एक मुस्लिम और एक बौद्ध मित्र की दोनों धर्म पर प्रश्न उत्तर के रूप में हुई चर्चा का सार।
अम्बेडकरवादी मानते हैं कि बौद्ध धार्मिक किताबों में मिलावट हो चुकी है और कोई 29वां बुद्ध नहीं है।
अगर खुद्दकनिकाय (जिसमें 29वें बुद्ध का उल्लेख है) के कुछ भाग में मिलावट की गई है। तो उसके जो शब्द प्रमाणिक माने जाते है तो वो शब्द सच में प्रमाणिक है कैसे पता चला? उनकी प्रमाणिकता कैसे सिद्ध की गई। क्योंकि बौद्ध लोग कहते हैं कि बुद्ध ने असल में कुछ लिखवाया ही नहीं, बस शिक्षा दी। सब कुछ बाद में शिष्यों ने लिखा। यानी बौद्ध ही कह रहे है की बुद्ध ने कोई वाणी लिखवाई ही नहीं। तो प्रमाणिकता कैसे जांची गयी?
दूसरे धर्म के दूतों ने भी स्वयं किताबें नहीं लिख डाली बल्कि उनकी शिक्षाओं की सुरक्षा और किताबों में उनकी लेखनी उसी प्रकार हुई जैसे बुद्ध की शिक्षाओं के साथ हुई। यानी पहले शिष्यों ने शिक्षाएं कंठस्थ हुई, फिर अलग अलग वस्तुओं पर लिखते हुए, पुस्तक का रूप लिया।
हर धर्म में मिलावट तो होती ही है। सिर्फ बौद्धों की ही किताबों में मिलावट नहीं हुई है। यही बात मुस्लिम (हदीसों में), क्रिस्चियन, ज्यूस और यंहा तक कि सनातनी भी कहते है कि उनकी कई किताबो में मिलावट हुई है। पर अधिकतर ऐसे ग्रंथों में मूल संदेश सही सलामत मिल ही जाता है। क्यूंकि धार्मिक महत्वता रखने के कारण इन्हें आम तौर पर पूरी तरह से बदल देना बहुत ही कठीन होता है।
अम्बेडकरवादी कहते है कि ग्रंथों में मिलावट के बाद आज जो भी बुद्ध धम्म बचा है वो जीवन में अप्लाई करने के कारण बच गया और असल बौद्ध धर्म भारत में ही सही स्वरूप में माना जाता है जबकि बाहर देशों में इसका स्वरूप बिगड़ गया है।
भारत में दो तरह से बोद्ध धर्म माना जाता है। एक वो धम्म है जो बौद्ध धर्म की सारी बातें और ग्रंथ मानते है जैसे महाराष्ट्र में कुछ जगह, लद्दाख, नार्थ ईस्ट आदि में। विदेशों में तो इसका स्वरूप और अधिक बदल के शुद्ध कर्मकांड वाला हो जाता है। दूसरा धम्म वो है जो सिर्फ वही बुद्धइज़्म का सार मानते है जो बाबा साहब अम्बेडकर बता कर गए जैसे महाराष्ट्र में कई जगह और यूपी में अम्बेडकरवाद प्रभावित बुद्धिज़्म। अम्बेडकरवादी, बाहरी बौद्ध धर्म को गलत मानते हैं। असल में भारत के अम्बेडकरवादी बोद्ध धर्म और नार्थ ईस्ट, लद्दाख, विदेशों के बौद्ध धर्म में ज़मीन आसमान का फर्क है।
बाबा साहब ने जब बुद्ध धर्म अपनाने की बात कही तो सिर्फ बौद्ध धर्म की केवल वही बातें ली जो साइन्टीफिक और लॉजिकल थी, बाकी छोड़ दी। इसका अर्थ ये नहीं है कि जो उन्होंने छोड़ी वो सारा मिलावट या आधारहीन था। बल्कि वो उन्हें उचित नहीं लगा जिसकी वजह उन की खुद की संतुष्टि, विचारधारा, राजनीतिक कारण, भविष्य का जोखिम, वैज्ञानिक दृष्टिकोण आदि हैं, जिनको आधार बना के बाबा साहब ने बुद्ध और बुद्धिज़्म की शिक्षाएं और मान्यताएं शॉर्टलिस्ट करी अपने और अपने लोगों के लिये। क्योंकि वो अपने अनुयायियों को केवल वही विचारधारा देना चाहते थे जो उनकी खुद की थी। इस धर्म को उन्होंने न हीनयान कहा, न महायान बल्कि नवयान कहा यानी नया मार्ग। परन्तु इसका मतलब ये नही की बुद्ध धर्म में सिर्फ वही शिक्षाए थी, जो बाबा साहब ने ली। अधिकतर तो उन्होंने छोड़ दी जो अन्य बौद्ध आज भी उसी प्रकार मानते हैं। केवल अम्बेडकरवादी इन्हें नहीं मानते है।
जबसे धम्म को समाप्त करने के प्रयत्न हुए, यानी लगभग ढाई हज़ार साल पहले से, तब से लेके अभी पिछले 100 साल तक तो बाबा साहब वाले धम्म के मानने वाले अनुयायी नहीं थे, क्योंकि बौद्ध धर्म का ऐसा सिलेक्टेड वर्ज़न था ही नहीं। बल्कि ये तो बाबा साहब ने बनाया। कहते हैं अप्लाई करने से धम्म बच गया था। अगर ऐसा है तो भारत की बजाए लद्दाख, नार्थ ईस्ट, चीन, जापान, श्रीलंका, तिबब्बत और आस पास के साउथ ईस्ट देशों में ही लोग सदियों से बल्कि आरम्भ से ही लगातार प्राचीन बौद्ध मत को अप्लाई करते हुए दपाए गए हैं। इसका मतलब असली धम्म यंहा से नहीं बल्कि, उन देशों से लेना चाहिए। तो दोनों में से कौन सच्चा धम्म फॉलो कर रहा है, यंहा वाले या वंहा वाले?
