Tuesday, 26 January 2021

बौद्धधर्म - भाग 3 (क्या बुद्ध और मैत्रेय पैग़म्बर हो सकते हैं?)


क्या गौतम बुद्ध एक पैग़म्बर थे और मैत्रेय बुद्ध मुहम्मद सल्लo थे।

 

क्या बुद्ध ईश्वर के संदेशवाहक थे।

ऐसा यक़ीन से तो नहीं कहा जा सकता है। पर कुछ मुस्लिम विद्वान ये मानते है कि क़ुरान में उल्लेखित नबी, ज़ुल किफ़ल, गौतम बुद्ध ही है। ज़ुल के मायने होते है 'वाला' और क़िफ़ल के मायने है 'दो'। ज़ुल क़िफ़ल का मतलब हुआ 'दो वाला' या Possessor of Two.  ये नाम से अधिक एक लक़ब या उपाधि जान पड़ती है। ऐसा भी माना जाता है कि इनके नाम में आया किफ़ल शब्द दरसल कपिलवस्तु का छोटा नाम है, कपिल, जो अरबी भाषा मे किफ़ल हो गया क्योंकि अरबी में प शब्द नहीं होता। तो इस तरह ज़ुल क़िफ़ल हुए कपिल वाले क्योंकि कपिलवस्तु बुद्ध का जन्मस्थल और कर्मभूमि थी। वैसे अगर अरबी मायने भी लिए जाए जिसका मतलब है दोहराव वाला या समरूप वाला तो हम जानते है कि बुद्ध के समकालीन ही महावीर स्वामी रहे है जो बुद्ध की तरह ही ज्ञान प्राप्त कर समाज सुधारक हुए थे। महावीर बुद्ध के समरूप और डुप्लीकेट जैसे ही माने जाते है। (हालाँकि कुछ विद्वान बुद्ध और महावीर को एक ही व्यक्ति भी मानते हैं, जिनकी शिक्षाओं के आधार पर इनके तत्कालीन अनुयायिओं ने अलग अलग व्यक्ति मानते हुए, अलग अलग विचारधाराएँ बना ली)

कुछ अप्रमाणिक स्रोत कहते है कि अलबेरुनी ने बुद्ध को पैग़म्बर माना था। जबकि कुछ कहते है कि अलबेरुनी ने केवल ये लिखा था कि भारत के लिए बुद्ध एक नबी जैसा व्यक्तित्व है।

ज़ुल क़िफ़ल के बारे में इस्लामिक साहित्य के बारे में बहुत ही कम जानकारी मिलती है और अक्सरियत उन्हें सामी परम्परा का नबी नहीं मानती। कुछ जानकारों का अनुमान है कि इनका काल 600 BC के आस पास रहा होगा. हज़रत ईसा के बारे में जैसे मनघडंत बातें गढ़ ली गई शायद उसी तरह बुद्ध के बारे में किया गया हो। अधिकतर बोद्ध साहित्य बुद्ध के मृत्यु के कई सदियों बाद लिखा गया है, ये बात बोद्ध अनुयायी भी मानते है और ये भी मानते है कि बहुत सा बोद्ध साहित्य नष्ट हो चुका है और बचे हुए में मिलावट भी हुई है।

वैसे अरबवासी बुद्ध को बाज़ासिफ या बाज़ासफ़ कहते थे। शायद बूत शब्द बुद्ध से ही बना क्योंकि बुद्ध काल से ही मूर्ति निर्माण प्रबल हुआ था।

जापान आदि में एक बुद्ध को बहुत माना और पूजा जाता है (ऐसा भी कहा जाता है कि कुछ लोग उन्हें प्रथम बुद्ध भी मानते हैं), उनका नाम है Amid जिन्हें अमिताभ भी कहते हैं जो कि एक पारलौकिक बुद्ध है और दैवीय संसार में है। ये शब्द अहमद से बना है क्योंकि वही पहली तखलीक या सृष्टि थी और परलोक में थी। अमिताभ में अमित शब्द का मतलब अहमद है और आभा का मतलब नूर है। ऐसा भी माना जाता है कि ये शब्द Adam या आदम से बना है और आदम प्रथम मानव और नबी थे और साथ ही उनका पहला निवास स्थान स्वर्ग था।

बुद्ध परम्परा 29 बुद्धों का उल्लेख करती है जिनमें 28वें गौतम बुद्ध थे और 29 मैत्रेय बुद्ध होंगे जो गौतम बुद्ध के अनुसार भविष्य में आने थे। बौद्धों की चैन की तरह ही जैन  धर्म में भी 24 तीर्थंकर माने जाते है और सनातन धर्म मे भी 14 मनु माने जाते है। ताओ और यूनानी दर्शन में भी ऐसी ही चैन या श्रृंखलाएं मिलती हैं। क़ुरान कहता है कि हर क़ौम में नबी भेजे गए है। कई क्षेत्रों में तो नबियों की पूरी श्रृंखला आती थी।

लोग बौद्ध धर्म (विशेषकर मठों में) में अधिक से अधिक 3 समय तक (सुबह, दुपहर रात) प्रार्थना करते हैं मगर वैसे कोई गिनती फिक्स्ड नहीं है.  


बुद्धो और पैगम्बरों में समानताएँ।


बुद्ध बनने की प्रक्रिया और चरणों होते है। नबी बनने की एक भी प्रक्रिया होती है। बुद्धो को त्याग, तपऔर ध्यान करके ज्ञान की प्राप्ति होती है। नबियों कि दुनिया में ही तरबियत होती है, धीरे धीरे ज्ञान दिया जाता है, सलाहियत दी जाती है। नबी आरंभ में आम इंसान होते और बाद में नबूवत की जानकारी दी जाती है। मुहम्मद साहब भी नबी बनने के लिए एक प्रक्रिया से गुज़रे है जब वो अपना अधिकतर समय गारे हिरा (एक गुफा) में सत्य की तलाश में गुज़ारते थे।

सब बुद्धों ने ज्ञान या सत्य को प्राप्त किया और निर्वाण भी। सत्य हमेशा एक होता है और इन बुद्धों को वही सत्य प्राप्त हुआ तो इसका अर्थ यही है कि उस सत्य का स्रोत भी एक ही होगा। सभी पैग़म्बर का ज्ञान या सत्य भी एक ही था और सृष्टि के सत्य का स्रोत भी एक है यानी स्वंय ईश्वर।

बोद्ध ग्रन्थ पढ़ने से पता लगता है कि...


● सभी बुद्धों की शिक्षा एक ही होती थी।

● सभी बुद्ध समान होते थे पर अन्यों लोगों से उनकी कोई समानता नहीं होती थी बल्कि वे अन्यों से श्रेष्ठ होते थे। 

● दो बुद्धों के बीच समय का लंबा अंतराल होता था। इस अंतराल में पूर्व बुद्ध की शिक्षाएं मूल रूप में नही बच पाती थी।

● हालांकि उनके शब्द समय प्रवाह में आगे जाते रहते थे पर सही अर्थ खोते जाते थे।

● बुद्धों की शुद्ध मूल वाणी भी खोती जाती थी और उनकी क्रियात्मक विपश्यना साधना भी।


ये सभी बातें विभिन्न पैग़म्बरों के आने के अंतराल में हूबहू होती थी। यंहा तक कि नमाज़ भी खो जाती थी जो दरअसल एक मानसिक और शारीरिक साधना ही है योग और विपश्यना की तरह। 

 

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बुद्ध विश्राम अवस्था


तथागत बुद्ध या सिद्धार्थ गौतम (6-5th सदी ईसा पूर्व में) की लेटी हुई अधिकतर प्रतिमाओं में वह इसी प्रकार लेटे हुए दिखाई देते हैं। इस अवस्था में चेहरा पश्चिम दिशा की ओर होता है, सिर उत्तर की ओर होता है, पैर दक्षिण की ओर, दाहिने हाथ पर सिर टिकाया जाता है और दाई करवट लेटा जाता है।

बुद्ध इस अवस्था में विश्राम करते थे और इसे सिंह अवस्था या सिंह मुद्रा कहा जाता है। बुद्ध ने इसी अवस्था में देह भी त्यागा था और इसीलिए इसे महापरिनिर्वाण मुद्रा भी कहते हैं।

मुख्य बौद्ध ग्रंथों में से एक महापरिनिर्वाण सुत्त (3rd सदी ईसा पूर्व) में इस अवस्था में उनके देह त्याग करने का उल्लेख है। चीनी यात्री और बौद्ध विद्वान ह्वेनसांग ने भी लिखा है कि मृत्यु के समय बुद्ध ने इसी अवस्था में प्राण त्यागे थे। इस मुद्रा का उल्लेख कई बौद्ध ग्रंथों और भारत भ्रमण पर आए विदेशी बौद्ध यात्रियों के विवरणों में मिलता है।

पैगम्बर मुहम्मद साहब भी लगभग इसी मुद्रा में विश्राम करते थे और दूसरों को इस प्रकार लेटने की शिक्षा भी देते थे। ऐसा कई हदीसों से सिद्ध है। मुहम्मद साहब दाई करवट से लेटते थे और सिर या गाल के नीचे दाहिना हाथ रखते थे।

साथ ही भारत आदि पूर्वी देशों में (बुद्ध भी यहीं थे) मृत्यु के बाद हर मुस्लिम के पार्थिव शरीर को कब्र में इस प्रकार रख कर दफनात हैं कि उसका सिर को उत्तर दिशा की ओर हो, पैर दक्षिण की ओर और चेहरा पश्चिम की ओर (यानी क़िबले या काबा की ओर जो कि अरब में है यानी भारत से पश्चिमी तरफ)। हालांकि शव को ज़्यादातर जगह दाई ओर करवट दिलवाए बिना ही दफनाया जाता है मगर भारत में कुछ स्थानों पर (जैसे यूपी, बिहार, बंगाल में, जो कि बुद्ध प्रभावित क्षेत्र का ही हिस्सा है) मुर्दे को हल्की से दायी करवट के साथ भी दफनाया जाता है ताकि चेहरा सीधा काबा की ओर हो जाये। इस्लाम में मुर्दे को सीधी तरफ करवट के साथ लिटाने का भी हुक्म है जिसे मुहम्मद सहाब से मंसूब किया जाता है और इसे इमाम हज़्म ने अल महल्ला (5/173) में भी बयान किया है।

 

सिंधु घाटी सभ्यता (लगभग 4-4.5 हज़ार साल पुरानी) की खुदाई में राखीगढ़ी और सिनौली में कई कब्रें मिली हैं जिनमें बेतरतीब मुर्दों को दफनाया गया है यानी अलग अलग दिशा और प्रकार से, यंहा तक कि पेट के बल भी। मगर साथ ही कुछ कब्रे ऐसी भी मिली हैं, जिनमें कब्रों या शवो की दिशा वैसी ही मिली है जैसे भारत-पाक पूर्वी देशों के मुसलमानों अपने शवों को दफनाते हैं यानी सिर उत्तर दिशा की तरफ़ और पांव दक्षिण की तरफ। कुछ लोगों का कहना इनमें से कुछ कंकालों के मुंह पश्चिम की तरफ मुड़े  हुए भी पाए गए हैं हालांकि अभी तक उनके दावों की पुष्टि नहीं हो पाई है जैसे:-

The Harappan people's burial practices are similar to Islamic burial practices ~  Dr. S.S. Mishra, Harappan Civilization and Islamic Burial Practices, Journal of Indian History, Vol. 93, No. 2, 2015 (?)
The burials found at Sinauli are similar to Islamic burial practices ~ Dr. R.S. Bisht, The Ancient Indian Civilization of Harappa and Mohenjodaro, Journal of Asian Studies, Vol. 10, No. 1, 2017 (?)

