Saturday, 22 January 2022

ब्रह्ममुहूर्त और तहज्जुद।

Has Brahammuhurt been taken from Islam or Tahajjud time?

No, this Brahmamuhurat has not been taken from the concept of Tahajjud. It is prevailed in Hinduism from centuries. It is one of the most beneficial Muhurats for Yoga and Meditation as mentioned in various scriptures and as known in Hindu culture such as Manusmriti (4:92) , Bhagwat Puran (10:70:4 - Shri Krihsna used to meditate during this time) and Ashtanga Hridayam (2:1). Please see Ashtanga Hridayam which is a very famous scripture of Ayurveda written by Vagbhata. The date of this text is well before the time of Prophet Muhammad. It is a well known muhurat and mentioned in numerous scriptures and Ayurveda books. Hindu scholars are very much aware of it since it is very famous.


1. Read the Astanga Hrdayam published by Chaukhambha Publisher, the most authentic one. You will know about the Vaghbhat authorship in preface itself. Chinese traveller I-tsing (7th cent.) has stated that the Ashtnaga Hridaya was widely popular in entire India. It has also been written that the Vaghbhat had taken such knowledge and practices from the earlier great scholars.

2. Manusmriti and such Ayurveda Texts are older than Prophet. If you say this shloka may be interpolation then it may also not be the one. You can't confirm.

3. It's not just about Manu, it's mentioned in various Hindu Dharama text and ayurveda books. This muhurat is accepted as ancient practice by Hindus scholars.

4. One requires solid evidences to say that this practice was taken into Hinduism or its texts from Islam or Muhammad saw.

5. Most of the muslims out of ignorance, are not at all ready to accept this world had great civilisations, arts, practices, knowledge etc even before Islam. They think that the whole world was living in Jahiliya.  As, there was no Sanatan Dharama or Manu Smriti or Ashtang Hridayam or Ayurveda or Yoga before Prophet Muhammad and they all started after Prophet Muhammad.


आयुर्वेद के ग्रन्थों में कहा है-
ब्राह्मो मुहूर्ते बुध्येत स्वस्थो रक्षार्थमायुषः ।
(भावप्रकाश १/४)
अर्थात् स्वस्थ व्यक्ति को अपनी जीवन-रक्षा के लिए ब्रह्ममुहूर्त में उठना चाहिए।

महर्षि मनु का आदेश है-
ब्राह्मो मुहूर्त बुध्येत धर्मार्थों चानुचिन्तयेत्।
कायक्लेशांश्च तन्मूलान्वेदतत्त्वार्थमेव च।।
(मनुस्मृति ४/९२)
अर्थ:-प्रत्येक व्यक्ति को ब्रह्ममुहूर्त में उठ के धर्म और अर्थ का चिन्तन करना चाहिए।शरीर के रोग और उनके कारणों का विचार करना चाहिए।फिर वेद के रहस्यों का भी चिन्तन करना चाहिए।

Friday, 21 January 2022

इस्लाम पर सवाल (तकिया, बहुपत्नीवाद, दहेज़, लव जहद, कज़िन विवाह, जॉइंट फैमिली, जातिव, हिजाबी, जादू, गर्भावस्था)



अल तकिया, बहुपत्नीवाद, दहेज़, लव जहद, कज़िन विवाह, जॉइंट फैमिली, जातिवाद, हिजाबी स्पोर्ट्स वुमन, जादू टोना, Rich & Poor deeds, गर्भावस्था में सम्भोग



अल तकिया

 

अल तकिया शब्दो के जो अर्थ जैसे बताये जाते हैं, वो क़ुरान में ऐसे नही है। और जिन चीज़ों को इससे जोड़ कर देखा जाता है वंहा भी इसका अर्थ ऐसा बिल्कुल नहीं है। अल तककीया शब्द एक स्तिथि का नाम है, जो इंसानों की बनाई हुई है। इसका अर्थ है जब आपके धर्म या किसी संबंधित आधार पर आप पर जुल्म किए जाए, या सताया जाए या आपकी जान माल आदि को खतरा हो तो आप अपने धर्म इस्लाम को छिपा कर वंहा रह सकते हैं। चोरी छिपे अपने धर्म का पालन करते रहें.  जान है तो धर्म है, यही ईश्वर का आदेश है। जब माहौल अच्छा हो जाये तो खुल कर पालन करने लगिये। शिया लोगो ने इस रेलक्सशेसन का काफी इस्तमाल किया है। आज भी कुछ लोग करते है जब मजबूरी होती है। और ये सिर्फ धर्म में ही क्यों, हर विचारधारा के लोगों को माहौल विरुद्ध मिलने पर ऐसा करना पड़ता है. जैसे इमरजेंसी में हुआ था या दंगो में होता है. इंसान समझ, बुद्धि, तर्क, अनुभव यही समर्थन करते हैं कि ऐसी छूट जीवन में मिलनी ही चाहिए, धर्म हो या कोई और चीज़। ये वैसा ही जैसे किसी भारतीय सैनिक जासूसी करने पाक जाये और वो कुछ समय के लिए अपनी इडेंटटी छिपा कर, खुद को पाकिस्तानियो में मिला ले। या पकड़े जाने पर खुद को भारत से पल्ला झाड़ कर अपनी जान बचाये और खतरा टलने पर बाद में भले खुल कर सामने आ जाये। जो हिन्दू भाई ये कहते हैं कि क़ुरान में इसका आदेश है या मुस्लिम इसके अंतर्गत दिखावा करते हैं, या ये धोखबाज़ी है। उन्हें अपने धर्म का ही ज्ञान नहीं है। हिन्दू धर्म में भी ये व्यवस्था है जिसे "आपद्धर्म" कहा गया है। विभिन्न ग्रंथों में इसका उल्लेख और आदेश है। यानी आपातकाल की स्थिति में अपने धर्म को छिपा कर व्यवहार करना। दुसरो पर उठने वाली हर उंगली अपनी तरफ पहले इशारा करती है। न जाने दूसरे धर्म के प्रति नफरत फैलाने वाले लोग अपने गिरेबान में पहले ही कब झांकेंगे।


बहुपत्नीवाद

दुनिया में 99% पोलीगमी ज़बरदस्ती होती है। बीवियों की मर्ज़ी नहीं होती। बहुपत्नी मुख्यता बेवा ,मज़लूम, बेसहारा, गरीब आदि के लिए एक हल है पर ऐसा बहुत ही कम हो पाता है। यानी कुछ मसलिहत के तहत ही इसकी इजाजत है। क़ुरान ने तो इंसाफ करने वालों को इजाज़त दी है। अगर इंसाफ न कर पाए कोई तो मुखलाफ़त हो जायेगी क़ुरान की।  सही इंसाफ का उदाहरण ये है कि दो सेब लेकर दो बीवियों को एक एक नहीं बांटना बल्कि एक सेब के 2 टुकड़े करके आधा आधा बांटना है। अगर ऐसा इंसाफ नहीं कर सकते तो आप दो शादी नहीं कर सकते। यानी मसलिहत, इंसाफ, नियत इन चीजों का खयाल रखना चाहिए।


दहेज़

क़ुरान ने सुरहः अराफ में किसी का हक़ मारने और किसी कि जान,माल,आबरू के खिलाफ ज़्यादती को हराम करार दिया है। अगर दहेज से किसी के माल के साथ ज़्यादती हो रही है या दहेज़ इकट्ठा करने, लेने, देने में किसी का हक़ मर रहा है तो ये हराम ही है। दहेज की और भी कई सूरत हो सकती है जो इन आयात में फिट बैठे।


लव जिहाद

लवजिहाद एक बोगस टर्म है। लव जिहाद के लिए बाहर से फाइनेंस आना भी एक सफेद झूठ है। अंतर्धार्मिक शादी के बाद लड़की के साथ सामान्य उत्पीड़न करने वाले लोग दोनों तरफ है। ज़्यादातर दो धर्म वालों के शुद्ध प्रेम विवाह ही होते है। और उनके शादी शुदा जीवन में भी वैसे ही लड़ाई झगड़े होते है जैसे एक ही धर्म से संबंध रखने वाले जोड़ों के होते है। पर ऐसे कुछ केसेस को राजीनीतिक लोग हाईजैक करके धर्म द्वारा उत्पीड़न बता के पेश करते है जो असल फेक केस तैयार किये जाते है। इस तरह के बनावती केस ही सोशल मीडिया में अक्सर सामने लाये जाते है। हाँ, पर कुछ लोग नफरत की आग में, बदले की भावना से दूसरे धर्म की लड़कियों से शादी ही इसलिए करते है कि उनकी ज़िंदगी बर्बाद कर दे। इस तरह के केस ही असली केस है धर्म के आधार पर उत्पीड़न के। ऐसे लोग या केस कम होते है पर होते ये भी दोनों तरफ है। इस में धर्म का नहीं, अधर्मी मनुष्यों का दोष है। उनकी मानसिकता और मंशाओं का दोष है।
 


