Saturday, 27 March 2021

शब ए बारात।


रात में सड़कों पर घुमना इबादत नहीं है। इबादतें मस्जिदों में की जाती है, सड़कों पर नहीं। 

बाइक स्टंट करना अपनी जान को ख़तरे में डालना है और इस्लाम इसकी बिल्कुल इजाज़त नहीं देता। 

साल भर से कोरोना बाहर घूम रहा है। आप रात भर तक गलियों में न घूमें। घर या मस्जिद में इबादत करें।

अपने घरों में भी इबादतें किया करो। घरों को कब्रस्तान मत बनाओ।
[सहीह मुस्लिम : 1820]

अपने दीन को बेहतरीन करने का एक हिस्सा ये है कि कोई शख्स हर वो चीज़ छोड़ दे जिससे उसका कोई वास्ता नहीं है।
[हदीस ए नवावी : 12]

जो दूसरों को परेशानी देता है, ख़ुदा उसको परेशानी देता है। जो दूसरों के लिए मुश्किलें खड़ी करता है, ख़ुदा उसके लिए मुश्किलें खड़ी कर देता है। 
[इब्ने माजाह : 2342]

दूसरों को नुक़सान पहुंचाने से बचो। तुम्हारे हक़ में ये भी एक नेकी मानी जायगी।
[सहीह बुखारी : 2518]

Friday, 19 March 2021

महाशिवरात्रि धार्मिक त्यौहार नहीं है।


क्या महाशिवरात्रि आरंभ में एक धार्मिक त्योहार था या सांस्कृतिक भौगोलिक ?

विज्ञान बताता है कि अगर चांद न हो तो पृथ्वी पर बहुत सी चीज़ें खत्म हो जाए जैसे वनस्पति आदि। पृथ्वी और चांद की परस्पर स्तिथि का प्रभाव धरती पर अनेकों रूपों में पड़ता है। चांद की ग्रेविटशनल फ़ोर्स पृथ्वी पर मौजूद पानी को ऊपर खींचता है।  इसलिए पृथ्वी की चांद की विशेष स्तिथि से ही समुद्र में ज्वारभाटा आता है।  वैज्ञानिक बताते है कि मंगल ग्रह पर पानी था पर कंहा गया पता नहीं। पृथ्वी का पानी भी चांद खींचने की कोशिश करता है पर बहुत से अन्य का कारणों के चलते वापिस छोड़ देता है। यानी अगर छोड़े न तो ऊपर चला जाएगा। 

चन्द्र या लूनर कलेंडर के प्रत्येक महीने के मध्य में एक रात ऐसी आती है जब पृथ्वी और चांद की स्तिथियों के कारण चांद की ग्रेविटशनल फोर्स पृथ्वी पर सबसे अधिक प्रभाव दिखाती है। रिसर्च में पाया गया है कि इसका सर्वाधिक प्रभाव पानी पर पड़ता है और इस रात धरती पर पानी ऊपर की तरफ उठता है। और फरवरी-मार्च महीने में आने वाली एक रात को सबसे अधिक फ़ोर्स प्रभाव दिखाती है। वैज्ञानिकों ने बताया है कि इस समय लहरें 5-7 फ़ीट ऊपर उठती है। इसलिए एनीमल बेहवीयरिस्ट ने ये पाया है कि इन दिनों में कमज़ोर जानवरों को बड़े जानवरों पर हमला करते हुए भी पाया गया है।

हज़ारों वर्षों से महाशिवरात्रि मनाई जा रही है। महाशिवरात्रि कोई धार्मिक त्योहार नहीं है। ये एक खगोलीय घटना है। ये मूलतः एक एस्ट्रोनॉमिकल और जियोग्राफिकल इवेंट है।  हर महीने आने वाली इसी रात को ही शिवरात्रि कहा गया और साल में सबसे बड़ी ऐसी रात को महाशिवरात्रि कहा गया। पूरे साल में 12-13 शिवरात्रि आती है। हर महीने एक शिवरात्रि आती है। ये महीने की 14वीं रात को आती है। अमावस्या से ठीक एक दिन पहले जिस दिन चांद बिल्कुल बारीक़ नज़र आता है उसे ही शिवरात्रि कहा गया। यानी जब चंद्र कृष्ण पक्ष से शुक्ल पक्ष में जा रहा होता है (the last day of wanning moon and the first day of waxing moon). फरवरी के अंत और मार्च के आरंभ में आने वाले शिवरात्री को महाशिवरात्रि कहा गया। क्योंकि इस दिन चाँद की ग्रेविटशनल फ़ोर्स अत्यधिक होती है। इस दिन के बाद ही सर्दियों का मौसम गर्मियों में बदल जाता है। 

भारतीय पंरपरा में मनुष्य को पंचतत्व से बना माना गया है जो है मिट्टी, पानी, अग्नि, वायु और आकाश। हमारे शरीर में 72% पानी है। क्योंकि सभी जीवों का शरीर में पानी से बना है। प्राणियो के शरीर में मौजूद पानी शिवरात्रि वाले दिन ऊपर की और उठता है। इससे शरीर में शक्ति और ऊर्जा बढ़ती है।   इस दिन विभिन प्रकार के लोगों पर विभिन्न प्रभाव पड़ता है। विवाहित, अविवाहित, सन्यासी पर अलग अलग प्रभाव पड़ता है। तभी सन्यासी लोग इस दिन ध्यान या योग करते है। पेड़ पौधों पर भी इसका प्रभाव पड़ता है।

इस रात में शरीर को सीधा रखना है लिटाना नहीं है। लेटने से नकारात्मक प्रभाव पड़ता है और सीधे बैठेने से सकारात्मक क्योंकि ऊर्जा नीचे से सर तक पहुंचती है।  स्पाइन सीधी रहनी चाहिए यानी नैचुरल, न ज़्यादा ढीली न ज़्यादा तंग। आसन में स्थिर रहने से प्रभाव पड़ता है। ये इसलिए किया जाता है ताकि हमारा कांशसनेस, यूनिवर्स की कांशसनेस के कांटेक्ट में आ जाए या जुड़ जाए। हर महीने इसका अभ्यास करने के बहुत फायदे है और इससे होता ये है कि वर्ष में एक बार आने वाली महशिवरात्री की तैयारी हो जाती है। 

भारत सदैव से ही खगोल और ज्योतिष शास्त्र में अग्रणी रहा है इसलिए भारतवासियों को इस रात के लाभों और समय का ज्ञान था। इस रात्रि की यंहा बहुत प्रतीक्षा की जाती थी और इस रात में यंहा लोग योग और ध्यान किया करते थे जो हज़ारों वर्षों बाद में एक धार्मिक अवसर बन गया।

दरअसल शिव एक निराकर ईश्वर की संहार करने के गुण का नाम था जिस पर बाद में एक देवता बना लिया गया। वैदिक काल में शिव एक निराकर ईश्वर का ही नाम था। जैसे ब्रह्मा नाम ईश्वर के रचना करने के गुण का नाम है और विष्णु संचालन करने के गुण का। ब्रह्मा विष्णु शिव कोई अलग अलग देवता नहीं बल्की एक निराकर ईश्वर में निहित शक्तियों या गुणों के नाम है जिन नामों पर  बाद में अलग अलग देवता गढ़ लिए गए। क्योंकि इस दिन विशेष ऊर्जा का उत्सर्जन होता है इसलिए ये बहुत संभव है कि इसे रात को शिव की शक्ति का प्रदर्शन होने के कारण ही शिवरात्रि नाम रखा गया हो। बाद में इस दिन के साथ भिन्न भिन्न कथाएं जोड़ दी गयी जैसे कि इस दिन सृष्टि का निमार्ण हुआ था या इस दिन शिव पार्वती का विवाह हुआ था या इस दिन शिव ने ज़हर पिया था या इसी दिन ज्योतिर्लिंग रुप में शिव प्रकट हुए थे आदि आदि। ये भी हो सकता है कि पहले इसे कुछ और नाम से पुकारा जाता हो और बाद में धार्मिक महत्व बढ़ने के कारण या शिव देवता से जोड़े जाने के कारण इसे शिवरात्रि कहा जाने लगा हो।

और अधिक जानकारी के लिए आप सदगुरु जग्गी वसुदेव और अलीगढ़ यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर डॉ सय्यद तारिक़ मुर्तजा की रिसर्च भी देख सकते है।

Wednesday, 10 March 2021

क्या वेदों में ईशवाणी और सनातनी परंपरा में एकेश्वरवादी धारणा कभी नहीं रही?


आजकल कुछ सवाल उठाये जाते हैं कि वेद, सनातन धर्म और भारतीय परंपरा में कभी एकेश्वरवाद रहा ही नहीं है और इसलिए लोग एकेश्वरवादी वेद भाष्य का गलत प्रचार करते हैं, जबकि उसमें केवल प्रकृति पूजा है और वेदो को ईश्वर ने नहीं बल्कि ऋषियों ने रचा है। कुछ हिंदू विद्वानों का भी ऐसा ही मत है।

ग्रंथों, विद्वानों और परम्पराओं से प्रमाण

यंहा फिलहाल प्रथम प्राथमिकता वेद को ईश्वरीय साबित करने की नहीं है। पर वेदों को ले कर प्राचीन काल और सनातन धर्म के विभिन्न संप्रदायों या विद्वानों में क्या क्या मत पाए जाते हैं, इस पर पहले चर्चा कर लेते हैं।

यह मानना आधारहीन नहीं है कि संकलन करते हुए और स्मृति आगे बढ़ाते हुए वेद कभी भी प्रक्षिप्त नहीं हुए हो। हालांकि लगभग सभी सनातनी विद्वान यह मानते हैं कि वेदों में कोई मिलावट नहीं हो पाई है। 

एक बात जो बिल्कुल स्पष्ठ है कि वेदों के मूल अर्थात मंत्र संहिता में कंहीं भी मूर्तिपूजा का उल्लेख नहीं है परन्तु प्रकृतिपूजा का अवश्य है। साथ ही इनमें एकेश्वरवाद भी उपलब्ध है। वेदों को हमेशा से अपौरुषेय कहा जाता रहा है, अनेकों जगह प्राचीन लेखन में इसका उल्लेख मिल जाता है।

यह सच है कि अधिकतर विद्वानों या संप्रदायों के वेदार्थ एक दूसरे से पूर्णत: या मूलतः अलग अर्थ रखते हैं और आपस में शत प्रतिशत नहीं मिलते। सायण (14वीं सदी) आदि प्राचीन भाष्यकार कर्मकांडी थे और इसलिए उनके वेद व्यख्यान भी उनकी विचारधारा से भिन्न नहीं हो सकते। इसलिये इनका वेदार्थ अन्य प्राचीन विद्वानों की तरह ही बहुदेववाद और कर्मकांडों के इर्द गिर्द ही अर्थ प्रस्तुत करता है।

स्वामी दयानन्द (19वीं सदी) द्वारा किया गया वेदों का अर्थ पूरी तरह से एकेश्वरवादी है। इन्होंने ब्रह्मा, विष्णु, महेश, तीनों को एक ही सिद्ध किया और कहा कि तीनों को बाद में अलग अलग देवता बना दिया गया। यह भी कहा कि इनकी शक्तियों को बाद में इनकी पत्नी बना दिया गया। वैसे भारतीय परम्परा में हर वस्तु (त्रिदेव को भी), एक ईश्वर से ही उत्पन्न माना जाता है। 

