क्या औरत कम अक़ल है? क्या मर्द औरत का हाकिम है? क्या औरत की गवाही आधी मानी जाएगी? क्या औरत को आधी विरासत का हक़ है? क्या बिना मर्द के औरत सफर कर सकती है? क्या औरत मुल्क की हाकिम या सदर नहीं बन सकती? क्या औरत, मर्दो की इमामत कर सकती है? इस्लाम की शुरवात में मुस्लिम औरतों की समाजी और सियासी स्थिति के उदाहरण।
1. औरत नाक़िसउल अक्ल वत दीन वाली हदीस की हकीकत.
एक हदीस (बुखारी 304, 1462, 1951,2658; तिरमिजी 2613) की बुनियाद पर कहा जाता है कि औरत नाक़िसउलअक्ल वतदीन हैं यानी अक़ल और दीन में औरतों कम होती है. यह हदीस इस हदीस में शब्द नक्स के आधार पर गलत अर्थ में पेश की जाती है. क्योंकि नाक़िस लफ्ज़ अरबी के मूल ‘न.क.स.’ से बना है जिसका मायने रियायत देने के या ज़िम्मेदारी कम करने के होते हैं, न कि नुक़्स के. सूरह तौबा में इस लफ्ज़ का इस्तेमाल 'पूरा करने, अदा करने में कमी न करने' के मायनों में ही हुआ है. इसी लफ्ज़ से उर्दू का लफ्ज़ नुक्स बना है मगर नुक्स लफ्ज़ के मायने अलग हैं और नुक्स का मतलब कमी से लिया जाता है. इससे यही पता लगता है कि उर्दू अनुवाद करने वालों लफ्ज नुक्स की बुनियाद पर इस हदीस को गलत समझ लिया है.
यह वाकया तब का है जब मुसलमान मक्का से मदीना हिजरत कर गए थे और मुहम्मद साहब ने ईद की नमाज के बाद यह बात फरमाई थी. हुआ यह था की सहाबा ने आप से आके औरतों कि शिकायत कि और कहा कि हमारी औरतें मक्का में तो हमारी सुनती थी पर यहां आकर ना जाने उन्हें क्या हो गया है। इस बात पर मोहम्मद साहब ने औरतों को तवज्जो दिलवाने के लिए कहा कि मैंने जहन्नुम में ज़्यदातर औरतों को देखा है, क्योंकि कि वो अपने पतियों की बहुत कमियाँ निकालती हो और उनकी न शुक्रगुजारी करती हैं जबकि अलाल्ह ने तुमने नाक़िस उल अक़ल वत दीन बनाया है (यानी जबकि अल्लाह ने तुम पर दुनिया और दीन की ज़िम्मेदारी भी कम डाली है), बल्कि तुम तो अक़्लमंद से अक़्लमंद मर्द तक की अक़ल तक हर लेती हो। पूछे जाने पर फिर आगे मुहम्मद साहब ने दीन और दुनिया के मामलों मे मर्दों के मुक़ाबले औरतों पर डाली कम ज़िम्मेदारी के कुछ उदाहरण इस हदीस मे ही बताए गए हैं जैसे कि मासिक धर्म के समय नमाज़ और रोज़े की अनिवार्यता ख़त्म हो जाती है (यानि उन्हें इस समय नमाज़ न पढ़ें और रोज़ा न रखें कि छूट है) और गवाही के मामले में 1 की बजाय 2 औरतों को गवाह बनाने का आदेश है (ताकि 2 साथी बना कर उनका साथ, हिम्मत, हौंसला मजबूत किया जा सके)।
जाहिर है आज भी कुछ मर्द अक्सर ऐसा महसूस करते हैं की औरतें अपनी चलाती हैं या मर्दों की नहीं सुनती. इसीलिए आपने जो कहा महफ़ूम है कि अल्लाह ने औरतों पर बहुत इनायते की है और उन पर दीन और दुनिया की ज़िम्मेदारी कम डाली है जबकि मर्दों पर ज्याड़ा जिम्मेदारियाँ हैं इसलिए उन्हे तंग न किया करो, छोटी छोटी तकलीफों पर यह न कहा करो कि तुमने किया ही क्या, उनके सारे किये कराये पर पानी मर फेर दिया