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*"I Love Muhammad ﷺ" बैनर का सिर्फ मुज़ाहिरा भर, क्या वाकई में अल्लाह और उसके नबी से सच्ची और मुक़म्मल मुहब्बत की निशानी है?*
*अल्लाह से मुहब्बत के क्या मायने हैं, अल्लाह ने खुद क़ुरान में समझाया है:-*
•क़ुरान 3:31: (ऐ नबी! लोगों से) कह दो कि अगर तुम अल्लाह से मुहब्बत रखते हो तो मेरी (नबी की) पैरवी करो, अल्लाह तुम से मुहब्बत करेगा और तुम्हारी ख़ातिर तुम्हारे गुनाह माफ़ कर देगा...
*अल्लाह ने ये भी बताया है कि नबी और अल्लाह की इताअ़त एक ही है:-*
•कुरान 3:32: कह दो कि अल्लाह और रसूल की इताअ़त करो...
•क़ुरान 4:80: जो रसूल की इताअ़त करे, उसने अल्लाह की इताअ़त की...
*फिर अल्लाह ने ये भी वाज़ेह कर दिया कि लोगों के मामलात में नबी ही फैसलाकुन हैं, उनके हुक्म के आगे सर-ए-तस्लीम ख़म हो जाना है:-*
•क़ुरान 4: 65: ...ये लोग उस वक़्त तक मोमिन नहीं हो सकते जब तक ये अपने आपसी झगड़ों में तुम्हें फ़ैसलेदार न बनायें, फिर तुम जो कुछ फ़ैसला करो उसके बारे में अपने दिलों में कोई तंगी महसूस न करें, और उसे मुकम्मल तौर पर क़ुबूल करें।
*हकम और इताअत के मामले में नबी ने कुरान के मुताबिक ज़िन्दगी बसर करने का भी हुक्म दिया:-*
•हदीस अन नवावी: तुममें से कोई भी तब तक सच्चा ईमान वाला नहीं हो सकता, जब तक उसकी ख़्वाहिशात उसके मुताबिक़ न हो जाए जो मैं लेके आया हूँ (यानी क़ुरान के मूताबिक)।
*तो क्या आज हम मुसलमान, अल्लाह, क़ुरान, नबी की मुक़म्मल इताअ़त कर रहे हैं? क्या उनके हर हुकुम पर अमल कर रहे हैं? नबी ने हमारी बेहतरी के लिए जो फैसलें और हिदायतें दी, क्या हम उन पर अमल पैरा हैं? अगर नहीं तो क्या फिर हम वाकई उनसे सच्ची और मुक़म्मल मुहब्बत रखते हैं?*
*उलेमा ने अल्लाह और नबी से मुहब्बत की कुछ अलामात बताई हैं:-*
•शेख अल-कादी इयाद (12वीं सदी ई.) ने अपनी किताब अश-शिफा बि तारिफ़ हुक़ूक़ अल-मुस्तफ़ा (बाब 4 और 5) में लिखा है:- इन्सान जिससे मुहब्बत करता है, उसे तरजीह देता है और वही पसंद करता है जो उसे पसंद है, वरना वो एक ढोंगी है, अपनी मुहब्बत में बेईमान है। जो इन्सान पैगंबर से सच्ची मुहब्बत करता है, उसमें ये सिफत दिखाई देंगी:- वो उनकी ताईद करेगा, उनकी सुन्नत पर अमल करेगा, उनके लफ़्ज़ों, अमाल, हुकुम का पालन करेगा, और उनकी मनाहियों से दूर रहेगा। वो अपनी चाहतों पर पैगंबर के दिए कानूनों को तरजीह देगा। वो कुरान से मुहब्बत करेगा और इस मुहब्बत में उसे पढना, उसे समझना, उसके मुताबिक अमल करना, और उसकी हदों के अंदर रहना शामिल है। वो अपने कौम के लिए रहमत रखेगा, उनके फायदों के लिए कोशिश करेगा और उनसे नुकसानदायक चीज़ों को दूर करेगा। अल्लाह और पैगंबर की मुहब्बत क्या है। सुफ़यान ने कहा है, "अल्लाह के रसूल की ताईद करना ही उनकी मुहब्बत है।" एक आलिम ने कहा है, "पैगंबर की मुहब्बत उनकी सुन्नत की हिफाजत करना, उनकी सुन्नत पर अमल करना और उनकी मुखालफत से डरना है।" एक और आलिम ने कहा है, "ये अपने हबीब को तरजीह देना है।" एक और ने कहा है, "मुहब्बत वही है जो अपने मालिक की ख़्वाहिशात को मानता है और जो मालिक पसंद करता है, बंदा भी वही पसंद करता है और जो मालिक नापसंद करता है, बंदा भी वही नापसंद करता है।"
*•अल्लामा इक़बाल ने इस पर लिखा है:-*
मस्जिद तो बना दी शब भर में ईमाँ की हरारत वालों ने, मन अपना पुराना पापी है बरसों में नमाज़ी बन न सका।
तेरा इमाँ तो है सिर्फ़ लबों की गवाही, तेरा दिल अब तक मुसलमाँ न हुआ।
*•मौलाना इसरार अहमद ने भी कुछ यूँ फरमाया है:-*
तक़रीरें सुनना आसान है, हाथ उठान आसान है, झूलुस निकालना आसान है, नारे लगाना आसान, यंहा तक कि जोश में आके जान देना तक भी आसान है लेकिन हराम से बचकर हलाल पर रहना और फ़राइज़ की पाबंदी करना मुश्किल है।
*इसलिए, पहले ज़ाहिर नहीं बातिन को ठीक करो, अंदर बदलाव लाओ, बहार खुद ब खुद दिखने लगेगा।*