रिवर्स लव जिहाद

ये हमारी पितृसत्तात्मक समाज (पितृ सत्ता समाज) की निशानी हैं। जंहा हमेशा लड़कियों को ही रोका जाता है, लड़कियों को ही घर की इज्जत का ज़िम्मा बनाया जाता है, लड़कियों पर ही निगाह रखने को कहा जाता है। जबकी मुस्लिम लड़के खुले आम हर वो काम कर रहे हैं जो वो मुस्लिम लड़के को करने से रोकते हैं। ये मुस्लिम लड़के आज भी ना तो मुस्लिम लड़कियों में अपनी बहन देखते हैं और ना ही हिंदू लड़कियों में, जैसी इस्लाम की तालीम है। असल में कुछ साल पहले तक ये मुस्लिम लड़के ही मुस्लिम लड़कियों के साथ हर गैर इस्लामी काम कर रहे थे। हिंदू लड़के तब मुसलमान लड़कों से काफी दूर थे। वक़्त ही ऐसा था तब. आज दूसरे मजहब के लड़के भी मुस्लिम लड़कों को (योजनाबद्ध या अनियोजित तरीके से) फसाने में लगे (जैसे मुसलमान लड़के भी करते थे हिंदू लड़कों के साथ), इसलिए मुस्लिम लड़कों को कॉम्पिटिशन फील हो गया और फिर आज कल जारी धर्म की लड़ाई में वो कैसे पीछे रह सकते हैं, वो कैसे उल्टा प्यार जिहाद को बर्दाश्त कर सकते हैं। फ़िक्र सिर्फ़ लड़कियों की नहीं बल्कि लड़कों की भी जानी चाहिए। स्टैंडर्ड डोनो के लिए बराबर राखे जाने चाहिए।  और सोशल मीडिया पर मुस्लिम लड़कियों को ताकीद करने वाले ज्यादा से ज्यादा मुस्लिम लड़कों के मोबाइल, प्रोफाइल, किरादर, जाति जिंदगी में झनक कर देखने पर पता लगेगा, उन्हें सबसे ज्यादा सुधार की जरूरत है, लड़कियों से भी ज्यादा। मगर तमाम मुहीम लड़कियों को ही सुधारने की जरूरत है क्योंकि यही हमारा सामाजिक रवैय्या है।
 
 
कज़िन विवाह

आदिकाल में संतानों की आपस में शादी, कज़िन विवाह, हालाल या वन नाइट स्टैंड।

चचेरे भाई की शादी कोई इस्लाम का मसला नहीं है। ना ही इसके लिए जज्बाती होने की जरूरत है। इसके होने न होने से मुसलमान और इस्लाम पर कोई फर्क नहीं पड़ता। भारतीय उपमहाद्वीप के मुसलमानों को जितना हो सके इससे बचना चाहिए। वजह ये है कि वयस्कता तक यहां लोग भाई-बहन बन कर रहते हैं, फिर एक दिन पता लगता है वो जीवन साथी बनने वाला है। और अगर ऐसी शादी करनी ही है तो पहले अपने सोशल माहौल को इसके लायक बनाएं। बाकी अब तो एक ही जाती में शादी करने से होने वाली जेनेटिक  बीमारियों पर भी रीसर्च आ चूकी है. तो फिर सिर्फ कज़िन मेरिज पर ऐसी रीसर्च रिपोर्ट्स पर ही हल्ला क्यों करना. बाकी देखा जाये तो हर सम्बन्ध में होने वाली शादियों में ऐसे नतीजे आ सकते हैं. ये वैसे ही जैसे आज कल डॉ. हर चीज के नकारात्मक प्रभाव (दिल का दौरा पड़ने का खतरा, कैंसर का कारण आदि) शरीर पर बताते हैं। अगर उनकी मने के ऐसे ही चेज़ेन खाना चोरने लगे तो भूखे मर जायेंगे।
 
जब एक एटम से भी करोड़ो गुना छोटे कण में बिगबैंग के कारण पूरे ब्रह्मांड का निर्माण हुआ तो ब्राह्मण की हर चीज़ भी तो रिश्तेदार हो गयी। ब्रह्मांड की हर शय उससे बनी हुई है, मनुष्य भी उससे बने हुए है, क्या फिर सब उसी कण की पैदाइशी नही हुए? वैसे भाई बहन की शादी न होने का सिद्धांत तो धर्म का दिया हुआ है। नास्तिक इसको क्यों मानते है। उन्हें ये नियम किस नास्तिकवादी ने दिया? बताओ?

Jab is dharti par first time life kisi padarth me aayi to usse life yaha create hui. Dusri species se bandar evolve hue, wo species aur Bandar aur dusre janwar apne relation me hi sex karte the.  Tumhare puravaj jab bandar the, tab apas me sex karte the, to tum bhi to inhi bhai beheno ki santan hue. Aadimanav bhii siblings se sex karte the. Jab ye sab karte the to first human society ke log aisa kyo nahi kar sakte. Yahi sahi baat he ki Nastik mante hai ki conscience paida hui aur ye niyam ban gaya ki close relation me shadi nahi karni ya bana diya gaya. Par baat whi he ki pehle aisa hota tha duniya ki arambh me chahe religiously dekho ya scientifically. Tumhare purvaj bandar aur adivasi bhai behan aise relationship ki paidaish ho. Bahut bade wale nastik western countries me cousins se shadi karte hai. To kya unka conscience nahi he  kya wo sabhy nahi. Wo tum se zyada sabhy hai. Tabhi to waha 7- 7 gotra ka system nahi. Gotra system to hindu dharm ka diya, tum to nastik ho, dharm ke niyam kyo mante ho . Jaatiwaad hindu dharm ka niyam hai , fir apne name me sharma kyo laga rakha he. Nastik nahin tum hidden dharmik ho jo dharm se chalte ho bas munh se nahi.

गोत्र क्यों मानता है, जाती क्यो मानता है। जाती सिर्फ भारत महाद्वीप के मुसलमान मानते है हिन्दुओ समाज से जो निकले है अधिकतर। पर तु क्यो गोत्र, जाती मानता है। नास्तिक है पर अपने नाम में शर्मा लगा रखा हौ जो धर्म और जाति विशेष है। काहे को नास्तिक। दोहरा चरित्र और नास्तिक वाह। एक विशेष धर्म जाती का दम्भ है तभी लगा रखा है। तुम्हारे से अच्छे और सच्च नास्तिक तो वेस्टर्न्स है जो न गोत्र मानते, न जाती। और मैं हलाला को नहीं मानता। और जिसे लोग हलाला मानते है, वैसा ही कुछ नास्तिक one night stand करते है, तो तुम खुद हालाला करते और करवाते हो । और पार्टियों दोस्तों में इसे गर्व से बताते हो। यही दोगलापन है। दुसरे करे तो हालाला और तुम करो तो एन्जॉय। वाह रे दोहरापन। जिस ब्राह्मण धर्म व जाती पर तुम्हे गर्व है, मैं साबित कर दुंगा की उनके ग्रन्थों में बाप बेटी, भाई बहन, कज़िन संबंध का उल्लेख है और पूर्व समाज में कज़िन में संबध रहते थे और आज भी कई जगह है। वही तुम्हारे पूर्वज है तो तुम भी उसी भाई बहन से निकले हो। तुम्हारी बात से लग रहा हैं सिर्फ मेडिकल कारणों से तुम कज़िन या भाई बहन से शादी नहीं करते। मतलब कल को नई रिसर्च आयी और विज्ञान ने कह दिया कि इसमे कोई नुकसान नही तो अपने बहन से शादी कर लियो फिर। हम तो धर्मानुसार भाई बहन के रिश्ते को पवित्र मानते है और ऐसी शादी को निषेध। पर तुम तो विज्ञान मानते हो तो कर लियो। और करते ही भाई बहन से शादी नास्तिक लोग बाहर देशों में। 
 