करो, बल्कि तुम तो इनकी अक़्लमंद होती हो कि बहुत ज़हीन, तजुर्बेकार, अकलमंद आदमी तक कि अक़ल को लोच लेती हो। औरतों के हुकुकों के बारे में और शुक्रगुजार होने के बारे में ऐसी हिदायतें तो नबी ने मर्दों को भी अनेकों बार दी हैं, सख्त लफ्जों में भी समझाया है। इस हदीस से लोग यह मानते हैं की औरतों की अक़ल कम होती है मगर हदीस में तो मुहम्मद साहब ये कह रहे हैं औरतें ऐसी (अकलमंद) होती हैं कि मर्दों की अक्ल तक को हर लेती हैं. इस हदीस से अगर अक़ल मे कमी के मायने लेते हैं तो फिर लोगों को यह भी मानना चाहिए की औरतों के दीन में भी कमी होती है चाहे कितनी तकवेदार हो, मगर मुस्लिम ऐसा नहीं मानते कि उनका दीन अधूरा या कम होता है.
2. क्या दीन के मुताबिक मर्द औरत का हाकिम हैं?
सबसे पहल हमें सरबरा, बरतर, फ़ज़ीलत जैसे शब्दों के अर्थ को कॉन्टेक्स्ट में समझने की और दुनिया और समाज की कुछ हकीकतें समझने कि कोशिश करनी चाहिए. समाज में बाप और बेटी में कौन बड़ा माना जाता है? बाप को, तो इसका मतलब क्या यह हुआ कि बाप बेटी का मालिक या बढ़कर है? इसी तरह माँ और बेटे में किसे बड़ा माना जाता है? माँ को, तो क्या माँ बेटे की मालिक या बढ़कर हो गयी? नहीं, असल में समाज द्वार बाप या माँ को यह बरतरी दी गयी है उनके आपसी सम्बधों, महत्व, आवश्यकातों, उत्तरदायित्वों आदि के कारण, न कि उनके लिंग के कारण. परिवार एक संस्था है. किसी को उसका नेतृत्व करना पड़ेगा, किसी को उसकी बढ़कर जिम्मेदार उठानी पड़ेगी, किसी के ज़िम्मे कोई कम आएगा और किसी के ज़िम्मे दूसरा. मर्द की ज़िम्मेदारी बहुत से कामों में बरतर या आगे रह कर जीवन चलाने की है और कुछ में औरत की है. इससे न तो मर्द बेहतर हो जाता है और न मालिक. दुनिया में एक को लीड करना ही पड़ेगा और एक को बेक एंड पर रहना पड़ेगा. ये चाहे तो अपने स्थान अदल- बदल भी सकते हैं, इसमें कोई रोक या बुराई नहीं है. हालाँकि ऐसा अदल बदल होने पर समाज ही इसका इंकार कर देता है (यानि जब मर्द घर पर रहकर घर संभालने लगता है और औरत मर्द की बजाय खुद बाहर निकलर पैसा कमा कर घर लाने लगती है) और ऐसे मर्द की इज्ज़त की कम होने लगती है और औरत को भी अच्छी निगाह से नहीं देखा जाता. असल में यह बात शादी के बारे में कही गयी है यानी घर - परिवार चलाने के बारे में. यह दुनिया के सभी मर्दों के के बारे में नहीं कही गयी है कि मर्द औरतों से ऊपर हैं या दुनिया में औरतें मर्दों से कमतर होती है. जैसे मोटरसाइकिल के दो पहिये होते हैं, आगे वाला पहिया लीड करता है और झटकों से बचाता है. पीछे वाला आगे वाले के अनुसार चलता है. मगर पीछे वाला पहिया ही गाडी का असल भार उठाता है और इंजिन के साथ चलता है, अगर वो न हो तो गाडी ही न चलें. यानी के दोनों पहियों की स्तिथि व ज़िम्मेदारी अलग है परन्तु दोनों ज़रूरी है. इसी प्रकार मर्द और औरत परिवार और समाज को चलाने में अपना योगदान देते है, एक आगे रहकर और एक पीछे रहकर.
