क्रिसमस जैसे जन्मदिन त्यौहारों पर मुबारकबाद देना।
अक्सर इस विरोध की बुनियाद दो होती हैं, पहली कि ये गैरों की मुशाबिहत है, जबकि इस मुशाबिहत वाली हदीस का मौज़ू जंग का मैदान है, न कि आम ज़िंदगी या त्यौहार। दूसरी बुनियाद है कि ये उनके अकीदे की ताईद है। इसलिए ये दलील दी जाती है कि क्रिसमस की मुबारकबाद देना शिर्क है क्योंकि ईसाईयों के अनुसार इस दिन ईसा अलैह. पैदा हुए थे और वो उन्हें खुदा का बेटा मानते हैं। किसी धार्मिक महापुरुष के दिन की मुबारकबाद देने से शिर्क नहीं हो जाता। मुबारकबाद देना अलग बात है और शिरकीया अक़ीदा रखना अलग बात है। हैप्पी क्रिसमस कह देने से ही आप शिर्क या कुफ्र या किसी गैर अख़लाकी काम को सपोर्ट नहीं कर रहे हैं। ऐसा कहना उन लोगो के अक़ीदे के साथ सहमति नहीं है। बल्कि किसी व्यक्ति या महापुरुष के प्रति दूसरों की भावनाओ और खुशियों को संबोधित करना या सम्मान देना है। उनके अक़ीदों और हमारे अमल में एक लंबा चौढ़ा फ़र्क़ होता है। अमल का दामोदर नियत पर होता है और मुबारकबाद देने वाले कि अगर नियत शिर्क से पाक से है तो उसका फैसला भी इसी के मद्देनजर होगा।
■ सबसे पहले कुछ शब्दों के लफ़ज़ी मायने समझ लें। किसी को विश करते हुए हैप्पी कहने का अर्थ होता है कि आपका दिन खुशहाल रहे या गुज़रे। मैरी क्रिसमस कहने में मैरी का अर्थ होता है कि आपका ये दिन आनन्दित या मज़ेदार रहे। अरबी लफ्ज़ मुबारक कहना, इन दोनों शब्दो से अलग है। किसी खास दिन पर जिसे कहने का मतलब होता है बलेस्ड होना यानी रहमत पाना या आशीर्वाद पाना। इसलिए त्योहार विश करते हुए कहे जाने वाले इन लफ़्ज़ों में कंही भी ये नहीं है कि मैंने जीसस को बेटा माना। क्रिसमस ईसा की पैदाइश का दिन माना जाता है, न कि उनके बेटे बनाये जाने का। क्रिसमस बना है क्राइस्ट और मास शब्द से। क्राइस्ट यीशु का नाम है और मास के बहुत से अर्थ होते हैं जो समय के साथ साथ बदलते रहे हैं। इसका मतलब 'मृत्यू या बलिदान' है, 'मिशन' भी है और 'भेजा जाना' आदि भी। क्रिसमस पर मुबारक देने का मतलब भी हुआ कि अल्लाह आपकी ईसा से मुहब्बत में बरकत दे।
■ क्रिसमस को ईसा अलैह. का जन्मदिन माना जाता है (गलत दिन ही सही). ये दिन सिर्फ उनका जन्मदिन है। क्रिसमस का मतलब उन्हें खुदा का बेटा मानना नहीं है, न ही ट्रिनिटी को मानना है, न ही क्रूसिफिकेशन को मानना है। इस्लाम को जन्मदिन मनाने पर नहीं बल्कि इन बातों को मानने पर इख्तिलाफ़ है। बल्कि यंहा तक कि क्रिसमस का मतलब उन्हें कुवाँरी मां से जन्म लेना भी मानना नहीं है। उनका जन्म एक हिस्टोरिकल और बायोलॉजीकल घटना है और उनकी अननेचुरल पैदाइश या उनकी मज़हबी हैसियत इंसानी फेथ का मसला है।
