Wednesday, 12 May 2021

ऑनलाइन नमाज़ क्यों जायज़ है।


【Online Salah】


■[ऑनलाइन नमाज़ के जायज़ होने के हक़ में दलीलें]■

कोरोना काल और लॉकडाउन में भीड़ भाड़ में कोरोना फैलने के इमकान बहुत ज़्यादा है, भीड़ इकट्ठा होने पर पाबंदी है और मस्जिदें बंद है। बात दो चार हफ्तों की नहीं है, एक साल से ये पाबंदिया लागू है और आगे भी शायद बहुत लंबी चलने वाली है। ऐसे हालत में जुमा, ईद और तरावीह की नमाज़ बजमात इश्तेमाईयत के साथ कैसे पढ़े? क्या ऐसे ही ये नमाज़े घरों पर सालों तक पढ़ते रहेंगे? क्या इस्लाम के पास इसका कोई हल नहीं? क्या मुसलमान इस पर बेबस हो गए है? जबकि इस्लाम तो हर परेशानी का हल रखता है। हल तो है क्योंकि जब मुश्किलें आती है तो उनके हल भी आते है। ऐसी परेशानी हमेशा आती रहेंगी हमें बस इश्तेहाद से उनका हल ढूंढना है। इस्लाम इसकी पैरवी करता है। ईद और जुमा की नमाज़ को वाजिब माना जाता है जबकि जान की हिफाज़त करना फ़र्ज़ है। इसलिए इसका परेशानी का हल इस्लाम के कानून और दुनिया के कानून के तहत ही निकाला जा सकता है जिससे हमारी इबादतें भी मुक़म्मल हो जाए और हमारी जान की हिफाज़त भी हो जाए।

आवश्यकता अविष्कार की जननी है और अगर वो शरीयतन दुरूस्त भी तो क्या कहने। ऐसे हालत में जुमा, ईद और तरावीह की नमाज़ ऑनलाइन पढ़ी जा सकती है। यानी गैर मामूली हालतों में ये ऑनलाइन नमाज़ जायज़ है।  

जुमा और ईद नमाज़ की बुनियाद ही लोगों की इश्तेमाइयत और खुतबा है, ये न हो तो ये नमाज़ होती ही नहीं है। अगर ये शर्ते पूरी न हो तो जुमा के बदले ज़ोहर पढ़ी जाती है और ईद की नमाज़ के बदले नफिल। लोकडाउन में ऑनलाइन के अलावा ये शर्त कंही पूरी हो ही नहीं सकती। घर पर अकेले ईद या जुमा की नमाज़ नहीं होती है। साल में एक बार आने वाली ईद उल फ़ितर के मौके पर इसकी नमाज़, इसकी इश्तेमाइयत, इसके खुतबे और दुआ को छोड़ना उम्मत के लिए सही नही है, जबकि इन्हें अदा करने के असबाब मौजूद हो जैसे ऑनलाइन नमाज़। ऑनलाइन नमाज़ पढ़िए, खुतबा सुनिए, दुआ कीजिए, उम्मत की इशेतमाईयत का हिस्सा बनिये और ईद के दिन की रूह और जज़्बे को कायम रखिये। अगर पढ़ने के बाद फिर भी दिल न माने तो अपनी अलग से 2 रकात ईद की नफिल एहतियातन पढ़ लीजिए जो आप पहले ही घर पर अकेले पढ़ने की सोच रहे थे। जैसे अक्सर कुछ हनफ़ी हज़रात एहतियातन जुमे के बाद 4 रकअत जोहर भी पढ़ते है।

किसी अच्छी चीज़ को तर्क करने से अच्छा है, एक दर्जे नीचे जा कर उससे फायदा उठा लिया जाए। उसे उसकी असल सूरत में जितना रख सकते है, रखने की कोशिश करें। छोड़ने से अच्छा है जो बदलाव कर सकते हैं, उसकी कोशिश की जाए।

असल शक्ल तो नमाज़ की मस्जिद में ही है। जमात की 3 शर्तों हैं, सफ मिली हुई हो, नमाज़ वाली जगह पर मौजूद होना और इमाम के आदेशों से मुक्तदी जुड़ा होना। मगर किसी वजह से जब इन्हें लागू किया जाना मुमकिन न हो तो इन्हें तर्क किया जा सकता है जैसे हरम में अक्सर होता है।

मुस्लिम देशों या इलाकों में तो मस्जिदें चप्पे चप्पे पर होती है। मगर गैर मुल्कों या गैर इलाकों में मस्जिद दूर दूर होती हैं। लोगो के लिए 5 वक़्त मस्जिद जाना मुमकिन नहीं होता। कोरोना में, मजबूरी में या सामान्य हालातों में भी मस्जिद से जारी नमाज़ को लाइव आप अपने घर में बैठ कर उस इमाम के पीछे नमाज़ अदा कर सकते है। 

कोविड में गैप मेन्टेन करना पड़ा करने की मजबूरी थी और जुमे में मस्जिद न आये, ये ऐलान भी करवाना भी पड़ा था। कोरोना जैसा कोई उज़र पेश आ रहा है तो रोज़ जमात को छोड़ने से अच्छा है, ऑनलाइन पढ़ लिया करें। 

भारत के बहुत से शहरों जैसे गुरुग्राम में जुमे की नमाज़ें पढ़ने के लिए मस्जिदें नहीं है या उनमें जगह कम है और जब लोग बाहर नमाज़ पढ़ते हैं तो वंहा गैर मुस्लिम अराजक तत्व आ कर लड़ाई झगड़े करते हैं, बल्कि दंगों तक की नौबत तक आ गई है। ऐसे में ऑनलाइन जुमा नमाज़ इसका एक हल है क्योंकि जुमा छोड़ने या बवाल फैलने से ये बेहतर है। 