3. क्या औरत की गवाही आधी मानी जाएगी?
सबसे पहला सवाल
यह है कि क्या निकाह के वक़्त जब औरत की रजामंदी या गवाही ली जाती है तो क्या वो आधी
मानी जाती है? इस बात को सही माने तो एक साथ, दो औरतों से निकाह कुबूल है, कहलवाना चाहिए ताकि दो
को मिलाकर गवाही पूरी हो जाये. क्या खून का मुकद्दमें के दौरान कोई यह कह सकता है
कि खून होता हुआ देखने वाली औरत की गवाही आधी है, इसलिए
कंहीं से भी दूसरी औरत लेके आओ तभी कातिल को सजा होगी? मरने
वाले के परिवार पर क्या गुजरेगी? यह बात अक्ल और इंसाफ के
खिलाफ है कि जाराइम के मुकद्दमों में औरत की आधी गवाही मानी जाए. असल में आधी गवाही का कानून अपराधिक (क्राइम के)
मामलों में नहीं है बल्कि अनुबंध (कॉन्ट्रैक्ट) से संबंधित मामलों में है. कुरान कहता है कि लेन देन के मामले (फायनेंशियल
मैटर्स) लिख लिया करो और (किसी मौके पर गवाह बनाने हो तो) 2
मर्दों को गवाह बना लो या फिर 1 मर्द या 2 औरतों ताकि एक औरत गलती (भूल आदि) करें तो दूसरी उसे याद दिला दें. यह हिदायत भूलने की वजह से नहीं बल्कि भटकने की वजह से दी गई है। असल में कुरान में वंहा जो लफ़्ज़ आया है, उसका मतलब भूल नहीं बल्कि भटकना है। इसका मतलब साफ है की ये बात तब लागु होगी जब
गवाह बनाना आपके हाथ में होता है, न कि क्राइम के समय जब कोई
1 आदमी, 1 औरत या 1 बच्चा तक भी गवाह हो सकता है जो बाय चांस बनते हैं, प्रीप्लांड नहीं. इस मामले में
कुरान की भाषा और लहजा समझने से ही यह बात
साफ़ हो जाती है कि यह सिर्फ एक प्रोएक्टिव मेजर है. ये उसी तरह है जैसे एक से भले दो होते
हैं. ज़रूरी नहीं है कि ये हिदायत हर केस में
शत प्रतिशत रिजल्ट देगी क्यूंकि 2 औरत की गवाही में दोनों भी
गलत गवाही दे सकती है जैसे 1 मर्द भी गलत गवाही दे सकता
है. मगर क्यूंकि मर्द और औरत की सामाजिक,
शारीरिक, आर्थिक, स्तिथि
में फर्क होता है इसलिए औरतों को 2 गवाह बना कर उनके गलत
बयानी की संभावनाओं को यंहा कम किया गया है. यानी अगर एक औरत किसी दबाव, प्रभाव (पारिवारिक,
सामाजिक, शक्ति) आदि में गलत बयानी करें तो
दूसरी औरत सच्चाई उजागर कर दे. यानि यह आदेश गवाही के मामलों में औरतों का 1 की बजाए 2 साथी बना कर उनका साथ, हिम्मत, हौंसला मजबूत किया जाने का प्रावधान है।
यंहा हमें यह भी समझना चाहिए कि कुरान उस समय के लोगों से मुखातिब था और कुरान सुरक्षित करने के साथ साथ हिदायत के तौर पे आगे बढाया गया. जिस समय कुरान में यह कहा गया है, उस दौर में औरतों का इंडीपेंडेंट होना, या उनका घर से निकलना, या मामलात में गवाह बनना आदि इतना आम नहीं था। इसलिए ये हिदायत उस वक्त की सामाजिक, स्थानीय, तंत्रीय आदि व्यवस्था के अनुसार दी गयी थी. असल में यह शरीअत का हुकुम नहीं है बल्कि एक हिदायत है. यानी की अगर औरतों द्वारा यह गलती होने के चांस बाकी न रहे तो यह कानून भी लागु करने की ज़रूरत नहीं है और एक औरत की