[ज़रूरत क्या है मुसलमान को ये सब करने की? नबी से मुहब्बत का तरीका तो पहले अमल से दिखाना है। लगता है मुसलमान के वो सब पुराने ज़ंग खाए रहनुमा फिर से खड़े हो गए पॉलिटिकल सोशल फ़ायदा लेने के लिए और वापस ज़मीन पर लीडरशिप पाने के लिए। मुसलमान तो हमेशा से ही इमोशनल और बेवकूफ़ रहा है। जिस नफ़रत के माहौल में अब गिरावत आना शुरू हो रही थी, ऐसे प्रोटेस्ट और कैंपेन उन माहौल को फिर से वापस ले आएंगे]
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अक्सर हमारी बातों में कन्क्लूज़न शामिल होते है। अगर न भी होता तो कन्क्लूज़न निकालना फ़र्ज़ नहीं है। हर इंसान तहक़ीक़ के ज़रिए अलग अलग निष्कर्ष भी निकाल सकते हैं, इसलिए हम अपना निष्कर्ष थोपने के लिए दुनिया मे नही है। हम नबी नहीं है। सिर्फ उनसे दीन के मामले में इख़्तलाफ़ नहीं किया जा सकता, बाकी सभी से किया जा सकता है, यही इस्लाम की हिदायत है। इसके अलावा कई बार बात एक खास नज़रिए या मौकिफ़ से भी बयान करी जाती है, जो अक़्ल की रोशनी में नज़र आ जाता है। फिर भी अगर किसी को किसी भी वजह से नज़र नहीं आ पाए तो भी मुद्दे का मुखतलिफ नज़रिया सामने वालों तक पहुँच ही जाता है। वैसे बाज़ मुद्दे ऐसे भी होते हैं जिनमें तमाम पहलू बयान करने की बाद कोई कन्क्लूज़न न ही दिया जाए तो बेहतर होता है और सामने वाले को खुद अपना मैकिफ़ कायम करने का स्कोप रखा जाता है। तमाम मुद्दीस, मुहक्कीक बाज़ वक़्त इसी तरह से अपनी किताबों में अपनी राय पेश कर के गए है, पिछली 14 सदियों में जो अक्सर हमें कंही न कंही दिख ही जाते हैं। डेटा प्रोवाइड करने को ही दलील मुहैया करवाना कहते हैं. न्हें हम उस्ताद मानते हैं, उनकी बात को भी तर्क, दलील के साथ लेना है और इल्म, अक़्ल के रोशनी में फैसला करना है। हर अच्छा उस्ताद अपने शागिर्दों को यही हिदायत देता है। हम अपने उस्ताद से दलील नहीं मांग रहे तो इसका मतलब यह नहीं होगा कि दूसरे लोगों को भी दलील मांगने का हक़ नहीं है। हमें अंधभक्तों की तरह नहीं बनना है। बल्कि हम तो इस अप्रोच के मुखालिफ हैं जंहा अक़्ल को पोटली में बंद करके दरिया में बहा दिया जाता है। हमें गुफ्तगू और इख़्तिलाफ़ के अदब सीखने पर ज़ोर देना चाहिए, खास तौर पर आइडियोलॉजी के खिलाफ़ बातचीत में. इख़्तलाफ़ बर्दाश्त करना चाहिए.
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आजकल खुद को दीनदारी दिखाने के लिए लोग अपने बिज़निस और अमल को ईमानदारी और मेहनत से करने के बजाय जाहिराना काम करना शुरू कर देते है। वो टोपी लगाने लगते है, दाढ़ी बढ़ा लेते है, पायेंचे ऊंचा कर लेते है, कुर्ता पजामा पहनना शुरू कर देते है, हज करिया आते है और खुद को हाजी साहाब कहवालने लगते है। दीनदारी का तक़ाज़ा है कि जो भी काम करे उसे अच्छी तरह निभाए और किसी और हक न मारे।
पांच वक्त की नमाज़ पढ़ कर अपने आप को मोमिन समझना बहुत आसान है मगर किसी के ऊपर होने वाले ज़ुल्म के ख़िलाफ़ उठना और अपना माल अल्लाह की राह में ख़र्च करके मोमिन बनना बहुत मुश्किल काम है। इसलिए ज़्यादातर लोग पहला रास्ता चुनते है। अपने ही सगे लोग जब कोई ज़ुल्म करें तो लोग ख़ामोशी से तमाशा देखते है। अपने घर में ज़ुल्म करने वाला या अपने रिश्तेदार ज़ालिम का साथ देने वाला या घर में होता ज़ुल्म देखकर ख़ामोश रहने वाला नमाज़ी, हाजी, रोजेदार, हिजाबी, दाड़ी वाला हरगिज़ मोमिन नहीं हो सकता बल्कि वह मोमिन के रूप में बहरूपिया होता है। ऐसे बहरूपियों की कोई अहमियत नहीं । अगर कोई इंसान हक़ परस्त, ईमानदार और सच्चा है तो उसकी अहमियत ज्यादा है चाहे वो इबादतों में कोताही ही करता हो। क्योंकि इबादत अल्लाह से ताल्लुक है और मामलात का माशरे से।
