Friday, 30 April 2021

इस्लाम के मुख़ालिफ़ या दुश्मन की मौत को अबु जहल समझ कर हंसी उड़ाना।


लोगो को यही नहीं पता कि अबु जहल और एक आम इस्लाम के मुख़ालिफ़ या दुश्मन में क्या फर्क है। इसका सबसे बड़ा फर्क नहीं जानना मुसलमानों की कम इल्मी और कहिलियात में छुपा हुआ है।

अबु जहल को हमारे नबी ने दावत पेश की थी।
अबु जहल नबी का आला किरदार देख चुका था।
अबु जहल क़ुरान का पैगाम सुन चुका था।
अबु जहल इस्लाम की सच्चाई जान चुका था।
अबु जहल अल्लाह को वाहिद हक मान चुका था।
अब जहल के दिलो दिमाग पर अल्लाह, इस्लाम और नबी का फरमान हक़ साबित हो चुका था।

पर इसके बावजूद उसने अपनी अना, आन, बान, शान और दुनयावी फायदों आदि के मद्देनजर हक़ का इनकार किया, खुद को हक का दुश्मन ज़ाहिर किया और यंहा तक कि उसके खिलाफ दुनिया भर की बड़ी से बड़ी से ज़्यादतियां की। 

नबी की दावत की शिद्दत, शुद्धता और ऑथरोटी और अन्य मुसलमानों की दावत में ज़मीन आसमान का फर्क है। अल्लाह का पैगम्बर दावत दे और उनका कोई समकालीन व्यक्ति उसको ठुकरा दे बल्कि उल्टा हक़ के ख़िलाफ़ जी जान से लड़ाई छेड़ दे। ये बहुत बड़ी गुमराही और हक का जानभूझ कर इनकार है। 

यही वजह थी कि उसके कुफ्र की अल्लाह ने तस्दीक की और नबी और सहाबा को इसे वाज़ेह किया गया। यही वजह थी उसे क़यामत तक मुसलमानों के लिए एक निशानी बना दिया गया।

पर अब वो मुसलमान सामने आए जो सरदाना को ये सारी दावत उसके दिलो दिमाग के लेवल पर जाकर दे चुका हो। अगर किसी ने नहीं दी तो तुम्हे कोई हक नहीं उसकी तुलना उससे से करने की जिसे अल्लाह ने काफिर ठहराया हो। 

किसी को काफिर घोषित करने का हक़ सिर्फ और सिर्फ अल्लाह को है। हमारे नबी ने कभी किसी को काफिर नहीं पुकारा। काफिर का अर्थ गैर मुसलमान नहीं होता। बल्कि हक को भली भांति जान कर और मान कर ठुकराने वाला काफिर होता है। और इस दिलो दिमागी डिनायल को सिर्फ अल्लाह ही जानता है। क़ुरान काफिर की 3 व्याख्या करता है जिसमे से 2 खुद मुसलमानों की तरफ भी आती है।

अगर कोई इस्लाम का खुला दुश्मन था तो उसकी मौत पर अफसोस न करे या दुख न प्रकट करे तो अच्छा है। खुशी जाहिर करना चाहे तो उसकी भी इजाज़त है। पर चिढ़ाने के लिए खूशी ज़ाहिर करना या जश्न मनाना सही नहीं जबकि दूसरी क़ौम आपको देख रही हो जिसका आप पर मुख्य इलजाम ही यही हो कि मुसलमान कट्टर होते है और गैर मुसलमानों से नफरत करते है। पर हम तो यंहा तो उल्टा ऐसी मौत पर खुले आम बढ़ चढ़ कर मज़ाक उड़ाया और जश्न मनाया जा रहा है। जबकि आप उसकी मौत पर खमोश भी तो रह सकते है। कोई बहुत बुरा आदमी मर जाए तो उसके बुरे कर्मों की आलोचना की जानी चाहिए, मरने वाले दिन भी कर सकते है ताकि वो उसके जैसे दूसरे लोगों के लिए एक सबक बने पर ये काम सलीके से होना चाहिए। ये काम हसीं उड़ाते या चिढ़ाते हुए कभी नही किया जा सकता। वैसे भी हंसी ठिठोली और चिढ़ाने से दूसरों में सुधार नहीं बल्कि और ढीढता आती है।

हिंदू मृतक शरीर को मुसलमानों द्वारा मुखाग्नि देना।


गैर मुस्लिमों के मृत शरीर को न जलाने के लिए दो हदीसें पेश की जाती है। दोनों हज़रत अली के वाकये है। एक में हुज़ूर द्वारा दी जानदारों को न जलाने की हिदायत है और दूसरी ह. अबु तालिब के कफन दफन के वक्त की है की जब हुज़ूर ने उन्हें दफनाने के लिए कहा था।

1. पहली हदीस के वाकये में हज़रत अली कुछ सरकाशों को जला के मार देने की सज़ा देते है। जिसके बाद एक सहाबा ह. अली को बताते है कि नबी ने किसी जानदार को जलाके आज़ाब देने को मना फरमाया था, जिस पर ह. अली ने अफसोस जताते हुए कहा कि काश मुझे ये बात पहले पता चल जाती तो मैं कतई ऐसा न करता। पहली बात इस हदीस में आज़ाब के तौर जलाने पर या किसी ज़िंदा जान को जलाने को मना किया गया है। क्योंकि ज़िंदा को जला के आज़ाब देने का हक़ सिर्फ अल्लाह को हे। इस हदीस का ताल्लुक मुर्दा जलाने से नहीं है।