सिंधु घाटी सभ्यता की एक जगह/शहर का नाम सिनौली है, जैसे एक शहर हड़प्पा या मोहनजोदड़ों है। सिंधु घाटी सभ्यता काल को 2500-1500 BC तक स्ट्रेच किया जा सकता है, अलग अलग मत अनुसार। हम यहाँ यह साबित नहीं कर रहे कि यह कब्रें इस्लामी थी बल्कि कोई इस्लाम से जुड़ा संकेत मिल रहा है तो उस पर चर्चा कर रहे हैं। शायद भविष्य में नई रिसर्च से कुछ और ऐसा मिले। 

क़ुरान या हदीस की कोई सीधी हिदायत ऐसी नहीं है जिसमें मुर्दे के साथ उसका कोई समान रखने की मनाही हो। शायद  किसी हदीस में नबी ने मना किया हो। मना करने की वजह यही होगी कि यह फ़िज़ूल खर्ची है या यह एक ऐसा अमल है जिसका कोई फायदा ही नहीं। क्योंकि न तो मुर्दा इसका इस्तमाल कर सकता है और न ही इस अपने साथ ले जा सकता है। इसके अलावा ये प्रथा तो हज़ारों सालों से पूरी दुनिया में चली आ रही थी कि मृतक के साथ कुछ समान रख देना, आज भी बहुत जगह चालू है। इसके पीछे कई वजह होती थी जैसे कि मरने वाला का ज़ाती समान या पसंदीदा चीज़ या उसकी पहचान का समान उसके साथ रख देना या फिर यह मान्यता की यह सामग्री उसे दूसरे लोक में मिल जायेगी वगैरह वगैरह। इस लिहाज से भी अगर नबी ने मना किया तो बिल्कुल बात अक़्ल में आने वाली है। वैसे ही जैसे नबी ने शादियों को सिंपल करने को कहा, कफ़न- दफन को भी सिंपल करने को कहा होगा।  हो सकता है पहले की उम्मतों या मुसलमानों (या ऐसे लोगों में जो अपने नबियों के जाने के सदियों बाद इस्लाम को बेहद बिगड़ी हुई सूरत में फॉलो करने लगते हैं, जैसे हमारे नबी से पहले तमाम अरब थे) में कब्रो में ऐसी चीज़ें रखी जाती हो किसी खास वजह से। या हो सकता है उस वक़्त के मुसलमानों में दफन के रिवाजों में यह बिदअत शामिल हो गयी हो जैसे आज कब्रो, दरगाहों से संबंधित कई बिदअत मुस्लिम समाज में जारी है। ऐसा भी हो सकता है कि जैसे बताया है कि कुछ ही कब्र इस दिशा में मिली हैं यानी सिर्फ यही लोगों इस्लाम के पैरोकार थे या इस्लामी परंपरा से एक हद जुड़े थे, कम से कम दिशाओं को लेके।



हज़रत ईसा को बोद्ध पाण्डुलियों में उल्लेख।

उन्नीसवीं शताब्दी में लद्दाख के हेमिस नामक तिब्बती बौद्ध-मठ से ईसा का एक प्राचीन हस्तलिखित जीवनचरित प्राप्त हुआ था, इसी के बाद ये विचार फैलने लगा कि ईसा अपने अज्ञातवास में भारत आये थे और बौद्धों के सम्पर्क में रहे थे। तिब्बत से मिले ताड़पत्रों से पता लगा कि एक बोद्ध भिक्षु या लामा जिसका नाम ईसा था, ज्ञान प्रप्ति के लिए कश्मीर आदि के मठों में अपना समय बिता के वापस अपने देश चला गया था और इस भिक्षु और हज़रत ईसा में बहुत समानता पाई गई। हज़रत ईसा के बचपन के बाद और नबूवत के बीच की ज़िंदगी की कहानी यानी 30 साल तक कि कहानी जैसे की वो कंहा रहे, क्या करते थे आदि इस्लामी और ईसाई साहित्य से नहीं मिलती है।  हालांकि कादियानी समुदाय इस मत को मानता है कि ईसा यौवन काल में कश्मीर में रहे थे और सलीब कांड के बाद वापस कश्मीर आ गए थे जंहा उनकी कब्र भी है। वे ये भी मानते है की कश्मीर में ही प्राचीन काल में यहुदी खोए हुए कबीले आके बसे थे।

इस विषय पर कुछ ऐतिहासिक स्रोत या किताबें है जैसे जीसस इन इंडिया (मिर्जा गुलाम अहमद कादियानी), जीसस लिव्ड इन इंडिया (होल्गर केर्स्टन), द लॉस्ट इयर्स ऑफ जीसस (एलिज़ाबेथ क्लेयर प्रोफेट) और अननोन लाइफ ऑफ जीसस क्राइस्ट (निकोलस नोटोविच).

शायद ये व्यक्ति ईसा की बजाय प्रोफेट मणि रहे हों.           

भारत में ईसा के आने का दावा बौद्ध धर्म से जुड़ा है, न कि हिन्दू धर्म से। हिन्दू और बौद्ध धर्म तो एक दूसरे के घोर विरोधी हैं। 

 

हज़रत ईसा और बुद्ध की एक परम्परा और समानताएँ।

हज़रत ईसा बुद्ध के लगभग 5 सदी बाद हुए है। फिर भी दोनों में कुछ समानता है जो दोनों को एक ही परंपरा या चैन का हिस्सा बनाती है। 

● ईसा के जन्म से पूर्व जिब्रील आकर मरियम को बताते हैं कि मुझे ईश्वर ने भेजा है ताकि तुम्हें एक पुत्र होने का शुभ समाचार दूँ जो ईश्वर का दूत होगा। बुद्ध के जन्म से पूर्व उनकी माँ महामाया के स्वप्न में सुमेध नाम का बुद्ध आकर कहता है कि मैं तुम्हारे गर्भ से जन्म लेने वाला हूँ।

● प्रसव पीड़ा होने पर मरियम खजूर के पेड़ के नीचे जा पहुँची थीं, जहाँ उन्हें रब ने खजूर का तना हिलाने की सलाह दी थी, क़ुरआन में ये ज़िक्र है। उधर बुद्ध के जन्म की कथा में ये ज़िक्र है कि प्रसव पीड़ा होने पर महामाया ने शाल वृक्ष की डाल पकड़ी थी यानी ये दो घटनाएं एक समान हैं। 

● माता के नाम भी मिलते जुलते (मरियम-महामाया) हैं। 

● फिर ईसा की कथा में ज़िक्र है कि वो बालपन से ही शांत और करुणामय स्वभाव के थे और धर्मगुरुओं के साथ शास्त्रार्थ करने लगे थे। महात्मा बुद्ध के बारे में भी उनके बचपन से ही शांत स्वभाव, करुणामय और विचारशील होने की कथाएं प्रचलित हैं। 

● ईसा के बारे में कहा जाता है कि जब शैतान ने उन्हें बरगलाने का प्रयास किया तब ईसा ने 40 दिन तक उपवास करके सिद्धावस्था पाई और बुद्ध पर जब "मार" का आक्रमण हुआ तब बुद्ध ने 49 दिन तक उपवास करके सिद्धि प्राप्त की। 

● ईसा ने एक धार्मिक वर्ग फरीसियों का प्रबल विरोध किया जो फरीसी खुद को ईश्वर के प्रिय कहा करते थे। वहीं बुद्ध ने ब्राह्मणों का प्रबल विरोध किया था। 

● इसके अतिरिक्त  ग्रहस्थ जीवन का त्याग, प्राणियों पर दया वेश्याओं का जीवन सुधारना, चोर डाकुओं का जीवन सुधारना, ध्यान मग्न रहना ये तमाम बातें दोनों की जीवनी में एक समान हैं, दोनों की अहिंसा की शिक्षा भी काफ़ी एक जैसी ही है।

हो सकता है बाद में मिलावट करने वालों ने बुद्ध और ईसा के जीवन चरितों को आपस में गड्डमड्ड कर दिया गया और गौतम के काफी बाद हुए  ईसा के जन्म और सिद्धि प्राप्ति व शिक्षाओं को गौतम बुद्ध की कथा में जोड़ दिया गया।

Some other resemblances are: 

  1. Jesus was born of a virgin without carnal intercourse. (Matth. Chapter 1) – Buddha was born of a virgin without carnal intercourse. (Hinduism by Williams, pp. 82 and 108)
  2. When Jesus was an infant in his cradle, he spoke to his mother and said: I am Jesus, the son of God. (Gospel of Infancy) – When Buddha was an infant, just born, he spoke to his mother and said: I am the greatest among men. (Hardy’s Manual of Buddhism, pp. 145-6)
  3. The life of Jesus was threatened by King Herod. (Matth. 2:1) – The life of Buddha was threatened by King Bimbarasa. (History of Buddha by Beal pp. 103-104)
  4. When Jesus was a young boy we are told that the learned religious teachers were astonished at his understanding and answers. (Luke 2:47) – When sent to school, the young Buddha surprised his masters. (Hardy’s Manual of Buddhism)
  5. Jesus fasted for forty days and nights. (Matth. 4:2) – Buddha fasted for a long period. (Science of Religion by Muller, p 28)
  6. It is believed that Jesus will return to this world. (Acts 1:11) – It is believed that Buddha will return to this world. (Angel-Messiah by Bunsen, Ch. 14)
  7. Jesus said: Think not that I am come to destroy the law, or the prophets; I am not to destroy but to fulfill. (Matth. 5:17) – Buddha came not to destroy the law but to fulfill it. (Science of Religion by Muller, p 140)
  8. Jesus taught: Love your enemies, bless them that curse you, do good to them that hate you. (Matth. 5:44) – According to Buddha, the motive of all our actions should be pity, or love for our neighbour. (Science of Religion by Muller, p 249)
  9. It is recorded certain of the scribes and pharisees answered, saying, Master we would see a sign from thee. (Matth. 12:38) – It is recorded in the Sacred Canon of the Buddhists that the multitude required a sign from Buddha that they might believe. (Science of Religion by Muller, p 27)
  10. It is written in the New Testament that Jesus said: If thy right eye offend thee, pluck it out, and caste it from thee. (Matth. 5:29) – A story is related of a Buddhist ascetic whose eye offended him so he plucked it out and threw it away. (Science of Religion by Muller, p 245)

