क्या मुसलमान क़ाबा और हजरे अस्वद की पूजा करते है? क्या वो भी मूर्ति -पत्थर की तरह ईश्वर का ही प्रतीक नहीं है?
एक बौद्ध नास्तिक भाई का सवाल है कि मुसलमान क़ाबा, हजरे अस्वद को छू कर, चुम कर और उसका तवाफ़ कर उनकी पूजा करते है जो असल में मूर्ति पूजा ही है क्योंकि वो सब पत्थर के रूप में ईश्वर का प्रतीक है। जैसे हिन्दू, मूर्तियों को ईश्वर का प्रतीक मानते है। वरना उन्हें छूने के लिए हज में मारा मारी नहीं होती हैं और क़ाबा को अल्लाह का घर इसलिए कहा जाता है क्यूंकि वो भी पत्थर में ही रहता है।
काबा को अल्लाह का घर कहा जाता है पर कोई एक मुसलमान भी यह नही मानता है कि उसमे अल्लाह खुद रहता है। दुनिया मे आज तक कोई मुसलमान नहीँ हुआ जो अल्लाह को आकार सहित या पत्थर में मानता हो। ये एक सिम्बोलिक टर्म या नाम है। इसलिए यह कहना की मुसलमान मूर्ति पूजा करते है एक सफेद झूठ है।
क़ाबे और हजरे अस्वद का ऐतिहासिक और धार्मिक महत्व है। क़ाबा सबसे पहले मानव, आदम अलैहo के द्वारा बनाया गया था। ये पहला स्थान था जो विशेष तौर पर खुदा के साथ मख़सूस कर दिया गया, हालांकि खुदा तो हर जगह है। इसलिए ये एक सांकेतिक या सिंबॉलिक (निशाना, प्रतिकात्मक, अलामती) स्थान हो गया। इसलिए आज भी इबादत के तौर पर इसका महत्वपूर्ण स्थान है। यह स्थान दुनिया के मध्य में स्तिथ है। इस स्थान का उल्लेख कई अन्य ग्रंथो में है। सनातनी धर्म ग्रंथों में इसे नाभा पृथ्वी यानी दुनिया की नाफ़ या नेवल कहा गया है। नाभि शरीर के मध्य में होती है। इसे इलास्पद भी कहा गया है जिसका अर्थ होता है ईश्वर का स्थान। क़ाबा कई बार टूटा और कई बार बना। हज़रत इब्राहीम ने जबसे इसका पुनर्निर्माण किया तब से इसका महत्व बहुत अधिक बढ़ गया।
आज भी क़ाबा नमाज़ के लिए रुख का काम भी करता है ताकि सभी नमाज़ी एक ही तरफ रुख करे, न कि अलग अलग यानी इसका आधार एकीकरण का सिद्धांत हैं। इसका तवाफ़ करना गवाही है कि हर सर्कल का एक ही सेंटर है। यानी सब का स्रोत एक ईश्वर ही है। पृथ्वी के केंद्र में स्तिथ होने के कारण इसकी परिक्रमा धरती के केंद्र से जोड़ कर ऊर्जा भर देती है क्यूँकि यहां सर्वाधिक ग्रेविटी है और यंहा ग्रेविटी का केंद्र है। जिस तरह मौत के कुंवे में चालक केंद्र से एक बैलेंस और कनेक्शन बना कर ऊर्जा के बल पर बिना गिरे, चक्कर लगता है। उसी तरह इसकी परिक्रमा भी यही काम अंजाम देती है।
काबे में लगे हजरे अस्वद को जन्नत का पत्थर कहा जाता है जो धरती पर आया था। वैज्ञानिक भाषा में कहे तो शायद किसी धूमकेतु या उल्कापिंड द्वारा लाखों वर्ष पूर्व धरती पर गिराया हुआ पत्थर मान सकते है। इसे आदम द्वारा काब में लगाया गया था. फिर पुननिर्माण के दौरान हज़रत इब्राहीम ने इसे क़ाबा की दीवार में स्तिथ कर दिया था.