2.
दूसरी हदीस में रसूलुल्लाह सल्ल. फरमाते है कि ह. अबु तालिब को दफनाया जाए। इससे उलेमा ये परिणाम निकालते है कि गैर ईमान वालों को।भी दफनाना जाएगा। पर सच बात ये है कि हज़रत अबु तालिब को दफनाया ही जाना था। वो अरब में थे और अरब में रसूलुल्लाह से पहले से ही दफनाने की रस्म चली आ रही थी (आदम अलैह. से). अबू तालिब को शिया लोग, मुस्लिम मानते है। शिया मानते है कि उनका खात्मा इमाम पर हुआ था। भले ही सुन्नी न माने। मुमकिन है भले ही बहुत कम ही सही की वो ईमान लाये थे। अगर इसमे ज़रा भी सच्चाई है तो अबु तालिब की ज़िंदगी और दफनाना इस पसमंज़र में भी एक बार देखना चाहिए। हालांकि अबू तालिब के कलमा पढ़ने के कोई सबूत नहीं मिलते पर मौत तक उनके मुश्रिक होने के भी सबूत नहीं मिलते। क़ुरान बताता है कि ईमान बातिन में भी होता और है जाहिर में भी। अबू तालिब ने अपने बेटे हज़रत अली को हुज़ूर की खिदमत में दे दिया था और नबी से इतनी मुहब्बत करते थे कि अपने वक़्त की बड़ी से बड़ी ताकतों और दबावों के बावजूद नबी के रक्षक रहे, ऐसे अमाल उनके ईमान के बारे में सोचने पर मजबूर करते है। यंहा उनकी मौत के वक़्त के माहौल पर नज़र डालनी चाहिए। उनके आखिरी वक्त में नबी ने उनसे तौबा करने और कलमा पढ़ने को कहा था। मक्का से सभी ताक़तवर जैसे अबु जहल उस वक़्त वंही मौजूद थे और वो बार बार दबाव उन पर डाल कर कहते रहे कि क्या तुम मरने से पहले अपने बड़ो का, अबू मुत्तलिब का दीन छोड़ दोगे। जिसपर अबू तालिब ने कहा कि नहीं। उस वक़्त के माहौल का अंदाज़ा लगया जा सकता है की क्या टेंसड सिचुएशन रही होगी।

3.
तीसरी बात, ये सच है कि अबु तालिब का जनाज़ा नहीं पढ़ाया गया था। पर उसी साल फौत हुई हज़रत ख़दीजा का जनाज़ा भी नहीं पढ़ाया गया था। क्योंकि उस वक़्त तक नामज़े जनाज़ा पढ़ने के अहकाम नाज़िल नही हुए थे। इसलिए अबु तालिब का सिर्फ जनाज़ा न पढ़ाये जाने से ये परिणाम नहीं निकाला जा सकता कि वो गैर ईमान वाले ही थे।

4.
अक्सर ये बात कही जाती है कि कुछ जंगों में मुसलमान ने कुफ्फरों - मुशरिकों को लाशें भी खुद दफनाई है जैसे बदर और उहद में। फिर हिन्दुओ की अर्थी और किर्याक्रम करने में क्या रुकावट है।

5. हमारे नबी तो गैर मुसलमानों के जनाज़े को देख कर अदब में खड़ा हो जाया करते थे और कहते थे कि ये भी एक इंसान ही तो था।

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मुस्लिम मृतक को जलाया नहीं जा सकता। गैर मुस्लिम मृतक को दफनाया भी जा सकता है बशर्त अगर आप किसी जंगल
या बियाबान में रहते हो जंहा कोई समाज ही नही है जिसको इस पर आपत्ति हो। इसलिए इसकी संभावना तो न के बराबर है। अगर गैर मुस्लिम अपने शव को दफनाने की वसीयत करके गया है तब तो हर स्तिथि में उसे दफनाया ही जाना चाहिए।
और अगर गैर मुस्लिम वसीयत करके गया है कि उसे जलाया जाय तो उसे जलाया ही जायगा भले ही वो मुस्लिमों के बीच मरा हो। अगर मरने वाला हिन्दू है और वसीयत न भी करें कि मरने के बाद उसे जलाना है तो भी उसे जलाया ही जायगा बशर्ते उसने मरने तक अपना धर्म या परम्पराओं को नहीं छोड़ी था। क्योंकि यही इंसानियत का फर्ज और सामाजिक नियमो का तकाज़ा की ज़िंदा रहते हुए जिस व्यक्ति की जी मान्यताएं थी उन मान्यताओं का उसके मरने के बाद भी ध्यान में रखा जाएगा, जब तक की वो इसके उलट कुछ कह के न गया हो या कुछ और मसलिहत पैदा न हो जाए।

मुझे सीधे तौर पर गैरो के मुर्दे न जलाए जाने की हिदायत करने वाली कोई हदीस या आयात नहीं मिली। और न ही कोई आलीम कोई सीधा रेफरेन्स देता है जंहा ऐसा करने को मना किया गया हो। सभी डेडयूस करते है अलग अलग रिवायतों से जो इसके मुतालिक असलन है ही नहीं। डायरेक्ट, क्लियर या रिलेटेड कोई रिवायत नहीं मिलती।