यह सत्य है कि स्वामी दयानंन्द ने सम्पूर्ण वेदार्थ को एकेश्वरवाद पर आधारित किया है। उनसे पहले किसी एक भी वेद का भाष्य सम्पूर्ण एकेश्वरवाद पर किसी भी विद्वान का नहीं मिलता है। शायद दयानंद जी के एकेश्वरवादी मान्यता के पीछे वजह ईसाइयत और इस्लाम रहा है। क्योंकि उनके समय तक हिन्दू इन दोनों धर्मों में शामिल होना नहीं रुक पा रहा था। इसलिए उन्होंने इन दोनों धर्मों की मूल मान्यता को वेद से ही निकाल कर सबके सामने रख दिया।

उन्होंने जो वेदों में आए अनेकों नामों या अस्तित्व को ईश्वर का नाम बताया है, इसका कारण यह हो सकता है कि वह ऐसे नामों को न्यायोचित ठहराने के लिए इसके अलावा कोई अन्य उपाय कर ही नहीं सकते थे। क्योंकि वह यह मानना ही नहीं चाहते थे कि वेद में इतिहास और मिलावट हो सकती है। वेदों को उन्होंने 4 ऋषियों को सृष्टि की अनादि में दिया हुआ माना है। वास्तव में वेदों में मनुष्यों के नाम आना उनमें इतिहास पाए जाने का सबूत है। उन्होंने इसलिए ये सभी नाम ईश्वर के नाम बना कर और उनकी मनमानी व्याख्या कर के, वेदों में नज़र आने वाली ऐसी सारी मिलावटों और इतिहास से पीछा छुड़ा लिया। 

यह भी सत्य है कि स्वामी दयानंन्द के सक्रिय होने तक या उनसे पहले भारतीय समाज में और वेदों में से एकेश्वरवाद लगभग गायब हो चुका था परन्तु ऐसा पूरी तरह नहीं से नहीं हुआ था। यानी दयानंद जी से पहले ही एक ईश्वर या ब्रह्म का विचार प्रचलन में था, कम मात्रा में ही सही। भले उस एक के नाम यंहा समय समय पर बदल कर ब्रह्म, परब्रह्म या ईश्वर कहे जाते रहे हों। स्वामी दयानंद के समकालीन रहे वेद विद्वान श्रीपद दामोदार सातवलेकर के वेदार्थ में भी एकेश्वरवाद का विचार मौजूद है।

1.
सबसे बड़ा उदाहरण है, अलबेरुनी (10वीं सदी), जिसने अपनी 'किताबउल हिन्द' में लिखा है कि "यंहा दार्शनिक, मोक्ष मार्ग पर चलने वाले, ब्रह्मविद्या अध्यनन करने वाले गण एकेश्वरवादी हैं, मूर्तिपूजा से दूर हैं और अशिक्षित जनता ही मूर्तिपूजा में संलिप्त है। ब्राह्मण वेदो को लिखे जाने के घोर विरोधी हैं क्योंकि इसको विशिष्ट उच्चारण से बोला जाता है और लेखन उन्हें कतई भली प्रकार नहीं संजो सकता। ये स्मरण के आधार पर आगे बढ़ाया जाता रहा है, इसीलिये ये कई बार स्मृति से खो भी चुके हैं"। (यंहा अलबेरुनी ने वेद मंत्रों के भूल या गुम जाने की बात भी करी है जो वेदों के शतप्रतिशत संजोयें जाने की मान्यता पर एक प्रश्नचिन्ह है)। 

डूबियस ने भी ऐसा ही बयान किया है। भारत यात्रा पर आए चीनी यात्री ह्वेनसांग (7वीं सदी) ने भी लिखा है ही वेदों को मैखिक रूप से प्रचलन में रखा जाता था।

इस तरह यह ठोस संकेत मिल जाता जाता है कि वेदों में कांट छांट हुई है, जिसे अब पूर्णत: ज्ञात करना लगभग असम्भव है।

ब्राह्मी लिपि के प्राचीनतम अभिलेख (6ठी सदी ईसापूर्व) के मिलते हैं। ब्राह्मी मतलब ब्रह्मा के मुख से निकली भाषा। ब्रह्मा शब्द बना ब्रह्म से। ब्रह्म या ब्रह्मा शब्द बौद्ध ग्रंथों में आता है जो लगभग 2 हज़ार वर्ष पुराने हैं। बुद्ध ने इस परमसत्ता का विरोध किया था।

2.
भारत में ईश्वर की मान्यता हमेशा से रही है। इंसान का मन भी उस सर्वशक्तिशाली को एक ही कहता है। सगुण और निर्गुण विचारधारा के रूप में दोनों भक्तियां यंहा सदियों से प्रचलित हैं। कैसी भी व्याख्या हो पर फिर भी वेद, उपनिषद, पुराण, महाभारत, गीता, रामायण या तारक मंत्र, ब्रह्मसूत्र में एक ईश्वर होने के बीज हर जगह स्पष्ठ रूप से मिल ही जाते हैं। भक्तिकाल (14-17वीं सदी) में भी एकेश्वरवाद पाया जाता है और कबीर, रैदास, नानक, तुलसीदास आदि अनेकों कवियों की रचनाओं में भी।

ब्रह्म सूत्र में एक ईश्वर ही आशय है बस अन्तर इतना है कि वेदांत में ये ब्रह्मसूत्र ईश्वर के सर्व्यापक होने की विचारधारा के साथ साथ चलता है जो अहंब्रह्मास्मि, तत्वमसि आदि जैसे मत भी प्रतिपादित करता है। इसके अलावा उपनिषदों में भी वेदों जैसी तौहीद मौजूद है। कभी भी केवल देवताओं को ही यंहा एकमात्र या पूर्ण सत्य नहीं माना गया है। आज भी ईश्वर की धारणा आम है। 

वैशेषिक दर्शन में वेद को ईश्वरीय वचन माना गया है। आदि शंकराचार्य (8वीं सदी) ने बिना वेद ज्ञान प्राप्त किये अद्वैतवाद का सिद्धांत दिया और प्रकृति को नकारते हुए आत्मा परमात्मा को एक माना। उनके प्रतिपादित किये गए सूत्र ईश्वर की ओर इंगित है।

यजुर्वेद के अंतिम अर्थात 32वें अध्याय में मुख्यता ईश्वर के बहुत से गुणों की ही बात हुई है। बल्कि वंहा पहले मंत्र में ही ईश्वर शब्द का सीधा सीधा उल्लेख है।

3.
ऋग्वेद की ऋचाओं में एकम सद्विपरा मंत्र में आये देवताओं के नामों को लगभग सभी विद्वानों ने एक ईश्वर के नाम माने हैं। पंडित श्रीराम शर्मा आचार्य ने भी यही लिखा है। 

वंही सायण आदि प्राचीन भाष्यकारों ने इन्हें अग्नि के नाम बताए है। ऐसा माना गया है कि इस मंत्र में अग्नि को एक कहा गया और अग्नि को ईश्वर का नाम भी माना जाता है। वैदिक संस्कृत व्याकरण ज्ञाता यास्क (7-5वीं सदी ई.पु.) ने निरुक्त (वैदिक शब्दकोश निघंटु की व्याख्या) में लिखा है कि शब्द अग्नि, अग्रणी से बना है और यह पहले स्थूल अग्नि नहीं बल्कि वास्तव में अग्रणी थी अर्थात सर्वप्रथम या सबसे आगे (सबसे पहले). निरुक्त में ही यास्क कहता है कि ईश्वर को विभिन्न रूपों में पूजा जाता है। इसका अर्थ यह हुआ कि बहुत बाद में यह अग्रणी शब्द अग्नि के अर्थों में प्रयोग होना शुरू हो गया। निघंटु में भी अग्रणी को सबसे पहला कहा है। हालांकि मुझे प्राचीन संस्कृत विद्वान पणिनी की अष्टाध्यायी में अग्नि पर कुछ मिल नहीं सका। यानी दयानंद जी से बहुत पहले ही यास्क एकेश्वरवादी मत के पक्ष में विचार रख गए है। 

सबसे आगे, सबसे ऊपर जो ईश्वर था और उसी की परिक्रमा होती थी और इसी को अग्रणी कहा जाता था जिससे अग्नि शब्द बना और बाद में अग्नि को ईश्वर के एजेंट के रूप में माना जाने लगा और उसकी परिक्रमा शुरू हुई। पारसियों ने भी अग्नि के साथ कुछ ऐसा किया (हालांकि एकेश्वरवादीयों ने अग्रणी या अग्नि को ईश्वर कहा है पर यह भी मान्यता है कि अग्रणी प्रथम सृष्टि थी यानी रुहेकुद्दुस और फिर उसे से ही ईश्वर माना जाने लगा और अंत में अग्नि को ईश्वर का एजेंट)।


4.
गंगा सहाय शर्मा अपने सायण आधारित वेदभाष्य की भूमिका में लिखते है कि वेदो में सूक्त के आरंभ में बातये गए देवता के नाम का अर्थ 'विषय' से है क्योंकि देवता विषय का नाम है। यही मत यास्क ने भी दिया है। यानी सूक्त देवता वह देवता नहीं है जो आम जन समझता है। विद्वान यह भी मानते हैं कि ऋषि मंत्र के दृष्टा हैं, रचयिता नहीं। महर्षि कात्यायन भी कुछ ऐसा ही मानते थे। हालांकि यास्क ने सूक्त ऋषिओं को मंत्र दृष्टा माना है और सायण ने मंत्र कर्ता।

बहुत से आधुनिक विद्वान जैसे वाचस्पति गैरोला भी वेद को ईश्वरीय मानते हैं और सूक्त ऋषियो को संकलनकर्ता मानते हैं यानी वे वेद मंत्र रचियता नहीं हैं।

5.
सायण स्वयं ही ऋग्वेद 10.90.9 की व्याख्या में बताता है कि उस पुरूष से ही ऋक, साम, यजु उत्पन्न हुए हैं। इससे ज्ञात होता है कि वेद ऋषि की रचना नहीं बताई गई है। श्वेतशवतरोउपनिषद 6.18 भी ऐसी ही बात करता है। 

वेदाचार्य रघुवीर वेदालंकार अपनी किताब 'वैदिक साहित्य के इतिहास' में पेज न. 183 पर बताते है कि निरुक्त 7.14 में यास्क एक ही शब्द यानी अग्नि के 3 निर्वचन करते हैं, पहला परमेश्वर, दूसरा यज्ञीक अग्नि और तीसरा भौतिक अग्नि। यह आगे ऋग्वेद के प्रथन मंत्र 'अग्निमीडे' के संदर्भ में बताते हैं कि शतपथ में 10.4.2.5 में परमेश्वर को अग्नि भी कहा गया है। वह यह भी कहते हैं कि भारतीय परंपरा वेदों को अपौरुषय मानती है और पाश्चात्य परंपरा इन्हें ऋषि निर्मित मानती है। 

