Tuesday, 15 June 2021

सिक्ख धर्म का परिचय और इस्लाम से समानता।


सिक्ख धर्म का परिचय और इस्लाम से समानताएं।

ये तो सभी जानते है कि सिक्ख धर्म एक अकाल अजन्में निराकर ईश्वर में विश्वास रखता है जिसे वो वाहेगुरु (यानी अद्भुत गुरु) या सत्य श्रीअकाल (जो सत्य और काल रहित है) कहता है। लगभग 500 साल पहले बाबा गुरु नानक देव ने इस धर्म की शुरुआत की थी। वो पहले गुरु थे। इनके कुल 10 गुरु हुए जिनमें आखरी गुरु गोबिंद सिंह थे। गुरु गोबिंद सिंह ने खालसा पंथ की स्थापना की थी जो दीक्षा प्राप्त अनुयायियों के एक समूह है।  इनके धर्मस्थल को गुरुद्वारा कहते है यानी गुरु का द्वार या घर। सिक्ख धर्म में 5 तख्त बनाये हुए हैं जैसे हिन्दू धर्म में पीठ है। यंहा से पूरी क़ौम के लिए धार्मिक आदेश पारित होते है। परमात्मा, धर्म और गुरुओं की शिक्षाओं को ये हकुम कहते है।

सिक्खों का धर्मग्रन्थ श्रीगुरुग्रंथ साहिब है जिसे आदिग्रंथ भी कहते है। इसे गुरुवाणी या गुरुशब्द भी कहते है। गरूग्रंथ का पहला पाठ जपुजी कहलाता है जो गुरु नानक द्वारा रचित है। 
गुरबाणी का पाठ बिना संगीत यानी किसी म्यूज़िकल इंस्ट्रूमेंट के बिना नहीं किया जा सकता। गुरुग्रन्थ के सामने या गुरीद्वारे के भीतरी मुख्य भाग में, सिर खुला नहीं होना चाहिए। 

गुरुग्रंथ में 1430 पृष्ठ है और हर पृष्ठ में कई वचन है। इसमें इनके गुरुओं की वाणी और शिक्षाएं लिखी हुई है। उसमें कबीर, रविदास और बाबा फरीद जैसे भक्तिकाल के बहुत से कवियों के काव्य भी मौजूद है। इसमें परमात्मा के लिए अल्लाह, ख़ुदा, रब और परब्रह्म लफ्ज़ का भी इस्तेमाल हुआ है।  ये अपने गुरुग्रंथ को इतनी ज़्यादा इज़्ज़त देते है कि उसे खोलकर पढ़ना तो दूर बल्कि उसे छूने के लिए भी बहुत सी फॉर्मेलिटी पूरी करनी पड़ती है।

सिखधर्म में गुरुओं का बहुत महत्व है जिनके बिना उद्धार संभव नहीं। ये सद्गुरुओं को ईश्वर और अपने बीच मध्यस्त मानते है। सिक्ख अपने 10 गुरुओं को छोड़कर अन्य किसी देहधारी को गुरु नहीं मानते है। हालांकि इनके ग्रन्थ और परम्परा के अनुसार सद्गुरु केवल सिख गुरु नहीं है बल्कि जिनमें बाबा नानक ने श्रद्धा रखी वो भी सद्गुरु ही है। 

गुरु नानक की वाणी से बिल्कुल स्पष्ट है कि वह अवतारवाद का विरोध करते थे और रामावतार और कृष्णवतार का खंडन करके गए है। गुरुग्रंथ कहता है कि परमात्मा ने ही ब्रह्मा विष्णु महेश को पैदा किया है। सिक्ख धर्म इन तीनो को अपूर्ण और ईश्वर की ही रचना मानता है और इन्हें पूजने को कभी नहीं कहता। हालांकि इनका मानना है कि परमात्मा की इच्छा से ही अवतार मानव रूप में प्रकट हुए थे और सारे अवतार उसका ही अंश है। सिक्ख मान्यता है कि परमात्मा निर्गुण और सगुण दोनों है पर वह अवतार नहीं लेता। सिक्ख धर्म मूर्तिपूजा विरोधी है।
 
सिक्ख धर्म में 5 समय अरदास की जाती है जिसे नितनेम भी कहते हैं। 
 

■  सिक्ख धर्म के प्रसिद्ध वचन।

●एक ओंकार सतनाम कर्तापुरख निर्भय निरवैर अकालमूरत अजूनी सैभं गुरप्रसाद।
परमात्मा एक है, उसी का नाम सत्य है। वही।जगत निर्माता है। वह बिना भय के, बिना बैर के है। वह काल रहित, अजन्मा और स्वयं से ही स्थापित है। गुरु के द्वारा ही उसकी प्राप्ति है।
[गरूग्रंथ :  जापुजी: मूलमंत्र/1]

● अव्वल अल्लाह नूर उपाया कुदरत के सब बंदे,
एक नूर ते जग उपजया कौन भले कौन मंदे।
सर्वप्रथम अल्लाह ने नूर को पैदा किया। सभी प्राणी परमात्मा के ही बनाए है। जब उस नूर से ही सब जग बना है तो फिर कौन अच्छा और कौन बुरा।
[गरूग्रंथ : 1349-19]

● जो बोले सो निहाल, सत्य श्रीअकाल।
जो परमात्मा को सत्य कहेगा, वह आनंदित व संतुष्ट होगा।
[गुरु गोबिंद सिंह का युध्द जयकारा]

● वाहे गुरु जी दा खालसा, वाहे गुरु जी दी फतेह।
खालसा पंथ परमात्मा का है। परमात्मा की ही जीत है।
(परमात्मा पवित्र है और उसी की जीत है।)
[गुरु गोबिंद सिंह का जयकारा]

● चिड़ियानाल बाज़ लड़ावा, तां गुरुगोबिंद नाम धारावा।
चिड़िया को बाज़ से लड़वाता हूँ। तभी गुरु गोबिंद कहलाया जाता हूँ।
[गुरु गोबिंद सिंह का जयकारा]


हज़रत मुहम्मद सल्ल. का ज़िक्र कई जगह आता है जैसे:-

● अठे पहर भोंदा, फिरे खावन, संदड़े सूल! 
दोज़ख़ पौंदा, क्यों रहे, जां चित न हूए रसूल!
अगर कोई मनुष्य दिन रात भोजन के दुख में भटकता फिरे और उस के मन में पैगम्बर (या गुरु) न  हो तो वह दोज़ख में पड़ने से कैसे बच सकता है?
[गुरु ग्रन्थ साहब, पेज नम्बर 319-320]


