दाढ़ी रखना फ़र्ज़ है या सुन्नत या कल्चर?
■ दाढ़ी के मामले में उलेमा की अक्सरियत का यही मौकिफ़ है कि दाड़ी फ़र्ज़ नहीं है बल्कि सुन्नत है। चंद उलेमा है जो दाढ़ी को फ़र्ज़ के बराबर दर्जा देते हैं।
■ दाढ़ी का इस्लाम, क़ुरान, शरीयत, आख़िरत से कोई ताल्लुक़ नहीं है। दाढ़ी न तो फ़र्ज़ है और न ही दीन की सुन्नत। अगर कोई इसे नबी की सुन्नत मान के करे तो उसकी मर्ज़ी है और इसमें कोई हर्ज़ नहीं है। मगर इसको न तो दीन की तरह थोपा जाना चाहिए और न ही इसे कोई दीन में मामले में मयार बनाना चाहिए। दाढ़ी असल में कल्चर मात्र है।
■ क़ुरान में कंही भी दाढ़ी रखने का हुक्म नहीं दिया गया है। ऐसा कैसे हो सकता है कि मुसलमानों को अल्लाह कोई दीनी हुकुम दें और उसे बताए न। यह वैसे ही जैसे हमारे हिन्दू भाई अवतारवाद को धर्म का सिद्धान्त कहें मगर वेदों में से नहीं बता पाए कि ईश्वर ने कंहा वेदों में इसका उल्लेख किया है।
■ सिर्फ एक हदीस में दाढ़ी बढ़ाने की बात कही गयी है कि जहाँ नबी ने कहा कि दाढ़ी को बढ़ाओ और मूछों को कुतरो। हदीस के दूसरे तुर्कों से पता चलता है कि उस वक़्त यहूदी दाढ़ी के साथ बड़ी बड़ी मूछें भी रखा करते थे। जिस पर साहाबा के द्वारा सवाल करे जाने पर नबी ने फरमाया कि तुम उनसे अलग करो और मूछों को कुतर दिया करो और दाढ़ी को बढ़ने दिया करो। इससे यह पता लगता है कि दाढ़ी बढ़ाना कोई दीन का हुकुम नहीं था बल्कि उस वक़्त मुसलमानों की एक अलग पहचान बनाये रखने का तरीका था और लोग जो पहले से ही दाढ़ी रखते हुए आ रहे थे, उनको दाढ़ी किस तरह रखनी चाहिए इस पर आपने यह तरीका बताया था।
■ दाढ़ी की फ़र्ज़ीयत के लिये क़ुरान (4:119) की उस हिदायत को बुनियाद बनाया जाता है जिसमें शैतान कहता है कि वो लोगों को गुमराह करेगा ताकि लोग अल्लाह की तख़लीक़ को बदल दें। इसके साथ ही वो उस हदीस को भी बुनियाद बनाते हैं जिसमें कहा गया है कि दूसरे जिंस की मुशाबिहत इख़्तियार न करो। असल में देखा जाए तो इनमें से कोई भी बात दाढ़ी पर लागू ही नहीं होती। दाढ़ी कटवाने से न तो मर्द की फितरत या इंसानी तख़लीक़ बदल जाती है और न ही उसका हुलिया ज़नाना हो जाता है। रही बात हजामत करवाने से औरतों की मुशाबिहत इख़्तियार हो जाने कि तो फिर यह मुशाबिहत मर्दो की सलवार पहनने पर क्यों नहीं मानी जाती क्योंकि मर्दाना और ज़नाना सलवार तो लगभग एक सी ही हैं। असल में इन आयत या हदीसों में जो बात या हुकुम बताया जा रहा है उसका ताल्लुक दाढ़ी से नहीं है।
■ आज तक तमाम मसलको में एक राय नहीं बन पायी है कि दाड़ी की लंबाई क्या हो। अगर अल्लाह इसको वाकई फ़र्ज़ करार देता तो इसकी लंबाई या बनावट के बारे में तफसील ऐसे अधूरा नहीं छोड़ता कि दाढ़ी की बनावट पर इतने इख़्तेलाफ़ हो जाएं कि हर मसलक इस पर अपनी ही एक राय रखें।
■ दुनिया के बहुत से ऐसे देश है जंहा लोगों की दाढ़ी आती ही नहीं है जैसे ईस्ट या साउथ ईस्ट एशिया के देश या जापान, चीन, कोरिया, इंडोनेशिया, मलेशिया आदि। अल्लाह किसी ऐसी चीज़ को दीन का अनिवार्य क्यों बनाएगा जो सभी को अता नहीं करता।
