुद दीन के एहकाम नही होते बल्कि दीन के एहकाम के अमल वाले हिस्से से वाबस्ता होते है। लोगों हमारे इन्ही गलत जवाबो से ही पकड़ करते है। इसलिए उन तक बेस्ट बात ही पहुँचे ताकि मुसलमानों की ताकत गलत को ठीक साबित करने में ज़ाया न हो।

जब हम दीन के स्रोत के स्रोत या मुक़म्मल होने की बात कर रहे है तो उससे मुराद, दीन के अहकाम, अरकान से होती है, जिसकी एक शुरुवात और अंजाम होता है। इस प्रोसेस का ज़िम्मा नबियों पर होता है और जो उन्ही के ज़रिए मुक़म्मल किया जाता है।

मसाइल और दीन की बुनियाद में फ़र्क़ है। दीन की बुनियाद मुक़म्मल हो चुकी हैं मसाइल आते रंहेगे। मसाइल आइंदा नया दीन या दीन में कुछ नया पैदा नहीं करेंगे। हां पर दीन में (अमल करते हुए) मसाईल पैदा होते रहैंगे।  असल में सुन्नत, सहीह हदीस, हदीस में फर्क है।


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अमलन तरीका ए ज़िंदगी, सुनन्त है। सुनन्त किसी और छीज़ के लिए इस्तेमाल नही हुआ। उसवा ए हसना, नबी का बेतरीन तरीका है दीन का यानी जो क़ुरान ने करने को कहा, उस पर रसूल ने कैसे अमल किया, यही उसवा ए हसना है। जैसे वुजू में तीन तीन बार अहकाम दोहराना. (यह  पानी ज़ाया करना नहीं है क्योंकि पानी को लेके नबी ने बहुत से हुक्म दिए जैसे नदी के किनारे भी पानी जाया न करना, पानी से रगड़ना. ऐसा बताया जाता है कि नबी एक लीटर पानी में में गुसल कर लेते थे.)

मुस्तक़िल बिल ज़ात, नबी की दीनी सुनन्त ही है। ये स्वतंत्र है। इसका जिक्र क़ुरान में है पर डिटेल में नहीं। डिटेल रसूल ने जारी की।

इमाम शाफ़ई अपनी किताब अल रिसाला में लिखते है कि इल्म (इस्लामी) दो तरह से महफूज़ हुआ है। एक कितबुल्लाह और दूसरा मुसलमानों की नकल में जैसे नमाज़, रोज़े, हज, ज़कात जिससे कोई बालिग आक़िल मुस्लिम अनजान हो ही नहीं सकता।

इब्न अब्दुल बर कहते है इल्म क़ुरान सुनन्त से मिल गया। सुनन्त दो तरीकों में। एक जारी है जो इज्मा और तावतुर से मिल गया। यानी सुनन्त इसी में है। दूसरी सुनन्त अखबार ए अहद से मिला यानी हदीस से क्योंकि वो कुछ लोगों ने बयान किया जबकि आगे बढ़ाने का काम सबने किया। इल्म की दुनिया मे हदीसो को अखबार के अहद कहते है। इल्म दो तरह महफूज़ हुआ। एक अखबार ए मुतवातिर यानी जारी सुनन्त।

यानी सुनन्त का बड़ा हिस्सा जरियात में है। अब अखबारें अहद के हिस्से को सुनन्त बोला जा रहा जबकि ये हिस्सा मुस्तकिल बिल जात को बयान ही नही कर रहा, नहीं क्योंकि ये कोई भी इंडिपेंडेंट बात नहीं करता सिर्फ दीन की कोई बात वजाहत करता है, किसी सुन्नत के जारी हकुम पर। उनकी ज़िंदगी के काम बातए जाते है।

