【बिदत के असल मायने क्या है और इससे क्या मुराद है।】
◆ बिदत के लफ़ज़न मायने नई चीज़ से या नई चीज़ पैदा करने से है। रसूलुल्लाह से पहले से ही अरब में यह लफ्ज़ इन्ही मायनो में इस्तेमाल होता आ रहा था। बिदत यानी नई ईजाद जो अच्छी भी हो सकती है और बुरी भी। दुनिया के मामलों में अच्छी बिदत बड़ी अहम और फायदेमंद चीज़ है। जैसे मॉडर्न साइंस या एलोपैथी इलाज की ईजाद करना। दुनिया के मामलों में की गयी बुरी बिदत जैसे कंप्यूटर वायरस की ईजाद एक बुरी चीज़ है।
◆ दीन मानने और दीन पर चलने के तरीको में अच्छी बिदत यानी अच्छी नई चीजों का इस्तेमाल शुरू करना भी असल में दीन में बिदत नहीं है। जैसे की अज़ान देने के लिए लाउडस्पीकर, नमाज़ टाइम देखने के लिए घड़ी, वुज़ू के लिए नल इस्तेमाल करना अच्छी बिदत है और फायदेमंद है। ऐसे ही हज के किये जहाज़, सायरन की आवाज़ से रोज़ा खोलना, क़ुरान पढ़ने के लिए मोबाइल अप्प, ज़कात के लिए कैलकुलेटर का इस्तेमाल करना भी बिदत की फेहरिस्त में नहीं आएंगी। पर दीन मानने और दीन पर चलने के तरीकों में बुरी बिदत भी हो सकती है जिनकी कंही से कंही तक गुंजाइश नहीं। जैसे कि सड़कों पर आकर नमाज़ पढ़ना और आवाजाही रोक देना या अज़ान के लाउडस्पीकर पर नाते नज़्में, लगा के शोर मचाना। अच्छी
बिदअत का सबसे बढ़िया उदाहरण है हज़रत उमर का जब उन्होंने तरावीह को मुक़म्मल
रमज़ान में एक इमाम के पीछे पढ़ने का हुक्म देने के बाद फरमाया था कि क्या
अच्छी बिदअत है ये जो मैंने शुरू की है।
◆ असल दिक्कत है दीन में बिदत करने की। यानी दीन के किसी एहकाम, फ़राइज़, बुनियाद में कोई नई चीज़ पैदा करना। इसे दीन में बिदत क़रार दिया गया है और इसे से दूरी इख्तियार करने को बार बार कहा गया है। यानी दीन में कुछ नई बात जोड़ना बिदत है और दीन मानने के तरीकों में नई चीज़ लाना बिदत नहीं है। जिसे नबी ने दीन या दीन का हिस्सा क़रार नही दिया, उसे दीन बना के पेश करना बिदत है। नबी की तालीमात में भी कुछ दाखिल नही किया जा सकता है। जैसे दीन में कुछ जोड़ा नही जा सकता वैसे ही सुन्नत में भी कुछ जोड़ा नही जा सकता, इनमें कुछ जोड़ना ही बिदत है। दीन के मामलात में ये देखा जाएगा कि क्या नबी ने ऐसा किया और दुनिया के मामले में ये देखा जायगा की मुमानियत तो नहीं है। यानी दुनिया के काम मे मुमानियत देखी जाएगी और दीन के काम में नबी का अमल। जैसे हज के अरकान वही रहेंगे पर मक्का आएं जाए जैसे मर्ज़ी यानी सवारी कोई भी हो सकती है। नमाज़ के अरकान वही रहंगे पर मस्जीद में जैसी मर्ज़ी सहूलतें रखवाएं। इबादत में कोई नई इबादत अब जोड़ी या घटाई नही जा सकती।
◆ आम तौर पर बिदत को दो हिस्सों में बांटा जाता है बिदत ए हसना (अच्छी बिदत) और बिदत ए सय्या (बुरी बिदत). ये डिवीजन वो आलिम करते है जो दीन के मानने और दीन पर चलने के तरीकों की ईजाद को 'दीन में बिदत' मानते है। जबकि गहराई से झांकें तो यह साफ है कि दीन में बिदत अच्छी हो ही नही सकती, सिर्फ बुरी होती है। इसलिए अच्छी और बुरी बिदत का कांसेप्ट दरअसल तरिकों में बिदत है जो पूरी तरह जायज़ है।