कुछ अम्बेडकरवादी मानते हैं कि ईसाई और मुस्लिम ने बुद्ध से नकल किया है।
अगर ये बात मान ली जाए कि बुद्ध को जीसस और पैग़म्बर ने कॉपी किया, तो बुद्ध भी अपने पहले के आये हुए बुद्धों को ही फोलो कर रहे हैं, जिसकी चैन बाकी दूतों और फिर भविष्य में मैत्री बुद्धा से मिलती है। क्या लगता है कि जब से पृथ्वी पर मनुष्य जीवन व्याप्त है तब केवल एक ही व्यक्ति यानी तथागत बुद्ध को ही सत्य ज्ञान की प्राप्ति हुई है। क्या कभी किसी ने सत्य की खोज की ही नहीं और न ही किसी को सत्य मिला, सिर्फ एक अलावा, जो कि बुद्ध थे। दुनिया में आज तक खरबों लोग आ चुके हैं, उनमें से केवल सिर्फ बुद्ध ही सत्य प्राप्ति के लिए निकले होंगे और केवल उन्हें ही सत्य मिला भी। यानी आज तक दुनिया में अरबों लोगों में केवल एक ही व्यक्ति सत्य को प्राप्त कर पाया, ये बात ही बुद्धि व तर्क के विपरीत है। ऐसा सोचना ही अनरीज़नबले, इलोजिकल है और प्रोबेबिलिटी के विरुद्ध है। कुछ तो और भी होंगे जिन्हें सत्य की प्राप्ति हुई होगी। वो कौन हो सकते हैं?
बुद्ध की शिक्षाओं में जैन धर्म की छाप दिखाई देती है जैसे कि अहिंसा, ध्यान, अच्छे कर्मों पर ज़ोर आदि। तो अगर 'नकल' करने वाला लॉजिक माने तो फिर तो बुद्ध ने जैनियों से नकल किया है और शिक्षाएं बना डाली। और नकल नहीं किया तो इसका मतलब वो पहले और अकेले ही सत्य को प्राप्त करने वाले हुए जो की असंभव है। यंहा तक कि चार्वाक के गुरु बृहस्पति नास्तिक थे। सब कहते है कि बुद्ध नास्तिक थे तो फिर क्या बुद्ध ने नास्तिकता, बृहस्पति या चार्वाक से नकल करी?
तथागत बुद्ध पहले बुद्ध नहीं थे और आखिरी भी नहीं, जिन्हें सत्य की प्राप्ति हुई। यह अवश्य ही एक श्रंखला होगी। क्योंकि इस तरह के सत्य खोजियों का जीवन, विशेषताएं, कथनाइयां, घटनाएं, आदेश, शिक्षाएं आदि लगभग एक जैसी मिलती हैं।
सभी धर्मों में सत्य को तलाश में लगे लोगो की शिक्षाओं के साथ मिलावट हुई है। यह यही सिद्ध करता है कि, ऐसे सब भले व्यक्ति एक दूसरे से किसी न किसी प्रकार की समानता या संबंध रखते हैं या जुड़े हुए रहे हैं। तभी उनके साथ दुनिया वाले एक जैसा व्यवहार करते आ रहे हैं और उनकी शिक्षाएं भी बदलते आ रहे हैं। यानी हमेशा से इन जैसों और अच्छाई के विरुद्ध पापी लोग षड्यंत्र करते आ रहे हैं।
बौद्ध कहते है कि हिन्दू धर्म को छोड़ने के बाद कोई और धर्म अपनाना रस्सी खोलकर ज़ंज़ीर बांधने जैसा है और बाबा साहब की चुनी हुई बुद्ध की शिक्षाएं ही उनके लिए पर्याप्त हैं।
गले की रस्सी खोलकर जंजीर बांधना बेवकूफी है। पर गले की रस्सी उतार कर सोने- मोती का हार दिखने या मिलने के बाद भी सदा गला खाली रखने की सौगंध खा लेना हठधर्मी है। सही गलत की परख होना ज़रूरी है। सत्य कंही भी हो सकता है। जिसे ढूंढा ही जाना चाहिए जैसे बुद्ध ने भी ढूंढा था।
जो आपके लिए फिट बैठे, बौद्ध मत की वो शिक्षाएं ले लेना और जो आप की मुहिम के लिए फिट न बैठे, उन शिक्षाओं को छोड़ देना, ये दोहरे मापदंड हैं। वो भी अगर दोनों तरह की शिक्षाएं समान रूप से प्रामाणिक हो। सिर्फ पसंद अनुसार धर्म आदि में से कुछ भी ले लेना और कुछ भी छोड़ देना, उचित नहीं है। ये ऐसा ही है जैसे कि आप सबसे अमीर बनने के लिए हीरे का धंधा करना चाहते हैं और आप किसी माइन में जाते हो और वंहा से 'सिर्फ हीरे' चुन कर लाते हो। पर उसी माइन में कंकर, पत्थर के साथ साथ दूसरे जेमस्टोन, प्रेशियस स्टोन, रूबी, नीलम आदि भी होते हैं जिन्हें आप सिर्फ कंकर, पत्थर समझ कर छोड़ आते है। कंकर, पत्थर छोड़ना तो समझदारी है पर जेमस्टोन, प्रेशियस स्टोन नहीं। सबसे अमीर कौन बनेगा, वही बनेगा जो कंकर, पत्थर छोड़ कर हीरे और बाकी जेमस्टोन आदि भी ले आएगा।
कर्मकांड धम्म का हिस्सा नहीं है।
पहले केवल कर्म ही होते हैं फिर करते करते वो कर्मकांड का रूप ले लेते हैं और फिर वही आडम्बर बन जाते हैं जिसका कारण अतिवाद, स्वार्थ आदि ही होता है। दुनिया में इसका अपवाद नहीं है। ऐसे सभी मतों और सो कॉल्ड धर्मों में होता आया है और आगे भी होता ही रहेगा। हमारे चारों और आज भी ये सभी मतों में हो रहा है। जिससे बौद्ध धर्म भी अछूता नहीं रहा। बस ध्यान से देखने की ज़ुरूरत है कि प्राचीन बौद्ध धर्म में आरम्भ में कितने अधिक कर्मकांड थे और अब कितने हो चुके हैं। उदाहरण योगा, विपश्यना, नमाज़ आदि शारीरिक और मानसिक एक्सरसाइज हैं। पर आज ये सीधे तौर पर किसी न किसी धर्म से जुड़े हुए माने जाते हैं और सभी एक दूसरे धर्म वालों के कार्यों को कर्मकांड, आडम्बर कहते हैं या वाकई बन गए हैं।