स्वर्ग नरक का सिद्धांत।

स्वर्ग नरक का उल्लेख गरूग्रंथ में बार बार आता है। पर सिक्ख धर्म में स्वर्ग और नर्क कोई अलग मान्यता नहीं है बल्कि वही है जो सभी भारतीय धर्मों में पाई जाती है जैसे सनातन, बोद्ध और जैन। सिक्ख धर्म यही मानता है कि स्वर्ग नरक कोई अलग लोक नहीं बल्कि केवल अलेगोरिकल और मेटाफोरिकल है यानी जीवन के सुख दुख ही स्वर्ग नरक है। हालांकि कुछ वचनों में इनके अलग लोक होने का इनकार नहीं किया जा सकता। कुछ गुरु वचनों में इनके वास्तविक लोक होने के संकेत भी मिलते है और यंहा तक कि मृत्यु पश्चात कर्मो के हिसाब के भी।

पर गुरबाणी में साफ कहा गया है कि संत लोग स्वर्ग व नरक दोनों को रद्द करते है। ये भी कहा गया है स्वर्ग में वास की इच्छा न करो और नरक में रहने से न डरो। इसमें 84 लाख योनियों में भ्रमण करने को भी कहा गया है। 

गुरु गोबिंद सिंह द्वारा रचित दसमग्रन्थ नामक सिक्ख ग्रन्थ में कल्कि अवतार वाले अध्याय में भी स्वर्ग नरक का भी उल्लेख है। इसमें लिखा है कि पापी लोग नरक में जायँगे (उदाहरण: नरक में जाएंगे, बहुत पछताएंगे, नरक में ही बसेंगे) और योद्धा स्वर्ग में। 

● करणी बाझहु भिसति न पाइ।
अच्छे कर्मों के बिना, स्वर्ग प्राप्त नहीं होता।
[श्री गुरुग्रंथ साहिब : 952]

● बैकुंठ नगरु जहा संत वासा।
स्वर्ग का नगर वंही है जंहा संत बसते है।
[श्री गुरुग्रंथ साहिब : 742]

● कुफर गोअ कुफराणै पइआ दझसी।
जो झूठ बोलता है वह नरक में गिर कर जलेगा।
[श्री गुरुग्रंथ साहिब : 142]

● संत कै दूखनि नरक महि पाइ।
संतों को बदनाम करने वाला नरक में गिरता है।
[श्री गुरुग्रंथ साहिब : 279]

● जो सिमरंदे सांईऐ नरकि न सेई पाईऐ।
जो मालिक पर ध्यान लगाते है, उन्हें नरक में कभी नहीं धकेला जाएगा।
[श्री गुरुग्रंथ साहिब : 132]

● नरक घोरु दुख खूहु है ओथै पकड़ि ओहु ढोइआ।
उसे पकड़ के सबसे भयंकर नरक में डाला जाता है, जो दुख और पीड़ा का कुंवा है।
[श्री गुरुग्रंथ साहिब : 309]

● गली भिसति न जाईऐ छुटै सचु कमाइ।
केवल बातें करने से स्वर्ग का मार्ग नहीं मिलता। मुक्ति केवल सत्य के अभ्यास से मिलती है।
[श्री गुरुग्रंथ साहिब : 141]

● चित्रगुप्त कर्मों का लेखा रखता है और मरने के बाद लेखा मांगेगा। 
[गुरुग्रन्थ : 393 व 616]


सिख धर्म में आदम और हव्वा को स्वीकार गया है।

● बाबा आदम कउ किछु नदरि दिखाई। 
उनि भी भिसति घनेरी पाई।
परमात्मा ने आदम को कुछ नज़र दिखाई। फिर उन्होंने भी बड़ी विहिश्त पाई।
(परमात्मा ने आदम जो मानवता के पिता है पर अपनी दया की और फिर वह हव्वा संग लंबे समय तक स्वर्ग में रहे।)
[श्री गुरूग्रंथ साहिब : अंग 1161 : 7]


ग्रंथो में अवतारों का ज़िक्र।

सिक्ख धर्म का एक ग्रन्थ है जिसे दशमग्रन्थ कहते है।  ये गुरु गोबिंद सिंह की वाणी और लेखन है। हालांकि इस ग्रन्थ पर मतभेद भी है। कुछ लोग मानते है कि इसे उन्होने खुद नहीं लिखा बल्कि अपनी देखरेख में लिखवाया। कुछ कहते की इसमें उनके और अन्य लोगों के भी काव्य है। कुछ कहते है कि ये उनका है ही नहीं। 

दशमग्रंथ में चौबीस अवतार नामक अध्याय में  विष्णु के प्रसिद्ध 10 और विष्णु के अन्य 14 अवतार मिलाकर 24 अवतारों का वर्णन है। इसमें राम, कृष्ण, जैन अरिहंत, बुद्ध, मनु और कल्कि को अवतार बताया गया है। सिक्ख का मानना है कि ये परमात्मा के अवतार नहीं है बल्कि परमात्मा की एक रचना विष्णु के अवतार है। हालांकि इस पर कुछ लोगों का ये भी कहना है कि दशमग्रंथ में आए इन अवतारों का केवल हिन्दू मान्यता के अनुसार जीवन चरित्र लिखा गया है, न कि उन्हें सिक्ख धर्म का हिस्सा माना गया है। ये सत्य है कि चौबीस अवतार अध्याय की विशेषता ये है कि ये एकेश्वरवाद की ही बात करता हुआ चलता है और अवतारों (विष्णु को भी) को केवल परमात्मा के एजेंट्स और अंश की तरह देखता है. सिक्ख धर्म में इन चौबीस अवतारों को केवल मनुष्य मात्र माना गया है।कुछ सिक्ख इन अवतारों को नहीं मानते है। वैसे गुरुवाणी में ईश्वर, विष्णु, शिव आदि के अवतारों व रूपों का उल्लेख है जिसका कारण संभवतः आवागमन सिद्धांत है।


●  हे ईश्वर तू ही नरसिंह अवतार, कृष्ण अवतार और तू ही वामन रूप है।
[गरूग्रंथ: 1082]

● कई कोटि होए अवतार।
कई करोड़ो हुए है दिव्य अवतार।
[गरूग्रंथ : 276]


मनु का ज़िक्र।

दशमग्रन्थ के चौबीस अवतार नामक अध्याय में 16वा अवतार मनु राजा है। इसमें बताया है कि जब सबने सरावग मत (श्रावक मत यानी जैन धर्म) को अपना लिया, धर्म को छोड़ दिया, सबने हरी (परेमश्वर) को त्याग दिया, तब कालपुरख (परमेश्वर) ने विष्णु से कहा और विष्णु ने मनु राजा का अवतार लिया। उन्होंने मनुस्मृति का पूरे विश्व में प्रचार किया और वो सभी को सही मार्ग पर ले आए। पापियों को मृत्य दी। जो अधर्मी राज्य को छोड़ गए वो श्रावक बने रहे पर बाकी सब धर्म के मार्ग पर आ गए। इसके लिए मनु को विश्व भर में बहुत सम्मान मिला। 

