Wednesday, 31 August 2022

इस्लाम में स्त्रियों की स्थिति से संबंधित उठाए जाने वाले प्रश्न।

 


क्या औरत कम अक़ल है?  क्या मर्द औरत का हाकिम है?  क्या औरत की गवाही आधी मानी जाएगी?  क्या औरत को आधी विरासत का हक़ है? क्या बिना मर्द के औरत सफर कर सकती है? क्या औरत मुल्क की हाकिम या सदर नहीं बन सकती? क्या औरत, मर्दो की इमामत कर सकती है? इस्लाम की शुरवात में मुस्लिम औरतों की समाजी और सियासी स्थिति के उदाहरण। 

 

1.  औरत नाक़िसउल अक्ल वत दीन वाली हदीस की हकीकत.

 

एक हदीस (बुखारी 304, 1462, 1951,2658; तिरमिजी 2613) की बुनियाद पर कहा जाता है कि औरत नाक़िसउलअक्ल वतदीन हैं यानी अक़ल और दीन में औरतों कम होती है. यह हदीस इस हदीस में शब्द नक्स के आधार पर गलत अर्थ में पेश की जाती है.  क्योंकि नाक़िस लफ्ज़ अरबी के मूल  ‘न.क.स.  से बना है जिसका मायने रियायत देने के या ज़िम्मेदारी कम करने के होते हैं, न कि नुक़्स के. सूरह तौबा में इस लफ्ज़ का इस्तेमाल 'पूरा करने, अदा करने में कमी न करने' के मायनों में ही हुआ है.  इसी लफ्ज़ से उर्दू का लफ्ज़ नुक्स बना है मगर नुक्स लफ्ज़ के मायने अलग हैं और नुक्स  का मतलब कमी से लिया जाता है. इससे यही पता लगता है कि उर्दू अनुवाद करने वालों लफ्ज नुक्स की बुनियाद पर इस हदीस को गलत समझ लिया है.

 

यह वाकया तब का है जब मुसलमान मक्का से मदीना हिजरत कर गए थे और मुहम्मद साहब ने ईद की नमाज के बाद यह बात फरमाई थी.  हुआ यह था की सहाबा ने आप से आके औरतों कि शिकायत कि और कहा कि हमारी औरतें मक्का में तो हमारी सुनती थी पर यहां आकर ना जाने उन्हें क्या हो गया है।  इस बात पर मोहम्मद साहब ने औरतों को तवज्जो दिलवाने के लिए कहा कि मैंने जहन्नुम में ज़्यदातर औरतों को देखा है, क्योंकि कि वो अपने पतियों की बहुत कमियाँ निकालती हो और उनकी न शुक्रगुजारी करती हैं जबकि अलाल्ह ने तुमने नाक़िस उल अक़ल वत दीन बनाया है (यानी जबकि अल्लाह ने तुम पर दुनिया और दीन की ज़िम्मेदारी भी कम डाली है), बल्कि तुम तो अक़्लमंद से अक़्लमंद मर्द तक की अक़ल तक हर लेती हो।  पूछे जाने पर फिर आगे मुहम्मद साहब ने दीन और दुनिया के मामलों मे मर्दों के मुक़ाबले औरतों पर डाली कम ज़िम्मेदारी के कुछ उदाहरण इस हदीस मे ही बताए गए हैं जैसे कि मासिक धर्म के समय नमाज़ और रोज़े की अनिवार्यता ख़त्म हो जाती है (यानि उन्हें इस समय नमाज़ न पढ़ें और रोज़ा न रखें कि छूट है) और गवाही के मामले में 1 की बजाय 2 औरतों को गवाह बनाने का आदेश है (ताकि 2 साथी बना कर उनका साथ, हिम्मत, हौंसला मजबूत किया जा सके)।  

 

जाहिर है आज भी कुछ मर्द अक्सर ऐसा महसूस करते हैं की औरतें अपनी चलाती हैं या मर्दों की नहीं सुनती.  इसीलिए आपने जो कहा महफ़ूम है कि अल्लाह ने औरतों पर बहुत इनायते की है और उन पर दीन और दुनिया की ज़िम्मेदारी कम डाली है जबकि मर्दों पर ज्याड़ा जिम्मेदारियाँ हैं इसलिए उन्हे तंग न किया करो, छोटी छोटी तकलीफों पर यह न कहा करो कि तुमने किया ही क्या, उनके सारे किये कराये पर पानी मर फेर दिया करो, बल्कि तुम तो इनकी अक़्लमंद होती हो कि बहुत ज़हीन, तजुर्बेकार, अकलमंद आदमी तक कि अक़ल को लोच लेती हो। औरतों के हुकुकों के बारे में और शुक्रगुजार होने के बारे में ऐसी हिदायतें तो नबी ने मर्दों को भी अनेकों बार दी हैं, सख्त लफ्जों में भी समझाया है।   इस हदीस से लोग यह मानते हैं की औरतों की अक़ल कम होती है मगर हदीस में तो मुहम्मद साहब ये कह रहे हैं औरतें ऐसी (अकलमंद) होती हैं कि मर्दों की अक्ल तक को हर लेती हैं.  इस हदीस से अगर अक़ल मे कमी के मायने लेते हैं तो फिर लोगों को यह भी मानना चाहिए की औरतों के दीन में भी कमी होती है चाहे कितनी तकवेदार हो, मगर मुस्लिम ऐसा नहीं मानते कि उनका दीन अधूरा या कम होता है. 

 

 

2.  क्या दीन के मुताबिक मर्द औरत का हाकिम हैं

 

सबसे पहल हमें सरबरा, बरतर, फ़ज़ीलत जैसे शब्दों के अर्थ को कॉन्टेक्स्ट में समझने की और दुनिया और समाज की कुछ हकीकतें समझने कि कोशिश करनी चाहिए.  समाज में बाप और बेटी में कौन बड़ा माना जाता है? बाप को, तो इसका मतलब क्या यह हुआ कि बाप बेटी का मालिक या बढ़कर है?  इसी तरह माँ और बेटे में किसे बड़ा माना जाता है? माँ को, तो क्या माँ बेटे की मालिक या बढ़कर हो गयी?  नहीं, असल में समाज द्वार बाप या माँ को यह बरतरी दी गयी है उनके आपसी सम्बधों, महत्व, आवश्यकातों, उत्तरदायित्वों आदि के कारण, न कि उनके लिंग के कारण.  परिवार एक संस्था है. किसी को उसका नेतृत्व करना पड़ेगा, किसी को उसकी बढ़कर जिम्मेदार उठानी पड़ेगी, किसी के ज़िम्मे कोई कम आएगा और किसी के ज़िम्मे दूसरा.  मर्द की ज़िम्मेदारी बहुत से कामों में बरतर या आगे रह कर जीवन चलाने की है और कुछ में औरत की है.  इससे न तो मर्द बेहतर हो जाता है और न मालिक.  दुनिया में एक को लीड करना ही पड़ेगा और एक को बेक एंड पर रहना पड़ेगा. ये चाहे तो अपने स्थान अदल- बदल भी सकते हैं, इसमें कोई रोक या बुराई नहीं है. हालाँकि ऐसा अदल बदल होने पर समाज ही इसका इंकार कर देता है (यानि जब मर्द घर पर रहकर घर संभालने लगता है और औरत मर्द की बजाय खुद बाहर निकलर पैसा कमा कर घर लाने लगती है) और ऐसे मर्द की इज्ज़त की कम होने लगती है और औरत को भी अच्छी निगाह से नहीं देखा जाता.  असल में यह बात शादी के बारे में कही गयी है यानी घर - परिवार चलाने के बारे में.  यह दुनिया के सभी मर्दों के के बारे में नहीं कही गयी है कि मर्द औरतों से ऊपर हैं या दुनिया में औरतें मर्दों से कमतर होती है.  जैसे मोटरसाइकिल के दो पहिये होते हैं, आगे वाला पहिया लीड करता है और झटकों से बचाता है.  पीछे वाला आगे वाले के अनुसार चलता है.  मगर पीछे वाला पहिया ही गाडी का असल भार उठाता है और इंजिन के साथ चलता है, अगर वो न हो तो गाडी ही न चलें. यानी के दोनों पहियों की स्तिथि व ज़िम्मेदारी अलग है परन्तु दोनों ज़रूरी है.  इसी प्रकार मर्द और औरत परिवार और समाज को चलाने में अपना योगदान देते है, एक आगे रहकर और एक पीछे रहकर.

 

 

3.  क्या औरत की गवाही आधी मानी जाएगी?