हमारे मुआशरे में ख़ुदग़र्ज़ी को अक़लमंदी समझा जाता है। अपनी ख़ानदान या घर में ही होने वाले ज़ुल्म को लोग ख़ामोशी से देखते हैं कि वह ज़ालिम से अपने ताल्लुकात ख़राब नहीं करना चाहते। अगर वह ज़ालिम अपना बेटा, बेटी, दामाद है तो फिर उसका पूरा सपोर्ट करते है। बच्चो में इंसाफ करने की बजाय, उनका हक मारते है। यही वजह है कि लोगो को कमज़ोरों पर ज़ुल्म करने की हिम्मत पड़ती है। अगर ज़ालिम का हाथ पकड़ने का कल्चर आम हो जाए तो समाज में ज़ुल्म बहुत कम हो जाएगा ।
मुसलमानों के 'मज़हबी' समाज में जिन बातों को बहुत बुरा समझा जाता है उनका क़ुरआन में कोई ज़िक्र नही है जैसे कि संगीत, गायकी, नृत्य, तस्वीर बनाना, मूरत बनाना, अभिनय करना, रायज बुर्का हिजाब न लगाना इत्यादि । जिन बातों को क़ुरआन सख़्ती से मना करता है वह तमाम बातें इस समाज में पाई जाती हैं जैसे झूठ बोलना, कंजूसी करना, पीठ पीछे बुराई करना, वादे को पूरा न करना, रिश्तेदारों का शोषण करना, नाप तौल में कमी करना, जायदाद मे हक़ मारना, पैसा गबन करना, नाजायज़ दौलत इकट्ठा करना, बहुओं का शोषण करना, घरों में लड़ाई झगड़े करवाना, इधर की उधर करना, कामचोरी करना, अपना माल बचाना दूसरे का खर्च करवाना इत्यादि। मज़हबी समाज अल्लाह के हुक्मों का पालन करने के बजाय मुल्लाओं के मज़हब का पालन करता है।
इसलिए दाढ़ी रखने वाले, टोपी लगाने वाले, कुर्ते पायजामे पहने वाले, पायचें ऊंचे रखने वाले, नमाज़ पढ़ने वाले, रोज़े रखने वाले, उमरा- हज करने वाले, हिजाब करने वाले, क़ुरान तिलावत करने वाले, चौबीस घंटे तस्बीह करने वाले, मीठी जुबान वाले आज माशरे में खुले आम बेईमानी करते, झूठ बोलते, अपनी बात से मुकरते, ग़ीबत करते, वादा खिलाफी करते, नमक हरामी करते, अहसान फरामोशी करते, खर्च करते, जायदात कब्जाते, दूसरों के जगह हथियाते, फितना फैलाते, खुल के दहेज लेते, दूसरों का हक़ मारते, दूसरों के पैसे मारते, दूसरे से चीज़े ऐंठते, बीवी के मायके से माल ऐंठते, घर जमाई बनते, अपने माँ बाप को छोड़ अकेले रहते, एकलखुरी करते, खुदगर्ज़ी करते, नाजायज़ काम करते, हक़ के खिलाफ खड़े होते खुले आम दिख जाते है। ऐसे लोग अल्लाह और उसकी किताब के आगे अपने फायदों को तरजीह देते मिलते है। अल्लाह को गवाह बनाने की बाजए दूसरों को झूठा गवाह बना के छोटे फायदे हासिल करने की फिराक में रहते है। अपने फायदों के आगे हक़ को तर्क़ करते है। ऐसे दिखावटी मुसलमान से एक अख़लाक़ी गैर मुसलमान भला है। यही होता है जब दीन को आप वे ऑफ लाइफ नहीं बल्कि एक मज़हब की तरह लेते हो और उसकी चुनिंदा तालीमें ही अपनाते हो, जिनमें अपना फायदा दिखता हो या दीन की तालीमात सिर्फ परमपराओं और रासुमात कि तरह लेते हो।
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इस्राइल में जो हो रहा है उस पर हम कुछ नही कर सकते सिर्फ़ दुआ कर सकते हैं मगर जो ज़ुल्म हमारे घर, पड़ोस और मोहल्ले में हो रहा है, उस पर हम कुछ न कुछ ज़रूर कर सकते हैं। इसराइल की ज़्यादतियों पर रोना पीटना मचाते हो और अपनी ज़्यादतियों पर एक सेकेंड भी नहीं सोचते। फिलिस्तीनियों का हक़ मारते हुए इस्राइली आपको बदतरीन मखलूक दिखाई देते है। और खुद जो लोगों के हक़ मार के और कब्ज़ा के बैठे हो, वो दिल मे एक बार भी नहीं खटकता। दुसरो की हक, ज़मीन, माल कब्ज़ाते इसराएली ज़ालिम है, सही बात है और हम जैसे यही काम रोज़ करने वाले अल्लाह के नेक बंदे है और सफेदपोश मुसलमान है, वाह। सोशल मीडिया पर सिर्फ और सिर्फ जेहाद करने के बजाय अपनी ज़मीन से जुड़ें और वहां बुराईयों को मिटाने की कोशिश करें। और हो सके तो अपने गिरेबान में झांके की कितनी ज़्यादतियां और हक मार के ईमान वाले बने बैठे है। दुसरो का हक़ मार कर कोई खुदा का हक़ अदा नहीं कर सकता। दो ज़ुल्म के खिलाफ दो अलग रवैय्ये रखना भी ज़ुल्म है।
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बताया जा रहा है कि शायद कुछ डाक्टरस मग़रिब से रात 11 बजे तक नमाज़ और तरावीह के बहाने कोई कौल अटेंड नहीं करते। इस मुश्किल घड़ी में मरीज़ों को तड़पता छोड़ कर तरावीह पढ़ना कहां तक दुरूस्त है?