गवाही भी मर्द के बराबर मानी जायगी. क्यूंकि कुरान में ही इस हिदायत के पीछे की वजह स्पष्ट कर दी गयी है. आप खुद ही सोचिये की अगर जुर्म या अनुबंधों में इंसानों की गवाही या लिखत गवाही लेना शरियतन फ़र्ज़ ही होता तो आज तकनीक के ज़रिये होने वाली गवाही गैर शरई साबित हो जाती. जबकि आज तो लिखत के बजाय वीडियोग्राफी, फिंगर प्रिंट्स, डीएनए सैंपल, मोबाइल लोकेशन वगेरह से भी गवाही साबित हो जाती हैं जो बिलकुल काबिले कुबूल हैं. असल में इस हुकुम को जुरिस्ट्स ने बाद में जुर्म के मामलों से भी जोड़ दिया. बाज़ आलिमों ने सोचा कि जब करार के मामलों में औरत यह गलती कर सकती हैं तो जुर्म के मामलों में भी तो कर सकती है. मतलब जैसे अल्लाह यह बात न जानता हो या जैसे ये लोग अल्लाह से बेहतर कानून बनाना जानते हों.
4. क्या औरत को आधी विरासत का हक़ है?
औरत और मर्द दोनों का विरासत का हिस्सा अमूमन बराबर है। जैसे औलाद के मर जाने वाले केस मे माँ- बाप को बराबर (1/6th) मिलता है। खाला और मामू वाला केस होगा तो उन्हे भी आधा आधा मिलता है। मगर बेटे और बेटी वाले केस में बेटे का हिस्सा एक और बेटी का आधा है। यानि कि हर केस में औरत का हिस्सा आधा नहीं है बल्कि बराबर है। बेटी को आधा हिस्सा देने कि कुछ वजूहात है जैसे कि बेटे के कंधों पर घर की ज़िम्मेदारी होना, बेटी कि ज़िम्मेदारी मुख्यता ससुराल पर होना, बेटी को शादी में मेहर की रकम मिलना, अपने पति कि विरासत में भी हिस्सा मिलना वगैरह।
वैसे कोई चाहे तो अपनी बेटी को पूरा का पूरा हिस्सा भी दे सकता हैंअगर वो इसकी हकदार या ज़रूरतमन्द हो या कोई जायज़ वजह हो तो (जैसे उसकी की गयी खास खिदमत के बदले, भविष्य में मिलन वाली खिदमत के बदले, भविष्य में अगर अकले रह जाने के करना उसके लिए जीने में दुश्वारीया होने वाली हो, उसकी परवरिश में रह गयी किसी कमी के बदले, उसके अपंग आदि होने के कारण इत्यादि)। इसी तरह औलादों आदि को छोड़ कर दूसरों को या बाहर वालों को भी पूरी पूरी वसीयत दी जा सकती है मगर एक बड़ी जायज़ वजह चाहिए होगी ताकि खुदा के सामने जाने पर अपनी वजह को हक़ पर साबित कर सको। अगर ऐसी कोई बड़ी जायज वजह या ज़रूरत न हो तो बाहर वालों को पूरी वसीयत कभी न करो। इसलिए मुहम्मद साहब ने इस तरह बाहर की गयी वसीयत पर बस यही सख्त ताकीद की दूसरे बच्चों का भी ख्याल रखो इसलिए 1/3 से ज़्यादा बाहर न दो। कुरान की बताई गयी वसीयत के हिस्से असल में तब लागू होते हैं जब इंसान जिसको जितना देना चाहे दे दें (इसके लिए बड़ी जायज़ वजह की दरकार है) और फिर जो बचेगा वो कुरान के मुताबिक दिया जागा या फिर अगर कोई इंसान बिना वसीयत किए मर गया तो उस केस में कुरान की हिस्सों से संबधित हिदायतें अपने अपने आप उसके माल पर लागू हो जायगी और बाँट दी जाएगी। वसीयत का मतलब ही होता है मर्ज़ी से विरासत को तकसीम कर देना।
5. क्या बिना महरम के औरत सफर कर सकती है?