बुद्ध ने उपवास का विरोध किया। पर अपराह्न में भूखा रह कर ध्यान लगाने का आदेश दिया। विनयपिटक के प्रतिमोक्ष के अनुसार अगर कोई ऐसा न करे तो इसे एक पच्चितिया अपराध माना जायेगा। यंहा तक कि महत्वपूर्ण बौद्ध धार्मिक दिन जैसे उपोसाथ को भी ऐसे ही रहना है। क्या ये कर्मकांड, आडम्बर, ढोंग कहा जायेगा? क्योंकि कुछ लोग व्रत और रोज़ा को ढोंग कहते हैं। अब अगर कोई डायटिंग के कारण भूखा रहे तो ठीक है। और कोई डायटिंग के साथ साथ बुद्ध के कहे के कारण भी उपवास रख ले तो वो भी कर्मकांड या आडम्बर हो जाएगा क्या? अधिकतर कर्मकांड तो आडंबर और ढोंग ही ही। पर थोड़े से ऐसे भी धार्मिक कर्म या रीतियां थी जो वास्तव में मनुष्य की शारीरिक, मानसिक, सामाजिक आदि आवश्यकताओं की पूर्ति करती थी या है और इसलिए धर्म का हिस्सा भी है। ध्यान या विपश्यना, योग, नमाज़ सब शरीरिक और मानसिक क्रियाएं है। इसलिए ये बहुतनलाभदायक चीज़े है, न कि सिर्फ धार्मिक कर्मकांड।
बुद्धमत धर्म नहीं बल्कि एक वे ऑफ लाइफ है।
असल में आज बुद्ध की शिक्षाओं पर सबका अपना अलग अलग इंटरप्रेटेशन और सिलेक्शन है। पहले से ही ऐसा होता आ रहा है। यह बात इतिहास समझ में भी आती है। तभी तो सनातन धर्मी बुद्ध को विष्णु का अवतार बताने लग गए। कोई बुध को नास्तिक तो कोई आस्तिक कहता है। बुद्ध मत भी अलग अलग प्रकार से दुनिया भर में माना जाता है। बुद्ध धर्म के साथ भी वही हुआ जो बाकी धर्मों के साथ होता आया यानी अनुयायी ही धर्म बिगाड़ते चले गए।
बुद्ध ने मूर्तिया बनाने के लिए मना किया था। पर फिर भी लोग बुद्ध मूर्तिया बनाते है। बुद्ध ने मांसाहार माना किया था पर फिर भी लोग खाते है। बुद्ध ने हिंसा का भी निषेध किया। पर कुछ बौद्ध भी हिंसा करते है जैसे म्यांमार, भूटान, श्रीलंका में बहुत से बौद्ध दूसरों पर अत्याचार कर रहे है। यानी धर्म से हटकर चलना धार्मिक लोग हर जगह करते ही है।
बुद्ध ने हिंसा, मांसाहार को मना किया। यंहा तक कि आदमखोर शेर को भी मारने से मना किया। एक कहानी ये है कि बुद्ध ने भिक्षुओ को दानपात्र में मिली सभी चीजों को ग्रहण करने को कह रखा था तो एक दिन एक शिष्य के दक्षिणा पात्र में मरा हुआ चूहा कंही से गिर पड़ा, तो उसे ग्रहण करने को बुद्ध ने मना नही किया। । बौद्ध धर्म की सबसे पुरानी शाखा थेरवाद सबसे पुरानी मान्यताओं को मानने को कहती है और ये भी कहती है कि बुद्ध ने शिष्यो को सुवर खाने की आज्ञा दे दी थी। कहा जाता है कि बुद्ध की मृत्यु उन्हें किसी बूढ़ी स्त्री के द्वारा सुवर मांस खिलाने से हुई थी। सच क्या है पता नहीं।
आज के बहुत से अम्बेडकरवादी बौद्ध, पिछले बुद्धों को नहीं मानते हैं क्योंकि इससे ये इशारा मिलता है कि सारे बुद्धा कोई दूत आदि तो नहीं या किसी एक धर्म के प्रचारक तो नहीं जिन्हें परमेश्वर ने भेजा हो।
बुद्धवंश ग्रँथ में 29 बुद्धों का उल्लेख है। दो हज़ार वर्ष पुराने सांची में स्तूपों पर रखे पत्थर द्वार पर भी पूर्व में हुए बुद्धों का उल्लेख है। पूर्व में हुए 6 बुद्ध का उल्लेख भरहुत स्तूप पर है। ऐसा माना जाता है कि बुद्ध के भाई देवदत्त भी पूर्व में हुए बुद्धों को मानते थे। बौद्ध ग्रंथों में इन बुद्धों का वर्णन है।
बुद्धिज़्म के आज तक हुए सबसे बड़े विद्वानों में से एक है भदंत कौसल्यान, जिनकी अनेको किताबे हर बहुजन पब्लिकेशन छापता है। वह सभी 28 बुद्धों के जीवनी लिख चूके है। जिनमे से पहले बुद्ध की आयु वो 1.75 लाख वर्ष बता चुके है।
प्रसिद्ध भाषा वैज्ञानिक और बुध्दिस्ट डॉ राजेन्द्र प्रसाद सिंह (जिनकी टक्कर का विद्वान फिलहाल नही है) अपनी पुस्तकों (बौद्ध सभ्यता की खोज, खोये हुए बुद्ध की खोज) मे प्रमाणित कर चुके है कि बुद्ध से पहले भी अनेकों बुद्ध हुए है जिनका सीधा संबंध सिंधु सभ्यता से जाकर मिलता है। इनकी रिसर्च की बाद अब लोगो ने फिर से, धीरे धीरे पूर्व के बुद्धो को मान्यता देना शुरू कर दिया हैं।
विपसना रीसर्च इंस्टीटूट, नासिक के संचालक और विपस्सना और बुद्धिज़्म के बहुत बड़े विद्वान, आचार्य सत्यनारायण गोयनका ने अपनी पुस्तक 'क्या बुद्ध नास्तिक थे' में स्पष्ट कर दिया है कि कई बुद्ध हुए है और भगवान बुद्ध कर्मफल, कर्मसिद्धांत, परलौकवाद को मानते थे जो बुद्ध की वाणी से स्पष्ट है।
क्या बहुत से मुस्लिम या इस्लामिक शब्द पाली भाषा या बौद्ध धर्म से लिए गए हैं?