■ नबूवत मिलने से पहले से ही हमारे नबी की दाढ़ी हुआ करती थी। सहाबा भी ईमान लाने से पहले से ही दाड़ी रखा करते थे। उस वक़्त में बल्कि उससे पहले से ही दाड़ी यहूदियों, ईसाईयों, मजूसियों, साबीईन यानी हिंदुओ में भी एक आम बात थी। आज भी सिखों में दाढ़ी रखना आम चीज़ है। असल में दाढ़ी आज भी बल्कि हमेशा से ही मर्दों के तौर तरीकों में शामिल रही है, चाहे कोई भी स्थान या समय हो। हमेशा से ही दाढ़ी मूछों को मर्दो की पहचान और शान से जोड़ कर देखा जाता रहा है।
■ इस्लाम के दुश्मन भी दाढ़ी रखा करते थे जैसे अबुजहल, अबुलहब वगैरह। मुस्लिम और दूसरे धर्मों की रिवायतों से पता चलता है कि नमरूद की भी दाढ़ी थी। तो इसका मतलब यह हुआ दाढ़ी सिर्फ मुस्लिम नहीं रखा करते थे और दाढ़ी मुसलमानों की पहचान नहीं थी। हज़रत मुहम्मद के चाचा हज़रत अबु तालिब की भी दाड़ी थी जिनको अक्सर मुसलमान ईमान वाला नहीं मानते हैं।
■ ऐसा कहा जाता है कि सभी नबियों की दाढ़ी हुआ करती थी मगर इसकी कोई ऑथेंटिक दलील नहीं है। सभी सहाबा के दाढ़ी थी, इसका भी कोई ऑथेंटिक प्रूफ नहीं है। यह सिर्फ एक अनुमान है बस। लाखों नबी और सहाबा में से कुछ की दाढ़ी न होना कोई अचंभे की बात नहीं है।
■ हमेशा ऐसे उलेमा रहे हैं जो दाड़ी नहीं रखते थे और आज भी होते हैं। जैसे अल्लामा इकबाल, सय्यद क़ुतुब शहीद, मुहम्मद असद, अब्दुलाह यूसुफ अली (क़ुरान में सर्वाधिक पढ़े जाने वाले इंग्लिश तर्जुमे के लेखक) आदि। हाल के ज़माने में गुज़रे इस्लाम के बड़े आलिमों में से एक, यसुफ़ अल करदावी की भी आम मुसलामनों जैसी दाढ़ी नहीं है। शियाओं में भी ऐसी दाड़ी नहीं रखी जाती है जैसी दाढ़ी को सुन्नी दीनी हुक्म मानते हैं।
■ बाइबिल में हज़रत दावूद अलैह. का कैद से बाहर आके बादशाह को मिलने जाने का वाक़या बयान हुआ है जिसमें बताया गया है कि बादशाह को मिलने जाने से पहले हज़रत दावूद ने दाड़ी की शेव की थी (Bible: Genesis: 41: 14). हो सकता है कुछ लोग कहें कि मुस्लिम क्यों यहूदी, ईसाई किताबों से दलील माने। ऐसे लोगों को समझना चाहिए कि सिर्फ इस दलील की बुनियाद पर दाढ़ी पर कोई हुकुम नहीं लगाया जा रहा है। बल्कि इस्लामी या मुस्लिम ग्रंथों से जो बात दाढ़ी की स्तिथि के बारे में हमें पता लग रही है, उस पर पिछली किताबों से यह बात आखिरी मुहर साबित हो रही है। यह बात दाढ़ी के मसले पर क़ुरान और सुन्नत की ताईद में जा रही है कि दाढ़ी रखना कोई दीनी अमल नहीं है।
■ हमारे नबी दाढ़ी रखा करते थे इसलिए जो लोग हुलिए में आप जैसा दिखना चाहते हैं वो बिल्कुल ऐसा कर सकते हैं। आप के जैसे लिबास भी पहन सकते हैं। आपके जैसा खान पान, सवारी वगैरह भी कर सकते हैं। मगर इन सब बातों से नबी से आपकी मोहब्बत तो ज़ाहिर हो सकती है मगर दीन का कोई अमल नहीं। हर फॉलोवर अपने लीडर जैसा दिखना चाहता है इसलिए उसे ऐसा करने का हक़ हासिल है पर अगर कोई अपने लीडर जैसा नहीं दिखता है तो इसका मतलब यह नहीं होगा कि वो उनका फर्जी फॉलोवर है। वैसे भी अगर किसी को अपने लीडर से इतनी ही मुहब्बत है तो उनके हुलिए से ज़्यादा उनके कार्यों, उनकी हिदायतों को फॉलो करना शुरू करिए। पहले उनके जैसा किरदार अपनाइए, फिर एक वक्त के बाद हुलिया अपने आप उनके जैसा हो जायेगा।