इससे यही प्रतीत होता है कि ये जिस राजा मनु की बात कर रहे है वो जैन धर्म के काल में होगा और ज़रूरी नहीं कि वह महावीर के काल में हुआ हो। क्योंकि हम जानते है कि जैन धर्म महावीर स्वामी से पहले के 23 अन्य तीर्थंकर को मानता है जिससे जैन धर्म का काल 6th Cent BC से कई सौ सदियों पहले तक का हो सकता है बल्कि वह तो अपने प्रथम तीर्थंकर को ही लाखों वर्षों पूर्व का सिद्ध करते है। दशमग्रन्थ अनुसार राजा मनु ने मनुस्मृति का प्रचार किया था। अब अगर प्रथम मनु मनुस्मृति का रचयिता था तो मनु राजा प्रथम मनु हो ही नहीं सकता क्योंकि प्रथन मनु के समय कोई भी अन्य धर्म था ही नहीं। मगर राजा मनु को वैववस्त मनु माना जा सकता है क्योंक एक मत ये है कि मनुस्मृति की रचना वैवस्वत मनु ने ही कि थी। और राजा मनु कोई अन्य मनु हो नहीं सकते क्योंकि 7 मनु में से सबसे अंतिम आये मनु, वैवस्वत ही थे। अन्य 7 को अभी आना बाकी है। कोई भी मनु महावीर स्वामी के समय नहीं हुआ।

● मनु सिमिरितहि प्रचुर जगि करा।
मनु ने मनुस्मृति का जग में प्रचार किया।
[दसम ग्रन्थ: चउबीस अउतार: मनु राजा: 3 : 2]

● पंथ कुपंथी सब लगे स्रावग मत भयो दूर।
सभी कुपंथी पंथ पर चल पड़े, श्रावक मत (जैन धर्म) को छोड़ दिया।
[दसम ग्रन्थ: चउबीस अउतार: मनु राजा: 8: 1]

● मनु राजा को जगत मो रहियो सुजसु भरपूर।
इसके लिए मनु को पूरे विश्व में भरपूर सम्मान मिला।
[दसम ग्रन्थ: चउबीस अउतार: मनु राजा: 8 : 2]


कल्कि अवतार का ज़िक्र।

दशम ग्रन्थ में जिस अंतिम अवतार कल्कि का उल्लेख है, उसको अभी आना बाकी है। सिक्ख लोग कल्कि अवतार को नेहक-लंक अवतार कहते है। कल्कि अवतार के अध्याय में लिखा है की उस समय विश्व में बुराई ही बुराई होगी, लोग क़ुरान, वेद आदि पढ़ना छोड़ चुके होंगे। ये आयरन युग का अंत और सतयुग का आरम्भ काल होगा।  फिर नेहकलंक शंभल नामक स्थान में जन्म लेगा। उसकी आंखें काली होंगी। वह हाथ में तलवार लिए होंगे। वह चीन और मंचूरिया जाएगा और दोनो को जीत लेगा। वो फिर उत्तर की ओर आगे बढ़ेगा। तब आयरन ऐज (लौह युग) का अंत होने वाला होगा और उसे महसूस हो जाएगा कि सतयुग आने वाला है। उसके युद्ध में हाथी, महावत, घोड़े, रथ, रथसवार, तीर कमान, तलवार, कवच, धारदार हथियार, सेना होगी और राजा भी होंगे। वो मंचूरिया के राजा को हराएगा और युध्द नगाड़े बजाए जाएंगे। वह सभी राजाओं को जीत लेगा। इससे साफ प्रतीत होता है कि नेहकलंक अवतार की विशेषताएं वही है जो हिन्दू ग्रन्थ व मान्यता अनुसार कल्कि की है क्योंकि ये वही से प्रेरित है। दोनो धर्मो में दिए संकेतों के अनुसार ये स्पष्ठ है कि कल्कि या नेहकलंक को किसी पुराने समय में आना था जब ये सब चीज़ें युद्ध मे प्रयोग होती थी, न कि किसी आधुनिक समय में आएगा जब इन वस्तुओं का युद्ध में कोई प्रयोग ही नहीं होता है। 

पाप का सर्वनाश करने के कारण वह कल्कि अवतार कहलाया जाएगा।
[दसम ग्रन्थ : चउबीस अउतार: निहलंकि चौबिसवो अवतार : 141] 


राम का ज़िक्र।

हम जानते है कि राम नाम ईश्वर का था और राजा राम यानी रामचंद्र जी दशरथ के पुत्र का। ये बात रामचंद्र नाम के अर्थ, राम तारक मंत्र, कबीर के दोहों, भक्ति काल के कवियों और परंपरा आदि से सिद्ध है। गुरुग्रंथ में राम शब्द बहुत बार आया है जो अधिकतर ईश्वर के लिए ही आया है. रामचंद्र नाम भी आया है जो दशरथ पुत्र राम के लिए है, कुछ अपवाद के साथ। कंही कंही राम शब्द रामचन्द्र के लिए भी आया है जो संदर्भ से, रामायण की किसी कथा या पात्र के उल्लेख आदि से साफ हो जाता है जैसे गरूग्रंथ पेज 205, 521 में।

घटि घटि रमईआ रमत राम राइ गुर सबदि गुरू लिव लागे।
हर घट घट (शरीर) में सुंदर राम व्यापक है, गुरु के शब्द के द्वारा उससे लगन लगती है। 
[गरूग्रंथ : 172]

निरगुण रामु गुणह वसि होइ।
निर्गुण राम के वश में गुण होते है।
[गरूग्रंथ: 222]

हे प्रभु तू वह श्रीरामचंद्र है जिसका ना कोई रूप है ना रेख। (यंहा निराकर परमेश्वर की ही बात हो रही है.)
[गरूग्रंथ: 1082]


गुरु नानक जीवनी।

मुहम्मद सल्ल., अल्लाह की किताबों, इस्लाम संबधित बातों आदि का ज़िक्र जन्म सखि ग्रंथो में प्रचुरता से मिलता है। जन्म सखी का अर्थ जन्म कहानियां है। इनमें गुरु नानक की जीवनी है जो उनकी मृत्यु के बाद अलग अलग समय और चरणों पर लिखी गईं। भाई बाला वाली जन्म सखी सबसे प्रचलित जन्म सखी है। यह बाला संधू द्वारा 1592 में लिखी गई थी। यह जन्म सखी आमतौर पर गुरु नानक देव जी के जीवन की आधिकारिक खाते के रूप में स्वीकार की गई है। हालांकि इसकी प्रामाणिकता कभी सिद्ध नहीं हो सकी है। प्रमुख जनम सखी है:- भाई बाला वाली जन्म सखी, विलायत वाली जनम सखी (एक सेवादार द्वारा लिखी), हाफिज़ाबाद वाली जनम सखी, भाई मनी सिंह जनम सखी, मिहरबान जनम सखी।  पुरानी जन्म सखियों में जहां नानक के बगदाद और मक्का की यात्रा के बारे में बखान है वहीं नई जनम सखियों में चाइना और रोम की यात्राओं के बारे में भी बताया गया है। वैसे प्रमाणिक सिक्ख इतिहास से तो केवल यही मालूम होता है कि गुरु नानक मक्का और बनारस जैसे कुछ हिन्दू तीर्थ (मूर्तिपुजा के लिए नहीं) गए थे।