रामप्रकाश वर्णी अपनी पुस्तक 'सायण और दयानंद की वेदभाष्य भूमिकाएं (परिमल प्रकाशक)' में लिखता है कि सायण और यास्क वेदों को अपौरुषेय मानते थे। यानी अपौरुषेय मानना प्रमाण है कि उसे ऋषि की रचना नहीं मानना। वह यह भी कहते हैं कि सायण इन्द्रादि की स्तुतियों के प्रसंग में परमेश्वर की स्तुति मानते है परंतु भाष्य में देवता के रूप में वर्णन किया है। लौगाक्षी भास्कर ने भी वेदों को अपौरुषेय बताया है। 

रामनाथ वेदालंकार ने अपनी पुस्तक  'वेद भाष्यकारों की वेदार्थ प्रक्रियाएँ' में कहा है कि सायण ने बहुत से मंत्रो को व्याख्या देवता और ईश्वर दोनों प्रकार से की है जैसे ऋग्वेद.9.50.4. वह ऐसी ही बात स्कन्दस्वामी के बारे में भी कहता है जो सायण के पूर्ववर्ती है और वेदों के भाष्यकार हैं।

प्रो. हरेंद्र प्रसाद सिंह पुस्तक 'धर्म दर्शन की रुप रेखा' में लिखते हैं कि "वैदिक काल में देवताओं का कोई स्पष्ठ व्यक्तितव नहीं है और न सुनिश्चित है। वैदिक ऋषि प्रफुल्लित होकर प्राकृतिक दृश्यों को देवताओं का रुप दे देते थे। देवताओं के अनेके असंख्या रहने के कारण वैदिक गण प्रश्न करते थे कि किस देवता को श्रेष्ठ मानकर आराधना की जाए। वेद में कंही कंही दो देवताओं की एक साथ उपासना की गई है। 

डॉ. राधकृष्णन ने 'भारतीय दर्शन' किताब में पृष्ठ 91 पर कहा है कि "हम अनेकेश्वरवाद को स्वीकार नहीं कर सकते क्योंकि धार्मिक चेतना इसके विरोध में है। वेद में अनेकेश्वरवाद, हिनोथिज़म और एकेश्वरवाद के उदाहरण मिलते है। अनेकेश्वरवाद की अपेक्षा एकेश्वरवाद से हमारी बुद्धि को अधिक तृप्ति मिलती हैं।"

ऋग्ग्वेद 10.90.9 में 3 वेदों का उललेख है। वेदो और अन्य ग्रंथो में (मनुस्मृति में, गीता में/ महाभारत में, बौद्ध ग्रंथो में और शायद जैनी में भी) कई जगह इन 3 वेदों का ही नाम आता है और कई जगह 4 वेदों का भी आता है। इसलिए जंहा जंहा 3 नाम आते हैं, उन मंत्रों को अथर्ववेद के पूर्व काल के मंत्र माना जाता है और इस आधार पर ही अक्सर विद्वानों में 2 मत पाए जाते हैं कि मूल वेद 3 ही थे और चौथे वेद यानी अथर्ववेद को बहुत बाद में लिखा गया। इस बात में दम भी लगता है क्योंकि हम जानते हैं कि अथर्ववेद की भाषा अन्य 3 वेदों से सरल और कम जटिलता वाली है जिससे विद्वानो के इस मत को प्रबलता मिलती है कि उसे बहुत बाद में लिखा गया, क्योंकि भाषा समय के साथ अपनी प्राचीन शैली खोती चली जाती है। यह वैसे ही जैसे वेदों की संख्या को लेके भी कुछ मतभेद है। कुछ कहते है कि प्रारम्भ में एक ही वेद था जिसके व्यास ने 4 भाग कर दिये जबकि दुसरा मत यह है कि 4 वेद हमेशा से अलग अलग ही थे। हालांकि यह सिद्ध है कि ऋग्वेद की ऋचाओं अन्य 3 वेदों में पाई जाती हैं या उसमें दोहराई गई हैं। बाकी वेदों में भी कुछ मंत्र समान हैं।


बुद्धि, तर्कों और इतिहास से प्रमाण।

अब वेदों में ईश्ववाणी पाए जाने को साबित करने की ओर चलते हैं। कुछ इस्लामी रिवायतों से पता लगता है कि आदम यानी स्वयम्भू मनु भारत भूभाग में उतारे गए थे। भारतीय और इस्लामी ग्रंथों की तहक़ीक़ से पता लगता है कि नूह यानी वैवस्त मनु भारत के बाशिंदे थे। ह. नूह को पहली शरीयत अता की गई थी। यंहा भी मनुविधान या मनुस्मृति को प्रथम नियमावली माना जाता है। अधिकतर इसे स्वयम्भू मनु को दिया हुआ मानते है परन्तु इसमें वर्णित विस्तृत समाज और गहन नियमों का जायज़ा लेने पर यह स्पष्ट हो जाता है कि यह वैवस्त मनु का ही ग्रंथ हो सकता है जिसमें बाद में संशोधन होते गए होंगे। वैवस्त मनु प्रलय से संवत भी जुड़ा है। मनुस्मृति में बेहद मिलावट हुई है क्योंकि कुल 14 मनु कहे जाते हैं और न जाने किसके काल में क्या क्या इसमें घुसाया गया होगा। इन 14 मनु में प्रथम और सातवें मनु ही मूल मनु हैं बाकी दोनों के बाद आने वाले 6-6 मनु दरअसल इन दोनों की ही संतति हैं। ये सब बातें वेदो में ईश्ववाणी होने की संभावना बताती हैं। 

इसके आलवा दुनिया में सिर्फ यही क़ौम है जो सबसे प्रथम ईश्वरीय ग्रंथो के होने का दावा करती है। हालांकि प्रथम एकेश्वरवादी धर्म जरथुस्त्र धर्म माना जाता है। इन दोनों धर्मों, समुदायों में क्या समानता या भिन्नता है, इस पर कभी और चर्चा करंगे। वेदों को सर्वप्रथम धर्मग्रन्थ माना जाता हैं और ईश्वरीय भी। इसीलिए वेदो को आदिग्रन्थ भी कहते हैं। क़ुरान आदिग्रंथों की तरफ इशारा करता है और उन्हें ज़बूरुल अव्वलीन कहता है जिसका मतलब होता है प्राचीनतम ग्रन्थ, वो भी बहुसंख्या में। ये अरबी का शुद्ध संस्कृत अनुवाद है।

ईश्वर ने सभी समुदायों को ग्रँथ दिए हैं। किसी समुदाय के ग्रन्थ पूर्णतया या तो बचाये नहीं गए या हमें कभी ईश्वर की तरफ से उनकी पुष्टि नहीं कि गयी कि फलां क़ौम की मौजूद ग्रंथ पूर्णतया मेरी वाणी है। यही ईश्वर का विधान था और उसे यही स्वीकार्य था। क्योंकि क़ुरान सुरक्षित होना था सैदव के लिए। इसलिए उसे बचाया गया और इसकी पुष्टि भी की गई। आरंभिक काल में अवतरित होने के बाद, इतने लंबे समय तक यानी वर्तमान तक वेदों या किसी भी ग्रंथ का शुद्ध रूप में बच पाना सम्भव ही नहीं है।

वैसे कुछ विद्वानों का मानना है कि बाइबिल में आज भी तौरेत और इंजील सही शक्ल में मौजूद है। हालांकि बाइबल को पूर्णतया कोई भी गैर ईसाई व्यकि, ईश्वरवाणी नहीं मानता। जबकि उसमें बहुत से नबियों के सहिफे, हिदायत और किताबें हैं। बाइबिल में इंसानी गॉस्पेल, ईसाईयों की कहानियां भी मिक्स है। बाइबिल एक मिलवाटी ग्रन्थ है। फिर भी आमतौर पर हज़रत ईसा को दी गई किताब को बाइबिल कह दिया जाता है। उसी तरह वेदो को भी ईश्वरीय कहा जा सकता है जबकि उसमें बहुत मिलावट मौजूद है। बाइबिल की तरह वेदों में मिलावट ढूंढना उतना आसान नहीं है। क़ुरान इसके लिए कसौटी है।

क़ुरान के अलावा आज किसी भी ईश्वरीय ग्रन्थ में तौहीद शुद्ध रूप से उपलब्ध नहीं है। पर फिर भी ये माना जाता है कि उनमें असलतन पहले तौहीद रही थी। तो यही बात वेदों के बारे में क्यों नहीं कही जा सकती? वैसे भी वेदों को कोई भी मुसलमान पूरा का पूरा इल्हामी नहीं मानता। यंहा तक कि कुछ सनातनी विद्वान भी इनमे मिलावट मानते हैं। वेदो में यक़ीनन मिलावट हुई है, ऐसा बहुत से हिन्दू विद्वान भी मानते हैं। जैसे अधिकतर बाइबिल (नए विधान) को हज़रत ईसा के साथियों ने लिखा है और उसमें इंजील भी है। उसी तरह वेदों को ऋषियो ने ही अधिकतर लिखा है पर हो सकता है उसमें थोड़ी ईश्वरवाणी हो।

हर धार्मिक का मन हमेशा कहता है कि ईश्वर एक है। ईश्वर किसी क़ौम के साथ ऐसा कर ही नहीं सकता कि अपना परिचय या संदेश न दे। यक़ीनन भारत जैसे बड़ी क़ौम को भी दिया होगा। यही कारण है बहुदेववादी होने के बावजूद हिन्दू क़ौम एक सर्वोपरि ईश्वर को जानती है, भले ही व्यवहारिक तौर पर उसे पूजती न हो। आज भी अधिकतर हिन्दू जनता सभी देवताओं को पूजने के बावजूद ईश्वर को सबसे ऊपर स्थान देते हैं और यही मानते हैं कि बाकी सब उससे ही बने या उसके ही रूप है। त्रिदेव को भी एक ईश्वर से ही उपजा माना जाता है।

कहा जाता है कि वेदों में ईश्वर का ज़ाती नाम नहीं है। पहली बात ईश्वर का ज़ाती नाम होता ही नहीं है। दूसरी बात मान लिया कि ईश्वर का व्यक्तिगत नाम वेदों में नहीं है पर ब्रह्मा, विष्णु, महेश तो वेदों में हैं।  वैसे आर्य समाजी कहते हैं कि ओम उसका निजनाम है और ब्रह्म भी उसका के नाम है। ब्रह्मा, विष्णु, महेश को भी ये एक ही ईश्वर के गुणवाचक नाम मानते हैं। वेद में उसके पुरूष और प्रजापति आदि जैसे नाम भी बातए गए हैं। ये हो सकता है कि प्राचीन समय में जब हमारी जैसे समृद्ध भाषा नहीं थी, ईश्वर को ऐसे ही नामों से पुकारा जाता हो और बाद में इन नामों को अन्य अर्थों में भी प्रयोग होना प्रारम्भ हो गया हो। ये भी संभव है कि वेदों में ईश्ववाणी रही हो और हज़ारों वर्षों के अंतराल में उसकी व्याख्या बदल कर बहुदेववादी हो गई हो। इस्लामी फ़िक़्ह की तरह सनातनी विद्वान या पम्परायें भी अपने मतानुसार वेदार्थ कर सकती हैं। जैसे अल्लाह को भी अकबर और कबीर कहा जाता है। ढेरों नाम ईश्वर के कहे जाते हैं। इनमें कौन सा नाम वाकई वैदिक काल में ईश्वर का था कोई यकीन से नहीं कह सकता और न इनकार कर सकता है।