 

सबसे पहला सवाल यह है कि क्या निकाह के वक़्त जब औरत की रजामंदी या गवाही ली जाती है तो क्या वो आधी मानी जाती है? इस बात को सही माने तो एक साथ, दो औरतों से निकाह कुबूल है, कहलवाना चाहिए ताकि दो को मिलाकर गवाही पूरी हो जाये.  क्या  खून का मुकद्दमें के दौरान कोई यह कह सकता है कि खून होता हुआ देखने वाली औरत की गवाही आधी है, इसलिए कंहीं से भी दूसरी औरत लेके आओ तभी कातिल को सजा होगी? मरने वाले के परिवार पर क्या गुजरेगी? यह बात अक्ल और इंसाफ के खिलाफ है कि जाराइम के मुकद्दमों में औरत की आधी गवाही मानी जाए.  असल में आधी गवाही का कानून अपराधिक (क्राइम के) मामलों में नहीं है बल्कि अनुबंध (कॉन्ट्रैक्ट) से संबंधित मामलों में है.  कुरान कहता है कि लेन देन के मामले (फायनेंशियल मैटर्स) लिख लिया करो और (किसी मौके पर गवाह बनाने हो तो) 2 मर्दों को गवाह बना लो या फिर 1 मर्द या 2 औरतों ताकि एक औरत गलती (भूल आदि) करें तो दूसरी उसे याद दिला दें. यह हिदायत भूलने की वजह से नहीं बल्कि भटकने की वजह से दी गई है। असल में कुरान में वंहा जो लफ़्ज़ आया है, उसका मतलब भूल नहीं बल्कि भटकना है। इसका मतलब साफ है की ये बात तब लागु होगी जब गवाह बनाना आपके हाथ में होता है, न कि क्राइम के समय जब कोई 1 आदमी, 1 औरत या 1 बच्चा तक भी गवाह हो सकता है जो बाय चांस बनते हैं, प्रीप्लांड नहीं.    इस मामले में कुरान की भाषा और  लहजा समझने से ही यह बात साफ़ हो जाती है कि यह सिर्फ एक प्रोएक्टिव मेजर है.   ये उसी तरह है जैसे एक से भले दो होते हैं.  ज़रूरी नहीं है कि ये हिदायत हर केस में शत प्रतिशत रिजल्ट देगी क्यूंकि 2 औरत की गवाही में दोनों भी गलत गवाही दे सकती है जैसे 1 मर्द भी गलत गवाही दे सकता है.  मगर क्यूंकि मर्द और औरत की सामाजिक, शारीरिक, आर्थिक, स्तिथि में फर्क होता है इसलिए औरतों को 2 गवाह बना कर उनके गलत बयानी की संभावनाओं को यंहा कम किया गया है. यानी अगर एक औरत किसी दबाव, प्रभाव (पारिवारिक, सामाजिक, शक्ति) आदि में गलत बयानी करें तो दूसरी औरत सच्चाई उजागर कर दे.  यानि यह आदेश गवाही के मामलों में औरतों का 1 की बजाए 2 साथी बना कर उनका साथ, हिम्मत, हौंसला मजबूत किया जाने का प्रावधान है।  

यंहा हमें यह भी समझना चाहिए कि कुरान उस समय के लोगों से मुखातिब था और कुरान सुरक्षित करने के साथ साथ हिदायत के तौर पे आगे बढाया गया.  जिस समय कुरान में यह कहा गया है, उस दौर में औरतों का इंडीपेंडेंट होना, या उनका घर से निकलना, या मामलात में गवाह बनना आदि इतना आम नहीं था।  इसलिए ये हिदायत उस वक्त की सामाजिक, स्थानीय, तंत्रीय आदि व्यवस्था के अनुसार दी गयी थी. असल में यह शरीअत का हुकुम नहीं है बल्कि एक हिदायत है.  यानी की अगर औरतों द्वारा यह गलती होने के चांस बाकी न रहे तो यह कानून भी लागु करने की ज़रूरत नहीं है और एक औरत की गवाही भी मर्द के बराबर मानी जायगी.  क्यूंकि कुरान में ही इस हिदायत के पीछे की वजह स्पष्ट कर दी गयी है. आप खुद ही सोचिये की अगर जुर्म या अनुबंधों में इंसानों की गवाही या लिखत गवाही लेना शरियतन फ़र्ज़ ही होता तो आज तकनीक के ज़रिये होने वाली गवाही गैर शरई साबित हो जाती. जबकि आज तो लिखत के बजाय वीडियोग्राफी, फिंगर प्रिंट्स, डीएनए सैंपल, मोबाइल लोकेशन वगेरह से भी गवाही साबित हो जाती हैं जो बिलकुल काबिले कुबूल हैं.  असल में इस हुकुम को जुरिस्ट्स ने बाद में जुर्म के मामलों से भी जोड़ दिया. बाज़ आलिमों ने सोचा कि जब करार के मामलों में औरत यह गलती कर सकती हैं तो जुर्म के मामलों में भी तो कर सकती है. मतलब जैसे अल्लाह यह बात न जानता हो या जैसे ये लोग अल्लाह से बेहतर कानून बनाना जानते हों. 

 

 

4.  क्या औरत को आधी विरासत का हक़ है?

 

औरत और मर्द दोनों का विरासत का हिस्सा अमूमन बराबर है।  जैसे औलाद के मर जाने वाले केस मे माँ- बाप को बराबर (1/6th) मिलता है।  खाला और मामू वाला केस होगा तो उन्हे भी आधा आधा मिलता है।  मगर बेटे और बेटी वाले केस में बेटे का हिस्सा एक और बेटी का आधा है।  यानि कि हर केस में औरत का हिस्सा आधा नहीं है बल्कि बराबर है। बेटी को आधा हिस्सा देने कि कुछ वजूहात है जैसे कि बेटे के कंधों पर घर की ज़िम्मेदारी होना,  बेटी कि ज़िम्मेदारी मुख्यता ससुराल पर होना, बेटी को शादी में मेहर की रकम मिलना, अपने पति कि विरासत में भी हिस्सा मिलना वगैरह।  

 

वैसे कोई चाहे तो अपनी बेटी को पूरा का पूरा हिस्सा भी दे सकता हैंअगर वो इसकी हकदार या ज़रूरतमन्द हो या कोई जायज़ वजह हो तो (जैसे उसकी की गयी खास खिदमत के बदले, भविष्य में मिलन वाली खिदमत के बदले, भविष्य में अगर अकले रह जाने के करना उसके लिए जीने में दुश्वारीया होने वाली हो, उसकी परवरिश में रह गयी किसी कमी के बदले, उसके अपंग आदि होने के कारण इत्यादि)। इसी तरह औलादों आदि को छोड़ कर दूसरों को या बाहर वालों को भी पूरी पूरी वसीयत दी जा सकती है मगर एक बड़ी जायज़ वजह चाहिए होगी ताकि खुदा के सामने जाने पर अपनी वजह को हक़ पर साबित कर सको। अगर ऐसी कोई बड़ी जायज वजह या ज़रूरत न हो तो बाहर वालों को पूरी वसीयत कभी न करो। इसलिए मुहम्मद साहब ने इस तरह बाहर की गयी वसीयत पर बस यही सख्त ताकीद की दूसरे बच्चों का भी ख्याल रखो इसलिए 1/3 से ज़्यादा बाहर न दो।  कुरान की बताई गयी वसीयत के हिस्से असल में तब लागू होते हैं जब इंसान जिसको जितना देना चाहे दे दें (इसके लिए बड़ी जायज़ वजह की दरकार है) और फिर जो बचेगा वो कुरान के मुताबिक दिया जागा या फिर अगर कोई इंसान बिना वसीयत किए मर गया तो उस केस में कुरान की हिस्सों से संबधित हिदायतें अपने अपने आप उसके माल पर लागू हो जायगी और बाँट दी जाएगी। वसीयत का मतलब ही होता है मर्ज़ी से विरासत को तकसीम कर देना। 

 

 

 5.  क्या बिना महरम के औरत सफर कर सकती है?