असल मे उस वक़्त
मे अरब और पूरी दुनिया का माहौल सुरक्षित नहीं था,
गाडियाँ नहीं थी, पुलिस नहीं थी, चप्पे
चप्पे पर होटल नहीं थे, सफर में बहुत समय लगता था, सफर मे सहूलतें नहीं होती थी, रास्तों डाकू, लूट पात आम थी। हज़रत आएशा तक पर सफर के दौरान ही तोहमत लग गयी थी, इस घटना से उस वक़्त में होने वाले सफर का अंदाज़ा लगाया जा सकता है कि यह
कितना मुश्किल और रिस्की होता था। आज भी इन्ही कारणों से बहुत सी स्थानों पर, औरतों अकेले सफर नहीं करती, रात में अकेले नहीं
निकलती इत्यादि। इन्हीं वजूहात से उस समय औरतों को बिना महरम सफर या हज के लिए मना
कर दिया था। मगर आज औरतों अकेले सफर कर
सकती हैं क्योंकि इस तरफ के रिस्क बेहद कम रह गए है। एक हदीस में तो मुहम्मद साहब खुद कहते हैं कि अगर तुम लंबा जीए
तो ऐसा वक़्त देखोगे जब एक औरत यमन से मक्का तक सही सलामत आएगी और उसे अल्लाह के सिवा
किसी का डर न होगा (बुखारी 3595). एक
और हदीस में मुहम्मद साहब कहते हैं कि अल्लाह तुम्हें ऐसे नवाज़ेगा कि एक औरत यमन से
मदीना तक या उससे भी आगे तक सफर कर सकेगी और उसे लूट लिए जाने का कोई डर न होगा (तिरमिजी
2953B)। कुरान और सुनन्ह में औरत
के बिना मर्द के सफर पार जाने को कहीं भी मना नहीं किया गया है। मगर आज भी मक्का में ये पाबंदी मौजूद है, जो इस्लाम के कारण नहीं बल्कि सऊदी अरब की सरकार द्वारा लगाई हुए है।
इसलिए इस पाबंदी को हटाया भी जा सकता है और हटाना भी चाहिए,
मगर कोई सुनता ही नहीं है। आज के सुरक्षित माहौल मे इस फिजूल की पाबंदी के कारण ही
कुछ औरतें हर साल हज बिना महरम के जाती हैं जिसके लिए वो झूठ लिखती हैं और किसी
पराए मर्द से झूठा रिश्ता पेपरों में दिखाकर हज पर जाती है। आज एक अकेली औरत पूरी दुनिया घूम आती है और आप उन्हें हज पर अकेले जान से कैसे रोक सकते हो।
6. क्या औरत को मुल्क का हाकिम या सदर बनाया जा सकता है?
औरत को बादशाह बनाने वाली बात एक रिवायत को गलत समझने के कारण कही जाती है जिसका संदर्भ और अर्थ बहुत अलग है। मुहम्मद साहब कई देशों को खत लिख कर इस्लाम की दावत दे चुके थे। इसके साथ ही आप ये पहशनगोई भी कर चुके थे कि रूमी, फारस जैसी हुकूमतें आने वाले वक़्त में ढहने वाली है और इस्लाम के आगोश में आने वाली है। फारस को लिखे खत को किसरा ने फाड़ दिया। कुछ दिन बाद बादशाह के रिशतेदारों ने उसे कत्ल कर दिया और उसकी बेटी को बादशाह बन गयी और इन्होनें भी वही रवैया अपनाया। इसलिए मुहम्मद साहब ने कहा कि इस कौम कि तबाही होकर रहेगी जिसने अल्लाह का हुकुम मानने कि बजाए, औरत (बादशाह को क़तल करके फिर से बादशाही बनाने मे लग गए) को हुक्मरान बना दिया।
7. क्या औरत, मर्दो की इमामत कर सकती है?
