Tuesday, 26 January 2021

बौद्धधर्म - भाग 3 (क्या बुद्ध और मैत्रेय पैग़म्बर हो सकते हैं?)


क्या गौतम बुद्ध एक पैग़म्बर थे और मैत्रेय बुद्ध मुहम्मद सल्लo थे।

 

क्या बुद्ध ईश्वर के संदेशवाहक थे।

ऐसा यक़ीन से तो नहीं कहा जा सकता है। पर कुछ मुस्लिम विद्वान ये मानते है कि क़ुरान में उल्लेखित नबी, ज़ुल किफ़ल, गौतम बुद्ध ही है। ज़ुल के मायने होते है 'वाला' और क़िफ़ल के मायने है 'दो'। ज़ुल क़िफ़ल का मतलब हुआ 'दो वाला' या Possessor of Two.  ये नाम से अधिक एक लक़ब या उपाधि जान पड़ती है। ऐसा भी माना जाता है कि इनके नाम में आया किफ़ल शब्द दरसल कपिलवस्तु का छोटा नाम है, कपिल, जो अरबी भाषा मे किफ़ल हो गया क्योंकि अरबी में प शब्द नहीं होता। तो इस तरह ज़ुल क़िफ़ल हुए कपिल वाले क्योंकि कपिलवस्तु बुद्ध का जन्मस्थल और कर्मभूमि थी। वैसे अगर अरबी मायने भी लिए जाए जिसका मतलब है दोहराव वाला या समरूप वाला तो हम जानते है कि बुद्ध के समकालीन ही महावीर स्वामी रहे है जो बुद्ध की तरह ही ज्ञान प्राप्त कर समाज सुधारक हुए थे। महावीर बुद्ध के समरूप और डुप्लीकेट जैसे ही माने जाते है। (हालाँकि कुछ विद्वान बुद्ध और महावीर को एक ही व्यक्ति भी मानते हैं, जिनकी शिक्षाओं के आधार पर इनके तत्कालीन अनुयायिओं ने अलग अलग व्यक्ति मानते हुए, अलग अलग विचारधाराएँ बना ली)

कुछ अप्रमाणिक स्रोत कहते है कि अलबेरुनी ने बुद्ध को पैग़म्बर माना था। जबकि कुछ कहते है कि अलबेरुनी ने केवल ये लिखा था कि भारत के लिए बुद्ध एक नबी जैसा व्यक्तित्व है।

ज़ुल क़िफ़ल के बारे में इस्लामिक साहित्य के बारे में बहुत ही कम जानकारी मिलती है और अक्सरियत उन्हें सामी परम्परा का नबी नहीं मानती। कुछ जानकारों का अनुमान है कि इनका काल 600 BC के आस पास रहा होगा. हज़रत ईसा के बारे में जैसे मनघडंत बातें गढ़ ली गई शायद उसी तरह बुद्ध के बारे में किया गया हो। अधिकतर बोद्ध साहित्य बुद्ध के मृत्यु के कई सदियों बाद लिखा गया है, ये बात बोद्ध अनुयायी भी मानते है और ये भी मानते है कि बहुत सा बोद्ध साहित्य नष्ट हो चुका है और बचे हुए में मिलावट भी हुई है।

वैसे अरबवासी बुद्ध को बाज़ासिफ या बाज़ासफ़ कहते थे। शायद बूत शब्द बुद्ध से ही बना क्योंकि बुद्ध काल से ही मूर्ति निर्माण प्रबल हुआ था।

जापान आदि में एक बुद्ध को बहुत माना और पूजा जाता है (ऐसा भी कहा जाता है कि कुछ लोग उन्हें प्रथम बुद्ध भी मानते हैं), उनका नाम है Amid जिन्हें अमिताभ भी कहते हैं जो कि एक पारलौकिक बुद्ध है और दैवीय संसार में है। ये शब्द अहमद से बना है क्योंकि वही पहली तखलीक या सृष्टि थी और परलोक में थी। अमिताभ में अमित शब्द का मतलब अहमद है और आभा का मतलब नूर है। ऐसा भी माना जाता है कि ये शब्द Adam या आदम से बना है और आदम प्रथम मानव और नबी थे और साथ ही उनका पहला निवास स्थान स्वर्ग था।

बुद्ध परम्परा 29 बुद्धों का उल्लेख करती है जिनमें 28वें गौतम बुद्ध थे और 29 मैत्रेय बुद्ध होंगे जो गौतम बुद्ध के अनुसार भविष्य में आने थे। बौद्धों की चैन की तरह ही जैन  धर्म में भी 24 तीर्थंकर माने जाते है और सनातन धर्म मे भी 14 मनु माने जाते है। ताओ और यूनानी दर्शन में भी ऐसी ही चैन या श्रृंखलाएं मिलती हैं। क़ुरान कहता है कि हर क़ौम में नबी भेजे गए है। कई क्षेत्रों में तो नबियों की पूरी श्रृंखला आती थी।

लोग बौद्ध धर्म (विशेषकर मठों में) में अधिक से अधिक 3 समय तक (सुबह, दुपहर रात) प्रार्थना करते हैं मगर वैसे कोई गिनती फिक्स्ड नहीं है.  