 

असल मे उस वक़्त मे अरब और पूरी दुनिया का माहौल सुरक्षित नहीं था, गाडियाँ नहीं थी, पुलिस नहीं थी, चप्पे चप्पे पर होटल नहीं थे, सफर में बहुत समय लगता था, सफर मे सहूलतें नहीं होती थी, रास्तों डाकू, लूट पात आम थी। हज़रत आएशा तक पर सफर के दौरान ही तोहमत लग गयी थी, इस घटना से उस वक़्त में होने वाले सफर का अंदाज़ा लगाया जा सकता है कि यह कितना मुश्किल और रिस्की होता था। आज भी इन्ही कारणों से बहुत सी स्थानों पर, औरतों अकेले सफर नहीं करती, रात में अकेले नहीं निकलती इत्यादि। इन्हीं वजूहात से उस समय औरतों को बिना महरम सफर या हज के लिए मना कर दिया था।  मगर आज औरतों अकेले सफर कर सकती हैं क्योंकि इस तरफ के रिस्क बेहद कम रह गए है। एक हदीस में तो मुहम्मद साहब खुद कहते हैं कि अगर तुम लंबा जीए तो ऐसा वक़्त देखोगे जब एक औरत यमन से मक्का तक सही सलामत आएगी और उसे अल्लाह के सिवा किसी का डर न होगा (बुखारी 3595).  एक और हदीस में मुहम्मद साहब कहते हैं कि अल्लाह तुम्हें ऐसे नवाज़ेगा कि एक औरत यमन से मदीना तक या उससे भी आगे तक सफर कर सकेगी और उसे लूट लिए जाने का कोई डर न होगा (तिरमिजी 2953B)  कुरान और सुनन्ह में औरत के बिना मर्द के सफर पार जाने को कहीं भी मना नहीं किया गया है।  मगर आज भी मक्का में ये पाबंदी मौजूद है, जो इस्लाम के कारण नहीं बल्कि सऊदी अरब की सरकार द्वारा लगाई हुए है। इसलिए इस पाबंदी को हटाया भी जा सकता है और हटाना भी चाहिए, मगर कोई सुनता ही नहीं है। आज के सुरक्षित माहौल मे इस फिजूल की पाबंदी के कारण ही कुछ औरतें हर साल हज बिना महरम के जाती हैं जिसके लिए वो झूठ लिखती हैं और किसी पराए मर्द से झूठा रिश्ता पेपरों में दिखाकर हज पर जाती है। आज एक अकेली औरत पूरी दुनिया घूम आती है और आप उन्हें हज पर अकेले जान से कैसे रोक सकते हो।

 

 

6.  क्या औरत को मुल्क का हाकिम या सदर बनाया जा सकता है?

 

औरत को बादशाह बनाने वाली बात एक रिवायत को गलत समझने के कारण कही जाती है जिसका संदर्भ और अर्थ बहुत अलग है।  मुहम्मद साहब कई देशों को खत लिख कर इस्लाम की दावत दे चुके थे। इसके साथ ही आप ये पहशनगोई भी कर चुके थे कि रूमी, फारस जैसी हुकूमतें आने वाले वक़्त में ढहने वाली है और इस्लाम के आगोश में आने वाली है।  फारस को लिखे खत को किसरा ने फाड़ दिया।  कुछ दिन बाद बादशाह के रिशतेदारों ने उसे कत्ल कर दिया और उसकी बेटी को बादशाह बन गयी और इन्होनें भी वही रवैया अपनाया।  इसलिए मुहम्मद साहब ने कहा कि इस कौम कि तबाही होकर रहेगी जिसने अल्लाह का हुकुम मानने कि बजाए, औरत (बादशाह को क़तल करके फिर से बादशाही बनाने मे लग गए) को हुक्मरान बना दिया। 

 

 

7.  क्या औरत, मर्दो की इमामत कर सकती है?

 

कुरान हमें अपने फैसले मशवरे की बुनियाद पर लेने को कहता है।  अगर औरत, औरतों की इमामत कर सकती हैं तो मर्दो या मर्दो - औरतों दोनों की मिक्स जमात की भी कर सकती हैं बस पर्दे, हिजाब, अखलाकी वगेरह की शर्तों का खयाल रखना पड़ेगा।  दीन के बुनियादी स्रोतों यानि कुरान और सुनन्ह में औरतों को ऐसी इमामत करने की मनाही नहीं है। मदीना  में हुज़ूर ने उम्मे वरक़ा साहबिया को मस्जिद का इमाम बनाया था और एक मर्द को उस मस्जिद मुअज़्जिन मुकरर किया था।  असल में पहले औरतों को इतनी छूट नहीं मिलती थी या ऐसा होना आम बात नहीं थी इसलिय आज इतिहास मे ऐसी मिसालें हमें नहीं मिलती हैं। 

 

 

8.  इस्लाम में औरतों की समाजी और सियासी स्थिति के ज़मीन पर उदाहरण।

 

इस्लाम आने के बाद महिलाओं की स्तिथि में बहुत सुधार हुआ.  मुहम्मद साहब के समय में हजरत खदीजा एक बड़ी व्यापारी थीं.  हजरत आयशा आर्मी की लीडर थीं.  हजरत उमर के समय में अलशिफा बिन अब्दुल्लाह नाम की एक  सहाबिया थीं जो पहली लेडी जज और मार्केट प्राइस कंट्रोलर थीं.  ह. खौला बिन्त अज़्वार एक योद्धा सहाबिया थीं.  9वीं सदी में मर्द और औरतों के लिए पहली मस्जिद नुमा युनिवर्सिटी बनाने का श्रेय फातिमा अल फहरी को जाता है.  मुहम्मद साहब ने एक सहाबिया उम्मे वरक़ा को मस्जिद का इमाम बानाया था।

 

 9. नरक में औरतों की ज्यादा तादात वाली हदीस

पैगंबर (बुखारी : 29) ने कहा: "मुझे जहन्नुम की आग दिखाई गई थी और यह कि इसके अधिकांश निवासी महिलाएं थीं जो कृतघ्न थीं।" वजह पूछने पर कहा कि वे अपने पतियों के लिए कृतघ्न हैं और एहसानों और उनके लिए किए गए अच्छे (दान कर्मों) के लिए कृतघ्न हैं। यदि आप हमेशा उनमें से एक के लिए अच्छे (परोपकारी) रहे हैं और तब वह आप में कुछ देखती है (उसकी पसंद का नहीं), वह कहेगी, 'मुझे आपसे कभी कोई अच्छा नहीं मिला।

 ये हदीस औरतों की इस और ध्यान दिलवाने के लिए बयान की गयी थी.  


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मनुमसृति 8:77:

एकोऽलुब्धस्तु साक्षी स्याद् भाव्य शुचयोऽपि न स्त्रीः।
स्त्रीबुद्धेरस्थिरत्वात् तु दोषैश्चन्येऽपि ये वृताः ॥ 

लोभ से रहित एक भी पुरुष साक्षी हो सकता है, परन्तु बहुत सी स्त्रियाँ, चाहे कितनी भी पवित्र क्यों न हों, साक्षी नहीं हो सकतीं, क्योंकि स्त्रियों की बुद्धि स्थिर नहीं होती, और न ही अन्य पुरुष जो दोषों से कलंकित हैं। 

Saturday, 13 August 2022

नमाज़, योग, संध्या, सज्दा, अष्टांग आदि पर चर्चा।


ईश्वरभक्त ऋषि- मुनियों ने आध्यात्मिक उत्थान के लिए अनेकों अनमोल चीज़ें सिखाई हैं। उनमें से एक है - योग। योग मानसिक और शरीरिक दोनों प्रकार से लाभदायक होता है।  योग का अर्थ होता है जोड़ना या जुड़ना। किसी भी जानदार शय को उन्नति करने के लिए अपने मूल स्रोत से जुड़े रहना बहुत ही आवश्यक है जैसे पेड़ को फलने फूलने के लिए अपनी जड़ों से जुड़े रहना बेहद आवश्यक है। योग भी प्रकृति के माध्यम से अपने मूलस्रोत ईश्वर से जुड़ने का साधन है। यह 3 चीज़ो का संगम है, मानसिक ध्यान, शारीरिक व्यायाम और मंत्र उच्चारण। योग, प्रार्थना और साधना का ही एक प्रकार है।

नमाज़ भी एक मानसिक और शारीरिक उपासना है। नमाज़ पर्शियन शब्द है जबकि अरेबिक में नमाज़ को सलाह कहते हैं और यह शब्द कुरान में आया है। सलाह शब्द बना है सिलह या सिल्ला से जिसका मतलब होता है जमा या to connect. इसलिए सलाह का अर्थ भी वही हुआ यानी जो ईश्वर से जोड़ दे।  नमाज़ या सलाह भी उन्हीं 3 चीज़ों का संगम है - मश्क (ध्यान), कसरत (व्यायाम) और तिलावत (मंत्रोच्चारण)। विभिन्न धर्मों में ऐसी आध्यात्मिक क्रियाएँ व साधनाएं विद्यमान हैं। बौद्धधर्म में विपश्यना भी एक योग साधना है। पूजा, उपासना, संध्या, साधना, योग, प्रार्थना, नमाज़, सलाह, विपश्यना, अरदास, प्रेयर आदि लगभग सामान अर्थ में ही प्रयोग होते हैं।  

हिन्दुधर्म में 5 बार भजन करने का विधान है:- सूर्योदय के पूर्व ब्रह्मुहुर्त में, स्नान के बाद, मध्यानकाल में, सायंकाल में, रात्री में निद्रा से पूर्व।  इसी प्रकार मुख्यता त्रिकाल संध्या अर्थात 3 काल की संध्या मानी जाती है:- प्रातःकाल (जो सूर्योदय से पूर्व सर्वोत्तम है), मध्यानकाल में, सायंकाल में (सूर्यास्त के समय)। यधपि वैसे कुल 4 संध्या होती हैं:- चौथी संध्या है , तुर्य संध्या (मध्यरात्रि में)। चारों संध्या में से जितनी बार भी संध्या करें, भक्त को पूर्व स्नान (जैसे ग़ुस्ल) करना अनिवार्य है। ये सभी भजन या संध्या आदि के समय एंव प्रकार जगद्गुरू पुरी शंकराचार्य जी महाराज द्वारा भी धर्मादेश सिद्ध हैं। 

