Friday, 13 November 2020

गैर मुसलमानों के त्यौहारों पर मुबारकबाद, मिठाई या शामिल होना


त्योहारों की तारीख।

हर धर्म में कुछ त्योहार कुछ खास दिनों की अहमियत की बुनियाद पर बनाये गए हैं। जिनमें से कुछ धर्म से सम्बंधित होते हैं और बाकी बचे ज़्यादातर संस्कृति या परम्पराओं से। वक़्त बीतने के साथ साथ इन त्योहारों के दिन किये जाने वाले कर्मकांडो के साथ साथ, दूसरी चीजें या दूसरे रिवाज़ भी बना लिए गए हैं जिनका कोई धार्मिक महत्व नहीं है, उनको बस सेलिब्रेशन के तौर पर अमल में लाया जाता है। गैर इस्लामी त्योहार के दिन आनन्द और खुशी के लिए खेलकूद या मौज मस्ती के कुछ रिवाज और अमल बनाए गए हैं या वक़्त के साथ इनका हिस्सा बन गए हैं। ये संस्कृति, परंपराओं, रहन सहन से सम्बंधित होते हैं, न कि पूजापाठ या कर्मकांड से।  

भारत में इनमें ऐसे ज़्यादातर मनोरंजन के काम (पटाखे, रंग वगैरह) मुस्लिम बादशाहों और सूफ़ी सन्तों द्वारा या उनके कार्यकाल में ही शामिल हुए है। जैसे मुहर्रम के दिन ताज़िए तैमूरलंग के वक़्त निकालने शुरू हुए थे। इस्लाम ऐसी चीज़ों को करने से बिल्कुल नहीं रोकता बल्कि सिर्फ उन कामों को करने से रोकता है जो शिर्क, कुफ्र, गैर अख़लाक़ी या हराम हैं।

होली के रंग या दिवाली के पटाखो, दशहरा के रावण दहन से इस्लाम को खतरा नहीं है। दीवाली पर फोड़े जाने वाले पटाखे और होली पर डाला जाने रंग का धार्मिक नहीं बल्कि सांस्कृतिक महत्व है जो पहले इन त्यौहारों का हिस्सा नहीं थे और बहुत बाद में जाके मनाए जाने लगे जब इन चीजों की ईजाद हुई। हैलोवीन मनाना भी अब सांस्कृतिक हो चुका है जो पहले कभी एक पेगन या मौसमी त्यौहार ही था। न्यू ईयर तो पहले से ही एक शुद्ध गैर मज़हबी दिवस है। हम जानते हैं कि दीवाली सभी भारतीय धर्मों में मनाई जाती है पर अपने अपने धर्मोत्सव के रूप में। हिन्दू दीवाली को श्रीराम से जोड़ते हैं, बोद्ध दीवाली को दीपोत्सव के नाम से बुद्ध से जोड़ते हैं, जैन दिवाली को महावीर स्वामी से जोड़ते हैं और सिक्ख इसे गुरु हरगोबिंद से जोड़ते हैं। एक मत ये भी है कि दीवाली और होली भारत के किसानों के त्यौहार थे क्योंकि होली रबी की फसल काटने और दिवाली खरीफ की फसल काटने का अवसर है। शायद इसी वजह से दूसरे धर्म के मानने वालों ने भी नई नई कहानियां बना कर इन्हें अपना त्यौहार मानना और मनाना शूरु कर दिया जैसे कि होली और दिवाली को भारत में बौद्ध, जैन, सिख, आदिवासी और अन्य समुदाय भी किसी न किसी स्वरूप में मनाते हैं। असल में बहुत से त्यौहारों का मूल और सच्चा इतिहास जानना मुश्किल है कि क्या, किस तरह शुरू हुआ था।