■ नबीयों के जन्मदिन पर ख़ुशी मानाने को तो कुरान में, रिसालत में, हदीसों में कंही मना नहीं किया गया है. इसलिए नबियों के जन्मदिन मनाना गलत नहीं है. अगर जन्मदिन मानना गलत है तो मिलाद उन नबी भी गलत हो जायगी और पीरों के उर्स भी। मगर ये हराम नहीं है, हाँ इनके मनाने के तरीके गलत हो सकते हैं मगर ये अपनी ज़ात में हराम या नाजायज़ नहीं है।
■ इस्लामी इतिहास में जन्मदिन मनाने के उदाहरण इसलिए नहीं मिलते हैं क्योंकि दुनिया भर में क़दीम जमाने में लोग जन्मदिन याद ही नहीं रखते थे तो जन्मदिन मनाना भी आम नहीं था। जन्मदिन मनाना तो बहुत बाद में जा कर आम बात हुई है। हालांकि हर साल कुछ दिन प्रतीक के तौर पर त्योहार मनाना चलन में था। यही वजह है कि अरब में भी पुराने अरबी दौर के सांस्कृतिक त्योहार या दिन मनाने के उदाहरण तो इतिहास में मिल जाते हैं मगर जन्मदिनों के नहीं। खुशी मनाने या त्योहार मनाने के तरीके भी हर कौम और संस्कृति में अलग अलग तरीके होते थे और आज भी अलग होते हैं।
इसके साथ ही इस्लामी साहित्य में नबी के द्वारा गैर मुस्लिमों को उनके त्योहारों पर मुबारकबाद देना या उनसे मिलने-जुुुलने के उदाहरण नहीं मिलते हैं क्योंकि उस समय आज की तरह मुबारकबाद देने का चलन ही नहीं था। दूसरों के त्योहारों पर नबी किस तरह की प्रतिक्रिया देते थे, ऐसे उदाहरण दर्ज नहीं हैं, शायद गलती से या जानबूझ कर इनको आगे नहीं बढ़ाया गया। ईद मुबारक कहना भी बहुत बाद में शुरू हुआ है। हदीसों से मालूम पड़ता है कि उस वक़्त ईद कि मुबारकबाद दुवा (तक्कबलअल्लाहू मिन्ना वा मिंक कह कर) कहकर दी जाती थी, कुछ और कह कर नहीं।
■ हालांकि ऐसे कुछ दिनों की अहमियत या उन पर खुशी मनाने की कुछ मिसालें मौजूद हैं:-
दस मुहर्रम को मूसा अलैह की फिरोन पर जीत को यहूदी रोज़ा रख कर मनाते थे. रोज़ा रख कर खुशी मनाने का ये उनका तरीका था। नबी ने भी इस दिन रोज़ा रखने का हुकुम दिया यह कह कर की हम तो यहूद से ज़्यादा मूसा के करीब हैं (माजह 1734). अगले साल आप ने 9 मुहर्रम का एक रोज़ा और बढ़ा दिया (ज़ाहिर है इससे 10 मुर्रम की अहमियत खतम नहीं हुई)। हम भी ईसा अलैह. से इसाइयों से ज़्यादा अक़ीदत रखते हैं, इसलिए हम भी इस दिन कोई अच्छा काम तो कर ही सकते हैं।
कुरान (19.33) में ईसा खुद कहते हैं कि जिस दिन मैं पैदा हुआ, जिस दिन मैं मरूँगा और जिस दिन मुझे वापिस ज़िंदा उठाया जायगा, उस दिन पर सलामती (रहमत) हो। ऐसी ही बात कुरान (19:13-16) में ह. याहया बिन ज़कारिया के बारे में भी कही गयी है.
मुहम्मद सल्ल. अपने जन्म के दिन वाले रोज़ हर सप्ताह रोज़ा रखते थे और वजह के तौर पर कहते थे कि क्योंकि इस दिन मेरी पैदाइश हुई थी.