सुनन्त को सिर्फ पहले हिस्से यानी जारी सुनन्त तक को ही कहना चाहिए।


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नफिल मतलब इज़ाफ़ा। सुन्नत मतलब तरीका। अल्लाह के तरीके को सुन्नतुल्लाह कहा गया है। नबियो की सुन्नत, हूज़र की सुन्नत, सहाबा कि सुन्नत, सबके तरीक़े उनकी सुन्नत होते है।

दीन में सुन्नत से मुराद, इबादत में सुन्नत या सैंक्शनड सुन्नत से है। वाज़िबे सुन्नत तर्क करने पर लानत है। जैसे नामज़ का तरीका, बाल काटना, सीधे हाथ खाना। न की आम सुन्नत तर्क करना जैसे तहमद पहनना, ऊंट की सवारी।



फ़िकही इख्तेलाफ़ 
 
अगर पति गायब है या खो गया है तो पत्नी कब दूसरी शादी कर सकती है:-
इमाम हनीफ़ा - 90 सालों बाद।
इमाम शफ़ई  - 6 सालों बाद।
इमाम मालिक - 4 सालों बाद (अब सभी उलेमा इसे ही मानते हैं)। 
 
 

Signboards not allowing people of other Firqa to perform Namaz in their Mosques.


We are not really aware of such bogus religious orders passed by ignorant muslims or their Rehnoomas. Most of the muslim think such boycott as a part of the Deen. Its not only about Barelvi firqa. All the firqas of Islam whether it be Sunni, Shia, Barelvi, Deobandi or Ahlehadees.  All are basically extremist and  generally think that only they are real muslims. That is why we are facing such Azaab today in evey corner of this world. Where is real islam or real muslim in its original form. There is no such place around us today.

We are most ignorant and jahil people inspite of having Islam as deen and Quran as guidance. It's a fact. We are just namsake Muslims. We are busy in Firqebazi and Bedeeni. Such acts, is neither Islam nor of real Muslims.

Diagnose is the first step towards Cure. We can't treat ourselves until we know what disease we are suffering  from. We have to creat Awareness among our people. People going in such Mosques or performing Namaz behind such Imams should ask the organizers to remove such boards or mentality.

Mazhabi Peshwaon ki Taanashahi aur Aam Musalmanon ki dwara unki Andhi Taqleed aur apni khud ki jahalat ne ummat ko barbad kar diya hai. Ab bhi waqt hai logo ko islam ka sahi roop janne ki koshish karni chaiye aur sahi islam ki tarf rookh.

We have to create awareness in masses. Diagnose is the first step towards Cure.

Whatever sects are there in the Ummmah, it should be to get close to Allah and Sunnah.
 
 
 
आलिम और उनके अनुसार इस्लाम की रेंज।

ज़्यादातर फिरकों और गैर फिरकों के बहुत से आलीमों को काफ़ी वक़्त तक समझ कर, सुन कर, देख कर या पढ़ कर, मैं दुनिया के तमाम आलीमों को अलग अलग कैटेगरी में रखता हूँ। कभी कभी किसी खास मसले पर इनकी कैटेगरी में बदलाव भी आ जाता है। पर अमूमन इन्हें इनकी इस्लाम पर समझ के मुताबिक़ मोटे मोटे तौर पर 5 कैटगरी में बांटा जा सकता है।

1. Those who have Islam for their selves।
जिनके पास इस्लाम है सिर्फ अपनी मन मर्ज़ी से मानने के लिए है।
2. Those who have Islam for a Maslak.
जिनके पास इस्लाम है ख़ास मसलक के लिए है।
3. Those who have Islam for all the Muslims.
जिनके पास इस्लाम है तमाम मुसलमानों के लिए है।
4. Those who have Islam for the whole Mankind.
जिनके पास इस्लाम है तमाम इंसानों के लिए है।
5. Those who have Islam as Culture.
जिनके पास इस्लाम सिर्फ सांस्कृतिक तौर पर होता है।