गुरु नानक मुस्लिम फ़क़ीर थे या सूफी फ़क़ीर।

नानक एक खत्री थे। वो हिन्दू धर्म से निकले एक तसव्वुफ़ के ईमाम थे. उन्होंने नहीं, उनके खलीफाओं ने बाद में सिक्खी को एक धर्म बनाया।
 
भक्तिकाल के अधिकांश गुरु व कवि आदि विभिन्न धर्मों की मिली जुली संस्कृति के सूत्रधार थे। गुरु नानक असल में एक सूफी फकीर थे। उनको क़ुरान, पुराण आदि का अच्छा ज्ञान था। उनके जीवन, घटनाओ, वस्तुओं आदि से ये साबित हैं। जो उनके अंदर था वही उनके बाहर दिखाई देता था। वो कतई झूठा दिखावा नहीं कर सकते थे। उनके चोले पर कलमा, फातिहा, आयात और दूसरी दुवाएं लिखी हुई थी जो आज भी बाबा नानक में देखा जा सकता है। उन्होंने पंडित और मुल्ला के खिलाफ बहुत कुछ कहा है। उन्होंने वेदों के खिलाफ भी कहा है पर क़ुरान के खिलाफ उन्होंने कभी कुछ नहीं कहा। ये एक सत्य है।

भाई मर्दाना मुसलमान थे और उनके प्रथम शिष्य थे। उनके कई शागिर्द मुसलमान थे। उस वक़्त मुल्लावाद हावी था पर फिर भी एक वाक़या नहीं मिलता जब किसी मुल्ला ने इनके किसी मुसलमान शागिर्द पर मुर्तद का इल्ज़ाम लगाया हो। मतभेद तो गुरु नानक के बहुत बाद औरंगज़ेब के वक्त में शुरू हुए जो बुनियादी तौर पर सियासी लड़ाई थी पंजाब पर पूर्ण अधिकार कायम करने की। यही वजह थी कि औरंगज़ेब के वक़्त से सिक्ख मुसलमानों से दूर होते गए जो कि लाज़मी था क्योंकि उनके विरोधीयो का मज़हब इस्लाम था।

गुरु नानक अपने पास एक किताब रखते थे हमेशा जिसे पोथी साहिब कहा जाता है। इसमें उनके द्वारा एकत्र वचन होते थे। ऐसा कहा जाता है की उसमें ज़यादातर क़ुरान ही मौजूद था। इसे उन्होंने अपने उत्तराधिकारी को सौंप दिया था। भाई गुरुदास बताते है कि अकसर क़ाज़ी और मौलवी गुरु नानक से कहते थे कि अपनी पोथी खोलके देखिए और बता दीजिए की हिन्दू और मुसलमान में कौन महान है। धीरे धीरे ऐसी ही कई पोथियाँ बनती गयी जिनमें पहले गुरु नानक की वाणी, फिर उनकी जीवनी आदि और फिर अन्य गुरुओं की शिक्षा भी नोट की जाती रही और ये पोथियाँ एक गुरु अगले गुरु को सौंपता जाता था। आज ऐसी कई पोथिया पाई जाती है।

Saturday, 12 June 2021

क्या भगवा रंग पहनना हराम है।


सबसे पहली बात सारे रंग अल्लाह के है। क़ुरान किसी रंग को मना नहीं करता। अल्लाह ने किसी रंग को हराम नहीं किया। किसी भी रंग का ताल्लुक मज़हब से नहीं है, चाहे हरा हो या भगवा। दुनिया में सिर्फ वही 5 चीज़ें हराम है जो क़ुरान ने बताई है और उसमें किसी रंग का ज़िक्र नहीं है।  हालांकि किसी खास काम या मौके पर किसी खास रंग को तरजीह दी जा सकती है। जैसे सफेद रंग एहराम और कफन के लिए मुस्तहब है। जैसे अल्लाह ने क़ौम मूसा से सुर्ख रंग की गाय ज़िबा करने को कहा था।

पूरे लाल रंग (बिना किसी और रंग के) के कपड़े, लाल प्लस जाफरानी रंग के कपड़ो, भगवा रंग के कपड़ों को पहनना हराम माना जाता है। हालांकि हदीसे बताती है कि नबी ने खुद लाल व जाफरानी रंग पहना है। ईसा अलैह अपनी वापिसी की वक़्त जाफरानी कपड़े पहने होंगे। हदीसो से ये भी पता चलता है कि नबी ने भी लाल रंग के कपड़े पहने थे पर उस पर कहा जाता है कि वो पूरे लाल नही थे। वैसे भी दोनों कपड़ो (उपर और लोअर) को इन रंग में होने से मना किया है। एक हदीस में (माजह 4077) में बताया गया है की दज्जाल और उसके साथी यहूदी हरे रंग का चोगे पहने हुए आयंगे. 

जिस तरह मर्दों को सलवार ऊपर रखना (ट्रैन क्लॉथ), सोना न पहनना और रेशन न पहनना मना था जिसका मुख्य कारण तकब्बुर, दिखावा, फिजूल खर्ची वैगरह था। उसी तरह कुछ रंगों को मना करने के पीछे भी तकब्बुर, दिखावा, दूसरे मज़हबों का पहनावा, औरतों से समानता, अरब के गर्म मौसम जैसे कई कारणों से था, न कि कोई दीनी हकुम। नबी के तरीके उसवा ए हसना है यानी सबसे बेहतरीन मिसाल है। नबी की सफेद पसंद था जिसकी कई वजह हो सकती है जैसे सूरज की रोशनी कम खींचना, सफेद कपडे आसानी से मिलना, रंगदार कपड़े आम न होना, सफेद की पवित्रता होना वगेरह। वैसे भगवा रंग पहन कर भी कोई दूसरे मज़हब का न लगे तो फिर भी क्या कुछ हर्ज है?