नबी (सहीह मुस्लिम 854) ने फरमाया है कि सबसे बेहतरीन दिन जुमा है क्योंकि इस दिन आदम को बनाया (पैदा किया) गया, इसी दिन उन्हें जन्नत मे डाला गया और इसी दिन निकाला गया। इससे यही साबित होता है कि इस्लाम में जन्मदिन का महत्व है और किसी दिन को महत्वपूर्ण मानने कि भी पूरी-पूरी गुंजाइश है।
■ उसी तरह जैसे जब कोई गैर मुस्लिम हमें ईद या बकरा ईद पर विश करता है तो इसका मतलब ये नहीं होता कि उसने भी रोज़े की फ़र्ज़ीयत या कुर्बानी की वाजिबियत को मान लिया है। ऐसा किसी को महसूस नहीं होता। अगर विश करना दूसरों के अक़ीदे में यकीन करना माना जाने लगे या उस मज़हब को अपनाना माना जाने लगे तो दुनिया में फिर हमें ईद पर विश करने की वजह उन्हें क्यों न गैर मुसलमानों को भी मुसलमान माना जाए? ऐसे तो वो भी मुसलमान हो चुके हैं और उन्हें फिर क.फ.र क्यों कहा जाए? ऐसा दोहरा रवैया क्यों? अगर क्रिसमस पर विश करने से या दीवाली पर बम फोड़ने से मुस्लिम हिंदुओ में शुमार हो जाते हैं तो फिर बकरा ईद के दिन, दुनिया भर में जो गैर मुस्लिम बकरों को काट कर खाते हैं, वो सभी क्या अल्लाह के यंहा मुस्लिम में शुमार हो जायँगे?
इसी तरह बारह वफात पर गैर मुस्लिम जब हमें विश करते हैं तो इसका मतलब ये नहीं माना जाता कि उन्होंने मुहम्मद साहब को अल्लाह का पैगम्बर मान लिया है। बल्कि इसका मतलब होता है कि उन्होंने आपकी श्रद्धा अनुसार आपको उनके जन्म पर मुबारबाद दी है और उन्हें एक महापुरुष और धार्मिक व्यक्ति मान कर।
जीसस को भी ईसाई खुदा का बायोलॉजिकल बेटा नहीं बल्कि थिओलॉजिकल, स्पिरिच्युअल, डिवाइन बेटा मानते हैं। सो उनके जन्मदिन पर दी गयी मुबारकबाद भी ऐसे ही सिर्फ जन्म की मुबारकबाद है, उनके बेटा होने की नहीं।
जैसे कोई साइंस्टिस्ट या अथीएस्ट किसी ईसाई को क्रिसमस की बाधाई दे तो इसका मतलब यह नहीं होगा कि उसने जीसस के वर्जिन मदर से पैदा होने की बात मान ली है या खुदा के बेटा होने की।
ये वैसे ही है जैसे कोई इन्सान किसी वली-अल्लाह या सूफी-संत की दरगाह पर उनके उर्स के मौके पर जाए उनसे मुहब्बत और अकीदत के इज़हार के नाते और वंहा आये दुसरे लोगों को मुबाकरबाद दे तो इसका मतलब ये नहीं होगा कि उसने भी उन्हें वैसे ही हाज़िर-नाज़िर मान लिया है जैसे एक खास मसलक के लोग मानते हैं और कब्रों पर सजदे और दुसरे शिरकिया काम करते हैं.