जॉइंट फैमिली

इस्लाम अनुसार जॉइंट या नुक्लीअर फैमिली में रहना कैसा है?  ये सब सामाजिक कानून और परंपराओं का इशुज़ है। इस्लाम इस पर कोई राय नहीं रखता, न क़ुरान। दोनों में से कोई भी राह इख्तियार की जा सकती है, जो अक्सर समाज प्रभावित होती है। इस्लाम आने से पहले से ही अरब में जोड़े अलग रहने की परंपरा चली आ रही थी जो हुज़ूर के वक़्त और बाद में भी जारी रही।



जातिवाद

ज़ात पात के कारण ही इस्लाम लाये तो शायद ये मुमकिन ही नही को वो अपनी जातों को भी उसी तरह इस्लाम मे आगे ले जाना चाहते हो। बल्कि महसूस तो ये होता है की वो इससे छुटकारा पाना चाहते हो। पर क्योंकि भारतीय समाज में जात से बड़ी कोई पहचान नही, इसलिए उस समय के मुस्लिम वर्चसवादी और दीनी रहनुमाओं ने उनकी जाति बरकरार रखते हुए, अरबी कबीलों के नाम दे दिए हो। ज़ाहिर, वो हिन्दू थे और इस्लामी और अरबी मालूमात न के बराबर रखते हो और इसलिए ये नाम उनको कोई आलिम से बेहतर कौन सजेस्ट कर सकता हो।  दूसरी बात इस्लाम की शिक्षाओं के कारण भारतीय मुसलमानों में जात पात में थोड़ी सी कमी तो आयी है। यक़ीनन ये उतनी ज़्यादा हिक़ारत वाली नही जितनी हिन्दुओ में है। पर इस मामूली से कमी का एक छोटा सा कारण ये भी ही सकता है की बदले हुए जात के नाम, जो कबीलों पर, इसका मानसिक प्रभाव भी कनवर्टेड मुस्लिम पर पड़ा हो क्योंकि देखा जाए तो एक ही काम करने वाले एक ही जाती के दो समाज, हिंदू और मुस्लिम के, दोनों में जाती को लेके बहुत विभिन्नता पाई जाती है। बाकी ये मेरी ऐसे ही ऑब्जर्वेशन है। ग़लत भी हो सकती है।
 
 
हिजाबी स्पोर्ट्सवुमन

हिजाब, बुर्क़ा, निक़ाब में फ़र्क़ होता है। एक मुस्लिम लड़की जो हज़ारों एथलीट्स को पीछे छोड़ ओलिंपिक में आती है और अपनी मर्ज़ी से जो चाहे पहन के भगती है, जैसे हिजाब। तो उसे बेवक़ूफ़  या पिछड़ा बताना गलत है। और हिजाब को हार का कारण बेवकूफी। गल्फ के अलावा दूसरे देशों से आये एथेलीट भी अपनी पसंद के कपड़ो में भागते और हार जाते है। उनकी हार की वजह भी कपड़े होते है क्या। पर लोग उनको खिलाङी मान लेते है। ये है डबल स्टंडेर्ड 

रही तैराकी की बात तो उसके लिए फुल स्विमिंग ड्रेस भी मौजूद है आज।
प्लेयर की मर्ज़ी जो मर्ज़ी पहनके तैरें। हम कौन होते है रोकने वाले। उसे जिस चीज़ में कम्फर्ट होगी वो वही पहनके खेलेगी अगर किसी नियम का उलंघन नहीं होता है तो। सबका अपना अपना कम्फर्ट लेवल है। किसी पर अपनी मर्ज़ी नहीं थोप सकते। 

और ये मानना भी गलत है की उनसे ज़बरदस्ती हिजाब करवाया जा रहा है।क्योंकि वो लड़कीया जो इंटरनेशनल पे खेल खेले, दुनिया भर में जाएँ खलने, बचपन से अपनी मर्ज़ी का स्पोर्ट खेले, उनपे कोई कैसे अपनी मर्ज़ी थोप देगा की तुम ओलंपिक में ये कपडे पहनना। ऐसा लगभग नामुमकिन है। वो स्वंत्रत है तभी खेलने आती है और स्वंत्रत है तभी अपनी मर्ज़ी की ड्रेस पहनती है।

हिजाब से असल मे नास्तिकों का दिल कुढ़ता है। नास्तिकता खुदगर्ज़ी सिखाती है। लगभग सारे नास्तिक आज तक अपने सुख के लिए ही भागे है। आज तक नास्तिकता ने दुनिया का क्या दिया है। बताइये ऎसे कुछ नास्तिकों के नाम जो धार्मिक लोगो से ज़्यादा दुनिया या इंसानों के लिए कुछ कर के गए हो।

आजकल नगें होके वॉलीबॉल भी एक खेल है। उनसे किसी को दिक्कत नहीं है। पर कोई अपनी मर्ज़ी से अपना सर शारीर ढँकना चाहे तो उसके पीछे लठ लेके दौड़ेंगे। क्यों उसे हक़ नहीं नहीं अपनी मर्ज़ी चलाने का।
जादू टोना

जादू टोना अज्ञानता से सम्बंधित है। क्योंकि ये मुसलमान का है इसलिए इसकी भाषा उर्दू अरबी है। इस्लाम में जादू टोना सख्त मना और हराम है। इससे दूर रहने को कहा गया है! पर कुछ मुसलमान इसमे संलिप्त है, वैसे ही जैसे कुछ दूसरे धर्मों के लोग भी जादूटोना करते मिलते है, यंहा तक कि हमारे कुछ शेड्यूल कास्ट और ट्राइब के लोग भी जिसका सबसे बड़ा कारण अज्ञानता है। दूसरे धर्मों के लोगों के ताबीज़ गंडे देखोगे तो उसमें भी उनकी भाषाएं और कुछ नंबर लिखे मिलेंगे कुछ अन्य भाषाओं और खास संकेत भी मिलेंगे। यंहा एक विशेष पिछड़ी जाति का नाम नही लिख रहा जो शायद सबसे ज़्यादा जादू टोना की दुकानें चलती है। मतलब ये धर्म समन्धित नही बल्कि अन्य कारणों से है।

ऐसे मुसलमानों को कितना भी समझाये ये मानते नहीं है, बोलते कुछ है करते कुछ है। ये उसी तरह के लोग है जो बहुजन समाज में भी पाए जाते है। सामने से ये कहते हुए की सब बराबर है पर पीछे से अपनी पिछड़ी जाति को किसी दूसरी पिछड़ी जाति से श्रेष्ठ भी बताते है।

जैसे अपराध करना मना है। पर सभी धर्मों जाती के लोगों में अपराधी पाएं जाते है। जिसके पीछे कारण धर्म से अधिक अज्ञानता और अन्य कारण होते है।


Rich and Poor deeds

Who truly believe the day of judgement, know that the poor will  be lesser accountable than the rich on the Last Day.  He, who once was poor, has greater chance and better understanding to refrain himself  being arrogant after becoming rich.

Being born poor is a gift. Being born rich is a sealed packet of gift.  If you use your wealth right throughout the life, there is a gift in the sealed box otherwise there is spring punch in it or it's empty. Becoming rich lawfully is a blessing and becoming rich unlawfully is a curse.



गर्भावस्था में सम्भोग की आज्ञा. 
 