कई लोग मस्जिदों को कोविड सेंटर बनाने की मुखाल्फत कर रहे है। और इसके लिए बेतुके तर्क दे रहे है। कोई ऑक्सीजन और मदद पहले सिर्फ मुसलमानों को देने की बात कह रहा है।
कई लोग बीमारों की सेवा में लगे मुसलामनों को बेवकूफ बोल कर उनका होंसला गिरा रहे है जबकि खुद घर बैठ कर मज़े से रोज़ा रख रहे है और पूरे दिन वाईफाई चला रहे है। इनका ज़मीन पर कोई योगदान नहीं। कोई कह रहा है की कुछ भी कर लो पर कागज़ तो दिखाने ही पड़ंगे।
मस्जिदे इंसानों के लिए है, इंसान मस्जिद के लिये नहीं है। सौ दो सौ सालों में ऐसी महामारी और परेशानी आती है जब इंसानों की जान और देखभाल से ऊपर कुछ नहीं होता, मस्जिद भी नहीं। मौत के माहौल और जान के खौफ में तो सुवर खाना भी जायज़ है। फिर ऐसे माहौल में तो बाकी आम कानून क्यों नहीं बदल सकते।
ख़िदमत के वक़्त एहतियात बेशक ज़रूरी है और कि जानी चाहिए। पर ये बात कहना उन्ही को फबता है जो खुद सड़क पर मदद करने को मौजूद है, न कि उन्हें जो सिर्फ और सिर्फ फेसबुक और व्हाट्सएप्प पर कीबोर्ड पीट पीट कर नसीहतें दे रहे है। मददगारों की एहतियात की तरफ तवज्जोह दिलवाइये पर उनके होंसले न गिराएं, उन पर छींटाकशी न करें। उनके साथ उतरिये मैदान में और उनकी इस्लाह कीजिए। पर आप सिर्फ तकरीरें करँगे।
एक बात याद रखिये की अगर मुसलमानों के पिछड़ेपन, कट्टरपन या मज़हब पर सवाल उठाये जाते है तो उसका जवाब मुसलमान अपने पिछड़ेपन, कट्टरपन को दूर करके ही दे सकते है। अगर इस्लाम और मुसलामनों के के तंग नज़रिए पर सवाल उठते है तो उसका जवाब इस्लाम और मुसलमानों की खुली सोच, आलमी नज़रिए और इंसानी जज़्बे को दुनिया को दिखा कर ही जवाब दिया जयगा। यानी नेक नियत से ये सब अमल करके अल्लाह पर छोड़ दिया जायगा।
इन सब दोहरे रवैया की वजह क्या है। असल मे यही होता है जब आप दीन को सिर्फ एक कल्चर के तौर पर लेते है। जब आप सिर्फ नमाज़, रोज़ा, हज, ज़कात को दीन समझते है। जब आप सिर्फ इन्ही 4 चीजों को अल्लाह की इबादत समझते है। जब आप सिर्फ इबादत और ज़िक्र को ही निजात के तरीक़ा समझते है। जब आप फ़र्ज़ और नफिल का बुनियादी फ़र्क़ नहीं समझते। जब आप इंसानों की ख़िदमत को अल्लाह की ही ख़िदमत करने जैसा नहीं मानते। जब आप अच्छे कामों का सिला दुनिया से चाहते हो, अल्लाह से नहीं। जब आप अपनी क़ौम की ज़िल्लत का जिम्मेदार खुद को नहीं किसी दूसरी क़ौम को मानते है। जब आप आपके मज़हब के लोगो के साथ हो रही ज़्यादती को 24 घंटे कोसते है पर ये नहीं सोचते कि ऐसा अल्लाह हमारे साथ क्यों होने दे रहा है। क्या अल्लाह हमें हमारी किन्ही खताओं की सज़ा तो नहीं दे रहा क्योंकि उसकी मर्ज़ी के बिना तो पत्ता भी नहीं हिलता है। अल्लाह क्यों चाहता है हम NRC, दंगे वैगरह जैसे आज़ाब झेले। कोई तो कमी रही होगी हमारी जो मुसलमान पूरी दुनिया मे ज़िल्लत और रुसवाई झेल रहा है।
पूरी दुनिया इस्लाम और मुसलमानों पर उंगली उठा रहे है। क्या आपने कभी कुछ किया इसके लिए। क्या कभी लोगों का इस्लाम से तार्रुफ़ करवाया। क्या कभी सच्चे मुसलमानों का किरदार उन्हें दिखाया। अल्लाह का कानून है कुछ भी अपने आप नहीं होता। अगर चाहते हो कि गैर मुस्लिम, मुस्लिम के बारे में अपनी राय बदले तो पहले खुद को बदलो। वही करो जो अल्लाह तुमसे चाहता है। क़ुरान कहता है कि तुम हो सबसे बेहतरीन उम्मत जिसे दुनिया की भलाई के लिए लाया गया है। तो फिर क्यों नौज़ुबिल्लाह क़ुरान को गलत साबित करने पर तुले हो अपनी मायूसी, काहीलियत, खुदगर्ज़ी और दीन की नासमझी का मुज़हायरा करके।
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मेरी जंहा तक नज़र जाती है दुनिया के ज़्यादातर गैर मुस्लिम आज इस्लाम पर उंगली उठा रहे है हालांकि वो असल में मुसलानों पर उंगली उठ रही है। आला अखलाक होने के बावजूद हमारे नबी पर मुश्रिक उँगली उठाते रहे उस वक़्त पर जब अल्लाह का हुक्म हुआ तो उंगली उठाने वाले पलट दिए गए। पर हमारे साथ ऐसा नहीं होने जा रहा फिलहाल क्योंकि न तो हम अपने नबी के, न साहाबा के और न असलाफ़ के नाखून के बराबर है। लगभग सभी तो हर वो काम आम तौर पर कर रहे है जिसे इस्लाम मना करता है जिन्हें गिनवाने की ज़रूरत नहीं है।
कितने मुसलमान है जो अल्लाह से डर के अल्लाह के कानून पर चल रहे है? बहुत कम। यंहा तो लोगों को असलन शरीअत क्या हैं, कंहा से डेडयूस की जायेगी, ये ही नहीं पता। कल्चर को ही शरीयत मानते है ज़्यादातर लोग। तो गैर कंहा से शरीयत अपनायेगा।