■ वैसे ईद वगैरह पर मुबारकबाद लेते हुए किसी मुस्लिम को गलत नहीं लगता पर दूसरों के त्योहारों पर देते हुए कंजूसी कर जाते हैं।
■ अगर इसी लॉजिक से चलें तो फिर ईसा अलैह. को जीसस कहना भी शिर्क होगा क्योंकि जीसस नाम, ईसाइयों का ही दिया हुआ है और जीसस को वो खुदा का बेटा मानते हैं और उनकी अक्सरियत का यही मानना है कि वो क्रिसमस वाले दिन पैदा हुए थे। यानी इस तरह जीसस कहने से तो फिर आप भी क्रिसमस और खुदा के बेटे होने की ताईद कर रहे हो। जीसस हिब्रू शब्द से बना है जिसका मूल सेमेटिक भाषा से है। इसका मलतब होता है बचाने वाला, बचाना, पहुंचाना।
■ फिर तो सोलर तारीख़ के लिए BC (Before Christ यानी यीशु से पहले के साल) और AD (Anno Domini - In the Year of the Lord यानी यीशु मसीह के पैदाइश के बाद के साल) का इस्तेमाल करना भी उनकी ताईद करना माना जाना चाहिए। क्योंकि ईसाइयों के मानना है कि खुदा के बेटा ज़मीन पर आने के बाद से AD शुरू हुआ है।
■ हम जो आज अंग्रेज़ी दिनों और महीनों के नाम पुकारते हैं, वो नाम भी शुरआत में अक्सर मुशरिकाना (पैगन धर्मो और देवताओं की) रिवायतों से जुड़े हुए थे, मगर इन नामों को कोई हराम नहीं बोलता। इनके आधार अपर आने वाले न्यू ईयर और अलग अलग नेशनल फेस्टिवल पर मुबारकबाद देते हुए भी किसी को शिर्क नहीं लगता। वजह यही है कि जब किसी चीज़ या त्योहार की हकीकत बदल कर एक कल्चर, रस्म, इवेंट बन जाता है तो उसमें कल्चरल तौर पर शामिल होना शिर्क नहीं हो जाता है जैसे हैलोवीन, क्रिसमस वगैरह।
■ ईसाइयों में बहुत से छोटे छोटे ऐसे फ़िरके रहे हैं और कुछ अब भी बाकी हैं जैसे यूनिटेरियन वगैरह जो ट्रिनिटी को नहीं मानते या जीसस को गॉड नहीं मानते या जीसस को सिर्फ महान रहनुमा मानते हैं। क्या उन्हें मुबाकरबाद दी जा सकती है? अगर हाँ, तो फिर मुसलमानों क्या कम से कम इन्हें तो विश करना ही चाहिए या नहीं?
■ एक आम मुसलमान यही कहेगा कि श्रीराम और श्रीकृष्ण के जन्मदिवस यानी रामनवमी और जनमाष्टमी पर हिंदुओं को मुबारकबाद देना शिर्क है, चलो मान लिया। पर अब ये बताइए कि इन पर्वों की मुबारकबाद आर्य समाजियों को देना भी क्या शिर्क माना जायेगा क्योंकि वो तो सिर्फ एक निराकर ईश्वर को मानते हैं और श्रीराम-श्रीकृष्ण को केवल महान मनुष्य और ईश्वर के भक्त मानते हैं।
वैसे बाइबिल हज़रत नूह के बारे में निहायत ही वाहियात किस्म के इल्जाम लगाती है और इसी तरह मनुस्मृति में लिखी वाहियात बातों के लिए भी मनु (जो हज़रत नूह ही हैं) को दोष दिया जाता है कि ये उनकी लिखी हुई है जबकि मनुस्मृति किस ने लिखी है, इसका कोई ठोस प्रमाण ही नहीं है। फिर तो दूसरे मज़हब के लोगों के अक़ीदों की वजह से हमें हज़रत नूह की हर बात से किनारा कर लेना चाहिए। पर हम ऐसा नहीं करते है क्योंकि हम अपने अक़ीदों की बुनियाद पर चलते है, न कि दूसरों के।
■ इस तरह तो क्या साईं बाबा के जन्मदिवस पर मुबारकबाद देना भी क्या शिर्क होगा? नहीं होगा। शिर्क तब होगा जब उनके मानने वालों के अक़ीदे से आप भी इत्तफ़ाक रखने लगे। असलन साईं बाबा तो एक मुस्लिम फ़कीर थे जिन्हें बाद में भगवान का अवतार बना दिया। लोग ऐसा ही कुछ बुद्ध और महावीर के साथ भी करते हैं, उन्हें ईश्वर तो नहीं मानते क्योंकि ईश्वर में उनका विश्वास ही नहीं है, मगर इन्हें ऐसे ही उच्चतम स्थान पर रखते हैं।
■ सिक्खों के प्रथन गुरु नानक साहाब का मूल मंत्र कहता है 'गुरु प्रसाद' यानी गुरु ज्ञान बिना निजात नहीं है। सीक्खों के 10 गुरु हैं। सीक्खों में गुरुओं का इतना आवश्यक और महत्तपूर्ण दर्जा है कि उनका मानना है कि गुरुओं की शिक्षाओं के बिना मानव का कल्याण नहीं है। पर इस्लाम में यह दर्जा गुरु का नहीं बल्कि नबी का है। तो इस तरह तो सीक्खों को नानक गुरुपर्व की बधाई देना भी उनके इस अक़ीदे की ताईद ननहीं माना जाना चाहिए?