डॉक्टर्स गर्भावस्था की एक खास मुद्दत में जैसे पहली तिमाही के बाद और आखिरी तिमाही से पहले शारीरिक इच्छाओं की पूर्ति के तहत सेक्स की इजाज़त देते है पर एहितयात की शर्त पर जैसे सेक्स आराम से हो, बच्चे और स्त्री को खतरा न हो आदि। यही इजाज़त इस्लाम भी देता है ऐसी ही शर्तो के साथ जिसमें मेडिकल एडवाइस बहुत महत्पूर्ण रोल अदा करती है और उसे लेने के बाद ही किया जाये। इस्लाम में पीरियड के दौरान सेक्स सख्त मना है, पेट में बच्चे को किसी भी तरह से नुकसान पहुँचना भी मना है, यहाँ तक कि औरत को शारीरिक या मानसिक नुकसान पहुंचाना भी मना है। पर गर्भावस्था में सेक्स कर सकते है, ये सभी चीजों को ध्यान में रखते हुए। इसीलिए हो सकता है किसी आलिम ने यही बात बयान की हो कि इस वक़्त में सेक्स की इजाज़त है पर हराम नहीं हैं। अगर कहा है तो मेडीकल पक्ष को ध्यान मे रखते हुए इसकी इजाज़त दी होगी। पर ये भी हो सकता है उन्होंने अपनी बात में कम इल्मी, गलत समझ या किसी और वजह से कही हो, अगर ऐसा है तो उन्होंने गलत कहा है।

 

नास्तिक बनाम आस्तिक - भाग 6 (कथन, वक्तव्य, अशार)।


◆ एक साहित्यकार (हजारी प्रसाद द्विवेदी) कहता है कि बहुत कम लोग जानते है कि वे बहुत कम जानते है। 
 
ये दर्शन की बात है। थोड़े इल्म पर फैसले करना इंसान की आदत है इसलिए थोड़े से इल्म की बुनियाद पर कुछ लोग ये फैसला कर लेते है कि खुदा नहीं है। ये इंसानी मनोविज्ञान की बात हुई। जबकि विज्ञान भी ऐसी ही बात सामने रखता हैं क्योंकि वैज्ञानिकों का खुद ये मत है कि इंसानों का इल्म अधूरा (पार्शियल) है। पर यह बात जिसने सबसे पहले बार कही थी वो मज़हब था। क़ुरान में अल्लाह ने फरमाया कि अपनी हुदूद (सीमाओं) में रहो और तुमको बहुत थोड़ा इल्म दिया गया है।

◆ पहले क़ुदरत को खुदा मानने की वजह से लोग क़ुदरत पर साइंसी तहक़ीक़ करने से अक्सर दूरी इख्तियार किया करते थे। जब क़ुदरत को इबादत के लायक़ मानना बंद किया गया तब जाकर क़ुदरत पर तहक़ीक़ शुरू हो सकी। क़ुरान के बाद खालिक और खलक में फर्क वाज़ेह हुआ। खुदा और कुदरत को अलग अलग तस्लीम किया गया। इस तरह कुदरत की हर शय पर तहक़ीक़ शुरू हुई जिसके नतीजे में इंसानों ने साइंस की गोल्डन एज देखी। 

◆ खुदा का तसव्वुर नहीं माना तो क़ायनात में सवाल ही सवाल है और सारे सवालों के जवाब गलत मिलेंगे। अगर खुदा का तसव्वुर मान लिया तो सारे सवाल हल हो जायँगे।

◆ साइंस और मज़हब साथ साथ चलने वाली चीज़े हैं। बस मरने के बाद साइंस साथ छोड़ देता है और मज़हब साथ देता है.

◆ ईश्वर कंहा है। वह हम सब में है और नहीं भी है। वह साथ भी है और साथ नहीं भी है। ढूंढो तो मिल जायेगा और न ढूंढो तो गुम जायगा। 
 
◆ अगर इस बात का पता लगाना चाहते हो की तुम्हारी ज़िंदगी पे कौन हुक्म चला रहा है तो उस शख़्स को ढूंढो जिससे तुम इख्तिलाफ नहीं कर सकते!
 
◆  नास्तिक सिर्फ वही नहीं होता जो ईश्वर को नहीं मानता वह भी नास्तिक है जो ईश्वर को जैसा है वैसा नहीं मानता.
 
◆ वैज्ञानिक कहते है कि इंसान का अभी तक सिर्फ 15% दिमाग विकसित हुआ है और अभी 85% और विकसित हो सकता है। यानी अभी सृष्टि के निर्माता और निर्माण को जो दिमाग झुठला रहा है, वो सच हो सकता है।
 
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◆ मानव इतिहास इस बात पर गवाह है की इंसान ने हर दौर में और हर इलाके में दुनिया के एक मालिक को स्वीकार किया है। इस ऐतिहासिक सच को इंसानियत ने हर दौर में कलेक्टिव हैसियत से कबूल किया है। एक पहले से साबित चीज़ को साबित नहीं किया जाता बल्कि उसको रद करने वालों से सबूत मांगा जाता है। अब अगर कुछ लोग उठते हैं और इंसानियत के इस कलेक्टिव फैसले को रद करते हैं तो उन से पूछा जाएगा की दीलील दो की कोई ईश्वर नहीं है।

ममता का जज़्बा मां में हमेशा से रहा है चाहे कोई भी जीव हो। अब कोई ये कहे कि ममता नाम की कोई चीज़ नहीं होती है। तो उससे यही कहा जायगा की तुम्हे नहीं महसूस होती होगी पर ये है और हमेशा से रही है जिसकी पूरी इंसानी तारीख़ गवाह है इसलिए सबूत तुम लाओ की ममता नहीं होती है।  उसके पास सबूत नहीं होगा सिर्फ उसकी अपनी मान्यता होगी। वो कहेगा कि आज बहुत से ऐसी मां होने लगी है जिनमें ममता नहीं दिखाई देती। तो इसका जवाब यही दिया जाएगा कि हां ठीक है पर फिर भी अधिकतर मां आज भी ममता रखती है। जैसे आज कुछ लोग आस्तिकता नहीं मानते है पर हमेशा से अधितकर लोग आस्तिक हुए और आज भी है। हो सकता कि भविष्य में में कभी आध्यात्मिकता इतनी कम हो जाये कि अधिकतर लोग नास्तिक हो जाए। पर फिर भी कुछ लोगों में आस्तिकता हमेशा बाकी रहेगी। भले ही इंसान न करें पर सृष्टि की हर शय साबित करती रहेगी की उसे किसी ने बनाया है। इसी तरह हो सकता है कि भविष्य में कभी खुदगर्ज़ी इतनी बढ़ जाए कि अधिकतर माँ की ममता खत्म हो जाए। पर फिर भी कुछ में ममता हमेशा बाकी रहेगी। भले ही इंसान इसे दबा दे पर संसार के अन्य जीवों में ममता दिखती रहेगी।
 
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◆ सोचता हूँ मैं अक्सर कि ख़ुदा एक बार तो नज़र बख़्शे।
लेकिन सफ़र से पहले ही आख़िर क्यों वो शहर बख़्शे।

◆ नज़र में जो नहीं अभी अगर हुआ तो क्या होगा। 
खुदा को मानता नहीं मगर हुआ तो क्या होगा।

◆ दो सोच, दोनों गलत।
मुल्हिद:- अक्ल के मामलों में ख़ुदा को न लाओ। 
मौलवी: - खुदा के मामलों में अक्ल को न लाओ।
 
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◆ दुनिया में बहुत सी चीजें ऐसी हैं जिनका नाम लेने से ही ज़ेहन में चाह और मुंह में पानी आ जाता है। फ़िर ये कैसे हो सकता है कि पूरी क़ायनात के ख़ुदा का नाम लिया जाए और जिस्म-रूह पर कुछ असर न हो।  यक़ीनन उसका नाम लेने में भी बहुत बरक़त है।

◆ मैंने कहीं पढ़ा कि दुनिया की खूबसूरत हक़ीक़तें, आंखों से नहीं बल्कि दिल से महसूस की जाती हैं। और फ़िर मुझे अल्लाह याद आया। तो फिर लोग क्यों ख़ुदा का इनकार इसलिए करते है क्योंकि उसका वजूद आंखों से नहीं दिखता।

◆ ख़्वाब धोखा नहीं बल्कि एक छोटी हक़ीक़त होते है। क्योंकि ख़्वाब के मुताबिक़ हमारा जिस्म और ज़हन रिस्पॉन्स कर रहा होता है। ख़्वाब से जागने के बाद एहसास होता है कि यह ज़िंदगी बड़ी हक़ीक़त है। जब छोटी से बड़ी हक़ीक़त में आते है तो पिछली के छोटे होने का एहसास होता है। इस दुनिया के बाद जब उस दुनिया में आंख खुलेगी तो एहसास होगा कि यह यंहा की हक़ीक़त पिछली सारी हक़ीक़तों से बड़ी है। ख़्वाब के मुक़ाबले, दुनिया बड़ी हक़ीक़त है और दुनिया के मुक़ाबले, आख़िरत.
 