बुद्धो और पैगम्बरों में समानताएँ।


बुद्ध बनने की प्रक्रिया और चरणों होते है। नबी बनने की एक भी प्रक्रिया होती है। बुद्धो को त्याग, तपऔर ध्यान करके ज्ञान की प्राप्ति होती है। नबियों कि दुनिया में ही तरबियत होती है, धीरे धीरे ज्ञान दिया जाता है, सलाहियत दी जाती है। नबी आरंभ में आम इंसान होते और बाद में नबूवत की जानकारी दी जाती है। मुहम्मद साहब भी नबी बनने के लिए एक प्रक्रिया से गुज़रे है जब वो अपना अधिकतर समय गारे हिरा (एक गुफा) में सत्य की तलाश में गुज़ारते थे।

सब बुद्धों ने ज्ञान या सत्य को प्राप्त किया और निर्वाण भी। सत्य हमेशा एक होता है और इन बुद्धों को वही सत्य प्राप्त हुआ तो इसका अर्थ यही है कि उस सत्य का स्रोत भी एक ही होगा। सभी पैग़म्बर का ज्ञान या सत्य भी एक ही था और सृष्टि के सत्य का स्रोत भी एक है यानी स्वंय ईश्वर।

बोद्ध ग्रन्थ पढ़ने से पता लगता है कि...


● सभी बुद्धों की शिक्षा एक ही होती थी।

● सभी बुद्ध समान होते थे पर अन्यों लोगों से उनकी कोई समानता नहीं होती थी बल्कि वे अन्यों से श्रेष्ठ होते थे। 

● दो बुद्धों के बीच समय का लंबा अंतराल होता था। इस अंतराल में पूर्व बुद्ध की शिक्षाएं मूल रूप में नही बच पाती थी।

● हालांकि उनके शब्द समय प्रवाह में आगे जाते रहते थे पर सही अर्थ खोते जाते थे।

● बुद्धों की शुद्ध मूल वाणी भी खोती जाती थी और उनकी क्रियात्मक विपश्यना साधना भी।


ये सभी बातें विभिन्न पैग़म्बरों के आने के अंतराल में हूबहू होती थी। यंहा तक कि नमाज़ भी खो जाती थी जो दरअसल एक मानसिक और शारीरिक साधना ही है योग और विपश्यना की तरह। 

 

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बुद्ध विश्राम अवस्था


तथागत बुद्ध या सिद्धार्थ गौतम (6-5th सदी ईसा पूर्व में) की लेटी हुई अधिकतर प्रतिमाओं में वह इसी प्रकार लेटे हुए दिखाई देते हैं। इस अवस्था में चेहरा पश्चिम दिशा की ओर होता है, सिर उत्तर की ओर होता है, पैर दक्षिण की ओर, दाहिने हाथ पर सिर टिकाया जाता है और दाई करवट लेटा जाता है।

बुद्ध इस अवस्था में विश्राम करते थे और इसे सिंह अवस्था या सिंह मुद्रा कहा जाता है। बुद्ध ने इसी अवस्था में देह भी त्यागा था और इसीलिए इसे महापरिनिर्वाण मुद्रा भी कहते हैं।

मुख्य बौद्ध ग्रंथों में से एक महापरिनिर्वाण सुत्त (3rd सदी ईसा पूर्व) में इस अवस्था में उनके देह त्याग करने का उल्लेख है। चीनी यात्री और बौद्ध विद्वान ह्वेनसांग ने भी लिखा है कि मृत्यु के समय बुद्ध ने इसी अवस्था में प्राण त्यागे थे। इस मुद्रा का उल्लेख कई बौद्ध ग्रंथों और भारत भ्रमण पर आए विदेशी बौद्ध यात्रियों के विवरणों में मिलता है।

पैगम्बर मुहम्मद साहब भी लगभग इसी मुद्रा में विश्राम करते थे और दूसरों को इस प्रकार लेटने की शिक्षा भी देते थे। ऐसा कई हदीसों से सिद्ध है। मुहम्मद साहब दाई करवट से लेटते थे और सिर या गाल के नीचे दाहिना हाथ रखते थे।