अरब
में शुरवात के दौर में सहाबा का काबा पर चढ़कर अज़ान देना यही बताता है कि
वो सिर्फ एक पत्थर का ढांचा है, जिसकी धार्मिक महत्वता तो है पर जो अल्लाह
की ज़ाती रिहाइश नही है। आज भी इस पर चढ़कर काबा का गिलाफ बदला जता हैै। कोई भी उपासक पूजा अपने पूजनीय पर पांव नही
रखेगा। हज़रत उमर का हजरे अस्वद को यह कहकर चूमा करते थे कि यह महज़ एक पत्थर जो न फायदा कर सकता है और न नुकसान और मैं इसे इसलिए चुम रहा हूँ क्योंकि मैंने नबी को इसे चूमते हुए देखा है। वो ये बात दरअसल खुलेआम इसलिए कहा करते थे कि लोग इससे गलत मतलब न निकाल ले जैसे इसे चूमने वैगरह को बूतपरस्ती समझना। हक़ीक़तन इसे चूमना एक सुन्नत अमल है जो मुहम्मद साहब किया करते थे, आस्था के कारण।
आज ये क़ाबा की दीवार में एक कोने में फिट हैं। उसी कोने से परिक्रमा का आरम्भ और अंत होता है यानी इसका प्रयोग पहचान के लिए भी हो रहा है. इसके द्वारा हाजि काबे के लगाए जा रहे चक्करों की गिनती भी करते हैं क्योंकि इन्सान भूल-चूक करता है.
इन सब तर्कों से बात बिल्कुल साफ हो जाती है की क़ाबा या हजरे अस्वद की पूजा नहीं होती है बल्कि ये धार्मिक महत्वता रखते है।
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हजरे अस्वद का इतिहास और वर्तमान
हदीसों के मुताबिक हज्रे अस्वद को जन्नत का पत्थर माना जाता है (ये शायद एक मेट्रोयड/ उल्कापिंड है). ज़मीन पर ये कब आया हमें पुख्ता तौर पर तौर मालूम नहीं है। हदीसों में बतायागया है कि ये जब आया था तो सफेद था मगर इंसानों के गुनाहों से ये काला पड़ गया (यानी बार बार छुए जाने पर)। हज्रे अस्वद काबा में पूर्व की ओर लगा हुआ है, जिस तरफ मक़ामे इब्राहिम, काबा का दरवाज़ा और ज़मज़म कुंवा है।
आदम को भारत में उतारा गया था और हव्वा को अरब में। हजरे
अस्वद नामक पत्थर (अल्लाह की निशानी, आयतुल्लाह है ) आदम के समय में समय हिन्द में जन्नत
से आया था। ऐसा लिखा गया है कि ये जन्नत में आदम की हिफाजत करता था (कैसे, ये नहीं बताया गया). एक रिवायत में
नबी ने कहा कि जिब्राइल ये हजरे अस्वद सबसे पहले हिन्द से लाये थे।
इसे आदम
ने काबा में लगया था. फिर पुननिर्माण के दौरान हज़रत इब्राहीम ने इसे क़ाबा की दीवार में स्तिथ कर दिया था। ये माना जाता है कि ह. इब्राहिम को यह क़ाबा की क़दीम बुनियादों में लगा हुआ मिला था। और भी कई मत जैसे पहला कि उन्हें यह वंही आस -पास पड़ा मिला था, दूसरा कि फ़रिश्ते जिब्राइल ने इब्राहीम को ये तब लाके दिया जब वो क़ाबा में एक पत्थर लगाने के लिए ढूंढ रहे थे और तीसरा कि जिब्रील ने बस इसकी शिनाख्त करवाई थी।
पैगम्बरी मिलने से पहले, मुहम्मद साहब ने भी एक बार काबा की मरम्मत के दौरान इसे दिवार में अपने हाथो से लगाया था, जब तमाम कबीले इस बात पर लड़ रहे थे कि ये शुभ कार्य कौन करेगा और उन्होंने अंत में इसके लिए मुहम्मद साहब को चुना था. 9वीं सदी में लूटेरे इसे लूटके ले गए थे दशकों बाद जिनसे भारी मुआवज़े के बदले इसे वापिस लिया गया था। तब से आज तक ये वंहा लगा हुआ है. हजरे अस्वद भी पहले सफेद
रंग का था
जिसे इंसानों ने छू छू कर काला कर दिया। बहुत पहले ये साबुत हुआ करता था, पर अब ये टूटा हुआ है, जिसे जोड़कर रखा गया है।
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हजरे अस्वद क्या और क्यों हैं?