ऑनलाइन के लिए अकेले या हो सके फैमिली या ग्रुप के साथ जमात बनाए। किब्ला रुख होके मोबाइल को आगे इमाम की जगह रखें अगर आपको ऑनलाइन एड्रेस समझ नहीं आ रहे तो।  फोन में दिखाई और सुनाई देने वाले इमाम को इमाम मानले और उनके पीछे नमाज़ पढ़िए। नमाज़ के बाद खुतबा सुनिए, दुआ कीजिए और अदा हो गई नमाज़। फिर भी कोई मुतमईन नहीं है या एहतियात के तौर पर चार रकात ज़ोहर एक्स्ट्रा पढ़ लीजिए जो किफाया कर जायँगी या सुन्नत में शुमार हो जायँगी।

■[ऑनलाइन नमाज़ की इजाज़त देने वाले आलिम]■

बुखारी की हदीस का मफ़हूम है कि नबी सल्ल. ने फरमाया की लोगों के लिए आसानी पैदा करो, मुश्किलात नहीं।  जब भी किसी चीज़ पर उलेमा में इख़्तेलाफ़े राय हो जाये तो किसी भी एक मौकिफ़ को अपनाने की इस्लाम इजाज़त देता जो आपको ज़्यादा बेहतर, मुनासिब और आसान लगे। जुमा और ईद की नमाज़ की इशेतमायत और रूह का कायम रखने के लिए ये ज़ुरूरी है कि इस नमाज को कानून के दायरे में क़ायम किया जाए, न कि घरों पर। ऑनलाइन नमाज़ हमारे लिए एक नई चीज़ जरुर है पर बिदअत नहीं है।  

जावेद अहमद ग़ामीदी, सय्यद अब्दुल्लाह तारिक़ जैसे आलिम ऑनलाइन नमाज़ को ऐसे हालतों में जायज़ कहते है। डॉ ज़ाकिर नाइक भी शेख मोहम्मद हसन दद्दू जैसे बड़े आलिम के फतवे के ज़रिए ऑनलाइन नमाज़ पढ़ने पर अपनी इंडरेक्टली राय दे चुके है। मौलाना सलमान नदवी भी ऑनलाइन नमाज़ की इजाज़त दे चुके है बशर्ते उन्होंने उन्ही लोगों को इजाज़त दी है जो जॉग्राफिकली इमाम से पीछे हो यानी उनका घर या शहर इमाम से आगे न हो। मुहद्दिस शेख अहमद बिन मुहम्मद बिन सिद्दीक़ अल घुमरी ने भी अपने फतवे में इसकी इजाज़त दी है। कुवैती अमेरिकन आलिम डॉ खालिद अबु अल फ़ज़ल ने भी ऑनलाइन नमाज़ की इजाज़त दी है, इन्होने कहा कि अगर मुस्लिम मस्जिद से दूर रहते हैं और उनका किसी एक जगह नमाज़ के लिए इककट्ठा होना मुश्किल हो तो ऑनलाइन नमाज़ पढ़ सकते हैं। उमर अल क़ादरी, सदर इमाम, इस्लामिक सेंटर ऑफ आयरलैंड का फतवा भी इसकी इजाज़त देता है, इन्होने लिखा है कि वो पहल इसके मुखालिफ थे पर अब हामी है। इन सबकी इजाज़त कोरोना काल या लोकडाउन तक के लिए है, उसके बाद वापस मस्जिदों में नमाज़ कायम करने को इन्होंने कहा है।

कुछ लोग अपने घरों में टीवी से आज भी तरावीह (नफिल) नमाज़ मक्का से लाइव पढ़ते है। टीवी पर लाइव और इंटरनेट पर लाइव एक ही बात है।



■[लोगों के ऐतराज़ात के जवाब]■

इस बारे में लोगों की मुश्किल अभी ये है कि उनके दिमाग मे कुछ सवाल है और उसके जवाब उनके पास नहीं है। जैसे:-

● 1. इससे तो लोग मस्जिदों में आना बंद कर देंगे।

ये किसी को मस्जिद आने से रोकने का प्लान नही है। ये तो सिर्फ अभी चल रहे गैर मामूली हालतों (कोरोना और लोकडाउन) में नमाज़ों को अदा करने का एक जायज़, मुमकिम, आसान और सबसे ज़्यादा मुफीद तरीका है। इसके ज़रिए जितने मुसलमानों तक उम्मत की खैर की बात पहुंचाई जा सकती है, उतनी किसी दूसरे ज़रिए से नामुमकिन है। ज़रा सोचिए अगर दुनिया के तमाम मुसलमानों का एक बड़ा तबका एक ही प्लेटफॉर्म पर आ जाये तो उम्मत क्या नहीं कर सकती। इससे पूरी दुनिया जमात में शरीक हो जायेगी। जब सब नार्मल हो जायेगा तो नमाज़े फिर से मस्जिदो में शुरू की जायगी। नमाज़ अकेले पढ़ने से बेहतर है ऑनलाइन पढ़ी जाए जंहा इशेतमायत और खुतबे की शर्त पूरी हो। 



● 2. फिर तो हज भी ऑनलाइन कर लो।

जो ये कहते है कि नमाज़ ऑनलाइन कर रहे हो तो हज या उमरा भी ऑनलाइन कर लो। इन लोगों को ये इल्म होना चाहिए कि हज या उमरा का ताल्लुक खास मुकामों और उन जगह की रूहानियत और कैफियत से जिन्हें ऑनलाइन पाना नामुमकिन है। जबकि नमाज़ में ऐसे खास मुकामो की कोई फ़र्ज़ीयत नहीं होती है

● 3. इमाम का जिस्मानी तौर पर न दिखना या उसकी असल आवाज़ न आना?