पहले वाले बदसमझ है। दूसरे वाले सिर्फ नाममात्र के आलिम है। तीसरे वाले आलिम तो है पर कुछ कमी पेशी के साथ। चौथे वाले सबसे बेहतरीन और मुकम्मल आलिम है क्योंकि अगर कोई चीज़ आलमी है तो उसे आलमी ही लिया जाएगा। पांचवे तो मज़हबी आलिम ही नही।

1. इसे समझने के लिए एक छोटा सर्कल बनाये। ये सर्कल फर्स्ट वालों का है यानी अपना अपना पर्सनल इस्लाम मानने वालों का, इसमें इस्लाम की कुछ बुनयादी बातें ही गायब है। जैस अहले क़ुरान, नुसेरिया, अहमदिया या क़ादियानी।

2. उसके ऊपर एक बड़ा सर्कल बनाये फोर्थ वालों का यानी असल इस्लाम का जो अपने आप में मुकम्मल इस्लाम है न कम न ज़्यादा। जैसे वाहिद्दुदीन खान साहब, सय्यद अब्दुल्लाह तारिक साहाब, जावेद अहमद गामीदी साहब।

3. उसके ऊपर उससे बड़ा सर्कल बनाये थर्ड वालों का है जिसमें कुछ ऐसी बातें है मौजूद है जिसका असल इस्लाम से कोई सरोकार नहीं और साथ साथ इस्लाम की कुछ बातें उसकी असल हक़ीक़त से अलग शक्ल में मौजूद है। जैसे ज़ाकिर नाइक, अहमद दीदात, इसरार अहमद साहब, मौदूदी साहब। तारिक जमील साहब भी इसी लिस्ट में आंशिक तौर पर रखे जा सकते है।

4. उसके ऊपर एक सबसे बड़ा सर्कल बनाये सेकंड वालों का, इसमें हद से ज़्यादा फिजूल की बातों की भरमार है जो इस्लाम का हिस्सा ही नहीं है और बहुत सी बातें बिगड़ी या गैर हक़ीक़ी शक्ल में भी मौजूद है। इसमे वो सारे उलेमा आते है जो किसी फिरके से शिद्दत से जुड़े हुए है और फिरके के मुताबिक है सब कुछ कहते है।

5. एक सर्कल ऐसा बनाये जो सारे सर्कल को काटते हुए बने। इसमें वो चीज़ें भी शामिल है जिनका इस्लाम से दूर दूर तक वास्ता नहीं है जैसे सूफी मज़ाहिब।
 
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List of Sunnan

● Worship Rituals
i. The Prayer ii. Zakah and Sadaqah of Id al-Fitr
iii. Fasting and Itikaf
iv. Hajj and Umrah
v. Animal Sacrifice and the Takbirs during the days of Tashriq i.e. 11th, 12th, 13th of Dhul-al-hajj.

● Social Sphere
i. Marriage and Divorce and their relevant details 
ii. Abstention from coitus during the menstrual and the puerperal period.  [in Quran]

● Dietary Sphere
i. Prohibition of pork, blood, meat of dead animals and animals slaughtered in the name of Gairullah. [in Quran]
ii. Slaughtering in the prescribed manner of Tazkiyah by pronouncing Allah’s name. 
[in Quran]

● Customs and Etiquette
i.  Remembering Allah’s name before eating or drinking and using the right hand for eating and drinking
ii.  Greeting one another with al-Salamu Alaykum and responding with Wa Alaykum al-Salam.
iii. Saying al-Hamdulillah after sneezing and responding to it by saying Yarhamukallah (may Allah have mercy on you)
iv. Keeping moustaches trimmed
v.  Shaving pubic hair
vi.  Removing the hairs under the armpits
vii. Paring fingernails
viii. Circumcising the male offspring
ix.  Cleaning the nose, the mouth and the teeth
x.  Cleaning the body after excretion and urination
xi.  Bathing after the menstrual and the puerperal periods
xii. 
Bathing after intercourse i.e. Ghusl-i Janabah (ceremonial bath after ejaculation).  [in Quran]
xiii. Bathing the dead before burial
xiv. Enshrouding a dead body and preparing it for burial
xv. Burying the dead
xvi. Id al-Fitr
xvii. Id al-Adha

7 Principles for Sunnah

1. Only those things can be a Sunnah which can be classified as religion (इबादात, ततहीरे - बदन, खान पान, अखलाक)

2. Sunnah relates to only practical affairs and things and not theoretical knowledge (इल्मी). Faith, belief or ideology (इमानियात) is not Sunnah.

