अल्लाह का हर काम करने का तरीका सर्वश्रेष्ठ है। मखलूक का इम्तिहान लेने के लिए इससे बेहतर निज़ाम हो ही नहीं सकता था। क्योंकि इसमें अल्लाह की निशानियां भी दिखाई जाती है और उसकी पर्दादारी भी बरक़रार रहती है। वो सामने आता भी नहीं पर अपने जलवे भी ज़ाहिर करता रहता है। अल्लाह से मिलना, देखना या उसे सुनना ही मखलूक के इम्तिहान के बदले सबसे बड़ा इनाम है। अगर इम्तिहान से पहले ही इनाम दे दिया जाए तो इम्तिहान बेमानी हो जाएगा। इनाम पाने की चाह ही इम्तिहान की रूह को बरक़रार रखती है। नबी अल्लाह के चुनिंदा बंदे है और आम इंसानों से बहुत बेहतर होते हैं। मगर जिस्मानी और मानसिक तौर पर वो भी इंसान है इसलिए इंसानों के लिए बनाए गए कानून उन पर भी लागू होते है। तमाम इंसानों को इम्तिहान के बाद ही अल्लाह से मुलाक़ात का शरफ़ हासिल होना है। यक़ीनन नबी और रसूल अल्लाह के क़रीब हैं पर उनकी ज़िंदगीयां उनका भी इम्तिहान ही है।
क़ायनात में हर काम अल्लाह करता है या उसकी मर्ज़ी से होता है. अल्लाह के अंजाम देने की ज़िम्मेदारी अलग अलग मखलूक, शय को है. उनके ज़रिए से ही अल्लाह काम करवाता है. यानी करता वो खुद है पर करवाया किसी और से जाता है। असल में अल्लाह के अलावा कोई ज़ात किसी काबिल नहीं. अल्लाह है तो वो हैं. अल्लाह ने क़ायनात में कामों के लिए फ़रिश्ते मुसल्लत किये हुए हैं।
यानी पहले अल्लाह किसी को ऑथोराइज़ और एम्पावर करता है कि फलां काम इसे करना है फिर उसे वो काम करने की अक्सर सैंक्शन या अप्रूवल भी देता है। जैसे मुख्यमंत्री के नाम पर चीफ सेक्रेटरी अक्सर फैसले लेने को ऑथोराइज़ है पर अक्सर कुछ फाइल पर मुख्यमंत्री के दस्तखत के द्वारा सैंक्शन या अप्रूवल भी लेता है. जैसे मुख्यमंत्री कभी भी मिनिस्ट्री में बैठे अफसर को सीधे आदेश नहीं देता बल्कि अपने निकटतम सबसे बड़े अफसर को आदेश आगे जारी करने को देता है। ऐसे ही अल्लाह सीधे हुकुम देने की बजाए अपने निकटतम फरिश्ते को अपनी अप्रूवल देके आगे आदेश पहुंचाने को कहता है जिस को वहीय पहुंचाने के लिए ऑथोराइज़ कर रखा है। ये एक हाइरेरकिअल सिस्टम है जैसा इंसान भी बनाते हैं निजामों को दुरुस्त चालाने के लिए.