■ ऐसे तो भारत के स्वन्त्रता दिवस और गणतंत्र दिवस पर भी मुबाकरबाद देना शिर्क क्यों न माना जाए? आखिर देश की अधिकतर जनता भारत को माता (भारतमाता) यानी देवी मानती है। लोग भारत माता को पूजनीय मानते हैं और इसकी आरती करते हैं। इसके खास तरह के बुत या मूरत बनाते हैं और इसके आगे सर भी झुकाते हैं।
■ आप को किसी आदमी की हरकतें बिल्कुल पसंद नहीं है परन्तु परिचित होने के नाते, आप उसे शादी की मुबारकबाद देते हैं। इसका मतलब यह नहीं होगा कि आपने उसकी हरकतों को सही मान लिया। इसी तरह गैर मुस्लिमों को या इंटर फेथ मैरिज वालों को उनकी शादियों पर (जो इस्लाम के अनुसार नहीं की गई हैं) मुबारकबाद देना, उनके शिर्क या ज़िना में हौंसला हफज़ाई करना क्यों नहीं माना जाना चाहिए? असल में मुबारक़बाद देना सहमत होना नहीं है। यही चीज़ क्रिसमस और ईसाइयों के साथ भी हो सकती है।
■ अगर त्योहार पर मुबारकबाद या शामिल होना शिर्क है तो फिर आप जो सरकार को टैक्स देते है, सरकार उस पैसे का एक हिस्सा हिन्दू तीर्थ यात्रओं पर, धार्मिक मेलों पर, शाही स्नानों पर, मंदिरों के निर्माण, मरम्मत और रख रखाव पर खर्च करती है। ये सभी जगह शिर्क के गढ़ हैं। तो फिर आप भी टैक्स दे कर शिर्क में मदद और बढ़ावा दे रहे हो और उसमें शरीक या साझेदार भी बन रहे हो। शिर्क का साथ देने की बजाय ऐसे देश क्यों नहीं चले जाते जंहा सरकार ऐसे काम न करती हो?
■ आशूरा के दिन यहूदी की तरह रोज़ा रखने का हुकुम देना, एक ईद वाले दिन, बुआत की जंग का गीत गाने, वाद्ययंत्र बजाने, करतब करने, नटों का नाच होने देने वाले वाकयात से यही मालूम पड़ता है कि दूसरे के त्योहारो या गैर इस्लामी त्योहारों (खालिस शशिरकिया न हो) पर अच्छे काम करना, उनकी खुशी में शामिल होना या उनको मौज मस्ती करने देना जायज़ है।
इसी तरह नबी द्वारा मदिना मस्जिद में केथोलिक ईसाइयों को अपनी इबादत करने की इजाज़त देना भी बताता है, इससे उनके किये जा रहे शिर्क को न तो मदद मिलती है और न ही बढ़ावा। ऐसा करना उनकी ताईद करना नहीं होता है।
जो दूसरों की मुशाबीहत इख्तियार करेगा वो आख़िरत के दिन उनमें से ही उठाया जाएगा। इस हदीस को अधूरा कोट किया जाता है। इसका संबंध त्यौहार से नहीं है बल्कि यह हदीस एक जंग से ऐन पहले बयान की गई बात थी ताकि मुस्लिम और गैर मुस्लिमों में फ़र्क़ वाज़ेह हो जाये।