3. Sunnah is not initiated by Quran. The directives initiated by Quran and merely followed by the Prophet like fighting the infidels and punishing the criminals as prescribed in the Quran is not Sunnah

So if something is based in Quran and the Prophet has merely explained or followed it as directed then these words or acts are not Sunnah. They are the Prophet's explanation (तफ़्सीर) and exemplary manner (उसवा ए हसना) as he acted upon them. 

Only those things are Sunnah which are based on words, practices or tacit approvals (दुरुस्त क़रार देना) of Prophet and they cannot be regarded as following a directive of Quran or an explanation of a directive of Quran. 

The directives like Namaz, Roza, Hajj, Qurbani are mentioned in Quran (it also corrected them) but it's evident from the Quran itself that these directives were initiated by Prophet himself once he had revived them as religion of Abraham and given them religious sanction (बाद इस्लाह और दुरुस्ती). So they are Sunnah which the Qur'an has ratified (तस्दीक़).

4. A new Sunnah is not constituted by merely observing some Sunnah in an optional manner like Nafil - Namaz, Roza, Qurbani. So It is not an independent Sunnah or original deed. (आपका इन नवाफील का एहतिमाम उसवा ए हसना है)।

Doing something of religion in the most ultimate and perfect form is not an independent or another Sunnah like Wuzu and Ghusl as performed by the Prophet since he just obeyed an original Sunnah in complete, perfect and exemplary form (उसवा ए हसना).

5. Things which merely state some aspects of human nature are not Sunnah except if the Prophets have made them an essential part of religion. Like eating beasts and clawed birds are prohibited. This prohibition is only a delineation of human nature and are not Sunnah.

Quran prohibited carrion, running blood, swine and or a sacrifice in the name of Gairullah. This is a mere delineation of human nature. Some similar prohibition of (unnatural) food mentioned in Ahadith are not independent Sunnah.

6. Those things are also not Sunnah, the nature of which is fully sufficient to show that the Prophet never wanted to constitute them as Sunnah like utterances and supplications (अज़कार) said in the Qadah.

The Prophet taught that Tashahhud & Durud (दवाएं भी) to be recited in the Qadah. But the Prophet neither prescribed (मुक़र्रर नहीं किया) them nor made them mandatory after teaching them. They are just his favourite supplications. He wanted to give them the option to either read these which he taught or some others (मुनाजात के लिए).

The only Sunnah in this regard is that one must sit in the Qadah in the second and last Rakat.

7. Quran and Sunnah are not validated through Khabar-i-Wahid. Sunnah is an independent source of religion. The Prophet Muhammad was liable to communicate it with great care and diligence in its original form and in a manner that would render it certain. It was not left to a person's choice to communicate it further as is the case of a Khabar-i-Wahid. The source of the Quran and Sunnah is the consensus of the Ummah. They were transmitted by the consensus and verbal/practical continuation.

Ahadith which show the personality of the Prophet or his interpretation are transmitted through lesser means of validation.