अल्लाह हर चीज़ पर कुदरत रखता है और उनको हकुम दे कर काम करवा सकता है
और करवाता है, चाहे वो जानदार हो या बेजानदार। अल्लाह किसी की सहायता नहीं लेता सिर्फ आदेश देता है। फ़रिश्ते उसकी बनायी सृष्टि है जो उसके आदशों के अनुसार कार्य करते हैं और इसलिए उसके ही अधीन है।
ये ब्रह्माण्ड अल्लाह की मशीन है और फ़रिश्ते उसकी मशीन के पुर्ज़े। अल्लाह के कुन कहने पर क़ायनात वजूद में आ गयी . कुछ लोग पूछते हैं कि ब्रह्मांड बनने में इंसानी खरबों वर्ष लगे पर अल्लाह चाहता तो इसे एक झटके में भी बना सकता था। असल में उन लोगों को समझना चाहिए कि ये इंसानों खरबों साल अनादी अनंत अल्लाह के लिए तो पल भर ही हैं. अल्लाह के काम करने का एक विशेष तरीका है जो सर्वश्रेष्ठ है, जो अपने समय, चाल के हिसाब से चलता है. ये तरीका इंसानों की तसल्ली, तहक़ीक़ के लिए है, खासतौर से साइंस के ज़रिये कायनात के मालिक को ढूँढने वालो के लिए। इसलिए जो ये कहे कि अल्लाह ने समय का सहारा लिया ब्रह्मांड बनाने में तो ये एक कुतर्क होगा।
आम
तौर पर ये माना जाता है कि फ़रिश्ते को इरादे का इख्तियार नहीं दिया गया
है। जबकि एक अकलियत (जैसे तबरी, सुयुति, नसाफ़ी और मातूरिदी वगैरह) का मौकिफ़ यह भी है कि फ़रिश्तें को भी इसानों और जिन्न
की तरह मर्ज़ी और इख्तियार दिया गया है. पर वो खुदा के हकुम की कभी मुखालफत
नहीं करते (क़ुरान 66:6), लफ़्ज़ों पर ध्यान दें, ये नहीं कहा कि वो, नाफरमानी कर नहीं सकते यानी
उनमें ये माद्दा ही नहीं है. फरिश्तें खुदा के करीब
रहते है और वही करते हैं जो उन्हें हुकुम दिया जाता है। फरिश्तों के लिए इम्तिहान नहीं है, वो अल्लाह के हुजुर में हैं. यानी फ़रिश्तो को भी इख़्तियार होता है
मगर महदूद किस्म का और इंसानो से मुख्तलिफ। उनका इरादा इख़्तियार कैसा और कितना है, हमें नहीं मालूम क्योंकि हमें थोड़ा ही इल्म दिया गया है। इसीलिए उनका अल्लाह से डिस्कशन और सवाल जवाब भी हो जाते हैं. कुरान में फरिश्तों का अल्लाह से सवाल करने का ज़िक्र, उनके
इख़्तियार की निशानी है। इस्लाम के मुताबिक बेजान
चीज़ें और ग़ैर माद्दी चीज़ें भी शख्सीयत रखती हैं। क़ुरान (41:11) ने बताया कि अल्लाह ने आसमान- ज़मीन से
कहा, आओ अपनी ईच्छा से या अनिच्छा से तो उन्होंने कहा हम
इच्छा से आते हैं। यानी इन्हें भी इख़्तियार हासिल है। इन शय के पास शख्सियत और शऊर
है, मगर हमारे जैसे नहीं है। इन सभी के ऐसी सिफ़तों की एक हद
होती है। अल्लाह और पूरी कायनात का राब्ता शऊरी है।
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इंसानों और फरिश्तों में कौन बेहतर मखलूक, हम नहीं जानते. कुरान
ईशारा देता है कि फरिश्तें भी जमात- ए- नमाज़ के ज़रिये अल्लाह की हमद करते
हैं. फरिश्तें महिला नहीं होती हैं (कुरान (43:19, 37:150 के मुताबिक) तो
क्या वे पुरुष होते हैं, हम ऐसा भी नहीं कह सकते. हदीसों में 70 हज़ार फरिश्तों का ज़िक्र आया है मगर इनकी संख्या इससे भी ज़्यादा हैं. कहा जाता है कि फ़रिश्तें कई तरह के होते है। अल क़ाज़विनि ने फ़रिश्तों
को 2 प्रकार में बांटा है, एक जो ऊंचा मकाम रखते है और परलोक से संबंध
रखते है, दूसरे वो जो नीचा मकाम रखते है और दुनिया से सम्बंधित है। फरिश्तों को अलबैदावी ने भी 2 और इमाम राज़ी ने 8 प्रकार में बांटा है. कुरान में बताया गया है कि फरिश्तों में से भी रसूल चुने जाते हैं. कुरान
में कई जगह फरिश्तों का इंसानी शक्ल इख्तियार करने का ज़िक्र मौजूद है.