साथ ही भारत आदि पूर्वी देशों में (बुद्ध भी यहीं थे) मृत्यु के बाद हर मुस्लिम के पार्थिव शरीर को कब्र में इस प्रकार रख कर दफनात हैं कि उसका सिर को उत्तर दिशा की ओर हो, पैर दक्षिण की ओर और चेहरा पश्चिम की ओर (यानी क़िबले या काबा की ओर जो कि अरब में है यानी भारत से पश्चिमी तरफ)। हालांकि शव को ज़्यादातर जगह दाई ओर करवट दिलवाए बिना ही दफनाया जाता है मगर भारत में कुछ स्थानों पर (जैसे यूपी, बिहार, बंगाल में, जो कि बुद्ध प्रभावित क्षेत्र का ही हिस्सा है) मुर्दे को हल्की से दायी करवट के साथ भी दफनाया जाता है ताकि चेहरा सीधा काबा की ओर हो जाये। इस्लाम में मुर्दे को सीधी तरफ करवट के साथ लिटाने का भी हुक्म है जिसे मुहम्मद सहाब से मंसूब किया जाता है और इसे इमाम हज़्म ने अल महल्ला (5/173) में भी बयान किया है।

 

सिंधु घाटी सभ्यता (लगभग 4-4.5 हज़ार साल पुरानी) की खुदाई में राखीगढ़ी और सिनौली में कई कब्रें मिली हैं जिनमें बेतरतीब मुर्दों को दफनाया गया है यानी अलग अलग दिशा और प्रकार से, यंहा तक कि पेट के बल भी। मगर साथ ही कुछ कब्रे ऐसी भी मिली हैं, जिनमें कब्रों या शवो की दिशा वैसी ही मिली है जैसे भारत-पाक पूर्वी देशों के मुसलमानों अपने शवों को दफनाते हैं यानी सिर उत्तर दिशा की तरफ़ और पांव दक्षिण की तरफ। कुछ लोगों का कहना इनमें से कुछ कंकालों के मुंह पश्चिम की तरफ मुड़े  हुए भी पाए गए हैं हालांकि अभी तक उनके दावों की पुष्टि नहीं हो पाई है जैसे:-

The Harappan people's burial practices are similar to Islamic burial practices ~  Dr. S.S. Mishra, Harappan Civilization and Islamic Burial Practices, Journal of Indian History, Vol. 93, No. 2, 2015 (?)
The burials found at Sinauli are similar to Islamic burial practices ~ Dr. R.S. Bisht, The Ancient Indian Civilization of Harappa and Mohenjodaro, Journal of Asian Studies, Vol. 10, No. 1, 2017 (?)

सिंधु घाटी सभ्यता की एक जगह/शहर का नाम सिनौली है, जैसे एक शहर हड़प्पा या मोहनजोदड़ों है। सिंधु घाटी सभ्यता काल को 2500-1500 BC तक स्ट्रेच किया जा सकता है, अलग अलग मत अनुसार। हम यहाँ यह साबित नहीं कर रहे कि यह कब्रें इस्लामी थी बल्कि कोई इस्लाम से जुड़ा संकेत मिल रहा है तो उस पर चर्चा कर रहे हैं। शायद भविष्य में नई रिसर्च से कुछ और ऐसा मिले। 

क़ुरान या हदीस की कोई सीधी हिदायत ऐसी नहीं है जिसमें मुर्दे के साथ उसका कोई समान रखने की मनाही हो। शायद  किसी हदीस में नबी ने मना किया हो। मना करने की वजह यही होगी कि यह फ़िज़ूल खर्ची है या यह एक ऐसा अमल है जिसका कोई फायदा ही नहीं। क्योंकि न तो मुर्दा इसका इस्तमाल कर सकता है और न ही इस अपने साथ ले जा सकता है। इसके अलावा ये प्रथा तो हज़ारों सालों से पूरी दुनिया में चली आ रही थी कि मृतक के साथ कुछ समान रख देना, आज भी बहुत जगह चालू है। इसके पीछे कई वजह होती थी जैसे कि मरने वाला का ज़ाती समान या पसंदीदा चीज़ या उसकी पहचान का समान उसके साथ रख देना या फिर यह मान्यता की यह सामग्री उसे दूसरे लोक में मिल जायेगी वगैरह वगैरह। इस लिहाज से भी अगर नबी ने मना किया तो बिल्कुल बात अक़्ल में आने वाली है। वैसे ही जैसे नबी ने शादियों को सिंपल करने को कहा, कफ़न- दफन को भी सिंपल करने को कहा होगा।  हो सकता है पहले की उम्मतों या मुसलमानों (या ऐसे लोगों में जो अपने नबियों के जाने के सदियों बाद इस्लाम को बेहद बिगड़ी हुई सूरत में फॉलो करने लगते हैं, जैसे हमारे नबी से पहले तमाम अरब थे) में कब्रो में ऐसी चीज़ें रखी जाती हो किसी खास वजह से। या हो सकता है उस वक़्त के मुसलमानों में दफन के रिवाजों में यह बिदअत शामिल हो गयी हो जैसे आज कब्रो, दरगाहों से संबंधित कई बिदअत मुस्लिम समाज में जारी है। ऐसा भी हो सकता है कि जैसे बताया है कि कुछ ही कब्र इस दिशा में मिली हैं यानी सिर्फ यही लोगों इस्लाम के पैरोकार थे या इस्लामी परंपरा से एक हद जुड़े थे, कम से कम दिशाओं को लेके।