लोगो द्वारा लगाई तकबीर की आवाज़ इमाम की असली आवाज़ नहीं होती पर फिर भी इसे इमाम की ही अवाज़ मानी जाती है जिसे सुनके लोग नमाज़ अदा करते है।  आम नमाज में भी दूर खड़े लोगों को इमाम की असली आवाज़ सीधी नहीं आती है बल्कि स्पीकर के ज़रिए आवाज़ आती है। ऑनलाइन में भी आवाज़ इलेक्ट्रॉनिक मोड यानी स्पीकर से आती है। आम नमाज में ऊपरी मंज़िल वालों को इमाम नहीं दिखता है जबकि ऑनलाइन में तो इमाम सामने दिखता है। इसलिए ये ऐतरज़ात बेबुनियाद है।

● 4. इमाम और मुक्तादियों और सफों के बीच फासला।

इमाम और मुकतदियों के बीच कोई फासला न हों, ऐसा कोई कानून या पाबंदी शरीयत में नहीं मिलता। हदीसों से साबित है कि ऐसी नमाज़ काबिले कुबूल है, भले ही इमाम और मुक्तादियों या सफों के बीच कोई दीवार, रास्ता या नहर तक हो बशर्ते इमाम की आवाज़ आ रही हो, चाहे इमाम दिखाई न दे रहा हो। ज़ाहिर है इमाम की आवाज़ नहीं आएगी तो पता कैसे लगेगा कि कौन सा रुकन करना है।  हदीसों की बुनियाद पर अलग अलग, फ़ासलों पर रही 2 कश्तियों में, ऊपर नीचे की 2 मंज़िलों पर, दूरी पर बने 2 घरों में भी नमाज़ पढ़ सकते है, भले ही इमाम न दिख रहा हो पर उसकी आवाज़ आ रही हो। मालिकी मसलक में अपने घरों से नमाज़ पढ़ने की इजाज़त है, भले ही मस्जिद और घर के बीच में सड़क या नहर हो। नबी और सहाबा के वक़्त में मस्जिद की तक़बीरों से औरतें अपने घरों में भी नमाज़ पढ़ती थी। ऐसे ही हुज़ूर की बीवियां भी अपने हुजरों से नमाज़ पढ़ती थी। 

ऊपर नीचे मंज़िल, बीच में खंबे, पेड़ या कई दूसरी तरह के फासले आज भी बड़ी इशेतमाई नमाज़ों में इमारतों, सड़कों, पार्को या मैदानों में आम दिख जाते है। यानी ज़्यादा अवाम की नमाज़ होने के दौरान सफों में फ़ासले आ जाना कोई अचंभे की बात नहीं है। आज भी ज़्यादातर जुमे या ईद की नमाज़ों में सड़कों, पार्को वैगरह में सफ़े अक्सर फसलों पर और टेड़ी ही पाई जाती है। सफ सीधी रखना और सफों में फासला होना दोनो अलग अलग बातें है। सफ़े फसलों पर बनाई जा सकती है, कुछ मसलिहतों के तहत। आज भी बनती है पर उन्हें सीधा रखा जाना चाहिए अगर मुमकिन हो, भले ही छोटी छोटी बने या अलग अलग। पर ये सब बातें आम माहौल में ध्यान रखी जाने वाली है, न कि गैर मामूली हालात में। इस तरह ये एतराज ख़ारिज हो जाते है।

हरम में सफों के बीच सड़क होती है, एक मकान भी नहीं होता जब होटल के कमरे में नमाज़ पढ़ते हैं क्योंकि सफ़े नीचे होटल तक आ चुकी होती हैं। 

● 5. इमाम का मुक्तदी से आगे होना।

ऑनलाइन नमाज़ में इमाम की आगे पीछे होने का सवाल नहीं उठता है क्योंकि इमाम के आगे होने का ताल्लुक उस जगह से जंहा सब इकट्ठा हो, मुक्तदी और इमाम दोनों यानी जंहा दोनों जिस्मानी तौर पर मौजूद हो। ऑनलाइन नमाज़ में ये मुमकिन ही नहीं है। ऑनलाइन या इंटरनेट की दुनिया में इन्सानों के पते या मुक़ामात भी ऑनलाइन होते है यानी वर्च्युअल।  इंटरनेट की दुनिया में आपकी वेबसाइट, ईमेल, प्रोफाइल वैगरह ही आपकी पहचान, पता और मुकाम है जंहा आप से राब्ता किया जाता है।

इस लेख में नीचे ऐसी शर्ते लिखी है जो नमाज़ की बुनियाद है पर गैर मामूली हालतों में उन्हें तरक यानी छोड़ा जा सकता है या उनमें बदलाव किया जा सकता है, जो क़ुरान, सुनन्त, हदीसो से साबित है।  जैसे वुज़ू का तरीका, रकअत की गिनती, नमाज़ का वक़्त, किब्ला रुख, नमाज़ के रुकन या पोस्चर वैगरह में खौफ, सफर, बारिश, बीमारी वैगरह जैसे गैर मामूली हालतों में तब्दीली लाई जा सकती है। इसी तरह गैर मामूली हालातों में ईमाम और मुक्तादियों की जगह (पोजीशन) में भी बदलाव हो सकता है। मुक्तदी आगे भी हो सकते और पीछे भी।