मुहम्मद शब्द पाली से नहीं आया है. अरबी के लगभग सभी शब्द रुट वर्ड्स से बनते हैं जो अक्सर तीन अक्षर के होते हैं। उन्ही में से एक ह.म.द. रुट वर्ड है। ये रुट वर्ड सिस्टम सेमेटिक भाषाओं का आधार है। पाली या कोई भी भारतीय भाषा में यह सिस्टम नहीं है। काबा की परिक्रमा भी बोद्ध धर्म से नहीं आई है. क्योंकि इस्लाम में इब्राहिम के काल से ही परिक्रमा की जाती रही है जो ऑन रिकॉर्ड है। यहूदी और ईसाइयों में भी कुछ प्रकार की परिक्रमा मिलती हैं। इब्राहिम का समय लगभग आज से 4 हज़ार साल पहले का माना जाता है। सनातन धर्म में भी परिक्रमा मौजूद है और हज जैसे वेशभूषा और नियम है। स्पष्ट है कि यह एक ही स्रोत से निकली हुई शिक्षा है। इब्राहिमिक धर्म और सनातन धर्म अपनी परंपरा अनुसार बुद्ध से पुराने हैं। संभवत बुद्ध धर्म ने आज से 2600 साल पहले यह शिक्षा इन्हीं में से किसी से ली हो। वैसे भी यह एक कर्मकांड सा लगता है जबकि बोद्ध लोगों का मानना है कि बुद्ध धार्मिक कर्मकांडो में विश्वास ही नहीं रखते थे। वालेकुम भी पाली या वणणकम शब्द से नहीं आया है. क्योंकि सलाम वालेकुम कोई वाक्य ही नहीं है और न ही वालेकुम वर्ब है। असल अरबी का वाक्य है अस्सलामुअलैयकुम। इसमें क्या नाउन है, क्या वर्ब है, क्या प्रोनाउन है पहले यह जानने की ज़रूरत है. जोड़ना ही है तो वणणकम को वालेकुम से नहीं बल्कि सलाम शब्द से जोड़ा जाता हालांकि वो भी ग़लत होता। क्योंकि इस शब्द या पूरे वाक्य का स्वागत आदि से कोई लेना देना ही नहीं।
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क्या हज की परिक्रमा, अरबी सलाम, बौद्ध धर्म से प्रेरित है? क्या कुरान में इतिहास नहीं है? क्या कुरान और पुराण समान नहीं हैं? बौध, हिन्दू और यूनानी दर्शन कौन किस्से प्रेरित?
अरबी के लगभग सभी शब्द रुट वर्ड्स से बनते हैं जो अक्सर तीन अक्षर के होते हैं। उन्ही में से एक ह.म.द. रुट वर्ड है। ये रुट वर्ड सिस्टम सेमेटिक भाषाओं का आधार है। पाली या कोई भी भारतीय भाषा में यह सिस्टम नहीं है।
इस्लाम में इब्राहिम के काल से ही परिक्रमा की जाती रही है जो ऑन रिकॉर्ड है। यहूदी और ईसाइयों में भी कुछ प्रकार की परिक्रमा मिलती हैं। इब्राहिम का समय लगभग आज से 4 हज़ार साल पहले का माना जाता है। सनातन धर्म में भी परिक्रमा मौजूद है और वही वेशभूषा और कई नियम समान है। स्पष्ट है कि एक ही स्रोत से निकली हुई शिक्षा है। इब्राहिमिक धर्म परंपरा अनुसार बुद्ध से पुराने हैं। बुद्ध धर्म ने आज से 2600 साल पहले यह शिक्षा इन्हीं में से किसी ने ली है। वैसे भी यह एक कर्मकांड सा लगता है जबकि ऐसा दावा किया जाता है कि बुद्ध धार्मिक कर्मकांडो में विश्वास ही नहीं रखते थे.
