Wednesday, 7 May 2025

सूरह तौबा

 

 

कुरान 9:1: हुदेबिया की शांति संधि जोकि 10 साल की थी, लेकिन बनू बक्र कबीले ने बनू खुजाअ पर हमला किया 20 22 लोगों की हत्या की, जिसमे कुरैश ने इस उपद्रव में बनू बक्र कबीले का साथ देकर संधि का उल्लंघन किया। संधि का उल्लंघन करना साफ साफ युद्ध के लिए ललकारना है। इसमें बनू खुजाअ कबीला जोकि मुसलमानों का साथी था गैरमुस्लिम ही था. अगर आज के दौर में भी अगर कोई देश या कौम शांति समझौते का उल्लंघन करता है तो उस देश से साफ संधि विच्छेद का ऐलान किया जाएगा क्योंकि अब वह भरोसेमंद नहीं रहे।

कुरान 9:2: अतः तुम लोग (संधि के उल्लंघनकारी) देश मैं चार महीने चल फिर लो और सचेत रहो कि तुम अल्लाहू को विवश नहीं कर सकते और यह कि अल्लाह अवज्ञाकारीयों को अपमानित करने वाला है। अर्थात संधि विच्छेद के एलान के साथ साथ युद्ध की घोषणा भी की जाएगी जिसमे शत्रु को 4 महीने (वर्जित महीने) की मोहलत दी जायेगी।

कुरान 9:3: घोषणा है अल्लाह और उसके संदेष्टा की ओर से बड़े हज के दिन लोगों के लिए कि अल्लाह और उसका संदेष्टा मुश्रिको से मुक्त है। अब यदि तुम ( संधि के उल्लंघन करने वाले ) तौबा करलो ( अर्थात अपनी हरकतों से पलट जाओ) तो तुम्हारे लिए बेहतर है । और यदि विमुख होगे तो समझ लो तुम अल्लाह को विवश नहीं कर सकते। और अवज्ञा करने वालों को कठोर यातना की शुभ सूचना दे दो।

कुरान 9:4:  लेकिन जिन मुश्रिको ने तुमसे समझौता किया था, फिर उन्होंने तुम्हारे साथ कोई कमी नहीं की और न तुम्हारे विरूद्ध किसी की सहायता की तो उनका समझौता उनकी अवधि तक पूरा करो। बेशक अल्लाह सदाचारियो को पसंद करता है । इस आयत से भी यह साफ है कि युद्ध का एलान सिर्फ उनसे है जिन्होंने संधि का उल्लंघन किया।

कुरान 9:5: फिर जब वर्जित महीने गुज़र जाए (लेकिन संधि उल्लंघन करने वाले मुश्रिको की नीतियों में कोई सुधार न आए ) तो इन मुश्रिको का ( युद्धभूमि में ) कत्ल करो जहा पाओ और उनको पकड़ो और उनको घेरों और बैठो उनकी घात में। फिर अगर वे तौबा करले और नमाज़ कायम करे और ज़कात अदा करे तो उन्हे छोड़ दो । अल्लाह माफ करने वाला, दयावान है। तौबा का अर्थ होता है पलट जाना, अर्थात वे अब बाज़ आ जाए और नमाज़ ज़कात आदि अदा करके व्यावहारिक तौर पर इस्लामी निज़ाम अपनाकर आइंदा साजिश या संधि न तोड़ने का यकीन दिलाए, तो फिर उन्हें छोड़ दो यानी युद्ध रोक दो.

कुरान 9:6: और यदि मुशरिकों में से कोई तुमसे शरण माँगे, तो तुम उसे शरण दे दो, यहाँ तक कि वह अल्लाह की वाणी सुन ले। फिर उसे उसके सुरक्षित स्थान पर पहुँचा दो, क्योंकि वे ऐसे लोग हैं, जिन्हें ज्ञान नहीं । यानी अगर लड़ाई के दौरान कोई दुश्मन यह दरख्वास्त करे कि उसे इस्लाम को समझने का मौका दिया जाए तो मुसलमानों को चाहिए कि वह उसे सुरक्षा की ज़मानत दे और उसे अपने यहां आने की इजाज़त दे. फिर उन्हें इस्लाम को समझाने के लिए उसके सामने इस्लाम पेश करना चाहिए। यदि अगर वह इस्लाम नहीं अपनाता है तो वे उसे सुरक्षित उसके स्थान पर पहुंचा दें।

कुरान 9:13: क्या तुम न लड़ोगे ऐसे लोगों से जिन्होंने अपने समझौते को तोड़ दिया और रसूल को निकालने का दुस्साहस किया और वही है जिन्होंने तुमसे युद्ध की पहल की.