गैर मुस्लिम त्यौहार असलन जायज़ या नाजायज़।

गैर मुसलमानों के त्यौहारों (अपनी ज़ात में ख़ालिस शिरकिया या कुफ़रिया त्यौहार न हो जैसे गणेश चतुर्थी, हनुमान जयंती, दुर्गा पूजा, ईस्टर आदि जिनकी बुनियाद में एक गैर इंसानी शक्लो सूरत आदि का देव-देवी हो या कोई कुल्ली बातिल अक़ीदा हो) पर मुबारकबाद देना हराम या नाजायज़ नहीं है। ऐसा सीधे तौर पर किसी आयत- हदीस में वाज़ेह नहीं हुआ है। यंहा तक कि उनके साथ ऐसे त्यौहार मनाने में भी कोई बुराई नहीं है, बस शरीयतन उसमें कोई गलत या गैर अख़लाक़ी काम नहीं होना चाहिए। जब भी हम किसी गैर मुसलमान के ऐसे त्यौहार में शरीक हों या उसे बधाई दें तो बस दो बातों ख्याल रखना चाहिए कि उस में कोई शिरकीया और कुफ़्रिया काम नहीं करना है और दूसरा उस में कोई गैर अख़लाक़ी काम या हराम काम नहीं करना है। क़ुरान (सूरह अराफ) के बताए हराम- हलाल के नियमों तो पहले से ही हर जगह हर समय ध्यान में रखने वाले हैं। 

किसी भी गैर ज़रूरी काम (क्या ज़रूरी है क्या नहीं, वो आप को निर्णय करना है) से बचना और किसी भी जायज़ काम में ज़्यादती से बचाना या उसमें हद पार करने से बचना बहुत फायदे का सौदा है, इसलिए ऐसी मुबारकबाद या शिरकत से बचना चाहते हैं तो बिल्कुल बचा जाए। पर यह कोई स्थायी नियम या ज़रूरी नहीं है इसलिए ज़रूरत या बिना ज़रूरत के इसे किया जा सकता है और इसे करने में कोई हर्ज़ नहीं है।

किसी भी लहवल हदीस यानी गैर जरूरी बात से बचना चाहिए मगर दूसरों के ऐसे त्योहारों में शामिल होना या उन्हें मुबारकबाद देना या गिफ्ट आदान प्रदान करना फ़िज़ूल चीज़ नहीं है, खासतौर पर तब जब नफरतों के बाज़ार गर्म हों और हम मुहब्बत की फ़िज़ा बहाना चाहते हों। हम रोज़ अपनी ज़िंदगी में बेशुमार फ़िज़ूल के काम करते हैं मगर उन पर ऐसा सख्ती नहीं दिखाते जैसी इस अमल पर दिखाते हैं। इसकी वजह यही है कि हमने परम्परा से चले आ रहे ऐतराज़ात को ढोने में लगे हुए हैं। मुसलमान मच्छर को छानते हैं मगर ऊंट को निगल जाते हैं।

यह सही बात है कि गैर मुस्लिमों से मोहब्बत करनी चाहिए, उनके लिए खैर-ख़िदमत के काम करने चाहिए, ज़रूरत में उनके मदद करनी चाहिए, अच्छे रिश्ते रखने चाहिए। मगर उनके ₹ ऐसे त्योहारों पर मुबाकरबाद या शिरकत या सेवा में भी कोई हर्ज़ नहीं है। जो मुस्लिम उनके ऐसे त्योहारों में शामिल होते हैं, वो वंहा उनकी मज़हबी रासुमात को अंजाम नहीं देते और न ही उनकी इबादतों में शरीक होते हैं। वो तो बस प्रेजेंस के ज़रिए सौहार्द का एक सिंबॉलिक मेसज या जेस्चर देते हैं।


