एकेश्वरवाद
"एकम ब्रह्म द्वितीय नास्ते नेह न नास्ते किञ्चन"
(ईश्वर एक है, दूसरा नहीं है, अंशमात्र भी नहीं है)
[शंकराचार्य ब्रहमसूत्र; कठोपनिषद 2:1:11, बृहदारण्यक उपनिषद 4:3:23 व 4:4:19]
"एकमेवाद्वितीयम्।"
(ईश्वर एक ही है, दूसरा कोई नहीं है, वह बिना साझेदार के है)
[छान्दोग्योपनिषद:6:2:1]
"य एक इत्तमुष्टुहि"
(वह एक ही है उसी की प्रशंसा, स्तूति, वंदना करो)
{He is One only. Praise only Him.}
[ऋग्वेद 6:45:16]
"तमिदं निगतं सह सः एष एक एकवृदेक एव"
(केवल वह एक ही स्वयं से, बिना जन्म लिये, अकेला विधमान है।)
{Only He is One, who by Himself, without being born to any one, alone is present.}
[अथर्वेद 13:4:12]
"य एको अस्ति"
(वह केवल एक है)
[ऋग्वेद 8:1:27]
"य एक इद्विदयते"
(वह एक ही दाता, विधाता है)
[ऋग्वेद 1:84:7]
"एको हि रुद्रो, न द्वितीयाय तस्थुर्य"
(ईश्वर, रुद्र केवल एक ही है। दूसरे के लिए कोई आधार नहीं।)
[श्वेताशवतरोपनिषद:3:2]
"न द्वितीयो न तृतीय श चतुर्थो ना प्युच्चते न पंचमो न षष्ठ: सप्तमो नाप्यूच्याते नाष्टमो न नवमसे दशमो नाप्यूच्याते”
(ईश्वर न कोई दूसरा है न तीसरा न चौथा, न पांचवा है, न छटा, न ही सातवाँ, न आठवां, न नौवां और न ही दसवां है।)
[अथर्वेद 13:4:16 व 13:5:3]
न द्वितीयो न तृतीयश्चतुर्थो नाप्युच्यते। य एतं देवमेकवृतं वेद।
दूसरा, तीसरा या चौथा ईश्वर अस्तित्व में ही नहीं है (वह एकमात्र है)! जो लोग उस एक ईश्वर को खोजते हैं, वे ही ईश्वर की कृपा को प्राप्त कर सकते हैं।
(अथर्ववेद १३: ५ : २)
एकं सद्विप्रा बहुधा बहुधा वदन्ति।
उस एक शास्वत ईश्वर को विद्वानगण विभिन्न नामों से बुलाते हैं।
एक परमेश्वर को बहुत से नामों से पुकारा जाता है।
ज्ञानी लोग एक ईश्वर को अलग-अलग नामो से पुकारते है.
[ऋग्वेद 1:164:46]
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"विश्वस्य भुवनस्य राजा"
(वह सारे संसार का राजा है)
[ऋग्वेद 6:36:4]
"महो दिव: पृथिव्याशच सम्राट"
(वह विशाल आकाश और पृथ्वी का सर्वोच्चय शासक है)
[ऋग्वेद 1:100:1]
"भूतस्य जात: पती: एक आसीत"
(उत्पन्न किए गए संसार का वह अकेला पालक है)
[ऋग्वेद 10:121:1]
"धावा भूमि जनयन देव एक:"
(आकाश व भूमि का रचयिता, जनक केवल एक है।)
[ऋग्वेद 10:81:3 एंव यजुर्वेद 17:19]
"एतस्य वा अक्षरस्य प्रशासने गार्गी सूर्याचन्द्रमसौ"
(ये संसार, सूर्य और चंद्र उसी अविनाशी परमेश्वर के प्रशासन में रहता है।)
[बृहदारण्यकोपनिषद:3:8:9]
"ओम आत्मा वा इदमेक एवाग्र आसित।"
(सृष्टि से पहले भी एक ही परमेश्वर था। उसके अतिरिक्त अन्य कुछ नहीं था।)
[ऐतरेयोपनिषद:1:1]
“य एकश्चर्षणीनाम वसुनाम इरज्यति।“
(वह एक ही सभी मनुष्यों का स्वामी है।)
[ऋग्वेद 1:7:9]
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अजन्मा, अमर
"अजामेकाम" / "आजामएकाम"
(वह एक अजन्मा है।)
[श्वेताशवतरोपनिषद:4:5]
"न चास्य कश्चिज्जनिता न चाधिप:"
(उसे किसी ने जन्म नहीं दिया है और न ही उसका कोई स्वामी है)
[श्वेताशवतरोपनिषद:6:9]
“न तवावाम अन्यो दिव्यो न पार्थिवो न जातो न जनिष्यते”
(तेरे जैसा दूसरा ज्ञानवान, इस पृथिवी पर न है, न पैदा हुआ और न पैदा होगा।)
[ऋग्वेद: 7:32:23]
"अन्ति संतम न जहति अन्ति संतम पश्यति
देवस्य पशन काव्यम न ममार न जिर्यति"
(अपने समीप मौजूद ईश्वर को मनुष्य कभी नहीं छोड़ता जबकि वह उसे देखता नहीं है। ऐस ईश्वर की वाणी को देखों, वह न तो कभी मरता है और न ही कभी वृद्ध होता है।)
{He neither dies nor grows old.}
[अथर्वेद 10:8:32]
"अहमिन्द्रों न पराजिगय इद्दनम न मत्थर्व तस्थे कदाचन"
(मैं सर्वशक्तिमान इंद्र हूँ, मेरी हार कभी नहीं होती। और न कभी मुझे मृत्यु आती है।)
{मुझे कभी मृत्यु नहीं हरा पाती है।}
[ऋग्वेद 10:48:5]
"ओमित्येतदक्षरमुदगीथमुपासीत"
(उस अविनाशी की उपासना करो।)
[छान्दोग्यउपनिषद 1:1]
"तदैव शुक्रम तद ब्रह्म तदेवामृतमुच्यते"
(वही जगत का चेतन्य कारण है और उस ब्रह्म को ही अमर कहा जाता है)
[कठोपनिषद: 6:1/ 2:3:1]
"भूयानिन्द्रों नमुराद भयानिंद्रासी मृत्युभय:"
(वह अमरता से भी अधिक ऐश्वर्यवान हैं और मृत्यु से भी अधिक शक्तिशाली है)
{वह ईश्वर इससे श्रेष्ठ है कि उसको मौत आए बल्कि अमरत्व की कल्पना से भी वे तो महानतर है।}
[अथर्वेद: 13: 4: 46]
“अथ परा यया तद अक्षरम अधिगम्यते”
(यह वह विद्या है जिससे वह अविनाशी जाना जाता है।)
[मुंडकोपनिषद: 1:1:5]
"यमयत्येष त आत्माअन्तर्याम्यमृत:।"
(वह तुम्हारा परमात्मा अन्तर्यामी और अमर है)
[बृहदारण्यकोपनिषद:3:7:3]
“अजो न क्षाम”
(वह जन्म न लेने वाला है।)
[ऋग्वेद 1:67:3]
“शम नो अज एकपाददेवो अस्तु”
(वह जन्म न लेने वाला हमें शांति दे)
[ऋग्वेद 7:35:13]
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उपासनीय
"मा चिदन्यद्वि शंसत्"
(ऋग्वेद 8:1:1)
उस के सिवा किसी अन्य की उपासना न करो ।
Do not deify anyone but him.
"भुवनस्य यम्पतिरेएकम एव नमस्यो विक्ष्ववीड्यः" /
"भुवनस्य य: पति: एक एव नमस्यो विक्ष्ववीड्यः"
(वही एक सारे संसार का पालक है। वही सभी के द्वारा स्तुति और नमस्कार के किए जाने के योग्य है।)
{Only One God is worthy of worship and reverence by all creation}
[अथर्वेद 2:2:1]
"तस्य ते भक्तिवांसः स्याम"
(हम केवल तेरे ही भक्त हों!)
(अथर्वेद 6:79:3)
O God, let us be only Your devotees.
"य एक इत्तमुष्टुहि"
(जो एक है, तू उसी की स्तूति कर)
{He is One only. Praise only Him.}
[ऋग्वेद 6:45:16]
जो जन परमेश्वर को छोड़ कर किसी और कि उपासना करता है वह विद्वानों की दृष्टि में पशु है।
(शतपथ ब्राह्मण: 14:4:2:22)
पूजा का अर्थ उचित व्यवहार करने के लिए आता है। मां बाप के साथ अच्छा व्यवहार करने को पूजा कहा गया है।
(महाभारत: अनशासन पर्व : 145 अध्याय)
स्त्रियों की आभुषण, वस्त्रों और भोजन आदि से पूजा अर्थात सत्कार करने को कहा गया है।
(मनुस्मृति: 3: 58-59)
यो देवेष्वधि देव एक आसीत्कस्मै देवाय हविषा विधेम"
जो समस्त देवों का एकमात्र देव है, उस ईश्वर की हम सदा उपासना किया करें।
[ऋग्वेद10:121:8]???
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निराकार
"न तस्य प्रतिमा अस्ति यस्य नाम महधशः"
(उसकी कोई प्रतिमा-मूर्ति नहीं है, उसका कोई आकार नहीं, उसके नाम का स्मरण ही सब से महान यश है।)
{He has no figure, the remembrance of whose Name is the greatest virtue.}
[यजुर्वेद 32:3, श्वेताशवतरोपनिषद:4:19]
"स पर्य्यगाच्छूक्रमकायम्"
(वह सर्वव्यापक व अकायम है अर्थात अकाय, काया रहित, शरीर रहित)
{He is bodiless}
[यजुर्वेद 40:8]
"न चक्षुषा गृह्यते नापि वाचा… ज्ञानप्रसादेन पश्यते"
(वह न तो आखों से ग्रहण किया जा सकता है और न वाणी से बल्कि उसे ज्ञान से देखा जा सकता है।)
[मुण्डकोपनिषद:3:1:8]
"न चक्षुषा पश्यति कशचनैनम।"
(उसे कोई भी आंखों से नहीं देख पाता है)
[श्वेताशवतरोपनिषद:4:20]
"य चचक्षुषा न पश्यति येन चक्षुषी पश्यति, तदैव ब्रह्म तवं विद्धि वेदम यदिदमुपास्ते।"
(जो इन आँखों से नहीं दिखता पर जिसके दी शक्ति के कारण ये आँखें देख पाती है। तू उसे ही ईश्वर जान। जो आंखों से दिखे वो ईश्वर नही है।)
[केनोपनिषद:1:6]
"यतत अद्रेशयम अग्राहयम अगोत्राम अवर्णमI अचक्षु: श्रोत्रं तद अपाणी पादम।"
(वह तो अदृश्य है, ग्रहण न होने वाला। अजन्मा, रंग-रूप रहित। बिना आंख, कान, हाथ, पांव के।)
[मुण्डकोपनिषद:1:1:6]
"नैन मुधर्व, न तिर्यञ्चन न मध्य परिजगरभत"
उसको इधर से, उधर से अथवा मध्य से, कंही से भी ग्रहण नहीं किया जा सकता। {उसे पूर्ण रूप से कोई नही जान सकता।}
[युजुर्वेद : 32:2]
"स पर्य्यगाच्छूक्रमकायमव्रणम्सनाविर"
(वह सर्वव्यापी है, देहरहित है, स्नायुरहित है और अव्रण है अर्थात छिद्र रहित जिसमें छेद न हो सके।)
{वह अव्रण है अर्थात छिद्र रहित है। वह अत्यंत सूक्षम है}
[यजुर्वेद 40:8]
वेनस्त पश्यम निहितम गुहायाम
विद्वान पुरुष ईश्वर को अपने हृदय में देखते है।
विद्वान ज्ञान दृष्टि से बुध्दि व गुप्त कारण में स्तिथ ईश्वर को देखता है।
(यजुर्वेद:32:8)
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मूर्तराहित
"अन्धन्तमः प्र विशन्ति येअसम्भूतिमुपासते ।
ततो भूयअइव ते तमो यअउ सम्भूत्याम् रताः।।"
जो असम्भूति अर्थात प्राकृति रूप जड़ पदार्थ (अग्नि, मिट्टी,वायु आदि) की उपासना करते हैं, वे अज्ञान अंधकार में प्रविष्ट होते हैं और जो 'सम्भूति' अर्थात इन प्रकृति पदार्थो के परिणामस्वरूप सृष्टि (पेड़ पौधे मूर्तियां आदि) में रमण करते हैं, उन्हें पूजते है वे उससे भी अधिक अंधकार में पड़ते हैं।
(वे अंधकार में गिरते है जो असम्भूति अर्थात प्राकृतिक पदार्थों (जैसे वायु, पानी, अग्नि, मिट्टी आदि) की उपासना करते है। और वे उससे भी अधिक अंधकार में गिरते है जो सम्भूति अर्थात प्रकृति से उत्पन्न वस्तुओं (जैसे पेड़, पौधे, मूर्ति आदि) की उसकी उपासना करते है।)
{They enter into deep blinding darkness who worship 'Asambhuti' (i.e. Nature in its original form e.g. fire, earth, air, water etc) and they are sunk in deeper darkness who indulge in 'Sambhuti' (i.e. things created out of 'Asambhuti' e.g. trees, plants, idols etc}
[यजुर्वेद 40:9]
"न काष्टे विधते देवो न परषाणे न मृण्मये"
भावे हि विधते देवस्तस्माद्भावो हि कारणम्"
(वह देव न तो लकड़ी में, न पत्थर में और न मिट्टी (से बनी मूर्ति) में है, वह तो भाव में विधमान है जहां भाव करें वहाँ ही परमेश्वर सिद्ध होता है।)
[गरूड़ पुराण धर्म काँ० प्रेत खण्ड 38:18]
"न देवा मृच्छिला मयाः"
(मिट्टी पत्थर आदि की मूर्तियां देव नहीं होती हैं।)
[श्रीमद भगवत महापुराण 10:84:11]
"सत्यश्चित्र श्रवस्तमः"
(वह सत्य है, अद्भुत है, सब प्राणों में बल व ज्ञानयुक्त है, वह प्राणों सहित देह में आता है; वह ह्रदयों में प्रकाशमान होता है)
{सच्ची मूर्ति सुनती है।}
(ऋग्वेद 1:1:6)
भौम इज्यधी: ... स एव गोखर:
जो धरती या जन्मस्थल को पुजनीय समझते है वो गाय और गधे से श्रेष्ठतर नहीं है।
[भागवतपुराण: 10:84:13]
प्राप्ते कलावहह दुष्टतरे च काले न त्वां भजन्ति मनुजा ननु वञ्चितास्ते।
धूर्तैः पुराणचतुरैहरिशंकराणां सेवापराश्च विहितास्तव निर्मितानाम्॥
[देवीभागवत ५।१९।१२]
अर्थ – इस घोर कलयुग में पुराणों के बनानेवाले, धूर्त, चतुर लोगों ने शिव, ब्रह्मा, विष्णु आदि की पूजा अपने पेट भरने के लिए चलाई है।
मृच्छिला धातुदावंदी मुरताविश्वर बुध्दय:
किलशयन्ति तपसा मूढा: पराम शांति न यान्ति।।
मूर्ख लोग मिट्टी पत्थर, धातु या लकड़ी की मूर्तियों को ईश्वर समझते है। इन लोगो को कभी शांति प्राप्त नही हो सकती।
(महाभारत/महानिर्वाणतंत्र)???
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सर्व्यापक
"ईशा वास्यमिद सर्वम यत्कि अच जगतयामम जगत"
[यजुर्वेद 40:1]
जगत में जो कुछ है वह ईश्वर की कृपा से है।
(डॉ रेखा व्यास भाष्य)
जगत में जो कुछ है वह ईश्वर द्वारा आवृत-आच्छदित, अधिकार में है।
(श्रीराम शर्मा आचार्य भाष्य)
वह सब और से व्याप्त, विधमान है।
(स्वामी दयानंद भाष्य)
{यह सारा संसार ईश्वर से घिरा हुआ है, उसके पूरे अधिकार में है। वह उस पर छाया हुआ है। वे सर्वोपरि है, सर्वदृष्टा है, सर्वज्ञ है और सर्वान्तर्यामी है अर्थात वह कण कण के भीतर की सूचना रखने वाला है, पूरा संसार ओतप्रोत है}
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पुनर्जन्म
“पुनः पुनः जायमाना पुराणी समान वर्णमाभि शुम्भमाना/ वर्णम भि
शवघ्नीव कृतनुविरज आमिमाना/आमिनाना”
बार बार उत्पन्न होने का वर्णन प्राचीन काल जैसा है, पापियों के समान इस प्रकार मानने वालों को विजित करो
[ऋग्वेद 1:92:10]
{ये मंत्र उषा के बारे में है। ऊपर लिखी व्याख्या से सबकी अलग व्याख्या है। गिरिफिथ कि भी अलग है।}
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स्वर्ग, नर्क
“यथा नात: पुनरेक शचनोदयत”
(दुष्कर्मियों को दुखदायी नरक में डालों जंहा से कभी न लौटें)
[ऋग्वेद 7:104:3]
“स्वर्गलोके मधुमत पिन्वमाना”
(दूध, दही, पानी, मिठास वाली सरोवर तुझे स्वर्ग में प्राप्त हो)
[अथर्वेद 4:34:6]
कंहा है धन, पत्नी, संताने, संबंधी, दोस्त, तू सिर्फ अपने कर्मो का फल भुगतेगा मूर्ख।
[गरुड़ पुरणब: प्रेतकल्प खंड/2: 2:40]
पितृणां लोकमपि गच्छन्तु ये मृता: ||
अथर्व वेद 12/2/45
(जो लोग मर चुके हैं वो पितर लोक को जाएं )
मनुष्य के लिए दो ही स्थान है। इहलोक और परलोक। तीसरे बीच वाले का नाम है संध्या। वह निद्रा का स्थान है। इस मध्यवर्ति स्थान से पुरूष दोनों लोकों का दर्शन करता है।
[बृ०उo:4:3:9]
{शतपथ ब्राह्मण में इसे पितरलोक कहा गया है)
तृतीया ह प्रद्यौरिित यस्यां पितर आसते.
अथर्व वेद 18/2/48
(पितर धरती और स्वर्ग नर्क से परे उस तीसरे स्थान ( प्रद्यौ ) रहते है।
[अंतिम दिन तक आत्माएं बरजख (क़ुरान इसे परदा कहता है) में है. शायद ''प्रद्यौ'' शब्द ही ''परदा'' है.]
''यद् वो अग्निर जहादे कमंगं पितृलोकं गमयज्जातवेद: .|
तद्व एतत्पुनराप्ययामि सांगात्स्वर्गे पितरो मादय ध्वम् ||
अथर्ववेद 38/3/64.
(हे पितर! पितृलोक को जाते समय जातवेदा अग्नि ने आपके जिस अंग को जलाया था उसे फिर से पुष्ट करता हूँ. ताकि अपने सभी अंगों के साथ आप स्वर्गलोक में आनन्द लें.)
कर्मफल
संसार में किया हुआ अधर्म तुरंत फल नहीं देता बल्कि समय आने पर देता है और पापी का मूलच्छेदन कर के ही छोड़ता है।
(मनुस्मृति:4:172)
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त्रिमूति, परब्रह्म, भगवान
"त्वमग्न इन्द्रो.. त्वं विष्णु.. त्वं ब्रह्मा..। त्वमग्ने रुद्रो..।
तवं वृत्रहा वसुपते सरस्वती। गणानान्त्वा त्वा गणपतिं.."
हे ईश्वर, तुम इंद्र हो.. तुम विष्णु हो.. तुम ब्रह्मा हो। तुम ही शिव हो और तुम ही सरस्वती हो। तुम गणों के गणपति हो।
[ऋग्वेद 2: 1: 3,6,11; 2:23:1]
"इंद्र मित्रां वरुण मग्नि माहुरथो दिव्य: स सुपर्णो गुरुत्मान
एकम सदविप्रा बहुध वदन्ति अग्नि यम मातरिशवानमाहू:"
(एक ईश्वर को भक्त के अनेकों गुणवाचक नाम से पुकारते है। इंद्र (हितकारी), मित्र, वरुण (प्रकाशमान), अग्नि, सूर्य, यम, मातरिश्वा नामों से, वही आकाश में।गुरुतमान है।)
[ऋग्वेद 1:164:46, 8:1:1]
"त्वमग्ने इन्द्रो वृषभ: सतामसि तवं विष्णु रुरुगायो नमस्य।
तवं ब्रह्मा.. त्वमग्ने रुद्रो.. तवं वृत्रहा वसुपते सरस्वती।।"
(हे ईश्वर, तुम कामना पूरी करने वाले इंद्र हो। तुम शक्तिशाली उपासनीय विष्णु हो। तुम ब्रह्मा हो। तुम ही रुद्र -शिव हो और तुम ही सरस्वती हो।)
[ऋग्वेद:2:1:3,6,11]
"ग॒णानां॑ त्वा ग॒णप॑तिं हवामहे क॒विं क॑वी॒नामु॑प॒मश्र॑वस्तमम् ।
ज्ये॒ष्ठ॒राजं॒ ब्रह्म॑णां ब्रह्मणस्पत॒ आ न॑: शृ॒ण्वन्नू॒तिभि॑: सीद॒ साद॑नम्॥"
[ऋग्वेद 2.23.1]
(ऋषि- प्रजापतिः देवता-गणपतिः, छन्द- शक्वरी जगती, गायन स्वर- निषादः)
हे मनुष्यों ! जैसे विद्वान लोग सबके अधिपति, सर्वज्ञ, सर्वव्यापी, अन्तर्यामी परमेश्वर की उपासना करते हैं वैसे तुम भी सब गणों के स्वामी परमेश्वर की उपासना किया करो।
"ग॒णानां॑ त्वा ग॒णप॑तिं हवामहे प्रियाणां त्वा प्रियपतिं हवामहे निधिनां त्वा निधिपतिं हवामहे। वसो मम आहमजानि गर्भधमा त्वमजासि गर्भधम्॥ "
[यजुर्वेद 23.19]
{पदार्थ: (ग॒णानां॑) समूहों के बीच, (ग॒णप॑तिं) समूहपालक, (त्वा) आपको, (हवामहे) स्वीकार करते हैं, (प्रियाणां) अतिप्रिय सुन्दरों के बीच, (प्रियपतिं) अतिप्रिय सुन्दरों के पालक, (त्वा) आपकी, (हवामहे) प्रशंसा करते हैं, (निधिनां) विद्या आदि पदार्थों की पुष्टि करने वालों के बीच, (निधिपतिं) विद्या आदि पदार्थों के रक्षक, (त्वा) आपको (हवामहे) स्वीकार करते हैं, (वसो) आपमें सब प्राणी वसते हैं, अतः आप (मम) मेरे हो जाईये। (गर्भधमा) जिस जगत को गर्भ के समान धारण करने वाले (त्वम्) आप (अजासि) जन्म से रहित हैं, उस (गर्भधम्) प्रकृति के धारणकर्त्ता आपको, (अहम्) मैं ,(आ) अच्छे प्रकार से (अजानि) जानूँ।}
(हे परमपिता परमात्मा आप समस्त समूहों के राजा हैं हम आपकी प्रजा हैं इसलिए मैं आपको गणपति अर्थात् गणेश नाम से पुकार रहा हूँ आप प्रिय पदार्थों के पति हैं, आप समस्त धन सम्पत्तियों, खजानों आदि के स्वामी हैं, आप मेरे अर्थात् हम सबको वसाने वाले वसु हैं, आप जन्म आदि दोष से रहित हैं, मैं अपनी अविद्या को दूर फेंक दूँ। हे प्रभु मैं समस्त प्रकृति को गर्भ में रखने वाले आप को जान सकूँ। ऐसी आपसे विनम्र प्रार्थना है।)
परब्रह्मन निराकर है। सदाशिव उसका साकार स्वरूप है। एक शक्ति उसके शरीर से निकली जिसका नाम पड़ा अम्बिका, प्रकृति, दुर्गा या त्रिदेव जननी जिसने ब्रह्मा विष्णु शिव को जन्म दिया। सदाशिव को ही शिव, शम्भु और महेश्वर कहा गया।
[श्रीशिवपुराण:अध्याय 6:रुद्र संहिता:पृष्ठ 100:गीता प्रेस:हनुमान प्रसाद पोद्दार]
ब्रह्मा, विष्णुवृषाकश्च त्रयो देवा: संता मता।
नाम भेद: क्रियाभेदैभिद्यन्ते नात्मना स्वयम।।
(ब्रह्म विष्णु और शिव, तीनो देवता सज्जनों द्वारा माने जाते है। ये नाम और कर्म भेद से पृथक जान पड़ते है परंतु स्वरूप की दृष्टि से इनमे कोई भिन्नता नही है।)
[भविष्यपुराण - पंडित आचार्य श्रीराम शर्मा - गायत्री परिवार संस्थापक]
आदित्यश्च्वादिदेवत्वा: तत्राभू: त्रिगुणात्मक।
प्रात: प्रजापति रसो मध्याह्न विष्णुरिष्यते।
रुद्रोपराह्न समो स एवैकस्त्रिधामत।।
(सूर्य-आदित्य आदि ही देव है जो त्रिगुणात्मक हो जाते है। ये प्रातःकाल में ब्रह्मा मध्याह्न में विष्णु, अपराह्न में रुद्र हो जाते है। इस प्रकार वे एक ही तीन स्वरूपात्मक होते है।)
[भविष्यपुराण - पंडित आचार्य श्रीराम शर्मा - गायत्री परिवार संस्थापक]
शुद्रो को वेद सुनना और पढ़ना मना था। इसकिए पुराणों की रचना हुई, विशेषतया मध्यकाल युग में। लोगो की रुचि धर्म में बनी रही इसलिए कथाओं, रूपक का प्रयोग करते हुए सत्य असत्य को रोचक बना कर प्रस्तुत किया गया इनमे। ये मनुष्य रचित है। इनमे उलेखित महादेव, ब्रह्मा, प्रजापति, हिरण्यगर्भ, स्वयम्भू, दिवाकर नाम उसी ईश्वर के है। न्यूह, आदम, हव्यवती आदि का उल्लेख है। ब्रह्म, पुराणों में विष्णु, शंकर, गणेश, देवी, देवी, इंद्र, अग्नि, राम, कृष्ण, हनुमान आदि देवता सभी ईश्वर के ही स्वरूप है।
[भविष्यपुराण भूमिका - पंडित आचार्य श्रीराम शर्मा - गायत्री परिवार संस्थापक]
ऐश्वर्स्य वीर्यर्य यशस: श्रियः। ज्ञानवैराग्ययोश्चैव पष्णां भग इतीरणा।।
(विष्णु पुराण 6.5.47/74) ???