■ रही बात क्रिसमस के दिन ईसा अलैह. के पैदा होने की तो यह बात सही है कि इस दिन वो पैदा नहीं हुए थे पर ईसाइयों की अक्सरियत ऐसा मानती है। हालांकि अब बहुत से ईसाई आलिम भी मानने लगे हैं कि 25 दिसंबर जीसस का जन्मदिन नहीं है। हो सकता है यह कोई मौसमी त्योहार रहा है मगर अधिक संभावना है कि यह एक पैगन त्योहार था। दुनिया के अधिकतर त्यौहार कृषि या मौसम संबंधित ही थी पहले जो बाद नई शक्ल लेते गए हैं।
रोमन के ईसाई जाने के बाद इस दिन को क्रिसमस के रूप में मनाने का चलन शुरू हुआ। नाम क्रिसमस, सेंटाक्लोज़, क्रिसमस ट्री आदि ये सब समय के साथ विभिन्न परम्पराओं के प्रभाव से इस त्योहार के साथ जुड़ते गए हैं।
मुहम्मद सल्ल. भी 12 रब्बिउलअव्वल को पैदा नहीं हुए थे पर मुसलमानों की अक्सरियत ऐसा मानती है। यीशु को लेके अलग मत हो सकते हैं, जैसे मुहम्मद सल्ल. की पैदाइश के दिन मानने और मनाने पर लोगो के बातिल अकीदे हो सकते हैं।
बाइबल और क़ुरान से ये साबित है कि ईसा अलैह का जन्म कड़कड़ाती सर्दीयों में नहीं बल्की मध्य गर्मीयों में हुआ था। क्योंकि बाइबल: गॉस्पेल ऑफ ल्यूक: 2:8 बताती है कि ईसा के जन्म के दिन गड़रिए रात में खुले बागों में अपने जानवरों की रखवाली/चाराही कर रहे था। दिसंबर की सर्द रातों में घर से बाहर ऐसा कौन गड़रिया कर सकता है। येरूशलम में गडरिये ऐसे काम गर्मीयों में ही कर सकते है। क़ुरान 19:25 भी बताता है कि हज़रत ईसा के पैदाइश के वक़्त हज़रत मरयम को खजूर के तने हिलाने को कहा गया ताकि खजूरे नीचे गिर जाए। अरबवासी जानते है पेड़ हिलाने भर से खजूरे तभी गिरती है जब वो पक चुकी हो और ये समय मध्य गर्मियों का ही हो सकता है।
[हो सकता है लूनर कैलेंडर के हिसाब से जब ईसा का जन्म हुआ था, वो दिन बाद में कभी सर्दियों में पड़ा हो और वंहा से यह दिन सोलर कैलेंडर के हिसाब से फिक्स हो गया हो। ईसा अलैह. के समय में उनके जन्म से भी पहले का जूलियन कैलेंडर चलता आ रहा था (राजा जूलियस सीजर द्वारा 45 BC में आरंभ,) जो प्राचीन रोमन कैलेंडर पर आधारित था। रोमन कैलेंडर में कुछ असंगतियां थी और इसीलिए इसे जूलियन कैलेंडर से बदल दिया गया था. इसी जूलियन कैलेंडर से ग्रेगोरियन कैलेंडर (वेटिकन पोप द्वारा 1582 AD में आरंभ) निकला है। जूलियन कैलेंडर में भी सटीक लीप ईयर की गणना नहीं थी और इसलिए इसे भी बदला गया था, हालांकि वैसे ये दोनों लगभग समान ही हैं.]