वेदों में 'इलास्पद नाभा पृथ्वी' वाला मंत्र क़ुरान में क़ाबा के ज़िक्र वाली आयात से मेथेमैटिकली टेली होता है। वेदो में क़ुरान की तरह ही एक दुनिया और आसमान के विच्छेद होने की बात कही जाती है। मनुस्मृति में प्रथम मानव भ्रूण का अंडे जैसा अस्तितव वैसा ही बताया जैसे क़ुरान बताता है। दोनों ग्रंथों की आयतों और मंत्रो के अर्थों में ऐसी अनेकों समानता हैं। यानी अगर यह मान भी लें कि वेदों को मनुष्य ने रचा है तो वेदों को लिखने वालों तक ईश्वर की बात कैसे न कैसे पहुंची तो थी, भले ही सीधी नहीं तो गुरुओं के द्वारा ही सही।

अल्लामा सय्यद अब्दुल्लाह तारिक़ साहब पर राय।

तारिक़ साहब ने वेदों में खुद आस्था रखने की बात कही है। साथ ही 'वृश्च्य' वाले मंत्र को भी स्वीकार है। जब वह सारी की सारी हदीसों को ही शतप्रतिशत सही नहीं मानते हैं तो वेदों को कैसे पूरा सही मान सकते हैं। वह क़ुरान के ज्ञाता हैं। उन्होंने शब्दार्थ के साथ वेदों के 3 भाष्य पढ़े हैं, सभी उपनिषदों को भी पढ़ा है। उन्हें वेदों में कुछ न कुछ तो ऐसी समानता मिली होंगी जो ईश्ववाणी में मिलना आम है या संभव है।

तारिक़ साहाब ट्रांस की हालत में रहते हैं, हम और आप उनका इन चीज़ों में मुकाबला नहीं कर सकते। 2026 के वक़्त पर इख़्तेलाफ़ हो सकते हैं पर यंहा तब्दीली तो आनी ही है। राजनैतिक और सामाजिक परिवेश पर नज़र बनाये रखने वाले भी ऐसा अंदाज़ा आसानी से लगा सकते हैं। तारिक़ साहाब की अभी तक बहुत सी भविष्यवाणीयां सच निकलती आ रही हैं और उनके तरीके पर लोग समानता या ईश्वर के सच्चे धर्म की ओर आते भी हैं। हिन्दू भाइयों को उन्हीं की किताबो से पैग़ाम देना ज़ुरूरी है और आसान भी। मौलाना शम्स नवेद उस्मानी साहब ने तारिक़ साहाब को शायद अपनी एक्सटेंशन बताया है। वैसे लोग उन्हें उनका रूहानी शागिर्द मानते ही हैं। अल्लाह का पैगाम दूसरों को देने से बेहतर भला और क्या काम हो सकता है और भारत में जारी माहौल में यही एकलौती आशा भी है।

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वेदादि और भारतीय सभ्यता में एकेश्वरवाद की धारणा रही है और ये आज भी मौजूद है और हमेशा रही है। यहाँ इतिहास, हिन्दू ग्रंथो, विद्वानों के कई सबूत दिए गए हैं और एक उदाहरण अलबेरुनी का दिया गया है। इसी तरह भक्ति काल  के कई कवियों का नाम का वंहा ज़िक्र है जो अधिकतर गैर मुस्लिम ही थे, बल्कि कई भक्तिकाल काल के कवियों आदि के नाम नहीं हैं, उन्हें भी सब जानते ही होंगे जैसे कबीर। मुस्लिम कम से कम इन दोनों नामों के विचारों को तो मानेंगे की वेदों में क्या है, गैर मुस्लिम की तो मानने से रहे।

मूल आस्थाओं में परिवर्तन और बिगाड़ तो समय के साथ आ ही जाता है चाहे मुसलमान ही क्यों न हो। सवाल था कि वेद और यंहा की संस्कृति में दयानन्द जी पहले एकेश्वरवाद था या नहीं? वेदों और अन्य ग्रंथो में यह था। अद्वैतवाद वेदों में सीधा सीधा मौजूद ही नहीं लगता है, यह तो बाद में दर्शन की उपज है। ज़ाहिर है बाद में बिगाड़ हुआ है। 

गंगा गप्रसाद को आर्य समाजी कहकर कोई उसके तथ्य भले ही नहीं माने मगर सायण विरोधी होने के बावजुद उसने सायण के बारे में बनाये गए कई आर्य समाजी भ्रम स्वयं तोड़े हैं जैसे कि एक तो यही है कि सायण ने वेदार्थ करने के लिए निरुक्त को आधार नहीं बनाया था। हम सभी जानते हैं कि निरुक्त में ईश्वर की स्पष्ठ धारणा मौजूद है। खैर मतलब ये था कि इनके सिर्फ आर्य समाजी होने से इनके प्रमाण खारिज नहीं हो जाते। नहीं तो फिर मुझे पहले ही कॉमेंट में आपके सारे वेदों पर दिये तर्क खारिज कर देने चाहिए थे क्योंकि आप एक मुस्लिम हो, न कि हिन्दू।

इसलिए अब मैं आपको एक सनातनी संस्कृत विद्वान डॉ रामप्रकाश वर्णी की किताब, 'आचार्य सायण और स्वामी दयानंद सरस्वती की वेद भाष्यभूमिकायाएं' से कुछ बातें और संदर्भ दे रहा हूँ। आप खुद इनसे संदर्भ लेके मूल संस्कृत में ढूंढ लीजिए। या इनकी मान लीजिये क्योंकि ये भी संस्कृत और वेद विद्वान हैं। इसी किताब में एक और तथ्य ये भी लिखा है कि यजुर्वेद (17:91) के जिस मंत्र में अनेकों अंगों वाले वृषभ का उल्लेख है, उस वृषभ को रामानुज (10-11वीं सदी) ने ईश्वर माना है। सायण वेदार्थ संस्कृत में है और विशुध्द हिंदी में उनका पूर्ण अनुवाद मिलना बेहद मुश्किल है। जगह जगह कुछ मंत्रों के अनुवाद तो मिल जाते हैं। 

मगर हम जैसों को तो सीधा उनके हिंदी अनुवाद की बजाय अन्य विद्वानों की उनके बारे में किये गए लेखन, किताबो से जानकारी लेनी पड़ती है। अब या तो आप यह कहना चाह रहे हैं कि आप इन सभी लोगों से बड़े विद्वान या संस्कृत ज्ञाता हैं या फिर आप ये तथ्य किसी भी हाल में मानना ही नहीं चाहते। 

रही बात सूक्तों कि तो ये दावा तो हम में से किसी ने किया ही नहीं  है कि पौराणिकों के वेदार्थों में ऐसे अनेकों एकेश्वरवादी सूक्त हैं। मैंने पहले भी लिखा है, ऐसे मंत्र हैं, मगर कम मात्रा में। हालांकि दयानंद जी ने हर सूक्त ही ईश्वर से जोड़ा है। ये तो ऐसा ही जैसे कोई कहे कि मुझे हलवे में से चीनी निकाल कर दिखाओ।

वेदों में एक ईश्वरवाद नहीं है और दयानंद से पहले यंहा यही भावना विद्यमान भी नहीं थी, ये दोनों ही सवाल के जवाब वही हैं कि ये धारणाएं थी मगर कम। एकेश्वरवाद यंहा पर कोई नई बात नहीं, हां मगर ये आम जन में आम बात नहीं थी, पिछली कई सदियों से।

सायण एकश्वरवाद की धारणा से अनजान नहीं थे और उन्होंने भी बहुत से वेदों में आए नामों को ईश्वर का नाम माना है, वैसे ही जैसे यास्क आदि अनेकों ऋषियों ने माना है। सिर्फ आर्य समाजी होने के नाते उनके विद्वानों को भी ठुकरा रहे हैं जबकि आप खुद एक मुस्लिम हो कर सनातनी मान्यतों पर अपने विचार प्रचारित कर रहे हैं जबकि आप से पहले ये अधिकार अगर किसी गैर सनातनी को देना ही हैं तो वो आर्य समाजी तो हो सकते हैं मगर कोई मुस्लिम कतई नहीं। इसलिए मैं भी उन्ही के विचार रख रहा हूँ। 

वृषभ वाला उदाहरण आप फिर से गलत समझे हैं। वो इसलिए रखा था कि वह यह सपष्ट रूप से सिद्ध कर रहा है कि  ईश्वर कि मान्यता और वैदिक नामों को ईश्वर के नाम मानने की मान्यता स्वामी दयानन्द से पहले ही यंहा चलन में है।

रही बात श्रीराम शर्मा जी के वेदार्थ कि तो उससे प्रमाण मैं आपको जल्दी ही देता हूँ,  बल्कि आप कहे तो सायण आधारित अन्य वेद विद्वानों के भी ऐसे ही प्रमाण दे दूंगा।

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पतंजलि के योगसूत्र या योग दर्शन में ईश्वर का उल्लेख मुख्य रूप से दूसरे पाद (साधनपाद) में किया गया है। यहाँ ईश्वर के संदर्भ में एक प्रमुख सूत्र है:-

 
योगसूत्र 1.23
ईश्वरप्रणिधानाद्वा।
ईश्वर प्रिणिधान (ईश्वर के प्रति समर्पण) से भी समाधि प्राप्त की जा सकती है।

योगसूत्र, समाधिपाद, 1.24
क्लेशकर्मविपाकाशयैरपरामृष्टः पुरुषविशेष ईश्वरः।
ईश्वर को विशेष पुरुष (अद्वितीय आत्मा) कहा गया है, जो क्लेश (दुःख), कर्म (कर्मफल), विपाक (कर्मों के फल का परिपक्व होना) और आशय (अंतरात्मा के संस्कार) से परे है।
[जो अविद्यादि क्लेश, कुशल अकुशल, इष्ट-अनिष्ट और मिश्र फलदायक कर्मों की वासना से रहित है, वह सब जीवों से विशेष 'ईश्वर' कहाता है।]
 
योगसूत्र 2.45
समाधिसिद्धिरीश्वरप्रणिधानात्।
ईश्वर प्रिणिधान (ईश्वर के प्रति समर्पण) से समाधि की सिद्धि प्राप्त होती है।
 
पुरुषः पुरिषादः पुरिशयः पुरयते वा । पूरयत्यत्तरित्यन्तर पुरुषम् अभिप्रेत्य।।
(निरुक्त २/३)
इस भौतिक शरीर में रहने से जीवात्मा पुरुष है, ब्रह्माण्ड में व्यापक होने से ईश्वर पुरुष है।

इन सूत्रों से स्पष्ट होता है कि पतंजलि ने ईश्वर को एक महत्वपूर्ण तत्व के रूप में स्वीकार किया है और उसकी भक्ति या समर्पण से योग साधना में उन्नति का मार्ग प्रशस्त होता है।