नबी की सुन्नत से साबित।

● 10 मुहर्रम यानी आशूरा के दिन यहूदी रोज़ा रखा करते थे क्योंकि इस दिन मूसा अलैह. और यहूदियों को फिरोन से निजात मिली थी और उसे डूबो दिया गया था। इस दिन रोज़ा रखने की वजह पूछे जाने पर यहूदियों ने कहा कि इस दिन को वो ईद का दिन मानते हैं, ताज़ीम का दिन और खुदा का दिन भी। ज़ाहिर है अगर इस दिन मूसा अलैह की जीत हुई थी तो ये एक बहुत बड़ा दिन हुआ और अल्लाह का दिन हुआ। क़ुरान में भी बड़े बड़े दिनों को अयामउल्लाह कहा गया यानी अल्लाह का दिन। इसी वजह से रसूलुल्लाह ने भी इस दिन रोज़ा रखने का हुक्म दिया क्योंकि मुसलमान तो मूसा अलैह. के यहूदियों से भी ज़्यादा करीब है और ज़्यादा मानने वाले हैं।

अगर किसी और के त्योहार पर मुबारकबाद देना या मनाना हराम होता तो रसूलुल्लाह कभी इस दिन पर उनकी तरह रोज़ा रखने या रोज़े को अहमियत देने को नहीं कहते। जबकि इस दिन की तारीख भी यहूदियों द्वारा ही फिक्स करी गई थी यानी कोई वहिय के द्वारा इसका इल्म नबी नहीं दिया गया था। इससे यही मालूम हुआ कि गैर मुसलमानों के ऐसे त्यौहार पर उनके साथ शामिल हुआ जा सकता है और वो सभी काम करे जा सकते है जो जायज़ या अच्छे हैं।

दूसरी बात जिस तरह रसूलुल्लाह ने मूसा अलैह. की जीत की तारीख यहूदियों से ली और उस पर उनके जैसा अमल जारी कर दिया। उसी तरह हिन्दुओं में राम नवमी (श्री राम का जन्मदिवस), दीवाली (श्री राम की वनवास से वापसी) और कृष्ण जन्माष्टमी (श्री कृष्ण का जन्मदिवस) मनाया जाता है। जिस तरह ईसाइयों ने खुदा के पैग़म्बर ईसा मसीह को खुदा का बेटा बना दिया, उसी तरह हिंदुओं ने इन महापुरुषों राम और कृष्ण को भी ईश्वर के अवतार या रूप बना दिया। हालांकि इसकी प्रबल संभावना है कि ये भी अवतार पैग़म्बर रहे हों (बल्कि इनको इब्राहिम और मूसा अलैह. से जोड़ कर भी देखा जाता है)।  इसलिए इनसे जुड़ी हुई तारीखों को लेने या उन दिनों पर अच्छे काम करने में कोई बुराई नहीं है। बुराई तभी होगी जब उन अमल में शिर्क, गुनाह या गैर अख़लाकी कामों की मिलावट हो जायेगी। 

रही बात राम जी या कृष्ण जी के मुताल्लिक़ हिन्दू भाइयों के अक़ीदे की तो उसका हमारे अमल पर फ़र्क़ नहीं पड़ेगा क्योंकि यक़ीनन मूसा अलैह. से मुताल्लिक़ यहूदियों के भी सारे के सारे अक़ीदे दुरुस्त नहीं थे और न हैं।