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नास्तिक बनाम आस्तिक - भाग 5 (चंद कारगर बातें, मिसालें)।



नास्तिकों के साथ क्या अप्रोच स्टेप बाई स्टेप अपनाएँ।

शुरुवात से ही इंसान, क़ायनात के मुताल्लिक़ दो ही रास्ते चुनता आया है। पहला की मैं इस क़ायनात की तशरीह जानना और ढूँढूना चाहता हूँ। दूसरा की मेरा इस क़ायनात से कोई वास्ता या कनसर्न नहीं है यानी कि आँखों पर पट्टी बांध कर जीना।

क्योंकि दुनिया में सिर्फ इंसानों को ही ऐसी कन्साइन्स, इंटेलिजेंस, रीजनिंग, एनालीटिकल और एस्थेटिक सेंस,  वैगेरह ख़ुसूसियात दी गयी तो अपने वजूद के बारे में सवाल उठने की और उसके जवाब पाने की कोशिश होनी ही थी, हुई भी और होनी भी चाहिए।

● ये क़ायनात और ये जिंदगी क्यों है। इस सवाल का जवाब, जब से ये क़ायनात बनी है सिर्फ दो ही सूरतों में निकल कर आया है। पहली की इसका कोई बनाने वाला है और दूसरी ये की यह अपने आप बनी हुई है। तीसरी कोई तशरीह आज तक सामने नहीं आ पाई है।

क़ायनात के बने होने होने से कोई इनकार नहीं करता। ज़्यादातर साइंसदान कहते है कि क़ायनात ने ही खुद को बनाया है। दुसरे लोग कहते हैं कि क़ायनात को भी बनाने वाला मौजूद है।

साइंसदान कहते हैं सब चीज़ को बनाने वाला यह क़ायनात ही है। जबकि खुदा को मानने वाले यह कहते हैं कि इस क़ायनात का भी एक खुदा है। बस यही फ़र्क़ है। आज तक किसी साइंसदान ने इसका इनकार ही नहीं किया कि क़ुदरत ख़ालिक़ नहीं है। जो सिफात वो कायनात की बताते हैं, हम वही खुदा की बताते हैं जैसे अनादी, अनंत, खुद-ब-खुद वगैरह.

क़ुदरत की सिफत क्या है। क़ुदरत खुद का तार्रुफ़ करवाती है कि वो क्या है, कैसी है, पालती-पोसती है, समझ रखती है। यह सारी सिफत खुदा की भी है या यूं कहें कि असल में खुदा की ही है। पर खुदा किसी शय की तरह सामने नहीं है। देखा जाए तो क़ुदरत को भी उसकी असली शक्ल से नहीं बल्कि उसकी सिफ़तों से पहचाना जाता है। कुदरत की कोई जाती शक्ल है भी नहीं.

● साइंस की पैदाइश के वक़्त में साइंस दरअसल फलसफे का ही भाग था जिसमे माद्दा यानी मेटर के होने की वजह क्या है, क्यों है, कैसे है, इसका भी जवाब ढूंढा जाता था। पर इस क्यों का जवाब, माद्दे पर तजुर्बे करके नहीं जाना जा सका। फिर फैसला हुआ कि इसका जवाब अक्ल से सुलझा लिया जाएगा कि हम और क़ायनात क्यों है, क्या मक़सद है, ज़िंदगी मौत क्यो है। इसलिए साइंस और फलसफा दो अलग अलग हुनर बन गए। पर साइंस फिर भी इस क्यों का जवाब माद्दे पर काम करके नहीं पा सका। तो फिर इस सवाल पर काम करना ही बंद कर दिया। वैसे फलसफे को आज भी एक साइंस ही माना जाती है। मध्ययुग में मॉडर्न साइंस की पैदाइश ही इस बुनियाद पर हुई थी कि साइंस सिर्फ माद्दे पर काम करेगा। सिर्फ ये पता लागयेगा कि वो क्या है, कैसे है और तजुर्बों के बाद वो क्या क्या कर सकता है और किस किस काम में आ सकता है। पर वो क्यों (मकसद) है, इसका जवाब नहीं तलाशेगा। इसलिए साइंस, क्या है, कैसे है का जवाब तो देता है पर क्यों है, का नहीं। साइंस अभी तक इस क़ायनात की तशरीह नही दे पाया है कि ये क्यों है? 

साइंस ये बता सकता है कि अंडों से चूज़ा कैसे निकलता है, पर क्यों (कारण नहीं बल्कि उद्देश्य) निकलता है, इसका जवाब नहीं दे पाता।

● क़ायनात और इंसान दोनों के पास गैर मामूली क़ुव्वत है पर फिर भी वो अपने आप की निश्चित तशरीह नहीं कर सकते, जैसे कि उनका वजूद क्यों है। इस क्यों को जानने के लिए ही  3 तरीके उभर कर आये थे। 
 
पहला साइंस या फलसफे से। यानी अक़ल के ज़रिये. तजुर्बों और सोच-विचार के ज़रिये. इस हुनर में से साइंस ने इस सवाल पर बहुत पहले ही काम करना छोड़ दिया था। 

दूसरा तरीका। इस क्यों का जवाब पाने के लिए ही बहुत पहले तसव्वुफ़, सूफीवाद, मिस्टिसिज़्म, रहस्यवाद की पैदाइश हुई। यानी क्यों का जवाब अपने बातिन से, इनरसेल्फ से लिया जाएगा। यानी बाहर की बजाय अपने अंदर की सैर की जाएगी। ये फ़न, बुद्ध और महावीर के वक़्त में मक़बूलियत पाते हुए, फिर यूनानी फलसफे का सफर तय करते हुए, इस्लामिक देशों में सूफ़ीइज़्म की शक्ल में अपने चरम पर पहुंचा।

तीसरा और आखिरी तरीका है कि बनाने वाले से ही पूछ लिया जाए कि क्यों बनाया है। यंही से खुदा, मज़हब और रिसालत का कांसेप्ट सामने आ जाता है। जैसे कोई नया प्रोडक्ट बनाने के बाद उसका एक मैन्युअल तैयार किया जाता है और उसे क्या करने के लिए बनाया गया है, उसका डेमो देने के लिये एक रिप्रेजेन्टेटिव को एग्जिबीशन में खड़ा कर दिया जाता है। उसी तरह किताब एक मैन्युअल का काम करतती है और पैग़म्बर, रिप्रेजेन्टेटिव का। सबसे सही तरीका यही है, इस क्यों का जवाब पाने के लिए। आमतौर एक आम आदमी का पहले दो तरीकों से न तो कोई खास राबता होता है और न उनके लिए वक़्त-रूचि.

● साइंस ने अभी तक ख़ुदा को अपनी रिसर्च का टॉपिक नही बनाया है। आज तक ख़ुदा का वजूद जानने के लिए कोई रिसर्च शुरू नहीं कि गई है। क्योंकि साइंस अभी इतनी एडवांस नहीं हो पाई है कि उसे देख या सुन सके। और जब रिसर्च कर ही नहीं पाए है तो फिर वो खुदा का इनकार भी कैसे कर सकते है, जबकि अभी तो हमने इस क़ायनात का 1% भी नहीं जाना है। धरती और समुंदर के ज़्यादातर अंदरूनी भाग आज भी हमसे अनजान है। सच्चाई ये है कि साइंस ने ख़ुदा को कभी नकारा ही नहीं है।

कुछ साइंसदान ज़रूर खुदा का इनकार करते है पर इसके लिए वो कोई सबूत देने की बाजाए अपना मौकिफ़ बताते है। और साइंस मौकिफ़ से नहीं बल्कि तजुर्बों से चलता है जिसे लेबोरेटरी में टेस्ट किया जा सके और खुदा के मामले ये फिलहाल नामुमकिन है। जब तक ऐसे कोई तकनीक हम हासिल नहीं कर लेते तब तक इनको भी गैर जानिबदार रहना चाहिए। न्यूटन, आइंसटीन, पास्चर, कलाम वैगरह जैसे साइंसदान ना-खुदा नहीं रहे है।

● असल में साइंस भी ख़ुदा और क़ायनात को जानने का एक तरीका ही है। ख़ुदा के बनाये क़ुदरत के वो कानून जो हमने खोज लिए है वही साइंस है। और बहुत से कानून आइंदा भी खोजे जाएंगे। 

आज मजीद तहक़ीक़ात के बाद साइंसदान ये कह रहे है कि यह क़ायनात एक इंटेलिजेंट डिज़ाइन है.