सम्पूर्ण ऐश्वर्य, वीर्य, यश, श्री, ज्ञान और वैराग्य, इन छह का नाम 'भग' है। जिस महापुरुषों में से उपरोक्त छह गुण विद्यमान होते हैं, वे भगवान् कहलाने योग्य हैं।
{अर्थात भगवान एक उपाधि है। मनुष्य भगवान हो सकते है। पर भगवान ईश्वर नहीं हो सकते। इसीलिये भगवान सम्मानीय और आदरणीय है। पर पुजनीय और उपासनीय केवल ईश्वर है और कोई नहीं।}
देव का अर्थ है मनुष्यों को देने वाला।
(निरुक्त 7.15)
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श्रीरामचंद्र
रामजी से पहले ही ईश्वर का नाम राम प्रचलित था तभी रामचंद्र नाम रखा गया।
[विष्णुसहस्त्रनाम में विष्णु जी का नाम जिसका अर्थ है सबसे सुंदर]
[निखिल कुंज, जोधपुर का भी यही मत ]
"राम रामाय नमः राम रामाय सत्यम अस्ति"
(जब लंका विजय के बाद सीता जी रामचंद्र जी से मिली तो झुककर चरण स्पर्श करने लगी तो राम चंद्र जी ने कहा की मुझ राम को नहीं बल्कि इस राम के राम अर्थात उस ईश्वर को नमन करो। राम का राम ही सत्य है।)
[श्रीराम चन्द्र जी का तारक मंत्र]
{राम रहस्य उपनिषद में भी उल्लेखित}??
राम तारक मंत्र आज राम से संबंधित कई मंत्रो को कहते हैं। इनमें से एक बेहद प्रामाणिक रां रामयनमः है जो नालंदा विशाल शब्दकोश (1950s) में भी आया है, संभवत सर्वाधिक लोकप्रिय व प्राचीन होने के कारण। यह किसी ग्रंथ में उल्लेखित नहीं मिल पाया है। इसे वंहा रामजी का तारक मंत्र बताया गया है। परंतु वंहा इसके अर्थ नहीं दिए गए हैं। सरल संस्कृत अनुसार इसके शाब्दिक अर्थ हैं, राम राम को नमन करता है। परंतु आज प्रत्येक हिंदू विद्वान इसके भिन्न अर्थ करता है। उनके अर्थ इतने विचित्र हैं कि अक्सर मंत्र के शब्दों को क्वालीफाई भी नहीं कर पाते हैं।
रामस्य ईश्वर: य: स: रामेश्वर:
(जो राम के ईश्वर है, उन्हें ही रामेश्वर कहते है)
[रामेश्वरम में ऋषियों ने रामेश्वर का अर्थ पूछा तब राम जी ने ये कहा था]
"न मत् विधो दुष्कृत कर्म कारी
मन्ये द्वितीयो अस्ति वसुंधरायाम् "
{I am second to none among the blameworthy wrongdoers on this earth}
(श्री रामचंद्र जी कहते है की पृथ्वी पर कोई दूसरा मनुष्य ऐसा नहीं है जो उनके समान दृष्ट कर्मों को करने वाला हो।)
[रामायण :अरण्यकांड कांड : 3:63:3]
न आत्मनः काम कारो अस्ति पुरुषो अयम् अनीश्वरः |
इतः च इतरतः च एनम् कृत अन्तः परिकर्षति ||
"Man is not able to do what he wills. He is not the Master. A fixed form or name (God) drives him hither and thither.
[Ramayan:2:105:15]
पूर्वम् मया नूनम् अभीप्सितानि, पापानि कर्माणि असत्कृत् कृतानि |
तत्र अयम् अद्य पतितो विपाको, दुःखेन दुःखम् यद् अहम् विशामि || ३-६३-४
"I might have definitely, habitually, and desirably committed damnable deeds in my previous births, and now the result of those impious deeds is very much ripened and has fallen on me, whereby I am entering misery after misery.
[Ramayan: 3-63-4]
कौसल्या सुप्रजा राम पूर्वा संध्या प्रवर्तते |
उत्तिष्ठ नर शार्दूल कर्तव्यम् दैवमाह्निकम् || १-२३-२
"Fortunate is Kausalya to beget you as her son Rama... get up oh, tigerly-man, eastern aurora is emerging, daytime tasks towards gods are to be performed."
[Ramayan: 1-23-2]
तस्य ऋषेः परम उदारम् वचः श्रुत्वा नृप नरोत्तमौ |
स्नात्वा कृत उदकौ वीरौ जेपतुः परमम् जपम् || १-२३-३
On hearing the benign words of the sage those valorous and best ones among men got up, bathed, and on offering water oblation they mediated upon the supreme hymn, namely Gayatri.
[Ramayan: 1-23-3]
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श्रीकृष्ण
Agnivesh:- Krishna's mama Ramaya's wife was Radha and older than Krishna. Krishna with wife Rukmani went to mountain jungle Himalaya and kept Assidhara vrat means sharper than walking on sword and remain Brahmchari there for 14 years then Pradhuman was born.
"परम हि ब्रह्म कथितं योग युक्तेन तन्मया"
It was a revelation as Param Brahm made to me in the state of trascendatle consciousness of God or I discoursed to thee on Supreme Brahma, having concentrated myself in yoga.
[महाभारत: अश्मेध पर्व (का अनुगीता पर्व)/14: 16:11-13]
{अश्वमेध पर्व में दो पर्व है बड़ा पर्व अश्मेध पर्व है और छोटा अनुगीता पर्व}
{इसे उत्त्तर गीता भी कहते है}
(जबकि कृष्ण के लिए ये आसान था याद करना क्योंकि वो 64 कला और 14 साइंसेस के ज्ञाता थे)
"जरा बिद्ययत पादतले तवारावाम
आश्वास सयंसतम महात्मा तदानी
गच्छननुधर्व रोदसी व्याप्य लक्ष्म्या"
(श्री कृष्ण जब योग निद्रा में लेटे थे, तो जरा नामक शिकरी ने उनके पैर के तले में तीर मारा जिससे घाव हो गया। उनकी महाआत्मा ऊधर्वलोक, परमधाम को चली जाती है/स्वेगलोकगमने। अंतरिक्ष में रुद्र, इंद्र, देवता, अप्सराएं मुनि, ऋषि उनका स्वागत करते है।)
[महाभारत : मौसल पर्व/16 : अध्याय 4: 23-24]
यो वै कामान्न भयान्न लोभान्नार्थकारणात्। अन्यायमनुवत्र्तेत स्थिरबुद्धिरलोलुपः। धर्मज्ञो धृतिमान् प्राज्ञः सर्वभूतेषु केशवः।।
(महाभारत उद्योग. अ. 83)
इस पृथ्वी पर समस्त मनुष्यों में श्री कृष्ण ही धर्म के ज्ञाता, परम धैर्यवान और परम बुद्धिमान हैं।
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गीता में ईश्वरवाद
कामैस्तैस्तैर्हृतज्ञानाः प्रपद्यन्तेऽन्यदेवताः ।
तं तं नियममास्थाय प्रकृत्या नियताः स्वया ॥
जिन मनुष्यों का ज्ञान सांसारिक कामनाओं के द्वारा नष्ट हो चुका है, वे लोग अपने-अपने स्वभाव के अनुसार पूर्व जन्मों के अर्जित संस्कारों के कारण प्रकृति के नियमों के वश में होकर अन्य देवी-देवताओं की शरण में जाते हैं।
(गीता : 7.20)
यो यो यां यां तनुं भक्तः श्रद्धयार्चितुमिच्छति ।
तस्य तस्याचलां श्रद्धां तामेव विदधाम्यहम् ॥
भावार्थ : जैसे ही कोई भक्त जिन देवी-देवताओं के स्वरूप को श्रद्धा से पूजने की इच्छा करता है, मैं उसकी श्रद्धा को उन्ही देवी-देवताओं के प्रति स्थिर कर देता हूँ।
(गीता : 7.21)
सर्वत: पाणिपादं तत्सर्वतोऽक्षिशिरोमुखम् |
सर्वत: श्रुतिमल्लोके सर्वमावृत्य तिष्ठति ||
[BG 13.14]
(āvṛtya — covering, pervade; tiṣṭhati — exists)
Everywhere are His hands and feet, eyes, heads, and faces. His ears too are in all places, for He pervades everything in the universe/ In this way the Supersoul exists, pervading everything.
सर्वेन्द्रियगुणाभासं सर्वेन्द्रियविवर्जितम् |
[BG 13.15]
Though He perceives all sense-objects, yet He is devoid of/without the senses
तत: पदं तत्परिमार्गितव्यं यस्मिन्गता न निवर्तन्ति भूय: |
तमेव चाद्यं पुरुषं प्रपद्ये यत: प्रवृत्ति: प्रसृता पुराणी || 4||
BG 15.4: Then one must search out the base of the tree, which is the Supreme Lord, from whom streamed forth the activity of the universe a long time ago. Upon taking refuge in Him, one will not return to this world again Or So doing, one must seek that place from which, having once gone, one never returns, and there surrender to that Supreme Personality of Godhead from whom everything has begun and in whom everything is abiding since time immemorial.
उत्तम: पुरुषस्त्वन्य: परमात्मेत्युदाहृत: |
यो लोकत्रयमाविश्य बिभर्त्यव्यय ईश्वर: |
BG 15.17: Besides these, is the Supreme Divine Personality, who is the indestructible Supreme Soul. He enters the three worlds as the unchanging controller and supports all living beings.
ॐ तत्सदिति निर्देशो ब्रह्मणस्त्रिविध: स्मृत: |
ब्राह्मणास्तेन वेदाश्च यज्ञाश्च विहिता: पुरा ||
BG 17.23: The words “Om Tat Sat” have been declared as symbolic representations of the Supreme Absolute Truth, from the beginning of creation. From them came the priests, scriptures, and sacrifice Or From the beginning of creation, the three syllables-om tat sat-have been used to indicate the Supreme Absolute Truth [Brahman]. They were uttered by brahmanas while chanting Vedic hymns and during sacrifices, for the satisfaction of the Supreme.
यत: प्रवृत्तिर्भूतानां येन सर्वमिदं ततम् |
स्वकर्मणा तमभ्यर्च्य सिद्धिं विन्दति मानव:
BG 18.46: By performing one’s natural occupation, one worships the Creator from whom all living entities have come into being, and by whom the whole universe is pervaded. By such performance of work, a person easily attains perfection.
ईश्वर: सर्वभूतानां हृद्देशेऽर्जुन तिष्ठति |
भ्रामयन्सर्वभूतानि यन्त्रारूढानि मायया
BG 18.61: The Supreme Lord dwells in the hearts of all living beings, O Arjun. According to their karmas, he directs the wanderings of the souls, who are seated on a machine made of the material energy.
तमेव शरणं गच्छ सर्वभावेन भारत |
तत्प्रसादात्परां शान्तिं स्थानं प्राप्स्यसि शाश्वतम्
BG 18.62:
Surrender exclusively unto him with your whole being, O Bharat. By his grace, you will attain perfect peace and the eternal abode.
’ईश्वर सर्व भुतानाम हृदेशे अर्जुन
तमेव शरणं गच्छ सर्वभावेश भारत
तत्प्रसादतपराम शांति स्थानम प्राप्स्यसि शाश्वतम’’
(ईश्वर प्रत्येक प्राणी, जीवित वस्तु के हृदय में निवास करता है अर्जुन केवल उसी की शरण में सम्पूर्ण भाव से जाओ भारत, तम-उस की, ईवा-केवल उस की दया से, तुम सर्वोत्तम शांति और अनंत का स्थानवास पा लोगे।)
[गीता 18:61-62]
गीता में अवतारवाद
जब भी धर्म का ह्रास होने लगता है और अधर्म की वृद्वि होती है, तब सर्व शक्तिमान हरि निस्संदेह (मार्गदर्शन के लिए) एक आत्मा पैदा करता है/स्वयं को सर्जता है।
(श्रीमद्भागवत महापुराण: 9:24:56)
"वासांसि जीर्णानि यथा विहाय नवानि गृह्णाति नरोऽपराणि ।
तथा शरीराणि विहाय जीर्णा न्यन्यानि संयाति नवानि देही ॥ (२२)
(जिस तरह व्यक्ति पुराने वस्त्रों का त्याग कर नए वस्त्र धारण करता है. उसी तरह आत्मा पुराने जर्जर हो चुके शरीरों को त्याग कर नए शरीर धारण करता है
(भगवत गीता: 2/22)
यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानि भर्वति भारत।
अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम्।।
(हे भारत, धर्म की हानि पर मैं धरती पर मनुष्य का रूप लेके धर्म की पुनः स्थापना और दृष्टो का संघार करने आता हूँ।)
(हे भारत जब जब धर्म की हानि होती है हमने एक महान पुरुष को धर्म सुधारक/ सन्देष्टा बना कर भेजा हूँ )
(हे भारत, जब जब धर्म की हानि होती है मैं अपने आप के सृजन करता हूँ, स्वयं को सृजता हूँ। अर्थात मैं धरती पर मनुष्य का रूप लेके धर्म की पुनः स्थापना और दृष्टो का संघार करने आता हूँ।)
(आर्य सामजी व्याख्या: श्रीकृष्णा कहते है कि मैं अपनी सृष्टि करता हूं अर्थात परमात्मा से मांग कर जन्म लेता हूँ।)
{यंहा भारत अर्जुन को नही बल्कि पूरे संसार को कहा गया है}
[गीता 4:7]
स तया श्रद्धया युक्तस्तस्याराधनमीहते ।
लभते च ततः कामान्मयैवविहितान्हि तान् ॥
भावार्थ : वह भक्त सांसारिक सुख की कामनाओं से श्रद्धा से युक्त होकर उन देवी-देवताओं की पूजा-आराधना करता है और उसकी वह कामनायें पूर्ण भी होती है, किन्तु वास्तव में यह सभी इच्छाऎं मेरे द्वारा ही पूरी की जाती हैं।
(गीता : 7.22)
अन्तवत्तु फलं तेषां तद्भवत्यल्पमेधसाम्।
देवान्देवयजो यान्ति मद्भक्ता यान्ति मामपि ॥
परन्तु उन अल्प-बुद्धि वालों को प्राप्त वह फल क्षणिक होता है और भोगने के बाद समाप्त हो जाता हैं, देवताओं को पूजने वाले देवलोक को प्राप्त होते हैं किन्तु मेरे भक्त अन्तत: मेरे परम-धाम को ही प्राप्त होते हैं।
(गीता : 7.23)
अव्यक्तं व्यक्तिमापन्नं मन्यन्ते मामबुद्धयः ।
परं भावमजानन्तो ममाव्ययमनुत्तमम् ॥
भावार्थ : बुद्धिहीन मनुष्य मुझ अप्रकट परमात्मा को मनुष्य की तरह जन्म लेने वाला समझते हैं इसलिय वह मेरे सर्वश्रेष्ठ अविनाशी स्वरूप के परम-प्रभाव को नही समझ पाते हैं।
(मेरे अति उत्तम अविनाशी और परम भाव को न जानते हुए, मुझ न दिखाई देने वाले पावन परमेश्वर को बुद्धिहीन, मनुष्य रूप प्राप्त किया हुआ मानते है)
Unintelligent men who know me not, think that I have assumed this form and personality. Due to their small knowledge, they do not know my higher nature which is changeless and supreme.
{परमेश्वर ने श्रीकृष्ण के माध्यम से अर्जुन से कहा}
[गीता 7.24]
नाहं प्रकाशः सर्वस्य योगमायासमावृतः ।
मूढोऽयं नाभिजानाति लोको मामजमव्ययम् ॥
भावार्थ : मैं सभी के लिये प्रकट नही हूँ क्योंकि में अपनी अन्तरंगा शक्ति योग-माया द्वारा आच्छादित रहता हूँ, इसलिए यह मूर्ख मनुष्य मुझ अजन्मा, अविनाशी परमात्मा को नहीं समझ पाते है।
I am not manifest to everyone, being veiled by my divine Yogmaya energy. Hence, those without knowledge do not know that I am without birth and changeless.
[गीता 7.25]
यो मामजमनादिं च वेत्ति लोकमहेश्वरम् |
असम्मूढ: स मर्त्येषु सर्वपापै: प्रमुच्यते ||
[BG 10.3]
Those who know me as unborn and beginningless, and as the Supreme Lord of the universe, they among mortals are free from illusion and released from all evil.
वेद्यं पवित्रम् ओंकार ऋक् सम यजुर एव च
श्रीकृष्ण कहते हैं कि मैं जानने योग्य शुद्धिकर्ता और ओंकार हूँ और ऋग्वेद, सामवेद, यजुर्वेद भी हूँ/ मैं ज्ञान का स्रोत, पवित्र करने वाला और ॐ अक्षर हूँ और मैं ऋग्वेद, सामवेद, यजुर्वेद भी हूँ।
भगवद्गीता (9:17)
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अलंकृत, मंत्र, विधान, अनकही
मैं घटनाओं का प्रशंसा की शैली में अलंकृत भाषा में वर्णन करता हूँ।
(ऋग्वेद: 8:6:11)
सामानो मंत्र समिति: समानी समानम मन: सह चित्तमेषाम।
समानं मंत्रमभि मंत्रये व: समानेन वो हविषा जुहोमि।।
हम सब का मंत्र समान हो अर्थात हम सब समान मंत्र पर एकत्रित हो। हमारे मन और चित्त समान हो।
मैं तुम सबको समान मंत्रों से अभिमंत्रित करता हूँ।
[ऋग्वेद:10:191:3]
(संगठन सूत्र, संज्ञान सूत्र)
ऋग्वेद: अदबधानी वरुणस्य व्रतानि।
(ईश्वर के विधान नहीं बदलते)
[ऋग्वेद:1:124:10]
न किरस्य प्रभिनन्ति व्रतानि
(ईश्वर के नियम कोई नहीं बदल सकता)
[अथर्वेद:18:1:5]
ला इलाहा हरती पापन, इलल्लाहा परम पदम।
जन्मा बैकुंठा पर ओप इनुती, जंपी नामो मुहम्मदम।।
There is no shelter but Ilah to get rid of sin. The shelter of Ilah is the actual shelter. If one is born on earth, there is no alternative to getting salvation from sin but to take shelter in llah. And for this, it is essential to follow the path shown by Muhammad.
(अनकही रीत/अकबर/ब्राह्मण/कनवर्टेड, दीने इलाही, सुलहएकुल)
[उत्तरायण या उत्तरायण वेद]
{5th वेद महाभारत है, अथर्वेद में भी कहा जाता है}
तथाकथित अनकही श्लोक के बारे में ये कहा जाता है कि इसे ब्राह्मण मरने वाले के कान ने प्राण निकलने से पहले पढ़ते -पढ़ाते हैं ताकि उसका उद्धार हो। पर इसका कंही कोई प्रमाणिक रिकॉर्ड नज़र नहीं आता है। शायद कंही किसी अप्रमाणिक मुगल कालीन या पुराने मुस्लिम लिटरेचर में इसका ज़िक्र किया गया हो। जो बाद में वर्क के लिटरेचर में भी आया। या शायद कभी पहले कुछ इलाकों में (सब जगह नहीं) रिवायती तौर पर ये कहानी या ये श्लोक आगे बढ़ाया गया हो। इसका प्रचार अज्ञानी लोगों के सामने किया जा सकता है। ज्ञानी लोगों में, हिन्दू विद्वानों में ये श्लोक नहीं टिकेगा। ये किसी किताब में नहीं। किसी किताब का सिर्फ पेज नम्बर कोट करना बेवकूफी और इग्नोरेंस है।
*"अल्लोपनिषद"*
यह *१०८ उपनिषदों* के अन्तर्गत लिखा मात्र २ पन्ने का *उपनिषद* है
*आस्माल्लां इल्ले मित्रा वरूणा दिव्यानिघत्ते।।*
*इल्लल्ले वरूणे राजा पुन्द्ददु: ।।*
अनुवाद:-मैं कहता हूं कि अल्लाह का नाम अल्लाह है तथा हबीब (मित्र) और आ समान (वरूण) आदि उसी के नाम हैं। अल्लाह ही वरूण है जो समस्त संसार का राजा है।
*हया मित्रो इल्लं इल्लल्ले इल्लं*
*वरूणो मित्रस्ते जस्काम्: ।।१।।*
अतः हे मित्रगण ऐसे अल्लाह को पहचानो, जो वरूण है और मित्रों कि भांति सभी कामों को पूरा करता है।
*होता रमिन्द्रो होता रमिन्द्रो महा सुरिन्द्रा:*
*अल्लो ज्यष्टं श्रेष्ठं परमपूर्ण ब्रह्माणं अल्लाम् ।।२।।*
वह इंद्र है और महा सुरिन्द्र है। अल्लाह सब से बड़ा, सब से ऊंचा, सब से उत्तम और पूर्ण है, और पवित्र (सब से मुक़द्दस)हमारा अल्लाह है।
*अल्लो रसूल महामदर कबरस्य अल्लो अल्लाम् ।।३।।*
अल्लाह के रसूल (ईश्दूत) मोहम्मद (स॰)सर्व श्रेष्ठ और वह अल्लाह के रसूल हैं।
*आदल्ला बूकमेक कम् ।।*
*अल्लाबुक निस्वातकम् ।।४।।*
अल्लाह अनादि काल से है और अनन्त काल तक रहेगा तथा अल्लाह ही समस्त विश्व का पालनकर्त्ता (पालनहार) है। अल्लाह ही के लिए अच्छे कार्य है तथा उसी के लिए हर प्रकार की प्रशंसा है!
*अल्लो यज्ञेन हुताहुत्वा ।।*
*अल्ला सूय्यर चन्द्र सर्व नक्षत्रा: ।।५।।*
अल्लाह ही ने सूर्य, चंद्रमा और सितारों का निर्माण किया!
*अल्ला ऋषीणां सर्व दिव्यां इन्द्राय*
*पूर्वेमाया परम मन्तरिक्षा: ।।६।।*
अल्लाह ने समस्त ऋषियों, इंद्र आदि को पूर्व काल में अवतरित किया तथा माया ही से आकाश आदि कि रचना कि है!
*अल्ल: पृथिव्या अंतरिक्षं विश्वरूपम ।।७।।*
अल्लाह ही पृथ्वी, अंतरिक्ष को रूप प्रदान करता है!
*इल्लांकबर इल्लांकबर इल्ला इल्लल्लेति इल्लल्ला: ।।८।।*
अल्लाह बड़ा है, अल्लाह बड़ा है, इल्लल्लाह (सब कुछ अल्लाह का) है,कहो *इल्लल्लाह*
*अल्ला इल्लल्ला अनादि स्वरूपाय अथर्वणा श्यामा हुं ही जनान पशु निसध्दात जल चरान अद्दष्टं कुरु कुरु फट ।।९।।*
ओम अल्लाह ही है, जो अनादि है तथा अथर व श्याम है। समस्त पशु एवं पक्षीयों के साथ ही पानी वाले जानवरों और नहीं दिखाई देने वाले जानवरों का पालन-पोषण करता है!
*असुर संहारिणी हुं ही अल्लो रसूल महामदर कबरस्य अल्लो अल्लाम् इल्लल्लेति इल्लल्ला: ।।१०।।*
हर प्रकार के कष्टों एवं बलाओं से मुक्ति दिलाने वाले अल्लाह के रसूल (ईश्दूत) *मोहम्मद* (स॰) जो समस्त *ऋषियों* के *सरदार* हैं अतः *कहो अल्लाह एक है,* हमारा *अल्लाह, इल्लल्लाह (सब कुछ अल्लाह ही का) है*
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वेद सर्वप्रथम
वेदों अखिलो धर्म मूलम
(धर्म का आधार वेद पर है)
[मनुस्मृति: 2:6]
श्रुतिस्तु वेदो विज्ञेयो धर्मशास्त्रम तू वै स्मृति:
(वेद को श्रुति और धर्मशास्त्र को स्मृति जानो)
[मनुस्मृति: 2:10]
श्रुतिद्वैधम तु यत्र स्यातत्र धर्मावुभौ स्मृतौ
जंहा दो श्रुति का आपस में विरोध हो वंहा दोनों ही धर्म कहे गए है।
[मनुस्मृति:2:14]
धर्मं जिज्ञासमानानां प्रमाणं परमं श्रुतिः
(मनुस्मृति: 2:13)
जिसको धर्म जानने की इच्छा है, उसको केवल वेद ही उत्तम प्रमाण है।
या वेदबाह्याः स्मृतयो याश्च काश्च कुदृष्टयः ।
सर्वास्ता निष्फलाः प्रेत्य तमोनिष्ठा हि ताः स्मृताः ।।
(मनुस्मृति:12/95)
जो वेद से बाहर की स्मृतियां और वेद विरुद्ध शास्त्र हैं, वे सब परलोक में निष्फल हैं, नरक के साधन है।
यस्तन्न वेद किम्रचा करिष्यति।
जो उस ब्रम्ह को नही जानता वह वेद से क्या करेंगा।
(ॠगवेद 1:164:39)
उत त्वः पश्यन्त ददर्श वाचमुत त्वः श्रण्वन्न श्रुणोत्ये नाम्।
बुद्धि हीन लोग ग्रंथ देखते हुए नही देखते और सुनते हुए नही सुनते।
(ॠगवेद 10: 71: 4)
तस्माद्यज्ञात्सर्वहुत ऋचः सामानि जज्ञिरे ।
छन्दांसि जज्ञिरे तस्माद्यजुस्तस्मादजायत ॥९॥
(ऋग्वेद पुरुषसूक्त 10/90/9)
उस पुरुष के होम वाल यज्ञ से ऋक, साम, छंद, यजु की उत्पत्ति हुई है.
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धर्म
यतो धर्मः ततो जय:
जहाँ धर्म है वहाँ जीत है।
(महाभारत)
धारयती इति धर्म:
जो धारण करने योग्य है वही धर्म है।
(मनुस्मृति)
धारणात धर्म इत्याहु: धर्मों धारयति प्रजा:
य: स्यात धारणसंयुक्त स धर्म इति निश्चय:
सम्पूर्ण विश्व के मनुष्यों का धारण करने योग्य धर्म एक ही है। जो धारण करता है, एकत्र करता है तथा अलगाव को दूर करता है, उसे धर्म कहते है। जिसमें प्रजा को एकसूत्र में बांध देने की शक्ति है, वह निश्चय ही धर्म है।
(महाभारत: भीष्मपर्व)
श्री कृष्ण कहते है की ये स्वधर्म और स्वभावनियतंकर्म है।
अर्थात वह धर्म जो स्वयं प्रकृति ने हमें सिखाया हो। ऐसे धर्म की हर बात स्वाभाविक होगी यानी सामान्य बुद्धि से समझने योग्य होगी।
(गीता: 18:47)
"जहां आकाश और प्रथ्वी मिले हुए थे और फिर अलग अलग हुए वहां जो धर्म की बुनियाद ईश्वर ने रखी थी, उसी को पुनः पाकर विश्व के ऋषिगण स्वयं भी शांत होंगे और विश्व को भी शांति प्रदान करेंगे।"
(ऋग्वेद १:६२:६, ७, ११)
Nothing is higher than dharma. The weak overcomes the stronger by dharma, as over a king. Truly that dharma is the Truth (Satya); Therefore, when a man speaks the Truth, they say, "He speaks the Dharma"; and if he speaks Dharma, they say, "He speaks the Truth!" For both are one.