सलाम वालेकुम कोई वाक्य ही नहीं है। असल अरबी का वाक्य है अस्सलामुअलैयकुम। इसमें क्या नाउन है, क्या वर्ब है, क्या प्रोनाउन है, वो पता होना चाहिए. पता होता तो वणणकम को वालेकुम से नहीं बल्कि सिर्फ सलाम शब्द से जोड़ते। हालांकि वो भी ग़लत होता। क्योंकि इस शब्द य पूरे वाक्य का स्वागत आदि से कोई लेना देना ही नहीं।
एक प्रकार का रिकॉर्ड क़ुरान में है, वो इतिहास का वर्णन है, कोई नहीं माने तो न सही। मगर क़ुरान में बताई गई वो ऐतिहासिक घटनाएं जो 6-7 वी सदी में हिजाज में और निकटवर्ती इलाकों में हो रही थी, वो सीधा सीधा इतिहास है जिसे दूसरे ऐतिहासिक ग्रंथ भी बताते हैं। इसलिए क़ुरान ऐतिहासिक ग्रन्थ की एक तरह स्थान तो रखता है। आखिर लेखक भी इतिहास को इसी प्रकार रेकॉर्ड करते आये हैं। पुरातात्विक प्रमाण तो क़ुरान के बताए अनेकों स्थानों के हमेशा से ही मौजूद हैं। जिनके इतिहास और समय की धूल में खो गए थे, उनमें से कुछ के मिल चुके हैं जैसे पेट्रा आदि। बाकी कई स्थानों की पुष्टि तो यहूदी और ईसाई इतिहास से ही हो जाती रही है। सो जो अभी भी नहीं मिले है संभवतः भविष्य में मिल ही जायंगे क्योंकि यही होता आ रहा है।
अगर क़ुरान और पुराण एक ही श्रेणी की किताब है तो फिर त्रिपिटक, धम्मपद आदि भी उसी श्रेणी में रखी जानी चाहिए। बाकी धम्मपद, त्रिपितक में परलोक, अन्य लोकों का उल्लेख है, जिन्हें गैर अम्बेडकरवादी बौद्ध धर्म में यानी भारत से इतर पूरी बौद्ध दुनिया या समाज में माना जाता है, भले ही भारत के नव बोद्ध न मानें। इन लोकों या स्थानों को आप पुरातत्व से नहीं खोज पाएंगे।
युनान और बुद्ध दर्शन तो समानांतर ही चला है जिस भारतीय दर्शन को यूनान से प्राचीन कहा जा रहा है, वो बुद्ध, जैन, चार्वाक आदि का नहीं बल्कि वैदिक दर्शन था और वैदिक दर्शन को आप बुद्ध से पुराना मानते ही नहीं हो जबकि वो अति प्राचीन है। अगर पूरा वैदिक दर्शन बौद्ध और यूनान की नकल है तो फिर बुद्ध से पहले पाया जाने वाला वैदिक दर्शन, बौद्ध कैसे हुआ, साथ ही उसमें आत्मा, परमात्मा, परलोक आदि विचार भी कंही न कंही मिलते ही है जो बुद्ध की शिक्षा नहीं मानी जाती। इसका अर्थ हुआ कि प्राचीन वैदिक दर्शन वैदिक या सनातनी दर्शन ही था, भले ही बुद्ध के बाद वह बौद्ध दर्शन से प्रेरित होकर और गहन होता गया हो।
अरबी के लगभग सभी शब्द रुट वर्ड्स से बनते हैं जो अक्सर तीन अक्षर के होते हैं। उन्ही में से एक ह.म.द. रुट वर्ड है। ये रुट वर्ड सिस्टम सेमेटिक भाषाओं का आधार है। पाली या कोई भी भारतीय भाषा में यह सिस्टम नहीं है।
इस्लाम में इब्राहिम के काल से ही परिक्रमा की जाती रही है जो ऑन रिकॉर्ड है। यहूदी और ईसाइयों में भी कुछ प्रकार की परिक्रमा मिलती हैं। इब्राहिम का समय लगभग आज से 4 हज़ार साल पहले का माना जाता है। सनातन धर्म में भी परिक्रमा मौजूद है और वही वेशभूषा और कई नियम समान है। स्पष्ट है कि एक ही स्रोत से निकली हुई शिक्षा है। इब्राहिमिक धर्म परंपरा अनुसार बुद्ध से पुराने हैं। बुद्ध धर्म ने आज से 2600 साल पहले यह शिक्षा इन्हीं में से किसी ने ली है। वैसे भी यह एक कर्मकांड सा लगता है जबकि ऐसा दावा किया जाता है कि बुद्ध धार्मिक कर्मकांडो में विश्वास ही नहीं रखते थे.
सलाम वालेकुम कोई वाक्य ही नहीं है। असल अरबी का वाक्य है अस्सलामुअलैयकुम। इसमें क्या नाउन है, क्या वर्ब है, क्या प्रोनाउन है, वो पता होना चाहिए. पता होता तो वणणकम को वालेकुम से नहीं बल्कि सिर्फ सलाम शब्द से जोड़ते। हालांकि वो भी ग़लत होता। क्योंकि इस शब्द य पूरे वाक्य का स्वागत आदि से कोई लेना देना ही नहीं।
एक प्रकार का रिकॉर्ड क़ुरान में है, वो इतिहास का वर्णन है, कोई नहीं माने तो न सही। मगर क़ुरान में बताई गई वो ऐतिहासिक घटनाएं जो 6-7 वी सदी में हिजाज में और निकटवर्ती इलाकों में हो रही थी, वो सीधा सीधा इतिहास है जिसे दूसरे ऐतिहासिक ग्रंथ भी बताते हैं। इसलिए क़ुरान ऐतिहासिक ग्रन्थ की एक तरह स्थान तो रखता है। आखिर लेखक भी इतिहास को इसी प्रकार रेकॉर्ड करते आये हैं। पुरातात्विक प्रमाण तो क़ुरान के बताए अनेकों स्थानों के हमेशा से ही मौजूद हैं। जिनके इतिहास और समय की धूल में खो गए थे, उनमें से कुछ के मिल चुके हैं जैसे पेट्रा आदि। बाकी कई स्थानों की पुष्टि तो यहूदी और ईसाई इतिहास से ही हो जाती रही है। सो जो अभी भी नहीं मिले है संभवतः भविष्य में मिल ही जायंगे क्योंकि यही होता आ रहा है।
अगर क़ुरान और पुराण एक ही श्रेणी की किताब है तो फिर त्रिपिटक, धम्मपद आदि भी उसी श्रेणी में रखी जानी चाहिए। बाकी धम्मपद, त्रिपितक में परलोक, अन्य लोकों का उल्लेख है, जिन्हें गैर अम्बेडकरवादी बौद्ध धर्म में यानी भारत से इतर पूरी बौद्ध दुनिया या समाज में माना जाता है, भले ही भारत के नव बोद्ध न मानें। इन लोकों या स्थानों को आप पुरातत्व से नहीं खोज पाएंगे।
युनान और बुद्ध दर्शन तो समानांतर ही चला है जिस भारतीय दर्शन को यूनान से प्राचीन कहा जा रहा है, वो बुद्ध, जैन, चार्वाक आदि का नहीं बल्कि वैदिक दर्शन था और वैदिक दर्शन को आप बुद्ध से पुराना मानते ही नहीं हो जबकि वो अति प्राचीन है। अगर पूरा वैदिक दर्शन बौद्ध और यूनान की नकल है तो फिर बुद्ध से पहले पाया जाने वाला वैदिक दर्शन, बौद्ध कैसे हुआ, साथ ही उसमें आत्मा, परमात्मा, परलोक आदि विचार भी कंही न कंही मिलते ही है जो बुद्ध की शिक्षा नहीं मानी जाती। इसका अर्थ हुआ कि प्राचीन वैदिक दर्शन वैदिक या सनातनी दर्शन ही था, भले ही बुद्ध के बाद वह बौद्ध दर्शन से प्रेरित होकर और गहन होता गया हो।
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मुहम्मद साहब की शारीरिक बीमारियों पर उनकी दिव्यता पर सवाल उठाने वाले बौद्ध.