कुरान नहीं बल्कि हदीस बताती है कि फरिश्तों को नूर
से बनाया गया है। वैसे भी कियास आसन है कि जब माद्दे की 3 शक्लों में से मिट्टी से इंसान, ऊर्जा से जिन्न बने हैं तो फ़रिश्तें प्रकाश से ही बने होंगे। नूर
का मतलब है रोशनी। रोशनी (Light) भी गर्मी (ऊष्मा, Heat) की तरह ही ऊर्जा (Energy) का एक रूप है। फ़रिश्तों
को क़ुरान में मलाइका कहा गया है। ये लफ्ज़ बना है मलाकुम से जिसका मलतब
होता है ताकत (Force)। ये लफ्ज़ मलक धातू से भी बना है जिसका मतलब पयम्बर या पैगम्बर भी होता है यानी पैगाम पहुंचाने
वाला। मलिक का मतलब भी पैगम्बर होता है। फ़रिश्तें पैगम्बर की भूमिका निभाते हैं इसलिए इन्हें मलाइका कहा गया है।
नूर से बने होने कारण फ़रिश्तों बेहद खूबसूरत माना जाता है और उनका वजूद भी माद्दी नहीं माना
जाता. इसलिए ऐसा माना जाता है कि ये दिखाई नहीं देते हैं (हालाँकि कुरान इस बारे में खामोश है). मगर हो सकता है कुछ माद्दी सूरत में भी हो या माद्दी और गैर माद्दी दोनों सूरत ले सकने वाले हो, या शायद सभी ऐसा कर सकते हो। पर हम ऐसा कुछ भी यकीन से नहीं कह सकते क्योंकि हमें फ़रिश्तों के बारें में इतनी जानकारी नहीं मिलती जीतनी जिन्नों के बारे में मिलती है, हमें थोडा ही इल्म दिया गया है। फरिश्तों के बारे लोगों के अपने बनाए हुए तसव्वुरात ज़्यादा मकबूल हो गए हैं.
कुरान में बताया गया है कि फरिश्तों के पंख होते हैं मगर उस आयात से ऐसा भी लगता है कि जैसे सिर्फ पैगम्बर बनाए गए फरिश्तों के ही पंख होते हैं. ये मायने तम्सीली भी हो सकते हैं और अगर लिटरल भी लें तो ज़रूरी नहीं वो दुनिया में पाए जाने वाले परिंदों के पंखों के मांनिंद ही हो. कुरान में मौत के फरिश्तों के हाथ का भी ज़िक्र है मगर वो तम्सीली है. कुरान में फरिश्तों में सिर्फ ह. जिब्रील के असल रूप का ज़िक्र है मगर सिर्फ इतना कि वो कंहा और कितनी दूरी पर दिखाई दिए थे. हाँ, हदीसों में जिब्रील के सेकड़ों पंखों और आसमान से ज़मीन तक उनके छाए हुए दिखाई देने का ज़िक्र आया है. ऐसा माना जाता है कि फ़रिश्ते की लंबाई, चौढाई बहुत होती है और हदीसों में लगभग ऐसी समान लम्बाई चौढाई की बात बयान हुई है मगर वो फरिश्तों के बारे में उनकी अपनी दुनिया की और जहन्नुमी लोगों के जहन्नुम में जाने के बाद, दोनों के लिए समान तौर पर बयान हुई है, ऐसा लगता है कि ये बात शायद गडमड हो गयी है।
फरिश्तें दुनिया की माद्दी चीज़ों को रब के हुकुम के मुताबिक कण्ट्रोल करते हैं. इस्लाम के मुताबिक पहाड़ों, समुन्द्र, बारिश के फरिश्तें होते हैं. बाज़ फरिश्तों को कुछ प्राकृतिक शक्तियों की ज़िम्मेदारी भी दे रखी है. गैर