[Brihadaranyaka Upanishad, 1.4.xiv]
युधिष्ठिर ने भीष्म पितामह से पूछा कि कौन सा धर्म सर्वश्रेष्ठ है? इस पर उन्होंने धर्म के कई मूलभूत सिद्धान्त बताए जिनमें से एक है:-
"धर्मं बुद्धिपूर्वं संप्रवर्तयन्ति।"
(महाभारत, शांतिपर्व, 109, 10)
[धर्म का आचरण बुद्धि के आधार पर ही किया जाता है।]
धर्म का पालन केवल परंपराओं, मान्यताओं, विश्वास और आस्था के आधार पर ही नहीं बल्कि बुद्धि, विवेक, तर्क और समझ के आधार पर भी होना चाहिए। महाभारत धर्म को स्वधर्म अर्थात व्यक्तिगत कर्तव्यों और सर्वधर्म अर्थात सर्वमान्य नैतिकताओं, सामाजिक सिद्धान्तों, दोनों रूपों में प्रस्तुत करती है। महाभारत में धर्म को किसी विशिष्ट धार्मिक दृष्टिकोण से संदर्भित नहीं किया गया है। इसलिए यह सिद्धान्त सभी धर्मों के अनुयायियों को अपने अपने धर्मों का पालन करते हुए प्रयोग में लाना चाहिए।
अन्य धर्म
धर्मो रक्षति रक्षितः
जो धर्म की रक्षा करते हैं, उनकी रक्षा स्वयं हो जाती है अर्थात रक्षित किया गया धर्म रक्षा करता है।
[मनुस्मृति: 8:15]
जन्म बहुधा विवाचसं नाना धर्माणम पृथिवी यथौकसम
अनेक धर्मो और अनेक भाषाओं वाले मनुष्यों को धारण करने वाली पृथ्वी।
(अथर्वेद : 12: 1 :45)
"यो ह्यस्य धर्ममाचष्टे यश्चैवादिशति व्रतम् ।
सोऽसंवृतं नाम तमः सह तेनैव मज्जति।।"
अर्थात- दूसरे धर्म का उपदेश और व्रत का जो पालन करता है, वह उस शूद्र सहित असंवृत नामक अंधकारमय नरक में जा गिरता है!
(मनुस्मृति: 4/81)
जिन्होने अपना धर्म त्याग दिया हो, उन्हे जलाञ्जलि भी नही देनी चाहिये।
(मनुस्मृति: 5/89 )
"यथा गति देवर मनुष्यो: पृथक्
स्व एव धर्मे परं क्षिपेतिस्थित:"
(मनुष्य को चाहिए कि अपने ही धर्म पर दुढ़ रहते हुए, दूसरों के घर्म का भी आदर करे)
[भागवत पुराण]
श्रेयान्स्वधर्मो विगुणः, परधर्मात्स्वनुष्टितात् ।
स्वधर्मे निधनं श्रेयः, परधर्मो भयावह: ॥
(गीता ३.३५)
अपना धर्म गुणहीन हो और दूसरे का गुणों में भलीभांति अनुष्ठित-प्रतिष्ठित हो तो भी दूसरे के धर्म से अपना धर्म ही श्रेष्ठ है।
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प्रथम पुरुष, स्त्री
आदमो नाम पुरुष: पत्नी हव्यवती
(भविष्यपुराण: प्रतिसर्गपर्व:4:18)
"जन्म मनुजातं"
(समस्त मानव जाति मनु की संतानें है)
[ऋग्वेद 1:45:1]
"स्वयंभू मनु अरु सतरूपा, जिन्ह तैं भे नरसृष्टि अनूपा।"
(प्रथम जोड़े स्वयंभूमनु और शतरूपा से ही सभी नर-नारीयों कि इस अनुपम सृष्टि ने जन्म लिया है)
[रामचरितमानस: 141:1]
"यत्तत्कारणमव्यक्तं नित्यं सदसदात्मकम् ।
तद्विसृष्टः स पुरुषो लोके ब्रह्मेति कथ्यते।।
तस्मिन्नण्डे स भगवानुषित्वा परिवत्सरम् ।
स्वयमेवाऽऽत्मनो ध्यानात्तदण्डमकरोद् द्विधा।।"
(मनुस्मृति-1/11-13)
अर्थात- सम्पूर्ण सृष्टि के कारण, अव्यक्त, नित्य, सत्-असत् स्वरूप से जो पुरुष उत्पन्न हुआ, उसे संसार 'ब्रह्मा' कहता है! अपने से वर्षो पर्यन्त उस अण्डे मे रहकर, ब्रह्मा ने स्वयं अपने ही ध्यान से उस अण्डे का दो खण्ड कर दिया।
सोअभिध्याय शरीरातस्वातसीसृक्षुविरविधा: प्रजा:
अप एव ससजारदौ तासु बीजमवासृजत।।
तदण्डमभवधदैमम सहस्त्रांशुसमप्रभम।
तस्मि अजज्ञे स्वयं ब्रह्मा सर्वलोक पितामह:।।
उस परमात्मा ने अनेक प्रकार की प्रजा उत्पन्न करने की इच्छा से जल उत्पन्न किया और उस जल में बीज डाला। वह बीज अंडा हो गया और उसमें सब लोकों का कर्ता ब्रह्मा स्वयं उत्पन्न हुआ।
[मनुस्मृति: 1:8-9]
महजलप्लावन वाले मनु का उल्लेख
(मत्स्यपुराण 1.29, 2.10)
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सद्भाव
सर्वधर्म सम्भाव
(सभी धर्मों को समान भाव दृष्टि से देखो.)
वसुधेव कुटुंबकम
(सम्पूर्ण धरती ही परिवार है)
"अयं निजः परो वेति गणना लघुचेतसाम।
उदारचरितानां तू वसुधेव कुटुंबकम"
(ये अपना बंधु हैं और ये अपना बंधु नहीं है इस इस तरह कि गणना छोटे चित्त वाले लोग करते है। उदार हृदय वाले लोगों के लिए तो सम्पूर्ण धरती ही परिवार है)
[महाउपनिषद:6:71]
Arzullah, Ibadullah (Allah ke Bande), Hjbullh
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अहिंसा व सत्य
"मा हिंसीः पुरुषं जगत्"
(जगत में किसी मनुष्य की हिंसा मत करो।)
[यजुर्वेद:16:3]
आचारः परमों धर्मः श्रुत्युक्तः स्मात्त्त एव च ।
यानी, आचरण (सदाचरण) ही परम धर्म है।
(मनुस्मृति 1.108)
"अहिंसा परमो धर्म"
(अहिंसा ही सबसे बड़ा धर्म है)
धर्महिंसा तदैव च:
(धर्म की रक्षा के लिए अहिंसा उससे भी श्रेष्ठ है)
[गीता]
अहिंसा परमो धर्मो हिंसा चाधर्मलक्षणा ॥
(अहिंसा उत्कृष्ट धर्म है और हिंसा अधर्म का लक्षण है)
[महाभारत:आश्वमेधिकपर्व: 46:20-21]
अहिंसा परमो धर्मः
(अहिंसा परम धर्म है)
[महाभारत:आरण्यकपर्व १९८.६९]
अहिंसा लक्षणो धर्म
(अहिंसा ही धर्म का लक्षण है)
[महाभारत: अनुशासनपर्व: 101:13]
अहिंसालक्षणं धर्मं
(अहिंसा ही धर्म का लक्षण है)
[महाभारत: अनुशासनपर्व: 114:2]
अहिंसा परमो यज्ञः।
(अहिंसा सबसे बड़ा यज्ञ है)
[महाभारत:अनुशासनपर्व : 101:38]
सत्य बोलना चाहिये, प्रिय बोलना चाहिये, सत्य किन्तु अप्रिय नहीं बोलना चाहिये । प्रिय किन्तु असत्य नहीं बोलना चाहिये; यही सनातन धर्म है।
(मनु० 4 : 138)
सत्यमेव जयते नानृतं।
सत्य की ही सदैव विजय होती है, असत्य की नहीं।
(मुण्डकोपनिषद् 3:1:6)
सत्यं ब्रह्म सनातनम अर्थात सदा रहने वाला परमेश्वर ही सत्य है।
(शांतिपर्व महाभारत 162.5)
सत्यं धर्मस्तपो योग अर्थात सत्य ही धर्म है, सत्य ही तप है और सत्य ही योग है।
(शांतिपर्व महाभारत 162.5)
सद्भाव: सत्यमुच्यते अर्थात सत्ता या वास्तविकता को ही सत्य कहते है।
(शांतिपर्व महाभारत 299.45)
यद्भूतहितमत्यंत तत् सत्यम् अर्थात जो वाक्य सभी प्राणियों के लिये अत्यंत हितकारी हो वही सत्य है।
(वनपर्व महाभारत 209.4)
एतद्देशप्रसूतस्य सकाशादग्रजन्मनः। स्वं स्वं चरित्रं शिक्षेरन्पृथिव्यां सर्वमानवाः।।
इस देश में जन्में ज्ञानियों से संसार के सभी मनुष्य चरित्र व आचरण सीखें।
( मनुस्मृति : 2 : 20)
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नमाज़
"संप्रेक्ष्य नासिकाग्रं स्वं दिशश्चानवलोकयन्"
(गीता 6:13)
योगी ऐसे योग करें की स्वयं अपनी ही नाक के अग्र भाग पर इस प्रकार दृष्टि जमाए, ध्यान केंद्रित करें, कि किसी अन्य दिशा में न देख सके।
भूथिषठानते नमउक्तिम विधेन
[यूजर्वेद: 40:16]
हम तुझे बहुत बड़ी नमस्कार-उति (ऐसी उक्ति जो नम करके, झुक कर अर्पित की जाएगी - नमाज़) करते है।
सदिन्न भिज्ञउ पत्नीवंतो नमस्यम नमस्यन
(ऋग्वेद: 1: 72:5)
वे पत्नियों के साथ, उसके सामने झुक कर उपासना करते है।
{अभिज्ञउ नमस्य- offering adoration kneeling upon their knees, रुकू की तरह)
ज्ञउवाधेनमसा सदेम
(ऋग्वेद: 6:1:6)
{Kneeling upon our knees with adoration - आदर भाव के साथ घुटनो पर झुकना}
व्रत के संकल्प से वह पवित्रता को प्राप्त होता है।
[यजुर्वेद : 19:30]
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काबा
“इलास्पद नाभा पृथ्वी”
(इला ईश्वर, स्पद स्थान, ईश्वर स्थान)
[ऋग्वेद : 3:24:4]
इलायास्तवा पदे वयं नाभा पृथ्विया अधि।
जातीवेदो नि धीमयअग्ने हव्याय वोढवे।
हम तुम्हें पृथ्वी की नाभि पर ईश्वर के स्थान में धारण करे।
हमारा इला का स्थान पृथ्वी की नाभि पर है।
[ऋग्वेद: 3:29:4]
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इत्यादि
“अग्नि मीले पुरोहितं यगस्य देवमृतविजम”
(मैं अग्नि पुरोहित याज्ञनिक देव ऋत्विज होतंव रत्नधाता प्रभु की स्तुति करता हूँ)
[ऋग्वेद:1:1:1]
असी होता मनुहिरत:
(ऋग्वेद:1:13:4)
Manu appointed thee as Priests.
ओम भूर भुवः सुव, तत्सवी तुर्वरनियं भर्गो देवस्य धीमही धियो योन प्रचोदयात।।
(प्रणव, प्राण देने वाला, दुख का नाश, सूर्य जैसा, सर्वोत्तम, कर्मो का उद्धार करने वाला, आत्म चिंतन ध्यान योग्य, बुद्धि शक्ति दे)
(तत मतलब वह और देवस्य मतलबप्रभु)
{'सवितू' मतलब जीवन देने वाला, सृष्टि निर्माण करने वाला, सूर्य का स्रोत प्रकाश, सत्य प्रकाश अर्थात ईश्वर as translated by स्वामी दयानंद, स्वामी विवेकानद, पंडित श्रीराम शर्मा आचार्य (गायत्री परिवार संस्थापक), सर्वपल्ली राधकृष्णन, श्री अरबिंदो।}
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रामचरितमानस
"बैर न कर काहू सन कोई, राम प्रताप विषमता खोई।"
कोई किसी से शत्रुता नहीं करता था, राम जी के प्रताप से सबने विषमता खो दी थी।
(अर्थात अपने मन में श्रीरामचंद्र जी का तेज-प्रताप पाने से मनुष्य में से घृणा, द्वेष व बैर समाप्त हो जाता है,
जिस मन में श्रीराम बसते है, उस मन में बैर नहीं बस सकता।)
{सच्चा रामभक्त वही है जिसमें दूसरों के प्रति कोई भेदभाव-विषमता न हो। हृदय में लोगों के लिए असमानता रख कर, जय श्रीराम बोलने वाले राम के नाम का सम्मान बढ़ाने की बजाय केवल बदनाम ही कर रहे है।}
[रामचरितमानस]
सोइ सेवक प्रियतम मम सोई। मम अनुसासन मानै जोई॥
जौं अनीति कछु भाषौं भाई। तौ मोहि बरजहु भय बिसराई॥
श्रीरामचंद्र जी प्रजा को उपदेश देते हुए कहते हैं कि वही मेरा सेवक है और वही प्रियतम है, जो मेरी आज्ञा माने। हे भाई! यदि मैं कुछ अनीति (अनैतिक) की बात कहूँ तो भय भुलाकर (बेखटके) मुझे रोक देना
[रामचरितमानस की चौपाई]
जौं अनीति कछु भाषौं भाई। तौ मोहि बरजहु भय बिसराई।
श्रीरामचंद्र जी लोगों से कहते हैं कि हे भाई! यदि मैं कुछ अनीति (अनैतिक) की बात कहूँ तो भय भुलाकर (बेखटके) मुझे रोक देना।
(अर्थात उन्हें नैतिकता का पाठ सीखाया जा रहा है जो कभी गलत हो नही सकता)
[रामचरितमानस]
बड़ें भाग मानुष तनु पावा। सुर दुर्लभ सब ग्रंथन्हि गावा।
साधन धाम मोच्छ कर द्वारा। पाइ न जेहिं परलोक सँवारा।
बड़े भाग्य से यह मनुष्य शरीर मिला है। सब ग्रंथों ने यही कहा है कि यह शरीर देवताओं को भी दुर्लभ है (कठिनता से मिलता है)। यह साधन का धाम और मोक्ष का दरवाजा है। इसे पाकर भी जिसने परलोक न बना लिया।
[रामचरितमानस]
सो परत्र दुख पावइ सिर धुनि धुनि पछिताई।
कालहि कर्महि ईस्वरहि मिथ्या दोष लगाइ।
(इस शरीर को पाकर भी जो मोक्ष न प्राप्त कर पाए) वह परलोक में दुःख पाता है, सिर पीट-पीटकर पछताता है तथा (अपना दोष न समझकर) काल पर, कर्म पर और ईश्वर पर मिथ्या दोष लगाता है।
[रामचरितमानस]
बिनु पद चलइ सुनइ बिनु काना। कर बिनु करम करइ बिधि नाना॥
(उस निराकार ईश्वर के पैर नहीं पर फिर भी वह चलता है। उसके कान नहीं, फिर भी वह सुनता है। उसके हाथ नहीं, फिर भी विविध प्रकार के कार्य करता है!)
रघुबर तुमको मेरी लाज। सदा सदा मैं सरन तिहारी तुमहि गरीबनवाज।।"
(राम जी तुम गरीबनवाज़ हो।)
"तुलसी सरनाम गुलाम है राम को, जाको रुचे सो कहै कछु कोहू।
मांगि के खैबो, मसीत को सोइबो, लैवे को एक न दैबे को दोऊ।।"
(तुलसीदास रामचन्द्र जी का ग़ुलाम है जो मांग कर भोजन करता है और मस्जिद में सोता है)
कर्म प्रधान विश्व रची राखा।
जो जस करई, सो तस फल चाखा।
(रामचरितमानस)
जाकी रही भावना जैसी.
प्रभु मूरत देखी तिन तैसी.
(जिसकी जैसी भावना उसी के अनुरूप प्रभु को उसी रूप में देखा)
रामचरितमानस
जय हनुमान ज्ञान गुण सागर
(हनुमान चालीसा)
दैहिक दैविक भौतिक तापा। राम राज नहिं काहुहि ब्यापा॥
सब नर करहिं परस्पर प्रीती। चलहिं स्वधर्म निरत श्रुति नीती॥
रामराज्य में दैहिक, दैविक और भौतिक ताप किसी को नहीं व्यापते। सब मनुष्य परस्पर प्रेम करते हैं और वेदों में बताई हुई नीति (मर्यादा) में तत्पर रहकर अपने-अपने धर्म का पालन करते हैं.
(रामचरितमानस)
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दोहे, चौपाई, अन्य
ब्रह्ममुहर्त में घाट पर सोए कबीर पर रामानंद जी के पैर पड़े तो उन्होंने कहा – ‘राम-राम कह’। कबीर ने गुरु मंत्र मान लिया और राम की भक्ति करने लगे। परन्तु उनके राम दशरथी राम नहीं है बल्कि निर्गुण ब्रह्म राम थे।
कबीर "दास" जी कहते है -
निरगुण राम निरगुण राम जपहु रे भाई।
राम रहीम एक हैं, नाम धराया दोय
कृष्ण करीम एक है, नाम धराई दुइ,
दसरथ सुत तिहुँ लोक बखाना।
राम नाम को मरम है आना।
(तीनों लोकों में दशरथ के पुत्र को राम कहा जाता है लेकिन राम नाम का असली मर्म ‘आना’ अर्थात् अन्य या अलग या भिन्न है)
पाहन पूजे हरि मिले तो हम पूजे पहार |
ताते तो चाकी भली पीस खाए संसार ||
पाथर पूजे हरि मिले तो मैं पूजू पहाड़।
दुनिया ऐसी बावरी पाथर पूजन जाए।
घर की चाकरी कोई न पूजे जेकर पीसा जाए।।
दुख में सुमिरन सब करे। सुख में करे न कोई।
जो सुख में सुमिरन करो तो दुख काय को होइ।।
सकार राम दसरथ घर डोलें, निराकार घट-घट में बोलै । बिंदराम का सकल पसारा, अकः राम हैं सबसे न्यारा ॥
सगुन राम विष्णु जग आया, दसरथ के पुत्र कहाया ॥
निर्गुण राम निरंजन राया, जिन वह सकल श्रृष्टि उपजाया ।
दादुजी कहते है --
मूर्त गढ़ी पाषण की किया सृजन हार |
दादू साँच सूझे नहीं यूँ डूबा संसार ||
गुरुनानकदेव जी का उपदेश है --
पात्थर ले पूजहि मुगध गंवार |
ओहिजा आपि डूबो तुम कहा तारनहार ||
कह रैदास तेरी भगति दूरि है, भाग बड़े सो पावै।
(ईश्वर की भक्ति बड़े भाग्य से प्राप्त होती है)
कृस्न, करीम, राम, हरि, राघव, जब लग एक न पेखा
वेद कतेब कुरान, पुरानन, सहज एक नहिं देखा
(रैदास कहते है कि राम, कृष्ण, हरि, ईश्वर, करीम, राघव सब एक ही परमेश्वर के अलग-अलग नाम हैं. वेद, कुरान, पुराण आदि सभी ग्रंथों में एक ही ईश्वर की बात करते हैं, और सभी ईश्वर की भक्ति के लिए सदाचार का पाठ पढ़ाते हैं.)
सबका मालिक एक।
(साईं बाबा)
अतिथि देवो भव।
नमस्ते सदा वत्सले मातृभूमे।
वैष्णव जन तो तेने कहिये जे पीड़ पीरपराई जानेरे।
रघुपतिराघव राजाराम पतितपावन सीताराम।
ईश्वर अल्लाह तेरो नाम, सबको सन्मति दे भगवान।
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मूर्तिविरोधी
"मूर्ति जड़ है , उसे ईश्वर मानोगे तो ईश्वर भी जड़ सिद्ध होगा | अथवा ईश्वर के समान एक और ईश्वर मानो तो परमात्मा का परमात्मापन नहीं रहेगा | यदि कहो कि प्रतिमा में ईश्वर आ जाता है तो ठीक नहीं | इससे ईश्वर अखण्ड सिद्ध नहीं हो सकता | भावना में भगवान् है यह कहो तो मैं कहता हूँ कि काष्ठ खण्ड में इक्षु दण्ड की और लोष्ठ में मिश्री की भावना करने से क्या मुख मीठा हो सकता है ? मृगतृष्णा में मृग जल की बहुतेरी भावना करता है परन्तु उसकी प्यास नहीं बुझती है | विशवास , भावना और कल्पना के साथ सत्य का होना भी आवश्यक है |"
(दयानन्दप्रकाश - पृ २६४ )
"नहीं नहीं , मूर्तिपूजा सीढ़ी नहीं किन्तु एक बड़ी खाई है जिसमे गिरकर मनुष्य चकनाचूर हो जाता है , पुनः इस खाई से निकल नहीं सकता किन्तु उसी में मर जाता है |"
( सत्यार्थ प्रकाश , एकादश समुल्लास )
*ईश्वर प्राप्ति की सीढ़ी तो है महर्षि पतंजलि कृत - "अष्टांग योग" - जिसके अंग - यम , नियम , आसन , प्राणायाम , प्रत्याहार , धारणा , ध्यान और समाधि हैं | विद्वान , ज्ञानी और योगीजन ईश्वर प्राप्ति की सीढियाँ हैं , पाषाण आदि नहीं |*
( साभार स्वामी जगदीश्वरानन्द सरस्वती कृत --उपासना और मूर्ति पूजा )
गजैरापीड्यमानोsपि न गच्छेज्जैनमन्दिरम्
(भविष्य पु . प्रतिसर्गपर्व ३-२८-५)
अर्थात , यदि हाथी मारने लिए दौड़ा आता हो और जैनियों के मन्दिर में जाने से प्राणरक्षा होती हो तो भी जैनियों के मन्दिर में नहीं जाना चाहिए |
{जैनियों के मन्दिरों में नग्न मूर्तियाँ होती थी , इन मन्दिरों में भव्यवेश में भूषित हार-श्रृंगारयुक्त मूर्तियों की स्थापना और पूजा होने लगी |}
यस्यात्म बुद्धिः कुणपेत्रिधातुके | स्वधीः ....स एव गोखार।
जो लोग धातु पत्थर मिट्टी की मूर्तियों में परमात्मा को पाने का विश्वास तथा जल वाले स्थानों को तीर्थ समझते है, वे सभी मनुष्यों में बैलों का चारा ढोहने वाले गधे के समान है।
(ब्रह्मवैवर्त्त)
यस्यात्मबुद्धिः कुणपे त्रिधातुके | स्वधीः कलत्रादिषु भौम इज्यधीः ||
यत्तीर्थबुद्धिः सलिले न कहिर्चिज् | जनेष्वभिज्ञेषु स एव गोखारः ||
(श्रीमद भागवत १०-८४-१३ )
अर्थात , जो वात , पित और कफ -तीन मलों से बने हुए शरीर में आत्मबुद्धि रखता है , जो स्त्री आदि में स्वबुद्धि रखता है , जो पृथ्वी से बनी हुई पाषाण -मूर्तियों में पूज्य बुद्धि रखता है , ऐसा व्यक्ति गोखर - गौओं का चारा उठाने वाला गधा है |
न ह्यम्मयानि तीर्थानि न देवा मृच्छिलामयाः |
ते पुनन्त्यापि कालेन विष्णुभक्ताः क्षणादहो ||
(देवी भागवत ९-७-४२ )
अर्थात , पानी के तीर्थ नहीं होते तथा मिटटी और पत्थर के देवता नहीं होते | विष्णुभक्त तो क्षण मात्र में पवित्र कर देते हैं | परन्तु वे किसी काल में भी मनुष्य को पवित्र नहीं कर सकते |
न प्रतीके न ही सः
(वेदान्त दर्शन ४-१-४ )
प्रतीक में , मूर्ति आदि में परमात्मा की उपासना नहीं हो सकती।
(श्री शंकराचार्य जी परापूजा में लिखते है)
पूर्णस्यावाहनं कुत्र सर्वाधारस्य चासनम् |
स्वच्छस्य पाद्यमघर्यं च शुद्धस्याचमनं कुतः ||
निर्लेपस्य कुतो गन्धं पुष्पं निर्वसनस्य च |
निर्गन्धस्य कुतो धूपं स्वप्रकाशस्य दीपकम् ||
अर्थात , ईश्वर सर्वत्र परिपूर्ण है फिर उसका आह्वान कैसा ? जो सर्वाधार है उसके लिए आसन कैसा ? जो सर्वथा स्वच्छ एवं पवित्र है उसके लिए पाद्य और अघर्य कैसा ? जो शुद्ध है उसके लिए आचमन की क्या आवश्यकता ?
निर्लेप ईश्वर को चन्दन लगाने से क्या ? जो सुगंध की इच्छा से रहित है उसे पुष्प क्यों चढाते हो ? निर्गंध को धूप क्यों जलाते हो ? जो स्वयं प्रकाशमान है उसके समक्ष दीपक क्यों जलाते हो ?
