भारत में धर्म परिवर्तन और मंदिर ध्वस्त करने के आरोप।
भारत में कभी कोई जबरन सामूहिक धर्म परिवर्तन नहीं हुआ। हो भी नहीं सकता था क्योंकि जबरन धर्मपरिवर्तन अगर हुआ होता तो मुसलमानों का राज 700 साल से अधिक तक न चल पाता। भारत में सदैव से ही हिन्दू जनसंख्या बहुत अधिक रही है, जो मुग़ल काल में भी। अगर जबरन धर्म परिवर्तन की कोशिश हुई होती तो इतना बड़ा विद्रोह हुआ होता कि मुसलमानों का तख्ता पलट कर दिया गया होता और सत्ता छीन ली गई होती। ये बात मुस्लिम शासक भी जानते थे कि राजपाट चलाना है तो जबरन धर्म परिवर्तन करावना आत्महत्या के समान होगा और इसलिए उन्होंने कभी ऐसा किया भी नहीं। अगर किया होता तो आज भारत की 85% जनसँख्या गैर मुस्लिम नहीं होती बल्की ये आंकड़ा उल्टा होता क्योंकि मुसलामन भारत में सैकड़ों साल सर्वशक्तिशाली रहे है।
विद्रोह के डर के कारण ही तो मुस्लमान शासकों ने कभी वर्ण व्यस्था समाप्त करने के लिए कोई एक्शन नहीँ लिया यही कहकर की ये इनके धर्म का अंदुरुनी मामला है। इसी कारण, एक आध बादशाह को छोड़ दे तो कभी किसी शासक ने सती प्रथा को बंद करवाने के लिए भी ज़ोर नहीं दिया और न ही अन्य गलग प्रथाओं को। ऐसी प्रथाएं तो अंग्रज़ों ने आके बंद करवाई। मुस्लिम शासकों को कट्टर मुसलमान कहा जाता है जबकि किसी भी बादशाह ने कभी इन 800 सालों के राज में हज नहीं किया जो इस्लाम में फ़र्ज़ है। इससे यही पता लगता है कि वो इस्लाम के प्रति अधिक भक्त नहीं थे। वो इस्लाम के प्रतिनिधि नहीं थे। भारत पर अंग्रेजों, फ्रांसीसियों, पुर्तगालियों और डच का शासन रहा। कभी किसी ने इनके शासन को ईसाई शासन नहीं कहा। पर मुग़लों, लोदी, तुग़लक़ आदि वंशो के शासन को मुस्लिम या इस्लामी शासन कहा गया।
धर्मान्तरण किये हुए हिन्दू समुदाय।
भारत के जीतने लोग आज तक मुस्लिम बने है, उन्हें तीन कैटगरी में बांट सकते है। एक जिन्होंने सूफी संतों के प्रभाव में और इस्लाम की शिक्षाओं से प्रेरित हो कर धर्म परिवर्तन किया। इनमें पिछड़ी जाति और ग़रीब जनता अधिक थी। सबसे अधिक संख्या इन्ही की थी और इन्ही को आज ये झूठा ताना दिया जाता है कि ये डर के मुसलमान बने थे। दूसरे वो लोग जो अपने लाभ के लिए मुसलमान हुए क्योंकि राज मुसलामनों का था और जब सत्ता वालों का ही धर्म अपना लिया जाए तो पुरानी संपत्ति बचाने के साथ साथ नई संपत्ति भी आसानी से बनाई जा सकती थी। ये वो लोग थे जिन्हें जागीरें, मनसब, औहदे और सत्ता का आशीर्वाद चाहिए होता था। ये अधिकतर वैश्य और क्षत्रिय लोग थे। इनको बहुतों को दरबारों में जगह मिलती थी, इनके मुस्लिम शासकों के साथ रिश्ते होते थे, इनको सेना की कमाने भी मिलती थी। इनकी संख्या भी अच्छी खासी थी। तीसरें वो लोग थे जिनका वास्तव में इक्क दुक्का कंही किसी राज्य के किसी कोने में जबरन धर्म परिवर्तन किया गया या किसी की ज़ाती दुश्मनी होने पर किसी को परेशान किया गया ताकि वो धर्म परिवर्तन करले। ये एक अपराध और पाप है। इसकी इजाजत इस्लाम कतई नहीं देता। ऐसे लोग सबसे कम रहे है बल्कि नगण्य रहे है। ऐसा आज भी दुनिया में कंही कंही होता है जब किसी को व्यकिगत तौर पर परेशान करके धर्म परिवर्तन करा लिया जाता है और ये काम वर्चस्ववादी लोग ही करा पाते है।