■ किसी ने सही कहा है कि दाड़ी में दीन नहीं है बल्कि दीन में दाड़ी है। दाड़ी रसूलुल्लाह से मोहब्बत का आगाज़ नहीं बल्कि इंतेहा है। दाड़ी से ज़्यादा अच्छे किरदार को बढ़ाना ज़रूरी है क्योंकि पहले बातिन को दुरुस्त करना है, ज़ाहिर को नहीं।
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दाड़ी रखना अच्छी बात है। नबी की दाढ़ी थी। पर दीन से इसका कोई ताल्लुक नही। दीन के अहकाम बिल्कुल वाज़ेह हैं। दाढ़ी दीन का कोई अहकाम नहीं है। यह न फ़र्ज़ है और न सुन्नत। दाढ़ी दुनिया से मुताल्लिक है। दाढ़ी रखने या न रखने से आपके दीन में कोई कमी या बढ़ोतरी नहीं होती है।
दाड़ी दीन की सुन्नत नहीं है। सुन्नत क्या है? सुन्नत के लफ्ज़न मायने होते है रास्ते के। सुन्नत (रास्ते, तरीका) अल्लाह की, दीन की, मुहम्मद सल्ल. की, नबियों की, सहाबा की यानी किसी की भी हो सकती है। पर जब हम दीन के ताल्लुक से सुन्नत कहते हैं तो इसके मायने होते हैं दीन की सुन्नत के यानी इस्लाम की सुन्नत के यानी जो अमल पिछले अम्बिया से दीन की हैसियत से चले आ रहे हैं। इस तरह सुन्नत के शरअई मायनों से मुराद उन अमल से हैं जो मुहम्मद सल्ल. से पहले से ही दीन के ऐतबार से जारी हैं।
नबी की दीन के मामलों में हर इताअत लाज़मी है पर दुनिया के मामलों में वैकल्पिक है। नबी की हर कही या करी गयी बात दीन की सुन्नत नहीं होती है। नबी का दुनियावी ऐतबार से कई बार या बार-बार करा गया अमल भी सुन्नत नहीं होता है। दीन के अहकमों से हटकर नबी ने जो भी काम किया, जैसे भी किया, वो नबी का तरीका तो हो सकता है और आप उसे नबी की जाती सुन्नत यानी नबी का रास्ता या नबी का तरीका तो एक बार कह सकते हैं मगर दीन की सुन्नत नहीं। दीन की सुन्नत अल्लाह फिक्स करता है। जो दीन की सुन्नत है, वो नबी ने दीन की सुन्नत ही की तरह अदा करी और आगे जारी करी और वो आज तक जारी है और क़यामत तक जारी रहेगी। इसके अलावा आपको दुनिया में किसी भी काम को करने का जो तरीका बेहतर लगा, उन्होंने उसे वैसे ही किया और बाज़ चीजों को बार बार भी किया। ये वो चीज़ें हैं जिसका दीन से ताल्लुक नहीं था। लोगों ने आपके ऐसे कामों को भी सुन्नत की फेहरिस्त में डाल दिया और आपका हर एक अमल सुन्नत कहलाया जाने लगा।
जैसे नबी ने ऊंट की सवारी अक्सर करी क्योंकि रेगिस्तान में ऊंट सबसे बेहतर ट्रांसपोर्टर है। मगर जंगी माहौल में आपने घोड़े की सवारी करी क्योंकि वंहा वो ज़्यादा बेहतर है। अगर इन जानवरों की सवारियां वाकई दीन की सुन्नत है तो फिर मुस्लिम क्यों बाइक, कार, जहाज़ का इस्तेमाल करके दीन की सुन्नत को तर्क कर रहे हैं। असल में इनमें से कोई भी दीन की सुन्नत नहीं है बल्कि इनको नबी की अपनी सुन्नत या तरीका भी नहीं कहना चाहिए। अगर वाकई इसके पीछे की हिकमत समझनी है तो यह समझ लीजिए कि नबी ने उस सवारी को बेहतर जाना जो माहौल के हिसाब से तेज़, आरामदेह और ज़्यादा मुफीद हो। इस लिहाज़ से देखा जाए तो नबी से हमें यह सीखना चाहिए कि हमारे वक़्त में जंहा हवाई सफर बेहतर है वंहा हम हवाई सफर करें और जंहा सड़क का सफर बेहतर हैं वंहा सड़क से जाएं इसलिए ऊंट की सवारी करना दीन की इताअत नहीं है। ऊंट की सवारी करना दीन का हिस्सा नहीं है। हालांकि यह नबी की नकल ज़रूर है मगर उनकी असल नकल भी इस मामले यह होगी कि अपने दौर में सफर की ज़रूरतों के मुताबिक अपनी सवारी को चुनना। इस तरह ऊंट की सवारी नबी की सुनन्त (नबी का तरीका) तो कही जा सकती है पर दीन की सुन्नत नहीं।