 

Monday, 5 May 2025

प्रदर्शन, झंडा, खतरे में नमाज़, जनगणना, राष्ट्रगान, संविधान या कुरान, फितरी देशप्रेम

 


 

हिजरत या सब्र से माहौल में बदलाव

जब मुसलमान मक्का छोड़कर मदीना में हिजरत कर गए थे वो वो अपनी प्रोपेटियाँ, वेल्थ वगैरह सब यूँही छोड़ गए थे जिन्हें मुशरिकों ने कब्जा लिया था। नबी ने मदीना जा कर कोई आज की तरह प्रोटेस्ट नहीं किया, न गैर ज़रूरी चीजों में वक़्त ज़ाया किया। बल्कि तमाम मुसलमानों ने तरबियत, तालीम, तिजारत पर इस्लाम के मुताबिक ज़ोर दिया। नतीजा कुछ सालों बाद आया जब मुसलमान वापिस मक्का लौटे और इंसाफ हासिल किया।

काबा में नबी तौहीदन इबादत कर रहे थे मगर आपने ने वंहा से हिजरत से पहले भी और बाद में भी ये बर्दाश्त किया कि मजबूरन क़ुरैश के कब्जे में रहे काबा में गैरुल्लाह की इबादतें होनी दी। आपने सब्र (खामोशी से ज़रूर तदाबीर करते रहना) किया। कुछ सालों बाद काबा वापिस मुसलमानों ने पाया और वो तौहीद का वापस सबसे बड़ा मरकस बना।

अब एक हालिया राजनीतिक मिसाल। इंदिरा गांधी ने इमरजेंसी के दौरान संविधान में अनेकों अमेंडमेंट किये और धज्जियां उड़ा दी कानून की। फिर मोरारजी की जनता पार्टी की सरकार आयी और सारे इंदिरा के बनाये सारे गलत कानून वापिस अमेंडमेंट करके सुधार दिए, बल्कि ऐसे कि कोई दुबारा आसानी से बदल भी न पाए।
 

पब्लिसिटी स्टंट से वोट बैंक एकजुट करना

एकजुट होने का मतलब खुद को किसी नेगेटिव या कट्टरपंथी ताकतों या शख्सियत  के हवाले करना नहीं होता। अगर ऐसे एकजुट होना सही है तो फिर हिंदुओ के इस अमल आप लोग आप रोना-पीटना क्यों मचाये रहते हो? अगर ऐसे वोटर मापना सही है तो थाली बजवाने वाले और आप मे फर्क क्या रह गया। वो तो अपने भक्तों को बेवकूफ बना रहे हैं और आप क्या कर रहे हो, इस्लाम के नाम पर अपना काम? 

अगर मुसलमानों एकजुट होना, महजबी ठेकेदारी नही है बल्कि अपने वजूद की लड़ाई है, जैसा आपने कहा तो ऐसा ही लॉजिक हिन्दू देते हैं कि वो उनके अस्तितिव, धर्म की रक्षा की लड़ाई है। इसके कारण देख लो मुल्क कंहा आके खड़ा हो गया है। हर तरफ यही होने लगा तो फिर देश कंहा जाके रुकेगा। यही लॉजिक देके हिंदुस्तान के 3 टुकड़े करवा लिए गए थे। बात A, B टीम की नही है बात है कि जो अक्सर मुस्लिम नेता करते रहे हैं, कर रहे हैं क्या वाकई वो यंहा के  मुसलमानों के मसइल का हल है या नहीं? क्या उससे यंहा हालात सुधरेंगे या और बिगड़ेंगे? क्या अभी जो किया गया है, वाकई उससे ज़मीनी स्तर कुछ मुसलमानों को फायदा हुआ या ये एक स्टंट था?