इस्लाम धर्म में 5 वक्त पर नमाज़ पढने का विधान है। इनके अलवा कई समय पर स्वैच्छिक नमाजें होती हैं। स्वैच्छिक नमाज़ों में, रात के अंतिम पहरों में उठ कर पढ़ी जाने वाली तहज्जुद की नमाज़ को बहुत ही महत्वपूर्ण और लाभकारी बताया गया है। इसी समय को हिन्दू धर्म में ब्रह्ममुहूर्त कहते है और इस काल में संध्या की भी बहुत महत्वता है।  ब्रह्ममुहूर्त और तहज्जुद एक सामान ही हैं। नमाज़ से पहले भी वुज़ू (आंशिक गुसल या स्नान) अनिवार्य हैं।  

मानवता की शुरवात से ही 5 समय की उपासना अनिवार्य रही है जिनको समय के साथ साथ लोग घटा कर 3 करते रहें हैं।

जैसे इस्लाम धर्म के शिया सम्प्रदाय में 3 वक़्त पर कुल 5 नमाज़ पढ़ी जाती है, सुबह, दुपहर और शाम। हालांकि खास हालातों में सुन्नी भी 5 वक़्त की नमाज़ को घटा कर 3 वक़्त पढ़ सकते हैं जो है, सुबह, दुपहर या शाम में और सूर्यास्त या रात में। क़ुरान के अनुसार मुहम्मद साहब से पहले से ही नमाज़ पढ़ी जाती रही है। हदीसों से पता लगता है कि अबु ज़र गिफ्फारि मुहम्मद साहब से मिलने से पहले ही नमाज़ पढ़ रहे थे। 

चर्च द्वारा 7 समय प्रार्थना करने का आदेश दिया जाता रहा है, हालाँकि बाईबिल से ही संकेत मिलते हैं कि यीशु भी वही प्रचलित 5 समय प्रार्थना करते थे. हालांकि बाइबिल ये यीशु की जो दिनचर्या पता लगती है, उससे स्पष्ट है कि उनका जब मन करता था वह तब भी प्रार्थना कर लेते थे। हालांकि आज ईसाई व्यवहार में 3 समय ही प्रार्थना करते हैं। 

यहूदी (Jews) 3 समय पूजा करते हैं, सुबह, दुपहर और रात में। पारसी धर्म में भी 5 समय की उपासना होती है जो हैं सुबह, दुपहर, शाम, सूर्यास्त और रात में। मेंडाइज़म में भी 3 समय की पूजा का विधान है। सिक्ख धर्म में 5 समय अरदास की जाती है जिसे नितनेम भी कहते हैं। बौद्ध धर्म (विशेषकर मठों में) 3 समय सुबह, दुपहर रात और ताओ में भी 3 समय की प्रार्थना करी जाती है 

नमाज़ में सबसे अच्छा आसन होता है, सजदा।  उसी तरह भारतीय संस्कृति में साष्टांग आसन का बहुत महत्व है।  साष्टांग में 8 अंगों को धरती से स्पर्श करके ईश्वर को नमन किया जाता है, जो हैं 2 पैर, 2 घुटने, 2 हाथ, 1 नाक और 1 माथा। आम जन में दंडवत को साष्टांग माना जाता है जबकि दंडवत तो पुरे शरीर को धरती पर लिटाकर नमन को कहते हैं। सजदा और साष्टांग एक ही आसन के दो नाम है। इसी अवस्था को ईसाई ऑर्थोडॉक्स प्रोस्ट्रेशन, यहूदी कराईट बोविंग और सिख मत्था टेकना कहते हैं। बौद्धधर्म में यही पाली भाषा में पानीपता और जैनधर्म में णमोकार नाम से पहचाना जाता है।

■ स्कवेयर टेम्पल, मेसोपोटामिया (इराक़) से लगभग 2500-3000 BC काल की 12 मूर्तियां (सुमेरियन वरशिपर नामक) मिली हैं जिन्हें इबादत की मुद्रा में दिखाया गया है। इन मूर्तियों में लोग एकाग्रता या सचेत मुद्रा में खड़े हुए हैं और उनका दायां हाथ, बाएं हाथ के ऊपर बांधने की स्तिथि में है और दोनों हाथ छाती के ऊपर टिकाए हुए हैं। ऐसी ही स्तिथि नमाज़ के प्रथम आसन में होती है। इसके अलावा निनेवेह व एस्सर (Nineveh & Assur, Iraq) में 3000 वर्ष पुराने चित्र बने हुए मिले हैं जैसे सन गॉड टेबलेट आदि जिनमें लोग दोनों हाथ ऊपर उठाकर दुआ - प्रार्थना करते हुए दिखाई देते हैं। 


■ मिस्र की मूर्तियों और चित्रों में लोग Osiris Pose में दिखाई देते हैं, जिसमें हाथ छाती के पास होते हैं.  Osiris जन्म और मृत्यु देवता है और उसकी यह अवस्था शायद एक ममीकृत कफन को दर्शाती है. इसी तरह Amarna art के चित्रों में विशेष रूप से सूर्य भगवान Aten की पूजा करते हुए लोगों की मूर्तियाँ मिलती हैं, जिनमें वे हाथ उठाकर प्रार्थना कर रहे होते हैं।  
 
पारसी धर्म की प्राचीन कलाकृतियों में "फरावहार" (Faravahar)की आकृति के साथ लोग हाथ उठाकर प्रार्थना करते हुए दिखते हैं। 
 
यहूदी धर्म में भी दोनों हाथों को ऊपर उठाकर प्रार्थना करने की प्रथा मिलती है. 
 
चीन की हान और तांग काल की मूर्तियों में भी लोग ध्यान मुद्रा में बैठे हुए दिखते हैं, विशेष रूप से बौद्ध धर्म के प्रभाव में। इस मुद्रा को "ध्याना मुद्रा" कहा जाता है, जो बाद में जापानी ज़ेन बौद्ध धर्म में भी देखी गई। जापान की शिंतो परंपरा में भी लोग हाथ जोड़कर और झुककर प्रार्थना करते हैं।
 
  
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इस्लाम में इसी नमाज़ रूपी प्रार्थना को करने से पहले अज़ान दी जाती है ताकि लोगों को पता लग जाए की ईश्वर की उपासना का समय हो गया है। अज़ान का अर्थ नीचे पिक्चर में दिया गया है।

● हे मनुष्यों। जिस परमेश्वर की योगी जन उपासना करते हैं, उस की आप लोग भी उपासना करो।
[ऋग्वेद: 6:16:46] 
● ऐ मेरे रब मुझे नमाज़ क़ायम करने वाला बना; ...मेरी नमाज़, मेरी कुर्बानी और मेरा जीना, मेरा मरना सब अल्लाह के लिए है...।
[क़ुरान : 14:40 ; 6:162]
● योगी अपने शरीर, गर्दन व सर को सीधा रखे और अन्य दिशाओं को न देखते हुए नाक के अगले सिरे पर दृष्टि लगाए।
[गीता : 6:13] 
● पाबन्दी करो नमाज़ों की और पाबन्दी करो बीच की नमाज़ की और खड़े हो अल्लाह के सामने नर्म बने हुए।
[क़ुरान : 2 : 238]
 
 

 
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क्या ईशनिंदा या स्वधर्मत्यागी की सज़ा मौत है?



■  ईश्वर, धर्म और धार्मिक महापुरुषों की निंदा।
 

इस्लाम के अनुसार धर्म के अपमान (बेहूरमती), ईशनिंदा, मुर्तद, शातिमे रसूल या तौहीने रिसालत की सज़ा मृत्युदंड कतई नहीं है और न ही दीन को लेकर कोई ज़ोर ज़बरदस्ती की जा सकती है। क़ुरान से ये बात साबित है। हालाँकि मुसलमानों ने ऐसा समझ रखा है। ऐसे मामलों में मृत्यदंड देने के लिए कानून को अपने हाथ में लेने का अधिकार किसी भी इंसान को नहीं है, ज़रा सा भी नहीं। ये सभी हिमाक़तें अल्लाह के दिए इख्तियार से सम्बंधित हैं तो इसकी असल सज़ा का अधिकार भी उसी को है। हालांकि ज़रूरत के मुताबिक हर देश और समाज को संविधान के अनुसार विधिपूर्वक और इंसानियत के दायरे में रहते हुए धर्म या ईशनिन्दा से संबंधित कानून बनाने का पूरा इख्तियार है, बिल्कुल उसी प्रकार, जिस प्रकार वे अन्य मामलों में सर्वसम्मति से अपने कानून बनाते हैं। अगर कोई किसी के धर्म या इष्टों का निरादर करता है तो कानूनी कार्यवाही करने का प्रावधान आज भी लगभग हर देश में पहले से ही मौजूद है और इसी तरीके को इस्तेमाल करना एक सभ्य समाज और इंसान की पहचान है।
 