मुस्लिमों को समझाने के ऐतबार से ऐसा कहा जा सकता है कि जैसे ग्रेविटी या
प्रकृति भी फरिश्ते हैं. इसका मतलब यंहा यह नहीं लीजियेगा कि बिलकुल ऐसा ही
है. पर ऐसा हो भी सकता है कि शायद ये बाज़ माद्दी प्राकृतिक चीज़ें भी फ़रिश्तें हों। भले
ही बहुत थोड़ी सी ही सही, एक अकलियत कुदरत की ताकतों को ही फ़रिश्तें कहते
है। सर सय्यद अहमद खां और ग़ुलाम अहमद परवेज़ ने दरअसल क़ायनात की मौजूद कुदरत
की फ़ोर्स या पावर को ही फ़रिश्तें कहा है। प्राकृतिक शक्तियों को ही फरिश्तें मानाने वाले शायद आसमान, बादल, सूरज, चाँद को इसलिए ऐसे रूप में देखते हैं. एक रिवायत में जिब्रील और मिकाइल को सूर्य और चंद्रमा की तरह अधीनस्थ रचनाएँ बताया गया है। बाज़ वक़्त और कौमो में अल्लाह की सिफ्तों यानी विशेषताओं को ही फ़रिश्ता माना गया है. जैसे प्राचीन काल में हिन्दू धर्म में इन फ़रिश्तों को ही देवता कहा जाता था जो ईश्वर के अधीन थे या उसकी सिफ़तें थे। इन्हे ही बाद में भगवान या पूजनीय बना दिया गया। क़ुरान की तारीख पर लिखी गयी बहुत तफसीरों और किताबों में साबईन के बारे में ये भी कहा गया है कि इन्होंने फ़रिश्तों को ही माबूद बना लिया था। और हम जानते है कि ये लोग हिन्दू क़ौम ही है।
जंगे बदर में 313 साहाबा के सामने 1000 मुश्रिक थे। उनकी मदद फ़रिश्तों (इनकी तादात 1000 मानी जाती है) ने की पर कैसे ये नहीं मालूम पड़ता। अगर उन्होंने जिस्मानी मदद की होती तो हर एक फ़रिश्ता, एक एक मुश्रिक को कत्ल कर सकता था पर वो सिर्फ 70 मरे थे और अगर जादुई या करामाती मदद करी होती तो एक फ़रिश्ता ही हज़ार का खात्मा कर सकता था। इसका मतलब यह है कि उन्होंने न माद्दी तौर पर और न ही सिफती तौर पर साहाबा की मदद करी बल्कि नफसी तौर पर की यानी मेंटली। शायद उन्होंने मुश्रिक के दिलो दिमाग और इरादों को कमज़ोर किया और साहाबा का मज़बूत किया। जैसे शैतान वसवसे डालता है दिलो दिमाग पर, वैसे ही। जो मुसलमान फरिश्तों को प्राकृतिक शक्तियों का रूप या अंग मानते हैं (फिलहाल गलत या सही बहस में नहीं जाते), उनका मानना है कि शायद ऐसा भी हो सकता है कि जैसे हवा मुसलमानों के पीछे से मुशरिकों की तरफ बह रही हो जिससे उनके वार हल्के पड़ रहे हो, हवा से रेसिस्टेन्स झेलना पड़ रहा हो, आँखों में चुभन हो रही हो या हो सकता है कि उनका रुख सूरज की तरफ हो और उसकी तपिश और चौंध उनके चेहरों की तरह सीधा आ रही हो या शायद ग्रेविटी उनकी ज़्यादा ताकत खींच रही हो।
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फरिश्तों के नाम और काम
जिब्रील बेहद अहम फरिश्तें हैं और वहिय पहुंचाने का काम करते हैं. इनका नाम कुरान में है.