इसी तरह दाड़ी रखने से हमारे दीन का कोई हकुम पूरा नहीं होता है। अगर नबी की कही और करी गई हर चीज़ दीन की या नबी की सुनन्त है तो फिर 40 साल की औरत से शादी, पहली बीवी के गुज़र जाने के बाद ही दूसरी शादी, 25 साल की उम्र में ही शादी और 6 साल की लड़की से शादी भी सुन्नत हुई न? तो फिर आपकी दाढ़ी को सुन्नत समझने के साथ इन कामों को भी लोग सुन्नत की तरह अदा क्यों नहीं करते?
एक बार नबी ने कुछ लोगों को एक खास तरीके से फसल पैदा करने को कहा जो पहले से ही फसल पैदावार करने के काम में माहिर थे। उन्होंने वैसा ही किया। इस बार फसल खराब हो गयी तो नबी ने फरमाया कि मैं भी तुम्हारी तरह बशर हूँ, मुझसे ज़्यादा तुम्हें दुनिया का इल्म है इसलिए दुनिया के मामलों में मेरी बात मानने से पहले देख लिया करो। इसका मतलब यह हुआ कि आपके मुंह से निकली दीन की बात ज्यों की त्यों लेनी है पर दुनिया की बात जांच परख सकते हो और फिर उस पर अमल करना है या नहीं, इस पर आपको इख्तियार हासिल है। नबी की इताअत की जहाँ तक बात है रिसालत में आप साफ कह चुके हैं जब दीन दूं तो ले लिया करो और जब दुनिया के बारे में कुछ कहूँ तो इताअत से पहले देख लिया करो की सही होगा या नहीं क्योंकि तुम दुनियावी मामले बेहतर जानते हो।
हम क़ुरान को तो कॉन्टेक्स्ट में पढ़ते हैं पर हदीसों को नहीं। दाड़ी बढ़ाने वाली सिर्फ एक ही हदीस है जिसे कॉन्टेक्स्ट में पढ़े तो पता लग जाता है कि उसमे सिर्फ यही कहा गया है कि यहूदीयों से अलग पहचान रखो और इसलिए दाड़ी बढ़ने दो मुछों को कुतर दिया करो (क्योंकि यहूदी बड़ी बड़ी मुछे रखते थे और दाढ़ी के बाल काटते रहते थे)। यानी नबी ने दाड़ी रखने का हुकुम नहीं दिया बल्कि पहले से राखी जा रही दाढ़ी पर राय रखी थी, बस। यानी सिर्फ पहचान बनाने के लिए दाड़ी पर आपकी यह राय या हुक्म था।
अगर आज भी सिर्फ अपनी एक अलग पहचान बनाये जाने के लिए मुसलमान दाढ़ी रखना चाहता है तो हमें यह समझना चाहिए कि दाढ़ी के अलावा भी बहुत से तरीके हो सकते हैं अलग पहचान बनाये रखने के लिए। असल बात यह है कि उस वक़्त पहचान बनाने के लिए दाड़ी नहीं रखी गयी थी बल्कि पहले से लोगों ने जो दाढ़ी रिवाज और तहज़ीब के तौर पर रख रखी थी, उसका अंदाज़ बदला गया ताकि पहचान अलग बन जाये।
सभी नबियों की दाढ़ी थी, यह सौ प्रतिशत दावे से नहीं कहा जा सकता क्योंकि ऐसा कंहीं से साबित नहीं है। लगभग 124000 नबी हुए हैं, जिनमें से हमें कुछ के ही नाम पता है बाकी के न तो नाम पता है, न जगह और न ही यह पता है कि उनकी दाड़ी थी या नहीं। न यह पता है कि उनकी दाड़िया कैसी थी या क्या कभी किसी नबी ने अपनी दाढ़ी छोटी करवाई या कटवाई थी या नहीं। वैसे भी नबियों का कोई दुनिया से संबंधित तरीका ज़रूरी नहीं दीन की भी सुनन्त या तरीका होगा। हो सकता है उस चीज़ का ताल्लुक दुनिया से हो जैसे जानवरों की सवारी करना या कुंवे से पानी पीना।