हज्रे अस्वद को साइंटिफिकली, स्प्रिचुली और वर्ल्डली प्रैक्टिसेज तीनो के तहत समझा जा सकता है।
आज तक कोई भी साइंटिस्ट रिसर्च हज्रे अस्वद पर नहीं करी जा सकी है। अलग अलग एक्सपर्टस ने ऑब्सर्वेशन की बुनियाद पर इसे दुनिया के अलग अलग पत्थरों, लावा और उल्कापिंडों सा बताया है। अगर रीसर्च हुई तो इनमें से कोई भी रिज़ल्ट आ सकता है। क्या होगा अगर ये दुनियावी निकला तो? इसलिए हमें इसकी सही तौज़ी करनी चाहिए
यकीनी तौर पर हम ये जानते हैं कि ये पहली बार हुई काबे की तामीर का पत्थर और निशानी है। हज्रे अस्वद वो पत्थर है जो काबा के स्ट्रक्चर में ह. आदम के वक़्त से मौजूद है। हम ये भी जानते हैं कि ह. आदम के बाद, ह. नूह के सैलाब में और बाद में भी काबा कई बार टूटा और बना। ह. इब्राहिम के वक़्त में तो इसे दुबारा से लगभग नीवं से उठाया गया।
हज्रे अस्वद को जन्नत से आया पत्थर कहा जाता है। फरिश्तों द्वारा लाया न सही, कम से कम इसे मेट्रोयड (उल्कापिंड) तो मानना ही पड़ेगा।
मगर जन्नत तो अभी वजूद में आई ही नहीं है, वो तो क़यामत के बाद, क़ायनात में फैले मलबे से बननी है। हालांकि क़यामत के बाद, पृथ्वी के टुकड़े होने पर, ये पत्थर निकल कर किसी बन रही जन्नत (ग्रह) में जाके लग जाये. तो फिर हो सकता है ये पत्थर उस जन्नत (क़ुरान में दुनिया के बागों को भी जन्नत कहा गया है) का है जो इसी दुनिया में थी और जिसमें ह. आदम- हव्वा ने यंही तरबियत पाई थी। ये बात इसके जन्नत के पत्थर होने के लिटेरल मायनों पर खरी उतर रही है (बजाय जन्नत से आये हुए पत्थर के).
इस तरह दो सूरतें बनती हैं:-
1. शायद इसी दुनिया की उस जन्नत नामक बाग के पत्थरों से पूरा काबा बनाया गया था या कम से कम यंहा उसका एक पत्थर (यही हज्रे अस्वद) काबा में लगाया गया था।
2. दुनिया के जिन भी पत्थरों का इस्तेमाल ह. आदम में काबा को बनाने में किया था, उनमें से सिर्फ एक ही पत्थर (यही हज्रे अस्वद) ह. इब्राहिम के वक़्त तक वंहा मौजूद था (इसकी क़दीम बुनियादों में या आस- पास ज़मीन की ऊपरी सतह पर) जिसे उन्होंने काबा में खास जगह खास मक़सद से लगा दिया था। क्योंकि ये तारीखी, माद्दी, रूहानी तौर पर शुरवात से ही काबा का बचा हिस्सा था। इसकी एक हिस्टोरिकल वैल्यू है। इसे हज की एक रस्म से जोड़ दिया गया।
इसकी रूहानी अहमियत यही है कि ये अल्लाह के हाथ की अलामत (प्रतीक, निशानी, सिम्बल) है, मुसाफा के तौर पर, जो हम तवाफ़ करते हुए उससे वफादारी का अहद दोहराते हुए करते हैं।
इसकी दुनियावी अहमियत यही है कि ये तवाफ़ की शुरवात करने और चक्करों की गिनती याद रखने के काम आता है। इसे चूमना, छूना, इसकी ओर हथेली, इशारा, दुवा करना एक यादिहानी, मेन्टल इम्प्रैशन या जेस्चर है कि इतने चक्कर हो गए हैं। क्योंकि चारों और से लगभग समान दिखने वाली जगह में बार बार, भीड़ के साथ चक्कर लगाने में ज़ेहन भुल जाता है, गुम जाता है।