जैसे हम बाहर की दुनिया का मुआयना करते है कि क्यों, कब, कैसे चीज़े बनी है ऐसे ही जब कोई अपने अंदर झांकता है तो जान जाता है कि वो बना हुआ है, बेबस और ज़हीन है। 

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खुदा, किताब, मज़हब, बातिन, ख्वाहिशहात, अमरता में रिश्ता


कोई 'मज़हब के ख़ुदा' का इनकार कर सकता है मगर कायनात के खालिक़ का नहीं।
 
◆ फूलों को समझने के लिए बोटनिस्ट को फूल को बर्बाद करना पड़ेगा। वो उसपर काम करेंगे और जानकारी हासिल हो जायेगी। पर फूल खत्म हो जाएगा। इलहाम इस कमी को पूरा करता है और बिना किसी नुकसान हुए जानकारी देता है।
 
 ◆ वैज्ञानिक पहले एक ह्यपोथसीसी बनाते हैं यानी फ़र्ज़ करते है। फिर उस पर रिसर्च करते हैं। ऐसे ही फ़र्ज़ कर लो कि खुदा है। अब रिसर्च करो। क़ुरान को खुदा की किताब फ़र्ज़ करो। अब इसके मौजज़ात देखो।
 
●  मज़हब से हमरा ताल्लुक़ ज़िंदगी की वजह से नहीँ बल्कि मौत की वजह से है। जैसे डॉक्टर बीमारी से नही बल्कि सेहत से जुड़ा हुआ होता है। मज़हब मौत से इस तरह जुड़ा हुआ है क्योंकि सवाल पैदा होता है कि मौत पर ज़िंदगी खत्म होती हैं या नहीं। मौत के बाद भी दो ही रास्ते है। पहला की मर कर भी ज़िंदगी आगे चलेगी। दूसरा मौत के बाद दुबारा ज़िन्दगी नहीं है। दोनों ही सूरतों में आस्तिक फायदे में हैं और नास्तिक असमंजस में. 

● कायनात में मौजूद हर चीज़ अपना अस्तित्व रखती है, वो सभी सच हैं तभी तो पाई जाती हैं। जैसे उड़ने का ख्याल मौजूद था, तो क़ायनात में भी उसके लिए एक कानून मौजूद था, जिसे हमनें पा लिया। जैसे प्यास है तो पानी भी मौजूद है। यानी पानी की बजाए अगर इंसान को जीने के लिए कुछ और चाहिए होता तो वो भी इस कायनात में मौजूद होता। मुझ में खैर और शर का शऊर मौजूद है अगर उससे दुनिया में कुछ हासिल नहीं होना था तो वो होता ही नहीं यानी इस कायनात में उसका वजूद ही नहीं होता। जो भी आप सोच/विचार कर पा रहें, उसको पूरा करने की चीज़ें इस कायनात में मौजूद होनी चाहिए और हैं. यही खुदा का कानून है। 
 
हमारी इन्साफ पाने की और अमर होने की ख्वाहिश है जो दुनिया पूरी नहीं होती दिखती। हर इंसान चाहता है कि वो न मरे, हमेशा जिये। ऐसी ही और भी कई खवाहिशें हैं। अगर 'मौत के बाद ज़िन्दगी ना होना'  सही है तो ये साबित हो जाएगा कि हम इस जिंदगी से कंपेटिबल नहीं है, हम बेबस है,  ये ख्वाहिश/विचार कभी पुरी नहीं होने हैं. अगर ऐसा है तो दुनिया में ये ख्वाहिश/विचार/चाहने की ताकत होती ही नहीं. ये हैं तो यकीनन इसी कायानात में इनका पूरा होना भी मुमकिन है. 

● मौत के बाद ज़िंदगी न होने के, केस में मेरा बातिन यानी इनर्सेलफ मर जाएगा है जिसमें ख्वाहिश/चाहतें मौजूद हैं। इसीलिए इनके पूरा होने के लिए मरने के बाद भी बातिन ज़िंदा रहना चाहिए। 

क्या हमारा बातिन हमारे पैदा होने से पहले भी मरा हुआ था? हाँ, मगर इस्लाम कहता है कि हमारा बातिन पहले भी जिंदा हुआ था (अहदे अलस्त में) । बल्कि जिंदगी की शुरुआत तो यंही से मानी जाएगी। 
 
● अगर किसी की खुदा बनने की ख्वाहिश हुई तो ज़ाहिर है वो अपनी जन्नत/दुनिया के लिए खुदा समान ही होगा. जो चाहेगा, वो कर पायेगा. मगर वो असली खुदा जैसे नहीं होगा क्योंकि इम्तिहान का लेवल उस लायक नहीं रखा गया था और ना रखा जा सकता. इन्सान की अक़ल महदूद है. बहुत कुछ उसे वँही समझ आएगा.   

बाकी कभी और...
 
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सनातन धर्म के 5 आधार: आत्मा, परमात्मा, पुनर्जन्म, स्वर्ग और नरक.

इन्हें हम विज्ञान की भाषा में समझेंगे. साइंस में थ्योरी, लॉ, ह्य्पोथिसिस होते हैं. लॉ बिलकुल कन्फर्म सिद्धांत होते हैं. थ्योरी अक्सर स्वीकार्य और स्थापित थ्योरी होती है हालंकि कुछ अन-कनफर्म्ड लॉ भी होते हैं. ह्य्पोथिसिस अपने नाम से ही स्पष्ट है.

धार्मिक ग्रंथों के वो अंश जो विज्ञान के नियमों के विरुद्ध नहीं है यानी जिन पर दोनों ओर से सहमति हैं, उन तथ्यों को धर्म समझाने के लिए आस्तिकों से सामने रखने में किसी को कोई समस्या नहीं होनी चाहिए.

सबसे पहले हम ये मान लेते हैं कि धर्म या ईश्वर नहीं हैं और केवल विज्ञान है. इन्सान एक बायोलोजिकल मशीन है और फंक्शन कर रही है. अचानक ये मशीन रुक जाती है और काम करना बंद कर देती.  पार्ट्स में खराबी के कारण मशीन में डिफेक्ट आ गया है यानी एक इंसान ब्लड क्लोटिंग या हार्ट फैल के कारण मर गया. डॉक्टर से कहा गया कि इस मशीन को रिपेयर कर दीजिए यानी इसकी खराबी (वीन्स से ब्लड क्लॉट)  निकाल दीजिए या फैल हुआ पुर्जा (हार्ट ट्रांसप्लांट) बदल दीजिए.  डॉक्टर ओपरेशन करता है मगर फिर भी इन्सान ज़िंदा नहीं होता.  डॉक्टर कहता है कि अब इसे दुबारा चालु स्तिथि में नहीं लाया जा सकता जैसे इन्सान की बनायीं हुई मशीनों को लाया जा सकता है (पार्ट्स रिपेयर या रिप्लेसमेंट के बाद). डॉक्टर से कहा जाता है कि जब बिजली कट होने पंखा बंद हो जाता है और बिजली आने पर चालू हो जाता है तो इसको भी हो जाना चाहिए.  आखिर हम मशीन भी तो एनर्जी इस्तेमाल करते हुए काम कर रहे हैं. असल में शरीर से निकल गयी है वो आत्मा है दुबारा नहीं आ सकती.  विज्ञान के अनुसार यही आत्मा ऊर्जा है.  कार्य करने की क्षमता को ऊर्जा कहते हैं.  पुराने ज़माने में ऊर्जा नाम का शब्द या कांसेप्ट नहीं था तो उर्जा को ही आत्मा कह देते हैं.  इसे ऊर्जा, आत्मा, रूह, सोल कुछ भी कह सकते है. इसी शक्ति से ही शरीर चल रहा है.  धर्म के अनुसार ये शक्ति आत्मा है.  

जब ऊर्जा है तो परम ऊर्जा भी होगी. यानि एनर्जी है तो सुप्रीम एनर्जी भी होगी.  जैसे बिजली है तो बिजली का मुख्य उत्पादक या स्रोत भी होता है.  जैसे बिजली जेनरेटर या ट्रांसफारमर होता है.   तमाम ऊर्जा को स्रोत परम ऊर्जा है.  ऊर्जा आत्मा है तो परम ऊर्जा या सुप्रीम एनर्जी ही परम आत्मा है यानी परमात्मा.  

विज्ञान कहता है कि उर्जा को न तो पैदा किया जा सकता है और न ही उसे समाप्त किया जा सकता है, उसे बस रूपांतरित किया जा सकता.  यानि ऊर्जा या आत्मा, शरीर से निकल कर कंही न कंहीं तो रहेगी. इस यूनिवर्स में रहेगी तो कभी mass में  भी बदलेगी जो कि साइंटिफिक लॉ है E=MC2(Square). इसलिए ऊर्जा कभी समाप्त नहीं होगी और कभी मैटर की फॉर्म लेगी. यही पुनर्जन्म है.