धर्मपरिवर्तन का कारण सूफी संत।
इससे यही पता लगता है कि भारत मे धर्म परिवर्तन इच्छानुसार हुआ और उसके सबसे बड़े ज़िम्मेदार सूफी संत लोग थे। उस समय, अपने पौराणिक कल्पनाओं से भरे धर्म से, स्त्री उत्पीड़न से, वर्ण व्यस्वस्था से, सती-दास प्रथा से, विधवा बहिष्कार प्रथा से, जात पात से त्रस्त आ चुके लोग सूफी, संतों और ख्वाजा जैसे साधुओं के दर पर आते थे। हिन्दू मुस्लिम देखे बिना ये सूफी संत सब पर दयालुता, उपाकरता करते थे। उनसे स्नेह और प्रेम करते थे। उनकी मदद करते थे। उनकी वित्तीय सहायता और इलाज आदि किया करते थे। उस समय भी ऐसे संतो के पास रहिसों का दान आता था जो गरीबों पर खर्च कर दिया जाता था क्योंकि दौलत का लगाव इन संतों का नही होता था। ये सूफी संत दरअसल लोगों की नफसियात और अन्तरात्मान को समझते थे और उस पर ध्यान देते थे। इसलिए लोग अपना जात पात और उत्पीड़न आधारित धर्म छोड़कर उस धर्म में आ जाते थे जिसमें उन्हें बराबरी का दर्जा मिलता था। यही कारण है कि हमेशा से ही हिन्दू लोग भी इन सूफी संतों को मानते आ रहे है और इनको बहुत मान सम्मान देते आ रहे है। इन्हें पहले कभी किसी ने धर्म परिवर्तन का जिम्मेदार नहीं माना। जबकि इनके कारण ही असल में प्रेम पूर्वक धर्म परिवर्तन हुआ, न कि मुग़लों द्वारा।
इन संतो में सबसे प्रभावशील थे ख्वाजा मईनुद्दीन चिश्ती जो अजमेर में बसे थे। उन्होंने अपने खुल्फा यानी उत्तराधिकारियों को अलग अलग शहर में बसाया जैसे हज़रत कुततुबद्दीन बख्तियार काकी को दिल्ली में, उसके बाद हज़रत गंजशककर और फिर हज़रत निज़ामुद्दीन आदि। ये भारत के कोने कोने में जाकर बसे और ऐसे ही संत पूरी दुनिया में भी जाके बसे।
जबरन धर्मान्तरण और मंदिर ध्वस्त करने का आरोप।
मुस्लिम शासकों पर ये आरोप लगाए जाते है की इन्होंने जबरन धर्म परिवर्तन करवाया और हज़ारों मंदिरों को तुड़वाया। जबकि इस बात में कोई सच्चाई नहीं। मंदिर तोड़ना भी इन शासकों के राजपाट के लिए किसी आत्महत्या से कम नही था। यंही के रिहाइशी मुस्लिम शासकों ने ये काम कभी नही किए। पर ये ज़ुरूर हुआ कि कुछ बाहरी आक्रमणकारी जैसे ग़ज़नवी यंहा आके मंदिरों को तोड़कर और उन्हें लूटके वापस अपने देश चला गया। जिसका कारण स्वतंत्र इतिहासकार ये बताते है कि उस समय सारे।आभूषण और माल मंदिरों में ही इकट्ठा किया जाता था। आज के समय में जनता भी अमीर है और मंदिर भी। पर उस समय अधिकतर जनता गरीब होती थी और मंदिर आज से भी अधिक मालामाल। यही कारण की आज जब भी किसी मंदिर का सदियों पुराना खजाना गिना जाता तो वो खरबों रुपए का बैठता है।