दुनिया में इस्लाम से पहले से ही पवित्र पत्थरों, स्तुनों आदि को इबादत घरों में रखने का रिवाज मौजूद है जिन्हें बीटिल (Baetyl from semitic word Bethel meaning House of God) कहा जाता है जैसे यूनान में ओपोलो के मंदिर में रखा हुआ Omphalos था। इंसान हमेशा से ही अनोखी चीजों का संग्रहकर्ता रहा है। यंहा तक कि बच्चो में भी अनोखे पत्थर इकट्ठे करने का शौक पाया जाता है।
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हजरे अस्वद एक अलमाती निशानी
कुछ गैर- सहीह हदीसों में नबी ने हजरे अस्वद को यमीनउल्लाह (अल्लाह का दाहिना हाथ) पुकारा है। जैसे एक रिवायत में अब्दुल्लाह बिन अब्बास कहते हैं कि यह काला स्तंभ (pillar) पृथ्वी पर अल्लाह का दाहिना हाथ है जिसके साथ वह अपने बंदों से हाथ मिलाता है जैसे कोई आदमी अपने भाई से हाथ मिलाता है। एक और रिवायत में कहा गया है कि जब अल्लाह ने आदम की संतानों से वचन लिया और उन्हें उनकी आत्माओं/नफ्सों के साथ गवाह बनाया तो पूछा था कि क्या मैं तुम्हारा रब नहीं हूँ और उन्होंने कहा था, हाँ, इसके बाद अल्लाह ने इसे (वाकये को) हजरे अस्वद में रख दिया (इसका अमतलब हजरे असवद वादे के दिन (अलस्तु बि रब्बिकुम) पर अल्लाह के साथ इंसानों के वचनों का भंडार है)।
हम जानते हैं कि सभी राजा दरबार में किसी भी नए आने वाले व्यक्ति को चूमने के लिए अपना दाहिना हाथ देते थे. हाजी को भी हरम में घुसने पर सबसे पहले अपने राजा के दाहिने हाथ को चूमना है। हजरे असवद का इस्तिलाम अहद को दोहारने की निशानी है. प्रतिज्ञाओं और वचनों की प्राचीन दुनियावी परम्पराओं के अनुसार ही, हाजी इसमें (अल्लाह के हाथ में) अपना हाथ रखता है और इसे चूमकर अल्लाह के साथ अपने अहद को दोहारता कि उसने इस्लाम स्वीकार करने के बाद स्वर्ग के बदले में अपनी ज़िन्दगी और दौलत को अल्लाह के हवाले कर दी है।
इस्लामी साहित्य में इसे अल्लाह के दायां हाथ (यमीन अल्लाह) की मुशबहत दी गयी है। ये अल्लाह से बयत करने का, हाथ करने सिम्बोलिक एक्सप्रेशन, अलामत है। जैसे लोग अपने करीबियों से बड़ी देर तक मुसाफा करते हैं। एक आपका हाथ और एक खुदा का हाथ होता है। यही वजह है तवाफ़ के वक़्त एक दुवा करते है जिसके मायने हैं कि अल्लाह, तेरे से अहद की वफादारी का इज़हार करते हैं। क़दीम ज़माने में बयत या वफादारी का अहद करते हुए हाथ मे हाथ देते हुए चूम लिया जाता था। अल्लाह ने इस रस्म को अपने लिए खास कर लिया।
ये अल्लाह से अहद की अलामत है जिसमे उन निराकार के हाथ चूमने, मिलाने की बजाय उसे छुवा जाता है. जैसे हमें माँ-बाप की तरह, देश को सलाम करने को कहा जाए तो हम उसके झंडे को सलाम कर देंगे, पाँव छूने को कहा जाये तो देश की मिटटी को छुवेंगे, बातचीत के लिए कहा जाये तो राष्ट्रगान गायेगें. ये सभी अलामती जेस्चर हैं.