हाल, क्लब आदि नहीं कर रहे तो क्या मस्जिदे भी मदद में पीछे रहे। गैर नहीं कर रहे तो क्या मुसलमान भी मदद से पीछे हट जाए। ऐसे एक्सट्रीम हालातों में तो मस्जिद और मुस्लिम को आगे आगे होने चहिए क्योंकि यही इस्लाम कहता है और
क्योंकि हम पर इसी कट्टरता, खुदगर्ज़ी, दुनियादारी से दूरी, मज़हबी रंग में बुरी तरह रंगे होने जैसे इलज़ाम लगते है चौतरफा। एक हदीस का मफ़हूम है कि दूसरे के लिए भी वही चाहो जो अपने लिए।
मस्जिदे और मदरसों पर उठने वाले सवाल, इनके दरवाज़े सबके लिए खोलने से ही खत्म होंगे। विजिट माई मॉस्क में बहुत अच्छा रिज़ल्ट आता है फिर ये तो आपदा चल रही ही, अब खोली गई मस्जिदें तो उसका भी आयेगा। नबी के वक़्त दुश्मन मस्जिद में बंधे पड़े हुए इमान ले आता था। दुश्मन तो मस्जिदों में नबी के वक़्त मल मूत्र भी कर देते थे। आज भी मस्जिदो का सुकून लोगों के दिलो जितने की ताकत रखता है। और ऊपर से समाज सेवा मस्जिद में चार चांद लगाने जैसा है। इन इलज़ामों का जवाब इन बातों को दूर करना है न कि इन्हें और बढ़ा देना। सवाल का जवाब मूलत: जवाब होता है न कि सवाल।
पिछले कई दिन से मुसलमान की जी तोड़ मेहनत और मदद देख कर बहुत से गैर मुस्लिम भाई कहने लगे थे वाह ये है इस्लाम और मुस्लिम। पर जब से ये अली सोहराब जैसे कट्टर नफरती और जाहील लोग अपनी जहालत और कट्टरता का इज़हार FB पर कर रहे है। उन्हें पढ़ कर बहुत से गैर मुस्लिम भाई कह रहे है कि यार ये कट्टरता कब खत्म होगी मुस्लिम में से। और उनका ये कहना सही भी क्योंकि जो दिखेगा वही बिकेगा।
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आपका व्यवहार दोहरा है। मदद करते है तो आप ही फ़ोटो डालते है। नफरती लोगों के कारण उल्टा हो जाता है तो आप ही मुसलामनों को गरियाते हो। पहले खुद फैसला कर लो कहना और करवाना क्या चाहते हो। दीन की यंहा बात ही करना बेकार है। हर अजर दुनिया नहीं देती।
नियमो का पालन न करके मदद करने वाले तो बेवकूफी करते है, इन्हें समझाना चाहिए। पर नागपुर जैसे उदाहरण भी है जो हर चीज़ नियमानुसार करते है, ऐसे लोगो को एनकरेज किया जाना चाहिए। वैसे आप अपने समाज के लिए ज़मीन पर क्या काम करते है। क्या बस कीबोर्ड पीटना आता है? आपने क्या नियमानुसार समाज को दिया? बस बातों और खोखले अमल रहित ज्ञान के अलावा। पूरे दिन में 386 पॉस्ट करने के बाद क्या कुछ समय लोगों की कैसे भी मदद करने की कोशिश करते हो?
मस्जिदे इंसानों के लिए है। इंसान मस्जिद के लिये नहीं है। सौ सालों में ऐसी महामारी और किल्लत आती है जब इंसानों की जान और देखभाल से ऊपर कुछ नहीं होता, मस्जिद भी नहीं। मौत के माहौल में तो सुवर भी जायज़ है। इसलिए अपनी कट्टरता से बाहर आओ। कूछ काम करो ज़मीन पर। कीबोर्ड पीटने के अलावा। दिन में 300 पॉस्ट करने की बजाए 1 आदमी की मदद कर दो। अंधभक्त और तुमने कोई फर्क नहीं। जो सिर्फ भड़काना जानते है। ज़मीन पर जिनका योगदान जीरो हे। जब मुसलामन के कट्टर होने पर सवाल उठते है तो जवाब भी कट्टरता से दूर रह कर दिया जायेगा। और सेकुलरज़िम से इतनी नफरत तो संघी और मुसंघी ही कर सकते है।
हमे ही करना है सब। अल्लाह का निजाम है। अल्लाह का कानून है। बिना किये कुछ नही होता। उसके अनुसार काम करो, मदद आयगी, जिंदगियां असान होगी। वरना ऐसे ही ज़िल्लत झेलते रहोगे। अपनी ज़िम्मेदारी निभाओ, अल्लाह पर छोड़ दो। वही है परेशानी देने वाला और दूर करने वाला। और अब भी अल्लाह की रस्सी न थामी। क़ुरान के बताई वो उम्मत न बने जिसे दुनिया की भलाई के लिए लाया गया है तो ऐसे ही ज़लील होंगे क्योंकि यही अल्लाह का निज़ाम है और वो यही चाहता है कि आज के नकली मुसलामन ज़िल्लत की ज़िंदगी जिए।
किसने कह दिया मस्जिद सिर्फ नमाज़ के लिए है। कंहा लिखा है? और वो भी आपदा में भी? क्या तुम्हें नहीं पता हुज़ूर के वक़्त मस्जिदों में क्या क्या भलाई का काम न होता था। मुसलामनों के दुश्मन मस्जिदों में मूतना और हगना भी कर देते थे। पर वो मुसलामन आप जैसे नहीं थे इसकिये उफ्फ न करते थे और खुद सफाई कर देते थे। विभाजन के टाइम मस्जिदे किस काम आयी थी, जानते हो? मस्जिद नेकी के काम के लिए सबसे पीछे नहीं, बल्कि सबसे आगे होनी चाहिए। जहालत क़ौम की नसों में बस चुकी है। इसलिए आज के ज़यादातर जाहिल मुसलामन किसी का खैर का काम नहीं कर सकते। और जब तुम दुनिया की खैर नहीं कर सकते तो अल्लाह भी तुम्हारी कोई मदद नहीं करेगा। और आज के खुदगर्ज़ मुसलामन ऐसे ही जगह जगह ज़लील होते रहोगे। गली गली दौड़ा के पिटे जाओगे। क्योंकि अल्लाह की मर्ज़ी के बिना कुछ नहीं होता और अल्लाह यही चाहता है कि आज के नाम नाम के मुसलामन पर दुनिया थूके जो हो भी रहा हैं।