किसी भी कुरानिक आयात में यह हकूम नहीं दिया गया है कि कोई तौहीन करे या इस्लाम छोड़ दे या दीन को नहीं माने तो उसे मौत की सज़ा दी जाए। बल्कि उल्टा ये कहा गया है कि ऐसे लोगों के लिए ईश्वर ही काफी है और वही दंड निर्धारक है। गुस्ताख़ी और दीन से फ़िर जाने वाले मामलों में क्या सज़ा दी जाए, इस पर क़ुरान ख़ामोश है। इसके अलावा, नबी ने भी कभी नहीं कहा कि फलां को मार डालो क्यूंकि उसने मेरी बेअदबी की है। बल्कि बहुत से मौकों पर मुहम्मद सल्ल. का अपमान किया गया परन्तु उन्होंने ऐसे मामलों में स्वयं करुणा और रहम दिली के बेहतरीन नमूने दिखाए इसलिए यह कतई नहीं हो सकता हैं कि वो अपने अपमान के बदले किसी की हत्या करवा दें।
 

ताज़ीर (ताज़ीराते हिन्द) के मायने है कानून. बहुत से देशो में धार्मिक प्रतीकों के अपमान पर कानूनी सजा मुक़र्रर है जिनमें भारत भी है. कई देशों में जीसस की तौहीन पर सजा है मगर दूसरों मज़हबों की तौहीन पर सजा नहीं है।

असल में कुरान ने किसी अकाईद (शिर्क, कुफ़र वगैरह) की सजा नहीं रखी, बल्कि आखिरत में रखी है। हालाँकि कुछ सजाएँ अल्लाह ने कुरान में रखी हैं मगर सिर्फ जुर्म, गुनाह की जिनसे समाज पर प्रभाव पड़ता हो यानि जिनसे दूसरों को नुकसान होत हो। हालाँकि स्टेट खुद भी जुर्म, गुनाह की सजाएँ मुकरर कर सकता है। मगर नमाज़, रोज़े छोड़ने की सजा नहीं दी जा सकती। जमात से नमाज़ छोड़ने वालों पर नबी ने यह ज़ुरूर कहा की दिल चाहता है किऐसे लोगो के घरो में आग लागा दूँ, मगर लगाई नहीं, यह बात सिर्फ लोगों को जमात की अहमियत समझाने के लिए थी।

■  कुरान (31.13) में हज़रत लुकमान अपने बेटे से कहते हैं कि  शर्क न करना, शर्क बहुत बड़ा जुर्म है। इस्लाम के अनुसार शर्क सबसे बड़ा जुर्म है। इसलिए सबसे पहले मौत की सज़ा तो इसकी राखी जानी चाहिए थी, मगर ऐसा नहीं है.  

■  कुरान (4.16) कहता है किजो ज़िना करें उन्हे यातना दो, तौबा करे तो छोड़ दो। यानी बाकी सजा समाज अपने हिसाब से तय कर ले

 


■  नीचे दी गई क़ुरान की आयतों में कंही नहीं कहा गया कि नबी या क़ुरान का अपमान करने वालो को मार डालो।
 

कुरान इस बात की पुष्टि करता है कि नबियों (मुहम्मद साहब का भी) का अधर्मियों द्वारा मज़ाक उड़ाया जाता रहा है.  उन्हें बुरे लफ्जों से जैसे झूठा, जादूगर, दीवाना, शायर वगैरह से पुकारा जाता रहा है और झूठी तोहमतें भी लगायी जाती रही हैं (36:30, 37:12, 13:32; 15:11; 21:41, 16:101; 25:4, 17:47; 25:8, 37:36, 38:4, 9:58).  कुरान ही बताता है कि कुरान को भी अधर्मियों द्वारा ऐसे ही गलत लफ्जों से पुकारा गया है (21:5, 16:103, 38:7, 25:5). यंहा तक कि कुरान ये भी पुष्टि करता है कि अधर्मी लोग अल्लाह को भी बुरा भला कहते थे (7:180).  मगर कुरान फिर भी उनसे बदला लेने को नहीं कहता बल्कि बड़ी ही संतुलित और अच्छी हिदायतें देता है जैसे:
 
• जो भी रसूल उनके पास आया, वे उसका मज़ाक ही उड़ाते रहे। [क़ुरान 36:30]
 
• मज़ाक उड़ाने वालों के लिए तुम्हारी ओर से हम ही काफ़ी है। [क़ुरान 15:95]
 
वे जो कुछ कहते हैं उस पर धैर्य से काम लो। [कुरान 38:17, 20:130] 

 
जिन्होंने तुम्हारे धर्म को हँसी-खेल (मज़ाक का विषय) बना लिया है, उन्हें अपना मित्र न बनाओ। [कुरान 5:57]

•  जहाँ तुम सुनो की अल्लाह की आयतों का इंकार किया जा रहा है और उनका मज़ाक़ उड़ाया जा रहा है तो जब तब वे किसी दूसरी बात में न लग जाएँ, तब तक उनके साथ न बैठो। [क़ुरान 4:140, 6:68]

•  और तुम्हें उन लोगों से जिन्हें तुमसे पहले किताब प्रदान की गई थी और जिन्होंने शिर्क किया, बहुत सी कष्टदायक बातें सुननी पड़ेंगी। परन्तु यदि तुम जमे रहे और अवज्ञा से बचो तो यह बड़े हौसले का काम है. [क़ुरान 3:186]

•  और उनमें कुछ लोग ऐसे हैं , जो नबी को दुख देते हैं और कहते हैं कि वह तो निरा कान (बस ये कान ही हैं) है। कह दो कि वह सर्वथा कान (कान तो हैं मगर) तुम्हारी भलाई (सुनने) के लिए है... रहे वे लोग जो अल्लाह के रसूल को दुख देते हैं, उनके लिए दुखद यातना है। [क़ुरान 9:61]

•  जो लोग अल्लाह और उसके रसूल को दुख पहुँचाते हैं, अल्लाह ने उन पर दुनिया और आख़िरत में लानत की है और उनके लिए अपमान जनक यातना तैयार कर रखी है। [क़ुरान 53:57]

एहले किताब में एक गिरोह कहता है कि ईमान वालो पर जो नाजिल हुआ है उस पर सुबह ईमान लाओ और शाम को इंकार कर दो ताकि वो फिर जाएँ. [क़ुरान 3:72 ]


■   बाज़ वक़्त नबी के लिए कुछ लोग अपमानजनक शब्द बोलते थे। ऐसे वाकयात और शब्दों का ज़िक्र कुरान करता है जो नीचे आयात में दिये गए हैं। परंतु फिर भी ऐसे मुनाफिकों को आप ने न तो उसी भाषा में जवाब दिया और न ही सज़ा। इसके अलावा इस बारे में एक हदीस में अल्लाह का आदेश भी रिकॉर्ड है। यंहा तक की आपकी बीवी ने भी आपका यही चरित्र बयान किया है. 
 

•  वे कहते हैं कि यदि हम मदीना लौटकर गए तो जो अधिक शक्तिवाला है, वह हीनतर को वहाँ से निकाल बाहर करेगा। हालाँकि शक्ति अल्लाह और उसके रसूल और मोमिनों के लिए है, किन्तु वे मुनाफ़िक़ जानते नहीं। [क़ुरान 63:8]
 
•  अल्लाह ने अपने पैगंबर को लोगों के दुर्व्यवहार (उनके प्रति) को माफ करने का आदेश दिया। [बुखारी 4644]

ह० आयशा ने कहा है कि अल्लाह के रसूल ने कभी किसी से अपने लिए (अपनी खातिर) बदला नहीं लिया. [बुखारी 3560, 6126, दावूद 4785, मुवत्ता  47:2/1637]



■  नबी के साथ करी गयी ज़्यादतियों और बुरे बर्ताव के बाद भी आप ने किसी को बुरा नहीं कहा। 