मीकाईल को वर्षा (संभवत बादल, हवा भी) और वनस्पति (vegetation, plant growth) का प्रभारी नियुक्त किया गया है, ताफासीर के मुताबिक। इनका भी नाम कुरान में है.
इसराफिल को कयामत शुरू होने पर सुर फूंकने के लिए नियुक्त किया गया है।
अज़राइल (मलाकुल मौत) या मृत्यु का फ़रिश्ता और उसके सहायक फरिश्तें.
कुरान 32:11: मृत्यु का फ़रिश्ता जो तुमपर नियुक्त है, वह तुम्हें पूर्ण रूप से अपने क़ब्जे में ले लेता है।
हालंकि सहीह हदीस में इसका कोई प्रमाण नहीं है कि उसका नाम अज़राइल है जैसा आम तौर पर माना जाता है।
(इन चारों को मुख्य फरिश्तें या Archangels माना जाता है.)
किरामन - कतीबीन इंसानों के कर्मों को लिखते हैं.
कुरान 82:10-11: जबकि तुमपर निगरानी करने वाले नियुक्त हैं, किरामन कतीबीन (noble recording), वे लिख रहे होते हैं जो कुछ भी तुम करते हो।
मालिक नामक फ़रिश्ता नर्क का रखवाला है.
कुरान 43:77: (नर्क में लोग) वे पुकारेंगे, "ऐ मालिक! तुम्हारा रब हमारा काम ही तमाम कर दे!" वह कहेगा, "तुम्हें तो इसी दशा में रहना है।"
मुनकर और नकीर
हदीस में मुनकर और नकीर का ज़िक्र है कि जब मृतक को दफ़न किया जाता है, तो उसके पास दो नीले-काले फ़रिश्ते आते हैं, जिनमें से एक को मुनकर और दूसरे को नकीर कहते हैं और वे उससे सवाल पूछते हैं.
हारूत और मारूत
कुरान 2:102: उन्होंने उन बातों का अनुसरण किया जो शैतान ने सुलैमान के समय में कही थी। हालाँकि सुलैमान ने कोई कुफ़्र नहीं किया था, बल्कि कुफ़्र तो शैतानों ने किया था. वे लोगों को जादू सिखाते थे और वह चीज़ भी जो बाबुल में हारूत और मारूत नामक दो फ़रिश्तों पर उतारा गया था। लेकिन वे दोनों फ़रिश्तें किसी को तब तक नहीं सिखाते जब तक वे यह न कह देते कि "हम तो बस एक परीक्षा हैं; तो तुम कुफ़्र में न पड़ना।"। फिर भी लोग उनसे वह सीखते हैं जिसके ज़रिए वे पति और पत्नी के बीच अलगाव पैदा कर दें। यद्यपि वे उससे किसी को भी हानि नहीं पहुँचा सकते थे जब तक अल्लाह न चाहे. पर लोग वह सीखते हैं जो उन्हें नुकसान पहुँचाता है और जो उन्हें फ़ायदा नहीं पहुँचाता। लेकिन बनी इसराइल को ज़रूर पता था कि जिसने जादू खरीदा है, उसका आख़िरत में कोई हिस्सा नहीं होगा। कितनी बुरी चीज़ के बदले उन्होंने अपने प्राणों का सौदा किया।
जहन्नुम के फरिश्तें
कुरान
74: 26- 30: मैं शीघ्र ही उसे 'सक़र' (जहन्नम की आग) में झोंक दूँगा। और
तुम्हें क्या पता कि सक़र क्या है? वह न तरस खाएगी और न छोड़ेगी, खाल को
झुलसा देने वाली है, उस पर उन्नीस (फरिश्तें) नियुक्त हैं।
मलकुल - जिबाल
पहाड़ों
के फ़रिश्ते मलकुल - जिबाल (पर्वतों का फ़रिश्ता) को माना जाता है. हालाँकि
प्रमाणिक किताबों में इनका ये ज़ाती नाम लिखा नहीं है. जब तायफ के लोगों ने
नबी को पत्थरों से ज़ख़्मी किया, तो यही उनके पास आए थे.