अग्निहोत्र करना द्विजमात्र का कर्तव्य है | मुनि लोग हृदय में परमात्मा की उपासना करते हैं | अल्प बुद्धि वाले लोग मूर्तिपूजा करते है | बुद्धिमानों के लिए तो सर्वत्र देवता है |
(चाणक्य नीति ४-१९ )
प्रतिमा स्वल्पबुद्धिनाम सर्वत्र समदर्शिनः
मूर्तिपूजा मूर्खों के लिए है, जबकि बुद्धिमान लोगो के लिए ईश्वर सर्वत्र व्यापक है।
(चाणक्यनीति: 4:19)
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वैदिक साहित्य, यज्ञ, कर्मकांड अपरा है।
वेद मंत्र पूरी दुनिया पर कृपा करनेवाले और चारों सीधी राह दिखाने का साधन है। ऋग्वेद , यजुर्वेद , सामवेद और अर्थववेद, ये चार वेद है । इसमें मन्त्रो की संख्या 1 लाख है ।
(जबकि चारों वेदों में लगभग 20 हज़ार मंत्र है)
[अग्नि पुराण : 271 :1]
तत्रापरा ऋग्वेदो यजुर्वेदः सामवेदोऽथर्ववेदः शिक्षा कल्पो व्याकरणं निरुक्तं
छन्दो ज्योतिषमिति। अथ परा यया तदक्षरमधिगम्यते ॥
(मुण्डकउपनिषद १.५)
ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद, अथर्ववेद और शिक्षा, कल्प, व्याकरण, रक्त, छंद, ज्योतिष ये सब अपरा (यानी, जो पार न लगा सक एसी विद्याएं हैं। परंतु जिसके द्वारा अनित्य लोकों के परे अविनाशी अवस्था तक जाना संभव है, वह परा विद्या है (भवसागर के पार जाने की विद्या है)।
प्लवा होते अदृढ़ा यज्ञरूपा अष्टादशोक्तमवरं येषु कर्म।
एतच्छेयो येऽभिनन्दन्ति मूढा जरामृत्युं ते पुनरेवापियन्ति ॥
(मुण्डकोपनिषद २.७)
भवसागर को पार करने के लिए यह यज्ञ-रूपी प्लव (छोटी नौका) अदृढ़ है, बिल्कुल कमजोर है। इसमें जो १८ प्रकार के कर्म कहे गये हैं, सब के सब अवर हैं यानी, हीन हैं, श्रेष्ठ नही है। जो मूढ इन यज्ञीय-कर्मकांडों को श्रेय मानकर आनंद मनाते फिरते हैं, वे बार-बार जरा तथा मृत्यु के भवबंधन में फँसते रहते हैं।
इष्टापूर्तम मन्यमाना वरिष्ठं नान्यच्छेयो वेदयन्ते प्रमूढाः ।।
नाकस्य पृष्ठे ते सुकृतेऽनुभूत्वा इमं लोकं हीनतरं वा विशन्ति ॥
(मुण्डक० २.१०)
मूढ़-लोग इष्टपूर्ति के लिए, यज्ञ-याग आदि कर्मकांडों को सब-कुछ मान बैठते है, वे इनसे अन्य कुछ श्रेय जानते ही नहीं। सुकृत से जो सुख प्राप्त होता है, उसकी तो मानो वे पीठ को ही छू पाते हैं, और फिर इस हीनतर लोक में जा पहुँचते हैं, क्योंकि यज्ञ-याग आदि वास्तविक सूकृत नही है।
त्रैगुण्यविषया वेदा निस्त्रेगुण्यो भवार्जुन ॥।
(गीता २.४५)
के अर्जन! वेदों का विषय तो सत्त्व, रज, तम इन तीन गुणों तक ही सीमित है। (यानी, वेद त्रिगुणमय लौकिक भव-चक्र में ही उलझाये रखने वाले हैं।) इसलिए तू इन तीनों की सीमा को लांघ कर त्रिगुणातीत हो जा (जिससे कि तू लोकों के परे भव-मुक्ति पा सके।)
यावानर्थ उदपाने सर्वतः संप्लुतोदके।
तावान्सर्वेषु वेदेषु ब्राह्मणस्य विजानतः॥
(गीता २.४६)
ज्ञानी ब्राह्मण के लिए वेदों का उतना ही मूल्य है जितना चारों ओर विपूल मात्रा में पानी ही पानी भरा होने पर किसी छोटे तालाब का मूल्य होता है। ज्ञान के विस्तृत जलाशय की तुलना में क्षुद्र तालाब सदृश वेदों का क्या मूल्य है!
सामवेद की ध्वनि अपवित्र है।
(मनु-स्मृति :४ :१२४)
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महामद
"उत्तनायामव भरा चिकित्वानतनसघ: प्रविता वृषणज जान।"
अर्थात ऊधर्व या ऊपर मुख वाली मशाल (अंतिम ज्ञान) को नीचे मुख वाली मशाल (प्रथम ज्ञान) पर रखोगे तो तुरंत गर्भ वाली अरणी से कामनाओं की वर्षा करने वाली अग्नि प्रकट होगी अर्थात अग्नि का भेद खुल जायेगा।
{ऊधर्व मुख वाली अरणी पर नीचे मुख वाली अरणी को रखो, तत्काल गर्भ वाली अरणी ने कामनाओं की वर्षा करने वाली अग्नि को प्रकट किया।}
(सबसे पहले वाले ज्ञान के उपर सबसे अंतिम वाले ज्ञान को रखो। अर्थात क़ुरान के प्रकाश में वेदों में शोध करोगे तो तुरन्त अग्नि का वह रहस्य पा जाओगे जिसकी सदा से कामना की गयी है।)
( ऋग्वेद: 3:29:3)
“इंद जना उप श्रतु नराशंस स्तविष्यते
पष्टिम सहस्रा नवतरी च कौरम आ रुषमेषु दघहे
उष्ट्रा यस्य प्रावाहनों वधुमंतो द्विदर्श
वषर्मा रथस्य नि जिहीडते दिव ईशमाना उपस्पृश:
एश इशाय मामहे शतम निष्कान दश सृज:
त्रीणि शतानयवृता सहस्रा दश गोनाम।“
(नराशंस की प्रशंसा की जाएगी, उस शरणार्थी को 60k शत्रु के बीच पाते है।
ऊंट सवारी, 20 उटनियों सहित, महान तेजरथ आकाश को छूते हुआ नीचा दिखती है। 100 स्वर्ण मुद्राएं दी(100 हिजरत की), 10 मालाएं मिली, 300 घोड़े मिले (बद्र में सहाबा), 10k गाय मिली (मक्का फतह पर सहाबा)
[अथर्वेद 20:127:1-3 कुंटप/कुंताप सूत्र]
[अथर्वेद कांड:-20,सुक्त:-127,मंत्र:-01]
इंद जना उप श्रुत नराशंस स्ताविष्यते।
षषिटं सहस्रा नवर्ति च कौरम् आ रुशमेषु दद्दाहे।
(हे मनुष्यो आदर से सुनो नराशंस की प्रशंसा की जाएगी उस कौरम शरणार्थी को साठ हजार नव्वे शत्रुओं के बिच हम पाते है)
[अथर्वेद कांड:-20,सुक्त:-127,मंत्र:-02]
उष्ट्रा यस्य प्रवाहणों वधूमन्तो द्विर्दश।
वषर्मा रथस्य नि जिहीडते दिव ईषमाणा उपस्पृशः
(जिसकी सवारी ऊंट है बिस उटनियों सहित उसके महान रथ की तेज तफतारी आकाश को छूते हुए नीचा दिखती है )
[अथर्वेद कांड:-20,सुक्त:-127,मंत्र:-03]
एष इषाय मामहे शंत निषकन् दश स्रजः।
त्रीणि शतान्यर्वतां सहस्रा दश गोनाम्
(उस ईश्वर ने उस उपजाऊ (पुरुष) को प्रदान किया है! सौ दीनार (स्वर्ण मुद्राएं) दस मालाऐं तीन सौ घोड़े और दस हजार गाएं)
महामद बिन साम & अव्यक्तंएका मुहम्मद अवतार
(मुहम्मद बिन ग़ज़नवी)
…..........................................................................
■■■
Agni is God, Soul, Man in the following Mantras:-
ब्रह्मा वा अग्नि
ब्रह्मा अग्नि है। Agni is God
(Kau./कोo: 9:1:5)
यदगने... सहस: सुनवाहुत
हे अग्नि, जगदउत्पादक, सर्वपूजित...
(ऋग्वेद: 8:19:25)
आत्मैवग्नि
आत्मा ही अग्नि है।
(शतo 6:7:1:20)
अग्निवै स्वर्गस्य लोकस्याधिपति:
स्वर्गलोक में अधिपति अग्नि है।
(Ait./ ऐo: 3: 42)
पुरुषोअग्नि
पुरुष अग्नि है।
(शतo 10:4:1:6)
अग्निम दूतं वृणीमहे
हम अग्नि को दूत चुनते है।
(ऋग्वेद: 1: 12:1)
त्वमग्ने प्रयदक्षिणम नरम..
अग्नि, वह मनुष्य (तुम हो) जो तपस्वियों से प्रसन्न होता है।
(ऋग्वेद: 1:31:15)
अग्निमाग्निम हवीमभि: सदा हवन्त विशपतिम हव्यवाहम पुरुप्रियम
अग्नि के जन्मदाता, अग्नि जो पूरे संसार के पालक है, उन्हें हम सदा के लिए प्रस्तूत करते है।
(ऋग्वेद: 1:12:2)
म अग्निअग्नि: समिधयते कवीगृहपतियुरवा हव्यावाड जुहवासय:
मेधावी, गृहरक्षक, हविवाहक, तेजस्वी मुख वाले अग्नि को अग्नि ही प्रज्लवित करते है।
(ऋग्वेद: 1:12:6)
तनुपादुच्यते गर्भ आसुरो नराशंसो भवति यद्विजयते
जिस अग्नि का व्यापक रूप कभी रुष्ट नहीं होता उसे तनूनपात कहते है, जब वह साक्षत होते है, तब आसुर और नराशंस कहलाते है।
(ऋग्वेद: 3:29:11)
तनुनपादुपांच्यते गर्भ असुरो नराशंसो..मातरिश्वा।।
जिस अग्नि का व्यापक रूप कभी नष्ट नहीं होता, उसे तनूनपात कहते है (पहला रूप)। जब वह साक्षात होते है तब आसुर और नराशंस कहलाते है (दूसरा रूप) और अंतरिक्ष मे अपने तेज को फैलाते है, तब मातरिश्वा होते है (तीसरा रूप)।
[ऋग्वेद:3:29:11]
(अग्नि को मंथन द्वारा प्रकट पूर्व काल के समान प्रकट करेंगे, अग्नि को अरणी मंथन से प्रकट करो, तुम श्रेष्ठ हो ज्ञानी हो, साक्षात अग्नि आने पर आसुर और नराशंस कहलाते है।)
[ऋग्वेद 3:39:1-11]
पूर्व काल के समान हम अग्नि को मंथन द्वारा प्रकट करेंगे।
[ऋग्वेद:3:29:11]
अग्नि का प्रथम जन्म स्वर्ग में, द्वितीय मनुष्यों में जातवेद।
[ऋग्वेद 10:45:1]
दिवसपरि प्रथमं जज्ञे अग्निरसमद द्वितीयं परि जातवेदा:
अग्नि का प्रथम जन्म विधुत (तेजस्वी) के रूप में स्वर्गलोक में हुआ, उनका द्वितीय जन्म कम मनुष्यो के मध्य हुआ, तब वह जातवेद कहलाया...
(ऋग्वेद: 10:45:1)
अग्निरस्मद...जातवेद:
अग्नि का प्रथम जन्म स्वर्गलोक में विद्युत के रूप में हुआ (प्रथम रूप)। उनका द्वितीय जन्म हम मनुष्यों के मध्य हुआ , तब वह जातवेद कहलाये (दूसरा रूप)। उनका तृतीय जन्म.. मनुष्यों का हित करने वाले अग्नि सदा प्रज्वलित होता है। उनको स्तुति करने वाले उनकी ही सेवा करते है।
[ऋग्वेद:10: 45: 1]
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दूतों के 3 मंत्र...
अग्निम दूतं वर्णीमहे होतारम विश्ववेदसम
(ऋग्वेद:1:12:1)
शशवत्तममीलते दूत्याय
(ऋग्वेद: 10:70:3)
त्वं दूतं प्रथमोवरेण्य
(ऋग्वेद: 10:122:5)
यज्ञम पृच्छामयवमम स तददूतो विवोचती।
क्व ऋतं पुवयम गतं कस्तदबिभर्ति नुतनो वित्तम मे अस्य रोदसी।।
(मैं) प्रश्न करता हूँ अंतिम यज्ञ (सबसे नीचे, सबसे बाद) का, जिसको वह दूत स्पष्ट करता है। पुराने समय का सदमार्ग कंहा गया कौन उसको नया धारण करता है, आकाश पृथ्वी मेरे इसको जानो, ध्यान दो।
[ऋग्वेद: 1:105:4]
“यज्ञम पृच्छामयवम स तददूतो विवोचति
क्व ऋतं पूवयम गतम
कस्तदूविभर्ति नूतवो वित्तम मे अस्य रोदसी”
(वह दूत स्पष्ट करता है सबसे नीचे सबसे बाद यज्ञ को पुराने समय का सदमार्ग कंहा गया जानो कौन उसको नया धारण करता है! मैं पूछता हूँ, सब से नीचे, सब से बाद, यज्ञ को, उसको, वह दूत, स्पष्ट करता है, पुराने समय का, सदमार्ग, कँहा, गया, कौन, उसको, नया, धारण करता है, आकाश पृथ्वी, मेरे, इसको, जानो, ध्यान दो।)
{मैं सबसे बाद वाले यज्ञ का प्रश्न पूछता हूँ। वह दूत उस को स्पष्ट करता है। पूर्व ईश्वरीय विधान कंहा गया। कौन उसको नया करके धारण करेगा। आकाश, पृथ्वी मेरी इस वेदना का पर ध्यान दो। }
[ऋग्वेद 1:105:4]
श्रेष्ट ज्ञानी, अविनाशी कवि, प्रदीप्तियुक्त देह वाली अग्नि को अरणी मंथन से प्रकट करो। तुम यज्ञ कर्म में मनुष्यों का नेतृत्व करने वाले हो। .. उन्हें प्रारंभ में प्रकट करो।
[ऋग्वेद: 3: 29: 5]
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And this is the record of John, when the Jews sent priests and Levites from Jerusalem to ask him, who are you? And he confessed, and denied not, but confessed, I am not the Christ. And they asked him, what then? Are you Elias? And he said, I am not. Are you that prophet? And he answered, No.
[Joh:1:19-21] {Yahya AS}
मैं उनके लिए उनके भाइयों के बीच में से (मूसा की तरह) एक नबी उत्पन्न करूंगा, अपना वचन उसके मुंह मे डालूंगा, जिस बात की आज्ञा दूंगा, वह उसको (मनुष्यों को) कह सुनायेगा।
[Old Testament: Deuteronomy: 18:18]
मैं तुम्हें बपतिस्म के लिए पानी से बपतिस्मा देता हूँ ताकि तुम पापों से पश्चाताप करो। परन्तु मेरे बाद जो आने वाला है, वह मुझसे शक्तिशाली है। मैं उसकी जूती उठाने के योग्य नहीं। वह तुम्हे पवित्र आत्मा और आग (by force) से बप्तिस्म देगा।
[St. Matthew: 3:11]
गौतम बुद्ध ने शिष्य नंदा से कहा कि न मैं पहला बुद्ध हूँ और न आखरी। मेरे बाद एक और बुद्ध आएगा, उसका नाम मैत्रय होगा।
[गॉस्पेल ऑफ बुद्ध: लेखक केरस: पृष्ठ 217]
अगले बुद्ध की विशेषताएं ये होंगी: रात को ज्ञान की प्राप्ति होगी।
पूर्ण ज्ञान प्राप्ति पर चमकदार दिखेगा। प्रकृतिक मृत्यु होगी। मृत्यू रात में होगी। मृत्यु से पहले चमकदार दिखेगा। मृत्यु के बाद धरती पर नही रहेंगे।
(बौद्धधर्म)
वह 7वीं सदी विक्रमी में पैदा होगा, उसके 4 पवित्र ख़लीफ़ा होंगे, उस पर ईमान वालों की संख्या बहुत होगी। मुहम्मद बिना किसी की निजात नहीं होगी।
[संग्राम पुराण: खंड 12: अध्याय 6, तुलसीदास अनुवाद]
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महामद इति ख्यात:
उसका नाम महामद होगा।
[भविष्यपुराण: प्रतिसर्गपर्व, भाग 3: 3:3:5]
अहमिधि पितु:
वह अहमद नाम से जाना जाएगा।
[सामवेद:2:6:8]
न्यूह समृतो विष्णु भक्तसमोअ हंध्यानपरायण:
[भविष्यपुराण: प्रतिसर्गपर्व]
Once Lord appeared in dream and said that Nyuh there would be a devastation on the 7th day so make a boat and ride in it.
[भविष्यपुराण: प्रतिसर्ग पर्व: अध्याय 4 - 7]???
अरब में मुहम्मद जन्म लेगा, राजा भोज ने कबबेश्वर के मंदिर में पूजा की। लिंग कटा होगा, शिखण्डी नहीं होगी, दाढ़ी रखेंगे, मांस खाएंगे।
[भविष्यपुराण: प्रतिसर्ग भाग: 3: 35-27]???
वेदाहमेंत पुरुषं महानतमादित्यवर्ण तमस: परस्तात
अहमद वेद (ब्रह्मज्ञान) है, महानतम पुरष है, सूर्यरूप दीप्तिमान, अंधकार को परास्त करने वाला
[यजुर्वेद: 31:18]
अज्ञान हेतु कृत मोहमदान्धकार नाशं विधायम हि तदो दयते विवेक:
जिस जीवन का कोई अंत नहीं, उसके काल में जब सामूहिक भलाई के ज्ञानों के द्वारा मनुष्यों पर सत्य के लाभों का समय आएगा तो मुहम्मद द्वारा अंधेरे छट जाएंगे और सुझभुज और तत्वदर्शिता का प्रकाश चमकेगा।
{जब जन्म जन्मान्तरों में सार्वजनिक कल्याण के उदय होने से मानव को सत्य का आध्यात्मिक लाभ प्राप्त होने वाला हो, तब मोहम्मद के माध्यम से अंधकार का नाश होकर विवेक की ज्योति का उदय होगा।}
[श्रीमदभागवत महापुराण:2:76]
[श्रीमद्भागवत : महात्म्य: 2:76]
न मे विदु: सुरगणा: प्रभवं न महर्षय: |
अहमादिर्हि देवानां महर्षीणां च सर्वश:
Neither of host of the demigods nor the great sages know my origin. Ahmed is the name of a man who will demolish demigods and demi sages.
[Geeta:10:2]
कलयुग में कल्कि आएंगे, सही रास्ता दिखाएंगे। विष्णुयाश, सुमति। अमन के शहर में पैदा। खानदान शहर का चीफ, 4 दोस्त , पहली वही गुफा में, रात को आएगी पहली वही, पश्चिन जाके आयंगे।
(कल्कि पुराण: अध्याय 2: श्लोक 4, 5, 7, 11, 15) &
(भगवत पुराण: vol no.2, verse no. 18-25)
By Dr. Zakir Naik
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महामद तस्य संदेष्था अस्ति.
भारत : जगद्गुरु : आसीत्
4 ब्रह्मसूत्र:
एकम ब्रह्म द्वितीय नास्ति। ब्रह्म जगदोद्भव कारणम। ब्रह्म सत्य जगतं मितथ्या। अहम ब्रह्मास्मि
अहं ब्रह्मास्मि - "मैं ब्रह्म हूँ" ( बृहदारण्यक उपनिषद १/४/१० - यजुर्वेद)
तत्त्वमसि - "वह ब्रह्म तू है" ( छान्दोग्य उपनिषद ६/८/७- सामवेद )
अयम् आत्मा ब्रह्म - "यह आत्मा ब्रह्म है" ( माण्डूक्य उपनिषद १/२ - अथर्ववेद )
प्रज्ञानं ब्रह्म - "वह प्रज्ञानं ही ब्रह्म है" ( ऐतरेय उपनिषद १/२ - ऋग्वेद)
सर्वं खल्विदं ब्रह्मम् - "सब ब्रह्म ही है" ( छान्दोग्य उपनिषद ३/१४/१- सामवेद )
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समानता
अद्धा देव महाम असि
ईश्वर निश्चय ही महान है
(अथर्ववेद: 20.58.3)
धरती में जितने वृक्ष हैं, यदि वे क़लम हो जाएँ और समुद्र उसकी स्याही हो जाए, उसके बाद सात और समुद्र हों, तब भी अल्लाह के बोल समाप्त न हो सकेंगे। निस्संदेह अल्लाह अत्यन्त प्रभुत्वशाली, तत्वदर्शी है।
(क़ुरान: 31:27)
अर्ज़उल्लाह
अल्लाह की ज़मीन
(क़ुरान)
"अल खलक़ो अयालुल्लाह"
समस्त मानवजाति अल्लाह का परिवार है।
[मुसनद अल बज़्ज़ार हदीस]
“The entire earth has been made a mosque or place of prayer.
[Bukhari & Tirmidhi]
Quran: 3:96: Indeed the first house (for bonding with God) that was built for people.
كُنتُمْ خَيْرَ أُمَّةٍ أُخْرِجَتْ لِلنَّاسِ
3.110. (O Community of Muhammad!) You are the best community ever brought forth for (the good of) humankind, enjoining and promoting what is right and good, and forbidding and trying to prevent evil.
"जो कोई आख़िरत की खेती चाहता है, हम उसके लिए उसकी खेती में बढ़ोत्तरी प्रदान करेंगे और जो कोई दुनिया की खेती चाहता है, "हम उसमें से उसे कुछ दे देते है," किन्तु आख़िरत में उसका कोई हिस्सा नहीं (20)
(क़ुरान : सूरह अश-शूरा)
"तुम्हें जो चीज़ भी मिली है वह तो सांसारिक जीवन की अस्थायी सुख-सामग्री है। किन्तु जो कुछ अल्लाह के पास है वह उत्तम है और शेष रहनेवाला भी, वह उन्ही के लिए है जो ईमान लाए और अपने रब पर भरोसा रखते है; (36)
(क़ुरान : सूरह अश-शूरा)
गुमराही में पड़कर अन्य देवी देवताओं की पूजा करने वालों की श्रद्धा उन्हीं देवी देवताओं में स्थिर कर देने और उन लोगों को परम धाम न प्राप्त होने की बात आप सूरह अश-शूरा की इस आयत में पढ़ेंगे "जिस व्यक्ति को अल्लाह गुमराही में डाल दे, तो उसके पश्चात उसे सम्भालनेवाला कोई भी नहीं। तुम ज़ालिमों को देखोगे कि जब वे यातना को देख लेंगे तो कह रहे होंगे, "क्या लौटने का भी कोई मार्ग है?(44)
(क़ुरान : सूरह अश-शूरा)
इसी तरह परमेश्वर अदृश्य है उसकी कोई मूर्ति नही है, ये बात इसी सूरह की इस आयत में है "किसी मनुष्य को संसार में ये अधिकार प्राप्त नही है, नहीं कि अल्लाह उससे बात करे, सिवाय इसके कि प्रकाशना के द्वारा या परदे के पीछे से (बात करे) । या यह कि वह एक रसूल भेज दे, फिर वह उसकी अनुज्ञा से जो कुछ वह चाहता है प्रकाशना कर दे। निश्चय ही वह सर्वोच्च अत्यन्त तत्वदर्शी है (51)
(क़ुरान : सूरह अश-शूरा)
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असितगिरिसमं स्यात्कज्जलं सिन्धुपात्रे सुरतरुवरशाखा लेखनी पत्रमुर्वी
लिखति यदि गृहीत्वा शारदा सर्वकालं तदपि तव गुणानामीश पारं न याति।।
(श्री शिवमहिमन् स्तोत्रम्: 32)
यदि समुद्र को दवात बनाया जाय, उसमें काले (कृष्ण) पर्वत की स्याही डाली जाय, कल्पवृक्ष के पेड की शाखा को लेखनी बनाकर और पृथ्वी को कागज़ बनाकर स्वयं ज्ञान स्वरूपा माँ सरस्वती दिनरात आपके गुणों का वर्णन करें तो भी आप के गुणों की पूर्णतया व्याख्या करना संभव नहीं है।
"परि माग्ने दुश्चरिताद बाधस्वा मा सुचरिते भज। उदायुषा स्वायुषोदस्थाममृताँअअनु"
हे ज्ञानस्वरूप परमात्मा! आप हमें दुष्कर्मों से दूर हटाकर सत्कर्मों में स्थिर कर दें, जिससे सत्पुरुषों के उत्तम मार्ग का अनुसरण करते हुए हम उत्कृष्ट जीवन प्राप्त कर पाएं।
{हे ईश्वर! जिन कर्मों से, मैं प्राण धारण करने वाले जीवन से मुक्त हो सकूं और जिनसे, मैं मोक्ष प्राप्त किए हुए विद्वानों व मोक्षरूपी आनंदों को प्राप्त कर सकूं, उनसे मुझे जोड़ दीजिए। दुष्ट आचरण से मुझको दूर कर दीजिए और उत्तम धर्म आचरण युक्त व्यवहार में मुझको स्थापित कर दीजिए।}
[यजुर्वेद: 4:28]
"सर्वे भवन्तु सुखिनः सर्वे सन्तु निरामयाः।
सर्वे भद्राणि पश्यन्तु मा कश्चिद् दुःखभाग्भवेत्॥"
हे ईश्वर, सभी सुखी होवें, सभी रोगमुक्त रहें, सभी मंगलमय घटनाओं के साक्षी बनें और किसी को भी दुःख का भागी न बनना पड़े!
[शान्तिंपाठ मंत्र]
ॐ असतो मा सद्गमय।तमसो मा ज्योतिर्गमय।मृत्योर्माऽमृतं गमय।ॐ शान्ति: शान्ति: शान्ति: ॥
(बृहदारण्यकोपनिषद् 1.3.28।)
मुझे असत्य से सत्य की ओर ले चलो। मुझे अन्धकार से प्रकाश की ओर ले चलो। मुझे मृत्यु से अमरता की ओर ले चलो.