● सहीह बुख़ारी (949, 950) और मुस्लिम बताती हैं कि मदीना में एक दिन आयशा रज़ि० के घर में दो अंसार लड़कियां गैर इस्लामी दौर का बुआत की जंग का गीत गा रही थीं (इस्लाम पूर्व, दो अंसार ट्राइब, खजरज और औस के बीच हुई जंग के) और कोई म्यूज़िकल इंस्ट्रूमेंट बजा रही थीं, हज़रत आयशा उन्हें सुन रही थीं, और नबी सल्ल० उनके घर में मुँह दूसरी ओर करके लेटे हुए थे, जब आयशा रज़ि० के पिता अबूबकर रज़ि० घर में आये तो गुस्सा करने लगे, तब नबी सल्ल० ने हज़रत अबूबकर रज़ि० को रोक दिया और उन लड़कियों को गाने बजाने दिया। ये ईद का दिन दिन था। इसी दिन हब्शी लोग ढाल और भालों के साथ करतब दिखाने का खेल करते थे, नबी सल्ल० ने हज़रत आयशा को उनकी इच्छा पर ये करतब भी उनका दिल भर जाने तक दिखाए और करतब दिखाने वालों का उत्साह भी ये कह कहकर बढ़ाते रहे "ओ बनी अफरीदा, लगे रहो"।  बुखारी (952) में लिखा है कि ये ईद का दिन था और नबी ने अबू बकर से कहा कि रहने दो, हर कौम कि लिए एक ईद होती है और ये हमारी ईद है (ईद कर अर्थ होता है बार बार लौट के आना वाला दिन यानि ईद का अर्थ कोई भी त्योहार है, यह अरबी में गैर मुस्लिम त्योहारों के लिए भी प्रयोग होता था). इसके अलावा, मस्जिद नबवी में नटों का नाच, रसूल (स.) ने ख़ुद भी देखा और अपनी जौज़ा हज़रत आयशा (र.) को भी दिखाया.

रसूल (स.) के ज़माने में अद्दुफ़ नाम का म्यूज़िकल एप्रेटस इस्तेमाल होता था. इसके आगे के एप्रेटस नहीं थे, होते तो वह भी इस्तेमाल होते. जब एक एप्रेटस इस्तेमाल हो सकता है तो दूसरा और तीसरा एप्रेटस इस्तेमाल क्यों नहीं हो सकता है?
 
इससे साबित होता है कि गैर मुस्लिमों के त्योहारों का बढ़ावा न देने के लिए उनका बॉयकॉट करने जैसी दलील देना गलत है। बल्कि उनके साथ ऐसे त्योहारों में शामिल होना चाहिए ताकि एकता और मेल जोल का माहौल बने और उन्हें दीने हक़ का पैगाम पहुंचे। वंहा उनकी गलत जगह या काम पर पर हिकमतन इस्लाह करनी चाहिए और खुद भी ग़लत कामों से बचना चाहिए। इसीलिए उन्हें ऐसे मुबाकरबाद देने के अलावा, उनके ऐसे त्योहारों पर हमें मिली उनकी मिठाई या गिफ्ट भी जायज़ हैं।


दूसरी क़ौम की मुशाबिहत ममनू वाली हदीस का जायज़ा।

दुसरे मज़हबों को मुबारकबाद न देने और उनमें शामिल न होने के फतवे देने वाले उलेमा अक्सर इस हक़ में जिस हदीस की दलील देते हैं, वो है कि नबी ने फरमाया जो कोई दूसरों की मुशाबीहत इख्तियार करेगा वो आख़िरत के दिन उनमें से ही उठाया जाएगा। इस हदीस को अधूरा कोट किया जाता है। यह हदीस पूरी नहीं है और इसका संबंध त्यौहार से भी नहीं है। यह हदीस एक जंग से ऐन पहले बयान की गई बात बताई जाती है (ऐसा हदीस से ज़ाहिर भी होता है)। ताकि मुस्लिम और गैर मुस्लिमों में फ़र्क़ वाज़ेह हो जाये। पूरी हदीस की रिवायत यह है कि रसूलुल्लाह ने फरमाया की 'मुझे तलवार के साथ क़यामत से पहले भेजा गया है' यानी दुनिया में ही क़यामत का छोटा सा मंज़र दिखा दिया जायेगा और उन पर अज़ाब आएगा जो अल्लाह के सख्त नाफ़रमान होंगे जो बाद में अरब में हुआ भी। हुज्जत तमाम होने की बाद मुसलमान और काफिरों में युद्ध हुए जिनमें कुछ शर्तो, के तहत जंग रोकने की पेशकश भी करी जाती थी (देखें बुखारी 2946.)। आगे हदीस में बयान हुआ है कि नबी ने कहा कि 'मेरा रिज़्क़ इन्हीं तलवारों के बीच दिया गया है' यानी इसी जद्दो जहद में ज़िंदगी जिऊँगा जो अल्लाह का पैगाम पहुँचाने और अल्लाह का हुक्म नाफ़ीज़ करने के दरम्यान की है। यंहा पर मतलब जंग में प्राप्त माल भी हो सकता है जो आपके लिए जायज़ किया गया था। यंहा मतलब जन्नत भी हो सकता है (बुखारी 2818 के मुताबिक जन्नत तलवारों के साये में मिलने की बात कहती है)। आपने आगे कहा कि 'हर उस शख्स के लिए ज़िल्लत और रुसवाई है जो मेरी बात को नहीं मानता और मेरी मुखालफत करता है, और जो जिस क़ौम की मुशाबिहत करेगा वो उसी के साथ उठाया जाएगा' यानी मुसलमान अगर कुफ्फार के पीछे चले तो उन्हीं के साथ गिने जाओगे सो तुम या तो मेरे साथ हो या मेरे खिलाफ हो, ये समझ लो।
 