हज़रत ईसा को बोद्ध पाण्डुलियों में उल्लेख।

उन्नीसवीं शताब्दी में लद्दाख के हेमिस नामक तिब्बती बौद्ध-मठ से ईसा का एक प्राचीन हस्तलिखित जीवनचरित प्राप्त हुआ था, इसी के बाद ये विचार फैलने लगा कि ईसा अपने अज्ञातवास में भारत आये थे और बौद्धों के सम्पर्क में रहे थे। तिब्बत से मिले ताड़पत्रों से पता लगा कि एक बोद्ध भिक्षु या लामा जिसका नाम ईसा था, ज्ञान प्रप्ति के लिए कश्मीर आदि के मठों में अपना समय बिता के वापस अपने देश चला गया था और इस भिक्षु और हज़रत ईसा में बहुत समानता पाई गई। हज़रत ईसा के बचपन के बाद और नबूवत के बीच की ज़िंदगी की कहानी यानी 30 साल तक कि कहानी जैसे की वो कंहा रहे, क्या करते थे आदि इस्लामी और ईसाई साहित्य से नहीं मिलती है।  हालांकि कादियानी समुदाय इस मत को मानता है कि ईसा यौवन काल में कश्मीर में रहे थे और सलीब कांड के बाद वापस कश्मीर आ गए थे जंहा उनकी कब्र भी है। वे ये भी मानते है की कश्मीर में ही प्राचीन काल में यहुदी खोए हुए कबीले आके बसे थे।

इस विषय पर कुछ ऐतिहासिक स्रोत या किताबें है जैसे जीसस इन इंडिया (मिर्जा गुलाम अहमद कादियानी), जीसस लिव्ड इन इंडिया (होल्गर केर्स्टन), द लॉस्ट इयर्स ऑफ जीसस (एलिज़ाबेथ क्लेयर प्रोफेट) और अननोन लाइफ ऑफ जीसस क्राइस्ट (निकोलस नोटोविच).

शायद ये व्यक्ति ईसा की बजाय प्रोफेट मणि रहे हों.           

भारत में ईसा के आने का दावा बौद्ध धर्म से जुड़ा है, न कि हिन्दू धर्म से। हिन्दू और बौद्ध धर्म तो एक दूसरे के घोर विरोधी हैं। 

 

हज़रत ईसा और बुद्ध की एक परम्परा और समानताएँ।

हज़रत ईसा बुद्ध के लगभग 5 सदी बाद हुए है। फिर भी दोनों में कुछ समानता है जो दोनों को एक ही परंपरा या चैन का हिस्सा बनाती है। 

● ईसा के जन्म से पूर्व जिब्रील आकर मरियम को बताते हैं कि मुझे ईश्वर ने भेजा है ताकि तुम्हें एक पुत्र होने का शुभ समाचार दूँ जो ईश्वर का दूत होगा। बुद्ध के जन्म से पूर्व उनकी माँ महामाया के स्वप्न में सुमेध नाम का बुद्ध आकर कहता है कि मैं तुम्हारे गर्भ से जन्म लेने वाला हूँ।

● प्रसव पीड़ा होने पर मरियम खजूर के पेड़ के नीचे जा पहुँची थीं, जहाँ उन्हें रब ने खजूर का तना हिलाने की सलाह दी थी, क़ुरआन में ये ज़िक्र है। उधर बुद्ध के जन्म की कथा में ये ज़िक्र है कि प्रसव पीड़ा होने पर महामाया ने शाल वृक्ष की डाल पकड़ी थी यानी ये दो घटनाएं एक समान हैं। 

● माता के नाम भी मिलते जुलते (मरियम-महामाया) हैं। 

● फिर ईसा की कथा में ज़िक्र है कि वो बालपन से ही शांत और करुणामय स्वभाव के थे और धर्मगुरुओं के साथ शास्त्रार्थ करने लगे थे। महात्मा बुद्ध के बारे में भी उनके बचपन से ही शांत स्वभाव, करुणामय और विचारशील होने की कथाएं प्रचलित हैं। 

● ईसा के बारे में कहा जाता है कि जब शैतान ने उन्हें बरगलाने का प्रयास किया तब ईसा ने 40 दिन तक उपवास करके सिद्धावस्था पाई और बुद्ध पर जब "मार" का आक्रमण हुआ तब बुद्ध ने 49 दिन तक उपवास करके सिद्धि प्राप्त की। 