(यह मन्त्र मूलतः सोम यज्ञ की स्तुति में यजमान द्वारा गाया जाता था)
असितगिरिसमं स्यात्कज्जलं सिन्धुपात्रे सुरतरुवरशाखा लेखनी पत्रमुर्वी
लिखति यदि गृहीत्वा शारदा सर्वकालं तदपि तव गुणानामीश पारं न याति।।
(श्री शिवमहिमन् स्तोत्रम्: 32)
यदि समुद्र को दवात बनाया जाय, उसमें काले (कृष्ण) पर्वत की स्याही डाली जाय, कल्पवृक्ष के पेड की शाखा को लेखनी बनाकर और पृथ्वी को कागज़ बनाकर स्वयं ज्ञान स्वरूपा माँ सरस्वती दिनरात आपके गुणों का वर्णन करें तो भी आप के गुणों की पूर्णतया व्याख्या करना संभव नहीं है।
श्री कृष्ण महाभारत के कर्ण पर्व, खंड 69 श्लोक 33 और 34 मे बताते हैं
"विवाह के समय, किसी स्त्री के साथ आनंद लेते हुए, या जब किसी का जीवन खतरे में हो, या जब किसी व्यक्ति की सारी संपत्ति हड़पे जाने का भय हो, और एक ब्राह्मण के लिये भी झूठ बोला जा सकता है।"
[झूठ के ये पांच प्रकार निष्पाप घोषित किये गये हैं । इन अवसरों पर झूठ सच्चाई बन जाएगा और सच झूठ बन जाएगा।]
समानी प्रपा सहवोऽन्भागः समाने योषत्रे सहवो युनाज्मि।
सम्यंचोऽग्नि सपर्य्यतारा नाभिमिवा भितः।
(तुम्हारा पीने के पदार्थ, जल दूध आदि एक समान हो, अन्न भोजन आदि समान हो, मैं तुम्हें एक साथ एक ही कर्त्तव्य के बन्धन में जोड़ता हूँ। जिस प्रकार पहिये की अक्ष में आरे जुड़े होते हैं उसी पर आपस में मिलजुलकर परोपकारी सदाचारी विद्वान के नेतृत्व में चलो)
{तुम्हारा पीने का स्थान एक हो, तुम्हारे अन्न का भाग भी साथ साथ हो। और मिलजुल कर उस प्रभु का पुजन करो।)
[अथर्वद 3:30:6]
संगच्छध्वं संवदध्वं सवो मनाँसि जानताम्।
देवा भागं यथा पूर्वे संजानाना उपासते॥
(आपस में मिलों, संवाद करो, जिससे तुम्हारे मन एक ज्ञान वाले हों, जैसा कि तुमसे पहले के विद्वान एक मन होकर अपना कर्तव्य करते हैं।)
[ऋग॰ 10:191:2]
यथा नः सर्व इज्जनोऽनमीवः संगमें सुमना असत्।
(हम सब का व्यवहार इस तरह का हो कि जिससे सबके सब मनुष्य हमारे संग में रोग रहित होकर, उत्तम मान वाले, हमारे प्रति सद्भाव करने वाले हो जावें।)
[यजुर्वेद 33:86]
मित्रस्यमा चक्षुषा सर्वाणि भूतानि समीक्षन्ताम।
मित्रस्याहं चक्षुषा सर्वाणि भूतानि समीक्षे।
मित्रस्य चक्षुषा समीक्षा महे।
(मुझे प्राणिमात्र मित्र की दृष्टि से देखें। अर्थात् कोई भी प्राणी मेरे से द्वेष न करे। मैं प्राणिमात्र को मित्र की दृष्टि से देखूँ)
[यजुर्वेद 36:18]
यांश्च पश्यामि यांश्च न। तेषु मा सुमतिं कृधि ॥
(अथर्व० १७.१.७ )
मैं जिन प्राणियों को देखता हूं और जिन प्राणियों को नहीं देखता अर्थात दृश्य और अदृश्य सभी प्राणियों के प्रति मेरे मन में प्रेम और सद्दभावना रहे।
विश्वा उत त्वया वयं धारा उदन्या इव।
अति गाहेमहि द्विषः ॥
(ऋग्वेद 2.7.3)
जल की धारा जैसे एक स्थान छोड़कर अन्यत्र चली जाती है, वैसे ही हम द्वेषभाव छोड़कर मैत्रीभाव को प्राप्त हों ।
युयोध्यस्मद् द्वेषांसि।
हे प्रभु, तू हमें द्वेषपूर्ण कार्यों से मुक्त रख।
(ऋग्वेद 2.6.4)
पिपर्तु नो अदिती राजपुत्राऽति द्वेषांसि।
राजमाता अदिति हमें द्वेषों से परे ले जाय।
(ऋग्वेद 2.27.7)
स नः पर्षदति द्विषः ।
(ऋ० १०.१८७.१, अथर्व० ६.३४.१)
बह (अग्नि) हमें द्वेषों से पार लगायेगा।
इन्द्रो अस्मे आराच्चिद् द्वेषः सनुतयूरयोतु ।
(ऋ० ६.४७.१३, १०.१३१.७, यजु० २०.५२)
वह इंद्र हमारे द्वेष को दूर ही रखे।
मित्रस्य मा चक्षुषा सर्वाणि भूतानि समीक्षन्ताम् ।
मित्रस्याहं चक्षुषा सर्वाणि भूतानि समीक्षे।
मित्रस्य चक्षुषा समीक्षामहे ॥
(यजु० ३६.१८)
सब प्राणी मुझे मित्र की दृष्टि से देखें। मैं भी सब प्राणियों को मित्र की दृष्टि से देखूं। यों हम सभी परस्पर मित्रदृष्टि से देखें।
असपत्ना: प्रदिशो मे भवन्तु, न वै त्वा दिविष्मो अभयं नो अस्तु।
(अथर्व० १९.१४.१)
सभी दिशाएं मेरे लिए शत्रुरहित हो जाएं। यह सब जानते हैं कि आपसे देष नहीं करते। हमारे लिए सर्वत्र अभय-ही-अभय हो जाये।
तन्मे मनः शिवसङ्कल्पमस्तु ।
(यजु० ३४.१)
मेरा मन शिवसंकल्प, यानी सदा शुभ संकल्प करने वाला, हो जाय ।
अन्यत्र पापीरप वेशया धियः।
(अथर्व० ९.२.२५)
जो पापमयी बुद्धि और संकल्प हैं, उनको हम से दूर कर दे। वैदिक ऋषि यह भी खूब समझता है कि कड़वे बोल से द्वेष और दुर्भावना जागती है, मैत्री और प्यार नहीं।
उग्रं वचो अपावधीत् ।
(यजुर्वेद 5.8)
कड़वी बात मुँह से मत निकालो।
ता नः प्रजाः सं दुहरतां समग्रा वाचो मधु पृथिवि धेहि मह्माम
(अथर्व० १२.१.१६)
हे पृथ्वीमाता, तुझ पर रहने वाले सभी प्राणी मूझसे प्रेम करें। तू मेरी वाणी में मधु घोल दे।
जिह्वाया अग्रे मधु मे जिह्वामूले मधूलकम्।
ममेदह क्रतावसो मम चित्तमुपायसि ॥
(अथर्व० १.३४.२)
मेरी जिह्वा के अग्रभाग में मिठास होवे और जिह्वा के भी अधिक मिठास, मिठास का झरना होवे। हे मधु! तू अवश्य ही मेरे प्रत्येक कर्म में, बुद्धि में विद्यमान रह और तू मेरे चित्त प्रदेश तक पहुँच जा, में और व्याप्त हो जा।
ऋतस्य पथा प्रेत।
ऋत के पथ पर चलें।
(यजु० ७.४५)
पुमान्पुमांसं परि पातु विश्वतः।
(यजुर्वेद 29.51)
मनुष्य का कर्तव्य है कि वह मनुष्यमात्र की सेवा, सहायता और रक्षा करे।
माता भूमिः पुत्रो अहं पृथिव्याः ।
(अथर्व० १२.१.१२)
पृथ्वी मेरी माता है। मैं उसका पुत्र हूं।
(इस धरती माता पर जो जन्मे हैं सभी उसके पुत्र हैं। अत: सभी मेरे नहोदर हैं, सगे भाई हैं। सभी वसुधापुत्र मानवों का यह कुनबा है, कुटुंब है। सब अपने हैं। कोई पराया नहीं है।)
प्र भ्रातृत्वं सुदानबोऽध द्विता समान्या। यातुर्गभ्भि भरामहे ।
(ऋग्वेद 8.83.8)
मातृगर्भ से ही हमें परस्पर भाईचारे का, सहोदरों का सा, भ्रातृत्वभाव मिला है। दूसरों के साथ मिल बॉटकर खाने का, साथ रहते का गुण हमें अपने जन्म से ही मिला है।
उद्बध्यध्वं समनसः सखायः ।
(ऋग्वेद 10.101.1)
मित्रो, सभी समान चित्त वाले होकर उठीो!
सं गच्छध्वं सं वदध्वं सं वो मनांसि जानताम् ।
(ऋग्वेद 10.191.2)
सब लोग मिल कर साथ-साथ चलें। एक उद्देश्य से परस्पर मिलें। खुले हृदय और खुले मन से मिल कर बातें करें। सबके मन एक हों।
सखाय आ नि षीदत।
हे मनुष्यो, तुम परस्पर सदैव मैत्रीभाव रखो।
(ऋ० १.२२.८)
मा कस्य नो अररुषो धूर्तिः प्रणङ् मत्त्यस्य
हम किसी दुष्ट मनुष्य का भी अनिष्ट-चिंतन न करें!
(ऋग्वेद 7.94.8)
मो अहं द्विषते रधम्
(ऋ० १.५०.१३)
मुझसे जो व्यक्ति द्वेष करता है, उस पर भी मैं किसी प्रकार का प्रहार न करू!
अद्या मुरीय यदि यातुधानो अस्मि । यदि बायुस्ततप पूरूषस्य॥
(अथर्व० ८.४.१५)
मैं यदि किसी व्यक्ति को कष्ट दूं, किसी को पीड़ा पहुँचाऊं, या किसी के जीवन में आग लगाऊं, तो मैं आज ही (क्यों न) मर जाऊं!
वसुधैव कुटुम्बकम्
(पूरा संसार एक परिवार है।)
आत्मनः प्रतिकूलानि परेषां ना समाचरेत।
सुनो! अच्छे जीवन का सार है: दूसरों के साथ वह न करें जो आप अपने साथ होना पसंद नहीं करेंगे।
(महाभारत, अनुशासनपर्व/ पद्मपुराण, शृष्टि १९.३५७--३५८)??
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जैन धर्म
● नमो अरिहंताणं, नमो सिद्धाणं, नमो उवज्झायाणं, नमो आयरियाणं, नमो लोए सव्वसाहूणं,
(I bow to Perfect Humans, I bow to liberated souls, I bow to आचार्य, I bow to गुरु, I bow to साधु साध्वी।
● तेरे लिए तो अर्हन ही काफी है।
●
उन भूमियों में नरक है। वे नरक नित्य (निरन्तर) अशुभतर लेश्या, परिणाम, देह, वेदना और विक्रिया वाले है। परस्पर उत्पन्न किये गए दुःखवाले है।
[तत्त्वार्थसूत्र : 3 : 2-4]
सौधर्म से अच्युत तक बारह स्वर्ग (देवलोक) है जिन्हें कल्प कहा जाता है।
[तत्त्वार्थसूत्र : 4 : 3]
अधोलोक (नरक), मध्यलोक (धरती) और ऊधर्वलोक (स्वर्ग) तीन लोकों का वर्णन।
[तत्त्वार्थसूत्र : अध्याय 3-4]
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बौद्ध धर्म
● To be a true disciple of Buddha, one needs to devoutly recite Trisharan Mantra i.e.
बुद्धम शरणं गच्छामि: धम्मम शरणं गच्छामि: संघम शरणं गच्छामि:
I surrender to the Awakened One (जागृत, ज्ञान प्राप्त मनुष्य).
I surrender to the Law of Nature (प्रकृति, जीवन का महानियम).
I surrender to the Group of Enlightened People (संगी, साधकों का समूह).
मैं बुद्ध की शरण मे जाता हूँ। मैं धम्म की शरण मे जाता हूँ। मैं संघ की शरण में जाता हूँ।
(यंहा सभी 29 बुद्ध से अभिप्राय है। धम्म अर्थात बुद्ध का या प्रकृति का धर्म। संघ मतलब बौद्ध साधकों का समूह)
● अप्प दीपो भव:
अपना दीपक अर्थात प्रकाश स्वयं बनो।
● शिक्षित बनो, संगठित रहो, संघर्ष करो
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"इथ तप्पति पेच्य तप्पति, पापकारी उभयत्थ तप्पति
इध नन्दति पेच्च नन्दति, कतपुञ्ञजो उभयत्थ नन्दति"
Idh Tappati Pecch Tappati, Paapkari Ubhyatth Tappati
Idh Nandti Pecch Nandti, Kat Puccho Ubhyatth Nandti
(जो पापकारी है वह यंहा भी संतापित होता है और मरणोपरांत परलोक में भी संतापित होता है। जो पुण्यकारी है, वह यहां इस लोक में भी आनंदित होता है, और मरणोपरांत परलोक में भी आनंदित होता है)
[धम्मपद:यमकवग्गो/1:17-18]
"अपि चाहं, आवुसो, इमस्मियेव ब्याममत्ते कळेवरे ससञ्जिम्हि समनके
लोकञ्च पञ्जपेमि लोकसमुदयञ्च लोकनिरोधञ्च लोकनिरोधगामिनिञ्च
पटिपदन्ति"
{सारे लोक इसी साढ़े तीन हाथ की काया में समाये हुए हैं।}
(अधोगति से लेकर अरूप व्रह्मलोक के अग्रतम लोकों तक सभी इकत्तीस लोकों की अनुभूतियों में से साधक गुजरता है। अधोलोकों में कितनी असह्य दुःखद अनुभूति होती है, इसका वह स्वयं साक्षात्कार करता है। कभी कामलोक की सुखद अनुभूति होती है, उसका साक्षात्कार करता है और कभी ब्रह्मलोकों की शांतिपरक स्थिति का साक्षात्कार करता है। यो अनुभूति द्वारा इन लोकों की उपस्थिति को स्वीकार करते हुए इन नास्तिकों के जंजाल से मुक्त होता है।)
[ससंयुक्त निकाय: १.१.१०७, रोहितस्ससुत्तं]
"न हेत्थ देवो ब्रह्मा वा, संसारस्सत्थिकारको।
सुद्धधम्मा पवत्तन्ति, हेतुसम्भारपच्चया॥"
(संसार को बनाने वाला न कोई देव है, न कोई ब्रह्मा । धर्मनियामता, यानी, कारण और परिणाम के निश्चित नैसर्गिक नियमों के आधार पर धर्म का स्वभाव ही प्रवर्तमान होता रहता है।)
[विसुद्धिमगग: २.६८९, कङखवितरणविसुद्धिनिद्देसो]
एसो अधम्मो दण्डानं, ओक्कन्तो पुराणो अहु।।
अदूसिकायो हञ्जन्ति, धम्मा धंसन्ति याजका ॥
(बुद्ध ने कहा की यह हिंसारूपी अधर्म पुराने समय से अब तक चला आ रहा है। पुरोहित निर्दोष गौवों की हत्या करते है और धर्म से भ्रष्ट होते है)
[सुत्तनिपात: २९७-३००, ३०५, ३१०-३१४, ब्राह्मणधम्मिकसुत्तं)
"अयमन्तिमा जाति"
(यह मेरा अंतिम जन्म है)
"चरिमो वत्तते भवो"
(यह मेरा अंतिम भव है।)
"नत्थिदानि पुनबभवोति"
(अब पुनः जन्म नहीं होगा)
{बुद्ध के जीवन मे विपश्यना के द्वारा सैंकड़ों लोगों ने इस अवस्था को प्राप्त कर ऐसे ऊपर दीए उद्घार प्रकट किये}
एतं बुद्धानसासनं ।
(दी०नि० २.९०, महापदानसुत्तं)
सभी बुद्धों की यही शिक्षा है ।
"यावज्जीवेत् सुखं जीवेत्, ऋणं कृत्वा घृतं पिबेत"
[ब्रहसप्तयसूत्र: ४५]
(जब तक जियें सुखनसे जिएं, पिएं घी ही चाहे ऋण लेकर ही पिएं)
"यदा जीवेत सुखं जीवेत, ऋणं कृत्वा, घृतं पिबेत्"
(जब तक जीओ सुख से जीओ, उधार लो और घी पीयो।)
"यावज्जीवेत सुखं जीवेद ऋणं कृत्वा घृतं पिवेत, भस्मीभूतस्य देहस्य पुनरागमनं कुतः"
(जब तक जीना चाहिये सुख से जीना चाहिये, अगर अपने पास साधन नहीं है, तो दूसरे से उधार लेकर मौज करना चाहिये, शमशान में शरीर के जलने के बाद शरीर को किसने वापस आते देखा है?)
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ईसाई धर्म
यहोवा वास्तव में परमेश्वर है। जीवित परमेश्वर और सदा का राजा वही है। (बाईबिल: यरमियाह: 10: 10)
परमेश्वर मनुष्य नहीं है की वह जूठ बोले और न वह मनुष्य पुत्र है की वह अपना निर्णय बदले। यदि यहोवा कुछ कहता है तो अवश्य करता है।
(बाइबिल: गिनती: 23:19)
आप लोगों ने उसका वचन कभी नही सुना और न तुमने उसका रूप ही देखा है।
(बाईबिल: यहुन्ना: 5:37)
इसके बाद परविद्या है जिससे वह अविनाशी कभी न मरने वाला परमेश्वर जाना जाता है। अब उस सनातन सम्राट, अविनाशी अदृश्य एक मात्र परमेश्वर का आदर और महिमा युग युगांतर होती रहे। आमीन।
(बाइबिल प्रo तिमोतीo :1:17)
(परमेश्वर के) तुम न कोई पुतले बनाओगे। न कोई मूर्ति बनाओगे।
(बाइबिल: लैव्य: 26:1)
तब परमेश्वर ने मूसा से कहा, मैं यहोवा हूँ। इब्राहिम,इस्हाक़, याक़ूब, मुझे एल सददायी यानी सर्वशक्तिमान ईश्वर के नाम से जानते थे। मैंने उन्हें नहीं बताया की मेरा नाम यहोवा भी है।
(बाइबिल: निर्गमन: 6: 2-3)
तुम ईश्वर को किस के समान बताओगे और उसकी उपमा किस से दोगे।
(बाइबिल: यशयाह: 40:18)
Jesus said to him, why so you call me good, no one is good but God alone.
(Mk. 10:18)
I can of myslef do nothing. As I hear, I judge, and my judgement is righteous, because I do not seek my own will but the will of the father who sent me.
(JN: 5:3)
Jesus said , the Lord our God the Lord is one.
[Gospel of Mark: 12:29]
[Duet:6:4]
Jesus said Worship the Lord your God and serve him only.
[Luke:4:8]
I am th God and there is non else.
I am the God and there is non like me.
[Isaiah: 46 : 9]
I am the Lord and there is no other. Apart from me, there is no God. There in non besides me.
[Isaiah: 45: 5-6, NIV]
God is not a man nor his son of a man.
[Numbers: 23:19]
Jesus is servant of God.
[Act: 4 : 27]
Jesus is prophet of God.
[Luke: 24: 19]
You must kill and destroy those who worship another God.
[Exodus: 22:20]
Thou shall not commit adultery.
[Exodus: 20: 14]
When you fast, do not look somber as the hypocrites do.
[Matthew: 6: 1-18]
Jesus fasted for 40 days for drawing near to God.
[Matthew: 4: 1-11 & Luke: 4: 1-13]
Jesus said that his disciples would fast after his departure.
[Luke : 5: 33-35]
Moses fasted for 40 days for the sake of God.
[Deuteronomy: 9: 18-19]
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सिक्ख धर्म
एक ओंकार सतनाम कर्तापुरख निर्भय निरवैर अकालमूरत अजूनी सैभं गुरप्रसाद
[आदिग्रंथ: जापुजी: मूलमंत्र]
अव्वल अल्लाह नूर उपाया कुदरत के सब बंदे, एक नूर ते जग उपजया कौन भले कौन मंदे।
मानस की जात सभै एकै पहिचानबो (गुरु गोबिंद सिंह)
बोलेसो निहाल सत्य श्री अकाल।
चिड़ियानाल बाज़ लड़ावा, ते गुरुगोबिंद नाम धारावा.
पहला नाम खुदा का, दूजा नाम रसूल। तीजा कलमा पढ़ी नानक दरगाह परे कबूल। दिहटा नूर मुहम्मदी दिहटा नबी रसूल, नानक कुदरत देखकर सुदी गयो सब भूल।
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ऐसे लोग जो सच्चे ईश्वर का सुमिरण नहीं करते या घमण्ड करते हैं उनका दण्ड ये है कि वो मरने के बाद चौरासी लाख जूनियों (प्रजातियों :- यानि अलग अलग जानवरों के रूप मे मनुष्य रूप मे नहीं ) मे जन्म लेकर बार बार बुरी तरह से मरते रहेंगे (Guru Granth Sahib Ji, 88)
इसके अतिरिक्त गम्भीर पाप करने वाले को बिना किसी पुनर्जन्म सीधे ईश्वर की अदालत मे दण्ड दिया जाएगा ( First Mehl: Raag Raamkali )
और पुण्य कार्य करने वाले और एक ईश्वर के प्रति समर्पित व्यक्तियों की मौत के बाद उनके चेहरे हमेशा ईश्वर के लोक मे चमकते रहेंगे यानि वे लोग सदा सदा के लिए स्वर्ग मे रहेंगे (Guru Granth Sahib Ji, 28).
ਰਾਗੁ ਤਿਲੰਗ ਮਹਲਾ ੧ ਘਰੁ ੧
रागु तिलंग महला १ घरु १
Rāg ṯilang mėhlā 1 gẖar 1
Raag Tilang, First Mehl, First House:
ਦੁਨੀਆ ਮੁਕਾਮੇ ਫਾਨੀ ਤਹਕੀਕ ਦਿਲ ਦਾਨੀ ॥
दुनीआ मुकामे फानी तहकीक दिल दानी ॥
Ḏunīā mukāme fānī ṯėhkīk ḏil ḏānī.
The world is a transitory place of mortality - know this for certain in your mind.
ये दुनिया थोड़े समय की है और खत्म हो जाने वाली जगह है, इस बात को निश्चित जान लेना चाहिए ।
ਮਮ ਸਰ ਮੂਇ ਅਜਰਾਈਲ ਗਿਰਫਤਹ ਦਿਲ ਹੇਚਿ ਨ ਦਾਨੀ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
मम सर मूइ अजराईल गिरफतह दिल हेचि न दानी ॥१॥ रहाउ ॥
Mam sar mūe ajrāīl girafṯėh ḏil hecẖ na ḏānī. ||1|| rahāo.
Azraa-eel, the Messenger of Death, has caught me by the hair on my head, and yet, I do not know it at all in my mind. ||1||Pause||
इज़राईल ( मौत का फरिश्ता ) मुझे किसी समय मेरे सर के बालों से पकड़ ले जाएंगे , पर फिर भी अभी मै ये सब अपने मन मे नहीं सोचता ।
ਜਨ ਪਿਸਰ ਪਦਰ ਬਿਰਾਦਰਾਂ ਕਸ ਨੇਸ ਦਸਤੰਗੀਰ ॥
जन पिसर पदर बिरादरां कस नेस दसतंगीर ॥
Jan pisar paḏar birāḏarāʼn kas nes ḏasṯaʼngīr.
Spouse, children, parents and siblings - none of them will be there to hold your hand.
जीवन साथी, औलाद, मात-पिता और भाई, वहाँ कोई तुम्हारा हाथ थामने के लिए नही होगा ।
ਮ: ੧॥
Ma 1 ||
म: १॥
First Mehl:
1 ਅਮ੍ਰਿਤ ਕੀਰਤਨ ਗੁਟਕਾ: ਪੰਨਾ ੭੬੨ ਪੰ. ੯
Raag Raamkali Guru Nanak Dev
ਨਾਨਕੁ ਆਖੈ ਰੇ ਮਨਾ ਸੁਣੀਐ ਸਿਖ ਸਹੀ
नानकु आखै रे मना सुणीऐ सिख सही ॥
Nānak ākẖai re manā suṇīai sikẖ sahī.
Says Nanak, listen, O mind, to the True Teachings.
बाबा नानक कहते हैं कि हे मन सच्ची शिक्षा सुन.
ਲੇਖਾ ਰਬੁ ਮੰਗੇਸੀਆ ਬੈਠਾ ਕਢਿ ਵਹੀ
लेखा रबु मंगेसीआ बैठा कढि वही ॥
Lekẖā rab mangesīā baiṯẖā kadẖ vahī.
Opening His ledger, God will call you to account
तेरे कर्मो का खाता खोलकर रब तुझसे तेरे कर्मो का हिसाब मांगेगा
ਤਲਬਾ ਪਉਸਨਿ ਆਕੀਆ ਬਾਕੀ ਜਿਨਾ ਰਹੀ ।।
तलबा पउसनि आकीआ बाकी जिना रही ॥
Ŧalbā pausan ākīā bākī jinā rahī.
Those rebels who have unpaid accounts shall be called out.
ईश्वर के जिन विद्रोहियों के कर्मो का बदला देना बाकी रह गया होगा, वे लोग पुकारे जाएंगे.
ਅਜਰਾਈਲੁ ਫਰੇਸਤਾ ਹੋਸੀ ਆਇ ਤਈ
अजराईलु फरेसता होसी आइ तई ॥
Ajrāīl faresṯā hosī āe ṯaī.
Azraa-eel, the Angel of Death, shall be appointed to punish them.
मौत के फरिश्ते इज़राईल को उन लोगों को यातना देने के लिए नियुक्त किया जाएगा .
ਆਵਣੁ ਜਾਣੁ ਨ ਸੁਝਈ ਭੀੜੀ ਗਲੀ ਫਹੀ
आवणु जाणु न सुझई भीड़ी गली फही ॥
Āvaṇ jāṇ na sujẖī bẖīṛī galī fahī.
They will find no way to escape coming and going in reincarnation; they are trapped in the narrow path.
वे ईश्वर के विद्रोही वहाँ से भागने का कोई रास्ता नहीं पाएंगे, यानि उन्हे पुनर्जन्म नहीं मिलेगा वे एक बंद रास्ते मे पकड़ लिए जाएंगे.
ਕੂੜ ਨਿਖੁਟੇ ਨਾਨਕਾ ਓੜਕਿ ਸਚਿ ਰਹੀ ੨
कूड़ निखुटे नानका ओड़कि सचि रही ॥२॥
Kūṛ nikẖute nānkā oṛak sacẖ rahī. ||2||
Falsehood will come to an end, O Nanak, and Truth will prevail in the end. ||2||
झूठ का अंत हो जाएगा, बाबा नानक कहते हैं कि सत्य ही अंत मे जीतेगा
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"Only the fool quarrels over the question of eating or not eating of the meat; that person does not have the True Wisdom. (Without True Wisdom or Meditation), the person harps on which is flesh and which is not flesh and which food is sinful and which is not." (SGGS - Ang 1289 - 1290)
(मास मास कर मूरख झगड़े ज्ञान ध्यान नही जाणे।।
कौन मास कौन साग कहावे किस में पाप समावे।।)
(म। page no. 1289 सतर 15)
ये बाणी धन श्री गुरु ग्रन्थ साहिब जी की पवित्र बाणी है।
जो पंडित को समझा रहे है तू क्यों मास के नाम पर झगड़ा कर रहा है? तुझ को पता नही मास और साग के बीच कौन सा मास है? जो पाप से कमाया गया हो वोही मास है।
(गेंडा मार होउम जग कीये देव्त्याँ के ब़ाणे।।
मास छोड़ भेस नक पकड़े राती मानस खाणे।।)
ये आम बात है जो मनुष्य मास नही खाता वो दुसरे को मास खाते देख नही सकता और अपनी नाक पकड़ लेता उसके मन में घिन की भावना पैदा होती है। मगर जो मनुष्य मास नही खा रहा मगर दूसरी तरफ रात को सो कर योजना बना रहा है की सुबह लोगों को कैसे ठगना है,
(फड़ कर लोकां नु समझावे ज्ञान ध्यान नाही जाणे।। )
एक तरफ तू दुनिया को समझाने की कोशिश कर रहा है की ये पाप है? लेकिन तुझे खुद ज्ञान नही है
(नानक अंधे से सेउ क्या कहिये कहे न कहे न भुजे।।)
बाबा नानक पंडित को कहते है एक जो तो ज्ञान से अँधा है उस पंडित को मैं क्या समझाऊँ बाबा नानक कहते है मैं उसको नही समझा सकता।
(अँधा होए सी अंध कमावे।।
जिस ह्रदय सी लोचन नाही।।)
जिसके पास ह्रदय की आँख नही है वो मनुष्य अँधा है और अन्ध कमाता है यानि पाप कर्मो का अर्जन करता है.