■ 1. हलाल हराम की वज़ाहत
सूरह अराफ (7:33) में खाने पीने के अलावा सिर्फ 5 बातें हराम क़रार दी गई है। इसके अलावा कोई बात हराम नहीं है। हर बात के हलाल और हराम होने का जायज़ा इस आयत के मद्देनजर लिया जाएगा। वो पांच हराम काम है:- बदकारी, हक़तल्फ़ी (गुनाह), ज़ुल्म (किसी की जान माल आबरू के ख़िलाफ़), शिर्क, अल्लाह से ऐसी बात जोड़ना या अल्लाह के बारे में ऐसी बात कहना, जिसका हमें इल्म नही (यानी अपनी मर्ज़ी से हलाल हराम मुक़र्रर करना भी)।
ह. सलमान फ़ारसी की हदीस है कि नबी ने फरमाया की हलाल और हराम सिर्फ वही है जो अल्लाह ने क़ुरान में हलाल और हराम क़रार दिये है। जिस पर अल्लाह खामोश है वो सब बख्शने के क़ाबिल है।
यानी इन 5 काम के अलावा बाकी तमाम चीज़े हलाल है। इसलिए दुनिया और दीन को फॉलो करने में इस्तेमाल होने वाले तरिकों में बिदत भी जायज़ है। बस दीन में बिदत या नई चीज़ की ईजाद मना है यानी दीन के अहकामों -अरकानों में कोई बदलाव नही किया जा सकता। दीन अल्लाह का दिया हुआ है जो मुकम्मल हो चुका है इसलिए इसमे कुछ जोड़ना, घटाना या बदलाव करना, अल्लाह की तरफ ऐसी बात को जोड़ने जैसा ही है जिसका हमें इल्म नहीं या जो अल्लाह ने कही ही नही।
■ 2. दीन में अच्छा तरीक़ा।
हुज़ूर सल्ल. की हदीस है कि आपने फरमाया की इस्लाम मे कोई अच्छी प्रैक्टिस (सुन्नतन हसनतन यानी अच्छा तरीका) लाया तो इस पर अमल करने वालो की तरह उसको भी सवाब मिलता रहेगा। और कोई बुरी प्रैक्टिस लाया तो इस पर जो लोग चलेंगे उनकी तरह उसको भी गुनाह मिलता रहेगा।
इसलिए दीन पर चलने के रास्तों या दीन को मानने के लिए इस्तेमाल होने वाले तरीकों में नई या अच्छी चीजें लाना या पैदा करना हराम कामों की फेहरिस्त में नही आता। ऐसी अच्छे नए तरिकों की ईजाद बिदत नहीं है पर सिर्फ इस सुरत में ये बिदत मानी जाएगी जब इन अच्छे तरिकों को फ़र्ज़ क़रार दे दिया जाए। क्योंकी हलाल को हराम, हराम को हलाल, फ़र्ज़ को मुबाह, मुबाह को फ़र्ज़ बना लेना आदि दीन में बिदत है।
■ 3. दीन की बुनियादी बातों में बिदत।
अब्दुल्लाह इब्न उमर रज़ि. को किसी ने सलाम भेजा तो उन्होंने यह कहकर सलाम लेने से मना कर दिया कि उसने क़ादरिया बन कर बिदत की है। असल मे क़ादरिया एक फिरका था जिसके बारे में कहा जाता है कि वो क़दर में यकीन नही रखते थे जो इस्लामी अक़ीदे की अहम बुनियाद है।
इससे यह साफ हो जाता है कि उस वक़्त भी बिदत के मायने, दीन में बिदत से लिये जाते थे यानी दीन में कोई जोड़ घटा बदलवा करने से, न की दीन फॉलो करने के तरिकों और रास्ते से।
■ 4. खुल्फाए राशिदुन की दीन के रास्तों और तरीकों में इजाद।