•  आप को बुरा भला कहने वाले लोगों के हक़ में आपने दिल से दुआएं की जैसे ह. अबु हुरैरा की माँ। 
हज़रत अबु हुरैरा की माँ जब इस्लाम धर्म की अनुयायी नहीं थी तब एक दिन उनकी माँ से उनसे मुहम्मद साहब के बारे में कुछ नापसंददीदा बात कही। हज़रत अबु हुरैरा ने जब मुहम्मद साहब को यह बात बताई तो मुहम्मद साहब ने उनकी माँ के लिए दुवा की और कहा ऐ अल्लाह, उन्हें सही मार्ग दिखा। [सहीह मुस्लिम 2491]
• एक आदमी ने आपको बुरा भला कहा, आप चुप रहें, फिर कहा, तब भी आप चुप रहें। तीसरी बार जब उसने अपमान किया तो ह. अबु बकर ने पलट कर जवाब दिया। इस मुहम्मद सल्ल उठ कर चल दिये। अबु बकर के वजह पूछने पर फरमाया कि जब तक वो बोल रहा था, उसे एक फरिश्ता जवाब दे रहा था और जब तुमने जवाब देना शुरू किया तो एक शैतान हमारे बीच में आ गया और जंहा शैतान आ जाये वंहा मैं नहीं बैठना चाहता। [अब दावूद 4878/4896]
• ताइफ में जब आप दीन की तबलीग़ के लिए गए तो वंहा के लोगों ने आप के पीछे बदमाश बच्चे लगा दिये और अनाप शनाप कहलवाया गया। यहा तक कि आप पर पत्थर फिकवाए गए जिनसे आप लहू लुहान हो गए और और आप कि चप्पलें तक खून से भर गयी।  इसके बाद भी आप ने पत्थर मारने वालों को बद्दुवा तक नहीं दी। बल्कि उनके हक में दुवा करी कि इनकी नसले इस्लाम ले आयें. [सीरत ए रसुलुल्लाह]
ताकत हासिल होने के बाद भी ताइफ़ और मक्का में आप के साथ बदसलूकी और जिस्मानी चोट पहुंचाने वालों को माफ कर दिया। फतह मक्का के मौके पर सभी मुखालिफों को माफ़ी दे दी, जो घरों में रहे.
आपके कत्ल की साजिश करने वाले अबु सुफियान जैसे दुश्मनों को माफ कर दिया। 
आप के ऊपर और आपके घर पर मरे हुए जानवरों की ओजड़ियां, खून, गंदगी आदि फेंकने वालों को भी आपने कुछ न कहा। 
आपकी मस्जिद-घर में गन्दगी (पेशाब वगैरह, बुखारी 6128) करने वालों को भी आपने माफ़ कर दिया। 
आप को खुलेआम नाऊज़ूबिल्लाह पागल, झूठा, फरेबी, जादुगर वगैरह कहने वालों को भी एक लफ्ज़ तक नहीं कहा। 
• आपको कर्जा देने वाले एक आदमी ने जब एक गलत मौके पर क़र्ज़ वापिस मांगते हुए आपके साथ बदतमीजी करी तो सहाबा को गुस्सा आया, इस पर आपने कहा कि उसे कहने दो, उसे अपनी बात कहने का हक है.

 

यंहा तक कि आपके छुपे हुए कट्टर दुश्मन अब्दुल्लाह बिन उबई को मरने के बाद अपना कुर्ता पहनाया और उसकी नमाज़े जनाज़ा तक पढायी।
एक आदमी ने आपको थोडा घुमावदार शब्दों में सलाम किया जो आपके लिए असल में एक बद्दुआ थी. इस पर सहाबा ने कहा सलाम उस पर जो हिदायत की पैरवी करे। यह सुन कर नबी मुस्कुरा दिए. आपने उस आदमी को पलट कर कुछ न कहा.

एक यहूदी ने नबी को सलाम किया नबी ने कहा तुम पर भी। फिर नबी ने सहाबा से पुछा कि तुम जानते हो उसने क्या कहा था, उसने कहा था कि तुम पर मौत हो. इस पर सहाबा ने कहा कि या रसूलुल्लाह क्या इसका कत्ल कर दें तो आपने मना कर दिया और कहा कि जब वो यहूद तुम्हें ऐसे सलाम करें तो वालेकुम कह दिया करो. [बुखारी 6926]

 
आपने तो खाने में ज़हर मिलाकर परोसने वाली यहूदी स्त्री (जो आपकी नबी होने का कन्फर्म करना चाहती थी) तक को माफ कर दिया था। आपने अपने चाचा के कातिल वहशी को भी माफ़ कर दिया था.

एक बार आप गालिबन सफर में कंही पेड़ के नीचे आराम कर रहे थे. इतने में एक दुशमन ने आप पर तलवार से हमला करने की कोशिश करी. जिससे आपकी अचानक नींद खुल गयी तो डर के मरे उस आदमी के हाथ से तलवार छुट गयी. आपने फोरना तलवार उठा ली और उससे पुछा कि अब तुझे कौन बचाएगा. फिर आपने उसे यूंही छोड़ दिया। 

• जंग में जिसने नबी के दांत तोड़े थे, वो कहता फिरता था कि मुहम्मद उसे माफ कर देंगे। वाकई ऐसा हुआ और आपने उसे माफ़ कर दिया जिसके बाद वो मुस्लिम हुआ।

• नबी का एक दुश्मन था जिसकी 5 बेटियाँ थी, इसी वजह से वो भी कहता फिरता था कि मुहम्मद उसे छोड़ देंगे. आपने उसे भी इसी वजह से छोड़ दिया।

 
आप पर रोज़ कूड़ा फेंकने वाली बुढिया जब बीमार हुई तो आप उसका हाल-चाल पूछने उसके घर चले गए (इस रिवायत के स्रोत पर प्रश्नचिन्ह है)। 

 


■  इस्लाम छोड़ने पर या धर्मांतरण करने वालों (मूर्तद) की सज़ा मौत कतई नहीं है। 
 
 
बहुत से मुस्लिम का कुछ ऐतिहासिक घटनाओं के आधार पर मानना है कि अगर कोई मुस्लिम इस्लाम छोड़ या धर्मांतरण कर ले तो उसे मौत कि सज़ा दी जाये या मार डाला जाये। फिर यही लोग हिन्दुओ द्वारा बनाए जाने वाले एंटि कनवर्ज़न लॉ का विरोध करते हैं और कहते हैं कि धर्म मानने या बदलने कि छूट होनी चाहिए। यही पाखंड है।  जब कोई इस्लाम अपनाता है तो मुसलमान फुले नहीं समाते मगर जब कोई इस्लाम छोड़ता है तो अक्सर आग बबूला हो जाते हैं.
 
हालांकि कुरान की आयतों में इस्लाम अपनाने और छोड़ने वालों का ज़िक्र किया गया है और कहीं भी यह नहीं कहा कि इस्लाम छोड़ने वालों को मार डालना है। अगर इस्लाम छोड़ने की सज़ा मौत होती तो बार बार इस्लाम में दाखिल होने और निकल जाने की बात क़ुरान क्यों करता? बल्कि धर्म को मानने कि स्वतंत्रता और मानवता आदि पर क़ुरान की बहुत सी आयतें हैं।
 
• निस्संदेह, वे लोग जो ईमान लाए, फिर इंकार किया, फिर ईमान लाए, फिर इंकार किया, फिर इंकार की दशा में बढ़ते चले गए तो अल्लाह उन्हें कदापि क्षमा नहीं करेगा और न उन्हें राह दिखाएगा। [क़ुरान 4:137]

अल्लाह उन लोगों को कैसे मार्ग दिखाएगा, जिन्होंने अपने ईमान के पश्चात कुफ्र (अधर्म और इंकार ) किया जबकि वे स्वयं इस बात की गवाही दे चुके थे कि यह रसूल सच्चा है और उनके पास स्पष्ट प्रमाण भी आ चुके थे... उन लोगों का बदला यही है कि उन पर अल्लाह और फरिश्तों और सारे मनुष्यों की लानत हो... इसी दशा में वे रहेंगे, न उनकी यातना हल्की होगी और न उन्हें मुहलत दी जाएगी... हाँ, जिन लोगों ने इसके पश्चात तौबा कर ली और अपनी नीति को सुधार लिया तो निस्संदेह अल्लाह बड़ा क्षमाशील और दयावान है। [क़ुरान 3:86-89]

जिन्होंने ईमान के बाद इंकार किया और इसमें आगे बढ़ते चले गए, उनकी तौबा नहीं कुबूल होगी. जिन लोगो ने कुफ़्र इख़्तियार किया और कुफ़्र ही की हालत में जान दी, उनमें सेकोई अगर अपने आप को सज़ा से बचाने के लिये ज़मीन भरकर भी सोना बदलेमें दे तो उसे क़ुबूल ना किया जायेगा। [ क़ुरान 3:90-91]

 

• धर्म के विषय में कोई ज़बरदस्ती नहीं है। हिदायत गुमराही वाज़ह हो चुकी है। अब जो कोई बढ़े हुए सरकश को ठुकराए। [क़ुरान 2:256]

• तुम्हारे लिए तुम्हारा दीन है और मेरे लिए मेरा दीन। [क़ुरान 109:6]
 
•  कह दो कि वह सत्य है तुम्हारे प्रभु की ओर से, अब जो चाहे माने (ईमान लाये) और जो चाहे इंकार करे. [क़ुरान 18:29]
 
• यदि तुम्हारा रब चाहता तो धरती पर जितने लोग हैं, वे सब के सब ईमान ले आते, फिर क्या अब तुम लोगों को विवश करोगे कि वो मोमिन हो जाएँ। [क़ुरान 10:99] {इसका मतलब मुसलमानों की जंगे भी दूसरे कारणों से हुई थी.}