हजरे अस्वद एक सांकेतिक प्रतिक
किसी छीज़ को शिद्दत से छूना, चूमना, संजोना या उसकी परिक्रमा करना, उसकी पूजा नहीं होती है। ये तो अपनी आस्था या अकीदत का इज़हार है। जिस के करने में धार्मिक तौर न कोई ज़बरदस्ती है और न अनिवार्यता।
जैसे कोई अपने बच्चों, धार्मिक ग्रंथों या प्यारी चीजों को चूमता है, प्यार करता है। ग्रंथों को चूमने से या बच्चों को चूमने से वो पुजनीय नहीं हो जाते। जैसे लोग मंत्र, तस्बीह आदि पड़ कर खुद के अंगूठे चूमते है। या आज कल नौजवान अपने पसन्दीदा एक्टर या क्रिकेटर को छूने की कोशिश करते है जिसके चलते अक्सर उनके बॉडीगार्ड से पिटाई भी खा लेते है। उन्हें छूने या उनके साथ सेल्फी लेना, ऑटोग्राफ लेना, ये सभी असल में उनकी मोहब्बत और चाहत का इज़हार है।
अगर यह सब कार्य पूजा मानी जायगी तो आज भगवान बुद्ध से जुड़े अवशेषों या स्मारकों पर बौद्धों का जाना, घूमना, छूना, संजोना, परिक्रमा और उनका संरक्षण आदि करना भी फिर बुद्ध की पूजा क्यों नहीं मानी जाएगी? इसी तसर्कनुसार, क्या ये भी पत्थर पूजा नही हुई? दुनिया भर में बौद्धों द्वारा बौद्धस्तूपों आदि की परिक्रमा की जाती है। जो बौद्धधर्मियो का महत्पूर्ण धार्मिक संस्कार और अनुष्ठान है जिसे प्रदक्षिणा कहते है। इसी तर्क से चले तो उस सरकमएम्बुलेशन को भी पूजा क्यों न माना जाए? वो स्तूप आदि भी तो पत्थर के होते है तो फिर क्या बौद्ध भी मूर्तिपूजक हो गये?
बोद्धधर्म में एक प्रेयिंग व्हील या चक्र होता है जिसे, खोरलो कहते है। ये धातु, लकड़ी आदि का बना होता है जिस पर मंत्र लिखे होते है। इसको पढ़ते हुए घुमाया जाता है। क्या यह एक धार्मिक संस्कार नहीं हुआ। क्या यह एक धार्मिक परम्परा का प्रतीक नहीं। मंत्र तो बहुतों को याद होते है पर फिर भी भक्त इसे घुमा घुमा कर पढ़ते है क्योंकि ये धार्मिक महत्वता रखता है। यही महत्वता बाकी धर्मो में विभिन्न चीजों की हैं।
हिन्दू मूर्तियों को प्रतीक मानते है। पर किसके प्रतीक? आम हिन्दू सभी देवताओं और भगवानों को ईश्वर के अवतार या रूप या अधीनस्थ आदि मानते है। और अधिकतर देवताओं और भगवानों को ईश्वर से पृथक अस्तित्व। इन पृथक अस्तित्व को ही एक रूप दे दिया गया और उनकी मूर्तिया बना ली गयी। इसलिए ये कहना अधिक उचित है कि वो उन्हें ईश्वर का इनडारेक्ट प्रतीक मानते है।
मूर्तिपूजा न करने वालो को पत्थरों में भगवान या खुदा नहीं दिखाई देता बल्कि उसका उलट दिखाई देता है। इसका आधार उनकी मूल धार्मिक धारण होती है। जैसे सिम्पली हर धार्मिक मत, विपरीत मत में अविश्वास रखता है।
प्रतीक और पूजा या उपासना का अर्थ अलग है। प्रतीक होने और आराध्य या पूजनीय होने में बहुत अंतर है। प्रतीक कुछ भी हो सकता है। उनसे आस्था हो सकती हैं, उनका सत्कार सम्मान आदि हो सकता है। पर वो धार्मिक प्रतीक स्वयं संसार का सृष्टा, संचालक, संहारक आदि नहीं हो सकता। उसी प्रकार उन प्रतीकों को ईश्वर नहीं कहा जा सकता, न वो आपकी प्रार्थना याचना स्वीकार करने वाले है। वो ऐसे धार्मिक प्रतीक है जो निर्जीव है या उनके है जो मृत हो चुके है।