सभी सहाबा की दाढ़ी थी, ऐसा भी कहा जाता है मगर इसे भी साबित नहीं किया जा सकता। लाखों सहाबा में कुछ सहाबा की दाढ़ी न होना कोई असंभव बात नहीं है। सबकी दाढ़ी नहीं हो, ऐसे इमकान हैं क्योंकि कोई रिकॉर्ड ही मौजूद नहीं है।
मुस्लिम उम्मत में बहुत से मसलक हैं जो दाढ़ी नहीं रखते या छोटी रखते हैं या मूछें जड़ से कटवाते हैं या लंबाई अलग अलग रखते हैं। शिया भी उम्मत में शमिल है? वो ऐसी दाढ़ी नहीं रखते जिसे नबी की दाढ़ी माना जाता है।
कोई बात क़ुरान में करने को कही गई हो और उसके उलट किया जाए तो ख़िलाफ़े क़ुरान होता है। कोई बात क़ुरान में नहीं लिखी है और उसे किया जाए तो वो ख़िलाफ़े क़ुरान नहीं होता।
एक बार नबी ने साहाबा को कहा कि बनू क़ुरैज़ा पहुँच कर ही मग़रिब पढ़ना। रास्ते मे मग़रिब का वक्त हो गया। कुछ साहाबा ने इस बात को मानन लिया और इसकी वजह और मक़सद को समझा कि नबी का हकुम था कि वंहा जल्द से जल्द पहुँचना है यानी मग़रिब से पहले पहुँचना है। मगर मग़रिब तक नहीं पहुँच पाने के सूरत में उन्होंने रास्ते में ही नमाज़ पढ़ी और फिर आगे सफर किया। जबकि दूसरी ओर कुछ सहाबा ने इस बात के लिटरल मायने लिये कि चाहे नामज़ क़ज़ा हो जाये रास्ते में, मगर नमाज़ वंही पहुँच कर पढ़नी है। इसलिए इन्होंने बनू क़ुरैज़ा कबीले पहुँच कर क़ज़ा नमाज़ अदा की। बाद में इस वाकये को नबी को बताया गया तो आप खामोश रहे और दोनों में से किसी को गलत या सही नहीं कहा। यानी इसका मतलब हुआ कि नबी की बात को लफ़ज़न और मानन (वजह और मकसद के तहत ) दोनों तरीके से लिया जा सकता है। इस से बात ये पता चली कि सलवार तखनों से ऊपर रखना, नमाज़ में पांव मिला के खड़े होना जैसी हिदायत दोनों तरीके से ली जा सकती है।
● मुहम्मद बिन अब्दुल्लाह ही की आप स० से मंसूब ये हदीस है: जब मैं तुम्हें दीन से मुतल्लिक हुक्म दूं तो उसे ले लो, जब मैं (दुनियावी कामों) से मुतल्लिक राए दूं तो मैं एक इंसान हूं। दुनियां के काम तुम मुझसे बेहतर जानते हो। (सही मुस्लिम, किताब उल फज़ाइल) सही मुस्लिम, भाग. 4, 1835-1836, (न. 2361-2363)।
● Allah ke Nabi Ansaar ke kuch logon ke paas aaye jin ki darhiyaan safed thein, farmaane lage: "Ae Ansaar ki jamaat! Surkh aur zard rang mein rango aur Ahl-e-Kitaab ki mukhalifat karo." Unhon ne kaha: "Ae Allah ke Rasool! Wo apni darhiyaan kaat'tay hain aur moonchein barhatay hain?" Aap ne farmaya: "Apni darhiyaan barhao aur apni moonchein kaato aur Ahl-e-Kitaab ki mukhalifat karo. Sahaba ne kaha: "Ae Allah ke Rasool! Ahl-e-Kitaab mozay pehntay hain, jootay nahin pehntay?" Aap ﷺ ne farmaya: "Jootay aur mozay pehno aur Ahl-e-Kitaab ki mukhalifat karo."
(Al-Silsila-tus-Sahiha 3077, Status: Sahih)
Ye sahabo ki ek Query thi jo unhone nabi saw se generally puchi thi, khud se sabko jakar nahi bola gaya tha ki dadhi badhao muchein Kato. kuch esi chz hai jisko us daur me oppose krne ke liye prophet ne yh baat kahi.