यंहा के ज़्यादातर लोग एक मक़सद और हिकमत के तहत हालातों को बदलने का क़ुरान, सुनन्त की रोशनी में काम कर रहे हैं।  उन्हें परेशानी, हल, रास्ता सब मालूम है. 


गैरों के लिए शांति मार्च

अपनी अपनी सामाजिक, राजनीतिक और धार्मिक समझ है। अपने अपने तजुर्बे, इल्म, हिकमत है।  रामपुर में पहलगाम के लिए रैली इसलिए निकाली गई क्योंकि इस्लाम का नाम लेके क़त्ल किया गया (कलप्रिट, प्लानर कौन हैं ये अलग बेहस है)। जो रैली निकाली गई वो इस्लाम, मुसलमानों की छवि साफ करने के लिए है, देश मे जारी माहौल के चलते। सब न सही मगर एक बड़ा हिन्दू धर्म का तबका ऐसे एक्सप्रेशन से न्यूट्रल हुआ है।

रामपुर में अगर 65% मुसलमानों में से ०.1% ने ये रैली निकाल दी। तो बाकी 64.99 % अपनी समझ अनुसार अपनी रैली निकाल लें, किसने रोका है? चाहे नैनीताल के हालातों पर हो या किसी और मुद्दे पर। आपको सवाल इन ०.1%  वालों की बजाय 64.99 % वालों से करना चाहिए पहले की वो क्यों घर बैठे हैं। वर्क वाले कुछ तो कर रहे हैं जो उनकी सोच और समझ अनुसार ठीक है। बाकी 64.99 % क्या कर रहे हैं? वो नैनिताल के लिए रैली नहीं निकालेगे, गारंटी से कह रहा हूँ। फिर उनसे वजह पूछिएगा। को वजह वो बताएं, वही वजह वर्क वालों की भी मान लीजिएगा की क्यो नैनीताल पर कुछ नहीं निकाला, और क्यों पहलगाम पर निकाला। दोनों मसले अलग हैं, दोनों पर एक्शन अलग होगा, दोनो के नतीजे अलग निकलेंगे। ऐसी बहुत सी बातें हमें समझनी पड़ेगी।

इस्लाम विरोधी प्रर्दर्शनों के खिलाफ रैली या वापिस कोई प्रदर्शन करने इस्लाम की छवि कैसे साफ होगी? छवि साफ करने के लिए तो निंदा होती है, पीस मार्च एंड टॉक होते हैं, इस्लाम की हकीकत समझाई जाती है, वगैरह वगैरह? उनके गलत प्रर्दशन के बाद हम भी कोई उनका विरोधी प्रर्दर्शन करने से छवि साफ होगी या मामला बढ़ेगा? उलटा उन्हें ही इससे और फायदा तो नहीं होगा जैसा वो चाहते हैं?

प्रोटेस्ट का जवाब हर बार प्रोटेस्ट नहीं होता, खासतौर से ब्लास.फेमी जैसा मामलों में। उनका मैन मकसद दुसरो को उकसाना और खुद को शोहरत दिलवाना होता है। वो तो चाहते ही है कि माहौल खराब हो।  ऐसे मेसेज हम ही वायरल करके उनको हीरो बना देते हैं. आखिर यही वो चाहते हैं। उनके बिछाए जाल में फंसना नहीं चाहते तो लीगली मूव करिए। लोग खुद को इक्कठा करिए और थाने में रिपोर्ट्स करवाइए. न लिखें तो लोकल लीडर्स को लेके प्रेशर बनाइए, आखिर वो भी तो इमोशनली प्ले करते हैं। फिर भी न हो तो वकीलों की टीम बनाइये और कोर्ट में जा कर रिपोर्ट दर्ज करवाइए. जब आप इन लोगों के पास जाओगे तो ये भी वही बात समझायेंगे, जो हम समझा रहे हैं. फिर भी ये करके देख लीजिये, कम से कम लोगों को तसल्ली तो हो जायेगी। वैसे भी सड़क पर लड़ाई से बेहतर कानून की लड़ाई करना है। कानूनी मार ऐसे मामलों में असरदार होती हैं। इससे कुछ नफरतती लोग पहले सीधे हुए हैं। कुछ वालों को जो मुनासिब लग रहा है, वो अपनी हिकमत के मुताबिक कर रहे हैं, बाकी लोग अपनी समझ से करिये। आखिर कई दिशाओं से इस पर काम करना तो और अच्छा है।