ज़ाफ़रान एक पौधा है जो खाने में डालने, इतर बनाने में, कपड़ो को चमकदार पिला करने के काम आता था। सेफरन से पीला और नारंगी रंग होता है और सेफफ्लावर को रंगने से लाल रंग होता है।

ईसा अलैह. के जाफरानी कपड़े।
नबी द्वारा खुद इस्तेमाल।

● नबी ने जाफरानी पुताई भी करवाई थी मस्जिद की दीवार पर जब कुछ लोगों ने दीवार पर थूक थूक कर गंदा कर दिया था।

जाफरानी कपड़ो को मना बाज़ लोगो को करना या बाज़ कपड़ो की बनावट पर ऐतरज़ात करना।


जाफरान से कपड़े रंगना या ज़ाफ़रान बदन पर लगना या जाफरानी खुशबू लगना।


मुहरिम यानी एहराम बांधने वालो के लिए।

हदीसो का टकराना या मंसूख हो जाना।
ह. फातिमा की हदीस बिना संदर्भ के बयान करना

दूसरे मनाही रंगों को इस्तेमाल करना।


Jaabir said: “I saw the Messenger  on the day of the Conquest of Makkah, wearing a black turban.” (Reported by Muslim).  Aaishah said: “I made a black burdah (cloak) for the Messenger and he wore it, but when he sweated in it he detected the smell of wool on it, so he took it off, because he used to like pleasant smells.” Reported by Abu Dawood. Al-Haakim (4/188) said: it is saheeh according to the conditions of the two shaykhs. Al-Dhahabi agreed with him. Shaykh al-Albaani said in al-Saheehah (5/168, no. 2136): It is as they said. Abu Dawood named a chapter in his Sunan “Bab fi’l-Suwaad (chapter on black clothes)”. The author of ‘Awn al-Ma’bood (11/126) said: The hadeeth indicates that it is permissible to wear black and that there is nothing makrooh in doing so.

मनु, पैग़म्बर और प्रोफेट।

 
【एक ख़ून - एक इंसानियत】

दुनिया की आबादी आज लगभग 8 अरब है। अनुमान है कि 500 साल पहले ये सिर्फ 50 करोड़ थी। 2000 साल पहले सिर्फ 3 करोड़ और 10000 साल पहले दुनिया मे सिर्फ कुछ लाख लोग ही थे।  समय में जितना पीछे जाते रहोगे, आबादी कम होती चली जाती है। पीछे जाते रहने पर एक समय ऐसा आयेगा जब मानव जीवन का आरम्भ हुआ था। उस समय धरती पर केवल एक स्त्री और एक पुरूष ही मौजूद थे। दुनिया के लगभग सभी धर्म व ग्रंथ यही बताते है और डीएनए विज्ञान भी यही इशारा करता है कि समस्त मानव जाति एक जोड़े से पैदा हुई है। इन्हें किसी मनुष्य ने नहीं जन्मा था पर सारे मनुष्य इन्हीं की संतान है और इसीलिये सभी मनुष्य आपस में रिश्तेदार हुए। आप मानों या न मानों पर हम सब एक ही परिवार के सदस्य है।

【मानवता के आधार】

■ सनातन धर्म में इस प्रथम पुरुष को स्वयम्भूमनु (आदम भी) और इस प्रथम स्त्री को शतरूपा (हव्यवती भी) कहा गया है। 

जनं मनुजातं।
मनु संतान मनुष्य।
[ऋग्वेद : 1 : 45 : 1]

स्वायंभुव मनु अरु सतरूपा, जिन्ह तें भै नरसृष्टि अनूपा।
स्वायम्भुव और उनकी पत्नी शतरूपा से मनुष्यों की यह अनुपम सृष्टि हुई है।
[रामचरितमानस : 1 : 141: 1]

आदमो नाम पुरुष पत्नी हव्यवती तथा।
आदम नाम वाला पुरूष तथा हव्यवती नाम वाली पत्नी थी।
[भविष्यपुराण: प्रतिसर्गपर्व: भाग 1 : अध्याय 4 : 18]

■ इस्लाम धर्म में इन दोनों को आदम और हव्वा कहा गया है।

ऐ लोगों हमनें तुम्हें एक पुरुष और एक स्त्री (आदम और हव्वा) से पैदा किया।
[क़ुरान : 49:13]

ऐ आदम, तुम और तुम्हारी पत्नी दोनों जन्नत में रहो।
[क़ुरान : 2 : 35]

■ ईसाई धर्म में इन्हें एडम और ईव कहा गया है।

एडम ने अपनी पत्नी का नाम ईव रखा क्यूँकि वह समस्त जीवितों की माता बनी।
[बाइबिल: जेनेसिस: 3 :20]

एडम और ईव की कहानी।
[बाइबिल: जेनेसिस : अध्याय 2 - 4]

■ यहुदी धर्म में  इन्हें आधाम और ख़व्वाह कहा गया है।

वहा आधाम याधअ अथ ख़व्वा इशतो।
आदम ने हव्वा को जाना।
[बाइबिल: बरेशीथ/उत्पत्ति : 4 : 1]

सिख धर्म में इनको आदम और हव्वा ही पुकारता है।

बाबा आदम कउ किछु नदरि दिखाई। उनि भी भिसति घनेरी पाई।
परमात्मा ने आदम को कुछ नज़र दिखाई। फिर उन्होंने भी बड़ी विहिश्त पाई।
(परमात्मा ने आदम जो मानवता के पिता है पर अपनी दया की और फिर वह हव्वा संग लंबे समय तक स्वर्ग में रहे।)
[श्री गुरूग्रंथ साहिब : अंग 1161 : 7]

■ पारसी धर्म मे इन्हें मश्य और मश्यान कहा गया है।
[बूनदाहिशन/Bundahishn]

■ शिंतो धर्म या जापानी पौराणिक कथाओं इन्हें इज़ानागी और इज़ानामी कहा गया है।
[कोजीकी/Kojiki]

■ इनका उल्लेख विभिन्न प्रसंगों के साथ बहुत सी अन्य प्राचीन सभ्यताओं और परंपराओं में भी पाया जाता है जैसे ग्रीक माइथोलॉजी में Epimetheus and Pandora, चीनी दंत कथाओं में FuXi and Nuwa, ऑस्ट्रेलियाई मूलनिवासी सभ्यता में Wurugag and Waramurungundi, एज़्टेक या मेक्सिकन सभ्यता में Oxomoco and Cipactonal, हवाईन प्राचीन मान्यताओं में Kumu Honua and Lalo Honua के नाम से।

■ इसके अलावा इनकी विभिन्न कथाएँ नॉर्स मायथोलॉजी (जर्मन - Ask and Embla), माओरी सभ्यता (न्यूज़ीलैंड - Rangi and Papa), चेरोकी सभ्यता (नेटिव अमरीकी), पेरू, फिलीपीनी और बहुत सी अफ्रीकी मायथोलॉजीस (जैसे युगांडाई, कीनियाई और नाइजीरियाई) में भी मिलती है।

■ जैन धर्म में मनु को कुलकर कहा जाता है। अंतिम कुलकर नाभिराज या नाभिराय थे जिनके पुत्र प्रथम जैन तीर्थंकर ऋषभनाथ या आदिनाथ थे। भागवतपुराण में नाभि को मनु बताया गया है। नाभिराज को स्वयम्भूमनु का पढ़पोता माना जाता है। वैसे आदिनाथ और आदम में भी कुछ समानताएं पाई जाती है।