● ईसा ने एक धार्मिक वर्ग फरीसियों का प्रबल विरोध किया जो फरीसी खुद को ईश्वर के प्रिय कहा करते थे। वहीं बुद्ध ने ब्राह्मणों का प्रबल विरोध किया था। 

● इसके अतिरिक्त  ग्रहस्थ जीवन का त्याग, प्राणियों पर दया वेश्याओं का जीवन सुधारना, चोर डाकुओं का जीवन सुधारना, ध्यान मग्न रहना ये तमाम बातें दोनों की जीवनी में एक समान हैं, दोनों की अहिंसा की शिक्षा भी काफ़ी एक जैसी ही है।

हो सकता है बाद में मिलावट करने वालों ने बुद्ध और ईसा के जीवन चरितों को आपस में गड्डमड्ड कर दिया गया और गौतम के काफी बाद हुए  ईसा के जन्म और सिद्धि प्राप्ति व शिक्षाओं को गौतम बुद्ध की कथा में जोड़ दिया गया।

Some other resemblances are: 

  1. Jesus was born of a virgin without carnal intercourse. (Matth. Chapter 1) – Buddha was born of a virgin without carnal intercourse. (Hinduism by Williams, pp. 82 and 108)
  2. When Jesus was an infant in his cradle, he spoke to his mother and said: I am Jesus, the son of God. (Gospel of Infancy) – When Buddha was an infant, just born, he spoke to his mother and said: I am the greatest among men. (Hardy’s Manual of Buddhism, pp. 145-6)
  3. The life of Jesus was threatened by King Herod. (Matth. 2:1) – The life of Buddha was threatened by King Bimbarasa. (History of Buddha by Beal pp. 103-104)
  4. When Jesus was a young boy we are told that the learned religious teachers were astonished at his understanding and answers. (Luke 2:47) – When sent to school, the young Buddha surprised his masters. (Hardy’s Manual of Buddhism)
  5. Jesus fasted for forty days and nights. (Matth. 4:2) – Buddha fasted for a long period. (Science of Religion by Muller, p 28)
  6. It is believed that Jesus will return to this world. (Acts 1:11) – It is believed that Buddha will return to this world. (Angel-Messiah by Bunsen, Ch. 14)
  7. Jesus said: Think not that I am come to destroy the law, or the prophets; I am not to destroy but to fulfill. (Matth. 5:17) – Buddha came not to destroy the law but to fulfill it. (Science of Religion by Muller, p 140)
  8. Jesus taught: Love your enemies, bless them that curse you, do good to them that hate you. (Matth. 5:44) – According to Buddha, the motive of all our actions should be pity, or love for our neighbour. (Science of Religion by Muller, p 249)
  9. It is recorded certain of the scribes and pharisees answered, saying, Master we would see a sign from thee. (Matth. 12:38) – It is recorded in the Sacred Canon of the Buddhists that the multitude required a sign from Buddha that they might believe. (Science of Religion by Muller, p 27)
  10. It is written in the New Testament that Jesus said: If thy right eye offend thee, pluck it out, and caste it from thee. (Matth. 5:29) – A story is related of a Buddhist ascetic whose eye offended him so he plucked it out and threw it away. (Science of Religion by Muller, p 245)

The basic teachings of Buddha are very similar to those taught by Jesus most of which are contained in his Sermon on the Mount. (Matth. ch 5)


मैत्रेय बुद्ध।

मैत्री से मित्रता बना है। महात्मा बुद्ध ने शिष्य नन्दा को अपने अंतिम समय में कहा था "नन्दा! इस संसार में मैं न तो प्रथम बुद्ध हूँ और न तो अन्तिम बुद्ध हूँ। इस जगत में सत्य तथा परोपकार की शिक्षा देने के लिए अपने समय पर एक और ‘बुद्ध’ आएगा। पवित्र अन्तःकरण वाला होगा। उसका हृदय शुद्ध होगा, वो मैत्रेय होगा। प्रत्येक बुद्ध का अपना एक वृक्ष होता है उसका भी होगा, वह पीछे देखने के लिये गर्दन मोड़कर देखने की बजाय पूरा ही घूमकर पीछे देखेगा"। ये निशानियां हज़रत मुहम्मद सल्ल० पर फिट बैठती है।  डॉ. वेदप्रकाश उपाध्याय ने अपनी किताब "नराशंस और अन्तिम ऋषि" में मुहम्मद साहब को ही मैत्रीय बुद्ध कहा है क्योंकि ऊपर बताई गई भविष्यवाणीयों के अलावा अगले बुद्ध की जो निशानियां बताई थीं, जैसे कि वो धन-ऐश्वर्य वाला होगा, पत्नी बच्चों वाला होगा किन्तु सादा जीवन जियेगा, वो धर्म प्रचारक होगा, उसका एक राज्य होगा, ये सब भी मुहम्मद साहब पर फिट बैठती है।