 

झंडे पैरों तले कुचलवाना

स्पोंसर्ड काम हो रहा है यह झंडा पांव तले कुचलवाने का। मक़सद है पहलगांव के मुद्दे पर आखिरी लेवल तक हिन्दू-मुस्लिम किया जा सके और बाकी चीजों से पूरी तरह से ध्यान हटाया जा सके। और भी इसी तरह फालतू के मुद्दे जानभुझ कर खड़े किए जा रहे हैं जिनका मक़सद ध्यान भटकाना है। लोगों को चाहिए कि इस बात को समझे और इमोशन की बजाय चालाकी से काम लें। वरना पिटाई भी होगी, एफआईआर भी, और उनके प्रोपगंडा को भी हवा मिलेगी। ज़ुल्म अपनी हदें पार कर चुका है। मगर रास्ता मुसलमान नहीं तो और कौन निकलेगा? आखिर ज़रूरत भी तो हमारी है।

चाँद-तारा इस्लाम का प्रतीक नहीं है. नबी के वक़्त में जंगों में मुसलमानों के झंडे सादे बिना किसी प्रतीक के होते थे. ये तो बाद में जब मुस्लिम हुकूमतें फैली और ईसाईयों के सलीब निशान वाले  झंडे के सामने मुस्लिम प्रतीक वाले झंडे की ज़रूरत पड़ी तो चाँद- तारे को अपना लिया गया क्योंकि हिलाल के चाँद का इस्लाम में काफी महत्व है.


खतरे के माहौल में नमाज़ कैसे अदा करें.

आज कल बाहर नमाज़ पढ़ने वालों पर काफी हमले हो रहे हैं. ये जान-माल-वजूद पर हमला है। लिहाजा इस्लाम की दी हुई तमाम रिलेक्सेशन अब लागू करनी ही चाहिए, आम उलेमा भले मना करते हों।

खतरे वाली जगह नमाज़ नहीं पढ़ना बल्कि सेफ जगह पहुँच कर ही पढ़ना। इसके लिए 2 नमाज़ों को उनके आखिरी मर्जिंग वक्त में साथ पढ़ा जा सकता है बल्कि 2 नमाज़ों को जमा भी किया जा सकता है। नमाज़ क़सर की जा सकती हैं (4 रकअत की 2)। अव्वल वक़्त में पढ़कर निकला जा सकता है। असर नमाज़ शाफ़ई मनहज़ के वक़्त पढ़ी जा सकती है।

जंहा आपको देखने वाले हो, वंहा नमाज़ इशारातन पढ़ना, बैठे हुए पढ़ना, गाड़ी पर पढ़ना, पैदल चलते हुए पढ़ना, कोई काम करते हुए पढ़ना। नमाज़ बेहद शार्ट पढ़ना (लाज़मी अरकान)। सिर्फ फ़र्ज़ नमाज़े पढ़ना।

सही माहौल न मिलने के कारण नमाज़ क़ज़ा हो जाये तो सेफ माहौल मिलते ही अदा करना, ये क़ज़ा नहीं मानी जायेगी।

और अगर इनमें से भी कोई सूरत मुमकिन न हो तो जो मुमकिन हो उस तरह से अदा करके अल्लाह के हवाले कर दें (भले ऐसा तरीका कभी नबी या किसी सहाबी ने पहले न किया हो)।

नमाज़ छोड़ने से बेहतर है, उसे किसी तरह अदा कर दिया जाय। 

 