ऐसा नहीं है की इमाम के आगे मुक्तदी खड़े होने का कोई इवेंट हमारे सामने नही है। ऐसा हरम में अक्सर होता है क्योंकि वंहा नमाज़ियों के क़ाबा के करीबतर होने और गोलदार सफों होने की वजह से इसकी इजाज़त है बशर्ते इमाम से थोड़ा दूर मुक्तदी एक खास फासले पर हो। मक्का में अक्सर ये देखा जाता है कि इमाम से आगे दूर सिमतों में कुछ मुक्तदी खड़े है। पहली सिम्त मे तो मुक्तदि आगे ही खड़े मिलते हैं।  असल मे होता ये है कि जिस सिम्त के सामने इमाम खड़ा होता है, उसकी सीध के किनारों तक मुक्तदी इमाम के पीछे ही खड़े होते है। पर जैसे ही सिम्त मुड़ने लगती है, मुक्तादियों को इमाम से भी आगे आके खड़े होने की इजाज़त है। यानी हरम में इमाम की सिम्त की एक खास दूरी के बाद इमाम के आगे खड़े होने का मसला नहीं रहता है। मान लीजिए इमाम पश्चिम की तरफ या पूर्व की तरफ मुंह करके नमाज़ पढ़ा रहा है। और ये गोलदार सफे ऐसे ही गोल शेप में आगे बढ़ती जाए और अमेरिका से जापान तक और नार्थ पोल से साउथ पोल तक बनती चली जाए तो आप देखेंगे कि क़ाबा की दाई से बाईं लंबाई की हद के बाद (जिसके सामने इमाम है) से नार्थ और साउथ पोल तक बनी सफों (जो क़ाबा के किनारों के बाद से घूम रही है) के नमाज़ी इमाम से आगे खड़े है।


इन दलीलों की बिना पर गैर मामूली हालातो और e-address होने की वजह मुक्तदी ऑनलाइन नमाज़ में इमाम के आगे हो सकता है। ऑनलाइन पहचान में असल जिओग्राफिकल मुकाम की अहमियत खत्म हो जाती है। वैसे भी मोबाइल की शक्ल में आपका इमाम विरचुअली आप से आगे ही खड़ा है। और अब तो 3D टेक्नोलॉजिक के द्वारा एक व्यक्ति आपके सामने होलोग्राम इमेज में खड़ा हो जाता है जिसे आप छू नहीं सकते पर देख सकते हो, सुन सकते हो और उसकी कद काठी रंग रूप उसी रूप में देख सकते है जैसी वो हकीकतन है। आने वाले वक्त में 3D होलोग्राम तकनीक का ईस्तमाल नमाज़ में इमाम के लिए हो सकता है तब फिर से ये ऐतराज़ फेेेल हो जायगा क्योंकिं इमाम वरचुअली आपसे आगे खड़ा मिलेगा हक़ीक़त के बिल्कुल करीब। पर अब भी किसी को इस पर तसल्ली नहीं हो पाई है तो वो ऑनलाइन उस इमाम के पीछे नमाज़ पढ़ ले जो जियोग्राफिकली उससे आगे हो।

● 6. नमाज़ के बीच में कनेक्शन टूट जाए तो क्या होगा।

ये परेशानी और इसका हल तो बहुत पुराना है। आम हालतों में मस्जिदों में जब लाइट चली जाती है, माइक खराब हो जाते है या कोई और परेशानी आ जाती है तो ऊपरी मंज़िल पर या अलग थलग नमाज़ पढ़ रहे नमाज़ियों को आवाज़ जाना बंद हो जाती है। ऐसी परेशानी में ये हकुम सभी को कुबूल है कि नमाज़ी अपनी अपनी नमाज़ें ख़ुद पूरी कर ले इंफ्रादी तौर पर। इस पर इज्मा है कि ऐसी परेशानी आने पर ये नमाज़ जमात से ही मानी जायेगी। यही काम ऑनलाइन नमाज़ में किया जायगा अगर कनेक्शन टूट जाए या कोई और टेक्निकल परेशानी आ जाए तो यानी बाकी बची नमाज़ वंही से इंफ्रादी तौर पर पढ़के मुक़म्मल करलें।

● 7. क्या ये बिदअत नहीं है।

बिदअत का मतकब दीन में यानी दीन के अहकाम और अरकान में नई चीज ईजाद करने से है। दीन के अहकामो और अरकानों को अदा करने के लिए या अदा करने के तरीकों में नई चीज जैसे तकनीक का ईस्तमाल बिदअत नहीं है बल्कि ये तो सिर्फ एक अच्छे तरीके या चीज़ का इस्तेमाल है बस। जैसे हज के लिए जहाज़, वुज़ू के लिए नल, तिलावत के लिए मोबाइल एप्प का इस्तेमाल करना।