एक बार नंदा ने बुद्ध से पूछा था की आप मैत्रेय का इतना उल्लेख क्यों करते हो, क्या वो आधा धम्म है। इस पर बुद्ध ने कहा था कि नहीं वो पूरा धम्म है। इस्लाम धर्म और सभी पैगम्बरों में मुहम्मद साहब को कुछ ऐसा ही दर्जा प्राप्त है।
 
 
 
प्रश्न: बुद्ध को कैसे पैगंबर माना जा सकता है, वो तो वस्त्रहीन रहते थे, वो तो मेडिटेशन करते थे, शैतान के मानने वाले थे, बुद्ध के मानने वाले भी अजीब लोग हैं?
 
उत्तर: बुद्ध की शिक्षाएं अखलाकियात पर आधारित थी। बुद्ध ने ईश्वर का कभी इनकार नहीं किया बल्कि या तो खामोशी इख्तियार करी या यह कहा कि खुद ढूंढो। 2500 पुरानी शिक्षाओं में मिलावट हो सकती है, ये नामुमकिन नहीं है। जब हज़रत मूसा और हज़रत ईसा तक कि तालिमों में मिलावट हो सकती है तो फिर यह किसी के साथ भी हो सकता है। यंहा तक तक हमारे नबी तक के नाम पर कितनी ही मौज़ू, मनगढ़ंत रिवायतें बनाई गई ये तो हम सभी जानते हैं, जो उन्होंने कभी कहा ही नहीं। बौद्ध लोग खुद मानते है कि मिलावट बड़े स्तर पर हुई है बल्कि बुद्ध की वाणी तो बुद्ध के जाने के कई सदियों के बाद लिखी गयी है।

बुद्ध ने नंगा रहने को नहीं कहा। वो जैनियों की बात है। महावीर का लिखा कोई ग्रंथ नहीं है, उनके वस्त्र त्यागने की बात भी उनके अनुयायियों ने लिखी। सच क्या है पता करना आसान नहीं। फिर भी हम बुद्ध को नबी नहीं मान रहे सिर्फ संभावना तलाश रहे हैं।

मेडिटेशन करना कोई बुरी बात नहीं है। दुनिया में बड़े बड़े इंसान मेडिटेशन करते आये हैं। नमाज़ भी एक मेडिटेशन का तरीका है। आज भी दुनिया भर के लोग, बाज़ मुसलमान भी मेडिटेशन करते हैं। योग भी मेडिटेशन है। इस्लाम मेडिशेसन को मना नहीं करता और कर भी नहीं सकता क्योंकि ये ज़ेहन और सुकून के तौर पर फायदा करता है। इसमें कोई शिरकीया अमल शामिल कर लो तो  बात गलत हो जायेगी वरना नहीं। सेल्फ कांशसनेस, सेल्फ कंट्रोल वगैरह अच्छी बात है सबको सीखनी चाहिए। नमाज़ भी इसके लिये बहुत असरदार है। मेडिटेशन भी यह करता है।

बुद्ध को शैतान का फॉलोवर कहना बुद्ध पर या किसी इंसान पर झूठ बांधने जैसा है और यह सख्त गुनाह है। जो अल्लाह या ईश्वर को न माने तो वो शैतान को ही मानता होगा, ऐसा सोचना ही इल्म और तजुर्बे की कमी है। ईश्वर और शैतान के न मानने वाले बीच के लोग भी होते हैं। जैसे सफेद और काले के बीच में कई रंग होते है।

बुद्ध के फॉलोवर बड़े वाले हैं तो वो तो ऐसे तो लोग आज हर धर्म, समुदाय में हैं। मुसलमानों में कौन से कम है? क्या ऐसे लोगो की वजह से बुद्ध और नबी को दोष दिया जा सकता है क्या?

बुद्ध फिलसोफेर थे इसमें कोई खराबी की बात नहीं। जिस काल में वो हुए उस काल में फिलोसोफी ही चलती थी पूरी दुनिया में। इस काल के 600 सालों के दौरान कोई नबी का नाम साफ तौर पर हमें नहीं मिलता जबकि एक से बढ़कर एक फिलॉस्फर का मिलता है। सिवाए जरथुस्त्र के जिन्हें पारसी अपना पैगम्बर मानते है, औए जिन्हें इसी काल का अक्सर माना जाता है। ज़रा जरथुस्त्र की शिक्षाओं के बारे पढ़िए।