चिता को आग देने का प्रथम अधिकार रिश्तेदार का है। अगर शमशान में मृतक का कोई गैर मुस्लिम करीबी, परिचित मौजूद है तो उसे ही अग्नि देनी चाहिए। या डोम राजा जो लावारिसों को अग्नि देता है, वो भी दे सकता है। पर एक मुसलमान भी हिन्दू भाइयो के पार्थिव शरीर को अग्नि दे सकता है अगर ऐसी मसलिहत पैदा हो जाये कि आपको ये करना पड़े, वो भी कोरोना जैसे आपदा काल में और मुसलमानों पर जारी आज़ाब के बीच में।  भारत एक हिन्दू बहुल देश है और यंहा ऐसे वाकये बिल्कुक पेश आ सकते है जब आपको ऐसा करना पड़ जाए। हालांकि मुस्लिम मुखाग्नि न दे यानी आग न लगाये तो बेहतर है पर मजबूरी हो तो आग दे सकते है। 

मृतक के अंतिम संस्कार का इंतज़ाम करना और उन्हें परफॉर्म करना आदि जैसे लकड़ी घी आदि लाना, अर्थी को कांधा देना, मटकी लेके अर्थी के आगे चलने आदि में तो कंही से कंही तक कोई दिक्कत ही नहीं है। यंहा तक कि राम नाम सत्य भी बोल सकते है क्योंकि अर्थी में लिया जाने वाला राम का नाम, श्रीरामचंद्र का नहीं बल्कि ईश्वर का नाम है, पर ये बात अगर बोलने वालों को मालूम हो तो।

एक सत्य ये भी है कि सनातन धर्म मे मृतक के शरीर को पार्थिव शरीर कहते है और पार्थिव का अर्थ होता है पृथ्वी से सम्बंधित यानी भूमि से संबंधित। ये नाम यही बताता है कि शायद कभी सनातन धर्म में भी दफनाने की प्रक्रिया रही होगी। सिंधु घाटी सभ्यता में जलाने और दफनाने दोनों की परम्पराएं थी और वंहा निकली बहुत सी कब्रो की पोजीशन और मुर्दे की गर्दन का रुख क़ाबा के मुताबिक ही पाई गई है जैसा मुसलमान दफनाते है।  सनातन धर्म मे आज भी छोटे बच्चों की मृत्यु होने के बाद उन्हें जलाया नहीं जाता बल्कि दफनाया जाता है। बड़े साधु- संतो को भी दफना के समाधि दी जाती है। यंहा तक कि हमने कोरोना की दूसरी वेव में देख चुके है कि हिन्दुओ बहुत से कारणों के तहत अपने परिचितों को दफनाया भी है। विज्ञान के आधार पर हम आज जानते है कि जलाने से वातावरण प्रकति (वायु, पेड़ आदि) को नुकसान होता है जबकि दफनाने से मिट्टी उपजाऊ होती है और कीड़े आदि को भोजन भी मिलता है।

ये कुछ तथ्य है जिन्हें आप परखिये। समझ आये तो मानिए नहीं तो आप की मर्ज़ी जैसा दिल कहे वैसा करिए। आप को मानने न मानने की पूरी आजादी है.

Tuesday, 27 April 2021

गैर मुसलमानों से दोस्ती और उनके तौर तरीके अपनाना।


1.
क़ुरान कहता है:-
ऐ नबी तुम कहो कि एकसमान बातों पर इकठ्ठा हो जाओ।
तुम्हारे पर जो भेजा गया उस पर ईमान रखते है और ...(कई नबियों के नाम) पर भेजा गया उस पर भी ईमान रखते है। फिर क्यों हम से बुग्ज़ रखते हो।
जो तुम पर भेजा गया और जो हम पर किताब भेजी गई, उस पर ईमान लाते है। 

2.
दुसरो की मुशाबिहत करने वाली हदीस जंग के माहौल और पसमंज़र में है।
 
"इब्न उमर रज़ी अल्लाहु अन्हु फरमाते हैं कि रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फरमाया : मैं तलवार के साथ मब'ऊस किया गया हूं यहां तक कि अल्लाह वहदहू - ला - शरीक की इबादत की जाए , मेरा रिज़्क मेरे नेज़े के साए में रख दिया गया है जिसने मेरी मुख़ालिफ़त की अल्लाह ने ज़िल्लत और रुसवाई उसके हक़ में लिख दी है और जो जिस कौम की मुशाबहत इख़्तियार करेगा वो उनमें से होगा।" 
(मुसनद अहमद, मुसन्नफ़ इब्न अबी शैबा)
 

3.
हातिब बिन अबी बलताह को शाहे मिस्र मुकौसिस के पास भेजा नबी का पैग़ाम लेके। उसने पढ़ा और कहा कि हम अपना दीन कैसे छोड़ दे। हातिब ने कहा जैसे मूसा के बाद इसा आये तो तुम उनकी दावत देते हो, इसी तरह ईसा के बाद आये मुहम्मद सल्ल की तुम्हे दावत देते है। हम तुम्हे ईसा के दीन पे चलने से कंहा मना कर रहे है बल्कि उसी दीन कि तालीम देने आए है। (अल रहिकुल मख्तूम)