बुद्ध मशरून या सुव्वार का मांस खा कर, पेट के संक्रमण से दुख झेलते हुए प्राण त्याग गए। जबकि दुख का निवारण अष्टांगिक मार्ग से किया जा सकता है। तो फिर ये मार्ग मृत्यु के समय दुख हरण के काम क्यों नहीं आया?? क्या लाभ ऐसे सिद्धान्तों का जो जूठे हैं, और उस काम नही आते जिनका दावा किया जाता है? जब पेट में संक्रमण है या अंतिम समय चल रहा है तो मनुष्य को दर्द या दुख महसूस नहीं होगा तो और क्या होगा? या बुद्ध का शरीर कोई दिव्य शरीर या फौलाद का था जो बीमारी या मरते हुए भी सुख ही सुख अनुभव हो रहा था? अगर अष्टांगिक केवल मानसिक पीड़ा आदि के लिए है तो फिर विपश्यना किस लिए है, शारीरिक या मानसिक? एक ही प्रकार की संतुष्टि के लिए 2 अलग अलग चीज़ें क्यो? यह तो मतभेद है। बुद्ध ने कहा संसार में दुख है, उसका निवारण उनका मार्ग है। ये नहीं कहा कि मन, मानसिकता या दिमाग में दुख है। संसार में दुख दोनो प्रकार का है, शारीरिक और मानसिक दोनो। अगर आपकी बात मानें कि बुद्ध ने केवल मानसिक दुख का उपाय दिया तो फिर तो संसार मे दुख वाला वाक्य ही निरर्थक, अनुचित और अज्ञानता हो जायेगा। अगर बुद्ध भी ऐसी गलती कर सकते है तो फिर उनकी ज्ञान प्राप्ति निष्फल, निष्काम और असफल सिद्ध हुई। क्या बुद्ध ने शारीरिक पीड़ा की बात ही नहीं करी ? यानि उनके प्रवचन, सिद्धांत आदि केवल मानसिक पीड़ा के लिए थे? तो फिर संसार में दुख है क्यों कहा? शारीरिक पीड़ा भी मानसिक पीड़ा देती है, ये एक सत्य है। बुद्ध ने इस शारीरिक पीड़ा को ही अनदेखा कर दिया, आप यही कहना चाहते हैं न? तो सत्य प्राप्ति के लिए भटकते हुए मिलने वाले विभिन्न लोगों के दुख देख कर बुद्ध ने यह निष्कर्ष बनाया की मन में दुख होता है? मतलब बुद्ध ने उनके शारीरिक दुख छोड़ कर, मन में झांक कर देखा था कि इन्हे शारीरक दुख नहीं आंतिरक दुख है?
पहली बात अल्लाह ईश्वर ने कभी नही कहा कि पैग़म्बर को बीमारी नहीं हो सकती या उन्हें साधारण बीमारी से मृत्यु नहीं आ सकती। कई पैगंबर कत्ल भी किये गए हैं। पैगम्बरों का शरीर आम इंसानों के शरीर जैसा ही होता है, बीमार भी होते हैं और दर्द भी। वैसे भी सामान्य बीमारी या सामान्य मौत या कत्ल आदि सभी इशारे हैं आम इंसान के लिए की पैग़म्बर भी कोई दिव्य शरीर के स्वामी नहीं, केवल रूहानी और आध्यात्मिक तौर पर आम लोगों से अलग हैं।
वैसे ये तथागत से पहले जो 27 बुद्ध हुए हैं, इनका संपर्क किस से था? जो इन सभी को एक ही शिक्षा मिलती थी? ये तो किसी एक ही स्रोत की ओर इशारा है? क्या वो स्रोत ईश्वर ही तो नहीं था? वरना सब बुद्धों को अलग अलग शिक्षाएं, सिद्धान्त, आदि मिलने चाहिए थे, न कि एक। क्या इसका अर्थ ये नहीं है कि उन सभी का या तो स्रोत एक था या सभी ने जुठ बोला?