इस ब्रह्माण्ड में दूसरी जगह भी जीवन हो सकता है, विज्ञान इसका इंकार नही करता बल्कि उसे ढूँढने में लगा है.  दुसरे गृह पर जीवन होने की शर्त है की उसका सूरज उससे उचित दूरी पर हो और वंहा पानी उपलब्ध हो. यही जीवन परलोक (स्वर्ग व नरक) है.

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माँ के पेट में जुड़वाँ बच्चों की चर्चा

एक मां के पेट में जुड़वा बच्चे थे। एक ने दूसरे से पूछा: क्या तुम इस गर्भावस्था के जीवन के बाद के जीवन में विश्वास रखते हो?

दूसरे ने कहा: बिल्कुल क्योंकि हम यहां इसलिए है ताकि ख़ुद को आने वाली जीवन के लिए तैयार कर सके। वंहा पैरों से चल सके, मुंह से खा सके और खुली सांस ले सके। वंहा ऐसी चीज़ें होंगी जिनके बारे में हमें अभी कुछ समझ नहीं है और जो हमनें आज तक देखी भी नहीं है जैसे शायद जहाज़, फ़ोन या बिल्डिंग्स, पहाड़, समुद्र, आसमान, सूरज, चांद, कपड़े, स्वादिष्ट खाना आदि।

पहले ने कहा: अगर बाहर ज़िन्दगी है तो कभी कोई वहां से वापस क्यों नहीं आया?

दूसरा बोला: यंहा वापिस आना नामुमकिन है। ये जगह थोड़े समय बाद समाप्त हो जायेगी। पर वंहा असल जीवन है। वंहा हमें हमारी मां मिलेगी और वही हमारी देखभाल करेगी।

पहला ने कहा: अगर माँ जैसी कोई चीज़ है तो वो कहां है? न नजर आती, न बात करती। वो हमें ऐसे अकेला ना छोड़ती।

दूसरा बोला: मां हमारे चारों तरफ है। हम उसकी वजह ही से यंहा है। वो न होती तो हम भी नहीं होते। अभी दिख नहीं रही पर ध्यान से महसूस करो तो उसका अहसास होता है। खामोशी से सुनो तो उसकी धड़कन और आवाज़ भी सुनाई देती है।

पहले ने कहा: ये सब फालतू बाते हैं। मेरी तजुर्बा ये नहीं मानता। ये बातें अवैज्ञानिक और अंधविश्वास है।

दूसरे ने कहा: ठीक है। न मानों। कुछ महीने बाद अपने आप पता चल जाएगा।
 
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How Energy is not the Creator?
 
There are two narratives on the creation of universe. One is that it has a creator. The second is that it is the creator of its own. The basic element of universe is energy. The energy has power to create the universe. Matter, light, heat all are energy. Is energy self sufficient, self conscious? No, because energy can be controlled by humans in numerous ways. It cannot save itself from the grip of humans. Energy can not be created or destroyed. It means that no scientific mechanism about creating it has been found. So it means that universe is not created and it is eternal as energy is uncreated but the creation of universe is said to be begun. The issue is that where is the mind behind this creation process. If you have not find such mind till date, it means that you are just discovering the laws of nature how its running. Humans are able to convert energy forms because there is a mind, intellect, conscious behind this work. Only religion give its answer, you can raise question on it but you can not give another explanation.
 
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● Science deals with what is tangible and observable—it explains things that can be tested and experimented upon. Paranormal events, creatures, or experiences, such as Jinns or Spirits, currently lie outside the scope of scientific investigation because they cannot be reliably observed, measured, or replicated in controlled settings. However, this doesn't mean they are definitively false—only that they haven't been scientifically verified yet. Perhaps in the future, as science advances, we may develop the tools or understanding needed to explore such phenomena more deeply. Presently, science does not have an answer to Jinns or Spirits. But scientists have it, they say that all this is a lie. This means that scientists have surpassed science this way.
 
● New research suggests death may not be the end, but a shift in consciousness within a multiverse shaped by the observer. Biocentrism theory suggests that life and consciousness are not accidental byproducts of the universe, but rather its very foundation. Proponents argue that what we perceive as death is only a transition—a change in our conscious experience—within a reality shaped by the observer. Life may persist in a dimension beyond time—within an interconnected multiverse where all possibilities coexist. This view is hinting at a universe where death isn’t final but part of a broader, ongoing continuum of awareness.
 

● The anti-universe theory suggests that there might be a "mirror universe" that is the opposite of ours. This idea comes from a rule in physics called CPT symmetry, which says that if you flip certain things—like charges (positive to negative), directions (left to right, like a mirror), and time (running backward)—the laws of physics would still work.The anti-universe could be like a reflection of our universe, running backward in time. While our universe is mostly made of matter (like the stuff we're made of), the anti-universe would be made of antimatter, which is the "opposite" of matter. Anti-universe might have existed "before" the Big Bang or even exists alongside our universe, balancing things out.

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Big Crunch theory says that after expansion, the universe may collapse inward, like a folded scroll.
Quran: The Day We will fold the heaven like the folding of a (scroll) for the books.
 
● Scientists have now found all of the DNA and RNA bases in meteorites. The discovery strengthens the idea that some of life’s fundamental building blocks may have arrived on Earth via space rocks. Alongside the crucial genetic bases, they also found amino acids and nucleobase isomers, compounds not present in nearby soil samples—supporting their extraterrestrial origin. The findings suggest Earth may have inherited life’s raw ingredients from interplanetary debris. 
 
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कुरान 2:97: जिबरील ने तो उसे (कुरान) अल्लाह ही के हुक्म से तुम्हारे (नबी) दिल पर उतारा है. जो उसी के अनुकूल है जो तुम्हारे दिल में पहले से मौजूद थी.

कुरान 41:30-31: उन पर फ़रिश्ते उतरेंगे... और कहेंगे हम सांसारिक जीवन में भी तुम्हारे सहायक थे और आख़िरत में भी हैं। और जो कुछ तुम्हारा जी चाहेगा, वह उसमें तुम्हारे लिए होगा और जो कुछ तुम चाहोगे, वह उसमें तुम्हारे लिए होगा। 

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Thursday, 13 January 2022

दूसरे पति से तलाक से पहले अनिवार्य सहवास बताने वाली हदीस का जायज़ा।



3 तलाक और हलाला।

क़ुरान में 3 अलग अलग तलाक और बाद चौथे तलाक के लिए ये शर्त है की वो सामान्य हो या प्राकृतिक कारणों से हो यानी किसी फायदे के, अनुबंध, प्री प्लान आदि के तहत न हो। क़ुरान ने इस चौथे तलाक के लिए सेक्स होना ज़ुरूरी जैसी कोई शर्त नहीं बताई हैं। इसलिए ये बिना सेक्स के भी हो सकता है। पर नबी ने एक हदीस में बात कह दी है जिसे बाद में मुस्लिम ने शर्त बना लिया जबकि नबी ने खुद अपने मुंह से शर्त जैसे अल्फाज़ नहीं कह थे। कुरान में (2:232) अल्लाह ने फरमाया कि जब तुम्हारी बीवियाँ इदत खतम होने के करीब पहुँचें तो उन्हें उनके भावी पतियों से शादी करने से न रोको।


तलाक के लिए सहवास के अनिवार्य कहने वाले हदीस का जायज़ा।

हदीस की विभिन्न किताबों और सही मुस्लिम में ही इस हदीस के कई तुर्क या संस्करण है। इस हदीस के सारे तुर्क और पसमंज़र जानना ज़रूरी है।  मैं उन सभी हदीस के शब्द यंहा रख रहा हूँ। उसमें कहा गया है की...