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Sunnah:
Words, Practices, Approvals of Prophet
Initiated by Prophet but mentioned in Quran (Namaz, Roza, Hajj, Qurbani)
Inhuman but essential? (Carron, Blood, Swine, Gairullah)

Not Sunnah:
Based in/Initiated by Quran but merely explained/followed by Prophet (
fighting, punishing).
Inhuman prohibition (eating beasts
clawed birds etc.)
Wuzu 

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1. ये ठीक है कि बच्चों के कान में अज़ान, अकीक़ा जैसा अहक़ाम को सुन्नत नहीं माना जा सकता क्योंकि उनकी कोई दीन के मूल स्रोत में असल नहीं है। वुज़ू इस सूची में नजर नहीं आ रहा है। हां, शायद उसे नमाज का ही हिस्सा मानते हुए स्पष्ट रूप से उल्लेख नहीं किया गया है? (क्योंकि वुज़ू की तफ्सीलात कुरान में आ गयी है और इसलिए शायद वो सुन्नत नहीं है)

2. मेहर, वलीमा जैसा अहकाम अगर सुन्नत है तो उन्हें भी शायद निकाह का ही हिस्सा बताते हुए स्पष्ट रूप से उल्लेख नहीं किया गया है? मगर फिर प्यूबिक हेयर, बगल के बाल हटाना, नाखून काटना को अलग-अलग सुन्नत के तौर पर क्यों रखा गया है? क्या इनको भी एक कैटेगरी में रखा नहीं जाना चाहिए था? मान लेते हैं कि ये अलग-अलग एक्सरसाइज हैं। मगर फिर शव को नहलाना, उसे ढकना, दफ़न के लिए तैयारी करना और दफ़नाना भी एक ही काम के हिस्से हैं, इन्हें दो अलग-अलग सुन्नत क्यों माना गया है?

3. इसी तरह नाक, मुंह, दांत साफ करने को एक ही कैटेगरी बना दिया गया, इन्हें भी अलग-अलग रखा नहीं जाना चाहिए था? बल्कि ये तो शायद गुसल/वुज़ू में भी रखा जा सकता है?

4. इसी तरह नमाज, रोजा, हज, ज़कात आदि को अदा करते हुए बेशुमार अहकाम सुन्नत के तौर पर किये जाते हैं, जाहिर है उन्हें एक ही कैटेगरी में क्लब कर दिया गया है (जैसे ग़ामिदी साहब ने कहा कि क़ादह में बैठना एक सुन्नत है, यानी ऐसी और भी सुन्नत हैं) मगर फ़िर यही क्लबिंग customs etiquette वाली सुन्नतो में क्यों नहीं की गई है?

5. सवाल बस यही है कि अगर बहुत सी सुन्नतों को उनके स्वभाव के हिसाब से एक ही श्रेणी में रख दिया गया है (worship, social, diet categories) तो social etiquette वाली सुन्नतों को अलग-अलग क्यों रखा गया है। क्योंकि जब सभी के लिए एक ही तरह का वर्गीकरण किया जाएगा तो सुन्नन का नंबर 26 से कम हो जाएगा और सभी का अलग से किया जाएगा तो इनका नंबर 26 से बहुत ज्यादा हो जाएगा क्योंकि इसमें हम डिटेलिंग में जाएंगे।

6. और बस एक आखिरी सवाल कि क्या कोई सुन्नत सफ़ाई के तौर पर सिर के बाल काटने से मुताल्लिक भी है? 
सुनन के उसूलों के मुताबिक़ वसीयत/विरासत सुन्नत नहीं हो सकती क्योंकि इन पर कुरान वाजेह है. 
 
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हुक्म की बुनियाद होने का मतलब है कि अल्लाह खुद उस हुक्म को कुरान में देंगे, लोगों के सवाल का इंतजार नहीं करेंगे। कुरान में हुकुम की बुनियाद और तफसील दोनों हैं तो वो सुन्नत नहीं होगी। मूल रूप से कुरान में उसकी बुनियाद नहीं होनी चाहिए तभी कोई चीज सुन्नत होगी। तफ़सील की ज़रूरत होगी तो दी जाएगी। नबी की तफ़सील वाला नियम परिवर्तनशील और सशर्त है, किसी चीज़ का सुन्नत मानने के लिए।