तकनीक को इस्तेमाल करना बिदअत नहीं है वो भी गैर मामूली हालतों में। कोई नई तकनीक उलेमा को पहले बिदअत लगती है पर बाद में उलेमा खुद उसका जमकर इस्तेमाल करते है। इसकी कई मिसालें तारीख में मौजूद है। जैसे लाउडस्पीकर पर अज़ान को शैतान की आवाज़ कहा गया था, आज सभी मस्जिदों से फूल वॉल्यूम पर उलेमा की तकरीरें सुनाई देती है। माइक से तक़बीर पढ़ने की भी मुखालफ़त की गई थी, आज नातें पढ़ी जाती है। घड़ी से नमाज़ का वक़्त जानने को नाजायज़ कहा गया था, आज सभी उलेमा की कलाई पर घड़ियां है।  कैमरा और टीवी को हराम कहा गया था आज सभी उलेमा यूट्यूब पर है। प्रिटिंग प्रेस को हराम बताया गया था आज सभी की किताबें छपती है। न्यूमेरिकल साइंस और फिलोसफी को गुमराही माना जाता था,आज बच्चे इनमें ग्रैजुएशन कर रहे हैं। वेस्टर्न एजुकेशन और इंग्लिश पढ़ने को गुमराही कहा गया पर आज ये सब जायज़ है। असल तकनीक को मना करने वाले ज़्यादतर कट्टर उलेमा मुखलाफ़त करते है जो मुस्तकबिल का अंदाज़ा नहीं लगा पाते और बाद में फेल हो जाते है। ऐसी चीजों पर अक्सर मुसलमानों को अक्ल की दाढ़ आने में वक़्त लगता है क्योंकि वो इसको अपनाने के लिए दलीलों का नहीं बल्कि अपनी चली आ रही फिक्स्ड परंपरा को बुनियाद बनाते है।


■[नमाज़ के फ़राइज़ में रियायतों के मिसालें]■

किब्ला: किब्ला रुख होना नमाज़ का एक बुनुयादी उसूल है। पर जब हम सवारी पर नमाज़ पढ़ते है तो किब्ला हर तरफ घूमता है। ऐसे में नमाज़ कुबूल इसलिए है क्योंकि गैर मामूली हालातों में ऐसा करना जायज़ है। यानी गैर मामूली हालातों में नमाज़ का यह बुनियाद उसूल तरक हो जाता है। ऐसे ही अंतरिक्ष में या चांद पर नमाज़ पढ़ने वाले एस्ट्रोनॉट के लिए ज़ुरूरी नहीं कि वो क़ाबा की तरफ रुख करके नमाज़ पढ़े क्योंकि ये नामुमकिन है। क़ाबा की इमारत के अंदर या हतीम में मौजूद नमाज़ी किसी भी और रुख करके नमाज़ पढ़ सकता है। इन सबकी इजाज़त गैर मामूली मुक़ामात और हालात की वजह से है।

● फ़र्ज़ नमाज़ में क़याम ज़रूरी है। पर बीमारी (गैर मामूली हालातों) में बैठ कर, लेट कर या इशारों में भी नमाज़ जायज़ है। बीमारी में सजदे में झुकने की बजाय कुर्सी पर बैठ कर सजदा किया जाता है। 

अक्सर मुसलमान नफिल बैठ कर अदा करते है क्योंकि नफिल में बहुत सी रियायतें मिलती है। ईद की नमाज़ असलम एक नफिल नमाज़ है। 

● क़ुरान ने हर आदमी को गैर मामूली हालतों में इश्तेहाद करने की इजाज़त दी कि अपने हिसाब से नमाज़ पढ़ने की। खौफ के मामले में सफर के दौरान जब रुकना मुमकिन न हो तो पैदल चलते हुए, गाड़ी चलाते हुए या  सवारी पर बैठे बैठे भी नमाज़ पढ़ सकते हो। ऐस वक़्त में कैसे नमाज़ पढ़नी है, कैसे रुकु सजदे करने है वैरगह वैरगह, अल्लाह ने ये नहीं बताया, न रसूल ने वाज़ेह किया। इसलिए नहीं बताया क्योंकि अल्लाह जानता है हर आदमी की अलग स्तिथि होगी और ऐसी स्तिथि में फिक्स्ड नियम नहीं बनाए जा सकते। इसलिए ऐसी स्तिथि में अल्लाह का यही हकुम है कि अपने अपने हिसाब से स्तिथि के मद्देनजर नमाज़ अदा कर लेना। इसी तरफ बीमार अपने लिए खुद फैसला करेगा कि वो बैठ कर या लेट किस तरफ से नमाज़ अदा करेगा।

● क़ुरान सूरह निसा में बताता है कि एक बार जंग और खौफ के माहौल में (गैर मामूली हालत) फ़र्ज़ नमाज़ की रक़ात आधी हो गयी थी दुश्मन पर नज़र व निगरानी रखते हुए आधे सहाबा ने पहली रकअत अदा की और फिर बाकी बचे आधों ने दूसरी रक़ात अदा की थी। ध्यान दीजिये की जमात की गई, इंफ्रादी नहीं पढ़ी गयी। कितना बड़ी रियायत थी ये, सुबहानअल्लाह।

● सफर में ज़ोहर और असर की आधी ही रकअत पढ़ी जाती है जिसे कसर कहते है।  सफर, बारिश, खौफ या किसी दूसरी ज़रूरत के तहत 2 नमाज़ें जमा करके एक ही वक़्त में भी पढ़ी जाती है (जहर+असर या मग़रिब+ईशा) जिसे जमाअ कहते है। आम तौर पर किसी नमाज़ के आखिरी वक्त तक भी वो नमाज़ अदा की जा सकती है। 

● खासतौर पर सफ को सीधा कायम रखने के लिए कंधे से कंधे, टखनों से टखनें मिलना नमाज़ में इतना ज़रूरी माना जाता है की गैर मामूली हालतों में भी इसका ख्याल रखना है। पर इस शर्त को हमेशा से ही गैर मामूली हालतों या बड़ी इश्तेमाई नमाज़ों में इसका ध्यान नहीं रख पाते है क्योंकि वंहा ऐसा करना लगभग नामुमिकन है। आज भी ज़्यादातर मस्जिदों की आम नमाज़ों में इसका कोई ख्याल नहीं रखता है।