4.
मुसलमानों ने मिस्र की राजधानी को घेर रखा था। मुसलमानों को मुखबिरों ने बताया कि ये मिस्री इस्लाम अपनाना चाहते है पर डरते है कि अरबी बद्दुओं की तरह रहना पड़ेगा, कबिलाई लोग हुकूमत करँगे, उनकी संस्कृति बर्बाद हो जायेगी।
मुसलमानों ने मिस्रियों को दावत पर बुलाया। वंहा मिस्री कपड़े पहने, मिस्री खाना बनवाया, बावर्चियों को मिस्री लिबास पहनवाया, मिस्री आदाब इस्तेमाल किए यानी सब कुछ मिस्री संस्कृति में किया। वो चौंक गए। मुसलमानों ने तकरीर में कहा कि तुम हमें अपने बीच ऐसा ही पाओगे जैसा देख रहे हो, सेहरा में ऐसा पाओगे जैसा सुनते हो और जंग में ऐसे पाओगे जैसा पाया या आज़माया है। (ये वाकया या तो हज़रत उमर का है या हज़रत खालिद बिन वालिद का।)

5.
ए रसूल तुम कहो, ए अहले किताब जब तक तुम तौरेत पर ईमान नहीं रखते तुम बेबुनियादी हो (यानी उस वक़्त ये किताबे सही सलामत थी).  ये बात हदीसों में नहीं मिलती की लोगों को कहा, आखिर क़ुरान में है तो ज़रूर कहा होगा। बादशाहों को खुतूत में तो इसका एक हिस्सा मिलता है पर ये बात 50-100 हदीसो में तो होनी चाहिए थी न।

6.
यहूदी के रास्ता रोकने पर उसका रास्ता तंग कर दो कहने वाली हदीसे मिलती है।
जैसे जनाज़ा दफनाने तक न बैठने का रिवाज था। यहूदी ने ये देखकर कहा कि हमारे यंहा भी ऐसा ही होता है। तभी नबी जल्दी से बैठ गए और कहा इसकी मुख़ालफ़त करो।

7.
कितने लोग नबी की तरह पठ्ठे वाले बाल रखते है। कुर्ता पजामा,शेरवानी उन्होंने पहना ही नहीं। शेरवानी तो हिंदुस्तानी राजपूतों का पहनावा था। टाई 18वीं सदी में  फ्रांस से शुरू हुई। पादरियों के वेशभूषा में टाई है ही नहीं और न ही ईसाई इसे सलीब की निशानी मानते है, पर मुसलामन मानता है।

8.
क़ुरान हमें उनसे दोस्ती करने को मना नहीं करता जिन्होंने तुमसे दीन के कारण जंग न की और न ही तुम्हे घर से निकला।

9.
अल्लाह ने हुबेदिया से वापस जाने को कहा क्योंकि खुफिया ईमान वाले तबाह हो जाते। क्योंकि वो मजबूरन लड़ने खड़े हो जाते पर हाथ न उठाते और इस तरह मारे जाते। उन्हें पहचान नहीं पाते। लिबास वैगरह एक जैसा था मुसलामन और गैर मुसलमानों का।

10.
मुसलमानों को हकुम दिया गया कि जंग में सलाम का जवाब देने वाले को मुसलमान मान लेना।

11.
सहाबियों ने ह. अब्दुल्लाह इब्ने मसूद का हुलिया बताया (पीछे से देखा) जब वो तवाफ़ कर रहे थे कि उनकी चोटी थी (किताब फ़िकह अस सुन्नाह)।
 
12.
हदीस में आता है कि ईसा अलैह जब वापस आयंगे तो भगवा रंग का ऊपरी कपड़ा पहने होंगे।

13.
नबी ने अपने पहनने आदि की तौर तरीक़े नबी बनने के बाद बदले नही। वैसे ही रहे जैसे बाकी अरबी पहले से ही रह रहे थे।
 
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गैरों को दोस्त न बनाओ
 

कुरान (5.51) यहूद ईसाइयों को दोस्त न बनाओ (अवलिया लफ़्ज़ का मतलब दोस्तकर रखा है).

कुरान (60.8) अल्लाह नहीं रोकता कि तुम उनके साथ अच्छा व्यवहार और न्याय करो, जिन्होंने तुमसे धर्म के मामले में युद्ध नहीं किया और न तुम्हारे घरों से निकाला।

कुरान (4.82) यह कुरान किसी और की तरफ़ से आता तो उसमें बड़ा इख्तेलाफ़ पाते.

कुरान (22:40) ये वे लोग हैं जो अपने घरों से नाहक़ निकाले गए, केवल इसलिए कि वे कहते हैं कि "हमारा रब अल्लाह है।" यदि अल्लाह लोगों को एक-दूसरे के द्वारा हटाता न रहता तो मठ और गिरजा और यहूदी प्रार्थना भवन और मस्जिदें, जिनमें अल्लाह का अधिक नाम लिया जाता है, सब ढा दी जातीं। (कुरान कहता है कि अगर ताकत मिल जाए तो भी दूसरों की इबादतगाहें नहीं तोड़ोगे. )

 
आम तरजुमों से चले तो आयतें एक दूसरे के against लगती हैतो इसका मतलब यंहा अवलिया लफ़्ज़ का मतलब गार्जियन, कसटोडियन है।

Tirmidhi (1602) Messenger of Allah (ﷺ) said: "Do not precede the Jews and the Christians with the Salam. And if one you meets one of them in the path, then force him to its narrow portion."[He said:] There are narrations on this topic from Ibn 'Umar, Anas, and Abu Basrah Al-Ghifari the Companion of the Prophet (ﷺ).[Abu 'Eisa said:] This Hadith is Hasan Sahih. And regarding the meaning of this Hadith: "Do not precede the Jews and the Christians": Some of the poeple of knowledge said that it only means that it is disliked because it would be honoring them, and the Muslims were ordered to humiliate them. For this reason, when one of them is met on the path, then the path is not yielded for him, because doing so would amount to honoring them.