जातिगत गणना में जाती मुस्लिम बताना

जातिगत गगना में खुद की जाती मुसलमान लिखवाना एक बेवकूफी भरी मुहिम है। बस सेंसस में जाति मुस्लिम लिखवा कर मुस्लिम बनने की कोशिश कर रहे हैं। जबकि शादियों से लेके कब्रिस्तानों में, सामाजिक स्तिथि से लेके मानसिकता तक मे जातियां घुसी हुई हैं। सेंसस में ऐसा कुछ किया तो पिछड़ी मुस्लिम जातियों को मिलने वाले थोड़े बहुत बेनिफिट से भी महरूम हो सकते हो। करना ही है तो पहले क़ौम की सोच में से जातियां हटाओ फिर सरकार के रिकॉर्ड में से। 


राष्ट्रगान में तौहीद

रबिन्दरनाथ टैगोर ने एक कविता लिखी थी जिसका एक भाग (पहला) भारत के राष्ट्रगान एक रूप में चुना लिया गया था. टैगोर पर आरोप लगे थे कि ये गीत उन्होंने ब्रिटिश राजा - रानी के लिए लिखें हैं क्योंकि इस पुरे गीत में एक सर्वोच्च शासक या शक्ति को रेफर किया गया है. इसके जवाब में उन्होंने कहा था कि ये उन्होंने यह गीत भाग्य विधाता (ईश्वर) की प्रशंसा में लिखा था. किसी भी देश का राष्ट्रगान ईश्वर की प्रशंसा नहीं करता है. अल्लामा इकबाल का सारे जंहा से अच्छा तराना भी देश देश की प्रशंसा में है. 


संविधान, कुरान में से कौन पहले है? देश और धर्म में किसे वरीयता देंगे?

हक़ीक़त में अल्लाह की ही बात को तरजीह दी जायेगी क्योंकि पूरी दुनिया का बनाने वाला एक ही मालिक है जबकि सरहदें इंसान की बनायीं हुई है. इंसानियत कौमियत से बढ़कर है, ऐसे विचार अनेकों विद्वान् जैसे रबिन्द्रनाथ टैगोर आदि पहली रख चुके हैं। मगर क्योंकि ये सवाल प्रोपगंडा के तहत पूछा जाता है इसलिए इसका जवाब इमोशनली नहीं, हिकमतन दिया जाना चाहिये, और वो जवाब सच भी हो।

देश या कानून की बात होगी तो संविधान सबसे ऊपर होगा। जब धर्म या आस्था की बात होगी तो इस्लाम/क़ुरान/अल्लाह की बात सबसे ऊपर होगी। दोनों को आपस में कोई टकराव नहीं है। क्योंकि हमारे संविधान निर्माताओं ने लोगों को कोई भी धर्म मानने का इख़्तियार संविधान में दिया है। इसी तरह हर धर्म ने अपने लिए कानून, संविधान बनाने का इख्तियारत दिया है।

क्या कोई बता सकता है कि उसे अपनी दोनों आंखों में से कौन से एक आंख ज़्यादा प्यारी है, या किसे वो ज़्यादा तरजीह देता है। इंसान को अपनी दोनों आँखें प्यारी होती है। वो दोनों से काम लेता है। इसी तरह क्या कोई बता सकता है कि उसे अपने पिता से ज़्यादा प्यार है या मां से। ज़ाहिर है हम दोनों को बराबर दर्जे पर रखते हैं। कोई ये नहीं कह सकता कि बाप को तरजीह दो, माँ को बाद में। या कोई ये नहीं कह सकता कि मां को तरजीह दो, बाप को बाद में। हर इंसान यही कहेगा कि दोनों को बराबर तरजीह दी जानी चाहिए।

 

फितरी देशप्रेम 

नबी ने फरमाया कि तू कितना ख़ूबसूरत शहर है और मुझे तुझ से कितनी मोहब्बत है, अगर मेरी कौम मुझे यहां से नहीं निकालती तो मैं किसी दूसरे शहर में कभी नहीं रहता (तिर्मिज़ी 3926).
नबी ने फरमाया  कि ऐ अल्लाह हमें मदीना की मोहब्बत अता कर जैसे हमें मक्के से मोहब्बत थी ब्लकि उस से भी ज़्यादा मदीने की मोहब्बत अता कर (बुखारी 5677).