रसूलुल्लाह ने एक एक दिन छोड़ कर 3 दिन तरावीह (तहज्जुद/सलातुल लयल) की सहाबा को आधी रात में नमाज़ पढ़ाई। आपके जाने के बाद हज़रत उमर ने लोगों को अलग अलग यही नमाज़ पढ़ते देखा और सबको एक इमाम के पीछे यह नमाज़ पढ़ना शुरू करवा के कहा कि यह कितनी अच्छी बिदत (नयमल बिदाह) है जो मैंने शुरू की। इसे लोग ने 30 दिन भी पढ़ना शुरू कर दिया। यानी दीन पर अमल करने में कोई नया तरीका पैदा करना दीन में बिदत नहीं है।
क़ुरान में पहले 30 पारे नहीं होते थे। ये तो बाद में हज़रत उस्मान की खिलाफत के दौरान, एक महीने में पूरा क़ुरान पढ़ने के लिहाज़ से इसे रोज़ का एक पारा पढ़ने के हिसाब से 30 पारो में बांट दिया गया। पर यह भी दीन में बिदत नहीं कहलाई, वजह वही है कि ये भी सिर्फ तरिकों में एक नई ईजाद है, बुनियाद में नही।
नबी के वक़्त जुमे की अज़ान सिर्फ एक बार दी जाती थी। पर बाद में जब आबादी ज़्यादा होने लगी तो 2 बार दो अलग जगह से अज़ान देंना शुरू किया गया हज़रत उस्मान रज़ि के दौर में ताकि सभी को आवाज़ पहुंच जाए। ज़ाहिर है ये भी बिदत नही मानी गई।
इमाम क़ुरतबी अपनी तफ़्सीर में लिखते है कि खलीफा हज़रत अली ने अपने शागिर्दों और कूफ़ा के चीफ जस्टिस अददौली से क़ुरान में ज़ेर ज़बर पेश लगवाए थे। ये भी बिदत नही थी।
हज़रत अबु बकर ने साहाबा के सीनों में महफूज़ क़ुरान को किताब की शक्ल में पिरोया बिल्कुल उसी क्रम में जो अल्लाह के हकुम अनुसार, रसूलुल्लाह का निर्धारित किया हुआ था। हिफ़्ज़ के अलावा पूरा क़ुरान लिखित तौर पर अलग अलग चीजों पर मौजूद था जैसे हड्डियां, पत्ते, छाल, चमड़ा, तख्ती, कपड़ा, लकड़ी आदि। इसे भी एक नई चीज़ नही समझा गया।
रसूलुल्लाह ने हज्जे तमत्तो (हज उमरा एक ही सफर के जमा करना) कि इजाज़त दी थी। फिर हज़रत उमर ने इसे बंद करवा दिया जिसे हज़रत अली ने अपनी खिलाफत के दौरान फिर से शुरू करवाया। हज़रत उमर का ये फैसला भी बिदत नहीं कहलाया गया।
इस्लाम से पहले हज के वक़्त में सिर्फ अरबी लोग सई करते थे पर रसूलुल्लाह ने इसे सबके द्वारा किए जाने के लिए आगे जारी कर दिया। इसी तरह आशूरा यानी 10 मुहर्रम का रोज़ा यहूदी रखा करते थे जिसकी वजह फतह उल बारी में ये बताई गई है कि यहूद से कभी कोई गुनाह हो गया था जिसके बदले यहूद ये रोज़ा रखा करते थे (ये भी कहा जाता है कि इस दिन मूसा अलैह को फिरौन से निजात मिली थी इसकिये रोज़ा रखा जाता है)। रसूलुल्लाह ने इस रोज़े को मुसलमानों में भी जारी किया।
■ 5. साहाबा की दीन के रास्तों और तरीकों में इजाद।
साहाबा के वक़्त में ही क़ुरान में 7 मंज़िले बन चुकी थी क्योंकि वो क़ुरान 7 दिन में पढ़ लेते थे फिर ताबईन के दौर में लोग सुस्त होने लगे और 30 दिन में पढ़ने लगे इसलिए 30 पारे हो गए। उसके बाद क़ुरान में रुकू की डिवीज़न सब्जेक्ट के हिसाब की गई। क्या ये सब भी बिदत नहीं कहलाएगी? कुरान की सुरह के नाम सहाबाओ के रखे हुए हैं.