(मात पिता की रक्त निभ्ने मच्छी मॉस न खाई)
बाणी कहे रही है हे मनुष्य तेरा सारा जीवन जो है वो मॉस से उत्पन हुआ है। माता पिता के रक्त (खून) से तू पैदा(जन्म) हुआ है। वो भी मॉस ही का रूप है। है मनुष्य तो सोच रहा है मच्छी मॉस न खाये।
(अपख पखे पख तज छोड़े।।)
हे मनुष्य जो न खाने वाली चीज़ है वो तो अपने जीवन में खा रहा है। जैसे पराया हक़ दुसरो के हक़ मरना भी तो मास खाने के बराबर हुआ तो वो भी पाप है। और जो खाने वाली चीज़ है ( यानि मांस ) उसको तू पाप कह रहा है ।
(अंध गुर जिनके)
जिनके अंधे पंडित होते है उनको ऐसी शिक्षा देते है।
(मासों जमे मासो निमे हम मासे के पण्डे।।
ज्ञान ध्यान सूजे नाही चतुर कहावे पाण्डे।।)
हे पंडित धरती के ऊपर मॉस के बिना जीवन संभव नही है जैसे जो समुन्दर के पास रहेते है उनका जीवन सिर्फ मच्छी खा कर होता है। इस शब्द में पंडित को चतुर और चालक कहे रहे है क्योकि पंडित लोगो से दान लेता है।
(जे हो दिये नर्क जाणे।।
उना का दान न लेण।।)
हे पंडित अगर तेरे को लगता है मास खाने वाले नर्क में जाते है? तो तू उनसे दान क्यों लेता है?
(लन्दे नर्क देंदे स्वर्ग)
है पंडित जब तो मास खाने वाले मनुष्य से दान लेता है अगर वो नर्क में जायेगा? और तू जो दान ले रहा है तू स्वर्ग जायेगा?
(देखो हे टिंगण) ये कौन सी धक्के वाली बात है पंडित तू स्वर्ग और मॉस खाने वाला नर्क ये किसने बोला पंडित तुझे?
(आप न भुजे लोग भुजाये पाण्डे खरा सयाना।।)
है पंडित तू सच नही जानता अभी, तू अन्य लोगों को क्या समझा रहा है।
(पांडेय तू जाणे नाही कीतो मास उपना।।)
हे पंडित तू अभी जानता नही की ये मांस कहाँ से आता है और कहाँ से उत्पन होता है।
(तोयो अन्न कपाह उपजे तोयो तिरवण गन्ना)
तोयो मतलब पानी जिससे अन्न कपास गन्ना जिससे इस संसार की उत्पति होती है विर्धि होती वो पानी है सबसे बड़ा जीव पानी है।
इससे ये पता लगता है की जीव तो हर जगह है पानी में खाने में अन्न में हवा में वायु में इस प्रकार तो हम इन सबके पापी है। लेकिन ऐसा नही है सबसे बड़ा पाप झूठ बोलना किसी को हानि पहुंचाना, ये है सबसे बड़ा मास खाना ।
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एका माई जुगत वेयाई तिन चेले परवान ।
इक संसारी इक भंडारी इक लाये दीबान ।
[जपुजी साहिब की पौरी 30 के गुरबचन]
(यहाँ माई का अर्थ माया है जिसे ईश्वर ने रचा है और माया ने त्रिदेव को जन्म दिया है।)
इस के ठीक बाद इसी पौरी मे लिखा है..
ਜਿਵ ਤਿਸੁ ਭਾਵੈ ਤਿਵੈ ਚਲਾਵੈ ਜਿਵ ਹੋਵੈ ਫੁਰਮਾਣੁ ॥
जिव तिसु भावै तिवै चलावै जिव होवै फुरमाणु ॥
(और वह सर्वशक्तिमान ईश्वर जैसा चाहता है वैसा आदेश इन को देता है)
ਓਹੁ ਵੇਖੈ ਓਨਾ ਨਦਰਿ ਨ ਆਵੈ ਬਹੁਤਾ ਏਹੁ ਵਿਡਾਣੁ ॥
ओहु वेखै ओना नदरि न आवै बहुता एहु विडाणु ॥
(वो ईश्वर जो सब जगत को देखता है, उन्हें (त्रिदेव को) नजर नहीं आता! कितना चमत्कारी है वो रब)
ਆਦੇਸੁ ਤਿਸੈ ਆਦੇਸੁ ॥
आदेसु तिसै आदेसु ॥
(मै उसे प्रणाम करता हूँ , मै उसे बहुत प्रणाम करता हूँ )
ਆਦਿ ਅਨੀਲੁ ਅਨਾਦਿ ਅਨਾਹਤਿ ਜੁਗੁ ਜੁਗੁ ਏਕੋ ਵੇਸੁ ॥੩੦॥
आदि अनीलु अनादि अनाहति जुगु जुगु एको वेसु ॥३०॥
(वो ही सबसे पहला है , दिव्य प्रकाश , जिसका न आदि है न अंत और युगों युगों से एक अपरिवर्तनीय स्थिति मे है)
{यानी अकाल पुरख सदा से एक ही वेश मे है तो भला वो माता शक्ति बनकर त्रिदेव को जन्म देने वाला कैसे होगा। गुरबानी स्पष्ट करती है कि त्रिदेव या कोई भी देवी देवता स्वयं कुछ नही करते बल्कि ये सब उस सर्वशक्तिमान ईश्वर की आज्ञा के अधीन कार्य करते हैं। सो हमें भी उसी सर्वशक्तिमान से अरदास करनी चाहिए}
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*गुरु नानक: पैगम्बर मुहम्मद ﷺ साहब के बारे में, गुरु नानक जी के सुनहरे विचार*
नबी *ﷺ* की अ़ज़मत और महानता का बयान हर इंसाफ पसंद शख्सियत ने किया है। उन्हीं में से एक नाम *गुरु नानक* जी का भी है। आईये इस पोस्ट में हम गुरु नानक जी के उन सुनहरे विचारो को देखते है जो *आपने नबी ﷺ की शान और अज़मत में बयांन किये।*
*गुरु नानक* जी कहते हैं कि…
*❛सलाह़त मोहम्मदी मुख ही आखू नत! ख़ासा बंदा सजया सर मित्रां हूं मत!❜*
*(यानीः-)* ह़ज़रत मोहम्मद की तारीफ़ हमेशा करते चले जाओ। आप अल्लाह तआला के ख़ास बंदे और तमाम नबीयों और रसूलों के सरदार हैं। *(जन्म साखी विलायत वाली, पेज नम्बर 246, जन्म साखी श्री गुरु नानक देव जी, प्रकाशन गुरु नानक यूनीवर्सिटी, अमृतसर, पेज नम्बर 61)*
*नानक* जी ने इस बारे में ये बात भी साफ़-साफ़ बयान किया है कि दुनिया की *निजात(मुक्ति)* और कामयाबी *अल्लाह तआला* ने *हज़रत मोहम्मद* के झण्ड़े तले पनाह लेने से वाबस्ता कर दिया है। गोया कि वही लोग निजात पाऐंगे, जो *हज़रत मोहम्मद* की फ़रमाबरदारी इख़्तियार करेंगे और *हज़रत मोहम्मद* की ग़ुलामी में ज़िन्दगी बसर करने का वादा करेंगे। *नानक* कहते हैं कि…
*❛सेई छूटे नानका हज़रत जहां पनाह!❜*
*(यानीः-)* निजात उन लोगों के लिए ही मुक़र्रर है, जो *हज़रत मोहम्मद* की पनाह में आऐंगे और उनकी ग़ुलामी में ज़िन्दगी बसर करेंगे। *(जन्म साखी विलायत वाली, प्रकाशन 1884 ईस्वी, पेज 250)*
नानक जी के इस बयान के पेशे नज़र गुरु अर्जून ने यह कहा है कि..
*❛अठे पहर भोंदा, फिरे खावन, संदड़े सूल! दोज़ख़ पौंदा, क्यों रहे, जां चित न हूए रसूल!❜*
*(यानी:-)* जिन लोगों के दिलों में *हज़रत मोहम्मद* की अ़क़ीदत और मोहब्बत ना होगी, वह इस दुनिया मे आठों पहर भटकते फिरेंगे और मरने के बाद उन को दोज़ख़ मिलेगी। *(गुरु ग्रन्थ साहब, पेज नम्बर 320)*
*नानक* ने इन बातों के पेशे नज़र ही दूसरे लोगों को ये नसीहत की है कि…
*❛मोहम्मद मन तूं, मन किताबां चार! मन ख़ुदा-ए-रसूल नूं, सच्चा ई दरबार!❜*
*(यानी:-)* *हज़रत मोहम्मद ﷺ* पर ईमान लाओ और चारों आसमानी किताबों को मानो। अल्लाह और उस के रसूल पर ईमान लाकर ही इन्सान अपने अल्लाह के दरबार में कामयाब होगा। *(जन्म साखी भाई बाला, पेज नम्बर 141)*
एक और जगह पर नानक जी ने कहा कि …
*❛ ले पैग़म्बरी आया, इस दुनिया माहे! नाऊं मोहम्मद मुस्तफ़ा, हो आबे परवा हे! ❜
*(यानीः-)* जिन का नाम मोहम्मद है, वह इस दुनिया में पैग़म्बर बन कर तशरीफ़ लाए हैं और उन्हें किसी भी शैतानी ताक़त का ड़र या ख़ौफ़ नहीं है। *(जन्म साखी विलायत वाली, पेज नम्बर 168)*
एक और मक़ाम पर *गुरु नानक* ने कहाँ है की..
*❛हुज्जत राह शैतान दा, कीता जिनहां कुबूल! सो दरगाह ढोई, ना लहन भरे, ना शफ़ाअ़त रसूल!❜*
*(यानी:-)* जिन लोगों ने शैतानी रास्ता अपना रखा है और हुज्जत बाज़ी से काम लेते हैं। उन्हें अल्लाह के दरबार में रसाई हासिल ना हो सकेगी। ऐसे लोग हज़रत मोहम्मद (सल्ललाहो अलैहि वसल्लम) की शफ़ाअ़त से भी महरुम रहेंगे। शफ़ाअ़त उन लोगों के लिए है, जो शैतानी रास्ते छोड़कर नेक नियत से ज़िन्दगी बसर करेंगे। *(जन्म साखी भाई वाला, पेज नम्बर 195)*
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Common
لَا إِلَٰهَ إِلَّا ٱللَّٰهُ مُحَمَّدٌ رَسُولُ ٱللَّٰهِ
اللہ کے سوا کوئی معبود نہیں ، محمد ﷺ خدا کا رسول ہے
There is no God except Allah, Muhammad (pbuh) is his Messenger.
ईश्वर के अतिरिक्त कोई प्रभु नहीं है, मुहम्मद साहब उसके ईशदूत है!
एकम ब्रह्म द्वितीय नास्ति। महामद तस्य संदेष्टा अस्ति।।
[Sanatan Dharam]
Vedas: "Ekam Avadwitiyam"
वह एक है, बिना किसी दूजे के!
(छान्दोग्यउपनिषद: 6:2:1)
[Zoroastrianism/Parsiism]
Dasatir/Zend Avesta: "Ya Savishto Ahuro Mazdos"
वह (एक) सर्वशक्तिमान है!
{Zend Avesta: Yasna: 33:11}
[Judaism]
Tanakh/Torah: "Anokhy El Ayin Od Elohim"
मैं ही परमेश्वर हूँ, अन्य कोई नहीं!
{Hebrew Bible: Old Testament: Isaiah: 46:9}
[Christianity]
Bible: "The Lord, our Lord is One"
वह प्रभु, हमारा प्रभु एक है!
(Bible: New Testament: Mark: 12:29)
(Bible: Deuteronomy: 6:4)
[Islam]
Will Huwa Allahu Ahad.
कह दो की अल्लाह एक है।
(Quran:112:1)
"La ilaha il Lallaah"
अल्लाह के सिवा कोई और ख़ुदा नही।
[Sikhism]
Guru Granth: "इक ओंकार सतनाम कर्तापुरख"
ईश्वर एक है, उसी का नाम सत्य है और वही निर्माता है।
(Shri Guru Granth Sahib: Japuji: 1)
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Treat others as you would yourself be treated.
Do not do to others what would cause pain if done to you.
Do nothing to others that would hurt you if it were done to you.
(Mahabharat: 5: 1517)
Do not do unto others whatevee is injurious to yourself.
(Shayast na Shayast 13.29)
[Zoroastrianism]
What you yourself hate, do to no man.
What is hateful to you, do not do to your neighbours.
That which you do not wish for yourself, you shall not wish for your neighbour.
(Talmud, Shabbat 31^)
(Hillel Talmud, Shabbat 31a)
Do the same to others as you would have done to yourself.
Do unto others as you would have them do unto you.
Do to others, as you would have them do to you.
Do to others what you would have them do to you.
(Mathew: 7: 12)
None of you shall be true believers unless you wish for your brother the same that you wish for yourself.
Not one of you truly believes untill you wish for others what you wish for others.
You are not a true believer until you wish for others, what you wish for yourself.
Do unto all men as you would wish to have done unto you.
(Islam)
I am a stranger to no one, and no one is a stranger to me. Indeed, I am a friend to all.
(Guru Granth Sahib: Page 1299)
Do not offend others as you would not want to be offended.
Hurt not others with that which pains yourself.
Treat not others in ways that you yourself would find hurtful.
(Udana Varga : 5: 18)
[Buddhism]
One should treat all creatures in the world as one would like to be treated.
(Mahavira, Sutrakritanga: 1:11:33)
The success of your neighbour and their losses will be to you as if they were your own.
Regard your neighbour's gain as your own gain and your neighbour's lossbas your own loss.
(T'ai Shang Kan Ying P'ien, 213 - 218)
[Taoism]
That which we do not wish to be done to us, we do not do to others.
(Analectus: 15:23)
[Confucianism]
Lay not on any soul a load that you would not wish to be laid upon you and desire not for anyone the things you would not desire for yourself.
(Gleanings)
[Baha-u-llah]
Live in harmony, for we are all related.
[Native American]
We are as much alive as we can keep the earth alive.
(Chief Dan George)
[Native or Aboriginal Spirituality]
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یَ ایکَ اِتَّ مُشٹُہہِ
( رگ وید ۔ 6:45:16)
ترجمہ :"وہ ایک ہی ہے اسی کی حمد کرو"
ایکَ ایوَ نَمَسۡیو وِکۡشَوِیۡڈۡیَہۡ
(اتھروید 2:2:1)
ترجمہ :"ایک خدا ہی عبادت کے لائق اور سبھی مخلوقات میں حمد کے قابل ہے"
تَمِدَمۡ نِگَتَمۡ سَہ سَ ایشَ ایکَ ایکَ وِرِ دیکَ ایوَ
(اتھروید ۔ 13:4:12)
ترجمہ : "صرف وہ ایک ہی خود سے (بغیر جنم لیے ) اکیلا موجود ہے"
مَا چِدَ نۡیَدۡ وِ شَنۡ سَتَ
( رگ وید 8:1:1)
ترجمہ :"اس کے سوا کسی غیر کی عبادت نہ کرو"
تَسۡیَ تے بَھکۡتِ وَانۡسَہۡ سۡیَامَ
(اتھر وید 6:79:3)
ترجمہ : "اے خدا ہم تیرے ہی بندے ہوں"
نَ مَماَر نَ جِیۡرۡیَتِ
( اتھروید 10:8:32 )
ترجمہ :"وہ نہ کبھی مرتا ہے اور نہ کبھی بوڑھا ہوتا ہے"
اَ کَایَمۡ
( یجروید 40:8)
ترجمہ : "اس کا جسم نہیں ہے"
نَ تَسۡیَ پۡرَتِمَا اَسۡتِ یَسۡیَ نَامَ مَہَدۡ یَشَہ.
(یجروہد 32:3)
ترجمہ : اس کی کوئی شبیہ نہیں ہے اس کا ذکر ہی سب سے بڑی نیکی ہے ۔۔۔
اَنۡ دَھۡنۡ تَمَہ پۡرَوِشَنۡتِ یے اَسَمۡبُھوۡتِ مُپَا سَتے تَتو بُھوۡ ـ یَ ـ اَ ـ اِ ـ وَـ تے ـ تَمو ـ یَ ـ اَ ـ اُـ سَمۡبُھوتۡ یَامۡرَ تَاہ
( یجروید ۴۰ : ۹)
نَ کَاشۡٹے وِدۡھ یَتے دِےوَو نَ پَرَشَاڑِے نَ مۡرِڑۡمَيے
بھَاوِے ہِ وِدۡھیَتے دےوَسۡتَسۡمَادۡبھَاوو ہِ کَارَڑَمۡ
نَ دِیۡوَا مۡرِچۡچِھلَا مَیَاہ
(شری مدبھاگوت مہا پران10:84:11)
سمپرےکشی ناسک اگرم سوم دششچانولوکین
(گیتا 6:13)
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【ईद मुबारक】
"अन्वारभेथामनुसरंभेथामेतं लोकं श्रद्दधानाः सचन्ते।"
श्रध्दा वाले लोग परलोक का ध्यान रखते हुए सत्कर्मों को निरन्तर मिलकर करते रहें।
[अथर्ववेद 6:122:3]
تَقَبَّلَ اللهُ مِنَّا وَمِنكُم
हमार और आपके द्वारा किये गए (अच्छे कर्मों और इबादतों) को ख़ुदा क़ुबूल फरमाएँ। or
हम से और आप से (अच्छे कर्मों और इबादतों) ख़ुदा क़ुबूल फरमाएँ।
[दुआ / हदीस]
【ईद उल अज़हा मुबारक़】
"अध्दा देव महां असि"
ईश्वर निश्चय ही महान है।
[अथर्ववेद 20:58:3]
"मही देवस्य सवितुः परिष्टुतिः"
संसार को बनाने वाले के लिए स्तुति है।
[ॠगवेद 5:81:1]
"اللَّهُ أَكْبَرُ اللَّهُ أَكْبَرُ لَا إلَهَ إلَّا اللَّهُ وَاَللَّهُ أَكْبَرُ اللَّهُ أَكْبَرُ وَلِلَّهِ الْحَمْد"
अल्लाह सबसे महान है। अल्लाह सबसे महान है। अल्लाह के सिवा कोई और ख़ुदा नहीं। और अल्लाह सबसे महान है। अल्लाह सबसे महान है। तमाम तारीफ़ अल्लाह के लिए है।
[تكبير التشريق\तक़बीर ए तशरीक़]
اللَّهُ أَكْبَرُ اللَّهُ أَكْبَرُ لَا إلَهَ إلَّا اللَّهُ وَاَللَّهُ أَكْبَرُ اللَّهُ أَكْبَرُ وَلِلَّهِ الْحَمْد
(تكبير التشريق)
[ईद मुबारक़]
"अन्वारभेथामनुसरंभेथामेतं लोकं श्रद्दधानाः सचन्ते।"
*श्रध्दा वाले लोग परलोक का ध्यान रखते हुए सत्कर्मों को निरन्तर मिलकर करते रहें।*
[अथर्ववेद]
"تَقَبَّلَ اللهُ مِنَّا وَمِنكُم तकबल्लाहु मिन्ना वा मिनकुम"
*हमारे और आपके (सत्कर्मों और उपासना) को ईश्वर स्वीकार करे।*
[फतहुल बारी]
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अप्सराएं
“स्वर्गे लोके बहु स्त्रैणममेषाम”
(पवित्र, शद्ध जीवन, ज्ञान वाले लोगों को स्वर्ग में बहुत सी स्त्रियों का सुखमय निवास प्राप्त होता है।)
[अथर्ववेद 4:34:2]
वराप्सर: सस्त्राणि शुरमायोधमे हतम
त्वरमाणा भिधावंती मम भर्ता भवेदिति
(युद्धस्थल में मारे गये शूरवीरों की और सहस्त्रों, हज़ारों सुंदरी अप्सराएं बड़ी उतावली होके इस आशा इसे दौड़ी जाती है कि यह मेरा पति हो जाए।)
[महाभारत:शांतिपर्व/12:98:46]
अप्सराएं तालाबों में पक्षियों के रूप में तैरती है।
[शतपथ ब्रह्मण्ड: 11:5:1:4]
शास्त्रों के अनुसार देवराज इन्द्र के स्वर्ग में 11 अप्सराएं प्रमुख सेविका थीं। ये 11 अप्सराएं हैं- कृतस्थली, पुंजिकस्थला, मेनका, रम्भा, प्रम्लोचा, अनुम्लोचा, घृताची, वर्चा, उर्वशी, पूर्वचित्ति और तिलोत्तमा। इन सभी अप्सराओं की प्रधान अप्सरा रम्भा थीं। अलग-अलग मान्यताओं में अप्सराओं की संख्या 108 से लेकर 1008 तक बताई गई है। कुछ नाम और- अम्बिका, अलम्वुषा, अनावद्या, अनुचना, अरुणा, असिता, बुदबुदा, चन्द्रज्योत्सना, देवी, घृताची, गुनमुख्या, गुनुवरा, हर्षा, इन्द्रलक्ष्मी, काम्या, कर्णिका, केशिनी, क्षेमा, लता, लक्ष्मना, मनोरमा, मारिची, मिश्रास्थला, मृगाक्षी, नाभिदर्शना, पूर्वचिट्टी, पुष्पदेहा, रक्षिता, ऋतुशला, साहजन्या, समीची, सौरभेदी, शारद्वती, शुचिका, सोमी, सुवाहु, सुगंधा, सुप्रिया, सुरजा, सुरसा, सुराता, उमलोचा आदि।
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युध्दबंदी, दासी, सेविका
Jabala tells her son Satyakama Jabala that she went about many places in her youth, and did not know who his father was. I used to serve many people.
(Chandogya Upanishad 4.4.2)
{Jabala was a Sevika or Dasi}
यज्ञ करवाने वाले राजा चायमान के पुत्र अभ्यावर्ती ने हम भारद्वाज ऋषिर्यो को बीस गायें एंव रथ के साथ अनेकों सेविकाएं प्रदान की।
[ऋग्वेद: 6 : 27: 8]
उत्तम दानी, स्वामी, सज्जनों के पालक, पुरुकुत्स के पुत्र त्रसदस्यु ने मुझे 50 स्त्रियां प्रदान की है।
[ऋग्वेद: 8 : 19: 36]
पारीबह ददौ कृष्ण: पाण्डवाना महात्मनाम।।
स्त्रियों रत्नानी वासांसि पृथक पृथगनेकश।। 26।।
(श्रीकृष्ण ने पांडव पुत्रों में से प्रत्येकको दहेज या निमंत्रण में बहुत सारी दासी-नारीयां, रत्न और वस्त्र दिए।)
[ महाभारत 4:72 (P.127)]
रथाश्वं हस्तिनं छत्रं धनं धान्यं पशून्त्त्रियः ॥
सर्वद्रव्याणि कुप्यं च यो यज्जयति तस्य तत् ॥
(युद्ध में से रथ, घोड़ा, हाथी, धन,पशु, स्त्री, तांबा आदि धातु तथा गुड़, नमक आदि सब वस्तुओं में से जो जिसे जीतकर लावे वह उसी की होती है)
[मनुस्मृति: 7:96]
भोजायास्ते कन्या शुम्भमाना
दान करने वालो के लिए वस्त्रों से सुज्जित कन्या होती है।
(ऋग्वेद: 10: 107:9)
जो सैनिक दासी को युद्ध मे जीतकर लाता है, उस पर उसी का अधिकार है!
(मनुस्मृति 7:96)
वन्दिग्राहेण या भुक्ता हत्वा वद्धा वलाद् भयात् कृत्वा सान्तपनं कृच्छू शुध्येत् पाराशरोऽव्रवीत् ।।
अर्थ बन्दी बनाकर लाई जाने के बाद, मारपीट कर अथवा बलपूर्क या भयभीत करके बांध कर लाई गई औरत यादि किसी के द्वारा भोग ली गई हो तो वह कृच्छ्र सान्तपन व्रत करने से शुद्ध हो जाती है ऐसा पराशर ने कहा है.
(पाराशरस्मृती अध्याय 10 श्लोक 25)
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■ घूँघट ■
घूँघट, संस्कृत के अवगुण्ठन शब्द से आया है जिसका मतलब होता है वील, क्लोक, कवर, हाईड।
● In the Rig Veda, Adhivastra denotes the outer cover (veil). In the Atharvaved Veda, Upavasana, denotes veil.
● वेदों में:
“ईश्वर ने तुम्हें नारी बनाया है, अत: तुम अपने चक्षु झुकाए रखा करो, पुरूषों की ओर मत देखा करो. अपने दोनों पैरों को एक दूसरे से सटाए रखि करो और अपने वस्त्र मत खोलो, एवं स्वयं को घूंघट मे छिपाकर रखा करो”
Women to be modest in dressing and behaviour, lower down the gaze body should be covered.