The basic teachings of Buddha are very similar to those taught by Jesus most of which are contained in his Sermon on the Mount. (Matth. ch 5)


मैत्रेय बुद्ध।

मैत्री से मित्रता बना है। महात्मा बुद्ध ने शिष्य नन्दा को अपने अंतिम समय में कहा था "नन्दा! इस संसार में मैं न तो प्रथम बुद्ध हूँ और न तो अन्तिम बुद्ध हूँ। इस जगत में सत्य तथा परोपकार की शिक्षा देने के लिए अपने समय पर एक और ‘बुद्ध’ आएगा। पवित्र अन्तःकरण वाला होगा। उसका हृदय शुद्ध होगा, वो मैत्रेय होगा। प्रत्येक बुद्ध का अपना एक वृक्ष होता है उसका भी होगा, वह पीछे देखने के लिये गर्दन मोड़कर देखने की बजाय पूरा ही घूमकर पीछे देखेगा"। ये निशानियां हज़रत मुहम्मद सल्ल० पर फिट बैठती है।  डॉ. वेदप्रकाश उपाध्याय ने अपनी किताब "नराशंस और अन्तिम ऋषि" में मुहम्मद साहब को ही मैत्रीय बुद्ध कहा है क्योंकि ऊपर बताई गई भविष्यवाणीयों के अलावा अगले बुद्ध की जो निशानियां बताई थीं, जैसे कि वो धन-ऐश्वर्य वाला होगा, पत्नी बच्चों वाला होगा किन्तु सादा जीवन जियेगा, वो धर्म प्रचारक होगा, उसका एक राज्य होगा, ये सब भी मुहम्मद साहब पर फिट बैठती है।

एक बार नंदा ने बुद्ध से पूछा था की आप मैत्रेय का इतना उल्लेख क्यों करते हो, क्या वो आधा धम्म है। इस पर बुद्ध ने कहा था कि नहीं वो पूरा धम्म है। इस्लाम धर्म और सभी पैगम्बरों में मुहम्मद साहब को कुछ ऐसा ही दर्जा प्राप्त है।
 
 
 
प्रश्न: बुद्ध को कैसे पैगंबर माना जा सकता है, वो तो वस्त्रहीन रहते थे, वो तो मेडिटेशन करते थे, शैतान के मानने वाले थे, बुद्ध के मानने वाले भी अजीब लोग हैं?
 
उत्तर: बुद्ध की शिक्षाएं अखलाकियात पर आधारित थी। बुद्ध ने ईश्वर का कभी इनकार नहीं किया बल्कि या तो खामोशी इख्तियार करी या यह कहा कि खुद ढूंढो। 2500 पुरानी शिक्षाओं में मिलावट हो सकती है, ये नामुमकिन नहीं है। जब हज़रत मूसा और हज़रत ईसा तक कि तालिमों में मिलावट हो सकती है तो फिर यह किसी के साथ भी हो सकता है। यंहा तक तक हमारे नबी तक के नाम पर कितनी ही मौज़ू, मनगढ़ंत रिवायतें बनाई गई ये तो हम सभी जानते हैं, जो उन्होंने कभी कहा ही नहीं। बौद्ध लोग खुद मानते है कि मिलावट बड़े स्तर पर हुई है बल्कि बुद्ध की वाणी तो बुद्ध के जाने के कई सदियों के बाद लिखी गयी है।

बुद्ध ने नंगा रहने को नहीं कहा। वो जैनियों की बात है। महावीर का लिखा कोई ग्रंथ नहीं है, उनके वस्त्र त्यागने की बात भी उनके अनुयायियों ने लिखी। सच क्या है पता करना आसान नहीं। फिर भी हम बुद्ध को नबी नहीं मान रहे सिर्फ संभावना तलाश रहे हैं।

मेडिटेशन करना कोई बुरी बात नहीं है। दुनिया में बड़े बड़े इंसान मेडिटेशन करते आये हैं। नमाज़ भी एक मेडिटेशन का तरीका है। आज भी दुनिया भर के लोग, बाज़ मुसलमान भी मेडिटेशन करते हैं। योग भी मेडिटेशन है। इस्लाम मेडिशेसन को मना नहीं करता और कर भी नहीं सकता क्योंकि ये ज़ेहन और सुकून के तौर पर फायदा करता है। इसमें कोई शिरकीया अमल शामिल कर लो तो  बात गलत हो जायेगी वरना नहीं। सेल्फ कांशसनेस, सेल्फ कंट्रोल वगैरह अच्छी बात है सबको सीखनी चाहिए। नमाज़ भी इसके लिये बहुत असरदार है। मेडिटेशन भी यह करता है।

बुद्ध को शैतान का फॉलोवर कहना बुद्ध पर या किसी इंसान पर झूठ बांधने जैसा है और यह सख्त गुनाह है। जो अल्लाह या ईश्वर को न माने तो वो शैतान को ही मानता होगा, ऐसा सोचना ही इल्म और तजुर्बे की कमी है। ईश्वर और शैतान के न मानने वाले बीच के लोग भी होते हैं। जैसे सफेद और काले के बीच में कई रंग होते है।

बुद्ध के फॉलोवर बड़े वाले हैं तो वो तो ऐसे तो लोग आज हर धर्म, समुदाय में हैं। मुसलमानों में कौन से कम है? क्या ऐसे लोगो की वजह से बुद्ध और नबी को दोष दिया जा सकता है क्या?

बुद्ध फिलसोफेर थे इसमें कोई खराबी की बात नहीं। जिस काल में वो हुए उस काल में फिलोसोफी ही चलती थी पूरी दुनिया में। इस काल के 600 सालों के दौरान कोई नबी का नाम साफ तौर पर हमें नहीं मिलता जबकि एक से बढ़कर एक फिलॉस्फर का मिलता है। सिवाए जरथुस्त्र के जिन्हें पारसी अपना पैगम्बर मानते है, औए जिन्हें इसी काल का अक्सर माना जाता है। ज़रा जरथुस्त्र की शिक्षाओं के बारे पढ़िए।

बुद्ध तो सबसे ज़्यादा कर्मो में यकीन रखते थे। अच्छे कर्मों में तो हर धर्म, नबी यकीन रखता है। उन्होंने incarnation की बात नहीं करी बल्कि reincarnation की करी। पुनर्जन्म तो हिन्दू धर्म में भी बहुत महत्वपूर्ण है मगर इसके असल मायने वही है जो वेदों में और वंहा इसका वही अर्थ है जो मुस्लिम मानते हैं, कि परलोक में फिर से जन्म लेना, यंहा मरने के बाद।

बुद्ध परलोक (स्वर्ग नरक) में यकीन रखते थे, बुद्ध की गीता कही जाने वाले धम्मपद में लिखा है और वैसे ही लिखा है जैसे मुस्लिम मानते हैं, एक जगह दुख ही दुख है और दूसरी जगह सुख ही सुख। बस अंतर इतना है इस स्वर्ग नरक को बौद्ध लोग हिन्दू भाइयों की तरह इसी धरती के दुख सुख मान लेते हैं जबकि वेदो में यह दूसरी दुनिया सिद्ध होता है और धम्मपद आदि में भी। यह बात भी अलग है कि आज के नास्तिक अम्बेडरवादी बुद्ध के इन स्वर्ग नरक के वचनों को खारिज कर देते हैं, ज़ाहिर उनके एजेंडे के खिलाफ जो जाते हैं ये।

यकीनन बौद्ध धर्म, बुद्ध, और इन पर अम्बेडकरवादी प्रभाव को गेहराई से पढ़ने के  बाद काफी कुछ नया पता लगता है, उन बातों के खिलाफ जो हम सुनते आ रहे हैं। बुद्ध के बारे में भारतीय आलिम ज़्यादा गहराई से बता सकते हैं किसी दूसरे देश के मुस्लिम आलिम के मुकाबले। 


प्रश्न: मैत्रेय बुद्ध का जन्म होना अभी बाकी है क्योंकि दस पार्मिता, उप पार्मिता, परमार्थ को गृहण करके ही बुद्ध बना जा सकता है। पहले वह अर्हत बनता है फिर वह बोधिसत्व बनता है और बाद मे वह बुद्ध बनता है। इसमे इश्वर का कोई हस्तक्षेप नही है। अनागत वमसा (Chronicle of future Buddhas) पढेगे तो पता चलता है की मैत्रेया बुद्ध का धम्म सम्पुर्ण नष्ट हो जाने के बाद ही आएगे और ऐसा होने के लिये 5000 साल लगेगे। अभी सिर्फ 2500 साल ही हुए है। चक्क्वती सिह्नाद सुत्त (दीघ निकाय) में बुद्ध ने समझाया कि अनैतिकता बढ़ती रहेगी और मानव जीवन काल तब तक कम होता रहेगा जब तक कि यह केवल दस वर्ष न हो जाए। लड़कियों की शादी पांच साल की उम्र में होगी। उस समय, जिन लोगों के पास अपने माता-पिता के लिए, धार्मिक नेताओं के लिए, या सामुदायिक नेताओं के लिए कोई सम्मान नहीं है, उन्हें सम्मानित और प्रशंसा की जाएगी। वैमनस्य इतना सामान्य होगा, इंसान जानवरों जैसा हो जाएगा। दुश्मनी, बीमार इच्छा और घृणा इतनी मजबूत होगी, लोग अपने ही परिवार के सदस्यों को मारना चाहेंगे। बड़े कत्लेआम के साथ सात दिन का युद्ध होगा। लेकिन कुछ लोग सात दिनों तक छिपेंगे, और बाद में वे उन लोगों को देखकर खुश होंगे, जो जीवित हैं। वे हत्या को रोकने के लिए निर्धारित करेंगे, और उनके जीवन काल में बीस साल तक वृद्धि होगी। यह देखकर, वे अन्य नैतिक उपदेशों को रखने का कार्य करेंगे और धीरे-धीरे मानव जीवन काल फिर से बढ़ेगा। इस दुनिया में अभी तक उस तरह के पतन का कोई विवरण नहीं है। और बुद्ध जब कोई बनता है तो वह 32 शुभ चीन्ह और 80 गुणो के साथ जन्म लेते है। और यही नही जितने भी 28 बुद्ध हुए ही वह सब  गृहस्थ जिवन त्याग कर चुके थे, वह सन्यासी जिवन व्यतीत करे थे। Chronical of Buddha में मैत्रेय बुद्ध की जन्म का विवरण दिया है:-

a) उनकी माँ एक खड़ी स्थिति में और एक जंगल में जन्म देती है।
b) वह बिना किसी दाग ​​के आगे आता है।
c) वह उत्तर में सात कदम उठाता है, चार तिमाहियों का सर्वेक्षण करता है और शेर की दहाड़ का उच्चारण करता है कि वह दुनिया में सर्वोच्च है। 
d) बोधिसत्व के जन्म के सात दिन बाद, उसकी माँ की मृत्यु हो जाती है और तुसिता देव दुनिया में उसका पुनर्जन्म होता है। 
e) इस समय, एक पहिया-मोड़ सम्राट होगा जिसका नाम सांखा है। बोधिसत्व सम्राट के प्रमुख पुजारी, सुब्रह्म और उनकी पत्नी, ब्रह्ममती का बेटा होगा।
f) उसका नाम अजिता होगा 
g) वह आठ हजार वर्षों तक गृहस्थ जीवन का नेतृत्व करेगा। h) उसके चार महल होंगे जिनका नाम: सिरिवाध, वध्मन, सिध्धा और कैंडका है।
i) उनकी पत्नी कैंडामुखी होगी और उनके बेटे का नाम ब्रह्मवधना होगा। 
j) वह चार लक्षण (एक बूढ़ा आदमी, एक बीमार आदमी, एक मरा हुआ आदमी, और एक संतोषी व्यक्ति जो जीवन से आगे निकल चुका है) को देखने के बाद गृहस्थ जीवन को छोड़ने का फैसला करेगा। 
k) वह कामुक सुखों का विरोधी हो जाएगा। सम्मान पाने के लिए नायाब, बड़ी खुशी और आनंद की तलाश में, वह आगे बढ़ेगा।