चित्त की वृतियों (मन की गतिविधियां या गतियां) को निरोध करना ही योग है। पतंजलि अनुसार वो हैं, प्रमाण (सही ज्ञान), विपर्यय (भ्रांति), विकल्प (अवास्तविकता), निद्रा, स्मृति। इन पांचों वृत्तियों का निरोध या नियंत्रण करना ही योग का मुख्य उद्देश्य है, जिससे मन को शांत और स्थिर किया जा सके। यह स्थिति समाधि कहलाती है, जिसमें आत्मा का साक्षात्कार होता है और अंतिम मुक्ति प्राप्त होती है। पतंजलि का योगसूत्र योग की विभिन्न विधियों, जैसे ध्यान, धारणा, और समाधि के माध्यम से आत्म-साक्षात्कार की ओर मार्गदर्शन करता है। 

चित्त की वृत्तियों का निरोध योग का मुख्य उद्देश्य है, और इसके द्वारा निम्नलिखित महत्वपूर्ण लाभ और अवस्थाएं प्राप्त होती हैं:

समाधि: समाधि एक ऐसी अवस्था है जहां मन पूरी तरह से एकाग्र और स्थिर हो जाता है, और आत्मा का साक्षात्कार होता है। इसमें व्यक्ति अपनी सच्ची स्वाभाविक अवस्था का अनुभव करता है, जिसे "स्वरूप" कहा जाता है। इसीलिए ये समझना बेहद आसान है कि आत्म साक्षात्कार ही आत्मा के मूल से जुड़ना है और वो मूल ही ईश्वर है।

कैवल्य: योगसूत्र के अनुसार, चित्त की वृत्तियों का निरोध अंततः कैवल्य या मोक्ष की ओर ले जाता है। यह आत्मा की स्वतंत्रता की स्थिति है, जहां आत्मा सभी प्रकार के कष्टों और बंधनों से मुक्त हो जाती है। आस्तिक दर्शन में मोक्ष से ही ईश्वर प्राप्ति है।

ज्ञान: चित्त की वृत्तियों का निरोध करके व्यक्ति गहरे आध्यात्मिक ज्ञान और आत्म-साक्षात्कार की स्थिति प्राप्त कर सकता है। यह स्थिति व्यक्ति को संसारिक भ्रम और अज्ञानता से ऊपर उठाकर वास्तविक ज्ञान की ओर ले जाती है। दर्शन शास्त्रों में वास्तविक ज्ञान उस एक परमसत्य को ही कहा गया है।

ईश्वर की प्राप्ति भी पतंजलि के योगसूत्र में वर्णित है। जैसा ऊपर बताया गया है कि योगसूत्र में पतंजलि कहते हैं: ईश्वर की प्राप्ति योग के अभ्यास का एक महत्वपूर्ण अंग है और इसके माध्यम से व्यक्ति उच्चतर आध्यात्मिक अवस्था प्राप्त कर सकता है।

इस प्रकार, चित्त की वृत्तियों के निरोध से समाधि, कैवल्य, आत्म-साक्षात्कार, और ईश्वर की प्राप्ति जैसी उच्चतर आध्यात्मिक अवस्थाएं प्राप्त होती हैं।

ईश्वर, परमेश्वर, परमात्मा, आत्मा में अंतर है। मगर आम जन में पहले 3 को एक ही मानते हैं। दूसरी बात है कि किसी भी प्रामाणिक ग्रंथ में आपको ईश्वर और परेमेश्वर में भेद करने वाली व्याख्या नहीं मिलेगी। ईश्वर के लिए परमात्मा शब्द प्राचीन ग्रंथों में ही नहीं है। 

योगसूत्र में ईश्वर शब्द मौजूद है जैसे ऊपर संदर्भ दिए गए हैं। और उन सभी संदर्भों में ईश्वर की वही परिभाषा बताई जा रही है, जिसे लोग आमतौर उस एक सर्वशक्तिमान की ही मानते हैं। सो यह तो सिद्ध हो गया कि योग में ईश्वर या परेमेश्वर की धारणा स्पष्ट मौजूद है। 

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सबसे प्राचीन शब्द ब्रह्म है, अगर ईश्वर के लिए सीधे अर्थों में समझे तो। मैं अभी दर्शन या इसकी व्याख्या में नहीं जा रहा। वैदिक साहित्य में ब्रह्म शब्द आया है। इसके बाद जब दर्शन, फलसफा आदि का समय आया तो भिन्न भिन्न व्याख्या और मत उभरे और फिर ब्रह्म से परब्रह्म हुआ। परब्रह्म, का शाब्दिक अर्थ है सर्वोच्च ब्रह्ममोटे मोटे  तौर पर दोनों एक ही है। जैसे अल्लाह की सिफ़त पर अलग अलग मसलक/फिरके थोड़ी बहुत अलग राय रखते हैं। बस हिन्दू धर्म में नाम में भी जोड़ तोड़ कर दी गई, यही फ़र्क़ है। 
 
इसी तरह प्राचीन ग्रंथों में ईश्वर शब्द आया है परंतु फिर बाद में जब ईश्वर शब्द को इंसानी गुणों के समानांतर प्रयोग होना शुरू हुआ तो, योगेश्वर, वानेश्वर,  लंकेश्वर जैसे शब्द बने। इस तरह ईश्वर को इन मानवीय चरित्रों से अलग करने के लिए ईश्वर में परम जोड़ कर परमेश्वर कर दिया गया। हालांकि साधारणत: दोनों शब्द उसी के लिए प्रयोग होते आए हैं। 

किस ग्रंथ का क्या काल रहा होगा, इसे आप इससे समझ सकते हैं कि दर्शन के ग्रंथों (न्याय दर्शन, मीमांसा दर्शन आदि) में रामायण और महाभारत के चरित्रों का उल्लेख है जैसे ब्रह्मसूत्र में राम, हनुमान और योग दर्शन में कृष्ण का।
  
वेदों, उपनिषदों , सांख्य सूत्र/दर्शन (3.82) आदि में ब्रह्म शब्द मौजूद है। दर्शन शास्त्र में परब्रह्म शब्द है। न्याय सूत्र/दर्शन (2.1.11), वाल्मीकि रामायण में (1.2.30) में, महाभारत (12.110.36) में, गीता (10.12) में भी परम ब्रह्म शब्द आया है। 

यजुर्वेद 40:1 में ईश्वर शब्द आया है। योगसूत्र में (1.23-24) में ईश्वर शब्द मौजूद है। वाल्मीकि रामायण (अरण्य कांड 3.30.3) में ईश्वर शब्द आया है। मनुस्मृति में (12.123) में ईश्वर शब्द आया है और उसके गुण भी। गीता (18.61) में भी ईश्वर शब्द आया है। महाभारत में परमेश्वर शब्द और उसके गुण आए हैं, जैसे शांतिपर्व 12.204.13, 12.201.15, अनुशासन पर्व 13.14.41. 



● Al Beruni:

Friday, 5 March 2021

आर्य समाजीयों से बहस।


प्रश्न
इस्लाम के जन्म से पहले भी अरबी भाषा में अल्लाह शब्द था। जिसका अर्थ निराकार सर्वव्यपाक परमात्मा ही लिया जाता था। पंजाबी भाषा में रब शब्द का भी यही अर्थ है। अलग-अलग भाषाओं में एक ही ईश्वर के अनेक नाम हैं। आपके सब कुतर्को का उत्तर सत्यार्थ प्रकाश के सातवें समुल्लास में हैं, समय निकाल कर पढ़ लीजिएगा। पूर्वाग्रह दुराग्रह का कोई उपचार नहीं। कुछ दम नहीं है इसमें । पर मुझे अवकाश नहीं है ऐसे लेखों का खंडन करके समय बेकार करने का। यह आपको भी पता है कि कर्मफल,आवागमन, पुनर्जन्म आदि पर मुल्लों ने सदैव हमसे पटखनी खाई है। अब सौ बार बेशर्मी से वही वही सवाल करते रहे, उससे कुछ बदलने नहीं वाला। और मृतक श्राद्ध, नरक स्वर्ग आदि पर सवाल करना मूर्खता है। हम इन पौराणिक गप्पों का वैसे ही खंडन करते हैं,जैसा इस्लामी जन्नत व जहन्नुम का। क्या सोचे थे, कोई संज्ञान नहीं लेगा तो कुछ भी सच-झूठ का कॉकटेल बनाकर चेप दोगे? केवल ये बताओ कि ऋग्वेदादि भाष्यभूमिका में एक ईश्वर को छोड़कर दूसरे को पूजने वाले नरकगामी और पशु हैं ऐसा पाठ दिखा दो। अथर्ववेद ४/१/६ में ईश्वर सोया था, यह कैसे ग्रहण किया?  बस, इन दो पर ही जवाब दे दो। जहां तक हमको पता है, विपश्यी मंडल और यहां के आर्यसमाजी तो कम से कम इनमें नहीं मानते। उपरोक्त लेख में यू टू यानी हममें गलती है तो तुममें भी गलती है यह नीति बनाई गई है। मुल्ले सदा यही करते हैं। वो सोचते हैं कि दो बुराई जोड़कर वो अपनी बुराई को जायज़ सिद्ध कर देंगे। कहां गये, अपने कॉपीपेस्ट ग्रुप में पूछने चले गये? वैसे आप शायद ही कभी बोलते हो। परंतु आज बोलना भारी पड़ गये। क्योंकि हम बहुत बुरी बला हैं। आसानी से प्राण नहीं छोड़ते । यकीन नहीं होता तो किसी से भी पुछ लीजिये।

उत्तर:

https://m.facebook.com/story.php?story_fbid=1250209198335210&substory_index=0&id=288736371149169


ये लिंक वाला आपका ही पेज है। इसमे ऋग्वेदादिभाष्य में पशु वाले मत का उलखे है। अपने दयानन्दू भाइयों को  पेलिये अब। या तो वो झूठे है या आप। निर्णय कर लो कौन सच्चा दयायनन्दू है।


प्रश्न
कभी भाष्यभूमिका खोलकर न पढ़ी होगी। दुनिया भर के झूठ सच बिना जांचे यहां न लाया करो। माफी मांगो, झूठा तथ्य रखने के लिये । अरे भैया, यह मुझे मत बताओ कौन क्या है। किसी ने गलत लिखा, आप उसको कॉपी करो इससे आप सही नहीं हो जाते। ऐसे हम किसी मुस्लिम वेबसाइट से कुछ आपत्तिजनक लेकर यही बात कह देंगे कि तुम्हारी फलाँ-फलाँ साइट या पेज पर ऐसा-ऐसा मोहम्मद साहब के विरुद्ध लिखा है।  ये नहीं चलेगा समूह में, कुछ भी अंड-बंड कहकर निकल लेंगे, हम देखते रहेंगे? अरे भैया, भाष्यभूमिका में से वो पाठ पेश करो, वरना अपनी गलती मानो।


उत्तर
वाह दोगली रणनीति। आपके लोग ही अपने गुरु के बारे में में झूठ लिखे। उनका गला पकड़िए अब। हो सकता हो आप झूठ लिख रहे हों।  आप लोग आपने गुरु के मत पर ही एकमत नहीं। और दुनिया को ज्ञान देने निकले हुए है। वाह। पेज वाले को पकड़िए। हम तो आर्य समाजी को सच्चा मानकर उनके लेख पढ़ते है। आज जाना वो झूठा प्रचार भी करते है। वो भी अपने पेज पर। फिर तो आर्य समाजी और पौराणिकों में कंहा अंतर रहा। दोनों पेट से बातें घड़ कर पेज पर डाल रही। धयनवाद आज के बाद किसी आर्य समाजी पर ज्ञान के लिए भरोसा नहीं करूंगा