•  ऐ नबी, याद दिहानी करवाते रहो। तुम तो बस एक नसीहत करने वाले हो। तुम उन पर कोई दरोगा नहीं हो। जो कोई मुंह मोड़ेगा और इंकार करेगा तो अल्लाह उसे बड़ी यातना देगा। निस्संदेह, हमारी ओर ही उनका लौटना है और फिर हमारे ज़िम्मे ही उनका हिसाब लेना है। [क़ुरान 88:21-26]
 
•  उसको रास्ता भी दिखा दिया, अब वह चाहे शुक्रगुज़ार हो चाहे नाशुक्रा। [क़ुरान 76:3]
 


•  उन्हें बुरा न कहो, जिनकी वे अल्लाह के सिवा इबादत करते हैं। कहीं ऐसा न हो कि अज्ञानता के कारण अति करके वे अल्लाह को बुरा कहने लगें। [क़ुरान 6:108]

•  इंसाफ की निगरानी करने वाले बनो। ऐसा न हो कि किसी की शत्रुता तुम्हें इस बात पर उभार दे कि तुम इंसाफ छोड़ दो। इंसाफ करो। [क़ुरान 5:8]

•  पैग़म्बर मुहम्मद साहब से किसी ने पूछा कि साम्प्रदायिकता किसे कहते हैं। तो  मुहम्मद साहब ने फरमाया कि अपने लोगों की गलत कामों में मदद करना ही साम्प्रदायिकता है। [सुनन अबु दावूद 5119]

•  जिसने किसी एक निर्दोष की हत्या करी तो उसने मानो समस्त मानवता की हत्या करी और जिसने किसी एक मानव की जान बचाई तो उसने मानो समस्त मानवता की जान बचाई। [क़ुरान 5:32]

•  भलाई और बुराई एक जैसी नहीं हैं। तुम बुराई को अच्छाई से दूर करो। फिर तुम देखोगे कि तुम्हारे साथ जिसकी दुश्मनी है, वो जिगरी दोस्त बन गया है। [क़ुरान 41: 4]


■   ऐतिहासिक संदर्भ 

 
हालांकि लगभग 15 हदीसों की बुनियाद पर बहुत से लोग ऐसे मामलों में 10 लोगों को मौत की सज़ा मिलने की बात मानते हैं। सही हादिसो के मुताबिक इनमें से 2 थे, काब बिन अशरफ, अबु राफे। इन दोनों को आम तौर पर ब्लासफेमि से जोड़ कर देखा जाता है मगर इनका गुनाह फितना-फसाद फैलना, जंग करना-करवाना, सरकश हो जाना यानी राजद्रोही-बलवाई आदि हो जाने से संबंधित था और हम जानते हैं कि ऐसे जुर्म के लिए आज भी ज़्यादातर देशों में कानून के मुताबिक मृत्युदण्ड ही निर्धारित है।  
 
 काब आदतन एक मुजरिम था और उसका ननिहाल मदीना था। काब लोगों को हमले के लिए भड़काता था। बहुत से लोग नबी के खिलाफ बुरा कहते थे मगर मारा सिर्फ इसको गया क्योंकि वजह अपमान करना नहीं बल्कि अपराध था.  इसी तरह अबू राफे को भी मारने की इजाजत दी गई क्योंकि वो लोगों को भड़काता था। यह स्टेट के लिए बहुत बडा खतरा था और स्टेट का मुजरिम था। इसके कत्ल की वजह भी तौहीन नहीं थी।
 
जबकि बाकी 8 लोगों के बारे में जो भी ऊपर बताई गई हदीसें हैं, वो या तो ज़ईफ (कमज़ोर) हैं या मौज़ू (मनघड़ंत)। इसके अलावा इन हदीसों की घटनाओं में सहाबा ने खुद अपने डिस्करेशनरी डिसीज़न पर क़त्ल का इरादा किया है या अंजाम दिया है जिनका पूरा पसमंज़र या सन्दर्भ क्या था इन्हीं हदीसों से स्पष्ट पता नहीं लगता। विद्वानों का मानना है कि इन हदीस के बुनियाद पर और क़ुरान के इस मसले पर कोई सज़ा जारी न करने के कारण, इस जुर्म की सज़ा मौत बिल्कुल नहीं ठहराई जा सकती।
 

बुखारी 2510, 3031, 3032, 4037 & दावूद 2768, 3000 (अलबानी ने सहीह  कहा): काब को मारा गया क्योंकि उसने अल्लाह और नबी को दुख पहुंचाया (काब के कत्ल  की वजह भी मिलती है).

 
बुखारी 6785: मेरे बाद एक दूसरे की गरदने उतारने के बाद ईमान से बाहर मत हो जाना।

बुखारी 3017: अगर कोई दीन बदले तो उसे कतल कर दो।

बुखारी 6878: जो इस्लाम और मुस्लिम को छोड़ दे उसका कतल किया जा सकता है।

बुखारी 6923: यहूदी से मुस्लिम और फिर यहूदी हुआ, उसे मार दिया गया।

नसाई 4059-65: जो कोई भी अपना धर्म बदले,उसे मार डालो।
 
दावूद 4361, बुलुग अल मराम, नसाई 4070 (अलबानी ने सहीह कहा): एक अंधे साहबी द्वारा अपनी गुलाम बीवी (दो बच्चों की माँ, गर्भवती भी, दयालु, नरम शब्द इस्तेमाल हुए हैं इसके लिए) को मार दिया क्योंकि आपको बुरा बोलती थी, बहुत समझाने के बाद भी। जब उसने पेट में चाकू मार तो एक बच्चा बीच में खड़ा था जो खून से रंग गया।

I went and got a dagger which I thrust into her stomach and leaned upon it, and killed her. In the morning she was found slain. Mention of that was made to the Prophet, and he gathered the people and said: "I adjure by Allah; a man over whom I have the right, that he should obey me, and he did what he did, to stand up." The blind man started to tremble and said: "I am the one who killed her.I mentioned your name and she slandered you, so I went and got a dagger which I thrust into her stomach, and leaned on it until I killed her. The Messenger of Allah [SAW] said: "I bear witness that her blood is permissible.

Asma bint Marwan - She composed poems that publicly criticized the local tribesmen who converted to Islam and allied with Prophet, calling for his death. In her poems, she also ridiculed Medinians for obeying a chief not of their kin.

Zaynab bint Al-Harith - was a Jewish  woman who attempted to assassinate Prophet in the aftermath of the battle of Khaybar.The Muslims asked if they should kill her, but Prophet replied, No. (Bukhari 2617)

[The writings of the later commentators such as al-Zamakhshari, al-Tabarsi, al-Razi, al-Baydawi, and al-Asqalani provide another distinct report according to which Ka'b was killed because Gabriel had informed Muhammad about a treaty signed by himself and Abu Sufyan creating an alliance between the Quraysh and forty Jews against Muhammad during Ka'b's visit to Mecca]

हज़रत इमाम अबू हनीफ़ा से मरवी है कि उन्होंने फ़रमाया कि नबी करीम सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम की शान में गुस्ताख़ी की वजह से किसी ग़ैर मुस्लिम शहरी को क़त्ल नहीं किया जाएगा क्यूंकि जिस शिर्क पर वो पहले से है वो सब बड़ा जुर्म है (मआलिमुस सुनन शरह अबू दाऊद जिल्द 3 पेज 296).
 
Link:

https://al-mawrid.org/Question/60a204a3923f0b12074d877f/punishment-of-blasphemy-based-on-a-hadith-narrative

https://www.newageislam.com/islamic-personalities/grace-mubashir-new-age-islam/the-prophet-killing-ka-b-ibn-al-ashraf/d/128237

https://www.islamweb.net/en/article/157545/eliminating-anti-islamic-state-instigators-ka%E2%80%98b-bin-al-ashraf-assassinated-ii

https://muslimcentral.com/yasir-qadhi-seerah-44-assassination-of-ka-b-ibn-al-ashraf/

https://discover-the-truth.com/2015/01/24/kab-bin-al-ashrafs-killing-deception-was-the-prophet-p-annoyed/

https://islamqa.info/en/answers/103739/regarding-the-hadeeth-about-the-blind-man-who-killed-his-slave-woman-who-had-borne-him-a-child-umm-walad-because-she-reviled-the-prophet-peace-and-blessings-of-allaah-be-upon-him

https://wikiislam.net/wiki/List_of_Killings_Ordered_or_Supported_by_Muhammad

https://islamqa.org/hanafi/seekersguidance-hanafi/31644/a-balanced-explanation-of-the-banu-qurayza-controversy/


Monday, 8 August 2022

क्या इस्लाम का पैग़ाम पहुंचाने के लिए मुस्लिम पहचान ज़ाहिर होना ज़रूरी है?