इंसानों के साथ फरिश्तें
कुरान 13:10-11: उसके पहरेदार (फरिश्तें) उसके (इंसानों के) अपने आगे और पीछे लगे होते हैं जो अल्लाह के आदेश के कारण, उसकी रक्षा करते हैं।
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फरिश्तें
पैगम्बर, पंख वाले, नूर से पैदा, हाथ वाले
● कुरान 4:136: ऐ ईमान
लानेवालो! अल्लाह पर ईमान लाओ और उसके रसूल पर और उस किताब पर जो उसने अपने रसूल
पर उतारी है और उस किताब पर भी, जिसको वह इसके पहले उतार चुका है। और
जिस किसी ने भी अल्लाह और उसके फ़रिश्तों और उसकी किताबों और उसके रसूलों और
अन्तिम दिन का इनकार किया, तो वह भटककर बहुत दूर जा पड़ा।
● कुरान 35:1: अल्लाह
ने फरिश्तों को पैगम्बर (संदेशवाहक) बनाया, दो, तीन, चार पखों
वाला {Allah made the angels, messengers having/with wings, two or three or four}.
[ऐसा लगता है जैसे सिर्फ पैगम्बर बनाए गए फरिश्तों के इतने पंख हैं]
● कुरान 22:75:
अल्लाह फ़रिश्तों में से पैगम्बर (संदेशवाहक) चुनता है और मनुष्यों में से भी।
● मुस्लिम 2996:
फ़रिश्ते नूर से पैदा हुए और जिन्न आग की चिंगारी से पैदा हुए और आदम का जन्म वैसा
ही हुआ जैसा कि तुम्हारे लिए (कुरान में) परिभाषित किया गया है (यानी वह मिट्टी से
बना है).
● कुरान 6:93 :
फ़रिश्ते अपने हाथ बढ़ा रहे होते हैं कि "निकालो अपने प्राण! आज तुम्हें
अपमानजनक यातना दी जाएगी।
[ये तम्सीली बात है]
फरिश्तें
इंसानी
शक्ल में
● कुरान ने बताया कि
फरिश्तें इंसानी शक्ल में आते हैं. जैसे ह. मरयम से जिब्रील इंसानी शक्ल में
मिले थे (19:17), जैसे
इब्राहिम और लूत के पाए फरिश्तें इंसानी शक्ल इख्तिआर करके आये थे (11:69-70), जैसे हारूत और मारूत फरिश्तें इंसानों के
राब्ते में थे. जैसे हदीसे जिब्राइल से भी पता लगता है कि जिब्राइल अलैह नबी से मिलने
इंसानी शक्ल में आये थे।
कुरान (6:8-9) ने बताया
कि वे कहते हैं,
उस
पर कोई फ़रिश्ता क्यों न उतारा गया, यदि हम कोई फ़रिश्ता उतार देते तो
मामला तय हो जाता, फिर उन्हें मोहलत न मिलती। और यदि हम उसे
फ़रिश्ता बनाते तो उसे इन्सान बना देते, और उन्हें उसी से
ढाँप देते जिससे वे अपने आपको ढाँपते हैं।
फरिश्तें
असल में कैसे दिखते हैं
● कुरान 53:5-10: उसे (मुहम्मद सल्ल.) एक
शक्तिशाली और महान सिद्ध पुरुष (जीब्रील) ने (क़ुरआन) सिखाया है, जो एक बार अपने वास्तविक रूप में आया, जब वह क्षितिज के ऊपर सबसे ऊँचे स्थान पर
था। फिर वह निकट नीचे आया, और वह 'दो
धनुष की लम्बाई' या उससे भी अधिक दूरी पर था और उसने अपने बन्दे पर वही उतारा जो उसने (उसके लिए) उतारा था।
● तिरमिज़ी 3283: अब्दुल्लाह ने कहा कि नबी ने जिब्राइल को रफ़्रफ़ के हुल्लाह (आमतौर पर दो टुकड़ों से बना पोशाक) में देखा जो आकाश और पृथ्वी के बीच में जो कुछ है उस भरे हुए दिखाई दे रहे थे (filling what is between the heavens and the earth).