उत्तर: मैत्रयी बुद्ध को मुहमद साहाब जिन रिर्सच के आधार पर साबित किया है, वो अधिकतर वेद प्रकाश उपाध्याय की है। एक और विद्वान MA श्रीवास्तव ने भी मैत्रयी को मुहम्मद साहब ही बताया है। और कई मुस्लिम विद्वानों की भी यही राय है। हालांकि कोई भी 100% ये साबित नहीं कर सकता कि मुहम्मद साहब ही मैत्रयी बुद्ध है जैसे कोई ये 100% साबित नहीं कर सकता कि मुहम्मद साहब मैत्रयी नहीं है। क्योंकि बहुत सी मैत्रयी के बारे में की गई भविष्यवाणी मुहम्मद साहब पर फिट बैठती है और कुछ नहीँ भी।

दूसरी बात बुद्ध बनने की प्रक्रिया और चरणों की थी। भले ही वो बुद्ध की अलग हो पर मुहम्मद साहब भी नबी बनने के लिए एक प्रक्रिया से गुज़रे है जब वो अपना अधिकतर समय गारे हिरा (एक गुफा) में सत्य या ज्ञान की तलाश में गुज़ारते थे।

रही बात ईश्वर द्वारा पैगम्बरी देने की तो सवाल यंहा ये है कि 28 बुद्ध हुए है और सबने सत्य या ज्ञान को प्राप्त किया और निर्वाण भी। सत्य हमेशा एक होता है और इन बुद्धों को भी वही सत्य प्राप्त हुआ तो इसका अर्थ यही है कि उस सत्य का स्रोत भी एक ही होगा। जैसे पैग़म्बरों का सत्य या ज्ञान एक ही होता है। सृष्टि सत्य का स्रोत भी एक है यानी स्वयं ईश्वर।

इतिहास और धार्मिक साहित्य जानने वाले लोग जानते है कि धार्मिक पुस्तकों में लिखी गई बातें या भविष्यवाणीया अलंकृत और गूढ़ भाषा मे होती है। जिनके अर्थ कई प्रकार से निकाले जाते है और इसकिये उन पर अलग अलग मत भी विद्वान रखते है। ये बातें उपमा और रूपक शैली में बताई गई होती है।जैसे पूर्व में हुए बुद्धो की औसत आयु लगभग 100000 वर्ष बताई गई है जबकि सृष्टि के इतिहास में कभी भी मनुष्य की इतनी लंबी आयु नहीं रही है। ज़ाहिर है ये आयु अलंकृत भाषा में बताई गई हो या ग्रंथो में मिलावट हो। यही चीज़ें मैत्रयी के बारे में भी होई हुई मालूम पड़ती है। 

मैत्रयी के बारे में की गई प्रश्न में लिखी गयी भविष्यवाणियो में कुछ तो अभी भी मुहम्मद साहाब पर फिट बैठ रही है, कुछ इतिहास में हो चुकी हुई लग रही है, कुछ गूढ़ या अलंकृत भाषा में लिखी मालूम हो रही है और कुछ अवैज्ञानिक या अतार्किक लग रही है।

इन भविष्यवाणी में ये भी कहा गया है कि मैत्रयी जंगल मे जन्म लेंगे, उस समय एक सम्राट होगा। जबकि पहले मनुष्य जंगलों में या उनके पास रहता था, अब नए युग में आमतौर पर जंगल में कोई नहीं जाता और अब सम्राट भी नहीं होते है। इससे यही पता लगता है कि मैत्रयी का जन्म बहुत पहले राजपाट वाले समय मे हो चुका है।


Thursday, 21 January 2021

दाढ़ी रखना फ़र्ज़ है या सुन्नत।


दाढ़ी रखना फ़र्ज़ है या सुन्नत या कल्चर?

■ दाढ़ी के मामले में उलेमा की अक्सरियत का यही मौकिफ़ है कि दाड़ी फ़र्ज़ नहीं है बल्कि सुन्नत है। चंद उलेमा है जो दाढ़ी को फ़र्ज़ के बराबर दर्जा देते हैं।

■ दाढ़ी का इस्लाम, क़ुरान, शरीयत, आख़िरत से कोई ताल्लुक़ नहीं है। दाढ़ी न तो फ़र्ज़ है और न ही दीन की सुन्नत। अगर कोई इसे नबी की सुन्नत मान के करे तो उसकी मर्ज़ी है और इसमें कोई हर्ज़ नहीं है। मगर इसको न तो दीन की तरह थोपा जाना चाहिए और न ही इसे कोई दीन में मामले में मयार बनाना चाहिए। दाढ़ी असल में कल्चर मात्र है। 

■ क़ुरान में कंही भी दाढ़ी रखने का हुक्म नहीं दिया गया है। ऐसा कैसे हो सकता है कि मुसलमानों को अल्लाह कोई दीनी हुकुम दें और उसे बताए न। यह वैसे ही जैसे हमारे हिन्दू भाई अवतारवाद को धर्म का सिद्धान्त कहें मगर वेदों में से नहीं बता पाए कि ईश्वर ने कंहा वेदों में इसका उल्लेख किया है।

■ सिर्फ एक हदीस में दाढ़ी बढ़ाने की बात कही गयी है कि जहाँ नबी ने कहा कि दाढ़ी को बढ़ाओ और मूछों को कुतरो। हदीस के दूसरे तुर्कों से पता चलता है कि उस वक़्त यहूदी दाढ़ी के साथ बड़ी बड़ी मूछें भी रखा करते थे। जिस पर साहाबा के द्वारा सवाल करे जाने पर नबी ने फरमाया कि तुम उनसे अलग करो और मूछों को कुतर दिया करो और दाढ़ी को बढ़ने दिया करो। इससे यह पता लगता है कि दाढ़ी बढ़ाना कोई दीन का हुकुम नहीं था बल्कि उस वक़्त मुसलमानों की एक अलग पहचान बनाये रखने का तरीका था और लोग जो पहले से ही दाढ़ी रखते हुए आ रहे थे, उनको दाढ़ी किस तरह रखनी चाहिए इस पर आपने यह तरीका बताया था।

■ दाढ़ी की फ़र्ज़ीयत के लिये क़ुरान (4:119) की उस हिदायत को बुनियाद बनाया जाता है जिसमें शैतान कहता है कि वो लोगों को गुमराह करेगा ताकि लोग अल्लाह की तख़लीक़ को बदल दें। इसके साथ ही वो उस हदीस को भी बुनियाद बनाते हैं जिसमें कहा गया है कि दूसरे जिंस की मुशाबिहत इख़्तियार न करो। असल में देखा जाए तो इनमें से कोई भी बात दाढ़ी पर लागू ही नहीं होती। दाढ़ी कटवाने से न तो मर्द की फितरत या इंसानी तख़लीक़ बदल जाती है और न ही उसका हुलिया ज़नाना हो जाता है। रही बात हजामत करवाने से औरतों की मुशाबिहत इख़्तियार हो जाने कि तो फिर यह मुशाबिहत मर्दो की सलवार पहनने पर क्यों नहीं मानी जाती क्योंकि मर्दाना और ज़नाना सलवार तो लगभग एक सी ही हैं। असल में इन आयत या हदीसों में जो बात या हुकुम बताया जा रहा है उसका ताल्लुक दाढ़ी से नहीं है।

■ आज तक तमाम मसलको में एक राय नहीं बन पायी है कि दाड़ी की लंबाई क्या हो। अगर अल्लाह इसको वाकई फ़र्ज़ करार देता तो इसकी लंबाई या बनावट के बारे में तफसील ऐसे अधूरा नहीं छोड़ता कि दाढ़ी की बनावट पर इतने इख़्तेलाफ़ हो जाएं कि हर मसलक इस पर अपनी ही एक राय रखें।

■ दुनिया के बहुत से ऐसे देश है जंहा लोगों की दाढ़ी आती ही नहीं है जैसे ईस्ट या साउथ ईस्ट एशिया के देश या जापान, चीन, कोरिया, इंडोनेशिया, मलेशिया आदि। अल्लाह किसी ऐसी चीज़ को दीन का अनिवार्य क्यों बनाएगा जो सभी को अता नहीं करता।

■ नबूवत मिलने से पहले से ही हमारे नबी की दाढ़ी हुआ करती थी। सहाबा भी ईमान लाने से पहले से ही दाड़ी रखा करते थे। उस वक़्त में बल्कि उससे पहले से ही दाड़ी यहूदियों, ईसाईयों, मजूसियों, साबीईन यानी हिंदुओ में भी एक आम बात थी। आज भी सिखों में दाढ़ी रखना आम चीज़ है। असल में दाढ़ी आज भी बल्कि हमेशा से ही मर्दों के तौर तरीकों में शामिल रही है, चाहे कोई भी स्थान या समय हो। हमेशा से ही दाढ़ी मूछों को मर्दो की पहचान और शान से जोड़ कर देखा जाता रहा है।

■ इस्लाम के दुश्मन भी दाढ़ी रखा करते थे जैसे अबुजहल, अबुलहब वगैरह। मुस्लिम और दूसरे धर्मों की रिवायतों से पता चलता है कि नमरूद की भी दाढ़ी थी। तो इसका मतलब यह हुआ दाढ़ी सिर्फ मुस्लिम नहीं रखा करते थे और दाढ़ी मुसलमानों की पहचान नहीं थी। हज़रत मुहम्मद के चाचा हज़रत अबु तालिब की भी दाड़ी थी जिनको अक्सर मुसलमान ईमान वाला नहीं मानते हैं।