● जिस जगह सूरज महीनों तक नहीं दिखता और जंहा 24 घंटे रात होती है जैसे अंटार्टिका, वंहा 5 नमाज़ों के वक़्त अंदाज़े से लगा कर नमाज़ अदा करने की इजाज़त है।

● ज़रूरत पड़ने पर मिट्टी से त्यमुम किया जाता है और हालात नार्मल होने पर हम वापिस पानी से वुज़ू करना शुरू कर देते है। पानी न होने की सूरत में तयम्मुम में पानी की जगह मिट्टी का इस्तेमाल किया जाता है। जबकि देखा जाए तो ये बिल्कुक उल्टा अमल है क्योंकि पानी सफाई करता है और मिट्टी गन्दा करती है। ऐसे ही पत्थर का इस्तेमाल पानी की जगह इसतंजे में किया जाता है। 

इसी बुनियाद पर प्लेन में पानी की किल्लत या पानी बहाना सही नही होता तो वंहा आप गीले तिश्शू पेपर को जिस्म के हिस्सों पर फेर कर वुज़ू कर सकते हैं।


ये मिसालें यही बताती है कि गैर मामूली हालातों में नमाज के बुनियादी उसूल भी जायज़ ज़रूरत के हिसाब से बदल सकते है।


■[ईद और जुमे की नमाज़ की बुनियादें]■

इस्लाम मे इश्तेमाइयात की बेहद ज़्यादा अहमियत है। इशेतमाईयत से उम्मत में इत्तेहाद भी पैदा होता है। छोटी छोटी इशेतमाईयत कायम करने के लिए मुहल्ले की मस्जिद में रोज़ नमाज़ के लिए इकट्ठा होना होता है। इससे बड़ी इशेतमाईयत कायम करने के लिए इलाके की मस्जिद में जुमा के लिए इक्कट्ठे होना होता है। इससे भी बड़ी इशेतमाईयत के लिए साल में शहर की ईदगाह में इकठ्ठा होना होता है। सबसे बड़ी इशेतमाईयत के लिए पूरी दुनिया के लोगों को मक्का में हज के लिए इकट्ठा होना होता है। इसी इशेतमाईयत के लिए ऑनलाइन नमाज़ ज़ुरूरी है। ये तकनीक ही इस इशेतमाईयत को ऐसे माहौल में कायम रख सकती है।

ईद की नमाज़ की बुनियाद इश्तेमाईयत, खुतबा और दुआ है। जुमा के लिए भी इश्तेमाईयत और ख़ुत्बा बुनियाद है और इसीलिए छोटी आबादी वाले गांवों या कस्बों के लिए जुमे का इंतज़ाम करना ज़रूरी नहीं है क्योंकि वंहा नमाज़ के लिए बड़ा मजमा इक्कट्ठा होना मुश्किल है सो वंहा ज़ोहर अदा होगी। हदीस से साबित है कि बारिश होने पर जुम्मे की नमाज़ के वक़्त ऐलान कर दिया जाता था की अपने अपने घरों में ज़ोहर अदा कर लो।

जुमे के लिए खुतबा फ़र्ज़ है पर ईद के लिए हमेशा नहीं। एक हदीस बताती है कि एक सहाबी ने ईद की नमाज़ घर वालों के साथ पढ़ी पर खुतबा नहीं दिया।  हदीसों से साबित है कि ईद जुमे वाले दिन आ जाए तो जुमा नहीं पढ़ा जायगा सिर्फ ज़ोहर पढ़ी जायगी क्योंकि इश्तेमाईयत और खुतबा सुबह पहले ही ईद की नमाज़ में हो चुका है और अब उसी दिन दुबारा इनकी ज़रूरत नहीं। ईद की नमाज़ का इंतज़ाम करते हुए इश्तेमाइयत का ख्याल रखना लाज़मी है, इसके बिना इस नमाज़ का मकसद ही खत्म हो जाता है। अगर ऐसे हालत पैदा हो गए है जब ऑफलाइन नमाज़ नहीं पढ़ी जा सकती हो तो ईद की नमाज़ का असल मक़सद यानी इश्तेमाईयत कायम रखते हुए इसे अदा करने के लिए ऑनलाइन से अच्छा कोई तरीका नहीं।

इमाम बुखारी का कौल है जिसकी ईद की नमाज़ छूट जाए तो 2 रकअत क़ज़ा ज़रूर पढ़े।  मालिकी, शाफ़ई, हंबली फ़िक़ह और लोगों की अक्सरियत का यही मानना है कि अगर ईद की नमाज़ छूट जाए तो अपनी नमाज़ भी पढ़ सकते है पर खुतबा नहीं दिया जायगा।  हनफ़ी और शेख इब्ने तैमिया का मानना है कि अगर ईद की नमाज़ छूट जाए तो बाद में अकेले नहीं पढ़नी है। हनफ़ी, ईद की नमाज़ को जमात से तो वाजिब मानते है पर छूटने के बाद नही यानी छूटने के बाद पढ़ना ज़रूरी नहीं है। वाजिब लफ्ज़ की जो फिक़ही इस्तलाह है, इसकी ईजाद हनफ़ी फ़िक़ह ने की है। असलन और हमारे नबी के कौल के मुताबिक इबादत की सिर्फ 2 ही कैटेगरी है, फ़र्ज़ और नफिल। जो नफिल आपने आम तौर पर पढ़ी, उन्हें सुनन्त कहा जाता है। ईद की नमाज़ एक नफिल (सुनन्त कह लें) नमाज़ ही है जैसे वित्र, तहज्जुद या तरावीह। 