अल्लाह यही चाहता है कि भारत के मुसलामन कागज़ दिखाये। मोदी नहीं ये अल्लाह की मर्ज़ी है। क्योंकि भारत के अधितकर मुसलामन सदियों से खुदगर्ज़ी में लगे है। इस्लाम की सूरत बिगाड़ दी है। हज़ारों फिरको में पड़े है। ऐसा कौन सा हराम या गलत काम नहीं जो भारत के मुसलमान नही करते हो। और फिर गुमान ये की तुम सच्चे मुसलामन हो। एक खुदगर्ज़ क़ौम है हम। तो अल्लाह का आज़ाब झेलो। कभी इस्लाम की सच्ची दावत अपने देशवासी को तुमने दी ही कब है। इसलिए ये अल्लाह के आज़ाब है NRC वैगरह। झेलो। जैसे स्पेन ने झेला। घर बैठे कर सिर्फ अल्लाह अल्लाह करो। इस्लाम की डाली ज़िम्मेदारी कोई और निभा लेगा। अगर चाहते हो ये सूरत बदल जाये तो पहले खुद को बदलो। एक्स्ट्रा कट्टरवादी मुसलमानों ने इस्लाम बर्बाद कर दिया। आतंक, कट्टरता फिरकवारियात, नफरत फेलातें है। बहुत से मुस्लिम ऑनलाइन सेलेब्रिटी जैसे जाहिल सर पर और बैठा रखे है क़ौम ने।
इस्लाम का बेड़ा गर्क करने वाले नफरती मुसलमान आपकी जय हो। सिर्फ हवा हवाई नमाज़, रोज़े, हज करो। खुद को मुसलामन समझो। और भूल जाओ अल्लाह ने तुमसे क्या चाहा है। कभी पढ़ा है अल्लाह क़ुरान में तुमसे कैसा इंसान बनने को कहता है। कभी ऐसा इंसान बनने की कोशिश की है जो अल्लाह कहता है। करके देखो तख्ता पलट जयगा। अल्लाह की बात पर ही तुम यकीन नहीं करते। अगर करते तो आज एक बेह्तरीन उम्मत होते। पर आज एक ज़लील क़ौम बन चूके हो दुनिया के लिए।
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थक गए है इन अंधभक्तों और कट्टरवादियों से। पर एक दिन आयेगा जब इस्लाम, इंसानियत पर इन जाहिल लोगों का कोई हक नहीं रह जायगा। ये मुसंघी अपनी नफरतों में खुद को ही बर्बाद कर चुके होंगे जैसे संघी। ईश्वर का नियम है ज़मीन पर वही क़ौम कामयाब और ज़िंदा रहती है जो दूसरों के काम आती है।
घर पर तुम्हारी तरह निठल्ला बैठ कर। कीबोर्ड पीटने से तो अच्छा है। ज़मीन पर कुछ तो कर रहा है। तकरीर देके नफरत फैलाना आसान है तुम्हारी तरह। औकात से बाहर तो हर वो मुंसघी आ चुका है जो घर पर पलंग बिछाए भाषण कर रहा है, जो इस्लाम की रूह के खिलाफ काम कर रहा है और खुद को इस्लाम का परचम दार कहलवा रहा है। दोहरे चरित्र है ऐसे मुसलामनों के। जैसे ही मुस्लिम मददगारों के फ़ोटो आ रहे है, खुद ही सीना फूला के शेयर कर रहे है और दूसरी तरफ उनकी ही टांग खींच रहे है। विदेश में बैठ कर बात नहीं कर रहे बल्कि यंहा के मुसलामन खुद यंहा के मसाइल यंही रह कर हल करने की कोशिश कर रहे है। पर खुद कुछ करना नहीं दूसरे को करने देना नही।
संघियो के पास तो ईमान नही तुम्हारे पास तो है। क्या हुक़ूक़ है अल्लाह और क़ुरान का ऐसी हालत में। नफरत फैलाने में तुममें और उनमें फर्क ही क्या है। संघी तो नई बीमारी है, मुसंघी तो पुराने है। जैसे अधिकतर मुसलमान इस समय जी जान से दूसरों की मदद कर रहे है और कुछ मुसंघी उन्हें ही गालियां बक रहे है और नफरत फेला रहे है। उसी तरह, ज़्यादातर हिन्दू भाई मुसलमानों की मदद को दिल से धन्यवाद दे रहे है और कुछ संघी अभी भी मुस्लिम मददगारों को गालियां दे रहे है और नफरत फैला रहे है। यानी ये दोनों एक ही थाली के चट्टे बट्टे है। नफरती चिंटू और नफरती कल्लू। लब्बेलुबाब ये है कि संघी और मुसंघी अपने ही क़ौम, समाज, देश को खोखला कर रहे है। जय कट्टरवाद।
यही बात जब गैर मुस्लिम कहते है कि.... "मुसलमान क़ौम अपनी नहीं हुई, इनका क़ुरान इन्हें भाई भाई कहता है और ये एक दूसरे को अलग फ़िरके वाला बोलके काट रहे है, अधिकतर मुसलमान खुद हर देश मे एक दूसरे को जान से मार रहे है इसलिए ये मुसलमान भारत के नही हो सकते और न हमारे क्योंकि ये मुसलमान मुसलमानों के सगे नहीं हुए कभी". ये सुनके तब तो मुसंघी बड़ा बवाल करते है। तब कंहा जाती है नैतिकता। दोहरा चरित्र है।
इन आयतों का पसमंज़र भी पता है। और इसमे काफ़िर लफ्ज़ है ही नहीं। अपने आप क़ुरान में लफ्ज़ डाल रहे हो। और काफिर किसे कहते है मालूम भी है। अपने मन से किसी को काफिर कहने वाला कहा खुद काफिर हो जाता है (हदीस). तुम्हारे जैसे लोगो ही है जो क़ुरान की गलत व्याख्या करते हज इस्लाम का गलत तरिके से पेश करते है। अगर यही काम कोई गैर मुस्लिम करता तो तुम उसके पीछे हाथ धो के पड़ जाते की अरे नही नहीं क़ुरान का ये अर्थ गलत कर रहे हो।