■  ऐसा कहा जाता है कि सभी नबियों की दाढ़ी हुआ करती थी मगर इसकी कोई ऑथेंटिक दलील नहीं है। सभी सहाबा के दाढ़ी थी, इसका भी कोई ऑथेंटिक प्रूफ नहीं हैयह सिर्फ एक अनुमान है बसलाखों नबी और सहाबा में से कुछ की दाढ़ी न होना कोई अचंभे की बात नहीं है।

■ हमेशा ऐसे उलेमा रहे हैं जो दाड़ी नहीं रखते थे और आज भी होते हैं। जैसे अल्लामा इकबाल, सय्यद क़ुतुब शहीद, मुहम्मद असद, अब्दुलाह यूसुफ अली (क़ुरान में सर्वाधिक पढ़े जाने वाले इंग्लिश तर्जुमे के लेखक) आदि। हाल के ज़माने में गुज़रे इस्लाम के बड़े आलिमों में से एक, यसुफ़ अल करदावी की भी आम मुसलामनों जैसी दाढ़ी नहीं है। शियाओं में भी ऐसी दाड़ी नहीं रखी जाती है जैसी दाढ़ी को सुन्नी दीनी हुक्म मानते हैं।

■ बाइबिल में हज़रत दावूद अलैह. का कैद से बाहर आके बादशाह को मिलने जाने का वाक़या बयान हुआ है जिसमें बताया गया है कि बादशाह को मिलने जाने से पहले हज़रत दावूद ने दाड़ी की शेव की थी (Bible: Genesis: 41: 14). हो सकता है कुछ लोग कहें कि मुस्लिम क्यों यहूदी, ईसाई किताबों से दलील माने। ऐसे लोगों को समझना चाहिए कि सिर्फ इस दलील की बुनियाद पर दाढ़ी पर कोई हुकुम नहीं लगाया जा रहा है। बल्कि इस्लामी या मुस्लिम ग्रंथों से जो बात दाढ़ी की स्तिथि के बारे में हमें पता लग रही है, उस पर पिछली किताबों से यह बात आखिरी मुहर साबित हो रही है। यह बात दाढ़ी के मसले पर  क़ुरान और सुन्नत की ताईद में जा रही है कि दाढ़ी रखना कोई दीनी अमल नहीं है।

■ हमारे नबी दाढ़ी रखा करते थे इसलिए जो लोग हुलिए में आप जैसा दिखना चाहते हैं वो बिल्कुल ऐसा कर सकते हैं। आप के जैसे लिबास भी पहन सकते हैं। आपके जैसा खान पान, सवारी वगैरह भी कर सकते हैं। मगर इन सब बातों से नबी से आपकी मोहब्बत तो ज़ाहिर हो सकती है मगर दीन का कोई अमल नहीं। हर फॉलोवर अपने लीडर जैसा दिखना चाहता है इसलिए उसे ऐसा करने का हक़ हासिल है पर अगर कोई अपने लीडर जैसा नहीं दिखता है तो इसका मतलब यह नहीं होगा कि वो उनका फर्जी फॉलोवर है। वैसे भी अगर किसी को अपने लीडर से इतनी ही मुहब्बत है तो उनके हुलिए से ज़्यादा उनके कार्यों, उनकी हिदायतों को फॉलो करना शुरू करिए। पहले उनके जैसा किरदार अपनाइए, फिर एक वक्त के बाद हुलिया अपने आप उनके जैसा हो जायेगा।

■ किसी ने सही कहा है कि दाड़ी में दीन नहीं है बल्कि दीन में दाड़ी है। दाड़ी रसूलुल्लाह से मोहब्बत का आगाज़ नहीं बल्कि इंतेहा है। दाड़ी से ज़्यादा अच्छे किरदार को बढ़ाना ज़रूरी है क्योंकि पहले बातिन को दुरुस्त करना है, ज़ाहिर को नहीं।

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दाड़ी रखना अच्छी बात है। नबी की दाढ़ी थी। पर दीन से इसका कोई ताल्लुक नही। दीन के अहकाम बिल्कुल वाज़ेह हैं। दाढ़ी दीन का कोई अहकाम नहीं है। यह न फ़र्ज़ है और न सुन्नत। दाढ़ी दुनिया से मुताल्लिक है। दाढ़ी रखने या न रखने से आपके दीन में कोई कमी या बढ़ोतरी नहीं होती है।

दाड़ी दीन की सुन्नत नहीं है। सुन्नत क्या है? सुन्नत के लफ्ज़न मायने होते है रास्ते के। सुन्नत (रास्ते, तरीका) अल्लाह की, दीन की, मुहम्मद सल्ल. की, नबियों की, सहाबा की यानी किसी की भी हो सकती है। पर जब हम दीन के ताल्लुक से सुन्नत कहते हैं तो इसके मायने होते हैं दीन की सुन्नत के यानी इस्लाम की सुन्नत के यानी जो अमल पिछले अम्बिया से दीन की हैसियत से चले आ रहे हैं। इस तरह सुन्नत के शरअई मायनों से मुराद उन अमल से हैं जो मुहम्मद सल्ल. से पहले से ही दीन के ऐतबार से जारी हैं।

नबी की दीन के मामलों में हर इताअत लाज़मी है पर दुनिया के मामलों में वैकल्पिक है। नबी की हर कही या करी गयी बात दीन की सुन्नत नहीं होती है। नबी का दुनियावी ऐतबार से कई बार या बार-बार करा गया अमल भी सुन्नत नहीं होता है। दीन के अहकमों से हटकर नबी ने जो भी काम किया, जैसे भी किया, वो नबी का तरीका तो हो सकता है और आप उसे नबी की जाती सुन्नत यानी नबी का रास्ता या नबी का तरीका तो एक बार कह सकते हैं मगर दीन की सुन्नत नहीं। दीन की सुन्नत अल्लाह फिक्स करता है। जो दीन की सुन्नत है, वो नबी ने दीन की सुन्नत ही की तरह अदा करी और आगे जारी करी और वो आज तक जारी है और क़यामत तक जारी रहेगी। इसके अलावा आपको दुनिया में किसी भी काम को करने का जो तरीका बेहतर लगा, उन्होंने उसे वैसे ही किया और बाज़ चीजों को बार बार भी किया। ये वो चीज़ें हैं जिसका दीन से ताल्लुक नहीं था। लोगों ने आपके ऐसे कामों को भी सुन्नत की फेहरिस्त में डाल दिया और आपका हर एक अमल सुन्नत कहलाया जाने लगा।

जैसे नबी ने ऊंट की सवारी अक्सर करी क्योंकि रेगिस्तान में ऊंट सबसे बेहतर ट्रांसपोर्टर है। मगर जंगी माहौल में आपने घोड़े की सवारी करी क्योंकि वंहा वो ज़्यादा बेहतर है। अगर इन जानवरों की सवारियां वाकई दीन की सुन्नत है तो फिर मुस्लिम क्यों बाइक, कार, जहाज़ का इस्तेमाल करके दीन की सुन्नत को तर्क कर रहे हैं। असल में इनमें से कोई भी दीन की सुन्नत नहीं है बल्कि इनको नबी की अपनी सुन्नत या तरीका भी नहीं कहना चाहिए। अगर वाकई इसके पीछे की हिकमत समझनी है तो यह समझ लीजिए कि नबी ने उस सवारी को बेहतर जाना जो माहौल के हिसाब से तेज़, आरामदेह और ज़्यादा मुफीद हो। इस लिहाज़ से देखा जाए तो नबी से हमें यह सीखना चाहिए कि हमारे वक़्त में जंहा हवाई सफर बेहतर है वंहा हम हवाई सफर करें और जंहा सड़क का सफर बेहतर हैं वंहा सड़क से जाएं इसलिए ऊंट की सवारी करना दीन की इताअत नहीं है। ऊंट की सवारी करना दीन का हिस्सा नहीं है। हालांकि यह नबी की नकल ज़रूर है मगर उनकी असल नकल भी इस मामले यह होगी कि अपने दौर में सफर की ज़रूरतों के मुताबिक अपनी सवारी को चुनना। इस तरह ऊंट की सवारी नबी की सुनन्त (नबी का तरीका) तो कही जा सकती है पर दीन की सुन्नत नहीं।

इसी तरह दाड़ी रखने से हमारे दीन का कोई हकुम पूरा नहीं होता है। अगर नबी की कही और करी गई हर चीज़ दीन की या नबी की सुनन्त है तो फिर 40 साल की औरत से शादी, पहली बीवी के गुज़र जाने के बाद ही दूसरी शादी, 25 साल की उम्र में ही शादी और 6 साल की लड़की से शादी भी सुन्नत हुई न? तो फिर आपकी दाढ़ी को सुन्नत समझने के साथ इन कामों को भी लोग सुन्नत की तरह अदा क्यों नहीं करते?

एक बार नबी ने कुछ लोगों को एक खास तरीके से फसल पैदा करने को कहा जो पहले से ही फसल पैदावार करने के काम में माहिर थे। उन्होंने वैसा ही किया। इस बार फसल खराब हो गयी तो नबी ने फरमाया कि मैं भी तुम्हारी तरह बशर हूँ, मुझसे ज़्यादा तुम्हें दुनिया का इल्म है इसलिए दुनिया के मामलों में मेरी बात मानने से पहले देख लिया करो। इसका मतलब यह हुआ कि आपके मुंह से निकली दीन की बात ज्यों की त्यों लेनी है पर दुनिया की बात जांच परख सकते हो और फिर उस पर अमल करना है या नहीं, इस पर आपको इख्तियार हासिल है। नबी की इताअत की जहाँ तक बात है रिसालत में आप साफ कह चुके हैं जब दीन दूं तो ले लिया करो और जब दुनिया के बारे में कुछ कहूँ तो इताअत से पहले देख लिया करो की सही होगा या नहीं क्योंकि तुम दुनियावी मामले बेहतर जानते हो।

हम क़ुरान को तो कॉन्टेक्स्ट में पढ़ते हैं पर हदीसों को नहीं। दाड़ी बढ़ाने वाली सिर्फ एक ही हदीस है जिसे कॉन्टेक्स्ट में पढ़े तो पता लग जाता है कि उसमे सिर्फ यही कहा गया है कि यहूदीयों से अलग पहचान रखो और इसलिए दाड़ी बढ़ने दो मुछों को कुतर दिया करो (क्योंकि यहूदी बड़ी बड़ी मुछे रखते थे और दाढ़ी के बाल काटते रहते थे)। यानी नबी ने दाड़ी रखने का हुकुम नहीं दिया बल्कि पहले से राखी जा रही दाढ़ी पर राय रखी थी, बस। यानी सिर्फ पहचान बनाने के लिए दाड़ी पर आपकी यह राय या हुक्म था।

अगर आज भी सिर्फ अपनी एक अलग पहचान बनाये जाने के लिए मुसलमान दाढ़ी रखना चाहता है तो हमें यह समझना चाहिए कि दाढ़ी के अलावा भी बहुत से तरीके हो सकते हैं अलग पहचान बनाये रखने के लिए। असल बात यह है कि उस वक़्त पहचान बनाने के लिए दाड़ी नहीं रखी गयी थी बल्कि पहले से लोगों ने जो दाढ़ी रिवाज और तहज़ीब के तौर पर रख रखी थी, उसका अंदाज़ बदला गया ताकि पहचान अलग बन जाये।
 