एक बार नबी नमाज़ पढ़ा रहे थे। रुकू से उठ कर पीछे से एक सहाबा ने दुवा पढ़ी ज़ोर से (हमदन कसीरन तय्यबन...) जिसे रसूलुल्लाह ने नही सिखाया था। नमाज़ पूरी होने के बाद नबी ने पूछा कौन था जिसने ये दुवा पढ़ी। सहाबी ने कहा मैं था। तो आप ने उसे डांटने के बजाए फरमाया की मैंने 70 से ज़्यादा फरिश्तों को तुम्हारी और लपकते हुए देखा कि इस दुआ को हम लेले। यानी एक अच्छी चीज़ गैर नबी से भी मिले तो लेने में कोई हर्ज नही।
ररसूलुल्लाह ने इसकी हिदायत नहीं की थी फिर भी हज़रत बिलाल चाहे कोई भी वक़्त हो हर वुजू के बाद 2 रकअत नमाज़ अदा करते थे जिसकी वजह से रसूलुल्लाह ने उनके कदमो की आवाज़ जन्नत में सुनी थी ख्वाब के दौरान। सहीह बुखारी की शरह, फतह उल बारी में इब्ने हजर असकलानी कहते है कि ये बिलाल रज़ि का अपना इज्तिहाद था।
ख़ूबयब बिन अदि ने क़त्ल किये जाने से पहले मुशरिक क़ुरैश से 2 रकअत पढ़ने की ख़्वाहिश जताई और फिर इजाज़त मिलने पर पढ़ी। यंही से इस प्रैक्टिस की शुरुवात हुई।
■ 6. मोहब्बत की वजह से नई ईजाद।
अब्दुल्लाह इब्ने उमर हज के दौरान, नबी से मुहब्बत की वज़ह से हर उस जगह बैठ कर इस्तनजा किया करते थे जंहा जंहा हमारे नबी को उन्होंने फ़ारिग होते हुआ देखा। क्या है कोई आलिम जो इस अमल को बिदत क़रार दे दे। इसे सिर्फ इब्ने तैमिया ने बिदत कहा है। और बाकी सभी उलेमाओं ने इब्ने तैमिया पर इस पर इख़्तलाफ़ किया है।
इमाम मालिक रह. मदीना में नंगे पैर चला करते थे नबी की मुब्बत ने की उनका अदब इसकी इजाजत नहीं देता की उन जगह पर चले जंहा के चप्पे चप्पे पर नबी के कदम पड़े है। क्या कोई है जो इसे बिदत क़रार दे दे की ऐसा करने को नबी ने कभी ने कब कहा था।
■ 7. इमामों की तशरीह।
इमाम शाफी का मानना था कि वो नई चीज़ जो क़ुरान, सुन्नत, हदीस और इज्मा के खिलाफ हो वो बिदत है पर जो नई छीज़ अपनी बुनियाद में बुरी नही है और ऊपर कही बातों से नही टकराती है तब यह काबिले तारीफ है और ना काबिले एतराज़ बिदत है।
इब्न हज असकलानी और इब्ने क़य्यिम अल जौज़िया ने ऐसी नई चीज़ को बिदत माना है जो क़ुरान और सुन्नत की मुखालफत करे और इस्लाम के खिलाफ हो।
इमाम इब्न रजब ने उस नई चीज़ को बिदत कहा है जिसकी क़ुरान और सुन्नत में कोई बुनियाद नहीं।
शिया मज़हब कहता है कि फ़र्ज़, मुस्तहब, हलाल, मकरूह या हराम के तौर पर क़ुरान और हदीस के खिलाफ इस्लाम में लायी जाने वाली कोई भी नई चीज़ बिदत है।
इमाम शौकानी, इमाम नवावी, इमाम असकलानी, इमाम रागिब के अनुसार बिदतए हसना वो नई चीज़ है जो शरिया के खिलाफ नही है।