[ Rigved, Book 8, hym 33, mantra 19-20 ]
● सीता जी अपने देवर लक्ष्मण जी से भी परदा करती थी। जब लक्ष्मण जी से माता सीता को जंगल से वापिस लाने को कहा तो लक्ष्मण जी ने जवाब दिया था कि मैं सीता जी को नही ला सकता क्योंकि मैंने माता सीता का चेहरा ही नही देखा इसलिए मै उन्हें नहीं पहचानता।
● वाल्मीकि रामायण (5सदी BC) में राम सीता को घूँघट हटा कर प्रजा को चेहरा दिखाने को कहते है वनवास पर जाने से पहले। रावण के मरने पर उसकी पत्नियां और पटरानी मंदोदरी, बिना घूँघट के दौड़ कर रावण के शव के पास इकट्ठा हो जाती है।
● रामचरितमानस में सीता को दशरथ और अन्य से घूंघट करने का वर्णन है।
● इसी तरह रामकथा मे भी राम चन्द्र जी भी सीता जी से पराये आदमियों से परदा करने को कहते हैं :-
जब श्रीराम चन्द्र ने परशुराम को आते देखा तो वे सीता जी से बोले ''हे सीता अपने आपको घूंघट में छिपा लो, और अपने चक्षुओं को झुका लो''
[ MahaveeraCharitra, Act 2, Page 71]
● उत्तर गुप्त काल मे घूँघट किया जाता था। शूद्रक की मृच्छकटिका (5 सदी BC) में घूँघट का उल्लेख है। कालिदास के अभिज्ञानशाकुनतलम (3-4 सदी) में घूँघट करने का उल्लेख है। और उसी समय के कई महाकाव्यों में भी इसका उल्लेख मिलता है।
● गुप्ता या मौर्य काल के घूँघट किए हुए स्त्री उकेरे गए सिक्के भी पाए गए है?
■ सती ■
सती नाम सती देवी के लिए आता है जिसने खुद को जला लिया था अपने पिता द्वारा स्वयं और पति शिव का अपमान होने पर। सती शब्द का संस्कृत में प्रयोग ही अच्छी पत्नी के लिए होता था। राजा राममोहन राय ने मुग़लो या मुसलमानों को दोष नहीँ दिया इसका। बल्कि 1829 में अपने ही समाज से इसके विरुद्ध लड़ाई लड़ी।
● 3rd सदी सदी में गुप्ता काल मे सती का प्रचलन अधिक था जिसके साक्ष्य मौजूद है। सती पिल्लर्स ऑफ एरन (9वी सदी) पर सती का उल्लेख मिलता है। कलचुरी साम्राज्य (9वी शताब्दी, आज का छत्तीसगढ़ क्षेत्र) में बहुविवाह और सती प्रथा का प्रचलन था। राजा गांगेयदेव के साथ 11 वी सदी में 100 रानियों सती हुई थी।
● मेधनाथ की मौत के बाद सुलोचना सती हुई थी।
● महाभारत मे पाण्डु की पत्नि माद्री भी पाण्डु के साथ सती हुई थी, और यही से यह क्रूर प्रथा प्रबल हो गयी। सोचने की बात तो यह है कि दशरथ की पत्नियाँ कौशिल्या, कैकेयी और सुमित्रा दशरथ के साथ सती नही हुई थी! तो क्या वो 'पतिव्रता' नही थी?
● गरुणपुराण/अध्याय-10 श्लोक-35 से 56 तक मे लिखा है-
"पति की मृत्यु के बाद पतिव्रता नारी को पति के साथ ही परलोकगमन करना चाहिये, महिला लज्जा और मोह त्यागकर श्मशान भूमि मे जाये, चिता की परिक्रमा करके महिला चिता पर चढ़े और अपने पति को गोद मे लिटाये, तथा अग्नि को गंगाजल समान मानकर खुद को पति के साथ भस्म कर ले"
इसी अध्याय के 41 वें श्लोक मे लिखा है कि महिला पहले प्रसव करके पुत्र पैदा कर दे, उसके बाद उसे 'सती' हो जाना चाहिये!
इसी पुराण 54वें श्लोक मे महिला को डराया भी गया है कि "यदि वह क्षणमात्र होने वाली पीड़ा के कारण सती होने का सुख नही भोगती है तो वो महिला जन्म- जन्मातर तक विरहाग्नि मे जलती रहती है, और जो महिला सती हो जाती है वह 14 इन्द्रों के कार्यकाल तक स्वर्ग मे पति के साथ रमण करती है!
● सती प्रथा का उल्लेख "नारदपुराण अध्याय-7" मे भी है, पर वहाँ जरा सा रहम किया गया है!
नारदपुराण अध्याय-7/52 के श्लोक मे लिखा है-
"बालापत्याश्च गर्भिण्यो ह्यदृष्टऋतवस्तथा।
रजस्वला राजसुते नारोहन्ति चिंता शुभे।।"
अर्थात- जिस महिला की संतान बहुत छोटी हो, जिसकी उम्र इतनी कम हो कि उसे अभी तक माहवारी ना शुरू हुई हो, जो गर्भवती हो, और जिसे माहवारी आ रही हो, उसे पति के साथ चिता पर नही चढ़ना चाहिये।
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■ सगे संबंधी से विवाह ■
● कर्नाटक, आन्ध्र प्रदेश और तमिलनाडु यानि पूरे दक्षिण भारत में (नार्थ ईस्ट राज्यो में भी) लोग ही बड़े पैमाने पर अपने कज़िन के साथ शादी करते है। अपने सगे चाचा मामा आदि तक से शादी कर लेते हैं। बल्कि कई जगह तो मामा को प्राथमिकता दी जाती है।
● कई दलित जातियों और जनजातियाँ, आदिवासियों में भी कज़िन विवाह प्रचलित है।
● बुद्ध की पत्नी यशोधरा उनके सगे मामा और सगी बुआ की बेटी थीं।
● श्रीकृष्ण ने अपनी बहन सुभद्रा का विवाह अपनी सगी बुआ के पुत्र अर्जुन से करवाया था ! अर्जुन सुभद्रा के सगे फुफेरे भाई थे, और सुभद्रा अर्जुन की सगी ममेरी बहन थी।
(वसुदेव एक यदुवंशी जिनके पिता का नाम शूर और माता का नाम मारिषा था। ये मथुरा के राजा उग्रसेन के मन्त्री थे। पांडवों की माता कुंती वसुदेव की सगी बहन थी। पृथा (कुंती) महाराज शूरसेन की बेटी और वसुदेव की बहन थीं। शूरसेन के ममेरे भाई कुंतिभोज ने पृथा को माँगकर अपने यहाँ रखा। इससे उनका नाम 'कुंती' पड़ गया, कुंती भगवान श्रीकृष्ण की बुआ थीं। कुन्ती को इन्द्र के अंश से अर्जुन का जन्म हुआ। सुभद्रा कृष्ण की बहिन जो वसुदेव की कन्या और अर्जुन की पत्नी थीं। इनके बड़े भाई बलराम इनका ब्याह दुर्योधन से करना चाहते थे पर कृष्ण के प्रोत्साहन से अर्जुन इन्हें द्वारका से भगा लाए। सुभद्रा के पुत्र अभिमन्यु , महाभारत के प्रसिद्ध योद्धा हैं। अर्जुन और सुभद्रा के विवाह की यही बात भागवत पुराण से भी सिद्ध होती है)
[ Shrimad Bhagvat. Skandh-9 . Paath-24. Shlok- 28-29 . Page-534/535 ]
● विराट नरेश की एक बेटी थी जिसका नाम उत्तरा था, और एक बेटा था जिसका नाम उत्तर था. अर्जुन के बेटे अभिमन्यु का विवाह उत्तरा से हुआ जिससे उनके यहाँ एक बेटा पैदा हुआ जिसका नाम परिक्षित रखा गया . परिक्षित ने अपने मामा उत्तर की बेटी इरावती से विवाह किया ।
[ Shrimad Bhagvat. Skandh-1 . Paath-16 . Shlok- 2 . Page- 63 ]
■ बहुपत्नीवाद ■
● ऋषि कश्यप की तेरह पत्नियाँ थी, जिनसे उन्होने करोड़ संतान पैदा की!
● मनु के पुत्र उत्तानुपात की दो पत्नियां थी, सुरूचि और सुनीति!
● कृष्ण के पिता वासुदेव की दो पत्नियां थी, रोहिणी और देवकी!
● कृष्ण भगवान की 16000 गोपियां थी।
● राम के पिता दशरथ की पत्नियों की संख्या अलग अलग आती है। कंही 60000 है। कंही 353 है। कंही 3 है कौशिल्या, कैकेयी और सुमित्रा!
● वाल्मीकि रामायण में राम की सौतेली माता को उसकी सखी कहती है कि राम को राजा न बनने देना वर्ना उसकी 'रानियां' तुम पर अपने आदेश चलाएंगी। अर्थात ऐसी आशा थी कि अन्य राजाओं की तरह श्री राम भी कई विवाह करँगे जो उस समय एक आम चलन था।
● अग्निदेव की भी दो पत्नियां थी, स्वाहा और स्वधा!
● इन्द्र के बारें मे कुछ कहना ही सूर्य को दीपक दिखाने के बराबर होगा ऋषि-मुनियों के पास अप्सराओं को इन्द्र भेजता था, वो तो वैराग्य मे खुश थे! तब भी यहाँ यह सवाल उठेगा कि ऋषियों की तपस्या भंग करने के लिये इन्द्र अप्सराऐं ही क्यो भेजता था? क्या इन्द्र जानता था कि ऋषियों के मन मे अप्सराओं की इच्छा है! आखिर वह अप्सराओं के बदले हीरे-मोती के ढ़ेरों आभूषण और स्वादिष्ठ पकवान भी तो भेज सकता था, जिसकी लालच मे ऋषि-मुनि अपनी साधना तोड़ देते! पर वह हर बार अप्सरा ही भेजता था, इसका कोई तो कारण होगा! पर ओशों कहते थे कि न तो इन्द्र किसी को भेजता था और ना ही कोई उर्वशी आती थी! इन्द्र तो खुद ऋषि-मुनियों की पत्नियों के पीछे पड़ा रहता था! वो क्यों अपनी अप्सराओं को इनके पास भेजेगा!
● मनुस्मृति-9/83
"अधिविन्ना तु या नारी निर्गच्छेद्रुषिता गृहात् ।
सा सद्यः संनिरोध्दव्या त्याज्या वा कुलसन्निधौ।।"
अर्थात- दूसरा व्याह करने पर यदि पहली स्त्री रुष्ठ होकर घर से भागे तो उसे पकड़कर घर मे बन्द कर देना चाहिये, या उसे उसके मायके पहुँचा देना चाहिये।
■ बहुपतिवाद ■
● पाँचो पांडव पाँच अलग-अलग पिता की संतान थे. युधिष्ठिर यमराज के पुत्र थे!भीम पवनदेव के पुत्र थे! अर्जुन इन्द्र के पुत्र थे, तथा नकुल और सहदेव दोनो अश्विनी कुमारों के पुत्र थे! पर क्या आपको ये पता है कि अपने पति पाण्डु के जीते जी कुंती ने दूसरे पुरुषो से नियोग क्यो करना पड़ा?
● द्रौपदी के 5 पति थे।
■ Wife Swapping ■
●सच्चे मित्र के 6 गुण है.. 6वां गुण है कि मित्र के मांगने पर उसके हित के लिए सब कुछ दे देना चाहिए। अपनी पत्नी को भी निछावर कर देना चाहिये।
(महाभारत उद्योगपर्व 45:12)
■ स्त्रियां खेती है ■
● मनुस्मृति-9/33 मे एक श्लोक लिखा है-
"क्षेत्रभूता स्मृता नारी बीजभूतः स्मृत पुमान।
क्षेत्रबीजसमायोगात् सम्भवः सर्वदेहिनाम् ।।"
अर्थात- स्त्री को क्षेत्र (खेत) रूप, तथा पुरुष को बीज (अनाज) रूप कहा गया है। खेत और बीज के संयोग से सभी जीवों की उत्पत्ति होती है।
● बल्कि मनु ने 9/41 मे कहा है कि पराये खेत मे पुरुष को अपना बीज नही बोना चाहिये,
● और 9/49 मे कहते हैं-
"येऽक्षेत्रिणो बीजवन्तः परक्षेत्रप्रवापिणः।
ते वै सस्यस्य जातस्य न लभन्ते फलं क्वचित् ।।"
अर्थात- जिसके पास खेत (स्त्री) नही है, वह दूसरे के खेत मे बीज बोता है तो उसमे उत्पन्न धान्य (बालक) को वह पाने का अधिकारी नही है।
● अध्याय-9 श्लोक- 34- 35- 36 और 37 में भी स्त्री को खेतरूपी ही लिखा है।
■ संतान ■
● धृतराष्ट्र की पत्नि गांधारी ने सौ पुत्रो को जन्म दिया था, जिन्हे कौरव कहा जाता है!
● ऋग्वेद 10 बच्चे पैदा करने को कहता है:
हे इंद्र, इस पत्नी को उत्तम पुत्रो वाली कर और इससे मेरे 10 बच्चे पैदा कर।
[ऋग्वेद 10 : 85 : 45]
● दूसरी जगह ऋग्वेद 3.1.6 में कहता है कि केवल एक संतान करो।
"सना अत्र युवतय: सयोनीरेकं गर्भं दधिरे सप्त वाणी: "
अर्थात् सप्तपदी (विवाह) की हुई युवती स्त्रियाँ एक ही गर्भ धारण करें।।
● ऋग्वेद 7.4.8 में कहा गया है--
नहि ग्रभायारण: सुशेवोऽन्योदर्यो मनसा मन्तवा उ अघा चिदोक: पुनरित्स एत्या नो वाज्यभीषाडेतु नव्य।।
अर्थात् दूसरे के पेट से जो उत्पन्न हुआ है उसको कभी अपना पुत्र न समझे | अन्योदर्य पुत्र का मन सदैव वहीं जायेगा जहाँ से वह आया है , इसलिए अपने
ही पुत्र को पुत्र समझना चाहिए ।
(नियोग संतान, सन्तान गोद लेना और सरोगेसी निषेध)
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शूद्र
"ब्राह्मणों अस्य मुखमा सीद्धाहु राजनय: कृत:
ऊरु तदस्य यद्वैश्य: पदभायम शूद्रो अजायत"
(ब्राह्मण उसके अर्थात ब्रह्मा के मुख थे, उसकी भुजाओं से राजन अर्थात क्षत्रिय जन्म लिए, उसकी जंघाएँ वैश्य बने, उसके पाँव से शूद्रों ने जन्म लिया)
[ऋग्वेद: पुरुषसूक्त : 10:90:12]
ब्राह्मणोऽस्य मुखमासीदबाहू राजन्यः कृतः ।
ऊरू तदस्य यद्वैश्यः पद्भ्यां शूद्रो अजायत ॥
(यजुर्वेद 31.11)
ब्राह्मण ब्रह्मा के मुख से उत्पन्न हुआ, क्षत्रिय भुजा से, वैश्य जांघो से और शूद्र पैरों से।
लोकानां तु विवृद्धयर्थं मुखबाहूरूपादतः ।
ब्राह्मणं क्षत्रियं वैश्यं शूद्रं च निरवर्तयत् ॥
(मनु० १.३१)
ब्रह्मा ने लोक-वृद्धि के लिए अपने मुँह से ब्राह्मण, बाहु से क्षत्रिय, जंघा से वैश्य और चरण से शूद्र को उत्पन्न किया।
यं तु कर्मणि यस्मिन् स न्ययुत प्रथमं प्रभुः।
स तदेव स्वयं भेजे सृज्यमानः पुनः पुनः॥
(मनु० १.२८)
ईश्वर ने सृष्टि के आरंभ में जिस प्राणी को जिस कर्म में नियुक्त कर दिया, वह बार-बार जन्म लेकर अगले जन्मों में भी उन्हीं कर्मों को करने लगा।
चातुर्वर्ण्यं मया सृष्टं गुणकर्मविभागशः ।
(गीता ४.१३)
यह जो ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शुद्र इन चारों वर्णीं का विभाजन है, वह गुण-कर्म के अनुसार मेरे द्वारा किया गया है।
ब्राह्मणक्षत्रियविशां शूद्राणां च परन्तप।
कर्माणि प्रविभक्तानि स्वभावप्रभवैर्गुणैः ॥
(गीता १८.४१)
हे अर्जुन! ब्राह्मणों, क्षत्रियों, वैश्यों तथा शूद्रों के स्वभाव से उत्पन्न गुणों के अनुसार उनके कर्मों का विभाजन किया गया है।
प्रियं मा कृणु देवेषु प्रियं राजसु मा कृणु।
प्रियं सर्वस्य पश्यत उत शूद्र उतायें ॥
(अथर्व० १९.६२.१)
हे प्रभु, तू मुझे ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र - सभी का प्रिय बना दे।
शूद्रों का एक ही कर्म है, चारों वर्णों की निष्कपट सेवा करना।
[मनुस्मृति :1:91]
■■■
ब्राह्मण सबसे श्रेष्ठ है, अतः सारी पृथ्वी उसी की है!
(मनुस्मृति :1:100)
एवं यदयप्यनिष्टेषु वर्तन्ते सर्वकर्मसु
सर्वधा ब्राह्मणाः पूज्याः परमं दैवतं हि ततु ॥
(मनु० ९.३१९)
सभी प्रकार के बुरे कर्मों में प्रवृत्त रहते हुए भी ब्राह्मण सर्वथा पूज्य है क्योंकि वे सर्वश्रेष्ठ देवता हैं।
दुःशीलोपि द्विजः पूज्यो, न तु शूद्रो जितेन्द्रियः।
(पराश० 8.33)
ब्राह्मण दु:शील भी पूज्य है, चाहै कितना ही पतित क्यों न हो फिर भी श्रेष्ठ है, जबकि शूद्र जितेंद्रिय हो तो भी श्रेष्ठ नहीं है, हीन है।
"पूजहि विप्र सकल गुण हीना / पूजहि विप्र सील गुण हीना
शुद्र न पूजहु वेद प्रवीणा / शुद्र न गुण गन ज्ञान प्रवीणा"
{इस चौपाई के कई संस्करण मिलते है}
(ब्रह्मण्ड कितना भी गुणहीन हो उसकी पूजा करनी चाहिए। शुद्र कितना भी सम्मान गुण ज्ञान सहित हो, पूजनीय नहीं हो सकता।)
[रामचरितमानस:63:1]
न विप्रम स्वेषु तिष्टत्सु शमृतं शुद्रेण नाययेत॥
अस्वगरयां हाहुती: सा स्याछुद्रसम स्पर्श दुषिता॥
स्वबांधवों के उपस्थित रहने पर मृत ब्राह्मण के शव को शुद्र के द्वारा बाहर न निकलवावे क्याकि वह निर्हरण (शुद्ध के द्वारा शव का बाहर निकालना) स्वर्गप्राप्ति में बाधक होता है।
(मनुस्मृति 5.104)
"शक्ते नापि हि शुद्रेण न कार्यों धन संचय:"
(समर्थ होने पर भी शुद्र का धन जमा करना उचित नहीं, क्योंकि शुद्र धन पाकर ब्राह्मणों को ही पीड़ा देता है।)
[मनुस्मृति :10:129]
शुद्र या दास के धन पर मालिक का अधिकार होता है।
[मनुस्मृति : 8:416]
विद्याविनयसम्पन्ने ब्राह्मणे गवि हस्तिनि ।
शुनि चैव श्वपाके च पण्डिताः समदर्शिनः॥
(गीता ५.१८)
जो ज्ञानी पंडित है वह विद्याविनयसंपन्न ब्राह्मण कतई गौ, हाथी, श्वान तथा चांडाल में भेद नहीं करता।
ब्राह्मण और शूद्र समान नहीं हो सकते। अर्थात आपस में आचरण बदलने से दोनों समान नही हो जाते, न वर्ण परिवर्तन होता। क्योंकि गुण स्वभाव के बिना केवल कर्म से आर्य अनार्य नहीं हो सकते।
(मनुस्मृति:10:73)
■■■
यदि शूद्र चोरी करे तो उससे आठ गुना, वैश्य करे तो सोलह गुना, क्षत्रिय करे तो बत्तीस गुना और ब्राह्मण करे तो उसे चौंसठ गुना या एक सौ अट्ठाइस गुना दण्ड दें!
(मनुस्मृति: 8: 337-338)
"अथास्य वेद मुपशृण्वतः त्रपुजतुभ्यांश्रोत्र प्रतिपूरणं
उच्चारणे जिह्वाच्छेदः, धारणे शरीरभेदः।"
(यदि शूद्र वेद मंत्रों को सुने तो उसके कानों में सीसा पिघला कर डाल दे। पढ़े तो जीभ काट लें और यदि वैदिक आज्ञाओं के अनुसार अपना जीवन बितावे तो फाँसी लगा दें)
[शंकराचार्य की लेखनी से/ गौतम धर्म सूत्र: 12:6]
"ढोल गंवार सुद्र पशु नारी सकल ताड़न के अधिकारी"
ढोल, गंवार, सूद्र, पशु और स्त्री ये सब दण्ड, पीटने के योग्य हैं।
[रामचरितमानस:59:5]
'‘स्त्री शूद्रौ ना धीयाताम्’'
(स्त्री और शूद्रों का वेद पढ़ना मना है)
[वेद]
(अगर कोई ऊंचे वर्ण वाली स्त्री से संबंध बना ले, उसकी इच्छा या बिना इच्छा से, उसे मृत्यु दंड दिया जाए। अपने वर्ण वाली के साथ सहमति के बाद संबंध बनाने पर दंड न दिया जाए। अगर ब्राह्मण शुद्र को गाली दे तो हल्का दंड दे। अगर शुद्र ब्राह्मण को गाली दे तो मृत्यू दी जाए। अगर ब्राह्मण शुद्र के प्राण लेले तो तो दंड के तौर पर ब्राह्मण को केवल जानवर की बलि देनी होगी।)
[मनुस्मृति]
"शम्बूको नाम वृषलः पृथिव्यां तप्यते तपः।
शीर्षच्छेदयः स ते राम! तं हत्वा जींवय द्विजम्॥"
(शुद्र शम्बूक को तपस्या करने के कारण राजा राम द्वारा प्राण गवाने पड़ते है)
[भवभूति द्वारा कृत उत्तररामचरित से जो 7 वीं सदी में लिखा गया। जिसमे ये भी बताया गया कि रामायण काल में वर्ण व्यस्था, पुरुषवादी समाज, और शूद्रों-स्त्रियों की स्तिथि दयनीय थी।]
"A Brahmin comes to Ram with his dead son. He says that Rama must have committed some sin due to which his son died. The sage Narada explains that a Shudra is practicing penances which is the cause of the child's death. Rama goes and finds an ascetic doing austerities with hanging downwards. He says he is a Shudra named Shambuka and performing this rigorous penance to acquire the status of a God in this body. Raghava [Rama] cut off his head. All the Gods and their leaders with Agni's followers, cried out, 'Well done! A rain of celestial flowers of divine fragrance fell on all sides, scattered by Vayu."
[Ramayana of Valmiki translation by Hari Prasad Shastri (Shanti Sadan Publishers) Book 7, 'Uttarakanda' i.e. Final Chapter, sargas 73-76]
(Another duty of the Brahmana consists in avoiding the food prepared by the Sudra.)
[Mahabharata 13:141]
(गुरु द्रोणाचार्य एकलव्य को धनुष सिखाने को मना कर देते है क्योंकि वो क्षत्रिय न होक शुद्र था। और गुरु दक्षिणा में एकलव्य का अंगूठा मांग लेते हैं ताकि प्रिय छात्र क्षत्रिय अर्जुन से एकलव्य आगे न निकल जाएं।)
[महाभारत]
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धार्मिक ज़बरदस्ती
'कृण्वन्तो विश्वमार्यम्।
आओ सकल विश्व को आर्य बनायें।
यानी, विश्वभर में जो-जो मानव दुर्जन हैं, अनार्य हैं उन्हें सज्जन, सद्गुणी, सदाचारी बनायें, आर्य बनायें।
(ऋग्वेद 1.63.5)
हे मनुष्य अपना सामर्थ्य बढ़ाओ, सारे विश्व को आर्य बनाओ।
(ऋग्वेद:9:63:5)
वैदिक ईश्वर आज्ञा देता है कि सब मनुष्यों को वेदि अर्थात वैदिक बनाओ।
[यजुर्वेद 2:1]
● अनार्य देश जंहा सनातन धर्म स्वीकार नहीं था।
अनार्य देशों में बसने वाली गायें तुम्हारे लिए कुछ भी न करेंगी।
[ऋग्वेद 3 : 53 : 14]
निरुक्त 6 : 32 और रघुनंदन भी कहता है ,की कीकट एक अनार्य देश है ,और हर अनार्य देश को कीकट कहते है। पर आर्य समाजी निरुक्त के 6 : 32 में लिखी मुनि यास्क की साफ सुथरी बात को काट कर कहता है , की ये पृथ्वी की किसी स्थान का नाम नही।
● इन्द्र, अग्नि और वरूण जैसे सबसे बड़े वैदिक देवताओं को भी वैदिक साहित्य में असुर कहा गया है , जिसका अभिप्राय उन्हें सामान्य देवताओं से बड़ा और विशिष्ट बताना था।
अव ते हेळो वरुण नमोभिरव यज्ञेभिरीमहे हविर्भिः |कषयन्नस्मभ्यमसुर परचेता राजन्नेनांसि शिश्रथः कर्तानि ||
With bending down, oblations, sacrifices, O Varuna, we deprecate your anger: Wise Asura, you King of wide dominion, loosen the bonds of sins by us committed.