प्रश्न:
नरकगामी तो उस फेसबुक लेख में भी नहीं है। बकवास बंद करो। हम भी इस्लामी पेजों से बहुत कुछ आपत्तिजनक लाकर यहां पर पटक सकते हैं। फिर मत कहना कुछ। भाष्यभूमिका में अन्योपासक *नरकगामी* है ऐसा कहां लिखा है? ऐसा फेसबुक लेख तक में नहीं है। मूल में क्या लिखा है, उस पर बात करो। बाकी लंतरानी न बताओ।


उत्तर:
ऐसे ही आर्य समाज अपने पेजों पर झूठ परोसता रहा तो कौन उनपर भरोसा करेगा। अब तो आपका झूठ का भांडा फुट चुका। अब आपमें और पौराणिकों में कोई फर्क नहीं रहा।

प्रश्न:
चुप करो,बकलोली बंद करो। अन्योपासक नरकगामी है यह पाठ उस पेज-लेख में भी नहीं है। न भाष्यभूमिका में। झूठे पर परमात्मा की सौ सौ धिक्कार है। और बरेलवी,देवबंदी वगैरह फिरके कैसे एक दूसरे की छीछालेदर करते हैं। शिया लोग कुरान हदीस आदि का क्या अर्थ करते हैं, अहमदी क्या करते हैं यह सब बताने लगेंगे तो कोई मतलब नहीं होगा। क्योंकि मुख्य बात यह है कि मूल पाठ में क्या लिखा है। रही मतभेद की, तो इसी समूह में वो हदीसों को मानते ही नहीं ।कुरान को अलग तरह से मानते हैं। बकरीद में पशुबलि का निषेध करते हैं। इस समूह में ही मतभेद है, आप तो पेज बताने लगे । यह कहां से ले आये? हकप्रकाश से या किसी मदरसा किताब से? नहीं है उसके पास, तब ही तो इधर-उधर की हांक रहा है। नरकगामी तो इनके लेख तक में नहीं है। उनको तो कुछ बोलो। व्यर्थ में विषयांतर कर रहे हैं। और आर्यसमाज को झूठ परोसने वाला कह रहे हैं। ये नहीं कि मूल पाठ मेरे मुंह पर पटक कर बोले,कि ये देखो- यह लिखा है। महर्षि दयानंद पौराणिक नरक मानते ही न थे,तब क्यों नरकगामी कहेंगे? न ही वे इस्लामी जन्नत या जहन्नुम मानते थे।

उत्तर
अब आपकी बैचैनी देखी नही जा रही। प्रमाण मैंने रख दिया आर्य समाज का ही। हमारे लिए आर्य समाजी ही आर्य ज्ञान का आधार है। हमने तो उस पेज वाले आर्य समाजी की बात पर विश्वास किया। जो हो सकता है झूठ हो। हो सकता है आपकी बात झूठ हो। क्योंकि हमारे लिए तो आप दोनों ही आर्य समाजी हो। सच्चा झूठ अब आप उससे सेटल कीजिये। जैसे दयानंद वेद की कोई बात अपने लेखन में लिखा गए, तो हम उससे यही मानते है कि ऐसा वेद में लिखा होगा। अब बाद में पता चले कि दयानद जी झूठ लिख गए है। वेद में ऐसा है ही नही।  तो या तो ये बात कहने वाला झूठा हुआ या दयानद। यही केस इस पेज वाले ने कर दिया है।  आप दोनों में कौन झूठा है। नही पता।

प्रश्न:
पेज में नरकगामी दिखा दो , इतना अंगुलियां टपटपाकर क्या लाभ?  इनका खोखलापन तो प्रकट हो गया न! और आप कहि रहे थे कि हम उस बकवाद लेख का संज्ञान लें!

उत्तर:


ये लो पढ़ो। और कितने आपके झूठ का पर्दा फाश करु।
सोया हुआ सा क्यों प्रतीत होता है। क्या कोई प्राणी है? जीव ही तो सोते है या निर्जीव भी??


प्रश्न:
सोता हुआ-सा प्रतीत होता है- बुध्यते। असलियत में नहीं सोता, जैसे अल्लाह तख्त पर बैठता है और आठ फरिश्ते उसको उठाते हैं। यहाँ पर सामान्य सा उपमा अलंकार इनकी खोपड़ी में नहीं घुसता। चले हैं वैदिक ईश्वर का खंडन करने। बल्कि अपनी अक्ल का दीवाला निकलवा दिया है। तुमको सामान्य सा अलंकार तक न समझ आया। इस्लामी रेगिस्तानी खोपड़ी में वैदिक अलंकार नहीं जा सकता। परमात्मा को पुरुष कहते हैं पुरि शेते यानी पूरे ब्रह्मांड में ही वो बसता है, मानो शयन कर रहा है। यही उसकी सर्वव्यापकता बताता है। पर तुम्हारे बस का रोग नहीं है। तुम्हारी अक्ल का फोटू दिख गया। तुम जैसों के लिये डॉ मुमुक्षु बहुत है। हमको ऊर्जा खपाने की जरूरत नहीं। अतः यहीं पर बस।  असुविधा के लिये खेद नहीं है! तात्पर्य यही है कि प्रलयावस्था में सृष्टिनिर्माण आदि मुख्य काम परमात्मा नहीं करता। इसलिए मानो वो सोता-सा था। वो असली में सोता था,यह भाव नहीं है। तुमने मेरा कोई झूठ नहीं खोला है। नरकगामी तो अब तक न दिखा सके, न तुम्हारा..... भी दिखा सकता है। इतनी ज़िल्लत के बाद भी इतनी थेथरई कैसे कर लेते हो?

उत्तर:
बात आपके झूठ को झूठ साबित करने की थी। सो मैन कर दिया। बिना ज्ञान के आप मुझ पर आरोप लगा रहे थे कि फला दिखाओ कंहा लिखा है। फलां दिखाओ कंहा लिखा है। मैन दिख दिया। बस अब आप लगे रहो अलंकार रूपक में।  मैं चला चैन की नींद लेने। अब आप लगें रहो अपने दयानंदी वेद भाष्य को ठीक करवाने में (जिसे वैसे भी सभी गैर आर्य समाजी विद्वान गलत बताते है) और अपने दयानंन्दू भाई का पेज बंद करवाने में। और ये लो नरकगामी लिखा हुआ आर्यमंतव्य पर।

 


प्रश्न:
तुम लोग लगे रहो भई, हमारे तो भाष्य सही हैं। पर कुरान के अनुवाद सेनेटाइज करो। इंटरनेट पर से हदीस व सीरत गायब करो। उसकी जगह कपोलकल्पित साहित्य बांटो। यही करो! इसी तकिय्या में रेगिस्तानी अल्लाह खुश होगा। इतनी बेशर्मी लाते कहां से हो रे? बेशर्मी में तो तुमने अपने रसूल तक को पीछे छोड़ दिया है। नरकगामी शब्द न तुम मूल भाष्यभूमिका में दिखा सके, न पेज पर। बकलोली करने को बस कह दो। दुखरूपी नरक - नरक का अर्थ कोई लोक नहीं,दुखमय स्थिति है। यहाँ कोई इस्लामी काल्पनिक जहन्नुम का कोई मतलब नहीं है, न पौराणिक नरक से। अच्छा, और ये भाष्यभूमिका का पाठ है क्या?⁩ देख लीजिये,ये लोग कैसे महर्षि दयानंद का नाम लेकर तोड़-मरोड़कर इस्लामी जहन्नुम साबित करना चाहते हैं और अथर्ववेद का नाम लेकर वेदोक्त ईश्वर को अल्लाह की तरह सिंहासन पर पसरने वाला बता रहे हैं। और प्रमाण भी दिया तो वेबसाइट का, नाकि मूल पुस्तक से।  उसके बाद भी थेथरई करना नहीं भूलते। क्या फालतू थेथरई करके बस अपने लेख का कलेवर बढ़ा रहे थे, ताकि लगे कि तगड़ा कॉपीपेस्ट मारा है! हमको महर्षि दयानंद के ग्रंथों व सिद्धांतों का पूरा पता है। हम तो बस दिखाना चाहते थे कि मुल्ले किस तरह तोड़-मरोड़कर इस्लामी रेगिस्तानी कबिलाई सिद्धांतों का दोषारोपण महर्षि के लेख से करते हैं।  जब थेथरई पकड़ी गई, तो बेशरमी से कहने लगे कि हमको इससे मतलब नहीं कि कहां क्या लिखा है? मतलब नहीं था तो डॉ मुमुक्षु के खंडन में काहे लिखे थे? भेज दिया पर उसस रेगिस्तानी कबिलाई किताब की कोई मान्यता सही साबित नहीं होती। तो डॉ मुमुक्षु आर्य के प्रत्युत्तर में उनको देने का औचित्य क्या था बिलौटा महाशय.


उत्तर:
खिसयानी बिल्ली खंबा नोचे। हमे फर्क  नहीं पड़ता दयानद या आर्य समाज नरकगामी क्या मानता है। आप ने नरकगामी लिखा  हुआ पूछा। मैंने दिखा दिया। आपने पशु के बारे लिखा हुआ प्रमाण मांगा। वो भी दिया। आपने सोया हुआ ईश्वर के बारे में पूछा। वो भी दिया। तो सच्चाई ये है चाचा चौधरी की आपको अपने ही मत, गुरु, ग्रन्थ का ज्ञान नहीं। झूठ बोलते है। दूसरा झूठ साबित कर दे । विषय बदलते हो। साधुवाद आप जैसे अनार्य समाजी को । आपने 3 प्रश्न किये तीनों झूठे निकले। मैंने तीनो के सबूत दिए। दयानंद खुद नरक भोगी लिख के गए है। आपके आर्य समाज वाले ही कहे रहे है। पढ़ लो आर्यमंतव्य। बहुत से आर्य समाजी वेबसाइट के लिंक दे दु जंहा ऐसी ही बात कही गई है। आर्य समाजी को आर्य समाजी के ही लेख कोट कर रहा हूँ। पकड़ो अब एक दूसरे के कॉलर। 
आपने कहा कि दयानंद नरक नही मानते थे। हाहाहाहा। अरे माने न माने मेरी बला से। पर ऐसा लिखा कर गया है दयानंद। जो आपको पता ही नहीं। आप कंहा से आर्य समाजी हो? झंडू आर्य समाजी हो आप जिसे अपने मत के बारे में ही कुछ पता ही नहीं की कौन क्या लिख गया। आप कितना झूठ बोलगे। 
मतलब सभी आर्य समाजी और उनकी वेबसाइट झूठी, केवल आप ही सच्चे हो, वाह। असल मे उन्होंने सही लिखा है। ये सभी लेख वाले सच्चे दयानंन्दू है और आप झूठे। आप दयानिन्दनीय अधिक लग रहा है। जो दयानद की बातें झुठला रहे है।  आपको न आपके धर्म का ज्ञान नहीं है (आर्य समाज जो असल मे किसी धर्म का नाम ही नहीं है, मुट्ठीभर हठधर्मी सींग मारक अज्ञानियों की गैंग है। सनातनी विद्वान जिसके वेदार्थ को संस्कृत भाषा और व्याकरण की मृत्यु मानते है जिसमें सभी नाम वाले अस्तित्वों को यूरेशियन ओम या वैदिक ब्रह्म बना दिया गया, जिसका कारण बताते है ईसाईयो से प्रभावित होके और अंग्रजी सरकार स्व लाभ लेने के लिए)। 
न आपको दयानंद का ज्ञान है। आप जिस को स्वामी कहते है वो क्या क्या लिख के गया है आपको पता ही नहीं। मैने बताया तो आपने दयानद की बातों को ही अंटशंट और बकलोली
 कहने लगे। आर्य समाजी रेफरेन्स भी दिए। अपने गुरु की लेखनी पढ़ो पहले फिर हमें ज्ञान देंना। वरना खिसयानी बिल्ली की तरह खंबा ही नोचते रहोगे।