■ हम जानते है कि श्रीलंका और भारत के बीच बना सेतु जिसे हम भारतीय रामसेतु कहते है, उसे दरअसल मुस्लिम और ईसाई एडम्स ब्रिज कहते है क्योंकि उनका मानना है कि इसी से हो कर एडम दुनिया भर में घूमे और रहे। इसी तरह श्रीलंका में एक पहाड़ी की चोटी का नाम एडम्स पीक है और ये जगह बुद्ध, मुस्लिम, ईसाई और हिन्दुओ के लिए पवित्र स्थान है। यंहा एक जोड़ा पांव के निशान पत्थर में उकरे हुए है। मुस्लिम और ईसाई इसे आदम के पांव के निशान मानते है। मुस्लिम साहित्य में ये बात पाई जाती है कि आदम को हिन्द या श्रीलंका (जो उस समय भारत का ही हिस्सा था) में उतारा गया था। हिन्दू इसे शिवजी के पांव के निशान मानते है (पुराणों में शिवजी और आदम की कहानी में कई समानता पाई जाती है)। वंही बुद्धिस्ट लोग इसे बुद्ध के पांव के निशान मानते है हालांकि कुछ बुद्धिस्ट इसे सिंबॉलिक और रेप्लिका मात्र भी मानते है। वैसे बौद्धधर्म की महायान शाखा में एक मुख्य परलौकिक बुद्ध है जिन्हें जापान में एमिड कहा जाता है।
 
श्रीलंका में इस चोटी को श्रीपदा कहा जाता है। इब्ने बतूता ने एडम्स पीक का दौरा किया है और इसे तीनों धर्मो से जुड़े होने की बात कही है।  अलबेरुनी ने भी एडम्स पीक के बारे में इसे बिबिलिकल एडम से जोड़ते हुए लिखा है। फाह्यान और महावंश (5th cent) बौद्ध ग्रंथ ने इसे बुद्ध के पदचिन्ह कहे हैं। हालांकि 3rd Cent. ईसापूर्व के समय से ही बुद्ध का श्रीलंका जाने और उनसे जुड़े पवित्र स्थानों का उल्लेख मिलता है। स्कंद पुराण (4th cent.) और तमिल संगम साहित्य (2nd cent. BC - 3rd Cent. AD) में शिव के पदचिन्ह वाला एक पर्वत का उल्लेख मौजूद है।

जो भी हो, कंही न कंही, किसी न किसी तरह, हर धर्म और हर इंसान इस प्रथम जोड़े से जुड़ा हुआ है।

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मनु, मनुस्मृति, कुलकर, नूह, आदम, हव्वा और भविष्यपुराण पर चर्चा।

वेदों में लगभग 75 बार मनु नाम आता है। वेदों में मनुष्य शब्द भी कई बार आता है। मनु शब्द से ही मनुष्य और मानव शब्द बने है। ऐसा भी कहा जाता है कि मनु के मानने वालों को मानव कहा जाता था। अंग्रेज़ी का मैन शब्द मानव से ही बना है। 

ऋग्वेद 1:13:4, 1:80:16, 1:114:2, 2:20:7, 2:33:13, 10:63:7 और अथर्ववेद 14:2:41 में मनु का उल्लेख है। वेदों में कुछ जगह मनु को पिता कहा गया है। मार्कण्डेयपुराण, गरुड़पुराण, भागवत और गीता (10:6) भी मनु का उल्लेख करते है। वेदों में कंही नही कहा गया कि बहुत से मनु होते है पर पुराण ऐसा कहते है। पुराण आदि के अनुसार 1 कल्प काल में 14 मन्वंतर काल (मनु के नाम पर ही आधारित) माने जाते है जो लाखों वर्षों के होते है और उन 14 काल में 14 ही मनु हुए है। मनु एक उपाधि है जैसे सीज़र, फेरोह, जार, विक्रमादित्य, भोज, व्यास या इंद्र आदि। पर ये भी एक सत्य है कि जिस तरह ग्रंथो के अनुसार एक के बाद एक मनु आये, जो एके दूसरे से संबंध भी रखते थे, उससे ये असंभब लगता है कि उनमें लाखों सालों का अंतर रहा होगा।

प्रत्येक मनु के साथ उनके समय के सप्तऋषी होते है। सप्तऋषि का उल्लेख ग्रंथों में जगह जगह आता है। इनके व्यक्तिगत नाम वेदों में नहीं है पर उपनिषदों, ब्राह्मण, महाभारत आदि ग्रंथों में है। सप्तऋषियों के नाम पर मतभेद है क्योंकि अलग अलग ग्रंथों में अलग अलग नाम आते है। सप्तऋषियों के नाम पर प्राचीन खगोलशास्त्र में तारों के नाम भी रखे गए है। इन सप्तऋषि को मिलाके ही प्राचीन कुल 8 ऋषि हुए थे जिनसे गोत्र व्यवस्था आरंभ हुई।

जैन धर्म इन्ही 14 मनु को कुलकर कहा जाता है और अंतिम कुलकर नाभिराज या नाभिराय थे जिनके पुत्र प्रथम जैन तीर्थंकर ऋषभनाथ या आदिनाथ थे। नाभिराज को प्रथम मनु अर्थात स्वयम्भू मनु का पढ़पोता कहा गया है।

प्रथम मनु स्वयम्भू मनु थे जिनके नाम से ही स्पष्ट है कि उनका जन्म किसी मनुष्य से नहीं बल्कि अपने आप हुआ था। ब्रह्माण्ड पुराण में स्वयम्भू मनु को आदिपुरूष यानी पूर्वपुरूष कहा गया है। इनकी पत्नी शतरूपा थी। ब्रह्मपुराण इन्हें प्रथम स्त्री कहता है।  ऋग्वेद (1 : 45 : 1) कहता है जनं मनुजातं अर्थात मनुष्य मनु की संतान है। रामचरितमानस ( 1 : 141: 1) में तुलसीदास कहते है कि स्वायंभुव मनु अरु सतरूपा, जिन्ह तें भै नरसृष्टि अनूपा दंपति धरम आचरन नीका अजहूँ गाव श्रुति जिन्ह कै लिका अर्थात स्वायम्भुव और उनकी पत्नी शतरूपा से मनुष्यों की यह अनुपम सृष्टि हुई है, इन दोनों पति पत्नी के धर्म व आचरण बहुत अच्छे थे और आज भी वेद इनकी मर्यादा का गुणगान करते है। स्वयम्भू का अर्थ है जो स्वयं पैदा हुआ और शतरूपा का अर्थ है सौ रूपों वाली।