जैसे देश का झण्डा जो सिर्फ एक साधारण कपड़ा होता है पर देश का प्रतीक होने के कारण बहुत सम्मानीय होता है। पर फिर भी वह स्वयं देश नहीं होता। वास्तव में धर्म इस तरह के नमाज़, हज, परिक्रमा आदि जैसे अनुष्ठान मनुष्यों का ईश्वर के प्रति प्रेम प्रदर्शित करते है। ये सारे संस्कार सिम्बोलिक होते है। क्योंकि मनुष्य तो इस जीवन मे ईश्वर से मिल नही सकता तो उसके प्रति भावनाएं दिखाने का यही सबसे बहेतरीन तरीका है। उसी तरह जैसे एक इंसान दूसरे इंसान से मिलने पर हाथ मिलाता है, गले लगता है या माथा चूमता है। ये सांकेतिक भाषा है।
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हजरे अस्वद और बुतों की तुलना
इस्लाम में पत्थरों से अल्लाह को दुश्मनी नहीं है, बस शिर्क मना है। बुत कोई चीज़ नहीं होता, बुत के पीछे जो शख्सियत होती है, उसे अल्लाह का शरीक माना जाता है। बुतों के पीछे वाकई कोई हक़ीक़त यानी अल्लाह होता तो इन्हें पूजना गुनाह न होता क्योंकि ये उस हक़ीक़त के सिम्बल, अलामत बन जाते। क़ुरान ने कहा है कि इनके, बुतों पीछे कोई हक़ीक़त नहीं है। ये फला का बुत है, वो कौन था, क्या हैसियत थी, क्या अल्लाह ने उसे कुछ इख्तियार दिया था? इन्हें अल्लाह का शरीक बना कर पूजना इसलिए गुनाह है क्योंकि ये हक़ीक़त नही है बल्कि अल्लाह पर झूठ बांधना है। बुत परस्ती शुरू ही ऐसे हुई थी जब किसी को अल्लाह का शरीक बना दिया गया और फिर उसके सिम्बल के तौर पर उसका बुत बना दिया गया। वरना अपनी ज़ात में सिम्बल बनाना गलत नहीं है बस उसके पीछे हक़ीक़त होनी चाहिए, झूठ नहीं। हक़ीक़तों की अलामत बनाना शिर्क नहीं है। जिसकी हक़ीक़त नहीं है, उसकी अलामत बनना शिर्क है। अल्लाह के लिए अलामत बनाने में कुछ गलत नहीं है बस शिर्क से बचना है, अलामतों से नहीं। जैसे हज्रे अस्वद के पीछे अल्लाह है, वो उसका सिम्बल, अलामत है, उसके किसी शरीक का नहीं। बैतुल्लाह अल्लाह का सिम्बल है। हज्रे अस्वद भी ऐसा ही है। तवाफ़, रुकू, सजदे भी अलामतें हैं। सजदे के सामने अल्लाह नही होते, हम अपने वजूद को उसके सामने झुकाते हैं। जैसे शैतान को कंकर मारने, उसके खिलाफ जंग की अलामत है। ये सभी अल्लाह की ज़ात से जुड़े हैं। जैसे झंडे, वतनी तराने मुल्क की अलामतें होती हैं, इनके पीछे एक हक़ीक़त होती है, ये हमारे वाकई मुल्क होते हैं, हम उनके पाबन्द होते हैं। वतन से मुहब्बत जायज़ है तो झंडे को सलाम भी जायज़ है। अगर खुदा की इबादत दुरुस्त है तो उसका घर मस्जिद की शक्ल में बनाना भी दुरुस्त है। अगर अल्लाह से अहद ठीक है, तो उसके लिए पत्थर को अलामत बनाना भी ठीक है।
इसके अलावा, काबा (या हजरे अस्वद) और उसमें पूजी जाने वाली मूर्तियों को एक ही मानने में कुछ बुनियादी गलती है। आम तौर पर भक्त अपने आराध्य की मूर्ति उसके मूल और वास्तविक आकार, रंग, रूप के अनुसार ही बनाता है, जबकि काबा या हजरे अस्वद के निर्माण में यह भावना या विचार कभी नहीं था और अब भी नहीं है (यह अलग सवाल है कि काबा को पहली बार किसने बनवाया या हजरे अस्वद पत्थर कहां से आया)। आमतौर पर मूर्तियां हमेशा