सभी नबियों की दाढ़ी थी, यह सौ प्रतिशत दावे से नहीं कहा जा सकता क्योंकि ऐसा कंहीं से साबित नहीं है। लगभग 124000 नबी हुए हैं, जिनमें से हमें कुछ के ही नाम पता है बाकी के न तो नाम पता है, न जगह और न ही यह पता है कि उनकी दाड़ी थी या नहीं। न यह पता है कि उनकी दाड़िया कैसी थी या क्या कभी किसी नबी ने अपनी दाढ़ी छोटी करवाई या कटवाई थी या नहीं। वैसे भी नबियों का कोई दुनिया से संबंधित तरीका ज़रूरी नहीं दीन की भी सुनन्त या तरीका होगा। हो सकता है उस चीज़ का ताल्लुक दुनिया से हो जैसे जानवरों की सवारी करना या कुंवे से पानी पीना। 

सभी सहाबा की दाढ़ी थी, ऐसा भी कहा जाता है मगर इसे भी साबित नहीं किया जा सकता। लाखों सहाबा में कुछ सहाबा की दाढ़ी न होना कोई असंभव बात नहीं है। सबकी दाढ़ी नहीं हो, ऐसे इमकान हैं क्योंकि कोई रिकॉर्ड ही मौजूद नहीं है।

मुस्लिम उम्मत में बहुत से मसलक हैं जो दाढ़ी नहीं रखते या छोटी रखते हैं या मूछें जड़ से कटवाते हैं या लंबाई अलग अलग रखते हैं। शिया भी उम्मत में शमिल है? वो ऐसी दाढ़ी नहीं रखते जिसे नबी की दाढ़ी माना जाता है।

कोई बात क़ुरान में करने को कही गई हो और उसके उलट किया जाए तो ख़िलाफ़े क़ुरान होता है। कोई बात क़ुरान में नहीं लिखी है और उसे किया जाए तो वो ख़िलाफ़े क़ुरान नहीं होता।

एक बार नबी ने साहाबा को कहा कि बनू क़ुरैज़ा पहुँच कर ही मग़रिब पढ़ना। रास्ते मे मग़रिब का वक्त हो गया। कुछ साहाबा ने इस बात को मानन लिया और इसकी वजह और मक़सद को समझा कि नबी का हकुम था कि वंहा जल्द से जल्द पहुँचना है यानी मग़रिब से पहले पहुँचना है। मगर मग़रिब तक नहीं पहुँच पाने के सूरत में उन्होंने रास्ते में ही नमाज़ पढ़ी और फिर आगे सफर किया। जबकि दूसरी ओर कुछ सहाबा ने इस बात के लिटरल मायने लिये कि चाहे नामज़ क़ज़ा हो जाये रास्ते में, मगर नमाज़ वंही पहुँच कर पढ़नी है। इसलिए इन्होंने बनू क़ुरैज़ा कबीले पहुँच कर क़ज़ा नमाज़ अदा की। बाद में इस वाकये को नबी को बताया गया तो आप खामोश रहे और दोनों में से किसी को गलत या सही नहीं कहा। यानी इसका मतलब हुआ कि नबी की बात को लफ़ज़न और मानन (वजह और मकसद के तहत ) दोनों तरीके से लिया जा सकता है। इस से बात ये पता चली कि सलवार तखनों से ऊपर रखना, नमाज़ में पांव मिला के खड़े होना जैसी हिदायत दोनों तरीके से ली जा सकती है।

 मुहम्मद बिन अब्दुल्लाह ही की आप स० से मंसूब ये हदीस है: जब मैं तुम्हें दीन से मुतल्लिक हुक्म दूं तो उसे ले लो, जब मैं (दुनियावी कामों) से मुतल्लिक राए दूं तो मैं एक इंसान हूं। दुनियां के काम तुम मुझसे बेहतर जानते हो। (सही मुस्लिम, किताब उल फज़ाइल)  सही मुस्लिम, भाग. 4, 1835-1836, (न. 2361-2363)।

● Allah ke Nabi Ansaar ke kuch logon ke paas aaye jin ki darhiyaan safed thein, farmaane lage: "Ae Ansaar ki jamaat! Surkh aur zard rang mein rango aur Ahl-e-Kitaab ki mukhalifat karo." Unhon ne kaha: "Ae Allah ke Rasool! Wo apni darhiyaan kaat'tay hain aur moonchein barhatay hain?" Aap ne farmaya: "Apni darhiyaan barhao aur apni moonchein kaato aur Ahl-e-Kitaab ki mukhalifat karo. Sahaba ne kaha: "Ae Allah ke Rasool! Ahl-e-Kitaab mozay pehntay hain, jootay nahin pehntay?" Aap ﷺ ne farmaya: "Jootay aur mozay pehno aur Ahl-e-Kitaab ki mukhalifat karo."
(Al-Silsila-tus-Sahiha 3077, Status: Sahih)

Ye sahabo ki ek Query thi jo unhone nabi saw se generally puchi thi, khud se sabko jakar nahi bola gaya tha ki dadhi badhao muchein Kato. kuch esi chz hai jisko us daur me oppose krne ke liye prophet ne yh baat kahi.

Agar jese Dadhi rakhna farz sunnat wajib ki category me aa gaya hai to fir har kisi ko jute pehen kar namaz padhni chahiye aur jo na padhe to vo khilaf e Deen kam kr raha hai.

Same chiz Safed balon ko rangne ka hai, kya jitna safed balon ko rangna Deen smjhte hai utna hi dadhi ko bhi smjhe to esa mas'ala nahi hoga ,lekin hum dadhi ko farz wajib category me le ate hai aur katne vale ko gunahgar ke tor se dekha jata hai, kya yh rawaiya safed Baal yani buzurgo ke liye bhi hona nahi chahiye fir?
 
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ज्यादातर मन्हजों में दाढ़ी किस हुक्म में आती है, फ़र्ज़ या सुन्नत, या दोनों तरह की राय मौजूद हैं? सहाबा के फ़हम में दाढ़ी का क्या मुक़ाम है, फ़र्ज़ या सुन्नत? हदीस और तारीख़ से क्या वाज़ेह हो रहा है? कोई भी फ़िक़्ह, मनहज, या सहाबा का फ़हम हो, क्या उसे नबी की बात से ऊपर तवज्जो दी जा सकती है? क्या किसी फ़क़ीह, मुफ़स्सिर, रावी की बात को नबी की बात की रोशनी में टटोल कर नहीं समझा जाएगा? कि नबी का कोई हुक्म किस लिहाज़, हिकमत, ज़रूरत वगैरह के तहत दिया गया था? दाढ़ी की शरई हैसियत पर शुरवात से ही फ़र्ज़, सुन्नत और तहज़ीब से संबंधित होने के मौकिफ़ मिलते हैं। दीन का कोई भी लाज़िम हकूम हो, उसकी बुनियाद या असल क़ुरान में ज़रूर मिलेगी। अगर नहीं है तो सुन्नत या रिसालत में उसका अमल, हकूम तलाशा जाएगा और समझा जाएगा और उसकी हैसियत तय की जाएगी कि वो हकूम किस नोईयत का है।  अगर किसी एहकाम को सुन्नत मानते हैं तो नबी का इस अमल को रिसालत में दीन की सुन्नत के तौर पर जारी किया हुआ होना चाहिए। इन दोनों ही सूरतों में क़ुरान और रिसालत में जारी सुन्नतह, दाढ़ी के इस हुक्म से खाली है। दाढ़ी पर इख़्तेलाफ़ पाए जाने की दलील यही बताती है कि यह फ़र्ज़ नहीं है। क्योंकि इस्लाम में फ़र्ज़ीयत बिल्कुल  वाज़ेह हैं।
 

दीन को समझने के लिए, दीन के अहकाम समझने के लिए, क़ुरान फुरक़ान होगा. अल्लाह ने क़ुरान में खुद फरमाया है कि हमनें इसमें कुछ भी नहीं छोड़ा है (हिदायत के ऐतबार से)। दीन के हर मुद्दे के लिए क़ुरान की ओर लौटा जायेगा। बहुत से उलेमा क़ुरान को ही तमाम दीनी अहकाम समझने के लिए आखिरी हदफ़ बनाते हैं। कोई उलेमा न भी करता तो क़ुरान से खुद यह वाज़ेह है क़ुरान ही अव्वल माखज़ है। अक़्ल और इल्म की रोशनी में भी यही दुरुस्त नज़र आता है। क़ुरान में हर दीनी एहकाम की असल या बुनियाद मौजूद होना ज़रूरी है, तफसील नहीं। तफसील तो सुन्नत में मिलेगी हर एहकाम की। अहादीस में भी मिल सकती है क्योंकि उनमें  भी एक हद तक सुन्नत का रिकॉर्ड मौजूद है। सुन्नत और हदीस में फर्क है। हदीसों के समझने के लिए क़ुरान और सुन्नत बुनियाद है। कुरान में एक नबी की दाढ़ी रखी हुई होने का ज़िक्र होना और दाड़ी का एक दीनी अहकाम होने में ज़मीन आसमान का फर्क है। जैसे क़ुरान में यूसुफ अलैह. का कमीज़ पहनने का ज़िक्र है, इसका मतलब यह नहीं होगा कि कमीज़ पहनना दीन का एक एहकाम है।  


हदीस में जो नबी ने हकूम दिया, वो अपनी ज़ात में कोई इंडिपेंडेंट हुक्म नहीं है जो पुरी हदीस और उसके पसमंज़र से ही ज़ाहिर है। दाढ़ी जो पहले से ही रखी जा रही थी उस पर सवाल किए जाने पर आपने उसकी बनावट पर एक चीज़ वाज़ेह करी और मुखतलिफ शक्ल इख़्तियार करने का हुक्म दिया।  इसका मतलब हुआ जो दाढ़ी रखे हुए हैं वो मूछें पस्त कर लिया करें और बालों को बढ़ने दिया करे। हदीस के जुमले को समझिए जो यह समझा रहा है कि दाढ़ी के बाल बढ़ने दें मगर मूछों के नहीं। यह ऐसे ही जैसे कोई दर्ज़ी हमारे पाजामे की बनावट कैसी रखने के लिए पूछे और हम उससे कहे कि भाई पाजामे की चौड़ाई जितनी मर्ज़ी बढ़ा देना मगर लंबाई नहीं बढ़नी चाहिए। ज़ाहिर है दर्ज़ी चौढ़ाई तो आम चलन के हिसाब से रख देगा मगर लंबाई कम से कम ही रखेगा। बल्कि इसकी सबसे अच्छी मिसाल यह है कि मान लो कोई नबी से पूछे कि अहले किताब गुद्दी के बाल छोटे करते है और कनपटी के बाल लंबे रखते हैं तो इस पर नबी यह कहे कि तुम उनसे अलग करो और कनपटी के बाल छोटे कर दिया करो और गुद्दी के बाल बढ़ने दिया करो। अब गुद्दी के बाल बढ़ाने का मतलब क्या यह होगा कि यह दीन का एहकाम या अम्बिया की सुन्नत है। नहीं। हम जानते हैं कि बालों पर तलवार आसानी से नहीं चलती, इसलिए पहले जंग में जाने वाले लोग गर्दन तक लंबे बाल रखा करते थे ताकि कोई गर्दन पर वार के कारण गर्दन ही न उड़ जाए। अब अगर जंगी माहौल में नबी यह कह देते कि सभी मुस्लिम बाल लंबे करो तो यह कोई दीनी एहकाम या दीन की सुन्नत नहीं होगी। मूछें कुतरने वाली बात भी ऐसे ही एक पसमंज़र में थी।