प्रश्न:
वेबसाइट से ही कॉपीपेस्ट करेंगे , पर मूल किताब न पढ़ेंगे। कटुवों की यही औकात है । इन गदहों को समझ ही नहीं आ रहा है जवाब देकर ये खुद अपनी ऐसी-तैसी करवा चुके हैं। उसके बाद भी रस्सी जल गई पर मोहम्मदी अकड़ नहीं टूटी। करते रहो थेथरई! हम चले अपने काम से। बाकी जनता देख रही है, कौन कितना पानी में है.⁩ देख लीजिये इन लोगों के लेख कितने पानी में हैं, जिनका संज्ञान लेने आप हमें कह रहे थे। आपक लगता है कि इनके घासलेटी कॉपीपेस्ट का हम लेखबद्ध उत्तर देंगे?

उत्तर:
 तू तड़ाक पर आगये। यही दयानंन्दू संस्कार है आपके? आपके सारे झूठ साबित कर दिये है। अगली बार यंहा बकनन्दी के फॉर्म भरने से पहले आर्य समाजी लेख पढ़ के आना।  मूर्खता और पखण्डता कि मिसाल बन गए हो अब आप। आप बुरी बला नहीं झूठी बला हो। हाहाहाहा। 
अगली बार मुझे से सबूत मांगने से पहले अपनी दयाझंडू खोपड़ी में अपने ही गुरु घंटाल की लेखनी स्टोर करो। वरना ऐसे ही झूठ परोसते राहोगे और ज़लील होते रहोगे, सच सामने आते ही। बिना ज्ञान के.. झूठ बोलने में और बेशर्मी में  दयानंद को भी पीछे छोड़ दिया तुमने। मुबारक आज आप उसके असली शिष्य बन ही गए इस संदर्भ में। अब आगे आप से आप जैसे झूठे प्रचारकों से बात नहीं हो पाएगी क्योंकि न आपको वेदो का ज्ञान (सोया हुआ सा वैदिक ईश्वर जो दिन रात के बाद जागता है) है, न आर्य समाज का (जो भाष्यभूमिका का पशु वाला मत मानते है ) और न ही दयानंद का (जो नकगामी बता कर गया है) इन सबको आप ने झुठलाया। 
और प्रमाण देने पर अलग ही राप अलाप रहे है। आपकी यूरेशियन चुतूरवर्णीय खोपड़ी में सत्य नहीं घुसेगा। मुझे पता है मैने दुम पर पांव रख दिया है अब आप मेरे बाद फिर से पिनक भरे मेसेज करंगे। धन्यवाद। कभी फिर। तब तक आप अपनी किताबें पढ़िए। आज्ञा दीजिए।

प्रश्न:
तुम नंबर एक के बेवकूफ हो। पता नहीं कौन सा गांजा फूंककर आते हो। वो लेख भी तुमने किसी से कॉपीपेस्ट किया है। नरकगामी आदि बातें क्यों लिखी, ये तुम खुद नहीं जानते ।
रही बात प्रचार की, तो हम शठे शाठ्यम् समाचरेत्वा ले आदमी हैं । मैं कुछ नहीं झुठला रहा था। बस ये देखना चाह रहा था कि तुम मूल पढ़ते हो, या कॉपीपेस्ट करते हो। जो साबित होना था, वो हो लिया।

दहेज किधर हराम लिखा है ?? अगर नही तो यकीन मानिए अल्लाह कोई दूरदर्शी नही सिर्फ काल्पनिक पात्र है. यह 
"किसी"का दायरा, मुसलमानों तक ही सीमित होता है, काफिर को इन्सान ही नहीं मानता आपका सेल्फ अटेस्टेड प्रॉफेट!


उत्तर:
क़ुरान ने सुरहः अराफ में किसी का हक़ मारने और किसी कि जान,माल,आबरू के खिलाफ ज़्यादती को हराम करार दिया है। अगर दहेज से किसी के माल के साथ ज़्यादती हो रही है या दहेज़ इकट्ठा करने, लेने, देने में किसी का हक़ मर रहा है तो ये हराम ही है। दहेज की और भी कई सूरत हो सकती है जो इन आयात में फिट बैठे।

क्या आप मुझे कोई कोई ऐसा रेफेरेंस दे सकते है जहां किसी एक व्यक्ति विशेष को मुहम्मद साहब ने काफ़िर कहा कहो? नहीं मिलेगा क्योंकि काफ़िर डिक्लेअर करने की अथॉरिटी उनके पास नहीं थी। काफ़िर के जो मायने आम मुसलमान समझता है, वो ग़लत है। काफ़िर के क़ुरान में 3 मायने है। रही बात इंसान न मानने की तो ऐसा नहीं है। बल्कि उल्टे आपके लगभग 2 अरब वर्ष पुराने सेल्फ अटेस्टेड वेद, वेदनिन्दक को इंसान नहीं मानते है। “वृशच प्र वृशच सं वृशच दह प्र दह सं दह” (दुश्मन - वेद निंदक को काट डाल, चीर डाल, फाड़ डाल, जला दे, फूंक दे, भस्म कर दे। [अथर्वेद 12:5:62]

प्रश्न:
 मेरे लिए वेद पुराण के कंटेंट  मायने नहीं रखते, मैं बस दस धर्मलक्षणों पर चलता हूँ। मैं किताब का बंधा नही हूँ जैसे कोई मुसलमान होता है। रही बात कुर'आन लिखने की, यह मैने मौलानाओं के तफसीरों से ही लिया है। वैसे मुसलमानों में तक़फिरी भरपूर है, एक दूसरे को काफिर तक कह देते हैं अलग अलग मसलक, तो कहना ही क्या? बाकी कुर'आन और मोहम्मद में फर्क क्या, सभी एक्स मुस्लिम तो अल्लाह को मोहम्मद की फेक आइडी ही कहते हैं।

क्या और क्यों बात घुमा रहे हैं? क्या  काफिर शब्द कुर'आन में नहीं है? और क्या मुशरिक नहीं है ? उसके मायने क्या हैं, बताईये। बाकी अथर्ववेद भी ठीक लिख नहीं पाते और IRF वाले किसी ने पकड़ाया हुआ एक कॉपी पेस्ट सभी जगह सभी ज़ॉम्बी चेपते रहते हैं।


उत्तर:
यही होता है जब अंधविरोध में। आदमी मेसेज पढ़ने में अपना दिमाग प्रयोग नहीं करता। ऊपर मेसेज में साफ लिखा है कि क़ुरान में काफ़िर के मायने है। और आप फिर भी पूछ रहे हो कि क्या काफिर क़ुरान में है।

बाकी क़ुरान को तो ठीक से आप लिख नहीं पा रहे। और दूसरे से उम्मीद कर रहे है वो सही लिखे। टाइपो होता है। वेद कंटेंट पर बात आप कर नहीं रहे। तो बात तो आप घुमा रहे है। कंहा से कॉपी करते हो। राहुल,अंकुर आर्य से।

प्रश्न:
रही बात कुर'आन लिखने की, अरब कुर'अन, कुर'आन और कुर'अँन (अनुनासिक नही, लेकिन यहाँ बिंदु के बिना उपलब्ध नही) भी कहते मिलेंगे । इराणी शिया क़ुरान या क़ोरान कहते हैं।


उत्तर:
आपके लिए ग्रन्थ के मायने नहीं। 10 धर्मलक्षणों को मानते है। तो ये मनु के धर्मलक्षण कंहा से लिये (वेद में तो एक जगह नहीं है/ मनुस्मृति में शायद हैं मगर वो तो आपके अनुसार मिलवाटी है और स्वयम्भू की है, क्योंकि स्वामी जी अनुसार वैवस्त का काल तो अभी चल रहा है)? उनकी स्मृति से न? तो फिर आप ये कैसे कह सकते है कि आप किताब के बंधे नही। कंट्राडिक्ट कर गए। और मुसलमान क्या, सारे आर्य समाजी वेद से बंधे है, पौराणिक से तो बहुत ज़्यादा। तो आप बंधे होने का उदाहरण सिर्फ केवल मुसलमान का क्यो दे रहे है। अपने समुदाय पर आंख बंद क्यो।

क़ुरान हिंदी में कई तरीकों से लिखा जाता है। क़ुरान क़ से है ना कि क से। आपकी मूल भूल ये है। जिसे पहले आप खुद सुधारे फ़ीर दुसरो की भाषा पर उंगली उठाए।

सनातन धर्म में आरोप प्रत्यरोप कम कंहा है। सनातनी, दयानंद और अनेक वेद भाष्य के एकेश्वरवाद को मिथ्या कहते है और धर्मभ्रष्ट करने वाला। आर्य समाजी उन्हें यही कहते है। सबके मत अलग किसी का एक सा नहीं। कोई कृष्ण को ईश्वर कहता है, कोई राम को। कोई साईबाबा को। कोई किसी और को। वैष्णव और शैव एक दूसरे को क्या कह कर गए है? 

बाकी दलित, अम्बेडकरवादी और बुद्धिस्ट लोग अपने छोड़े हुए सनातन धर्म, वेद को फेक, पतनकारी और न जाने क्या क्या मानते है। इसकिये पीछा छुड़ाते आये है हज़ारों सालों से।


प्रश्न:
आपको मनु ही पता है, ये धर्म लक्षण मनु से भी पुरातन हैं। आप लोगों की खामी यह है कि दुनिया की सबसे गंदी और खूंख्वार विचारधारा को दैवी साबित करने निकले हैं क्योंकि अब पुराने तरीके मुमकिन नही। इसलिये आप लोग केवल दूसरों को गलत बताने की गंदे से गंदी कोशिश करते रहते हैं।
कभी सच्चाई से भी मुखातिब होईये, इस्लाम हमेशा एक disaster रहा है। फैलाव और सफलता अलग होते हैं। वह केवल एक रोग है जो इन्फेक्शन फैलाकर अधिकाधिक बलि लेने में सफल रहा है, बाकी कुछ नही।

 काहे का बौद्ध खूनी इतिहास! बड़ी वकालत कर रहे हो टकलों की? क्यों न हो! मुहम्मद बिन कासिमआदि  मुल्लों के साथ टकलों ने दलाली तो करी ही थी। 

औऱ सुनो, बदले में उनको भी इस्लाम ने केवल मौत दी। बख्तियार खिलजी अहिंसक बौद्ध भिक्षुओं को काटता हुआ बिहार उड़ीसा से निकल पड़ा था। ये तकिय्या की दुकान कहीं और जाकर चलाना। मुल्लों ने सदा इस दुनिया में मारकाट और आतंकवाद के सिवा कुछ नहीं दिया है। और आज भी वो यही कर रहे हैं। कौन सा ५००० साल का इतिहास बता रहे हो? तुम्हारे ही लोग कहते हैं कि २००० साल तक मुल्लों ने बाकियों ने शासन किया, तब बौद्धों पर उस समय कौन अत्याचार कर रहा था?