"रसूल सल्ल. ने फरमाया : मैं तलवार के साथ (क़यामत से पहले) मबऊस किया गया हूं, यहां तक कि अल्लाह वहदहू ला शरीक की इबादत की जाए, मेरा रिज़्क मेरे नेज़े के साए में रख दिया गया है, जिसने मेरी मुख़ालिफ़त की अल्लाह ने ज़िल्लत और रुसवाई उसके हक़ में लिख दी है, और जो जिस कौम की मुशाबहत इख़्तियार करेगा, वो उनमें से होगा।" 
[मुसनद अहमद: 5114, 5115, 5667 (on Islam 360)4969, 4970, 5515, 11252.  मुसन्नफ़ इब्न अबी शैबा: 19401, 19437, 33010; 33016, 6/471; 18833, 32319.  Sharh Mushkil al Athaar 231. Shuab al Eemaan 1154. Musnad Abd Ibn Humayd: 856. Musnad At Tahawi: 201. Musnad Shamiyyin Tabrani: 212.]

बहुत से मुहद्दिससों ने इस हदीस को (सनद में कमज़ोरी की वजह से) ज़ईफ़ माना है। मगर कुछ ने हसन और कुछ ने सहीह भी माना है जैसे शैख़ अल्बानी। दूसरी बात कि इस हदीस के जो टुकड़े दीग़र हदीसों की किताबों में बयान किये गए हैं, उन सबकी सेहत दुरुस्त है। हम जानते हैं कि अक्सर नबी की बात टुकड़ों में बयान करी जाती थी।
 
https://islam.stackexchange.com/questions/71729/what-is-the-authenticity-of-the-hadith-i-have-been-sent-with-the-sword
https://ask.ghamidi.org/forums/discussion/71194/ 
https://shamela.ws/book/10757/484#p1
https://al-hadees.com/musnad-ahmed/5114



मस्जिदे नबवी, मदिना में ईसाइयों को अपनी इबादत की इजाज़त देना।

सम्बन्ध बेहतर करने के लिए किसी को या अपने मेहमानों को उनकी ऐसी मज़हबी इबादत (ईश्वर के प्रति, भले ही वो शिरकीया अक़ीदा रखते हो) करने के लिए फेसिलटेट करना हराम नहीं है।

जो लोग गैर इस्लामिक त्यौहार पर सिर्फ मुबारकबाद या उसमें शिरकत को शिर्क की ताईद क़रार देते हैं, उन्हें नबी का एक वाकया समझना चाहिए: 

"ईसाइयों का एक प्रतिनिधि मंडल मदीना आया तो नबी ने उनकी खूब मेहमानदारी की और उनको मस्जिद में ठहरायाऔर साथ ही मस्जिद में उन्हें उनके अपने तरीके पर इबादत करने की अनुमति भी दी।"  (तफसीर इब्ने कसीर/अलबिदाया वन्निहाया)