● मुस्लिम, 174c, बुखारी 4856, 4857: इब्न मसऊद ने बताया कि नबी ने जिब्रील को उनके असल रूप में देखा था और उनके 600 पंख थे।
● दावूद 4727: जाबिर ने बताया कि मुझे ये बताने की आज्ञा दी गयी है कि एक फ़रिश्ता है जो जब सिंहासन धारण करता है तो उसके कान की लोब और उसके कंधे के बीच की दूरी सात सौ साल की यात्रा के बराबार होती है।
● मिश्कात 5690: इब्न उमर ने बताया कि नबी ने फ़रमाया कि नरक के निवासी नरक
में इतने विशाल हो जाएंगे कि उनमें से एक के कान की लोब और कंधे के बीच की
दूरी सात सौ साल की यात्रा के बराबर होगी, उसकी त्वचा की मोटाई सत्तर हाथ
होगी, और उसका दाढ़ उहुद जैसा होगा।
[दोनों हदीसों में लगभग एक ही बात बयान हुई है मगर शक्सियत अलग अलग हैं]
फरिश्तों का नीचे उतरना
● कुरान 70:4: फ़रिश्ते और रूह उस दिन उसके पास
चढ़ेंगे जिसकी अवधि पचास हज़ार वर्ष है।
● कुरान 97:4: फ़रिश्ते और रूह अपने रब की अनुमति
से हर मामले में उतरते हैं।
● कुरान 16:2: वह अपने बन्दों में से जिस पर चाहता
है, अपने आदेश के साथ फ़रिश्तों को उतारता है।
● कुरान 2:97: जिबरील ने तो उसे (कुरान) अल्लाह ही के हुक्म से तुम्हारे
(नबी) दिल पर उतारा है. जो उसी के अनुकूल है जो
तुम्हारे दिल में पहले से मौजूद थी.
अल्लाह का हुक्म मानते हैं
● कुरान 16:49-50: आकाशों में और धरती में
जितने भी जीवित प्राणी हैं, अल्लाह ही के आगे झुकते हैं, फ़रिश्ते भी, वे इस पर घमंड
नहीं करते। वे अपने रब से डरते हैं जो उनके ऊपर है और जो आदेश उन्हें दिया जाता है,
वह वे करते हैं।
● कुरान 21:26-29: वे कहते हैं कि अल्लाह ने बेटा पैदा किया है। वे (जिन्हें
वे अल्लाह की संतान कहते हैं, अर्थात्
फ़रिश्ते, ईसा, उज़ैर वगैरह) सिर्फ़
अल्लाह के प्रतिष्ठित बन्दे हैं। वे तब तक कुछ नहीं बोलते जब तक कि अल्लाह न बोल
दे (अल्लाह से आगे बढ़कर नहीं बोलते हैं) और उनके आदेश का पालन करते हैं। वे किसी
की सिफ़ारिश नहीं करते सिवाय उसके जिसके लिए अल्लाह पसन्द करे। और वे उसके भय से
डरते रहते हैं। और जो उनमें से यह कहे कि अल्लाह के सिवा वह भी एक इलाह है तो
हम उसे बदले में जहन्नम देंगे। ज़ालिमों को हम ऐसा ही बदला दिया करते हैं।
नियुक्त करे गए
● कुरान 82:10-12: तुम्हारे ऊपर रखवाले नियुक्त किए गए हैं, जो उदार और रिकार्ड करने वाले हैं; वे जानते हैं कि तुम क्या करते हो।
● कुरान 50:17-18: जब
दो प्राप्त (receivers) करने वाले
(फ़रिशते) प्राप्त (रिकार्ड) करते हैं, दाएँ और
बाएँ बैठे हुए। कोई बात किसी ने कही नहीं कि उस पर एक निरीक्षक (watcher) तैयार
रहता है (रिकार्ड करने को)।
● कुरान 32:11: कह दो कि मृत्यु का फ़रिश्ता, जिसे तुम्हारे ऊपर नियुक्त किया गया है, वह तुम्हें ले जाएगा (वफात) फिर तुम अपने रब की ओर लौटाए जाओगे।
● कुरान 66:6: उस आग से बचाओ जिसका ईंधन मनुष्य और पत्थर हैं, जिस पर कठोर और सख्त फ़रिश्ते नियुक्त हैं। वे अल्लाह के
आदेश की अवज्ञा नहीं करते, बल्कि जो आदेश उन्हें दिया जाता
है, वही करते हैं।
● कुरान 7:37: हमारे भेजे हुए (फ़रिश्ते) उनके प्राण निकालने उनके पास आएँगे
तो कहेंगे, कहाँ हैं, वे
जिन्हें तुम अल्लाह को छोड़कर पुकारते थे?