इसीलिए तफ़्सीर, हदीस संग्रह और फ़िक़्ह की ईजाद को बिदअत के हसना माना गया है क्योंकि ये सभी रसूलुल्लाह के वक़्त में थी ही नही। जबकि बिदत की आम मानी गयी गलत तशरीह से तौले तो यह सभी बिदत कही जा सकती है।
■ 8. बेबुनियाद बिदत का तमग़ा देना।
इमाम ग़ज़ाली ने किताब अल इल्म में सहाबा हुजैफा इब्ने यमन की बात दोहराते हुए कहा कि ये कितना भी अजीब लगे पर आज की स्वीकृत कार्य गुज़रे हुए कल में प्रतिबंध थे और आज के प्रतिबंध आने वाले कल के स्वीकृत कार्य है।
असल में हमारे उलेमा और दीनी रहनुमा टयूबलाइट है जो धीरे धीरे झटके खा खा कर जलते है। ये शुरुवात में एक चीज़ को बिदत या हराम क़रार दे देते है और बाद में उसी को करने का हकुम देते है या खुद करना शुरू कर देते है। ऐसी कुछ मिसालें है:-
● इमाम इब्ने तय्मिया के वक़्त में न्यूमेरिकल साइंस में काम करना गुमराही डिक्लेर किया गया।
● इमाम ग़ज़ाली के वक़्त में फिलोसोफी का इतना बोलबाला हुआ कि साइंस को हक़ीर चीज़ माना जाने लगा और लोग साइंस में रिसर्च छोड़कर फिलोसोफी की तरफ रुजू करने लगे
● बाद में चलकर सल्फी अक़ीदे के लोगो ने फिलोसोफी को गुमराही क़रार देते हुए इससे बचने को कहने लगे क्योंकि फिलॉसफी उनकी समझ से परे थी।
● इब्ने खल्दून ने मेडिकल साइंस को गैर नबवी साइंस क़रार देकर एक गकतफहमी को दूर किया।
● मेडिवल पीरियड में तुर्की में प्रिंटिंग प्रेस के खिलाफ फतवा देके इसके जरिये इस्लामिक साहित्य छापने को मना कर दिया गया जिसकी वजह से दीन के फैलाव सिमटता गया पर आज यह जायज़ है।
● घड़ी से नमाज़ के अवक़ात या टाइम फिक्स करने को भी ग़लत क़रार दिया गया पर आज ये हर जगह नार्मल है।
● लाउडस्पीकर को शैतान और मशीन की आवाज़ से बता कर इसपे अज़ान देना रोका गया पर आज हर मस्जिदों पर लाउडस्पीकर परिंदों की तरह लटके हुए है।
● कैमरा- फ़ोटो और टीवी को हराम क़रार दिया गया पर आज सभी आलिम आगे बढ़ कर फ़ोटो खिंचवाते और यूट्यूब पर मुखालिफ आलिमो पर जवाबी वीडयो बनाते दिखाई देते है।
● आगाज़ में वेस्टर्न एजुकेशन, इंग्लिश लैंग्वेज, यूनिवर्सिटी और स्कूलो का भी जम कर विरोध किया गया जिसका नतीजा यह निकला कि मुसलमान एजुकेशन की फील्ड में पिछड़ते चले गए।
■ 9. बिदत पर कुछ सवाल।
● अगर तरिकों में ईजाद, दीन में ईजाद है तो फिर...
● सेहरी में जगाने के लिए सायरन का इस्तेमाल क्यों?
● इफ्तार में खाने में समोसे का इस्तेमाल क्यों?
● चांद देखने में टेलिस्कोप का इस्तेमाल क्यों?
● हज में माजूरों के लिए व्हीलचेयर का इस्तेमाल क्यों?
● अज़ान के लिए लिउडस्पीकर क्यों?
● तकबीरों के लिए माइक-स्पीकर क्यों?
● नमाज़ के वक़्त के लिए घड़ी क्यों?