 



अक्ल के मुताबिक आज क्या तरीक़ा होना चाहिए।


1.  कुछ लोग पैगाम के उसूलों में से एक उसूल यह बताते हैं कि इस काम को करते हुए सामने वाले को आपका मुस्लिम होना वाज़ेह हो जाना ज़ुरूरी है। पहली बात ये उसूल इन्सानों द्वारा काम को बेहतर तरीके से अंजाम देने के लिए बनाए गए थे और इनमें तबदीली की पूरी गुंजाइश मौजूद है। बल्कि एक उसूल तो यही है कि सामने वाले इंसान, मौका, महल के मुताबिक अपनी अक़ल की रोशनी में हिकमत से काम करना है। इसलिए ज़रूरत के मुताबिक इन उसूलों को बदल भी सकते हैं ताकि काम को नए हालातों में और बेहतर तरीके से अंजाम दिया जा सके। किसी शख्स की मर्ज़ी है पहचान छुपाने और न छुपाने की। भले ही आप अपनी पहचान छुपाने कि कोशिश करें पर नाम पूछे जाने पर पहचान बिल्कुल नहीं छुपानी चाहिए। वैसे मुस्लिम की असल पहचान उसका लिबास, हुलिया या नाम नहीं बल्कि उसका ईमान, तकवा और अक़ीदा है। 


2.  आज माहौल बदल चुका है और अब ये काम पहले की तरह खुल्लम खुल्ला करने का वक़्त नहीं है क्योंकि आज गैर मुस्लिमों को हमारे दीन से, हमसे, हमारे हुलिये से, हमारे पहनावे से नफरत हो चुकी है। अगर कोई मुस्लिम के आम माने जाने वाले हुलिए या लिबास में यह काम खुलम खुल्ला करता है तो बहुत इमकान है की उसे बहुत सी परेशानियों का सामना करना पड़ सकता है। कलीम साहब, उमर साहब को किस तरफ झूठा फंसाया गया है, हम सब जानते हैं।  बहुत से राज्यों में खासतौर पर कट्टर पार्टी द्वारा शासित राज्यों में मुस्लिम तंजीमो का काम या तो बंद किया जा चुका है या ठंडा पड़ चुका है।  अब वे भी ज़्यदातर खिदमत में ही लगे हुए नज़र आते है।  इसलिए आज ढके छुपे अंदाज़ में या इंडरेक्ट्ली या अपनी पहचान दिखाने पर ज़्यादा फोकस न करते हुए, यह काम करना बेहद महफ़ूज तरीका है और यही किया भी जाना चाहिए क्यूंकी मक़सद तो हक़ बात उन तक पहुंचाने का है। बाकी कोई खुल कर काम करना चाहे तो उसकी मर्ज़ी है जैसा दिल चाहे करे। 


हमारा तरीका। 


3.  हमारे कुछ लोग, इसी वजह से हमें छोड़ कर जा चुके हैं की यह नया तरीका ठीक नहीं है और यह काम तो पुराने तरीके से ही होना चाहिए।  पर अब आप जब ऐसे लोगों से पूछते हैं कि हमें छोड़कर अब आप कैसे और कितना काम कर पा रहे हैं यानि पहले वाले तरीके पर ही चलते हुए, तो आपको पता लगता है कि उनका काम या तो बंद हो चुका है या मंदा पड़ चुका है। तो क्या फाइदा हुआ? काम बंद करने से तो बेहतर है कि तरीका बदलकर या हल्का हाथ रखते हुए काम किया जाये।


4.  अगर हमारा कोई साथी ऐसी पुराने तरीके पर काम करना चाहे तो वो आज़ाद है और जाके खुद कर लें, पर हमारे बैनर के अंडर काम न करें वरना नाम हमारा ही खराब होगा और उसे हमारा ही साथी मान जाएगा। हमने किसी को इंडिपेंडेंटली अपने नाम से काम करने से नहीं रोका है।  पर यकीन मानिए शायद ही किसी की हिम्मत होगी आज के माहौल मे जाके पुराने तरीके पर काम करने की। न जाने लोग यह बात क्यों नहीं समझ पा रहे कि खुद ऐसा करेंगे नहीं और हमसे उम्मीद करेंगे की हम पहले की तरह काम करें या यही लोग हम पर तनकीद करेंगे की आपका नया तरीका तो बिलकुल बेकार है। यह तो डबल स्टैंडर्ड है।


कुरान, सुन्नत, इस्लाम का तरीका। 


5.  कुरान के मुताबिक नेकी खुल कर और छुपके दोनों तरह से हो सकती है। यह बात साफ है कि इशतेमाई सोशल वर्क अक्सर खुले आम ही हो सकता है, न की छुप के। इस्लाम का पैग़ाम भी छुप कर और खुले आम दोनों तरह दे सकते हैं यानी अपनी मुस्लिम पहचान दिखा कर और छुपा कर, दोनों तरीको से। कुरान और सुन्नत इस काम को करते हुए अपनी पहचान बताने की कोई शर्त नहीं लगाते।  


6.  ज़रूरी नहीं हम मुस्लिम दिखे तभी यह काम मुकम्मल होगा। आपको बात तो इस्लाम की ही पहुंचानी है, अगर आपकी भाषा उनके जैसी है या आपकी पहचान उनके जैसी है तो उससे क्या फर्क पड़ेगा। आपका मक़सद तो हक़ बात पहुंचाने का है।  मक्का में इस्लाम के शुरवाती दौर में मुस्लिम हुए लोगों का हुलिया और पहनावा, मुशरीकों की तरह ही था।  साहबा उन्हीं की जैसी पहचान के साथ उन्हीं की ज़ुबान (पूरे अरब की ज़ुबान अरबी ही थी) मे यही काम किया करते थे। शुरवात मे तो मुस्लिम लफ्ज भी नहीं आया था, तो सोचिए ज़रा क्या साहब जा कर कैस कह सकते होंगे कि वो मुस्लिम है और हमारी बात सुनो।  ज़ाहिर है वो सिर्फ पैगाम देने पर ज़्यादा तवज्जो देते होंगे और लोग भी बात पर ही ध्यान देते होंगे। मुहम्मद साहब भी एक बार एक ऐसी बुढ़िया की मदद करने के लिए उसका सामना सर पर लाद कर चल दिये थे जो आप ही का नाम लेके लगतार कोसे जा रही थी, पर अपने आखिर मे बतया कि मैं वही मुहम्मद हूँ, यह सुनकर वो ईमान ले आई। यानि आप ने आपने शुरू मे नाम बताना सही न समझा और सही मौके पर बताया। 


7.  आज यंहा भी मक्की दौर के अव्वल वक्त जैसे हालत चल रहे है।  हम यंहा के लोगों की पहचान लिए हुए ही उन तक हक़ बात पहुँचाते हैं, उनकी ज़ुबान में पहुँचाते हैं (यंहा भी पूरे मुल्क की यही ज़ुबान है)। उस वक्त मुशरीकों को अल्लाह का नाम तो मालूम था पर वो उससे बेहद दूर थे, उन्हें अल्लाह के बारे में याददिहानी करवाई गयी।  उसी तरह यंहा लोगो को ईश्वर का नाम तो मालूम है पर वो उससे बहुत दूर है सो उन्हे भी ईश्वर की याददियानी करवाई जाएगी। मुशरीकों को लगता था की मुस्लिम उन्हे उनके बाप दादाओ के दीन से दूर लेके जाना चाहते हैं पर सहाबा फिर भी इस काम मे लगे रहते थे क्यूंकी वो जानते थे कि उन सभी के पूर्वजों का दीन भी इस्लाम था।  यंहा भी लोगों को लगता है की हम उन्हे, उनके बाप दादाओ के धर्म से दूर लेके जाना चाहते है तो हमे फिर भी इसी मे लगे रहना चाहिए क्योंकि हम भी जानते हैं कि सभी के पूर्वजों का धर्म सनातन (दीने कय्यिम) था।


8.   इस्लाम का पैगाम शुरुवात में छुप कर ही दिया गया जब तक की क़ुरान में खुल कर देने का हुकुम न आ गया। यंहा तक की अव्वलीन मुस्लिमो ने अपनी पहचान को छुपाते हुए यह काम किया। साहबा का खुद का दीन या पहचान छुपाना और इस्लाम का पैगाम ढके छुपे अंदाज़ में लोगों को पहुंचाने के पीछे भी वही वजूहात थी, जो आज हमारे यंहा है जैसे दुश्मनी, कट्टरता, हिंसा, नफरत से भरे लोग और माहौल। इसलिए इस इस सुन्नत और उसूल को लेकर आप भी बिना पहचान ज़ाहिर करते हुए या ढके छुपे अंदाज़ मे काम कर सकते हो, बल्कि वक़्त की ज़रूरत है की ऐसे किया जाए। 


दर्शन विज्ञान और ईश्वर

   दर्शनशास्त्र की 3 शाखाएँ हैं:- I. तत्वमीमांसा/ तत्वज्ञान (Metaphysics - beyond physics/theory of reality) [तत्व, अस्तित्व, वास्तविकता का ...