Saturday, 24 April 2021

विभिन्न मान्यतों पर अंतर्धार्मिक चर्चा (तुलनात्मक धर्म दर्शन)

 
 
Wahdat-e-Deen (only one religion leads to salvation).
 
Wahdat-e-Adyan (all religions are equal). 
 
Wahdat al-Wujūd (Unity of Being: Only one real existence; Al-Wujūd al-Ḥaqq is Allah) Associated with Ibn Arabi (d. 1240)
 
Wahdat al-Shuhūd (Unity of Witnessing: Allah and creation are ontologically distinct) Associated with: Shaykh Aḥmad Sirhindī (Mujaddid Alf-Thānī)


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निष्काम योग या कर्मयोग - गीता में वर्णित एक योग जो कर्मों को बिना किसी फल की इच्छा या आसक्ति के, केवल अपने कर्तव्य के रूप में करने की शिक्षा देता है।

 
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अन्ति सन्तं न जहात्यन्ति सन्तं न पश्यति। देवस्य पश्य काव्यं न ममार न जीर्यति ॥
परमात्मा के वेदरूपी काव्य न कभी मरता है और न कभी पुराना होता है।
[अथर्ववेद 10:8:32]

जब तक धरती और आकाश समाप्त नहीं हो जाते, (ईश्वर के) कानून का एक एक शब्द और एक एक अक्षर बना रहेगा, वह तब तक बना रहेगा जब तक वह पूरा नहीं हो जाता।
[बाइबिल: मैथ्यू: 5:18]

बेशक हम ही ने क़ुरान नाज़िल किया और हम ही तो उसके निगेहबान भी हैं.
[क़ुरान 15:9]
 
 
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तदेतत्त्रयँ शिक्षेद् दमं दानं दयामिति।
Learn three cardinal virtues — self control, charity and compassion for all life.
इसलिए व्यक्ति को तीन गुण सीखने चाहिए - आत्म संयम, दान और करुणा।
[बृहदारण्यक उपनिषद 5:2:4]

They are those who donate in prosperity and adversity (charity), control their anger and pardon others (self control). And Allah loves the good-doers (compassion).
ये वो हैं जो समृद्धि और विपत्ति में दान करते हैं, अपने क्रोध पर नियंत्रण रखते हैं और दूसरों को क्षमा कर देते हैं। और ईश्वर भलाई करने वालों को पसन्द करता है।
[क़ुरान: 3:134]
 
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 2.26: अल्लाह नहीं शरमाता कि मिसाल पेश करे, चाहे मच्छर हो, बल्कि उससे भी बढ़कर किसी तुच्छ चीज की।
[मच्छर 11L, इंसान 5L, सांप  50K -biggest killer, मच्छर से बीमारियाँ अलग। virus bacteria, parasites जैसी दूसरी हकीर और छोटी चीजों के बारे में आज हम जानते हैं जो और खतरनाक साबित हो सकते है।]

Bible: Mat.  23:24: ओ अंधे रहनुमाओं तुम मच्छर तो छानते हो मगर ऊंट निगल जाते हो।
[ईसा कहते थे, दाड़ी  में थोड़ा से बदलाव पर हराम के फतवे, और इतने गुनाह, अन्याय हो रहे हैं, उन्हे नहीं टोकते]
 
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ऋत: 
 
निर्गुण ब्रह्म (अद्वैतवाद वेदांत) - वह एक, निराकार, अनादि, अनन्त, सर्व्यापक, अवर्णीय, अवताररहित, मूर्तिरहित, गुणरहित और माया से परे है। वह त्रिगुणरहित यानी समय, स्पेस, माया और 5 इंद्रियां रहित है। वह कण कण में। माया न सत्य है न असत्य बल्कि मिथ्या (इलुज़न) है। 


सगुण ब्रह्म - जब ब्रह्मन माया के द्वारा कार्य करता है यानी निर्माण, संचालन, संहार तो सगुण कहलाता है यानी ईश्वर।  आकर और अवतारवाद को पूजना। ईश्वर शरीरधारी है तो वो सर्वव्यापक कैसे होगा? ईश्वर ने अवतार लिया तो वो माययुक्त हो जाएगा न?

निर्गुण = बिना किसी गुण, रूप, आकार, सीमा के

सगुण = गुणों, नाम और रूप सहित.

निर्गुण ब्रह्म सत्य का निरपेक्ष स्वरूप है, सगुण ब्रह्म उसी सत्य का सापेक्ष, उपास्य और सृष्टिकर्ता रूप।

अद्वैत वेदान्त में निर्गुण ब्रह्म ही परम सत्य है, विशिष्टाद्वैत में सगुण ब्रह्म ही परम सत्य है, द्वैत में सगुण ईश्वर (विष्णु) परम सत्य है. 

3 तत्व - ब्रह्म (ईश्वर), चित (आत्मा), अचित (प्रकृति)
5 तत्व - धरती वायु जल आकाश अग्नि।
3 गुण - सत्व (सत्त्व), रज (चंचलता), तामस (तम)

सत्व, रज और तम (त्रिगुण), सत्व शुद्धता, ज्ञान और शांति का प्रतीक है, रजस क्रियाशीलता, जुनून और इच्छाओं को दर्शाता है, और तमस जड़ता, अज्ञानता और अंधकार का प्रतिनिधित्व करता है, जिससे व्यक्ति को मुक्ति पाने के लिए सत्व गुण को विकसित करने का प्रयास करना चाहिए. इन्हें आज इलेक्ट्रान, प्रोटोन, न्यूट्रॉन भी बताया जाता है.