प्रश्न: 'मासिक धर्म और प्रसव काल के दौरान सहवास से परहेज' का वाज़ेह ज़िक्र कुरान में है। ये ऐसा सरल नियम है कि कुरान और सुन्नत से इसकी तफ़सील की ज़रूरत नहीं पड़ी। फ़िर इसे सुन्नत क्यों माना? ये पैगम्बरों की सुन्नत रही है.
उत्तर: क्योंकि वो दीन जो पैगम्बरों की सुन्नत रही है और कुरान पर सिर्फ ताकीद करता है या कुछ सुधार कर देता है (लेकिन उसकी तफसील हमें सुन्नत के माध्यम से मिलती है उसे सुन्नत में रखते हैं?)। कुरान 2:222 हुक्म की बुनियाद है ही नहीं। वो तो सिर्फ स्पष्टीकरण दे रही है। आयत शुरू ही यहां से होती है - वे आपसे इसके बारे में पूछते हैं। ये सवाल किसी पुराने पास मंज़र से पैदा हो रहा है।

प्रश्न: प्राइवेट पार्ट्स को छिपाना सुन्नत क्यों नहीं है? जबकी ये हमेशा से जारी है? प्राइवेट पार्ट्स ढकने की तफ़सील नहीं हो सकती और इसीलिए कुरान ने भी नहीं दी है। क्योंकि यह भी एक सरल नियम है. इससे के बाद या इसे ऊपर उठाकर, जिस्म/धकने के बारे में जिन चीज़ों का ख़्याल रखना है, उसकी तफ़सील ज़रूर क़ुरान ने दी है। प्राइवेट पार्ट्स की रखवाली करना तो नबियो के भी एकसा रहा होगा और सभी मजहबी समाजों में भी। प्राइवेट पार्ट ढकना कैसे कुरान की पहल हो सकती है? कुरान कैसे इस हुकुम की बुनियाद हो सकता है? क्या ये हमेंशा से अंबिया के दीन का हिस्सा नहीं रही है? क्या पहली कौमें और आम लोग ऐसा नहीं करते थे? क्या दौर में जाहिलिया में या कुरान नाज़िल हो रहे वक्त के दौरन आम अरबों को इतना हिस्सा ढकना जरूरी नहीं समझते थे?
उत्तर: क्योंकि वो हुक्म जिसकी बुनियाद और तफसील कुरान से मिलती है उसको कुरान के हुक्म में रखते हैं अगरचे की पैगम्बर ने भी उन पर अमल किया। सूरह नूर की आयतें जो प्राइवेट पार्ट, ड्रेस कोड, पुरुष-महिला बातचीत की पूरी शरीयत के बारे में है। आयत के शुरू जहां से हो रही, जितने ब्यौरों पर चर्चा हुई है, हुक्म से मुतल्लिक लोगों के सवालो का जवाब जैसा दिया गया है, उससे साफ हो जाता है कि कुरान ही इस सारे हुक्म की बुनियाद भी दे रहा और तफसील भी। (क्योंकी इसकी शरीयत कुरान में बयान हो गई है विवरण के साथ???)। अब नबी का जो अमल भी होगा इस मामले में, इसी कुरान के हुक्म के तहत इस्तेमाल किया जाएगा और नबी का जो अमल भी कहा जाएगा उसे उस्वा कहा जाएगा, न कि सुन्नत।