Agar jese Dadhi rakhna farz sunnat wajib ki category me aa gaya hai to fir har kisi ko jute pehen kar namaz padhni chahiye aur jo na padhe to vo khilaf e Deen kam kr raha hai.
Same chiz Safed balon ko rangne ka hai, kya jitna safed balon ko rangna Deen smjhte hai utna hi dadhi ko bhi smjhe to esa mas'ala nahi hoga ,lekin hum dadhi ko farz wajib category me le ate hai aur katne vale ko gunahgar ke tor se dekha jata hai, kya yh rawaiya safed Baal yani buzurgo ke liye bhi hona nahi chahiye fir?
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ज्यादातर मन्हजों में दाढ़ी किस हुक्म में आती है, फ़र्ज़ या सुन्नत, या दोनों तरह की राय मौजूद हैं? सहाबा के फ़हम में दाढ़ी का क्या मुक़ाम है, फ़र्ज़ या सुन्नत? हदीस और तारीख़ से क्या वाज़ेह हो रहा है? कोई भी फ़िक़्ह, मनहज, या सहाबा का फ़हम हो, क्या उसे नबी की बात से ऊपर तवज्जो दी जा सकती है? क्या किसी फ़क़ीह, मुफ़स्सिर, रावी की बात को नबी की बात की रोशनी में टटोल कर नहीं समझा जाएगा? कि नबी का कोई हुक्म किस लिहाज़, हिकमत, ज़रूरत वगैरह के तहत दिया गया था? दाढ़ी की शरई हैसियत पर शुरवात से ही फ़र्ज़, सुन्नत और तहज़ीब से संबंधित होने के मौकिफ़ मिलते हैं। दीन का कोई भी लाज़िम हकूम हो, उसकी बुनियाद या असल क़ुरान में ज़रूर मिलेगी। अगर नहीं है तो सुन्नत या रिसालत में उसका अमल, हकूम तलाशा जाएगा और समझा जाएगा और उसकी हैसियत तय की जाएगी कि वो हकूम किस नोईयत का है। अगर किसी एहकाम को सुन्नत मानते हैं तो नबी का इस अमल को रिसालत में दीन की सुन्नत के तौर पर जारी किया हुआ होना चाहिए। इन दोनों ही सूरतों में क़ुरान और रिसालत में जारी सुन्नतह, दाढ़ी के इस हुक्म से खाली है। दाढ़ी पर इख़्तेलाफ़ पाए जाने की दलील यही बताती है कि यह फ़र्ज़ नहीं है। क्योंकि इस्लाम में फ़र्ज़ीयत बिल्कुल वाज़ेह हैं।
दीन को समझने के लिए, दीन के अहकाम समझने के लिए, क़ुरान फुरक़ान होगा. अल्लाह ने क़ुरान में खुद फरमाया है कि हमनें इसमें कुछ भी नहीं छोड़ा है (हिदायत के ऐतबार से)। दीन के हर मुद्दे के लिए क़ुरान की ओर लौटा जायेगा। बहुत से उलेमा क़ुरान को ही तमाम दीनी अहकाम समझने के लिए आखिरी हदफ़ बनाते हैं। कोई उलेमा न भी करता तो क़ुरान से खुद यह वाज़ेह है क़ुरान ही अव्वल माखज़ है। अक़्ल और इल्म की रोशनी में भी यही दुरुस्त नज़र आता है। क़ुरान में हर दीनी एहकाम की असल या बुनियाद मौजूद होना ज़रूरी है, तफसील नहीं। तफसील तो सुन्नत में मिलेगी हर एहकाम की। अहादीस में भी मिल सकती है क्योंकि उनमें भी एक हद तक सुन्नत का रिकॉर्ड मौजूद है। सुन्नत और हदीस में फर्क है। हदीसों के समझने के लिए क़ुरान और सुन्नत बुनियाद है। कुरान में एक नबी की दाढ़ी रखी हुई होने का ज़िक्र होना और दाड़ी का एक दीनी अहकाम होने में ज़मीन आसमान का फर्क है। जैसे क़ुरान में यूसुफ अलैह. का कमीज़ पहनने का ज़िक्र है, इसका मतलब यह नहीं होगा कि कमीज़ पहनना दीन का एक एहकाम है।