■ अब तो मिस्र के अल अज़हर और दारुल इफ्ताह जैसे संस्थान क्रिसमस विशिंग को जायज़ क़रार दे चुके हैं। शेख यूसुफ अल करदावी, मौलाना वहीदुद्दीन खान, उस्ताद जावेद गामीदी, अल्लामा सय्यद अब्दल्लाह तारिक़, डॉक्टर शब्बीर अली जैसे उलेमा ऐसी मुबारकबाद देने को जायज़ मानते हैं। शेख़ अहमद दीदात अपने ईसाई सामेईन को "मेरी क्रिसमस" कहा करते थे। शैख़ ताहिर उल कादरी न सिर्फ क्रिसमस मुबारकबाद को जायज़ ठहराते हैं बल्कि क्रिसमस मानाने और उसमें शामिल होने को तरजीह देते हैं। शेख यासिर क़ादी ऐसे मौक़े पर जेनेरिक ग्रीटिंग देने को तरजीह देते है और ये भी कहते हैं कि अगर ऐसी मुबारकबाद अगर उनके अक़ीदे की ताईद न करे तो दे सकते हैं।
इसलिए ये सब करना जायज़ है। लोगों को यह बात प्यार से समझानी चाहिए। अगर लोग नहीं माने तो भी उनका सम्मान करना चाहिए और उन लोगों को भी दुसरों पर फतवे नहीं लगाने चाहिये। ऐसे दिनों पर भी इन महापुरुषों की शिक्षाएं आम करनी चाहिए और नेक काम करने चाहिए जैसे आम दिनों पर या उनके असली जन्मदिस पर करनी चाहिए।
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इस मुद्दे पर हज़रत आयेशा के नाम से वायरल मेसज (कि उन्होंने क्रिसमस के पकवान खाने मना किये थे) की सच्चाई?
हज़रत आएशा के नाम पर ऐसी कोई रिवायत मौजूद नहीं है। नबी के वक़्त में अरब में कोई क्रिसमस ईसाइयों के द्वारा नहीं मनाया जाता था, इसलिए बड़े दिन पर पकवान बांटना भी नहीं होता था। क़ुरान के मुताबिक ईसाइयों के जाबिहा खाना जायज़ है। जब उनके नॉन वेज पर क़ुरान ने कोई पाबंदी नहीं लगाई (क्योंकि वो भी एक खुदा के मानने वाले हैं) तो फिर उनके वेज खानों पर कैसी पाबंदी लगाई जा सकती है (वेज पर क्या वो किसी और का नाम लेते होंगे?)
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Sol Invictus (Unconquered Sun) was a Roman god representing the Sun. The cult was officially established in 3rd Cent. AD, though worship of solar deities like Helios and Sol existed long before. His Birthday festival was celebrated on 25th December, marking the winter solstice, when daylight begins to increase again. Christians start celebrating 25th December as Jesus birthday around mid-4th century. Before that, early Christians did not celebrate Jesus’s birth at all. They focused on his death and resurrection (Easter). Some Christian groups (especially in the East, like Alexandria) celebrated Jesus’s birth on 6th January, which later became Epiphany (celebrated to commemorates the visit of the Magi means Wise Men to the infant Jesus and the baptism of Jesus). When Christianity began spreading through the Roman Empire, it encountered many pagan traditions and festivals so church may have reinterpreted these existing symbols and days as Jesus was symbolically called the Light of the World in the Gospel of John. Some Christian scholars now suggest different dates for birth of Jesus as the Gospel narratives suggest it to be during mid-winter in Judea
Luke 2:8: There were shepherds living out in the fields nearby, keeping watch over their flocks at night (In December, Judean nights are cold and rainy and hence flocks were usually kept in pens, not out overnight).
Luke 2:1–3: In those days Caesar Augustus issued a decree that a census should be taken of the entire Roman world. This was the first census that took place while Quirinius was governor of Syria. And everyone went to their own town to register (It would more likely be conducted during a milder season when travel was easier). The actual event may have occurred between 6-4 BCE (based on King Herod’s death), likely in spring or autumn.
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Quran 19:13-16: as well as purity and compassion from Us. And he was God-fearing, and kind to his parents. He was neither arrogant nor disobedient. Peace be upon him the day he was born, and the day of his death, and the day he will be raised back to life [John the Baptist]. And mention in the Book O Prophet, the story of Mary when she withdrew from her family to a place in the east.
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