Indus Valley Civilization (Harappa)

 

The Dravidian linguistic elements have been found in Indus Valley Civilization (IVC). Due to this, some believe that IVC had a proto Dravidian language and when IVC declined (around 1900 BC), some people moved towards southwards and formed the Dravidian language. However it's also believed that IVC language is related to other linguistic families or are just symbolic markers.

Worship of the mother goddess, scared animals, people tree signs are common in both civilizations. That's why it's believed that they had some connection with Dravidian but were not part of each other at the time of IVC.

IVC had not Aryan (steppe) ancestry. Indo-Aryan arrived here after 2000 BC. IVC and South Asian populations share some of the same genes.

70K years ago Homo sapiens arrived in Asia. Some inhabited south Asia i.e. South India as Hunter-Gatherers between 65K-10K years ago. From Arica, some inhabited Iran as Farmers around 7K years ago. They both met and built IVC (3300-1300 BC).

Dravidians were the descendants of these Hunter gatherers. Today's Dravidians have these South Asian, Iranian Farmers and Indo-Aryan genes as well (later mixes up in North). Sindhis are mixture of IVC and Indo-Aryans.
 

There is a particular gene called R-M124, found in one percent of Ashkenazi Jews. The question arises: how did the R-M124 gene get into the Ashkenazi Jews? A study by Sanghamitra Sahoo points out that there is a high concentration of the R-M124 gene among the Karmalis of West Bengal (100 percent), Kshatriyas of Jaunpur (87 percent), and the Yadav community in Bihar (50 percent). This suggests a strong presence in eastern India. It is hypothesized that when the Indus Valley declined around 1500 BCE, the Yadavas, who lived there and had the R-M124 gene, migrated to Israel. Simultaneously, some migrated to eastern India. This explains the presence of the R-M124 gene in both these regions. 

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अब तो नई तहक़ीक़ सामने आ रही है। IIT प्रोफेसर भारत झुनझुनवाला रिसर्च कर रहे हैं और दावा कर रहे हैं कि यहूदियों के खोये हुए 12 कबीलों में से एक कबीला भारत के यादव हैं। यहूदियों ने गाय का बछड़े की मूरत को बना कर परम्परा के तौर पूजा था। यादवों में गाय को पूजनीय माना जाता है, हमेशा से गौ पालक भी हैं। यादवों का कृष्ण से गहरा नाता है। कृष्ण और मूसा अलैह. की कहानी में बेहद समानता है। कृष्ण अवतार है। हालांकि यादव ये बात सुनकर नाराज़ हो जाते हैं। वैसे भारतीय लोग हमेशा से ही तथ्यों से ज़्यादा परम्परा पर ज़ोर देने वाले हैं। शायद DNA रिसर्च के बाद ही पुख्ता तौर पर कुछ कहा जा सकता है। 

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अल तकिय्या और हज सब्सिडी


अल तकिय्या शब्दो के जो अर्थ आम तौर पर बताये जाते हैं, ये क़ुरान में ऐसे ही नहीं है और जो इससे जोड़ कर देखा जाता है, वंहा भी इसका अर्थ ऐसा बिल्कुल नहीं है। अल तकिय्या शब्द एक स्तिथि का नाम है, जो इंसानों की बनाई हुई है। इसका अर्थ है जब आपके धर्म या किसी संबंधित आधार पर आप पर जुल्म किए जाए, या सताया जाए या आपकी जान - माल आदि को खतरा हो तो आप अपने धर्म - इस्लाम को छिपा कर वंहा रह सकते हैं। यानि चोरी छिपे अपने धर्म का पालन करते रहें, धर्म रहित न हो जाये डर से. स्पष्ट है कि जान है तो धर्म है, यही ईश्वर का आदेश है। जब माहौल अच्छा हो जाये तो खुल कर पालन करने लगिए। आज भी कुछ लोग इसे करते है जब मजबूरी होती है।

शिया लोगो ने इस रेलक्सशेसन का काफी इस्तमाल किया है और उन्ही से इसे जोड़कर देखा जाता है.