बुद्ध मशरून या सुव्वार का मांस खा कर, पेट के संक्रमण से दुख झेलते हुए प्राण त्याग गए। जबकि दुख का निवारण अष्टांगिक मार्ग से किया जा सकता है। तो फिर ये मार्ग मृत्यु के समय दुख हरण के काम क्यों नहीं आया?? क्या लाभ ऐसे सिद्धान्तों का जो जूठे हैं, और उस काम नही आते जिनका दावा किया जाता है? जब पेट में संक्रमण है या अंतिम समय चल रहा है तो मनुष्य को दर्द या दुख महसूस नहीं होगा तो और क्या होगा? या बुद्ध का शरीर कोई दिव्य शरीर या फौलाद का था जो बीमारी या मरते हुए भी सुख ही सुख अनुभव हो रहा था? अगर अष्टांगिक केवल मानसिक पीड़ा आदि के लिए है तो फिर विपश्यना किस लिए है, शारीरिक या मानसिक? एक ही प्रकार की संतुष्टि के लिए 2 अलग अलग चीज़ें क्यो? यह तो मतभेद है। बुद्ध ने कहा संसार में दुख है, उसका निवारण उनका मार्ग है। ये नहीं कहा कि मन, मानसिकता या दिमाग में दुख है। संसार में दुख दोनो प्रकार का है, शारीरिक और मानसिक दोनो। अगर आपकी बात मानें कि बुद्ध ने केवल मानसिक दुख का उपाय दिया तो फिर तो संसार मे दुख वाला वाक्य ही निरर्थक, अनुचित और अज्ञानता हो जायेगा। अगर बुद्ध भी ऐसी गलती कर सकते है तो फिर उनकी ज्ञान प्राप्ति निष्फल, निष्काम और असफल सिद्ध हुई। क्या बुद्ध ने शारीरिक पीड़ा की बात ही नहीं करी ? यानि उनके प्रवचन, सिद्धांत आदि केवल मानसिक पीड़ा के लिए थे? तो फिर संसार में दुख है क्यों कहा? शारीरिक पीड़ा भी मानसिक पीड़ा देती है, ये एक सत्य है। बुद्ध ने इस शारीरिक पीड़ा को ही अनदेखा कर दिया, आप यही कहना चाहते हैं न? तो सत्य प्राप्ति के लिए भटकते हुए मिलने वाले विभिन्न लोगों के दुख देख कर बुद्ध ने यह निष्कर्ष बनाया की मन में दुख होता है? मतलब बुद्ध ने उनके शारीरिक दुख छोड़ कर, मन में झांक कर देखा था कि इन्हे शारीरक दुख नहीं आंतिरक दुख है?
पहली बात अल्लाह ईश्वर ने कभी नही कहा कि पैग़म्बर को बीमारी नहीं हो सकती या उन्हें साधारण बीमारी से मृत्यु नहीं आ सकती। कई पैगंबर कत्ल भी किये गए हैं। पैगम्बरों का शरीर आम इंसानों के शरीर जैसा ही होता है, बीमार भी होते हैं और दर्द भी। वैसे भी सामान्य बीमारी या सामान्य मौत या कत्ल आदि सभी इशारे हैं आम इंसान के लिए की पैग़म्बर भी कोई दिव्य शरीर के स्वामी नहीं, केवल रूहानी और आध्यात्मिक तौर पर आम लोगों से अलग हैं।
वैसे ये तथागत से पहले जो 27 बुद्ध हुए हैं, इनका संपर्क किस से था? जो इन सभी को एक ही शिक्षा मिलती थी? ये तो किसी एक ही स्रोत की ओर इशारा है? क्या वो स्रोत ईश्वर ही तो नहीं था? वरना सब बुद्धों को अलग अलग शिक्षाएं, सिद्धान्त, आदि मिलने चाहिए थे, न कि एक। क्या इसका अर्थ ये नहीं है कि उन सभी का या तो स्रोत एक था या सभी ने जुठ बोला?
इस्लाम में अंग दान मना नहीं है
इस्लाम में अंग दान मना नहीं है। साथी ही सुवर खाना हराम है, न कि उसका कोई अन्य प्रयोग। ऐसे तो फिर बौद्धों को भी सुवर अंग से परहेज़ करना चाहिए क्योंकि बुद्ध ने मांसाहार को मना किया था। बाकी बौद्ध धर्म कहता है दुःख है और दुःख का निवारण इच्छाओं से मुक्ति है तो फिर दुःख को दूर करने के लिये अंग बदलवाने की आवश्यकता क्यो? सुख पाने की, बीमारी दूर करने की, या स्वस्थ होने की इच्छा क्यो? बौद्ध क्यों दुख दूर करने के लिए बुद्ध से इतर माध्यम ढूंढते हैं। सुवर मांस मना है तो जाहिर है इसका कोई कारण होगा, कोई ऐसी चीज़ होंगी जिसे इस्लाम इंसानों के लिए ठीक नहीं मानता। अगर वही चीज़ सुवर के अंग लगाने से भी पैदा होती होगी तो सुवर अंग भी नहीं लगवाया जायगा, किसी और का लगवाया जाएगा। वैसे सुवर अंग लागने वाले ऑपेरशन कितने सफल हुए, और मरीज कितने दिन ज़िंदा रह पाए इस पर आप थोड़ा और पढ़े। और साथी ही सुवर हराम होने का कारण। बुद्ध मांसाहार मना करते है मगर अनुयायी मांस के अंग लगवाते है, कमाल का लॉजिक है. मांस तो इंसानी दिल, गुर्दे आदि भी हैं? आप खाते हो क्या उन्हें? नहीं न। क्योंकि इसका भी एक कारण है। मांस तो सांप, लक्कड़भग्गा आदि जानवर भी, उन्हें भी दुनिया मे सभी खाते हैं क्या? ज़ाहिर है एक लाइन ड्रा होती है।
अन्य धर्मों की रेलियाँ और बौध धर्म की रेलियाँ