जैसा कि अबु दावूद (4163) में नबी ने फरमाया कि जिसके भी बाल हो, उनका ख्याल करें यानी उन्हें सँवारे वगैरह। क्या इसका मतलब यह हुआ कि बालों की देखभाल दीन का कोई लाज़मी एहकाम या दीन की पिछले अम्बियों से चली आ रही सुन्नत है। नहीं। दीन का हुक्म है जिस्म को साफ सुथरा और खूबसूरत रखना, इसमें अगर बालों का मामला आएगा तो उसमें कंघी की जायेगी, तेल लगया जाएगा, धोया जाएगा वगैरह। नाखून के मामले उन्हें साफ और छोटा रखा जायेगा। इसी तरह किसी की दाढ़ी है तो वो दाढ़ी को खूबसूरत बनाये रखने के लिए उसमें कांट छांट करेगा। इसी खूबसूरती के मद्दनेजर नबी जाती तौर पर बता भी सकते हैं कि फला साइज की दाढ़ी रखो या नबी की खूबसूरत दाढ़ी देख कर लोग ही बताने लगे कि नबी की तो इतने साइज की दाढ़ी हुआ करती थी। इसी तरह अगर किसी वक़्ती ज़रूरत के चलते दाढ़ी में मूछें साफ रखनी है तो वो भी नबी के हुक्म पर किया जाएगा।

अगर सहाबा, इस्लाम के दुश्मन, मुशरिक, अहले किताब सभी नुबवत से पहले से ही दाढ़ी रख रहे हैं तो इसे इस्लाम का अंग कैसे माना जा सकता है? जो दीन के अहकाम रसूल ने आके वापिस स्थापित किये उनका खुलकर क़ुरान में ज़िक्र है बल्कि हर जगह यही कहा गया है कि यह तुमसे पहले की उम्मतों पर भी फ़र्ज़ थे जैसे नमाज, रोज़ा, ज़कात या हज। मगर ऐसा कोई बात दाढ़ी के बारे में न तो क़ुरान बयान करता है और न ही रसूल ने कहा कि दाढ़ी तो पहले की उम्मतों से चली आ रही है। आपने सिर्फ उसके नक्श के बारे में एक हिदायत दी कि ऐसा करा करो।

सहाबा अगर दाढ़ी मुंडवाने का हुक्म देते तो तभी दाढ़ी मुंडवाना जायज़ होता, हर अमल पर ऐसा सोचने लगे तो बात कंही जा कर नहीं रुकेगी। नबी या किसी सहाबी ने यह नहीं कहा कि कान या नाक के बाल काटो। मगर लोग कटवाते हैं, यह जायज़ है। इसका मतलब यह नहीं होगा कि नाक या कान के बाल कटवाना नाजायज़ है या ख़िलाफ़े सुन्नत है क्योंकि इसको कटवाने का कोई हुक्म या अमल नबी या सहाबा से नहीं मिलता। दीन के हुदूद अखज़ करने का तरीका है कि जो ममनू किया गया है वो नाजायज़ है, जिससे रोका नहीं गया या जिसका जिक्र नहीं किया गया, वो सब जायज़ है।
कोई कहे कि बरेलवीयों से कि फला चीज़ मना है और इस पर बरेलवी हजरात उसके नाजायज़ होने की क़ुरान और सुन्नत से दलील मांगे (क्योंकि मूल मुमानियत वंहा होनी ही चाहिए) तो उन्हें दलील बिल्कुल देनी चाहिए।

यह वक़्ती दुनियावी हुक्म था। अगर किसी हदीस में इस हुक्म को रसूल से भी आगे बढ़कर अल्लाह से जोड़ा गया है कि यह हुकुम अल्लाह की तरफ से था तो वो इसी हदीस का एक तुर्क होगा जिसमें ये ज़ायद अल्फ़ाज़ किसी रावी ने जोड़ दिए होंगे। तभी यह क़ुदसि हदीस किसी बड़ी हदीस की किताब में दर्ज नही है। असल वाकया ऊपर वाला ही है।
 
दाढ़ी पर हकूम इस वजह से था कि मक्का और मदीना दोनों जगह के मुसलमानों को उस वक़्त जारी माहौल में ज़रूरत के मुताबिक़ खुद को एक अलग क़ौम दिखाने की ज़रूरत थी। मुशरिक और मुस्लिम सभी दाढ़ी वाले थे। इसके पीछे कुछ वजूहात और हिकमत थी, इस पर कभी और बात करंगे। 
 
रही बात सलफ़ को एज़ इट इज़ फॉलो करने की तो सलाफ़कुछ ऐसे मौकिफ़ भी हैं जो आज साइंस की रोशनी में गलत साबित हो चुके हैं और इस लिहाज से हमने भी अपने मैकिफ़ दुरुस्त कर लिए हैं यानी इन मुद्दों पर हम उनकी समझ से हटे तो ज़ुरूर हैं। जैसे कुरान में ज़मीन को चपटे फैलाए जाने के बारे में , मां के पेट में क्या के बारे में, सूरज के कीचड में डूबने के बारे में अल तबरी, अल कुरुत्बी, इबन हज़म वगैरह जो राय पहले दे कर गए हैं, वो आज बदल चुकी है. 

● In Al-Muhalla (vol. 4, p. 345), Ibn Hazm said: There is no text in the Quran that obligates growing a beard, nor is there a definitive proof in the Sunnah that it is an obligation. What is clear is that it was a custom of the people of the time of the Prophet but that does not make it obligatory for us (?).
● Al-Mabsut (a major Hanafi legal text) by Sarakhsi (d.1096AD) notes that Imam Abu Hanifa saw the growing of the beard as a sunnah,  but not an obligatory one. He reportedly did not consider shaving the beard to be sinful, as there was no clear, direct command in the Quran mandating it
(?).
● Al-Jassas (d.981AD)' Ahkam al-Quran (a Hanafi commentary on the Quran), explains that Imam Abu Hanifa's position was that the beard was part of the cultural norm of the time and should not be viewed as an obligation. For Imam Abu Hanifa, this was consistent with his broader legal philosophy, which acknowledged that cultural practices (like the beard) could be influenced by time and context rather than being unconditionally binding
(?).
● In Al-Mughni (vol. 1, p. 223), Ibn Qudama discusses the importance of following the Prophet's sunnah, including growing a beard, but he also emphasizes that such practices were part of the broader context of the Prophet's time and were not necessarily obligatory (?).

● हजरत अबू बकर के समय में एक आदमी ने बैतुल माल से चोरी करने की कोशिश करी थी तो उसकी दाढ़ी काटने की सज़ा दी गई थी. ज़ाहिर है यह गलत अमल होता तो गलती के लिए सज़ा के तौर पर नहीं दिया जाता (सजीद हमीद साहब).

ईसा की पैदाइश और ईसा- पैगन देवताओं में समानता


How did Virgin Mary give birth to Jesus.

Mother Mary was a virgin and she got pregnant without the touch of any men by the grace of God Almighty. It was a miracle from God as he did earlier also like making human from dust and like making the universe from an atom or blast. The creation of the first life in a non living thing on this earth is a bigger miracle than the creation of fetus in her womb.

It is assumed that she is the only person in the known history who must have been a human Hermaphroditism. In reproductive biology, a hermaphrodite is an organism that has complete or partial reproductive organs and produces gametes normally associated with both male and female sexes. In some animals these organs are found functional but in humans, only either organ has been found functional and not both simultaneously. However, the research is still going on. As some animals have got self fertile power, it is speculated that she was also able to self fertile.
 
A science article says:  There is a hypothetical scenario, though, in which it could be possible for a human to self fertilize. If a human chimera is formed from a male and female zygote fusing into a single embryo, giving an individual functional gonadal tissue of both types, such a self- fertilization is feasible. Indeed, it is known to occur in non- human species where hermaphroditic animals are common, including some mammals. However, no such case of functional self- fertilization has ever been documented in humans.


Another such possibility is named as Parthenogenesis. It is a form of reproduction in which an egg can develop into an embryo without being fertilized by a sperm. Parthenogenesis is derived from the Greek words for “virgin birth,” and several insect species including aphids, bees, and ants are known to reproduce by parthenogenesis.
 
Such a unique case is of a male goat in India that has started to produces milk due to hormonal imbalances during gender determination in the foetal stage of the animal.
 
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क्या मरियम ने जब ईसा को जन्म दिया था, तब वह कुंवारी या अविवाहित थीं?