हदीस में जो नबी ने हकूम दिया, वो अपनी ज़ात में कोई इंडिपेंडेंट हुक्म नहीं है जो पुरी हदीस और उसके पसमंज़र से ही ज़ाहिर है। दाढ़ी जो पहले से ही रखी जा रही थी उस पर सवाल किए जाने पर आपने उसकी बनावट पर एक चीज़ वाज़ेह करी और मुखतलिफ शक्ल इख़्तियार करने का हुक्म दिया। इसका मतलब हुआ जो दाढ़ी रखे हुए हैं वो मूछें पस्त कर लिया करें और बालों को बढ़ने दिया करे। हदीस के जुमले को समझिए जो यह समझा रहा है कि दाढ़ी के बाल बढ़ने दें मगर मूछों के नहीं। यह ऐसे ही जैसे कोई दर्ज़ी हमारे पाजामे की बनावट कैसी रखने के लिए पूछे और हम उससे कहे कि भाई पाजामे की चौड़ाई जितनी मर्ज़ी बढ़ा देना मगर लंबाई नहीं बढ़नी चाहिए। ज़ाहिर है दर्ज़ी चौढ़ाई तो आम चलन के हिसाब से रख देगा मगर लंबाई कम से कम ही रखेगा। बल्कि इसकी सबसे अच्छी मिसाल यह है कि मान लो कोई नबी से पूछे कि अहले किताब गुद्दी के बाल छोटे करते है और कनपटी के बाल लंबे रखते हैं तो इस पर नबी यह कहे कि तुम उनसे अलग करो और कनपटी के बाल छोटे कर दिया करो और गुद्दी के बाल बढ़ने दिया करो। अब गुद्दी के बाल बढ़ाने का मतलब क्या यह होगा कि यह दीन का एहकाम या अम्बिया की सुन्नत है। नहीं। हम जानते हैं कि बालों पर तलवार आसानी से नहीं चलती, इसलिए पहले जंग में जाने वाले लोग गर्दन तक लंबे बाल रखा करते थे ताकि कोई गर्दन पर वार के कारण गर्दन ही न उड़ जाए। अब अगर जंगी माहौल में नबी यह कह देते कि सभी मुस्लिम बाल लंबे करो तो यह कोई दीनी एहकाम या दीन की सुन्नत नहीं होगी। मूछें कुतरने वाली बात भी ऐसे ही एक पसमंज़र में थी।
जैसा कि अबु दावूद (4163) में नबी ने फरमाया कि जिसके भी बाल हो, उनका ख्याल करें यानी उन्हें सँवारे वगैरह। क्या इसका मतलब यह हुआ कि बालों की देखभाल दीन का कोई लाज़मी एहकाम या दीन की पिछले अम्बियों से चली आ रही सुन्नत है। नहीं। दीन का हुक्म है जिस्म को साफ सुथरा और खूबसूरत रखना, इसमें अगर बालों का मामला आएगा तो उसमें कंघी की जायेगी, तेल लगया जाएगा, धोया जाएगा वगैरह। नाखून के मामले उन्हें साफ और छोटा रखा जायेगा। इसी तरह किसी की दाढ़ी है तो वो दाढ़ी को खूबसूरत बनाये रखने के लिए उसमें कांट छांट करेगा। इसी खूबसूरती के मद्दनेजर नबी जाती तौर पर बता भी सकते हैं कि फला साइज की दाढ़ी रखो या नबी की खूबसूरत दाढ़ी देख कर लोग ही बताने लगे कि नबी की तो इतने साइज की दाढ़ी हुआ करती थी। इसी तरह अगर किसी वक़्ती ज़रूरत के चलते दाढ़ी में मूछें साफ रखनी है तो वो भी नबी के हुक्म पर किया जाएगा।
अगर सहाबा, इस्लाम के दुश्मन, मुशरिक, अहले किताब सभी नुबवत से पहले से ही दाढ़ी रख रहे हैं तो इसे इस्लाम का अंग कैसे माना जा सकता है? जो दीन के अहकाम रसूल ने आके वापिस स्थापित किये उनका खुलकर क़ुरान में ज़िक्र है बल्कि हर जगह यही कहा गया है कि यह तुमसे पहले की उम्मतों पर भी फ़र्ज़ थे जैसे नमाज, रोज़ा, ज़कात या हज। मगर ऐसा कोई बात दाढ़ी के बारे में न तो क़ुरान बयान करता है और न ही रसूल ने कहा कि दाढ़ी तो पहले की उम्मतों से चली आ रही है। आपने सिर्फ उसके नक्श के बारे में एक हिदायत दी कि ऐसा करा करो।
सहाबा अगर दाढ़ी मुंडवाने का हुक्म देते तो तभी दाढ़ी मुंडवाना जायज़ होता, हर अमल पर ऐसा सोचने लगे तो बात कंही जा कर नहीं रुकेगी। नबी या किसी सहाबी ने यह नहीं कहा कि कान या नाक के बाल काटो। मगर लोग कटवाते हैं, यह जायज़ है। इसका मतलब यह नहीं होगा कि नाक या कान के बाल कटवाना नाजायज़ है या ख़िलाफ़े सुन्नत है क्योंकि इसको कटवाने का कोई हुक्म या अमल नबी या सहाबा से नहीं मिलता। दीन के हुदूद अखज़ करने का तरीका है कि जो ममनू किया गया है वो नाजायज़ है, जिससे रोका नहीं गया या जिसका जिक्र नहीं किया गया, वो सब जायज़ है। कोई कहे कि बरेलवीयों से कि फला चीज़ मना है और इस पर बरेलवी हजरात उसके नाजायज़ होने की क़ुरान और सुन्नत से दलील मांगे (क्योंकि मूल मुमानियत वंहा होनी ही चाहिए) तो उन्हें दलील बिल्कुल देनी चाहिए।