● कुरान 89:22: (जब क़यामत आयेगी) तुम्हारा रब आएगा और फ़रिश्तें भी जो पद अनुसार/पंक्ति
में (rank wise) होंगे.
● कुरान 8:12: जब
तुम्हारा रब फ़रिश्तों की ओर प्रकाशना (वह्य्) कर रहा था कि मैं तुम्हारे साथ हूँ।
अतः तुम ईमानवालों को जमाए रखो। मैं इनकार करने वालों के दिलों में रोब डाले देता
हूँ। तो तुम उनकी गरदनें मारो और उनके पोर-पोर पर चोट लगाओ.
● In a narration, Abdullah ibn Salam said that, Jibril and Mikail are subordinate creations like the sun and the moon (Islam QA)
दुनिया और अखिरत में इंसानों के सहायक और उनकी मगफिरत मांगने वाले.
● कुरान 41:30-31: उन पर फ़रिश्ते उतरेंगे... और कहेंगे हम सांसारिक जीवन में
भी तुम्हारे सहायक थे और आख़िरत में भी हैं। और जो
कुछ तुम्हारा जी चाहेगा, वह उसमें तुम्हारे लिए होगा और जो कुछ तुम चाहोगे, वह
उसमें तुम्हारे लिए होगा।
● कुरान 42:5: फ़रिश्ते अपने रब की तसबीह करते हैं और ज़मीन वालों के लिए क्षमा की प्रार्थना
करते हैं।
● कुरान 37:165-166: बेशक हम (फ़रिश्ते) सफों (कतारों) में खड़े होते हैं और उसकी तसबीह (प्रशंसा) करते हैं.
[नमाज़ का ज़िक्र लगता है]
अल्लाह के करीब
● कुरान 39:75: तुम फ़रिश्तों को अर्श के चारों ओर खड़े देखोगे, जो अपने रब की प्रशंसा करते हुए उसकी तसबीह कर रहे होंगे।
● कुरान 69:17: फ़रिश्ते उसके किनारों पर होंगे और उस दिन आठ फ़रिश्ते
तुम्हारे रब का अर्श अपने ऊपर उठाए होंगे.
● कुरान 40:7: जो सिंहासन को उठाए हुए हैं और जो उसके आस पास हैं, अपने रब का गुणगान करते हैं और उस पर ईमान रखते हैं और उन
लोगों के लिए क्षमा की प्रार्थना करते हैं जो ईमान लाए कि "ऐ हमारे रब! तू
अपनी दयालुता और अपने ज्ञान से हर चीज़ को व्याप्त है। अतः जिन लोगों ने तौबा की
और तेरे मार्ग का अनुसरण किया, उन्हें क्षमा कर दे और भड़कती
हुई आग की यातना से उन्हें बचा ले।
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