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दावत और दावे में फर्क होता है। इसका फर्क किसी ज़मीनी दायी से पता कीजिए साफ हो जायगा। दो लफ्ज़ में समझ लीजिये की एक है पैग़ाम बयान करना और एक है पैग़ाम हक़ साबित करना है। हम सिर्फ मुंह से लफ़्फ़ाज़ी करते है और सोचते है कि दावत पहुंच गई, नही, दवात को दिलो दिमाग पर साबित करना होता है। किरदार से साबित करना होता है। इस्लाम जो कहता है उस पर खुद पहले अमल करके दिखाना होता है। उससे हो रहे फायदे को दिखाना पड़ता है ताकि उन्हें यकीन हो जाये। पर आयरनी ये है कि हम खुद इस्लाम के एक भी हकुम से होता फायदा खुद नहीं ले पा रहे क्योंकि हमारी इबादतें, अमल खोखले और दिखावटी ज़्यादा है। तो फिर दूसरे कंहा से हम देख के इस्लाम को सच मानेंगे।
हमारी इन्ही ऊपरी इसलमियात के चलते अल्लाह ने दुनिया भर में मुसलमानों पर आज़ाब भेज रखा है और ज़िल्लत भारी ज़िंदगी जी रहे है अक्सरियत।
कुछ ज़हनी बीमार लोग सिर्फ इस्लाम पढ़ते है समझते नहीं। उनके पढ़ने का मकसद ही गलत होता है। वो सिर्फ इस्लाम मे कमियां निकालने चाहते है। साफ नियत से नहीं पढ़ते। ज़िम्मेदारी हमारी थी कि वो इस्लाम के बारे में जो भी पढ़े और देखे, उन्हें हम समझाये की ये गलत है, ये ऐसे नहीं हैं बल्कि इस्लाम और सच्चे मुसलमान तो ऐसे होते है। पर अफसोस हमारा खुद का दीन, अमल, अखलाक, किरदार, समझ बिगड़ी हुई है।
हमारी अक्सरियत भी यही करती है सिर्फ क़ुरान पढ़ती और इस्लामिक उसूल बताती है पर अमल नही करती इस्लाम के उसूलों पे या क़ुरान पर। ऐसा कौन से गैर इस्लामी काम है जो आज उम्मत में आम आम नहीं है।
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हमारी ये वो क़ौम है जिसकी अक्सरिय अक्सर दूसरी कौमो में कीड़े निकालती है और अपने गिरेबान में झांकना भुल जाती है। अल्लाह का शुध्द पैग़ाम पाने वाली दुनिया की सबसे बड़ी अंधभक्त क़ौम है ये। ये ऐसे ही पूरी दुनिया मे ज़िल्लत का आज़ाब झेलेंगे जैसा कि दशकों से झेल रहे है। इनके दुनयावी हीरो और दीनी रहहुमा भी इनकी तरह जाहील और इस्लाम से कौसों दूर हैं। अक्सरपूरी क़ौम की कहा जाता है क्योंकि जब ज़्यादातर जाहील हो। वरना दिखाओ वो जगह जंहा हमसे दूसरे खुश है। बहुत कम है। हम तो अपनी क़ौम में ही फिरकवारियात और कुफ्र के फतवो पर नाच रहे है।
इस क़ौम का सबसे बड़ा दोहरापन यही है कि अपने दुश्मनों को नबी के दुश्मनों से तुलना करती है, चलिए कर लीजये। पर कभी ये तुलना नहीं करती की आज के मुसलमान और नबी के वक़्त के मुसलमान या सहाबा के किरदार, अखलाक, ईमान आदि में ज़मीन आसमान का फ़र्क़ है। कभी उनके नाखून के बराबर भी ज़मीन पर इस्लाम के लिए मेहनत किये होते तो आज मुसलमानों का ये हाल नहीं हो रहा होता जो देश में हो रहा है और न ही इतने ज़्यादा दुश्मन होते। वो इस्लाम जीते थे, तुम इस्लाम घसीट रहे हो। वो ज़िम्मेदारी निभाते थे, तुम अपनी गलतियां भी दूसरों पर थोपते हो। ये फ़र्क़ दूर हुआ तो सूरत भी बदलेगी इंशाअल्लाह।
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अच्छा काम करते करते जब एक ज़्यादती नाइंसाफी मुसलमानों के साथ हो जाती है तो मुंसघी कहते है और करो हिन्दुओ की सेवा। जैसी ही कोई मुसलानों से हिंसा होती है, अच्छा काम करने वाले हिन्दुओ को संघी कहते है और करो मुल्लो की सेवा। कमाल है दोनों कट्टरवादी अपने धर्म के मूल आदेश से दूर है। कौमो की ज़िंदगी हज़रों सालों की होती है। उनकी मानसिकता बदलने में दशकों लगते है। जितना वक़्त ज़हर बोन में लगता है, कम से कम उतना तो ज़हर निकालने में भी लगेगा। जुमा जुमा 4 दिन खिदमते खलक में लगा के सदियों का हर्जाना चाहना बेफवक़ूफ़ी है। क़ौम में फसबूक वारीयर बहुत है ज़मीन पर बहुत कम।
उसके कुफ्र के ऐलान और आपकी दुआ में, उसकी कुफरी मान्यता और आपकी भावना में कंही से कंही तक संबंध नहीं है। ये दो अलग बातें जिनको आम मुसलामन कमइल्म के कारण मिलाने की असफल कोशिश करता है। दोनों अलग बातें है।