सत्त्व (प्रकाश, ज्ञान: परिणाम:मुक्ति)), रजस (क्रिया, कर्म, आसक्ति, गति: परिणाम बंधन )तमस (जड़ता, अज्ञानता, अन्धकार: परिणाम पतन) — इन्हें त्रिगुण कहा जाता है। ये प्रकृति (मनुष्य) के मूल गुण हैं, जिनसे मन, स्वभाव, कर्म, संसार संचालित होता है।
 
सत्वगुण मनुष्य में सुख पैदा करता है. रजसगुण (परिवर्तनशील) दुःख पैदा करता है. तमोगुण (अंधकार) उदासीनता पैदा करता है. 
 
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गुणाणात्मक, गुणवाचक, एट्रिब्यूटिव, अडजेक्टिव, उपमा।
अलेगोरिकल, मेटाफोरिकल, तमसीली, अलंकृत, गूढ़, रूपक।
 
Religions Color and Symbol

Sikh : Navy blue or Kesari (lighter than bhagwa).
Christian: White or Black or Red or Blue.
Yahudi: True Blue .
Parsi: Golden or light Yellow or light Black or dark Grey.

Sikh:  Basanti Nishane Sahib (flag) and Khanda (sword)
Parsi: Faravahar (man with wings) and Atar (fire).
Jain: परस्परोपग्रहोजीवानाम्
 
 
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4 ब्रह्मसूत्र: 

एकम ब्रह्म द्वितीय नास्ति। 

ब्रह्म जगदोद्भव कारणम। 

ब्रह्म सत्य जगतं मितथ्या। 

अहम ब्रह्मास्मि। 


अहं ब्रह्म अस्मि – मैं ब्रह्म हूँ। (आदि शंकराचार्य)
अयम् आत्मा ब्रह्म – अपना स्वंम ब्रह्म है।
सर्वं खल्विदं ब्रह्म – यह सब ब्रह्म है।
एकमेवाद्वितीयम् – वह ब्रह्म बिना किसी दूजे के है।
तत्त्वमसि – तुम वह (ब्रह्म) हो।  
प्रज्ञानं ब्रह्म – प्रज्ञता (बुद्धिमत्ता) ब्रह्म है।

एकम सत जगत मिथ्या या वहदतुल वजूद - एक ही वजूद है यानी असत से सत की उत्पत्ति।

अनल हक़- मैं हक़ हूँ।
हमाऔसत - सब वही है।


शून्यवाद - संसार शून्य है और सभी पदार्थ सत्ताहीन है।

नेति नेति न यह, न वह (यह नहीं, वह नहीं.)
 
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विवेकानंद : इस्लाम तलवार से नही। वेदांत आत्मा, इस्लाम शरीरी।

गांधी ने भी माना कि इस्लाम तलवार से नहीं फैला।

दयानंद,विवेक,राहुल,राधा,श्रीराम,नानक,अग्निवेश - अवतार
गांधी,विवेक,कबीर,नानक,ओशो,प्रमोद,लक्ष्मी - इस्लाम
चाणक कबीर रैदास दयानंद विवेक राधा टैगोर गांधी - मूर्ति विरोधी

यूनान,बुद्धों(नेहरू),जैन(दयानंद)से आयी
ग्रीस से जैनी फिर बुद्ध मूर्ति चालू


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मत्स्यपुराण में ब्रह्मा के द्वारा अपने शरीरी से स्त्री पुरुष बनाने का ज़िर्क है।
ब्रह्मा शब्द आदम के लिए इस्तेमाल हुआ है हरिवंश पुराण में।
आदिम यानी प्रथम शब्द से आदि बना फिर आदम और एडम।
हव्वा मतलब जीवन है और शतरूपा का अर्थ है सौ रूपों वाली।
मनु का उल्लेख मत्स्य, मार्कण्डेय पुराण और महाभरत में है।
परंपराओं में मनु को महानु भी कहा गया है यानी महान नूह। 
भविष्य पुराण में न्यूह कहा गया है। नु यानी नौका। नु से मनु बना। और मनु से नूह।
 
 
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मंदिर द्वार पूर्व में, कब्रे उत्तर दक्षिण में.
वेदों में इलास्पद नाभा पथ्वी का उल्लेख है, क़ुरान की तरह कोड मैच करता है। 
वेदों में बिगबैंग का उल्लेख कहा जाता है। 
मनुस्मृति में अंडे से ब्रह्मा के जन्म का उल्लेख है।
ब्रह्मा द्वारा अपने शरीरी से स्त्री बनाने का ज़िर्क है।

1920 से पहले के सारे मन्दिरों (हनुमान मंदिर छोड़ के) की  दिशा पश्चिम की तरफ होता है। मूर्तियों का मुंह पूर्व की और होता था यानी गर्भगृह की और अपना मुंह करने के लिए आपको पश्चिम की और देखना पड़ेगा। 

सिंधु घाटी सभ्यता में कब्रों में मुर्दो के रुख और गर्दन इस्लामिक तौर तरीकों से मेल खाते है।

भारतखण्ड में मुर्दे को दफनाने की बजाए गाड़ने के पीछे शायद कभी ये तर्क रहा हो की ये हमेशा से ही वनों से भरा इलाका रहा है सो यंहा जीवन आसनी से जीने के लिए सपाट धरती की आवश्यकता पड़ती थी। पहले से ही ज़मीन उपजाऊ होने के कारण पेड़ों की बहुलता होने से, उन्हें काट कर अपने जीवन को और वातावरण को आसान और सुविधाजनक बनान आवश्यक होता था। इसलिए मुर्दो को लकड़ी से जलाना शुरू हुआ। ये सिर्फ अनुमान है।