यह वक़्ती दुनियावी हुक्म था। अगर किसी हदीस में इस हुक्म को रसूल से भी आगे बढ़कर अल्लाह से जोड़ा गया है कि यह हुकुम अल्लाह की तरफ से था तो वो इसी हदीस का एक तुर्क होगा जिसमें ये ज़ायद अल्फ़ाज़ किसी रावी ने जोड़ दिए होंगे। तभी यह क़ुदसि हदीस किसी बड़ी हदीस की किताब में दर्ज नही है। असल वाकया ऊपर वाला ही है।
दाढ़ी पर हकूम इस वजह से था कि मक्का और मदीना दोनों जगह के मुसलमानों को उस वक़्त जारी माहौल में ज़रूरत के मुताबिक़ खुद को एक अलग क़ौम दिखाने की ज़रूरत थी। मुशरिक और मुस्लिम सभी दाढ़ी वाले थे। इसके पीछे कुछ वजूहात और हिकमत थी, इस पर कभी और बात करंगे।
रही बात सलफ़ को एज़ इट इज़ फॉलो करने की तो सलाफ़कुछ ऐसे मौकिफ़ भी हैं जो आज साइंस की रोशनी में गलत साबित हो चुके हैं और इस लिहाज से हमने भी अपने मैकिफ़ दुरुस्त कर लिए हैं यानी इन मुद्दों पर हम उनकी समझ से हटे तो ज़ुरूर हैं। जैसे कुरान में ज़मीन को चपटे फैलाए जाने के बारे में , मां के पेट में क्या के बारे में, सूरज के कीचड में डूबने के बारे में अल तबरी, अल कुरुत्बी, इबन हज़म वगैरह जो राय पहले दे कर गए हैं, वो आज बदल चुकी है.
● In Al-Muhalla (vol. 4, p. 345), Ibn Hazm said: There is no text in the Quran that obligates growing a beard, nor is there a definitive proof in the Sunnah that it is an obligation. What is clear is that it was a custom of the people of the time of the Prophet but that does not make it obligatory for us (?).
● Al-Mabsut (a major Hanafi legal text) by Sarakhsi (d.1096AD) notes that Imam Abu Hanifa saw the growing of the beard as a sunnah, but not an obligatory one. He reportedly did not consider shaving the beard to be sinful, as there was no clear, direct command in the Quran mandating it (?).
● Al-Jassas (d.981AD)' Ahkam al-Quran (a Hanafi commentary on the Quran), explains that Imam Abu Hanifa's position was that the beard was part of the cultural norm of the time and should not be viewed as an obligation. For Imam Abu Hanifa, this was consistent with his broader legal philosophy, which acknowledged that cultural practices (like the beard) could be influenced by time and context rather than being unconditionally binding (?).
● In Al-Mughni (vol. 1, p. 223), Ibn Qudama discusses the importance of following the Prophet's sunnah, including growing a beard, but he also emphasizes that such practices were part of the broader context of the Prophet's time and were not necessarily obligatory (?).
● हजरत अबू बकर के समय में एक आदमी ने बैतुल माल से चोरी करने की कोशिश करी थी तो उसकी दाढ़ी काटने की सज़ा दी गई थी. ज़ाहिर है यह गलत अमल होता तो गलती के लिए सज़ा के तौर पर नहीं दिया जाता (सजीद हमीद साहब).
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