अगर यह शिर्क है या शिर्क की मदद है या बढ़ावा है तो हमारे नबी ने केथोलिक इसाईयों को (जो मरियम की मूर्तियां बनाते हैं) मस्जिद में इबादत करने की इजाज़त देके क्या नौज़ुबिल्लाह गलत किया था? असल में, न तो यह शिर्क में मदद करना था, न शिर्क में साथ देना था और न ही शिर्क को बढ़ावा देना था। यह तो सिर्फ सम्मान और सौहार्द में किया गया एक अमल था। 


नियत पर आयत और हदीस।

■  सूरह मायदा की आयत 89 में अल्लाह का फ़रमान है कि वो बन्दे को उसकी ज़बान की लग्ज़िशों पर नही पकड़ता, अल्लाह बन्दे को उन कसमों पर नही पकड़ता जो बातचीत में बन्दा बेध्यानी में कह जाता है, बल्कि अल्लाह बन्दे से सिर्फ उन कसमों की बाबत सवाल करेगा, जो कसमें बन्दे ने पूरे इरादे के साथ खाई थीं. 

■ बुख़ारी शरीफ़ की पहली ही हदीस में लिखा है कि इंसान के आमाल की जज़ा (प्रतिफल) का दारोमदार उस अमल के पीछे की उसकी नीयत से होता है. 

इससे यही साबित होता है कि हमारे अमल के पीछे अच्छी और बुरी नियत देखी जाएगी। मुबारकबाद देना, मिठाई लेना या उनके ऐसे त्योहार में शामिल होने वाले लोगों के आमाल पर यह देखा जायगा कि ये सब करने की उसकी नियत शिर्क या कुफ्र की थी या उसने ये कल्चर के तौर पर अपनाया और सौहार्द के लिए मनाया। 

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आम तौर पर जितने भी आर्गुमेंट क्रिसमस विशिंग के अगेंस्ट में दिए जाते हैं, उन सभी का तफसील से जवाब एक दूसरे ब्लॉग में हैं। बल्कि इससे भी बढ़कर उन आर्गुमेंट की बुनियाद पर ही ब्लॉग में कई ऐसे सवाल वापिस उन आर्गुमेंट देने वालो पर उठाए गए हैं कि अगर उनके मुताबिक इस तरह क्रिसमस विश करना नाजयज़ है तो फला फला सैम काम जो वो करते हैं वो क्यों नाजायज नहीं है? 

किसी भी कामयाब डिस्कशन या चर्चा के लिए आगे की तरफ बढ़ा जाता है, वापिस पीछे की तरफ नहीं जाया जाता, यह उसूल है। यानी जिन आर्गुमेंट का जवाब दिया जा चुका है, अब या तो उन जवाब की कमी ज़ाहिर करी जाए या फिर कोई नया आर्गुमेंट लाया जाए। वापिस उन्हीं पुराने आर्गुमेंट को दोहराना टाइम और एफर्ट्स खराब करना है, बल्कि डिस्कशन का लेवल नीचे लेके जाना है। पुराने सवालों की सुई घुमा कर वापिस लाना यही बताता है कि लोगों को जवाबो से फर्क नहीं पड़ता है, उन्हें बस वही सवाल (पुराने आर्गुमेंट) उठाए रखना है।

अगर कोई रिवर्ट ईसाई इस मुद्दे पर मुसलमानों वालों ही सवाल उठता है तो हमें समझना चाहिए कि किसी के ईसाई होने से उसके दिए आर्गुमेंट वैलिड नहीं हो जाते है। आर्गुमेंट को मेरिट पर परखा जाएगा। उसके ऐसे सवालों से ज़ाहिर है कि इंसान के लिए अपने माहौल के असर से बाहर निकलना आसान काम नहीं होता, चाहे कोई मुस्लिम हो या ईसाई।
 
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https://www.islamweb.net/en/fatwa/319777/whether-christians-of-najraan-prayed-inside-mosque-or-not

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