वर्तमान काल के ऋषि या 7वे मनु, वैवस्त मनु है। विष्णुपुराण में इन्हें श्राद्धदेव मनु या सत्यव्रत मनु भी कहा गया है। इन्ही के काल में महाजलप्रलय आई थी और इन्होंने उसके लिए एक बहुत बड़ी नौका बनाई और उसमें 7 ऋषि नर नारी के साथ सवार होकर बच गए थे, बाकी सभी डूब गए थे। इसके बाद जीवन फिर से शुरू हुआ। 

महाभारत (आदि पर्व/1: संभवपर्व/अध्य्याय 75 : 14) कहती है कि वैवस्त मनु से ही सब मनुष्य पैदा हुए है और इसलिए मनुष्य मानव कहलाये गए। अथर्ववेद 8:10(4):10 में वैवस्त मनु का नाम है। कुछ वैदिक सूक्तों का ऋषि वैवस्त मनु है जैसे ऋग्वेद 8:27 से 8:31 तक। शतपथ ब्राह्मण (1:8:1:1) में, मत्स्यपुराण (अध्याय 1-2) में,  भविष्यपुराण (प्रतिसर्गपर्व, भाग प्रथम, अध्याय 4-5) में मनु की महाजल प्रलय की कथा आती है। विष्णुपुराण, अन्य पुराणों में भी मत्स्यकथा आती है और वेदों में भी इसके कंही कंही बीज है। नौका को बचाने आयी मछली को पुराणों में विष्णु का रूप कहा गया है, हालांकि महाभारत में इसे ब्रह्मा के साथ जोड़ा गया है। मत्स्यपुराण में टिप्पणी की गयी है कि ये सत्यव्रत राजा है जो आगे जाके वैवस्त मनु हुए और आगे कहा गया है कि दुबारा जीवन आरम्भ होने के बाद वेदों का पुनः प्रवर्तन होगा।

स्वामी दयानंद ने ईश्वर का एक अन्य नाम मनु भी बताया है। मनुस्मृति 12:123 में ईश्वर को प्रजापति मनु कहा गया है। महाभारत (आदिपर्व 66:17) में कहा गया है की ब्रह्मा के पुत्र मनु थे जिनका नाम देव और प्रजापति भी है।  रामायण में मनुस्मृति और मनु की प्रतिष्ठा की गई है और श्लोक भी लिए गए है पर मनुस्मृति में राम या वाल्मीकि का उल्लेख नहीं है। यानी मनुस्मृति के बाद राम हुए और फिर कृष्ण। केवल स्वामी दयानंद ने मनुस्मृति को आदिसृष्टि में होना माना है। 

सामान्यतः मनुस्मृति स्वयम्भू की कृति कही जाती है पर एक छोटा सा मत है कि यह वैवस्त मनु की है। हालांकि प्रमाण से कोई नहीं कह सकता कि इसे किस ने लिखा। ये भी माना जाता है कि वेदों में वर्णीत मनु ने ही मनुस्मृति लिखी थी चाहे कोई से हो।  हो सकता है प्रत्येक मनु काल में इसका संशोधन हुआ हो।  आर्य समाज मानता है कि वेदों में व्यक्तिगत नाम नहीं है इसलिए ये वेदों में मनु शब्द योगिक नाम है। ऐसी ही बात यास्क ने भी कही है की पहले शब्द का योगिक प्रयोग होता है फिर वह व्यक्तिगत नाम बन जाता है। जबकि ग्रिफिथ ने अपने वेद अनुवाद में मनु का अर्थ बताया है कि Man par excellence, Representative man, Father of human race, First institutor of sacrifices, Religious ceremony.


संस्कृत में आदम की धातु आद्य आज भी पाई जाती है। इसी से आदि शब्द बना है जिसका अर्थ है प्राचीनतम। आदि से आदिम बना है जिसका अर्थ है प्रथम, पिछला या प्राचीनतम। ऐसे ही आदिमयुग, आदिमानव जैसे शब्द बने। आदिम से आदम शब्द बना है। इसी कारण इंसानों को आदमी पुकारा गया। हरिवंश पुराण में आदम को ब्रह्मा नाम से पुकारा गया है।  पुराण में कहा गया है कि ब्रह्मा ने स्वयं के शरीर को दो भाग में बांटकर स्वयम्भू (स्वयं उत्पन्न ब्रह्मा) मनु और शतरूपा को बनाया। पुराण अनुसार ब्रह्मा विष्णु के हिरण्यगर्भ से उत्पन्न हुए थे ईश्वर का ही रूप है जिनका कार्य सृष्टि संभालना है। ब्रह्मा से 4 मुनि या 4 कुमार उत्पन्न हुए जिनकी कोई मां नहीं है। इनके बाद 7 ऋषि पैदा हुए। 4 मुनि और 7 ऋषि को मनसपुत्र भी कहा गया है अर्थात ब्रह्मा पुत्र। इनके बाद फ़ीर 14 मनु। 

वैवस्त मनु के बड़े पुत्र इक्षवाकु से क्षत्रिय में दो वंश चले सूर्यवंश और चंद्रवंश चले। अनुमान है कि नूह के दो बेटों हेम या हाम (सूर्य) और सेम या साम (चंद्र) से जो दो वंश चले थे वो यही थे।  नूह मूल संस्कृत शब्द नु से बना जिसका अर्थ है नौका।

अथर्ववेद में ब्रह्मा इब्राहिम है, अथर्वा इस्माइल है, अंगरिका इसहाक का नाम है। अबिराम भी नाम आया है। अथर्ववेद में पुरूषमेध यज्ञ का भी उल्लेख है।

मत्स्यपुराण में ब्रह्मा की पत्नी शतरूपा या सरस्वती को बताया गया है जिससे इन दोनों का पुत्र स्वयम्भूब मनु या अधिपुरूष हुआ और स्वयम्भू की पत्नी अनंति को बताता है। मत्स्यपुराण और हरिवंशपुराण 1.2.1 को छोड़कर हर जगह शतरूपा को स्वयम्भू मनु की पत्नी बताया गया है।

Yama and Yami una were first siblings on earth. Yami is known as Yamuna and Kalindi also. She is regarded as the twin sister of Yama. According to the Vedas, Yama is said to have been the first mortal who died.

In Sumerian mythology, a god (also in the Atra-Hasis epic, Akkadian mythology or Babylonian versions) with the assistance of a goddess, created humans from clay or mud or earth and gave life to them. Here, the first woman is associated with the name Nin-ti (also considered a creator deity), meaning Lady of the Rib or Life, fertility, creation, giving life. Nin meaning lady or goddess. Ti can mean life or rib. She is also associated with the creation of the first woman. 
 