ऐसा ज़रूर हुआ कि कभी कभी कुछ मंदिरों को शासकों द्वारा तोड़ा गया जिसका कारण ये पता लगता है कि उन जगह का शासक के विरूद्ध षड्यंत्र और विद्रोह करने के लिए अराजक तत्वों ने प्रयोग किया था। यही वजह थी कि उस समय ऐसे मंदिर तोड़ने का विरोध नहीं हुआ क्योंकि जनता जानती थी इसका कारण मंदिर जैसे पवित्र जगह का गलत इस्तेमाल करना था। इसी कारणवश कुछ मस्जिदों को भी तोड़ा गया था। कभी कभी इतिहास से ये भी पता लगता है कि हिन्दू शासक भी अपने दुश्मन की बनाई इमारते या मंदिर जीत के बाद तोड़ देते थे जिसका कारण दुश्मन को नीचा दिखाना होता था। शिवाजी महाराज ने भी एक बार इसी कारण एक मंदिर तुड़वाया था। हो सकता है अपवाद स्वरूप दो चार केस ऐसे रहे हो जब किसी मुसलामन शासक या कुछ कट्टर मुस्लिम ने कोई मंदिर तोड़ा हो धार्मिक कारणों से पर ऐसे जाहिल लोगों के कारण पूरे समुदाय को दोषी नहीं ठहराया जा सकता।
औरंगेज़ब और टीपू सुल्तान।
सबसे अधिक औरंगज़ेब और टीपू सुल्तान पर मंदिर तोड़ने के आरोप लगाए जाते है जबकि स्वतंत्र इतिहासकार और दस्तावेज़ों से ये पता लगता है कि इन्होंने हज़ारों मंदिरों को जागीरें और दान दिया था जिसका बड़ा कारण वही राजपाट चलाना था। मंदिर बनवाने वाले कभी मंदिर नहीं तोड़ सकते। बाबर की बेटे को लिखी वसीयत में समझाया था कि धार्मिक ज़बरदस्ती से बचना। टीपू सुल्तान की अंगूठी पर राम का नाम लिखा होता था। औरंगज़ेब का 50 साल का शक्तिशाली राज था जिसमे ज़बरदस्ती करता तो गैर मुसलमानों और मंदिरों की इतनी संख्या आज नहीं होती।
नंदादेवी का मेला रामनगर, उत्तर प्रदेश में लगता है जिसमें मंदिर की जागीर औरंगज़ेब द्वारा दिए जाने के दस्तावेज दिखाए जाते है। चित्रकूट के मंदिर के बाहर लिखा हुआ है कि इसे औरंगज़ेब ने बनवाया है। BN पांडेय जो गवर्नर और इतिहासकार रहे है, उन्होने अपनी किताब में 300 से ज़्यादा ऐसे मंदिरों की लिस्ट दी है जिसमें उन्हें जागीरें दी गयी है। इस लिस्ट में ऊपर बताए गए दोनों मंदिरों का ज़िक्र नहीं है। हो सकता है और भी मंदिर हो जो इस लिस्ट में नोट न हो पाए हो। औरंगज़ेब और टीपू द्वारा मदद किये गए मंदिरों की खबरें निचे लिंक पर पढ़िए।
Links
https://m.timesofindia.com/india/Aurangzeb-gave-temples-grants-land-Historian/articleshow/48940506.cms#:~:text=He%20said%20that%20several%20temples,committee%20headed%20by%20Justice%20Sapru.
https://www.nationalheraldindia.com/india/mathuras-daoji-temple-where-aurangazeb-donated-revenues-of-five-temples
https://scroll.in/article/829943/what-aurangzeb-did-to-preserve-hindu-temples-and-protect-non-muslim-religious-leaders
https://theprint.in/features/aurangzeb-protected-more-hindu-temples-than-he-destroyed-says-historian-audrey-truschke/95145/
https://amp.scroll.in/article/821075/that-awkward-moment-tipu-sultan-restored-a-hindu-temple-that-the-marathas-sacked
https://m.economictimes.com/magazines/panache/the-temple-that-saved-tipu-sultan-was-built-when-wadiyars-bought-bengaluru-in-1690/amp_articleshow/58628037.cms
https://archive.siasat.com/news/more-156-temples-used-receive-annual-grants-tippu-sultan-his-army-was-largely-composed-shudras-844813/
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