कुरान हमें अपने फैसले मशवरे की बुनियाद पर लेने को कहता है। अगर औरत, औरतों की इमामत कर सकती हैं तो मर्दो या मर्दो - औरतों दोनों की मिक्स जमात की भी कर सकती हैं बस पर्दे, हिजाब, अखलाकी वगेरह की शर्तों का खयाल रखना पड़ेगा। दीन के बुनियादी स्रोतों यानि कुरान और सुनन्ह में औरतों को ऐसी इमामत करने की मनाही नहीं है। मदीना में हुज़ूर ने उम्मे वरक़ा साहबिया को मस्जिद का इमाम बनाया था और एक मर्द को उस मस्जिद मुअज़्जिन मुकरर किया था। असल में पहले औरतों को इतनी छूट नहीं मिलती थी या ऐसा होना आम बात नहीं थी इसलिय आज इतिहास मे ऐसी मिसालें हमें नहीं मिलती हैं।
8. इस्लाम में औरतों
की समाजी और सियासी स्थिति के ज़मीन पर उदाहरण।
इस्लाम आने के बाद महिलाओं की स्तिथि में बहुत सुधार हुआ. मुहम्मद साहब के समय में हजरत खदीजा एक बड़ी व्यापारी थीं. हजरत आयशा आर्मी की लीडर थीं. हजरत उमर के समय में अलशिफा बिन अब्दुल्लाह नाम की एक सहाबिया थीं जो पहली लेडी जज और मार्केट प्राइस कंट्रोलर थीं. ह. खौला बिन्त अज़्वार एक योद्धा सहाबिया थीं. 9वीं सदी में मर्द और औरतों के लिए पहली मस्जिद नुमा युनिवर्सिटी बनाने का श्रेय फातिमा अल फहरी को जाता है. मुहम्मद साहब ने एक सहाबिया उम्मे वरक़ा को मस्जिद का इमाम बानाया था।
9. नरक में औरतों की ज्यादा तादात वाली हदीस।
पैगंबर (बुखारी : 29) ने कहा: "मुझे जहन्नुम की आग दिखाई गई थी और यह कि इसके अधिकांश निवासी महिलाएं थीं जो कृतघ्न थीं।" वजह पूछने पर कहा कि वे अपने पतियों के लिए कृतघ्न हैं और एहसानों और उनके लिए किए गए अच्छे (दान कर्मों) के लिए कृतघ्न हैं। यदि आप हमेशा उनमें से एक के लिए अच्छे (परोपकारी) रहे हैं और तब वह आप में कुछ देखती है (उसकी पसंद का नहीं), वह कहेगी, 'मुझे आपसे कभी कोई अच्छा नहीं मिला।
ये हदीस औरतों की इस और ध्यान दिलवाने के लिए बयान की गयी थी.
●●●
मनुमसृति 8:77:
एकोऽलुब्धस्तु साक्षी स्याद् भाव्य शुचयोऽपि न स्त्रीः।
स्त्रीबुद्धेरस्थिरत्वात् तु दोषैश्चन्येऽपि ये वृताः ॥
लोभ से रहित एक भी पुरुष साक्षी हो सकता है, परन्तु बहुत सी स्त्रियाँ, चाहे कितनी भी पवित्र क्यों न हों, साक्षी नहीं हो सकतीं, क्योंकि स्त्रियों की बुद्धि स्थिर नहीं होती, और न ही अन्य पुरुष जो दोषों से कलंकित हैं।