In Greek mythology, Prometheus is credited with the creation of humanity from clay. In some versions of the myth, he also breathed life into these clay figures. Epimetheus (brother of Prometheus) and Pandora (created by Hephaestus, the god of craftsmanship) was considered as Adam and Eve. Pandora is given a jar (Pandora's Box) containing all the evils of the world and when she opens it, she unleashes suffering upon humanity. However, she also releases Hope, which remains in the jar. This influenced Biblical narratives and then Islamic narratives.  Deucalion (son of Prometheus and man of flood) and Pyrrha (his wife) were considered the first modern humans because they were the survivors of the great flood.

As per Avesta, in Zoroastrian mythology, Ahura Mazda created from earth or clay, the first human, Gayomart (referred as primordial man) who was later killed by Angra Mainyu (evil spirit), the opponent of Ahura Mazda. His body became the source from which the first true human beings were created.

In Norse mythology of Europe, the gods discovered two lifeless beings, Ask (the man) and Embla (the woman), lying on the shore and breathed life into them to begin humanity.

In Māori folklore of New Zealand, the first human, Hineahuone and the first woman, were created by a God.


Some Amazing Facts about Puranas, Bible and Quran.

भविष्यपुराण के प्रतिसर्गपर्व में... आदम (Adam) का नाम  आदमो आता है जिन्हें वेदों में मनु और पुराणों में स्वयम्भू मनु कहा गया है। हव्वा (Eve) का नाम हव्यवती आता है जिन्हें ब्रह्मापुराण में शतरूपा कहा गया है। नूह (Noah) का नाम न्यूह आता है जिन्हें विष्णुपुराण में वैवस्त मनु कहा गया है। इब्राहिम (Abraham) का नाम अविराम आता है। मूसा (Moses) का नाम मूशा आता है। ईसा (Jesus) का नाम ईशा आता है। और मुहम्मद स. (Paraclete) का नाम महामद आता है।

आदम, एडम या स्वयम्भू सब नाम एक ही के है। हव्वा, ईव, शतरूपा आदि भी एक ही है। नूह, नोहा, वैवस्त आदि भी एक है। और भी ऐसे बहुत से ईश्वरदूत थे। कहने का अर्थ ये है कि ईश्वर एक है तो उसका धर्म भी एक है। उसने दुनिया के हर कोने में हर समय मे अपना धर्म भेजा, ग्रन्थ भेजे और इनके नाम बता दिए। समय के साथ व भाषा के प्रभाव आदि के कारण इनके नामों व कथाओं में, धर्म में, ईश्वरीय ग्रंथों में मिलावट होती गयी। इसी कारण आज सब धर्म अलग अलग दिखाई देते है। ईश्वर का सच्चा और मूल धर्म पाना है तो सभी धर्मों की समानताएँ अपना लो तो उसे अवश्य पा लोगे।

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(Origin of word Adam and Havva)

Bhagavad Gita: Chapter 9, Verse 13
महात्मानस्तु मां पार्थ दैवी प्रकृतिमाश्रिताः ।
भजन्त्यनन्यमनसो ज्ञात्वा भूतादिमव्ययम् ॥

हे पार्थ! किन्तु महान आत्माएँ जो मेरी दिव्य शक्ति का आश्रय लेती हैं, वे मुझे समस्त सृष्टि के उद्गम के रूप में जान लेती हैं। वे अपने मन को केवल मुझमें स्थिर कर मेरी अनन्य भक्ति करती हैं। 
(भूत-समस्त सृष्टि; आदिम्-उदगम; अव्ययम्-अविनाशी।)

हे पार्थ! मोहमुक्त महात्माजन दैवी प्रकृति के संरक्षण में रहते हैं | वे पूर्णतः भक्ति में निमग्न रहते हैं क्योंकि वे मुझे आदि तथा अविनाशी भगवान् के रूप में जानते हैं |
(भूत – सृष्टि का; आदिम् – उद्गम; अव्ययम् – अविनाशी |)

But the great-souls, O Partha, partaking of My divine nature, worship Me with a single mind (with a mind devoted to nothing else), knowing Me as the Imperishable Source of all beings. 
(bhuta = of creation, adim = the origin, avyayam = inexhaustible)

(1)
Bhuta = of creation/creation
Adim = origin/original
so Bhutadim = Original Creation

(2) 
Avva, Amma, Amba= mother
(in Kannada language, spoken in North Maharashtra as well)
so Durgavva (Durga + Avva) = Godess/Mother Durga

Thus the word Avva may possibly originate from the word Havva/Eve or vice versa.
 
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अरबी में Adim का अर्थ है, पृथ्वी की सतह मगर इसकी कोई भी तीनों अक्षरों की मूल धातु अरबी में उपलब्ध नहीं है  इसलिए आदम शब्द को हिब्रू भाषा के adamah शब्द से निकला हुआ माना जाता है जिसका अर्थ है, भूमि या मिटटी परत्नु उसके पीछे भी कोई मूलधातू मालूम नहीं पड़ती है. हिब्रू भाषा में यह शब्द धार्मिक तौर पर इस्तेमाल हुआ मिलता है. संस्कृत के आदि शब्द का अर्थ है, प्रथम, प्रारंभ और इसका प्रयोग साहित्यिक और व्याकरणिक तौर पर भी मिलता है. इस शब्द को धातु अद (खा जाना, ग्रहण करना - शायद फल) से निकला माना जाता है. वंही संस्कृत में दम शब्द का अर्थ है संयम और आत्म नियंत्रण (फल खाने से रोकना). शायद आदम शब्द इन्हीं दोनों  (आदि+अम=अदिमा) से मिलकर बना है. संस्कृत के आदि शब्द को को हिब्रू के adamah से पुराना माना जाता है. अरबी और हीब्रू एफ्रो-एशियाई भाषा परिवार की सेमेटिक शाखा की भाषायें हैं। जबकि संस्कृत, अवेस्तन प्रोटो-इंडो-योरोपियन भाषा परिवार की मानी जाती है। दोनों परिवार प्रोटो होने के नाते से एक दूसरे से प्रभावित हो सकती हैं। इसलिए संभवत इस शब्द का मूल प्रोटो भाषा में ही छिपा है. 
 
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Claiming that Prophet Muhammad was the last Prophet of his time, zone and Lineage

Quran can be, and should be, interpreted in the light of new circumstances. However, there are some fundamentals of religion mentioned in the Quran. Any new interpretation is acceptable as long as it does not go against these fundamentals or basic concepts. For example, tawheed, the finality of Prophet-hood, the Qur’an being the Book of Allah, and the obligations of salah (namaz), hajj, zakat and sawm (roza) and some more doctrines cannot be understood in any contrary way. Everything else can be viewed and interpreted from different angles.
 

दर्शन विज्ञान और ईश्वर

   दर्शनशास्त्र की 3 शाखाएँ हैं:- I. तत्वमीमांसा/ तत्वज्ञान (Metaphysics - beyond physics/theory of reality) [तत्व, अस्तित्व, वास्तविकता का ...