 

सबसे पहली बात कि यदि मरियम ने सचमुच बिना विवाह के या बिना चमत्कार के यीशु को जन्म दिया होता, तो यहूदियों ने उसे इस पाप के लिए पत्थर से संगसार करके मार डाला होता, जैसा कि यहूदी धर्म में जानी के लिए निर्धारित सज़ा है। बाइबिल के अनुसार, मरियम के रिश्तेदार (शायद कजिन भाई और मंगेतर), यूसुफ (Joseph) ने मरियम की गर्भावस्था और प्रसव और प्रसवोत्तर देखभाल के संबंध में मदद की थी। इस्लाम में जोसेफ का कोई उल्लेख नहीं है, हालांकि, हमल के हालातों में मरियम की किसी ने मदद नहीं की इसके खिलाफ भी कुरान में कुछ नहीं है। इस्लाम अनुसार मरियम को मठ को समर्पित कर दिया गया था जंहा पैगम्बर ज़करिया उनके गार्जियन बने जो मरियम के अंकल (माँ की बहन के पति और ह. हारुन के वंशज) भी थे। उन्होंने बचपन के दौरान मरियम की देखभाल करी थी। ज़करिया के बेटे याह्या भी एक पैगम्बर थे और यीशु के कज़िन थे। मरियम को अल्लाह की तरफ से खाने पीने की नयमतें मिलती थी कुरान संकेत देता है कि उनका कोई मंगेतर नहीं हो सकता क्योंकि मरियम ने कहा कि न तो मुझे किसी ने छुआ है और न ही मैं अविवाहित हूं यानि इससे पता लगता है कि शीघ्र भविष्य में उसके विवाह की कोई संभावना नहीं थी।

बाइबिल (मैथ्यू 1:18-25; ल्युक 1:34) में जोसेफ को उनका मंगेतर बताया गया है (और गर्भाधारण के बाद में पति), जो उनसे एक अरसे के बाद तब मिला जब वो गर्भाधारण कर चुकी थी (जोसफ को इस बात की खबर ख्वाब में फरिश्ते ने दी थी जब वो तलाक की सोच रहे थे और कहा था कि अपनी पत्नी मरियम को घर ले जाओ, उसके पेट में जो है पवित्र रूह की तरफ से है यानी वो परमेश्वर के चमत्कार से गर्भवती हुई थी) जबकि प्रोटेस्टेंट का मानना था कि जोसेफ यीशु के पिता थे और उन्होंने यीशु के जन्म के बाद मरयम से शादी की और आगे भी अन्य बच्चों को जन्म दिया क्योंकि बाइबिल (मैथ्यू 13:55-56, मार्क 6:3) में ही लिखा मिलता है कि यह यीशु 'बढ़ई है/बढ़ई का बेटा' है, मरियम का बेटा है और वे उसके भाई (नाम सहित) और बहने हैं। कैथोलिक (ईसाइयों की बहुमत) द्वारा इन्हें या तो जोसेफ की पूर्व शादी से हुए बच्चे माना जाता है या यीशू के अन्य कजिन रिश्तेदार। कैथोलिक मानते हैं कि यीशु बिन बाप के पैदा हुए थे. प्रोटेस्टेंट का कहना है कि ओल्ड टेस्टेमेन्ट (Isaiah 7:14) में मरियम के लिए हिब्रू शब्द 'अलमाह' प्रयोग हुआ है जिसके मायने असलन यंग गर्ल है और वर्जिन भी हैं, मगर बाद में न्यू टेस्टेमेन्ट की इंजीलों (यीशु के सहाबी, ताबाइन, तबेताबाईन आदि द्वारा 60-100 AD में निर्मित) में इस शब्द के मायने सिर्फ वर्जिन किया जाने लगा, जबकि इन इंजीलों से पहले किसी भी क्रिस्चियन टेक्स्ट, लेटर्स आदि में कुंवारी मरियम शब्द का ज़िक्र नहीं है।

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यह कोई ईमान और कुफ्र तय करने का मुद्दा नहीं है। इस पर विद्वानों की एक अकलियतों में मतभेद हैं। मौलाना अब्दुल करीम अथरी, अल्लामा तमन्ना इमादी, मौलाना इनायातुल्लाह गुजराती और मौलाना वज़ीराबादी जैसे कुछ मुस्लिम विद्वानों ने ईसा के चमत्कारी जन्म पर सवाल उठाया है और माना है कि यह एक प्राकृतिक गर्भाधारण था।

सबसे पहली बात, मुसलमान यह नहीं मानते कि ईसा खुदा का कलमा (Word of God) थे, जैसा कि ईसाई मानते हैं। दूसरी बात, बाइबिल लिखे जाने से पहले ईसाई रिकॉर्ड में कहीं भी मरियम के कुंवारेपन में चमत्कारिक रूप से ईसा को जन्म देने का उल्लेख नहीं है, जैसे कि ईसा के शिष्यों के किसी भी पत्र में। ईसा मसीह के लगभग 100 साल बाद जा कर यह मरियम के कुंवारी माँ की धारणा जन्म ली जब गोस्पेल लिखी गईं। बाइबिल (मैथ्यू/लुका) के अनुसार, मैरी का विवाह जोसेफ से हुआ था, लेकिन वह तब गर्भवती हुई जब वो उनके साथ नहीं थे और उनसे अलग रह रहे थे।

कुरान में कुंवारी मरियम शब्द का उल्लेख नहीं है। साथ ही, कुरान में कोई प्रत्यक्ष आयत नहीं है जो कहती है कि मरियम एक कुंवारी माँ थी। इस पक्ष में उद्धृत की गई आयत का तात्पर्य केवल यह है कि वह उस समय कुंवारी थी जब फरिश्तों ने उन्हें ईसा के जन्म के बारे में खबर दी थी। जैसे कुरान की एक आयत अनुसार, मुसलमानों का मानना ​​है कि मरियम को जो भोजन मिलता था वह अल्लाह द्वारा जन्नत से भेजा जाता था, लेकिन कुरान की इस आयत में ऐसा स्पष्ट रूप से नहीं कहा गया है। इसके अलावा कुरान में एक जगह कई पैगम्बरों के पिताओं की ओर ईशारा करा गया है और वंहा ईसा का भी ज़िक्र है

ऐसा माना जाता है कि कुंवारी मरियम की धारणा ईसाई धर्म से ली गयी थी और ऐसा कहा जाता है कि मरियम की शादी जोसेफ से हुई थी लेकिन उस समय वह अंतरंगता (physical intimacy) में दिलचस्पी नहीं रखते थे। इसलिए मरियम आश्चर्य हुआ कि वह कैसे बच्चे को जन्म दे सकती है जबकि उसे किसी पुरुष ने छुआ तक नहीं है (तब तक दोनों में सम्बन्ध नहीं बने थे)। लेकिन अल्लाह की इच्छा थी कि वह निकट भविष्य में एक चुने हुए बच्चे (अल्लाह की रूह - यीशु और आदम को प्राप्त) को जन्म दे और यही कारण है कि बाद में जोसेफ का मन ;पलटा और उन दोनों के बीच अंतरंगता हुई और बच्चा हुआ (हालाँकि बाइबिल में इसके उलट उल्लेख हुआ है)

यह एक प्राकृतिक प्रक्रिया थी जिसमें समय लगा, ठीक उसी तरह जैसे अल्लाह के 'कुन' कहने के बाद ब्रह्मांड का निर्माण समय के साथ स्वाभाविक रूप से हुआ। इसके अतिरिक्त, कुरान पैगंबर अब्राहम, पैगंबर ज़कारिया के बारे में और उनकी पत्नीयों के बारे में बताता है कि वे सब उम्र दराज़ थे (पति बूढ़े हो चुके थे और महिलाएं रजोनिवृत्ति/menopause प्राप्त कर चुकी थी) और बच्चे पैदा नहीं कर सकते थे, लेकिन उन्होंने चमत्कारिक रूप से बच्चे पैदा किए जैसा कि अल्लाह चाहता था। इसका मतलब यह नहीं है कि गर्भधारण से पहले उनमें कोई अंतरंगता नहीं हुई थी।

जो लोग मानते हैं कि मरियम hermaphroditic हो सकती है, उन्हें समझना चाहिए कि महिलाएं अपने आप Y chromosome नहीं बना सकती हैं, जो कि पुत्र पैदा करने के लिए आवश्यक है। इसके अलावा, अगर ईसा चमत्कारिक रूप से पैदा हुए थे, उनके पास artificial Y chromosome होना चाहिए, हालाँकि सामान्य तौर पर ईसा अन्य इज़राइलियों की तरह ही दिखते थे और उसमें कोई artificial traits नहीं थे।

 

Quran 11:72-73: Sarah asked how can she have a child in this old age, and as her husband (Ibrahim) is also an old man? The angels asked, do you wonder at the decree of your Lord?

■ Quran 19:1-11: This is a reminder of your Lord to His servant Zachariah, saying, My bones have become brittle and grey hair has spread across my head. My wife is barren. Grant me an heir. Who will inherit prophethood from me and the family of Jacob. The angels announced, O Zachariah! We give you the good news of the birth of a son, whose name will be John — a name We have not given to anyone before. He wondered, How can I have a son when my wife is barren, and I have become extremely old? An angel replied, Your Lord says, it will be, it is easy for Me, just as I created you before, when you were nothing! Zachariah said, Grant me a sign. He responded, Your sign is that you will not be able to speak to people for three nights, despite being healthy. So he came out to his people from the sanctuary, signaling to them to glorify Allah morning and evening.

■ Quran 3:45-46 : Remember when angels proclaimed, O Marry, Allah gives you good news of a word (Kalimatin) from him, his name will be Messiah, Jesus, son of Mary, honored in this world and the hereafter and he will be one of those nearest to Allah. He will speak to people in his infancy and adulthood and will be one of the righteous.

■ Quran 3:47: Mary wondered, My Lord! How can I have a child when no man has ever touched me? An angel replied, So will it be. Allah creates what He wills. When He decrees a matter, He simply tells it, Be! And it is!

■ Quran 6:84-86: We gave to Abraham, Isaac and Jacob - all of them, We guided. And Noah, We guided before; and among his descendants, David and Solomon and Job and Joseph and Moses and Aaron. Thus do We reward the doers of good. Zechariah and John and Jesus and Elias - and all were of the righteous. Ishmael and Elisha and Jonah and Lot - and all of them, We preferred over the worlds.

■ Quran 6:87: And from their fathers (ābāihim) and their descendants and their brothers - and We chose them and We guided them to a straight path.

■ Quran 3:37: Every time Zechariah entered upon her in the prayer chamber, he found with her provision. He said, "O Mary, from where is this (coming) to you?" She said, "It is from Allah. Indeed, Allah provides for whom He wills without account."

■ Quran 5:112: (Jesus' disciples said), 'O Jesus, Son of Mary, can your Lord send down to us a table (spread with food) from the heaven?'"

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Similarities between Jesus & Pagan Gods 

Jesus has some striking similarities of surface-level with the mythological figures Mithra (Persian), Dionysus (Greek) and Horus (Egyptian). Jesus was called Christ (Greek: Anointed one).

Mithra/Mitra first appeared in ancient Persian religion (Zoroastrianism) as a god, but later, the Roman Mithraic cult (1st–4th cent. CE) developed him into a savior figure. He was cosnidered to bhe born around Dec 25 (in Roman Mithraism) from a virgin (or from a rock symbolizing purity), attended by shepherds at birth, had a last supper with his followers and died & resurrected. These parallels are believed to be come from later Roman Mithraism (after Jesus), not the older Persian version.

Dionysus, a Greek God was considered to be born of a divine father (Zeus) and mortal mother (Semele), died and resurrected (reborn from Zeus’ thigh), turned water into wine in some stories, his followers symbolically ate his body and drank his blood (in ritual wine). 

Horus, a Egyptian (2500 BC) was considered to be born of a virgin (Isis resurrected Osiris and conceived miraculously), his birth was announced by a star, visited by wise men, baptized in river by Anup (similar to John). He had 12 disciples, healed the sick. He was killed,  dismembered, scattered, then entombed and resurrected by Isis. He became ruler of afterlife underworld. He was called “KRST” (anointed one) in some late texts.

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दर्शन विज्ञान और ईश्वर

   दर्शनशास्त्र की 3 शाखाएँ हैं:- I. तत्वमीमांसा/ तत्वज्ञान (Metaphysics - beyond physics/theory of reality) [तत्व, अस्तित्व, वास्तविकता का ...