(ऋग्वेद 1/24/14)
बर्हच्छ्रवा असुरो बर्हणा कर्तः पुरो हरिभ्यां वर्षभो रथो हि षः ||
High glory hath the Asura, compact of strength, drawn on by two Bay Steeds: a Bull, a Car is he.(Here it's addressed to Indra)
(Rrigved 1/54/3)
【राम ने शबरी के झूठे बेर खाये। निषादराज को गले लगया। शम्बूक का सर काटा, एकलव्य से गुरुदक्षिणा में अंगूठा मंगाना।}】
【औरों को अनार्य कहकर, दास कहकर, दस्यु कहकर दुत्कारने लगे। इस कारण दोनों ओर से एक-दूसरे के प्रति स्पर्धा होने लगी, दुश्मनी होने लगी।】
【काफिर, जेंटाइल्स, मलेच्छ,
【ब्रह्मद्विष: (ईश्वर, वेद विरुद्ध), वेदनिन्दक, नास्तिक शुद्र 】
【 असुर, राक्षस, चंडाल, दैत्य, दानव, पिशाच, 】
【 मनु काल मे दस्युधर्म था जो रक्ष संस्कृति को मानते थे।】
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हिंसा, आतंक, गैर हिंदू
“वृशच प्र वृशच सं वृशच दह प्र दह सं दह”
(दुश्मन/वेद निंदक को काट डाल, चीर डाल, फाड़ डाल, जला दे, फूंक दे, भस्म कर दे।)
[अथर्वेद 12:5:62/7]
दस्युनव धुनुष्व
जो दस्यु (दृष्ट) है, राक्षस है, दुराचारी है, व्याभिचारी है, बलत्कारी, डाकू लूटरे है, उनको धुन डालो।
(अथर्वेद:19:46:2)
शत्रु के भीतर भय पैदा करने के लिये उसके अन्न, जलायश जला दो और राज्य मे घेरा डालो।
(मनुस्मृति 7/194)
हत्वी दस्युन प्रार्यं वर्णमावत्
(ऋग्वेद 3.34.9)
दस्युओ की हत्या करें और स्वर्ण आर्यों की रक्षा करें।
'विश्वाः स्पृध आर्येण दस्यून।'
(ऋ० २.११.१९)
आयों से स्पर्धा करने वाले सभी दस्युओं को जीतें।
'यथावशं नयति दासमार्यः ।
(ऋग्वेद 5.34.6)
आर्य दासों को अपने वश में करता है।
प्रमृणिहि शत्रुन
शत्रुओं को मूलसहित समाप्त कर दो।
(यजुर्वेद)
स साधुभि ब्रहिष्कार्यो नास्तिको वेदनिन्दक:
साधुओं को चाहिए कि नास्तिक और वेदनिन्दाको को समाज से निकाल दें।
[मनुस्मृति:2:11]
“यथा हि चोरः स, तथा ही बुद्ध स्तथागतं।
नास्तिक मंत्र विद्धि तस्माद्धि यः शक्यतमः प्रजानाम्
स नास्तिकेनाभिमुखो बुद्धः स्यातम् ।।”
(वाल्मीकी रामायण: अयोध्याकांड, सर्ग -109, श्लोक: 34)
जैसे चोर दंडनीय होता है, इसी प्रकार ‘बुद्ध’ और और उनके नास्तिक अनुयायी भी दंडनीय है
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मांसाहार, जीवहत्या
【अश्वमेध यज्ञ एवं नरमेध यज्ञ: मेध का अर्थ ही है सेकरीफ़ाइज़, क़ुरबानी, बलि।】
【बलि शब्द भी संस्कृत का ही है। जैसे तलाक के लिए संस्कृत में कोई शब्द ही नहीं है क्यूंकि ऐसा कोई विधान ही नही था।】
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जीवो जीवस्य जीवनम।
(जीव ही जीव का जीवन है।)
[श्रीमद्भागवत महापुराण:1:13:47]
जीवो जीवस्य भोजनम अर्थात जीव ही जीव का भोजन है।
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"यज्ञार्थं ब्रह्मण्य वर्ध्या: प्रशस्ता मृग पक्षिणह"
(ब्राह्मणों को, यज्ञ के लिए, और स्त्री, सेवक आदि के पालन के लिए शास्त्रोक्त मृगपक्षीयों का वध कर सकते हैं। पहले ऋषियों के यज्ञों में और ब्राह्मण क्षत्रियों के यज्ञों में खाने के योग्य मृग और पक्षियों के पुरोडाश हुए थे।)
[मनुस्मृति:5:22-23]
"प्रेक्षितं भक्षयेन मांसं ब्राह्मणानां च काम्यया।
यथाविधि नियुक्त स्तु प्रणा नामेव चात्यये।।"
(मंत्रो द्वारा पवित्र मांस व शास्त्र विधि अनुसार मांस खाना चाहिए।)
[मनुस्मृति:5:27]
"नाद्याद विधिना मांसं विधिज्ञों अनापदि द्विजह:"
(मांस के दोष की विधि को जानता हुआ द्विज, बिना विधि के मांस न खाए)
[मनुस्मृति:5:33]
"असंस्कृता नपशुन मंत्रेनारद्दा द्विप्रह कदाचन।
मंत्रेस्तु संस्कृतानद्दाच्छा शवतं विधि मास्थित:।।"
(मंत्रो के बिना बिना पवित्र किए मांस को न खाए, मंत्रो से संस्कृत किये गए मांस को खाए।)
[मनुस्मृति:5:36]
"यज्ञार्थं पशवः सृष्टा: स्वयंमेव स्वयं भुवा।"
(ब्रह्मजी ने यज्ञ के लिए और यज्ञ की सिद्धि के लिए पशुओं को बनाया है)
[मनुस्मृति:5:39]
"यज्ञार्थं निधनं प्राप्ता: प्राप्नुवंत्यु तृसती: पुनः"
(पशु, जीव, पक्षी यज्ञ के लिये नाश होकर उत्तम गति को पाते है।)
[मनुस्मृति:5:40]
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ऋभुओं में से एक लाल रंग का उदक अर्थात रक्त धरती पर रखता है। दूसरा छुरी से काटे गए मांस को रखता है एंव तीसरा उस मांस से मलमूत्र साफ करता है।
(ऋग्वेद 1.161.10)
उक्षणों हि मे पञ्चदश सांक पचन्ति विंशतिम..।
(इंद्र कहता है) इंद्राणी द्वारा प्रेरित याज्ञीक मेरे लिए पंद्रह या बीस बैल पकाते है। उन्हें खा कर मैं मोटा होता हूँ।
(ऋग्वेद: 10:86:14)
कहिर स्वितसा त इंद्र...शयन्ते.
हे इंद्र, जिस प्रकार वधशाला में गाय कटती है..उसी प्रकार तुम्हारे आयुध से चोट ख़ाके राक्षस गिरते है।
(ऋग्वेद:10:89:14)
यसमित्रश्वास ऋषभास उक्षणों वशा मेषा अवसृषटास आहुता:
यज्ञ के समय जिस अग्नि में घोड़ो, बैलों, बिजारों (साडों), बांझ भेड़ो की आहुति दी जाती है।
(ऋग्वेद: 10:91:14)
मंसौदन पाचयित्वा..औक्षण वाआर्षभणवा।
मांस चावल पकवा कर अथवा औक्षण (Uksha is Ox) से खायें।
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"ऋष्यशृंगम् पुरस्कृत्य कर्म चक्रुः द्विजर्षभाः |
अश्वमेधे महायज्ञे राज्ञोऽस्य सुमहात्मनः ||"
{प्रथम कांड, बालकांड में राजा दशरथ द्वारा करवाए गए अश्वमेघ यज्ञ का उल्लेख है।}
(Keeping Rishyasringa at the helm of affairs those eminent Brahmans commenced, ashva medha , the Horse-ritual of that noble-souled Dasharatha)
[Valmiki Ramayan:1:14:2]
"नियुक्ताः तत्र पशवः तत् तत् उद्दिश्य दैवतम् |
उरगाः पक्षिणः च एव यथा शास्त्रम् प्रचोदिताः ||"
(In that ritual animals, serpents and birds designated to such and such deities are readied according to the scriptural directives.)
[Valmiki Ramayan:1-14-30]
"शामित्रे तु हयः तत्र तथा जलचराः च ये |
ऋषिभिः सर्वम् एवै तन् नियुक्तम् शास्त्रतः तदा ||"
(The sages have arranged those animals that are to be there in animal sacrifices, like horse and other aquatic animals, in that ritual according to scriptures.)
[Valmiki Ramayan:1:14:31]
"सुराघटसहस्रेण मांसभूतोदनेन च |
यक्ष्ये त्वाम् प्रयता देवि पुरीम् पुनरुपागता || "
{As Sita crosses Ganga, she promises to Ganga what she will offer on safe return, Maamsa bhuutodanena cha = and jellied meat with cooked rice}
(Oh, goddess! After reaching back the city of Ayodhya, I shall worship you with thousand pots of spirituous liquor and jellied meat with cooked rice well prepared for the solemn rite)
Sita promising Ganga meat-rice on safe return:
[Valmiki Ramayan:Ayodhya Kand:2:52:89]
"तौ तत्र हत्वा चतुरः महा मृगान् |
वराहम् ऋश्यम् पृषतम् महा रुरुम् |
आदाय मेध्यम् त्वरितम् बुभुक्षितौ|
वासाय काले ययतुर् वनः पतिम् ||"
{Hatvaa= having killed, Mrigaan= deer, Bubhukshhitou= being hungry as they were}
(Lakshmana and Rama hunting deer and wild boar i.e. wild pig,
Having hunted there four deer, namely Varaaha, Rishya, Prisata and Mahaaruru i.e. the four principal species of deer and taking quickly the portions that were pure, being hungry as they were, Rama and Lakshmana reached a tree to take rest in the evening OR Then on reaching the other shore Rama and Lakshmana hunt four types of animals including wild boar, antelope, spotted antelope and another species of antelope and take their flesh and hurry in hunger to a tree as it was getting dark. Also makes one wonder how much meat they ate in one go as it is too much for three adults even for warriors)
[वाल्मीकि रामायण: 2:52:102]
"समाश्वस मुहूर्तम् तु शक्यम् वस्तुम् इह त्वया ||
आगमिष्यति मे भर्ता वन्यम् आदाय पुष्कलम् |
रुरून् गोधान् वराहान् च हत्वा आदाय अमिषान् बहु || "
{Ruruun = stag with black stripes, Godhaan = mongooses, Varaahaan ca = wild-boars, Hatvaa = on killing, Bahu Amisaan Aadaaya = aplenty, meat, on taking, Sita telling Ravana in the disguise of a Brahmin that Rama will bring back deer, reptiles and wild boar for meal. The different types of meat Sita offers to the Brahmin guest in which disguise Ravana is, once Rama brings them from his hunt}
(Be comfortable for a moment, here it is possible for you to make a sojourn, and soon my husband will be coming on taking plentiful forest produce, and on killing stags, mongooses, wild boars he fetches meat, aplenty.)
[Valmiki Ramayan: Aranya Kand: 3:47:22B-23]
"देवकार्यनिमित्तम् च तत्रापश्यत् समुद्यतम्|
दध्यक्षतम् घृतम् चैव मोदकान् हविषस्तदा ||
लाजान् माल्यानि शुक्लानि पायसम् कृसरम् तथा |
समिधः पूर्णकुम्भांश्छ ददर्श रघुनंदनः |"
{Modakaan = sweet meats}
(There, Rama saw the articles of worship kept ready for the purpose of the sacred ceremony like curd, unbroken rice, clarified butter, sweet meats, things fit for oblation, fried grain, garlands made of white flowers, rice boiled in milk, mixture of rice and peas with a few spices, sacrificial sticks, vessels full of water etc.)
[Valmiki Ramayan:2:20:17-18]
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छित्रस्थूणं वृषं दृष्ट्वा विलापं च गवां भृशम् ।
गोग्रहे यज्ञबाटस्य प्रेक्षमाणः स पार्थिवः ॥
(एक समय किसी यज्ञशाला में राजा ने देखा कि एक वृषभ की गरदन कटी हुई है और वहां बहुत-सी गौवें आर्तंनाद कर रही हैं। यज्ञशाला के प्रांगण में अन्य अनेक गौवें बँधी हुई खड़ी हैं।)
[महाभारत: शांतिपर्व २६५.२]
"Bhishma said, 'I shall tell thee, O prince, how high-souled Brahmanas may be absolved from all sin incurred by accepting food from others. In accepting clarified butter, the expiation is made by pouring oblations on the fire, reciting the Savitri hymn. In accepting sesamum, O Yudhishthira, the same expiation has to be made. In accepting meat, or honey, or salt, a Brahmana becomes purified by standing till the rising of the sun"
(The Brahmana who takes his food in the company of Sudras is purged from all impurity by duly observing the ceremonies of purification. Actually Brahmins are not even allowed to eat food of other Brahmins)
[Mahabharata 13:136:20-22]
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न त्वसौ यज्ञसंविधिः।।
(जो हिंसक हैं, वे यज्ञ संवैधानिक नहीं हैं।)
[महाभारत: शांतिपर्व १२.१७]
तस्माद् हिंसा न यज्ञिया।
(इसलिए स्पष्ट है कि हिंसा यज्ञेय नहीं है। यानी, यज्ञ के योग्य नहीं है।)
[महाभारत: शांतिपर्व १२.१८]
नैष धर्मः सतां देवा यत्र वर्येत वै पशुः।
इदं कृतयुगं श्रेष्ठं कथं वर्येत वै पशुः।
(देवताओ! जहां कहीं भी यज्ञ में पशु का वध हो, वह सत्पुरुषों का धर्म नहीं है। यह श्रेष्ठ सत्ययुग चल रहा है। इस में पशु का वध कैसे किया जा सकता है?)
[महाभारत: शांतिपर्व ३३७.५]
कामकाराद् विहिसन्ति बहिर्द्यां पशूनु नराः॥
(मनुष्य अपनी आंतरिक कामनाओं के वशीभूत होकर बाहर यज्ञ की वेदी पर पशुओं का बलिदान करते हैं।)
[महाभारत: शांतिपर्व २६५.५]
सुरां मत्स्यान् मधु मांसमासवं कृसरौदनम् ।
धूर्तैः प्रवर्तितं ह्योत्रैतद् वेदेपु कल्पितम् ॥
(सुरा, आसव, मधु, मांस और मछली तथा तिल और चावल की खिचड़ी, इन सब वस्तुओं को धूत्तों ने ही यज्ञ में प्रचलित कर दिया है। वेदों में इनके उपयोग का विधान नहीं है।)
[महाभारत: शांतिपर्व २६५.९]
तदो दीनान् पशून् दृष्ट्वा ऋषयस्ते तपोधनाः।
ऊचुः शक्रं समागम्य नायं यज्ञबिधिः शुभः ॥
(उन पशुओं की दयनीय अवस्था देखकर वे तपोधन ऋषि इंद्र के पास जाकर बोले, यह जो यज्ञ में पशुवध का विधान है, यह शुभकारक नहीं है।)
[महाभारत: आश्वमेधिकयर्व ९१.१२]
न हि पशुगणा विधिदृष्टाः पुरंदर॥
(हे पुरंदर! यज्ञ में पशुओं के वध का विधान शास्त्र में नहीं देखा जाता।)
[महाभारत: आश्वमेधिकपर्व ९१.१३]
धर्मोपघातकस्त्वेष समारम्भस्तव प्रभो।
नायं धर्मकृतो यज्ञो न हिंसा धर्म उच्यते ॥
(प्रभो! आपने इस यज्ञ का जो समारंभ किया है, यह धर्म को हानि पहुँचाने वाला है। यह यज्ञ धर्म के अनुकूल नहीं है, क्योंकि हिंसा को कहीं भी धर्म नहीं कहा गया है।)
[महाभारत: आश्वमेधिकपर्व ९१.१४]
लुब्धैर्वित्तपरै ब्रह्मात्रास्तिकैः सम्प्रवर्तितम्।
वेदवादानविज्ञाय सत्याभासमिवानृतम् ॥
सतां वत्त्मारनुवर्तन्ते यजन्ते चाविहिंसया।
वनस्पतीनोषधीश्च फलं मूलं च ते विदुः॥
(लोभी, लालची और नास्तिक ब्राह्मणों ने, जो कि वेदों के सही अभिप्रायों को नहीं जानते थे, उन्होंने झूठ को सत्य रूप में वर्णित किया है। परंतु जो सत्पुरुषों के मार्ग के अनुगामी हैं, वे तो बिना हिंसा के ही यज्ञ करते हैं। वे वनस्पतियों, ओषधियों, फलों तथा मूलों से यज्ञ करते हैं)
[महाभारत: शांतिपर्व, २६३.६, २६३.२६]
ध्रुवं प्राणिवधो यज्ञे नास्ति यज्ञस्त्वहिंसकः ।
ततो हिंसात्मकः कार्यं सदा यज्ञो युधिष्टिर ॥
यूपम छित्वा पशूनू हत्वा कृत्वा रुधिरकर्दमम ।
यद्येवं गम्यते स्वर्गं नरकं केन गम्यते ॥
(यह ध्रुव सत्य है कि यज्ञ में प्राणीवध की विधि नहीं है। यज्ञ तो अहिंसक है। इसलिए हे युधिष्ठिर ! सर्वदा हिंसारहित यज्ञ ही करना चाहिए। यूप को काटकर, पशुओं को मारकर तथा वेदी को उनके लहू से लथपथ करके यदि मनुष्य स्वर्ग जा सकता है, तो बताओ फिर और ऐसे कौन-से दुष्कर्म हैं जिन्हें करके उसे नरक प्राप्त होगा)
[महाभारत: शांतिपर्व, २३३]
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हिंसाविहारा ह्यालब्धैः, पशुभिः स्वसुखेच्छया ।
यजन्ते देवता यज्ञैः, पितृभूतपतीन् खलाः॥
(हिंसारत मनुष्य ही अपने सुख की इच्छा से पशुवध द्वारा थाद्ध और यज्ञ करते हैं। ये वास्तव में मांस के लोभी हैं और निश्ठय ही छली हैं कपटी है)
[शश्रीमद्भागवत पुराण, स्कंध ११, अध्याय २१]
निन्दसि यज्ञविधेरह श्रुतिजातम्। सदयहृदय दर्शितपशुधातम् ।
केशव धृतबुद्धशरीर, जय जगदीश हरे॥
(वेदों की यज्ञ-विधि में पशुहत्या का विधान देख कर केशव सदय-हृदय बुद्ध का रूप धारण कर वेद-समूह की निदा की।)
[कृष्ण भक्त जयदेव द्वारा कृत गीतगोबिंद: १.९]
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Hinduism’s greatest propagator Swami Vivekanand said thus: “You will be surprised to know that according to ancient Hindu rites and rituals, a man cannot be a good Hindu who does not eat beef”. "There was a time in this very India when, without eating beef, no Brahmin could remain a Brahmin;” (The Complete Works of Swami Vivekanand, vol.3, p. 536 & 174 or The complete works of Swami Vivekanand vol 3/5/36)
Swami Vivekananda and Swami Dayanand Saraswati said that whatever from the Puranas (or other text also) contradicts the Vedas then it must be rejected without any mercy. And verses from Shatapatha Brahmana and Puranas confirms that the horse was slaughtered in Ashvamedha Yajna. So there is no way that apologists can now twist verses from Vedas about Horse-sacrifice.
BR Ambedkar’s 1948 work The Untouchables: Who Were They and Why They Became Untouchables.
"Brahmins were not merely beef-eaters but they were also butchers,”
There was a time when the Brahmins were the greatest beef-eaters... In a period overridden by ritualism there was hardly a day on which there was no cow sacrifice to which the Brahmin was not invited by some non-Brahmin. For the Brahmin every day was a beef-steak day. The Brahmins were therefore the greatest beef-eaters. The Yajna of the Brahmins was nothing but the killing of innocent animals carried on in the name of religion with pomp and ceremony with an attempt to enshroud it in mystery with a view to conceal their appetite for beef. Some idea of this mystery pomp and ceremony can be had from the directions contained in the Atreya Brahamana touching the killing of animals in a Yajna...
VD Savarkar espoused his views in Vidnyan Nishta Nibandh, that the cow, like the peepal tree, should be cared for, as something useful to humans, which meant eating it as well if need be. He insisted that a superstitious mindset towards cows would ruin India’s intellect and that cows should be protected for their economic use to man, and not because of their ‘divinity’. Attributing religious qualities to it gives it a godly status. Such a superstitious mindset destroys the nation’s intellect. “When humanitarian interests are not served and in fact harmed by the cow and when humanism is shamed, self-defeating extreme cow protection should be rejected.”
According to Sanskrit Scholar Rajani K Dixit, “there is no such thing as Holy Cow in the Vedas”. The Vedas consider bovines important for milk, beef, agriculture and transport but not divine or holy. The word ‘Aghnyaa’ applies only to a milch cow because it is not economical to kill it. A Vaisha cow is meant for beef, and especially reserved to an extent for Brahmins only.
Quoting Charaka Samhita, veteran scientist P M Bharagava said: "The flesh of the cow is beneficial for those suffering from the loss of flesh.
Currently 72 communities including some upper caste Hindus in Kerala prefer beef to the mutton.
मेष [Mesha] = Ram/Sheep.
पचत [Pachat] = Cooked
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रामायण में राम चरित चित्रण और अश्लीलता।
(श्री रामजी अपने पिता राजा दशरथ के बारे में कहते है कि वो स्त्री से मोहित और बूढ़े हो गए है तभी उन्हें वनवास पर भेज रहे है)
[रामायण:2:53:10 & 12]
(श्री रामजी कहते है कि स्त्रियों की बात का विश्वास मत करो और उन्हें कोई राज़ मत बताओ)
[रामायण: 2:100:49]
Sexualtiy and obscene words for women body such as h*ps, thig*s, bre*st , Nip*les are mentioned in Ramayan.
[Valmiki Ramayan:Arnaykand : 3:46:19-20, 35]
कच्चिद्धारयए तात राजा यत्त्वमिहागतः |
कच्चिन्न दीनः सहसा राजा लोकान्तरं गतः ||
[ Ramayana. २-१००-६]
“My dear brother! Is the king alive, that you have come here? I hope the miserable king has not indeed departed to the other world, all of a sudden.”
कच्चित् स्त्रियः सान्त्वयसि कच्चित् ताः च सुरक्षिताः |
कच्चिन् न श्रद्दधास्य आसाम् कच्चिद् गुह्यम् न भाषसे ||
[ Ramayana २-१००-४९]
“I hope you are pacifying the women well. Are they protected by you? I hope you are not believing the words of these women and not telling them the secrets.”
आयः ते विपुलः कच्चित् कच्चिद् अल्पतरो व्ययः |
अपात्रेषु न ते कच्चित् कोशो गग्च्छति राघव ||
[ Ramayana २-१००-५४]
“I hope your income is abundant and expenditure, minimum. I hope your treasure does not reach undeserving people, Bharata!”
Idam vyasanam aalokya raaj~naH ca mati vibhramam |
kaamaeva ardha dharmaabhyaam gariiyaan iti me matiH || [Ramayana 2-53-9]
“Reflecting on this misfortune of the king and his mental derangement, I deem that passion alone is greater than early gain and religious merit.”
Ko hi avidvaan api pumaan pramadaayaaH kR^ite tyajet |
chanda anuvartinam putram taataH maam iva lakSmaNa || [ Ramayana 2-53-10]
“what man however deluded, what father on account of a woman, at his own will and pleasure, abandon a son like myself?
Artha dharmau parityajya yaH kaamam anuvartate |
evam aapadyate kSipram raajaa dasharatho yathaa ||
[ Ramayana 2-53-13]
“He who pursues sensuous pleasures neglecting his real interests and discipline soon comes to distress; in the same way as king Dasaratha has.”
(What does Seeta think of Rama, when Ravana is describing the worthless Rama to Seeta ?)
Na deveSu na yakSeSu na ga.ndharveSu na R^iSiSu |
aham pashyaami lokeSu yo me viirya samo bhavet || 3-55-20
“I behold none matchable to my vitality is existent among gods; among yaksha-s – no; among gandharva-s – no; among sages – no, nor anyone in any world. [Ramayan 3-55-20]
Raajya bhraSTena diinena taapasena padaatinaa |
kim kariSyasi raameNa maanuSeNa alpa tejasaa || 3-55-21
“What can you achieve with that dethroned, hapless, seer, vagrant Rama who is short-lived, for after all, he is a human with littlest vitality? [Ramayan 3-55-21]
Sthaapayitvaa priyam putram raaj~naa dasharathena yaH
|manda viiryaH suto jyeSThaH tataH prasthaapito vanam ||
“Though Rama is the eldest son, king Dasharatha established his dear son Bharata as king, and because Rama is spineless he is put to flight to forests, and now, what is he and what am I, in matter of sovereignty. [Ramayan 3-48-15]
Tena kim bhraSTa raajyena raameNa gata cetasaa |
kariSyasi vishaalaakSi taapasena tapasvinaa || 3-48-16
“Rama is subverted from kingdom, thus dwindled is valour, thus winded down is his anima, thus he has become a pitiable one, thus he became an ascetic as nothing else is there for him to undertake, oh, broad-eyed lady, what do you aspire to do with such a Rama? [Ramayan 3-48-16]
(Seeta was a Nepali woman.)
ईदृशम् गर्हितम् कर्म कथम् कृत्वा न लज्जसे |
स्त्रियाः च हरणम् नीच रहिते च परस्य च || ३-५३-७
“A woman, that too a lonely one, that too the other man’s wife, that too an abduction, but not winning or wooing her… you knave, on your undertaking such a kind of deplorable deed, how unashamed are you? [Ramayan 3-53-7]
(Note – SEETA MAIYA DID NOT SAY THAT SHE WAS ALONE. SHE SAID SHE WAS LONELY)
(Ravana touched Seeta with intent of lust. He described Seeta’s body. People say that Ravana DID NOT TOUCH THE BODY OF SEETA. Ravana touched her body, waist and thighs.
It is said that if Ravana touched any woman with intent of lust, he would die. RAVANA DID NOT DIE ! WHICH MAY MEAN THAT SEETA MAIYA WENT WITH RAVANA WILLINGLY?)
ताम् अकामाम् स काम आर्तः पन्नग इन्द्र वधूम् इव |
विवेष्टमानाम् आदाय उत्पपात अथ रावणः || ३-४९-२२
Ravana who is “infatuated with lust” picked her up, which lady is disinclined for any kind of sensuality and who is verily writhing like the wife of King Cobra, and then he surged skyward and flew off with her in his air-chariot.
[Ramayan 3-49-22]
वामेन सीताम् पद्माक्षीम् मूर्धजेषु करेण सः |
ऊर्वोः तु दक्षिणेन एव परिजग्राह पाणिना || ३-४९-१७
He that Ravana grabbed the lotus-eyed Seetha on lifting her up with his left hand at her plait of hair at nape, and with his right hand at her thighs. [Ramayan 3-49-17]
ततः ताम् परुषैः वाक्यैः अभितर्ज्य महास्वनः |
अंकेन आदाय वैदेहीम् रथम् आरोपयत् तदा || ३-४९-२०
Then he whose voice is strident that Ravana lifted her up by her waist and got Vaidehi up on the air-chariot intimidating her with bitter words. [Ramayan 3-49-20]
(Rama's mother had inte*cou*se with a Horse.)
होता अध्वर्युः तथ उद्गाता हस्तेन समयोजयन् |
महिष्या परिवृत्त्या अथ वावाताम् अपराम् तथा || १-१४-३५
Queen Kausalya desiring the results of ritual disconcertedly resided one night with that horse that flew away like a bird. [Ramayana: 1-14-34]
(Hanuman describes Rama to Seeta in Chapter 35 of Sundara Kandam)
“His wrists, Fists and Chest are strong; his eyebrows, arms and foot are long. his knees, foot , hair ends are even; tes*icles; stomach and chest are elevated; his forehand, foot, eyecorners are red; lines on his soles, hair in the head and tip of his p*nis is smooth.”
“He has 3 folds in neck and belly. his ni*ples, soles, lines on the soles are depressed. He has a foot which does not show off the nerves, hair roots with single hair, small membrame virile, a navel without any flesh and a round head
[https://sundaragandam.wordpress.com/2012/07/08/chapter-35hanuman-describing-the-qualities-of-rama-continued/]
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