और ये सिर्फ धर्म में ही क्यों, हर विचारधारा के लोगों को माहौल विरुद्ध मिलने पर ऐसा करना पड़ता है। इंसान की समझ, बुद्धि, तर्क, अनुभव यही समर्थन करते हैं कि ऐसी छूट जीवन में मिलनी ही चाहिए, धर्म हो या कोई और क्षेत्र। ये वैसा ही जैसे कोई भारतीय सैनिक जासूसी करने पाक जाये और वो कुछ समय के लिए अपनी इडेंटटी छिपा कर, खुद को पाकिस्तानियो में मिला ले और पकड़े जाने पर खुद को भारत से पल्ला झाड़ कर अपनी जान बचाये और खतरा टलने पर बाद भले खुल कर सामने आ जाये।

जो हिन्दू भाई ये कहते हैं कि क़ुरान में इसका आदेश है या मुस्लिम इसके अंतर्गत दिखावा करते हैं, या ये धोखेबाज़ी है। उन्हें अपने धर्म का ही ज्ञान नहीं है। हिन्दू धर्म में भी ये व्यवस्था है जिसे "आपद्धर्म" कहा गया है। विभिन्न ग्रंथों में इसका उल्लेख और आदेश है। यानी आपातकाल या आपदा की स्थिति में अपने धर्म को छिपा कर व्यवहार करना। दुसरो पर उठने वाली हर उंगली अपनी तरफ पहले इशारा करती है। न जाने दूसरे धर्म के प्रति नफरत फैलाने वाले लोग कब अपने गिरेबान में पहले झांकेंगे?

 

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हज सब्सिडी लगभग 1960 से दी जा रही थी। 2012 में सुप्रीम कोर्ट ने इसे 2022 तक चरण बद्ध तरीके से बंद करने का आदेश दिया जो घटाते सब्सिडी अमाउंट घटाते घटाते 2018 में बंद कर दी गई।

आखिर बार 2017 में जब ये दी गयी तो लगभग 525 करोड़ थी और सरकारी सब्सिडी लेने वाले हाजियों की संख्या 1.25 लाख थी (यानी लगभग 40 हज़ार प्रति व्यक्ति)। इस वक्त इंडियन एयरलाइन दिल्ली, मुम्बई, कोलकाता से सऊदी तक का टिकट 65-90 हज़ार के बीच चार्ज कर रही थे। जबकि दूसरी एयरलाइन्स में यह 35 हज़ार का टिकट था। बसब्सिडी बंद होने के बाद इंडियन एयरलाइन के हज टिकट सीधा 20 हज़ार कम हो गए थे।

2010s में सरकार ने सबसे अधिक 850 करोड़ की सब्सिडी दी थी मगर सरकारी हाजी लगभग 1.25 ही थे। यानी पर हेड 68 हज़ार। इस समय इंडियन एयरलाइन्स लगभग 90 हज़ार -1 लाख टिकट के चार्ज कर रही थी। जबकि प्राइवेट एयरलाइन्स 30-40 हज़ार। इस वक़्त 2-3 लाख में हज हो रहा था। 2025 में आज बिना सब्सिडी के सरकार 4 लाख ले रही है।

सऊदी सरकार एक तरफ का फ्यूल भी फ्री देती थी। कुछ अन्य बेनिफिट भी दे रही थी। किसी भी ट्रिप में हवाई जहाज़ की कमाई का 25% सिर्फ फ्यूल में खर्च हो जाता है। अगर आज भी साल भर के लाखों लोगों के एयर टिकट का कॉन्ट्रैक्ट किसी प्राइवेट एयरलाइन को दिया जाए तो 25% डिस्काउंट आसानी सी मिल जायेगा।

इंडियन एयरलाइन का जितना भी घाटा था उसका लगभग 20% सब्सिडी भरपाई कर रही थी। इसी वजह से 2022 में इंडियन एयरलाइन को टाटा ने खरीद लिया।

 

दर्शन विज्ञान और ईश्वर

   दर्शनशास्त्र की 3 शाखाएँ हैं:- I. तत्वमीमांसा/ तत्वज्ञान (Metaphysics - beyond physics/theory of reality) [तत्व, अस्तित्व, वास्तविकता का ...