बुद्ध तो सबसे ज़्यादा कर्मो में यकीन रखते थे। अच्छे कर्मों में तो हर धर्म, नबी यकीन रखता है। उन्होंने incarnation की बात नहीं करी बल्कि reincarnation की करी। पुनर्जन्म तो हिन्दू धर्म में भी बहुत महत्वपूर्ण है मगर इसके असल मायने वही है जो वेदों में और वंहा इसका वही अर्थ है जो मुस्लिम मानते हैं, कि परलोक में फिर से जन्म लेना, यंहा मरने के बाद।

बुद्ध परलोक (स्वर्ग नरक) में यकीन रखते थे, बुद्ध की गीता कही जाने वाले धम्मपद में लिखा है और वैसे ही लिखा है जैसे मुस्लिम मानते हैं, एक जगह दुख ही दुख है और दूसरी जगह सुख ही सुख। बस अंतर इतना है इस स्वर्ग नरक को बौद्ध लोग हिन्दू भाइयों की तरह इसी धरती के दुख सुख मान लेते हैं जबकि वेदो में यह दूसरी दुनिया सिद्ध होता है और धम्मपद आदि में भी। यह बात भी अलग है कि आज के नास्तिक अम्बेडरवादी बुद्ध के इन स्वर्ग नरक के वचनों को खारिज कर देते हैं, ज़ाहिर उनके एजेंडे के खिलाफ जो जाते हैं ये।

यकीनन बौद्ध धर्म, बुद्ध, और इन पर अम्बेडकरवादी प्रभाव को गेहराई से पढ़ने के  बाद काफी कुछ नया पता लगता है, उन बातों के खिलाफ जो हम सुनते आ रहे हैं। बुद्ध के बारे में भारतीय आलिम ज़्यादा गहराई से बता सकते हैं किसी दूसरे देश के मुस्लिम आलिम के मुकाबले। 


प्रश्न: मैत्रेय बुद्ध का जन्म होना अभी बाकी है क्योंकि दस पार्मिता, उप पार्मिता, परमार्थ को गृहण करके ही बुद्ध बना जा सकता है। पहले वह अर्हत बनता है फिर वह बोधिसत्व बनता है और बाद मे वह बुद्ध बनता है। इसमे इश्वर का कोई हस्तक्षेप नही है। अनागत वमसा (Chronicle of future Buddhas) पढेगे तो पता चलता है की मैत्रेया बुद्ध का धम्म सम्पुर्ण नष्ट हो जाने के बाद ही आएगे और ऐसा होने के लिये 5000 साल लगेगे। अभी सिर्फ 2500 साल ही हुए है। चक्क्वती सिह्नाद सुत्त (दीघ निकाय) में बुद्ध ने समझाया कि अनैतिकता बढ़ती रहेगी और मानव जीवन काल तब तक कम होता रहेगा जब तक कि यह केवल दस वर्ष न हो जाए। लड़कियों की शादी पांच साल की उम्र में होगी। उस समय, जिन लोगों के पास अपने माता-पिता के लिए, धार्मिक नेताओं के लिए, या सामुदायिक नेताओं के लिए कोई सम्मान नहीं है, उन्हें सम्मानित और प्रशंसा की जाएगी। वैमनस्य इतना सामान्य होगा, इंसान जानवरों जैसा हो जाएगा। दुश्मनी, बीमार इच्छा और घृणा इतनी मजबूत होगी, लोग अपने ही परिवार के सदस्यों को मारना चाहेंगे। बड़े कत्लेआम के साथ सात दिन का युद्ध होगा। लेकिन कुछ लोग सात दिनों तक छिपेंगे, और बाद में वे उन लोगों को देखकर खुश होंगे, जो जीवित हैं। वे हत्या को रोकने के लिए निर्धारित करेंगे, और उनके जीवन काल में बीस साल तक वृद्धि होगी। यह देखकर, वे अन्य नैतिक उपदेशों को रखने का कार्य करेंगे और धीरे-धीरे मानव जीवन काल फिर से बढ़ेगा। इस दुनिया में अभी तक उस तरह के पतन का कोई विवरण नहीं है। और बुद्ध जब कोई बनता है तो वह 32 शुभ चीन्ह और 80 गुणो के साथ जन्म लेते है। और यही नही जितने भी 28 बुद्ध हुए ही वह सब  गृहस्थ जिवन त्याग कर चुके थे, वह सन्यासी जिवन व्यतीत करे थे। Chronical of Buddha में मैत्रेय बुद्ध की जन्म का विवरण दिया है:-