प्रश्न: 'अल्लाह का नाम लेकर तज़किय्याह के निर्धारित तरीके से जिबह' का ज़िक्र भी कुरान में वाज़ेह है और सुन्नत से इसकी तफ़सील की ज़रूरत भी नहीं है तो फिर इसे सुन्नत क्यों माना? पैग़म्बरों की सुन्नत ज़रूर रही मगर नबी की तफ़सील की ज़रूरत ही नहीं पड़ी। इसमे निर्धारित तरीके से विशेष रूप से अल्लाह का नाम लेने से जोड़ा गया है। तो फिर क्या निर्धारित तरीके से (जो सुन्नत से मिलता है) में खून बहाना भी शामिल है (जबकि खून पहले से ही कुरान द्वारा निषिद्ध है) या फ़िर निर्धारित तरीके में दूसरी चीज़े भी शामिल है जैसे क़िबला रुख़, जानवर की उम्र (ईद-अल-अजहा पर), तेज़ चाकू आदि? अगर ये सब चीजें भी शामिल हैं तो क्या सुन्नत को सिर्फ 'निर्धारित तरीके से जिबह' लिखना चाहिए था? इसमे "अल्लाह के नाम का उच्चारण करके तज़कियाह" लिखने से क्या इसके मायने और एप्लिकेशन सीमित नहीं हो गए? ज़बीहा (जैसे मुसलमान करते हैं) अरबों से (कुरान से पहले) पहले से परिचित (पर कम अभ्यास में) था और ये वंहा के यहूद में भी हुआ करता था।
उत्तर: निर्धारित तरीके यानी ज़बीहा का तारिक़ा हमें सुन्नत से ही मिलता है। इसको शुरू में ही अंबिया ने जारी कर दिया था। तज़किया अल्लाह का नाम लेके इसे जो लिखा गया है वो स्पष्टता के लिए है बस, वरना इससे मुराद पूरा जिबह का तरीका ही है।

प्रश्न: 'सूअर का मांस, खून, मृत जानवरों और गैरुल्लाह के नाम पर वध किए गए जानवरों पर प्रतिबंध' का ज़िक्र कुरान में है और ये सुन्नत है। क्या ये सुन्नत इस उसूल (ऐसी चीज़ें जो केवल मानव स्वभाव के कुछ पहलुओं को बताती हैं, सुन्नत नहीं हैं, सिवाय इसके कि पैगंबर ने उन्हें धर्म का एक अनिवार्य हिस्सा बना दिया है), के तेहत है यानी इसे दीन का लाज़मी हिसा जो क़रार दिया गया है? लेकिन यह नियम भी आसान है, इसलिए नबी ने इन पर शायद कोई तफसीलत नहीं दी है। धर्म का अनिवार्य हिस्सा है उसलू के मुताबिक ऐसा क्या अमल है जो मानव स्वभाव होने के बावजूद, नबी ने उसे दीन का हिसा बना कर सुन्नत क़रार दिया, क्या वो यही निषेध तो नहीं है?
उत्तर: कुरान में ये हुकुम भी लोगो के सवाल करने के बदले में दिया गया है बाज़ जगह यानी कुरान में इसकी बुनियाद नहीं है बल्कि सिर्फ तक़ीद करी गई है, इसलिए ये सुन्नत है। मानव स्वभाव धोखा खा सकता है, इसलिए कुरान की इस रोक को "मानव स्वभाव के कुछ पहलू" में नहीं डाला जा सकता। ये सारी चीजें भी हमसे अंबिया के दीन में रह रही हैं, कुरान सिर्फ तक़ीद या स्पष्टीकरण कर रहा है।

प्रश्न: वुज़ू सुन्नत में क्यों नहीं है? मेहर सुन्नत नहीं है? जबकी नमाज, रोजा, हज, कुर्बानी का जिक्र है कुरान में, तफसीलात नहीं है।
उत्तर: सलाह के तहत वुज़ू एक सुन्नत है और निकाह के तहत मेहर एक सुन्नत  है. इनकी तफ़सीलत क़ुरान में है।

ऐसा लगता है कि नमाज के तहत वुज़ू और निकाह के तहत मेहर नबी ने खुद से पहल की और इसी तरह ग़ुस्ल-ए जनाबा को भी खुद से शुरू किया, भले ही कुरान में तीनो की तफ़सील या ज़िक्र आ गया जो असल में इनकी पुष्टि या सुधार होना चाहिए।
 
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