जीवित प्राणियों की बनाई जाती रही हैं और उन मूर्तियों का वास्तविक रूप जीवित प्राणियों को ही माना जाता है। जबकि काबा और अस्वद में यह अवधारणा स्पष्ट रूप से नहीं पाई जाती। इसके अलावा हमें इन मूर्तियों या काबा, अस्वद को मानने वाले अनुयायियों की भावनाओं को भी ध्यान में रखना चाहिए कि वे इन मूर्तियों या पत्थरों (काबा सीमाओं का नाम है, पत्थर की दीवारों का नहीं) को अपना पूजनीय मानते हैं या सिर्फ एक निर्जीव वस्तु। मुसलमान हमेशा से उन्हें सिर्फ निर्जीव ही मानते आये हैं। हालांकि, दोनों के अनुयायियों में इन प्रतीकों को लेकर काफी दीवानगी है, जिससे कई सवाल उठते हैं कि यह कितना सही है। लेकिन दोनों के बीच अंतर को नकारा नहीं जा सकता। दोनों के बीच कई अन्य अंतर भी हैं जैसे कि काबा पर खड़ा होना अपराध नहीं माना जाता।
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मकामे इब्राहिम
ऐसा लिखा मिलता है कि ह. इब्राहिम को भी 3 पवित्र पत्थर दिए गए थे, एक हज्रे अस्वद, दूसरा मक़ामे महमूद का पत्थर (जिसमें उनके पैरों के निशान हैं) और तीसरा पत्थर बनी इस्राइल के लिए था (जिससे ह. मूसा ने पानी की धारा निकाली थी)। कहा जाता है कि जब इब्राहिम काबे को ऊंचा कर रहे थे तो इस पत्थर पर चढ़कर इस्माइल को कंधों पर बिठा कर तामीर मुकम्मल करते थे। ये भी कहा जाता है कि ये पत्थर अपने आप ऊंचा होता चला जाता था। ये पहली बात का ही तमसीली बयान लगता है। ये भी माना जाता है कि इब्राहिम इस पर खड़ा होकर लोगों को हज की दावत देते थे। ये भी कि काबा की तामीर या तवाफ़ के बाद आपने यंही पर नमाज़ अदा करी थी। इन दोनों बातों की ओर क़ुरान से इशारा मिलता है, जंहा इसका 2 बार जिक्र है (2:125, 3:97). नबी से पहले ये काबा के अंदर रखा हुआ था, जो फतह मक्का के बाद बाहर रखा गया जो कि इसकी असल जगह मानी जाती है। हदीसों से मालूम पड़ता है कि नबी के दौर तक इसमें पंजें और ऐड़ी के निशान दिखाई देते थे जो बाद में बार बार छूने से मिट गए। हम जानते हैं कि इस्लाम से पहले से ही दुनिया भर में अपने महापुरुषों के पैरों के निशान संजोने का चलन रहा है जैसे आदम, बुद्ध, महावीर, राम, कृष्ण, यीशु, मुहम्मद सल्ल. आदि (भले ही प्रमाणिकता संदिग्ध हो)।
रियाज़अल जन्नत
मदीना में मस्जिद-ए-नबवी के अंदर पैगम्बर के रोज़े के बगल में, एक क्षेत्र को जन्नत माना जाता है, जिसे रियाज़-अल-जन्नत कहा जाता है। पैगम्बर ने कहा है कि उनके घर और मिम्बर के बीच जन्नत के बगीचों में से एक बगीचा है। इसका मतलब यह नहीं है कि यह जगह जन्नत से लाई गई थी। यह एक आम अभिव्यक्ति है जिसका अर्थ है कि पैगम्बर ने आध्यात्मिक रूप से जिस जगह को महसूस किया, वह जन्नत का बगीचा था। इसका मतलब यह है कि इस जगह से पैगम्बर को महत्वपूर्ण और सार्थक आध्यात्मिक अनुभव हुआ, जरूरी नहीं कि सभी को ऐसा ही महसूस हो। इब्ने हजर अल असकलानी ने बुखारी में दर्ज इस कथा की अपनी टिप्पणी में लिखा है कि इसका मतलब है 'जन्नत के बगीचों में से एक बगीचे जैसा'।
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