a) उनकी माँ एक खड़ी स्थिति में और एक जंगल में जन्म देती है।
b) वह बिना किसी दाग ​​के आगे आता है।
c) वह उत्तर में सात कदम उठाता है, चार तिमाहियों का सर्वेक्षण करता है और शेर की दहाड़ का उच्चारण करता है कि वह दुनिया में सर्वोच्च है। 
d) बोधिसत्व के जन्म के सात दिन बाद, उसकी माँ की मृत्यु हो जाती है और तुसिता देव दुनिया में उसका पुनर्जन्म होता है। 
e) इस समय, एक पहिया-मोड़ सम्राट होगा जिसका नाम सांखा है। बोधिसत्व सम्राट के प्रमुख पुजारी, सुब्रह्म और उनकी पत्नी, ब्रह्ममती का बेटा होगा।
f) उसका नाम अजिता होगा 
g) वह आठ हजार वर्षों तक गृहस्थ जीवन का नेतृत्व करेगा। h) उसके चार महल होंगे जिनका नाम: सिरिवाध, वध्मन, सिध्धा और कैंडका है।
i) उनकी पत्नी कैंडामुखी होगी और उनके बेटे का नाम ब्रह्मवधना होगा। 
j) वह चार लक्षण (एक बूढ़ा आदमी, एक बीमार आदमी, एक मरा हुआ आदमी, और एक संतोषी व्यक्ति जो जीवन से आगे निकल चुका है) को देखने के बाद गृहस्थ जीवन को छोड़ने का फैसला करेगा। 
k) वह कामुक सुखों का विरोधी हो जाएगा। सम्मान पाने के लिए नायाब, बड़ी खुशी और आनंद की तलाश में, वह आगे बढ़ेगा।

उत्तर: मैत्रयी बुद्ध को मुहमद साहाब जिन रिर्सच के आधार पर साबित किया है, वो अधिकतर वेद प्रकाश उपाध्याय की है। एक और विद्वान MA श्रीवास्तव ने भी मैत्रयी को मुहम्मद साहब ही बताया है। और कई मुस्लिम विद्वानों की भी यही राय है। हालांकि कोई भी 100% ये साबित नहीं कर सकता कि मुहम्मद साहब ही मैत्रयी बुद्ध है जैसे कोई ये 100% साबित नहीं कर सकता कि मुहम्मद साहब मैत्रयी नहीं है। क्योंकि बहुत सी मैत्रयी के बारे में की गई भविष्यवाणी मुहम्मद साहब पर फिट बैठती है और कुछ नहीँ भी।

दूसरी बात बुद्ध बनने की प्रक्रिया और चरणों की थी। भले ही वो बुद्ध की अलग हो पर मुहम्मद साहब भी नबी बनने के लिए एक प्रक्रिया से गुज़रे है जब वो अपना अधिकतर समय गारे हिरा (एक गुफा) में सत्य या ज्ञान की तलाश में गुज़ारते थे।

रही बात ईश्वर द्वारा पैगम्बरी देने की तो सवाल यंहा ये है कि 28 बुद्ध हुए है और सबने सत्य या ज्ञान को प्राप्त किया और निर्वाण भी। सत्य हमेशा एक होता है और इन बुद्धों को भी वही सत्य प्राप्त हुआ तो इसका अर्थ यही है कि उस सत्य का स्रोत भी एक ही होगा। जैसे पैग़म्बरों का सत्य या ज्ञान एक ही होता है। सृष्टि सत्य का स्रोत भी एक है यानी स्वयं ईश्वर।

इतिहास और धार्मिक साहित्य जानने वाले लोग जानते है कि धार्मिक पुस्तकों में लिखी गई बातें या भविष्यवाणीया अलंकृत और गूढ़ भाषा मे होती है। जिनके अर्थ कई प्रकार से निकाले जाते है और इसकिये उन पर अलग अलग मत भी विद्वान रखते है। ये बातें उपमा और रूपक शैली में बताई गई होती है।जैसे पूर्व में हुए बुद्धो की औसत आयु लगभग 100000 वर्ष बताई गई है जबकि सृष्टि के इतिहास में कभी भी मनुष्य की इतनी लंबी आयु नहीं रही है। ज़ाहिर है ये आयु अलंकृत भाषा में बताई गई हो या ग्रंथो में मिलावट हो। यही चीज़ें मैत्रयी के बारे में भी होई हुई मालूम पड़ती है। 

मैत्रयी के बारे में की गई प्रश्न में लिखी गयी भविष्यवाणियो में कुछ तो अभी भी मुहम्मद साहाब पर फिट बैठ रही है, कुछ इतिहास में हो चुकी हुई लग रही है, कुछ गूढ़ या अलंकृत भाषा में लिखी मालूम हो रही है और कुछ अवैज्ञानिक या अतार्किक लग रही है।

इन भविष्यवाणी में ये भी कहा गया है कि मैत्रयी जंगल मे जन्म लेंगे, उस समय एक सम्राट होगा। जबकि पहले मनुष्य जंगलों में या उनके पास रहता था, अब नए युग में आमतौर पर जंगल में कोई नहीं जाता और अब सम्राट भी नहीं होते है। इससे यही पता लगता है कि मैत्रयी का जन्म बहुत पहले राजपाट वाले समय मे हो चुका है।


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