ईद की नमाज़ को बिला वजह नहीं छोड़ना चाहिए क्योंकी ये आम नफिल नहीं है बल्कि खास है। इसे हम आम नफिल की तरह जिस मर्ज़ी रोज़ या जिस मर्ज़ी वक्त नहीं पढ़ सकते। बल्कि इसका दिन और वक़्त वैगरह अल्लाह की तरफ मुकर्रर हुआ है जिसकी कुछ शर्तें है। बात सिर्फ ईद की नमाज़ की नहीं है। बात इस खास ईद के दिन सबके साथ शामिल होके इस खास उस नमाज़ को अदा करने की है जो इस खास मौके पर रखी गयी खास नमाज़ है। ये नफिल है जिसे रसूल का लागतार अमल हासिल होने की बजह से सुनन्त की हैसियत हासिल है।


■[जुमा और ईद की अहमियत]■

नबी ने फरमाया है कि जिसने लगातार 3 जुमे की नमाज़ छोड़ दी, उसके दिल पर अल्लाह मुहर लगा देता है। एक दूसरी हदीस में कहा गया है कि अगर लोग जुमे की नमाज़ न पढ़ने की आदत नहीं छोड़ते तो अल्लाह उनके दिलों पर मुहर लगा देता और वो गुमराह हो जाते है।

हदीसों से पता लगता है कि ईद में हैज़ वाली औरतों तक को बेझिझक आने की इजाज़त रसूलुल्लाह ने दी भले ही वो नमाज़ अदा नही कर सकती। पर उन्हें बुलाने का मकसद सिर्फ यही है की ईद एक बड़ा दिन है, खुशियों का मौका है, मुसलमानों की इश्तेमाइयत और खुतबा वगैरह में शिरकत उनका हक़ है।

इन हदीसों से पता लगता है कि जुमा और ईद कायम करना कितना ज़ुरूरी है। इन दिनों पर ग़ुस्ल करना, साफ कपड़े पहनना, खुशबू लगना, अज़कार  बहुत चीज़ें करने के सवाब है। इन सब की अहमियत कायम रखने के लिए इन दो नमाज़ को इनके असली तरीके के जितना हो सके उतना करीब पढ़ा जाना जरूरी है जो आज ऑनलाइन से मुमकिन है।


■[कुतर्क करने वालों के लिए तर्क]■

ऑनलाइन नफिल तो आम हालतों में भी जायज़ है क्योंकि नफिल के लिए जमात की या मस्जिद आने की ज़रूरत नही होती है। 

ऊंट पर बैठ कर जमात कराने की रिवायतें इसलिए नहीं मिलती है क्योंकि ऊंट पर नमाज़ कोई तभी पढ़ेगा जब गैर मामूली हालत होंगे और ऐसे हालतों में जमात करना ज़रूरी नहीं है। वैसे भी एक ऊंट पर 2 लोग जमात आसानी से नहीं पढ़ सकते।

टखनों से टखने मिलाने वाले हकुम का पसमंज़र अलग है। एक दूसरे को छू कर उसका असल मकसद दिलों में मुहब्बत पैदा करना है। इस हकुम को लफ़ज़न और मानन दोनों लिया जा सकता है। दूसरी बात ज़्यादातर मुसलमान टखने नहीं मिलाते है इसलिए ऑनलाइन में टखने न मिलना कोई तर्क नही हुआ।

सवालअगर किसी की ऑनलाइन नमाज़ छूट जाए तो क्या वो रिकॉर्डिंग चला के अपनी नमाज़ अदा कर सकता है।

जवाब:  नहीं, क्योंकि आपको उस इमाम के पीछे नियत करनी और नमाज़ पढ़नी थी, कैमरे या रिकॉर्डिंग के पीछे नहीं। इमाम की नमाज़ हो चुकी, इमाम जा चुका, मुक्तदी नमाज़ पढ़ चुके है, वो वक़्त बीत चुका है। 

क्या एक बार ऑनलाइन दिया गया एग्जाम दुबारा या बार बार दे सकते है, नहीं। वो हो चुका है। क्या एक बार दिया गया ऑफलाइन एग्जाम जिसका पेपर आउट हो चुका है, अगले दिन कोई बच्चा आके दुबारा दे सकता है, नहीं। अब नया एग्जाम पेपर आएगा, नया एग्जाम दिया जायगा, नया इंतज़ाम किया जाएगा। मान लीजिए किसी सांसद को ऑनलाइन शपत लेनी थी, वो लेट हो गया, बाकी सब शपथ ले चुके। तो वो रिकॉर्डिंग चला के खुद ब खूद शपथ नहीं ले सकता। उसके लिए दुबारा इंतज़ाम किया जाएगा।

आज कई जगह ईद की नमाज़ पढ़ाते इमामों की रिकॉर्डिंग की जाती है। जिन लोगों की नमाज़ छूट गयी, क्या उस रिकॉडिंग को देख कर वो लोग अपनी अपनी नमाज़ पढ़ सकते है, नहीं न। वो नमाज़ मखुससु थी और हो चुकी। ये दोनों वाकये एक जैसे है।

हम जानते है की मस्जिद में अगर किसी की नमाज़ छूट जाती है तो अपनी पढ़ता है या नई जमात बनाके नए इमाम के पीछे, न कि उसी इमाम के पीछे नमाज़ पढ़ने के लिए ज़िद करता है और न ये कहता है कि दुबारा पढ़ो मेरे लिए।  दूसरा कोई नया इमाम और नए मुक्तदी आके नई जमात पढ़ सकते है अगर छूट गयी या लेट हो गए थे। 