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Ask Iskcon
पाणिनि. श्रीराम . विवेकानद. बाली गीता
विष्णु के ही.  भारत मे ही. विदेशी क़ौम. बुद्ध
देश काल. तुच्छ जीवन. ओशो सत्यसाईं
युग. फैक्ट्री. दीवाली मिठाई
न देवो मृचला माया.  ईश्वर सर्व भूतानाम. ज़रा.ओम का जप
संध्या. अनुगीता पर्व.  गोपियाँ
Vivekannd said Geeta was not known much until Shankracharya wrote on commentary on it.
Geeta press contributed in its prevalence.
700 Shlok not possible in War. 
70 Shloki Gita

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वेद में भारत शब्द नहीं आया। सिर्फ एक जगह आय है वंहा भी उसका अर्थ देश से नहीं है बल्कि एक ट्राइब का नाम है। सनातन धर्म शब्द भी वेदों में नहीं आया। हिन्दू धर्म शब्द भी कालिका पुराण और सिन्धुस्तान या हिंदुस्थान भविष्य पुराण में आता है। हालांकि 4Cent BC में इंडिका लिखी गई, हिंदुकुश पर्वत, सिंधु नदी, हिन्दा।


गौत्र संस्था उत्तरवैदिक काल से शुरू हुई, वर्ण जन्म आधरित हुए, इंद्र की जगह प्रजापति मुख्य देवता हो गए।
लिंगपूजा का प्रथम स्पष्ट प्रमाण मत्स्यपुराण में मिलता है।
महाभरत के अनुशासनपर्व में भी लिंगपूजा का वर्णन है। 
विष्णु के दशावतार का उल्लेख मत्स्यपुराण में है।
पर्दा प्रथा और वैश्यावर्ती सैंधव सभ्यता के प्रचलित थी।
सिंधुघाटी में जलाने दफनाने दोनों की प्रथा थी। 

पतंजलि ने योग दर्शन में योग के 8 अंग बताए है जिनको अष्टांग योग कहते है जो है, यम, नियम, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, आसन, ध्यान, समाधि।


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जातक में लगबहग 550 कहानियां है।

गौतम बुद्ध के संदेश पाली भाषा में है। बोध धर्म अनिशरवादी, अनात्मवादी है पर कर्मफलवादी है। बौद्ध धर्म के त्रिरत्न है, बुद्ध, धम्म और संघ। बुद्ध ने मध्यम मार्ग, चार आर्यसत्य और अष्टांगिक मार्ग दिया। मैत्रेय और अन्य बुद्ध आने है। जातक में पूर्व बुद्धों की कथाएँ है। 1st सदी AD में यह हीनयान और महायान में बंट गया। पिटक का अर्थ होता है टोकरी।

महायान मूर्तिपूजा करते है और बुद्ध के परलोक में होने में विश्वास करते है।
अमिताभ या अमितायुष एक पारलौकिक बुद्ध है।

छठी सदी में कल्कि अवतार हो चुका था, इसीलिए सातवीं सदी में पहली बार कलि संवत हमें मिलता है. कल्कि अवतार श्रमणों के लिए वह काल बनकर आया. कल्कि पुराण के अनुसार कल्कि अवतार हाथ में चमचमाती हुई तलवार लिए सफेद घोड़े पर सवार होकर श्रमणों ( जैन - बौद्ध ) का नाश करेगा.  जयदेव और चंडीदास ने लिखा है कि कल्कि अवतार हो चुका है. गुणभद्र के अनुसार कल्किराज का जन्म महावीर के निर्वाण के हजार साल बाद होगा. जिनसेन ने " उत्तर पुराण " में लिखा है कि कल्किराज 40 सालों तक शासन करेगा. जैन ग्रंथों के अनुसार कल्किराज का उत्तराधिकारी अजितांजय था 

जैन धर्म के प्रथम तीर्थंकर ऋषभदेव और वर्धमान महावीर स्वामी से पहले पार्श्वनाथ हुए है। 2 तीर्थंकर ऋषभदेव और अरिष्टनेमि (कृष्ण के संबधी माने जाते है) का उल्लेख ऋग्वेद में है। लगभग 300 BC में श्वेताम्बर (श्वेत वस्त्र धारण करने वाले) और दिगाम्बर (नग्न रहने वाले) बन गए।

जैन धर्म के त्रिरत्न है, सम्यक दर्शन, सम्यक ज्ञान और सम्यक आचरण।
ईश्वर की मान्यता नही है पर आत्मा, पुर्नरजन्म और कर्मफल की है। महावीर के संदेश प्राकृत भाषा में है।

जैन धर्म के ग्रंथ है: 12 अंग (14 पूर्व या पर्व सबसे प्राचीन है और इसी का अंग है) , 12 उपांग, 10 परिकरण, 6 छेदसूत्र, 4 मूलसूत्र, 2 सूत्रग्रंथ।
इसके अलावा कल्पसूत्र और भद्रबाहु चरित भी है।

जैनियों में कुछ लोग मर के अधोलोक में जांयगे जो धरती के नीचे है जंहा 7 नरक है। और कुछ उद्धोलोक में जांयगे जो ऊपर की तरफ जंहा 16 स्वर्ग हौ। 


सिखों के आदिग्रंथ में तुलसीदास के दोहे नही हैं। एक तो उनकी विचारधारा सिखधर्म के अनुकूल नहीं थे। दूसरी ये बात साबित करती है कि सिखों हिंदू धर्म के लिए कोई रक्षा या लड़ाई नहीं की।

No among the 10 guru called Him Waheguru. Although the word is written in Guru Granth.