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इनके आलीमों की स्टडी से ये सीख के नफरत फेला रहे है तो इसका मतकब यही तो हूआ न कि इनकी इस्लामी स्टडी फॉल्टी थी और सिर्फ कमियां निकालने के मकसद से की गई थी? यानी इस्लाम का मुताला अनबायसेड नहीं था। अगर मुताला गैर जानिबदार वाकई नहीं था तो फीर यक़ीनन इस्लाम की तालीम को समझने में इनसे गलती हुई। अब सवाल ये है कि क्या कुछ लोग इन तक पहुचे होंगे जिन्होंने ये हक़ वाज़ेह कर दिया हो। ऊपर से क्या इनके लीडरों पर हुई हुज्जत तमाम क्या इन पर यानी ऐसे फॉलोवर पर भी हुज्जत तमाम मानी जायगी? क्योंकि अल्लाह तो एक जान का बोझ दूसरी जान पर नही डालता। एक और बात इनको यकीनन मालूम था कि देश दुनिया मे जो सरकारी अत्याचार हो रहा है या इनके द्वारा फैलाई गई नफरत बेहद गलत है फिर भी ये उसको सपोर्ट करते थे। तो क्या इनको इस दुनियावी गलत कामो का इल्म होना, इस्लाम की ही हुज्जत तमाम मानी जायेगी? क्या इनको ये अखलाकियात का इल्म होना, इन्हें इस्लाम का पूरा बुनियादी इल्म या दावत होना ही माना जायगा? अबु जहल जो नबियों के सरदार से कायल नहीं हुआ और अल्लाह के मेहबूब के साथ रहते हुए भी उनका कायल न हुआ (बल्कि जो उनका मुख़ालिफ़, दुश्मन, कत्ल की साजिशकर्ता भी था).....और..एक आम सा इस्लाम का मुख़ालिफ़ (सरदाना) जिसको कायल करने वाले हम जैसे कच्चे आम मुसलमान है (हम जो नबी के नाखून के बराबर भी नहीं )। तो फिर ऐसा अबु जहल, ऐसे सरदाना से हज़ार। गुना बेहतर कैसे हो सकता है।
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सिख क़ौम की सफलता में सबसे बड़ा हाथ शायद उनकी ख़िदमत का है। अल्लाह का आम निज़ाम है, नवाज़ने वाले को नवाज़ना। हमारी क़ौम इससे बहुत दूर है। हमसे अगर ख़िदमत खलक कर रहा होता तो इस तरह हर जगह ज़िल्लत नही उठा रहा होता। जिनके पास संसाधन है वो घरों में दुबके रहते है। पाकिस्तान से पहले जन संसाधन थे तब भी क्या कर लिया। अपने संसाधन जैसे वक्फ खा चुके है। ज़कात अदा नहीं की जा रही सिर्फ दी जा रही है वो भी बट्टा लगाके। ख़िदमत कर रहा होता तो आज माहौल ऐसा नहीं होता। मस्जिदों को गुरुद्वारे की तरह इस्तेमाल करने में अपनी बनाई शरीयत ले आते है। ज़कात खैरात सदक़ा सिर्फ क़ौम को देना है। और सोचते है सिख की बराबरी करँगे। सिख तो एक बार मे समझ गए। हम इतने दंगे झेल के कौन सा समझदार या एक हो गए। मैं सेल्फ क्रिटिसिज्म और सेल्फ इवेल्यूएशन में यकीन रखता हूँ जो इस्लाम की मूल बुनुयादी शिक्षा है। सेल्फ हेटिंग तो उन लोगों ने ईजाद किया जिनकी आंखों के आगे सिर्फ दुनिया है, दीन नहीं और जो आलकसी है बिना कुछ किये टॉप पर आना चाहते है।
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जब जहाज़ डूब रहा होता है तो सवारी हर तरह से जान बचाने के लिए हाथ पैर मारती है। अब इस पर कैप्टन ये कह दे कि ये लोग पैनिक मचा रही है और जहाज बचाने की इनको ट्रेनिंग नहीं है इसलिए इन्हें जहाज़ बचाने की कोशिश नहीं करनी चाहिए, इनको जहाज़ से बाहर फेंक दो। अब सवारी करे तो क्या करे।
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इसलिए कहते है कि लगभग सब करप्ट है। कोई कम कोई ज़्यादा। पेंसिल की हैसियत वाला पेंसिल चुराता है और जहाज़ की हैसियत वाला जहाज़। ज़र्रे कि ताकत रखने वाला ज़र्रा बराबर ज़ुल्म ज़्यादती करता है और पहाड़ की ताकत रखने वाला पहाड़ के बराबर ज़ुल्म ज़्यादती करता है। एक जाहिल भी अपनी दकियानूसी को इकलौता हक़ समझता है और एक आलिम भी अपनी दकियानूसी को इकलौता हक़।
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न जाने मुसलमान कब ख्वाबों की दुनिया से बाहर आयंगे और समझेंगे की खिलाफत और इस्लामी हुकूमत जैसा अब कुछ होना नामुमकिन है। जिस इमाम मेहदी की राह देख रहे है, उनका वक़्त कब आयेगा पता नहीं। क्या तब तक सिर्फ इंतज़ार करें और हाथ पर हाथ धरे देखते रहे। मुसलमान एज़ ए मज़हबी क़ौम अपनी बारी ले चुके है। अब किसी और कि बारी है। पिछले 500 साल इसके गवाह है।
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अगर आप ज़िंदगी भर अपने माल को दूसरों के लिए कुर्बान करते आ रहे है और उसको ज़रूरतमंदो में तकसीम करते आ रहे है तो आपका ज़िबह किया गया जानवर वाकई में एक कुर्बानी है। अगर आप ज़िंदगी भर दूसरों का हक हड़पते हुए और लोगों का माल डकारते हुए आ रहे है तो आपका ज़िबह किया हुआ जानवर सिर्फ़ एक हलाक़त है और कुछ नहीं। यानी क़ुरबानी और नियत के मुताल्लिक़ 2 तरह के लोग पाए जाते है। पहले वो लोग है जो पूरे साल दूसरों पर अपना माल कुर्बान करते है और फिर जानवर को क़र्बानी का अहद करते है। दूसरे वो लोग है जो पूरे साल दूसरों का माल हलाक़ और हड़पने में लगे रहते है और फिर जानवर को हलाक़ करने उसका गोश्त भी डकार जाते है।
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