पर जुमा या ईद की नमाज़ दुबारा एक ही जगह नहीं करवाई जा सकती क्योंकि बड़ी इश्तेमाइयत और खुतबा कीया जा चुका है, सिर्फ कुछ चंद लोगों की वजह से दुबारा इन्हें करवाने का कोई औचित्य नहीं। जुमा और ईद की दुबारा जमात तभी हो सकती है जब ऑफलाइन कुछ मसलिहियत के चलते जैसे मस्जिद की हद से ज़्यादा या एरिया में अत्यधिक नमाज़ी होना जिन्हें कानूनों का पालन करते हुए एक बार मे नमाज़ पढ़ाई जाना नामुमिकन है।

दुबारा ईद या जुमे की ऑनलाइन नमाज़ नहीं कर सकते क्योंकि इनमें नमाज़ी की संख्या, मस्जिद की हदों जैसी कोई रुकावट नहीं, लोग अपने घरों से पढ़ते है और करोड़ो भी एक साथ पढ़ सकते है। फ़र्ज़ नमाज़ इसलिए ऑनलाइन नहीं पढ़नी चाहिए क्योंकि इसमे इश्तेमाइयत की शर्त नहीं होती इसलिए फ़र्ज़ ऑनलाइन पढ़ने की ज़रूरत ही नहीं है। 

हनफ़ी फ़िक़ह में इमाम के पीछे मुक्तदी को सूरह फातिहा पढ़ने की इजाज़त नहीं है, चाहे नमाज़ जहरी हो या सिर्री। जब इमाम के पीछे किसी ने नमाज़ देर से जॉइन की तो उसके लिए हनफ़ी किताबों में ये हकुम है कि वो छुटी हुई रकअत पढ़ने जब खड़ा होगा तो उसमें सूरह फातिहा नहीं पढ़ेगा बल्कि इतने वक़्त का अंदाज़ा लगा के चुपचाप क़ियाम खड़ा रहेगा जितनी देर में इमाम फातिहा पढ़ लेता। अब ये बताइए कि इमाम अपने घर जा चुका है और ये मुक्तदी अभी भी खुद को इमाम के पिछे मानके नमाज़ पढ़ रहा है। यही चीज़ हमें ऑनलाइन नमाज़ में नहीं करनी चाहिए।


लोगों की नफसियात बदलने में वक़्त लगता है। तारीख़ यही बयान करती है। मुझे उम्मीद है की ऑनलाइन नमाज़ की मुख़ालफ़त कर रहे यही लोग 10-20 सालों बाद ही सही पर इसकी हिमायत करते मिलेंगे इंशाअल्लाह। 



1 comment:



  1. सवाल: अगर किसी की ऑनलाइन नमाज़ छूट जाए तो क्या वो रिकॉर्डिंग चला के अपनी नमाज़ अदा कर सकता है।

    जवाब: नहीं, क्योंकि नमाज़ हो चुकी, इमाम जा चुका, मुक्तदी नमाज़ पढ़ चुके है, वो वक़्त बीत चुका है। आज कई जगह ईद की नमाज़ पढ़ाते इमामों की रिकॉर्डिंग की जाती है। जिन लोगों की नमाज़ छूट गयी, क्या उस रिकॉडिंग को देख कर वो लोग अपनी अपनी नमाज़ पढ़ सकते है, नहीं न। वो नमाज़ मखुससु थी और हो चुकी। ये दोनों वाकये एक जैसे है।

    क्या एक बार ऑनलाइन दिया गया एग्जाम दुबारा या बार बार दे सकते है, नहीं। वो हो चुका है। क्या एक बार दिया गया ऑफलाइन एग्जाम जिसका पेपर आउट हो चुका है, अगले दिन कोई बच्चा आके दुबारा दे सकता है, नहीं। अब नया एग्जाम पेपर आएगा, नया एग्जाम दिया जायगा, नया इंतज़ाम किया जाएगा।

    मान लीजिए किसी सांसद को ऑनलाइन शपत लेनी थी, वो लेट हो गया, बाकी सब शपथ ले चुके। तो वो रिकॉर्डिंग चला के खुद ब खूद शपथ नहीं ले सकता। उसके लिए दुबारा इंतज़ाम किया जाएगा।

    हम जानते है की मस्जिद में दूसरा कोई इमाम और नए मुक्तदी आके नई जमात पढ़ सकते है अगर छूट गयी या लेट हो गए थे। पर जुमा या ईद की नमाज़ दुबारा एक ही जगह नहीं करवाई जा सकती क्योंकि बड़ी इश्तेमाइयत और खुतबा कीया जा चुका है, सिर्फ कुछ चंद लोगों की वजह से दुबारा इन्हें करवाने का कोई औचित्य नहीं। जुमा और ईद की दुबारा जमात तभी हो सकती है जब ऑफलाइन कुछ मसलिहियत के चलते जैसे मस्जिद की हद से ज़्यादा या एरिया में अत्यधिक नमाज़ी होना जिन्हें कानूनों का पालन करते हुए एक बार मे नमाज़ पढ़ाई जाना नामुमिकन है।

    दुबारा ईद या जुमे की ऑनलाइन नमाज़ नहीं कर सकते क्योंकि इनमें नमाज़ी की संख्या, मस्जिद की हदों जैसी कोई रुकावट नहीं, लोग अपने घरों से पढ़ते है और करोड़ो भी एक साथ पढ़ सकते है। ऑनलाइन फ़र्ज़ नमाज़ इसलिए नहीं पढ़ सकते क्योंकि इसमे इश्तेमाइयत की शर्त नहीं होती इसलिए फ़र्ज़ ऑनलाइन पढ़ने की ज़रूरत ही नहीं है।


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