कैथोलिक मूर्तियां बनाते है, प्रोटेस्टेंट नहीं।

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Noah's son Shem. Shem's son is Aram also called Ram.
Shem's descendants is Abraham which is Abram (tribal name meaning One of Ram) or Abrah in Hebrew. 
Abram may mean Descendants of Ram.
Native place of Abram is Aram meaning Land of Ram.
 
 
Socrates from Greece. Greece had several similarly scholars.
Confucius from China. Confucianism has a chain of Saints.
Laozi or Lao Tze or Tzu from China. His book based on Futtsi is TaoTeChing. Taoism Books are Zhuangzi, I Ching, Daozang. Taosim also has a chain of Saints. 
Mani of Manichaeism from Iran. Book are Arzhang & Shabuhragan.
Mandaeism is Sbaeein from Noah. Book is Ginza Rba.
Bahaism.


Australians Aborigine religions or civilizations which are more than 5000 years old, had distorted concept of One God.
Even in Maya civilization specially in Mexico, it's higher priests used to believe in one Supreme Element (Param Tatva) which is the cause of everything, however they worshiped in many deities.

Unitarianism is a Christian sect not believing in Trinity.
Brhamo Samaj is a monotheist sect.

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अम्बिया, पैग़म्बर, नबी, रसूल, ईशदूत, संदेष्टा, संदेशवाहक, प्रोफेट, मैसेंजर,
सूथसेयर,सोइश्यान्त, बुद्ध, तीर्थंकर,
 
 
स्वयंभू, महर्षि मनु, आदिपुरुष, आदिपिता, आदिम, आदम, एडम। Mashya
आदिमाता, माता शत्रुपा, हव्वयवती, हव्वा, ईव, Mashyana.

सातवें मनु, मनु महाराज, महाजल प्लावन वाले मनु, वैवस्त मनु, सप्त ऋषि वाले मनु, नौकाव वाले मनु, न्यूह, नू, Noah, Noak, Nu, सत्यव्रत, Yima Kshaeta, Jameshed, Mithra. 

अबिराम, इब्राहिम, अब्राहम, राम, प्रहलाद, यूसुफ (प्रसंग)।
कृष्णा, मूसा, Moses, कहन (काला)
 ईशा, मसी,  ईसा, मसीह, Jesus.

नराशंस, कल्कि अवतार, महामद, सुश्र्व, कल्किराजा, मैत्री बुद्धा, अंतिम ऋषि, Comfortor, पैराक्लीट, Paraecletus, फ़ारकलीत, स्तवेतएरेता, सोइश्यान्त, Astvast Ereta, Astvat Erat, Soeshyant, वर्कलीतुस, मूनहमन्ना, मूनहामन्ना.
 
 
एक नबी हिन्द में भी है जिनका रंग काला है और नाम कहान है यानी कृष्णा। (कमज़ोर रिवायत) 


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Bible, Gospel, Injil, New Testament.
Old Testament, Torat Torah (law).
Tanakh, Talmud, Exodus, Nevim,
Zabur, Pslams (Bibile has a section called Ketuvim that includes Psalms)
SeferYetzirah, Suhufe Ibrahim, Testament of Ibrahim.
Dasatir (Dastur),  Avesta, Zend (commentary), ZendAvesta (together).
 
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वनस्पति सामान जन्म, यहोवा का बेटा, अल्लाह का तख़्त और हाथ 

जैसे कुरान में सूरह नूह में नूह अल्लाह से कह रहे हैं कि मैंने अपनी कौम को यह बताया था (71 : 14,17) कि उसने तुम्हें विभिन्न अवस्थाओं से गुजारते हुए पैदा किया और तुम्हें जमीन से वनस्पति के समान उगाया। हो सकता है कि कभी सनातन धर्मियों को भी ऐसी ही या यही बात ईश्वर की तरफ से अवतरित हुई हो जिसे उन्होंने लिटरल अर्थों में ले लिया हो और आवागमन की धारणा पैदा हो गई हो। हज़रत नूह को भारतीय कौम की तरफ ही भेजा गया था। इसी तरह बनी इस्राइयल में यह मजहबी टेरमिलोजी थी कि नेक इंसान परमेश्वर के बेटे हैं और बुरे इंसान शैतान के बेटे हैं। ईसाइयों ने इसे लिटरल अर्थों में ले लिया और ईसा को परमेश्वर का बेटा बना दिया।  इसी तरह कुरान में अल्लाह का हाथ और अल्लाह का तख्त कहा गया है। बहुत से मुसलमान ने इसे लफ़ज़ी मायनो में ले लिया और कहा कि उसक हाथ और तख्त हैं मगर कैसा है, पता नहीं।  जबकि ये तमसीली मिसाल है जैसे कामयाबी में हाथ होना, तख्ता पलट होना वगैरह।  
 
 

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दर्शन विज्ञान और ईश्वर

   दर्शनशास्त्र की 3 शाखाएँ हैं:- I. तत्वमीमांसा/ तत्वज्ञान (Metaphysics - beyond physics/theory of reality) [तत्व, अस्तित्व, वास्तविकता का ...