उत्तर:
 मनु से भी पुराने लक्षण है तो मनु तो प्रथन मनुष्य था, स्वयंभू। उससे पहले किसने दिए लक्षण जब आरम्भ ही वही है? और वैवस्त मनु ने दिए तो फिर तो ये कहा जा सकता है कि मनु से पुराने है। मनुस्मृति से पहले के है तो उससे पुराने वेदो में दिए है क्या? क्या 4 ऋषियों ने दिए है? फिर वो 4 क्या स्वम्भू मनु से पहले के है?

इस्लाम को तो आप लोग 1400 साल कहते है पर सनातन कितना खूंखार है ये जग जाहिर है। बौद्ध 5 हज़ार वर्ष पुराना इसका खूनी इतिहास बताते है जो आज भी बढ़ता जा रहा है। जो आपके साथ पिछले 5 हज़ार वर्ष से रहते आ रहे है वही ये यह विचार रख रहे तो उनकी बात क्यो न मानी जाए?

प्रश्न:
असहमति,खण्डन,विरोध अवश्य हुआ पर कोई क़त्लेआम नहीं किया गया बौद्धों का ये असत्य है,. यद्यपि कहीं कहीं बौद्धों को शूद्रों में सम्मिलित किया गया था बलपूर्वक ,हाँ, यवन आक्रान्ताओं ने सर्वप्रथम इनका ही नरसंहार किया ऐसा वर्णन मिलता है। झूठे इतिहास के नाम पर ब्राह्मण को विदेशी और झूठा अत्याचार बताकर विक्टिम कार्ड खेलना, इस काम में मुल्ले और टकले दोनों एक हैं। और जब वह किसी मत विशेष का पक्ष ही नहीं लेते, तब काहे ये ५ हजार साल का शोषण कार्ड बता रहे हो? उनको इससे कोई मतलब नहीं। उनको आज इस्लामी जिहाद का खूनी इतिहास और वर्तमान दिख रहा है, इसलिए वो उसका विरोध करते हैं। उनको इससे फरक भी नहीं पड़ता कि बौद्धों का इतिहास क्या था। उनको अभी इस्लामी राक्षसीपन दिख रहा है, इसलिए वो उसकी आलोचना करते हैं।

उत्तर:
दयानद ही लिख के गया है। ये वैवस्त मनु  का वर्त्तमान है। सबसे पहला स्वयम्भू मनु का था। इसे ही सभी सनातनी प्रथम मनुष्य कहते है। क्योंकि ये स्वयं से उत्पन्न है, किसी अन्य मनुष्य से नहीं। अब ये बातए दीजिए कि ये 10 लक्षण वेद में कंहा है? मनुमसृति से पहले कंहा पाए गए?

वो तो बाहरी है पर आप तो इसी धर्म के है। आर्य समाजियों पर आरोप आपके ही सनातनी भाई लागाते है कि आप लोग और आपके गुर सनातनी ग्रंथो में खयानत करते है। मनुस्मृति, पुराणों में मिलावट बताते है। वेदों में क्योंकि मिलावट, इतिहास मानना, अपने ही पैर पर कुल्हाड़ी मारना होगा, इसलिए भी वेदो के मनमाने अर्थ निकालते है और एकेश्वरवादी बना देते है। सभी नामों को ईश्वर बना दिया गया।

प्रश्न:
मनु प्रथम मनुष्य कौन कहता है. सुना है आप के लोग गल्फ के हिंदुओं में बाँटने के लिये हिंदु ग्रंथोंमें खयानत कर के छापते हैं और वहाँ विक्रय करते हैं। सबूत नही हैं, लेकिन जिस तरह के फ्रॉड दावे  मुस्लिम करते आये हैं कुछ वर्षों से,  यह अवश्य कर सकते हैं।

उत्तर:
काहे बिदक रहे हो। फिर मैंने दुम पर पांव रख दिया क्या। बात किसी और से हो रही थी आप फिर कंही से टपक पढ़े जैसे वेद 4 ऋषियो पर पता नहीं कंहा से टपके थे। बेगामी शादी में पंडा दीवाना। 

मुल्ल्ले और टकले दिख गए पर अपनी टांट पर उगी सर्पीली चोटी नहीं दिखती, और न पाजामे में डालने वाला नाड़े का यग्योपवित बनना दिखता है। 

वो तो कहते है हमेशा से ही विदेशी नस्ल आर्य, हिन्दू और पुष्पमित्र शुंग जैसे कालों में उनका दमन होता आया है। जबकि बाकियों जैसे अंग्रेज़ आदि में उन्हें बमानराज से थोड़ी राहत ही मिली है। धीरे धीरे आपका 5 हज़ार साल का भांडा फोड़के वो दुनिया के सामने लाते ही जा रहे है। जैसे मिथ्या और झूठ और नफरत आप फैलाते हो आपका नाम कुतर्की अय्यार होना चाहिए।

प्रश्न:
कोई उसे प्रथम मनुष्य नही मानता, यह प्रथम मनुष्य की कहानी अब्राहमी है। वैसे भी खुद को अल्लाह और मोहम्मद के गुलाम ही मानते हैं आप लोग और इस्लाम, असल में Mway है, गुलामी का मल्टिलेवल मार्केटिंग। आप को आप के कोल्हू के गधे और बैल मौलाना लोगों ने एक ही पट्टी पढाई है, अपनी फ्रॉड किताब को सब से श्रेष्ठ साबित करो अन्यथा दूसरों की किताबों में मीनमेख निकालो, और कुछ भी कर के चर्चा किताब के विषयपर ही रखो क्योंकि किताब के सिवा इस्लाम के पास मौलिक सोचने की क्षमता ही नही है। दिमागी गुलाम हैं। इन लोगों को इनके कोल्हूके गधे और बैल मौलाना लोगों ने एक ही पट्टी पढाई है, अपनी फ्रॉड किताब को सब से श्रेष्ठ साबित करो अन्यथा दूसरों की किताबों में मीनमेख निकालो, और कुछ भी कर के चर्चा किताब के विषयपर ही रखो क्योंकि किताब के सिवा इस्लाम के पास मौलिक सोचने की क्षमता ही नही है। रही बात मैं केवल भेड़ियों को एक्सपोज करता हूँ। एक तो मैं नार्य समाजी नहीं हूँ, और ना ही पौराणिक हूँ। इसलिए दयानन्द को आप कुछ भी कहें, मुझपर कोई फर्क नहीं पड़ता। आप किसी देवताओं को भी कुछ भी कहें, मुझपर उसका भी कोई असर नहीं होता, क्योंकि मैं जानता हूँ कि आप उन्हें काल्पनिक मानते हैं और उनको जो भी कहते हैं,  आप का कल्पना विलास मात्र है। लेकिन आप का मोहम्मद कल्पना नहीं है। ये व्यक्ति हो गया था और आज दुनिया के दुखडर्ड का कारण ही उसका जबर्दस्ती से फैलाया हुआ अंधविश्वास है।

उत्तर:
जब से इस ग्रुप में देख रहा हूँ। आप लोगो को आप दूसरे की ग्रंथो,धर्म में कमियां निकाल रहे हो, वर्षों से।  सत्यार्थ प्रकाश में यही तो किया है आपके मौलाना दयानद ने। अभी तक मैंने तो क़ुरान को श्रेष्ठ साबित करने के लिए एक शब्द यंहा नहीं कहा। आपने सीधा गढ़ के आरोप लगा दिया। मुझे तो किसी ने पट्टी नहीं पढ़ाई। पर आप लोग एक ही पट्टी और ढर्रे पर चलते दिखायी दे रहे है क्योंकि सारी बातें झुठलाते जा रहे हो सभी। अब मनु की बात भी झुठला दी। जबकि यही सनातनी मत है। हमारी क्या गलती। मैं सभी उत्तर और प्रमाण देता आ रहा हूँ। पर आप ने अपने ही किसी भी मत का जवाब नही दिया। 10 लक्षण वेद में या मनु से पहेले कंहा लिखे है। जवाब हो तो दे दीजिएगा। वरना अब चलता हूँ। किसी ज्ञानी से इसका जवाब लेने। आपके दिए मतों पर मेरे किये गए प्रश्नों का उत्तर की प्रतीक्षा अभी भी रहेगी। गर उत्तर नही थे, तो यंहा रखने भी नहीं थे। जितने भी आरोप लगा रहे है, उसके जैसे आरोप सनातन और आर्यो पर इस्लाम से पहले से ही लग रहे है।
आप जिस तथाकथित नफ़रत का उल्लेख कर रहे है। मुझे आपमें भी वही दिखाई दे रही है। धन्यवाद। प्रश्न उतर समाप्त।

प्रश्न:
इस्लाम एक भेड़िया सोच है, जो देता कुछ नहीं, केवल wanton desruction में माननेवाली एक parasitic predatory विचारधारा है। यह दैवी नहीं है इसका प्रमाण यह है कि यह केवल हिंसा और छल कपात से कब्जा से ही फैला है। इंडोनेशिया का उदाहरण देनेवाले यह नहीं बताते कि राजा को हानी trap करके कन्वर्ट किया था और बाद में जो प्रजा ने जहां प्रतिकार किया वहाँ हिंसाचर किया। यह कभी भी शांति का धर्म नहीं रहा। अगर वाकई ये दैवी होता तो अल्लाह रेगिस्तान में बरसात कराता, मोहम्मद के लिए,  सभी खुशी से कन्वर्ट हो जाते. अविश्वासनीय और अतार्किक बातें हर धर्म में निकालेंगी। लेकिन भारत का कोई भी देशज धर्म खुद को दूसरों पर नहीं थोपता, वह भी हिंसाचर से। इस्लाम वही करता है। अगर झूठ हजम नहीं हुआ तो हिंसा का मौका देखता है या फिर और कोई छल कपात से गलबा और दायरा बढ़ाने की हिकमत खोजता है, कुल मिलाकर एक malignant fraud है इसलिए उससे लड़ना कर्तव्य है। आरोप में असत्य हो सकता है, मैने कोई आरोप लगाये ही नही, जो साफ सत्य है वही लिखा है। और मैंने आप कौ उत्तर देने में नफरत का कहाँ उल्लेख किया ?

उत्तर:
धन्यवाद। प्रश्न उतर समाप्त।

दर्शन विज्ञान और ईश्वर

   दर्शनशास्त्र की 3 शाखाएँ हैं:- I. तत्वमीमांसा/ तत्वज्ञान (Metaphysics - beyond physics/theory of reality) [तत्व, अस्तित्व, वास्तविकता का ...