अन्य धर्मों की धार्मिक यात्राओं के कारण उनके अनुयायियों की जहालत पर सवाल उठाने से पहले बौद्ध लोगों को बुद्ध जयंती पर की निकाली जाने वाली बुद्ध धम्म यात्रा पर भी सवाल करने चाहिए. मैं खुद मुहर्रम पर इन सब करतबो, झुलस के खिलाफ हूँ। बल्कि हर झुलस के खिलाफ हूँ चाहे धर्मिक हो, राजनैतिक या कोई और, जो रास्ता रोके या दूसरों को परेशानी दे। बुध्द जयंती में भी बहुत सी बातें गलत, बेकार, फ़िज़ूल खर्ची, दिखावा, अर्थहीन, दिखावटी होता है। वंहा मूर्ति पूजा (बुद्ध की उपासना नहीं, दोनो में अंतर है), फूल अपर्ण, झांकियां, नफरत से भरी बयानबाज़ी और न जाने क्या क्या होता है। और भीड़, रैली के कारण सडक पर लोगों को होने वाली परेशानी सो अलग हैं। इसलिए मुहर्रम पर ये सब गलत है (जो है ही) है तो बुद्ध और अम्बेडकर यात्राओं में भी गलत है।हर कोई अपने अनुसार दिवस मनाता है। मुहर्रम मनाने के इस तरीके में जहालत, गलतियां हो सकती है, मगर से अवैज्ञनिक नहीं, सांस्कृतिक या परम्परावादी चीज़ें है, वैसे ही जैसे बुद्ध जयंती यात्रा में है। इसको विज्ञान से नही नहीं परखा जा सकता।
अन्य धर्मों की धार्मिक यात्राओं के कारण उनके अनुयायियों की जहालत पर सवाल उठाने से पहले बौद्ध लोगों को बुद्ध जयंती पर की निकाली जाने वाली बुद्ध धम्म यात्रा पर भी सवाल करने चाहिए. मैं खुद मुहर्रम पर इन सब करतबो, झुलस के खिलाफ हूँ। बल्कि हर झुलस के खिलाफ हूँ चाहे धर्मिक हो, राजनैतिक या कोई और, जो रास्ता रोके या दूसरों को परेशानी दे। बुध्द जयंती में भी बहुत सी बातें गलत, बेकार, फ़िज़ूल खर्ची, दिखावा, अर्थहीन, दिखावटी होता है। वंहा मूर्ति पूजा (बुद्ध की उपासना नहीं, दोनो में अंतर है), फूल अपर्ण, झांकियां, नफरत से भरी बयानबाज़ी और न जाने क्या क्या होता है। और भीड़, रैली के कारण सडक पर लोगों को होने वाली परेशानी सो अलग हैं। इसलिए मुहर्रम पर ये सब गलत है (जो है ही) है तो बुद्ध और अम्बेडकर यात्राओं में भी गलत है।हर कोई अपने अनुसार दिवस मनाता है। मुहर्रम मनाने के इस तरीके में जहालत, गलतियां हो सकती है, मगर से अवैज्ञनिक नहीं, सांस्कृतिक या परम्परावादी चीज़ें है, वैसे ही जैसे बुद्ध जयंती यात्रा में है। इसको विज्ञान से नही नहीं परखा जा सकता।
कट्टर बौद्धों द्वारा मुस्लिम महिलाओं की स्तिथि पर गरियाना
आप लोग सारे मुस्लिम समुदाय को कैसे पाक को आधार बना कर गरियाते हैं, क्योकि हमारे खिलाफ आपमें भी नफरत तो उतनी ही अंदर तक भरी है, जो गाहे बगाहे दिखाई देती रहती है। मुस्लिम समुदाय को सुधारना है तो नफरत से नहीं होगा। तमाम मुस्लिम औरतों हर फील्ड में काम कर रही है, आपको नहीं पता तो हम क्या करे। जिन जगह पिछड़ी मानसिकता है उनमें से एक भारतीय उपमहाद्वीप है। अब आप हमारे को सुधारना से पहले अपने आप और अपने लोगों को सुधारे। क्योंकि उनमें भी इस्लाम और मुस्लिम के खिलाफ कितनी नफरत है ये दंगों में पता लग जाती है जब सबसे आगे वही होते हैं। इसके अलावा दिन रात हिन्दू धर्म को कोसने वाले आप लोग, ही हिन्दू के मंदिरों में सबसे ज़्यादा जा जा के मत्था टेकते हो, घंटी बजाते हो। कांवड़ में सबसे ज़्यादा भी आप होते हो। इसलिए पहले अपने अंदर काम करिये, धर्मन्धता कम करिए, साइंस्टिस्ट खड़ा करिए, फिर बात करंगे।
आप लोग सारे मुस्लिम समुदाय को कैसे पाक को आधार बना कर गरियाते हैं, क्योकि हमारे खिलाफ आपमें भी नफरत तो उतनी ही अंदर तक भरी है, जो गाहे बगाहे दिखाई देती रहती है। मुस्लिम समुदाय को सुधारना है तो नफरत से नहीं होगा। तमाम मुस्लिम औरतों हर फील्ड में काम कर रही है, आपको नहीं पता तो हम क्या करे। जिन जगह पिछड़ी मानसिकता है उनमें से एक भारतीय उपमहाद्वीप है। अब आप हमारे को सुधारना से पहले अपने आप और अपने लोगों को सुधारे। क्योंकि उनमें भी इस्लाम और मुस्लिम के खिलाफ कितनी नफरत है ये दंगों में पता लग जाती है जब सबसे आगे वही होते हैं। इसके अलावा दिन रात हिन्दू धर्म को कोसने वाले आप लोग, ही हिन्दू के मंदिरों में सबसे ज़्यादा जा जा के मत्था टेकते हो, घंटी बजाते हो। कांवड़ में सबसे ज़्यादा भी आप होते हो। इसलिए पहले अपने अंदर काम करिये, धर्मन्धता कम करिए, साइंस्टिस्ट खड़ा करिए, फिर बात करंगे।
बौद्ध देश म्यांमार, श्रीलंका आदि में जब मुस्लिमों का कत्ले आम होता आया है, बांग्लादेश से कंही अधिक, तब आपके भंते और बौद्ध गुरु क्यों चुप थे?
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