● वुज़ू के लिए नल क्यों?
● मशीन से छपे क़ुरान क्यों?
● क़ुरान पढ़ने के लिए मोबाइल एप्प क्यों?
● हज के लिए हवाई जहाज़ क्यो?
● ज़कात के हिसाब के लिए कैलकुलेटर क्यों?
● मस्जिदों में कालीन, झूमर, टाइल्स, मल्टीप्ल फ्लोर क्यों?
● अज़कार के लिए डिजिटल तस्बीह क्यो?
■ 10. एक दूसरे फिरकों पर बिदत का इल्जाम।
● ज़िंदगी मे सिर्फ एक बार शहर के बाहर दावत देने नबी देने ताइफ़ गए थे फिर क्यों जमाते बार बार बाहर जाती है। क्या यह बिदत नहीं?
● रसूलुल्लाह रोज़ 5 नमाज़ों के दौरान दुवा मांगा करते थे, न कि हर नमाज़ खत्म होने के बाद ऐसे इशतमायी दुवा करते थे जैसे आज हम करते है, क्या यह बिदत नही?
● हमारे नबी का आम लिबास कुर्ता पजामा नही बल्कि थोब या जुब्बा था पर मुसलमान तो कुर्ता पजामा को सुन्नत मानके पहनता है, क्या यह बिदत नही है?
● हमारे नबी आम तौर पर सर पे अमामह रखते थे, टोपी या कूफ़ी नहीं। पर लोग तो नमाज़ से पहले टोपी पहनना ज़रूरी समझते है। क्या यह बिदत नही ?
● नमाज़ से पहले पजामा या इज़ार ऊपर मोड़ना नबी से साबित नही फिर क्यों मुसलमान नमाज़ से पहले इसे मोड़ते है।
● नबी तो ऊंट की सवारी करते थे। कार बाइक की सवारी बिदत नहीं?
● दहेज लेना नबी से साबित नही। शादी में शेरवानी पहनना भी आप से साबित नही। निकाह में छुआरे, सलामी, जूते छुपाना भी साबित नहीं है। फिर लोग क्यों ये बिदत करते है?
● बर्थडे मानना भी सुन्नत से साबित नहीं पर फिर भी बहुत से लोग बच्चों का बर्थडे मनाते है।
● उर्स, इज्तिमा, जलसे, सलाना कॉन्फ्रेन्स, हफ्ते में जोड़, नमाज़ के बाद गश्त और रैलियां भी नबी से साबित नहीं फिर क्यो करते है?
● जुमा मुबारक कहना और रसूलुल्लाह के नाम पर अंगूठे चूमना भी साबित नही फिर क्यों करते है?
इसे एक मिसाल से अच्छे से समझा जा सकता है। कुछ बंदरों को एक कुंवे में डाला गया और जैसे ही कोई बंदर निकलने की कोशिश करता उस पर ठंडा पानी डाल दिया जाता। बंदरो को पता लग गया कि बाहर नहीं निकलना है। फिर कुंवे के एक एक करके बंदर बदलते जाते। पुराने बंदर नए वाले को निकलने की कोशिश करने पर पीट देते पर वजह नहीं मालूम होती। यही होता है है जब मुसलमानों पुराने गलत अक़ीदों को तोड़ने की कोशीश करता है तो पुराने लोग उसे चुप करा के बिठा देते ह
है।
दीन के तौर पर किये जा रहे हर अमल की पैदाइश यक़ीनन क़ुरान और सुन्नत से ही होनी चाहिए। सभी फिक़ही मसलकों में सल्फी या अहले हदीस या ईमाम शाफ़ई के पैरोकार ही सबसे ज़्यादा बिदअत को लेके एहतियात बरतते हैं। मगर इनके पास भी बिदअत की एक सही और जामे तौज़ीह नहीं है और वो अक्सर ही इसमें गडमड करके लोगों की गुमराही का सबब बनते हैं।
बिदत एक सेंसिटिव इशू है और बिना समझे किसी पर बिदत का इल्जाम लगाना, अल्लाह की तरफ से कोई बात कहने जैसा है।
No comments:
Post a Comment