एक औरत तमीमा  मुहम्मद साहब के पास आके कहती है कि उसके पति रिफात ने उसे 3 तलाक दे चुके थे (3 अलग अलग) और उसने एक दुसरे मर्द ज़ुबैर से शादी कर ली पर ज़ुबैर के पास जो कुछ है वो इस कपडे के झालर या डोरी के समान है (यानी यौन रूप से कमज़ोर है - ये बात एक कहने की स्टाइल है)। इसे सुन के नबी ने मुस्कुराते हुए पूछा कि यानी तुम वापिस रिफात से शादी करना चाहती हो। और फिर आगे कहा कि पर ये तुम तब तक नही कर सकती जब तक तुमने उसकी (वर्तमान पति) और उसने तुम्हारी मिठास या शिरिनी न चख ली हो (यानी जब तक अकृत्रिम, विशुद्ध और संतोषजनक शारीरिक संबंध न बना लो)। [सहीह मुस्लिम]


बुखारी का एक और तुर्क बताता है की इस शिकायत के वक़्त जुबेर नबी के पास आते है, अपने दोनों बच्चो को साथ लेके जो उनकी दूसरी बीवी से हुए थे. तमीमा की बात पर जुबेर ने कहा की यह झूठ बोल रही है और मैं इतनी कुव्वत वाला हूँ की इसको भली भाँती संतुष्ट कर सकता हूँ पर यह एक अवज्ञाकारी पत्नी है और अपने पूर्व पति के पास वापिस जाना चाहती है. इस पर नबी ने तमीमा से कहा की अगर यह तुम्हारी मंशा है तो तुम तब तक पूर्व पति से विवाह नहीं कर सकती जब तक जुबेर से शारीरिक संबध न बना लो। [बुखारी : 5825]


हदीस का निष्कर्ष। 

इससे स्पष्ट है की तमीमा झूठ का सहारा लेके शादी तोडना चाहती थी, यंहा तक की अपने वर्तमान पति का चरित्र हनन तक कर रही थी और झूठ का सहारा लेके उनकी मर्दानगी का मज़ाक उड़वा कर.  इसी झूठ और बुरी मंशा के कारण नबी ने ऐसी शर्त रखी. शुध्द इच्छा से शारीरिक संबंध बनाने को क्यों कहा गया है, ये बात सहीह मुस्लिम में शरह (व्याख्या) में ही बताया गया है की जुबेर के पहली बीवी से बच्चे थे यानी उनके कमज़ोर होने की बात में सच्चाई कम थी और उनकी पत्नी द्वारा ऐसी बात कहने के पीछे अन्य कारण थे। दूसरी बात, तमीमा का दिल दूसरी शादी के बावजूद अपने पहले पति रफात पर अभी भी था।  इसीलिए वह दूसरे पति के साथ खुशदिली के साथ संबध नहीं बनाती थी और उन्हें दिल से पति भी नहीं मान पाई थी जिससे उसे शारीरिक तसल्ली नहीं होती थी। यानी ये मालूम हुआ की उस औरत की पहले पति से मुहब्बत खतम नहीं हुई थी और उसका मन पहले पति पर ही अटका था। वह शादी (वो भी दूसरी) की पवित्रता नही समझ पा रही थी और अपनी मानसिक स्तिथि के कारण शारीरिक सुख से दूर थी। इसलिये नबी ने फरमाया की तुम भी मिठास चखो और पति को भी चखने दो ताकि एक दूसरे को करीब से जान पाओ और दिल से एक दूसरे को पति पत्नी मान पाओ और फिर उसके बाद भविष्य में साथ रहने या न रहने का फैसला करो। न कि दूसरे पति को करीब से जाने बिना या उसकी अच्छाईया आदि जाने बिना ही उससे तलाक ले लो। हो सकता है दुसरा पति, पूर्व पति से हर लिहाज से अच्छा हो। और ये तभी पता लग सकता है जब शादी के रिश्ते को सच्चा व्यवहारिक रूप दे सको। इसलिय हदीस के एक तुर्क (बुखारी: 1433f) में आता है की नबी ने फरमाया की जब तक तुम्हारा पति वैसे ही मिठास न चख ले जैसे की पूर्व पति ने चखी थी.

हदीस में एक दूसरे की मिठास यानी हलावत चखने (तर्जुमे में लुत्फ शब्द है) की बात आई है यानी दोनों की खुशनुमा वांछित सेक्स की, जो अरबी ज़ुबान का एक तरीका है। जैसे कुरान में इसी संदर्भ में आदम और हव्वा के साथ शजरे की बात कही गई है। दूसरी बात ये बात 1400 पहले कई मर्दो के सामने कही जा रही एक औरत से तो इससे बेहतर और कैसे कह सकते है, ये शैली कोई गैर अरबी ज़ुबान वाला जल्दी से नही समझ पायेगा। 

इस वाकये के वक़्त दरवाज़े पर खालिद बिन बाज़ खड़े थे जो अपने मुक़द्दमे की बारी का इंतेजार कर रहे थे। उस औरत की सेक्स के बारे में नबी के सामने इतनी बेबाकी से कही बात सुन के उन्होंने अबु बकर से ऊंची आवाज में कहा कि तुमने सुना ये औरत कैसे नबी से खुल्लम खुल्लम ऐसी बात कह रही है, तुम उसे डांटते या रोकते क्यो नही। यानी वंहा मौजूद लोगों को तमीमा एक अशालीन और बोल्ड स्त्री लगी जो सबके सामने तलाक के लिए ऐसा कारण दे रही थी। इसीलिए इन चीजों से ये बात साफ हो जाती है कि शादी तोड़ने का असल मक़सद शारीरिक संबंध नहीं बल्कि कुछ और ही था।
 
इस हदीस पर एक मत यह है कि असल में यह हदीस तो उलट हलाला को रोकने के खिलाफ है क्योंकि इसमें कोई शर्त नहीं लगाई गई है बल्कि एक असंभवता बताई गई है। असल में पत्नी को अपने पति से संबंध बनाने को कहा जा रहा है जो कि असंभव होगा क्योंकि पत्नी का ही कहना है कि उसका पति नामर्द है।
 
हम जानते है कि फैसले के वक़्त नबी सभी पक्षों को देखते थे, अपने साथियों के चरित्र व्यक्तित्व को समझते थे, अपने आस पास के लोगो के जीवन मे हो रही समस्याओं आदि को जानते थे, इसलिए उन्होंने इन जोड़े को ऐसी हिदायत दी, न कि सीधा सीधा अलग हो जाने को कहा।  इन सब बातों से यही ज़ाहिर है कि नबी, उनके साथीयो, वंहा मौजूद अन्य लोगों को तमीमा, रिफात और जुबेर के व्यकितगत जीवन आदि की जानकारी थी कि कौन, कैसा क्या है और उनकी मंशा समस्या आदि क्या है।

मुहम्मद साहब की रुचि किसी की शादी टुटवाने में नहीं थी और न ही जबरस्ती चलवाने में। वो शादी ब्याह को मामूली कॉन्ट्रैक्ट नहीं मानते थे और न ही वह अपने साथियों और परिचितों के चरित्र, जीवन आदि से अंजान थे। वो मुकद्दमों के दोनो पक्षों की पूर्ण जानकारी रखते थे या मालूम करके ही फैसले देते थे। आप 1400 साल पूर्व के एक पिछड़े समाज में ढके छुपे और खुले अल्फ़ाज़ दोनो तरह से, मौका और महल देख के ईस्तमाल करते थे जिनमें अक्सर अरबी ज़ुबान के कहावते, मुहावरे आदि का भी इस्तेमाल होता था जो आज गैर अरबी लोगों को अजीब लग सकते है। पर हर भाषा मे बात कहने के ऐसे तरीके या अंदाज़ होता है। 


नतीजे और फतवे।

बाद में मुस्लिम लोगों ने इस हदीस से ये रिज़ल्ट निकाला कि सेक्स के बाद ही तालक हो सकता है। कुछ ने ये भी माना है कि सेक्स में संतुष्टि या पतन भी अनिवार्य है। हालांकि ये मत बिल्कुल गलत और अतार्किक है। क्योंकि ये केस टू केस तो निर्भर करता है कि इसे अनिवार्य करें या वैकल्पिक। बुखारी (5792) के ही एक तुर्क में आता है की इसके बाद यह शर्त एक परम्परा बन गयी. यानि की इसके पहले ऐसा कोई प्रावधान नहीं था.  ज़ाहिर है की ये परम्परा लोगो की गलत समझ के कारण शुरू हुई.

सईद बिन मुसय्यब जो नबी की अगली ही पीढ़ी में एक ताबेईन और विद्वान थे। उन्होंने इस हदीस को मद्देनजर रखने के बावजूद, तलाक के लिए सेक्स करना अनिवार्य नही माना है। यानी सिर्फ निकाह के बाद चौथा तलाक हो जाय तो पूर्व सपॉउस से शादी कर सकते है। 

महान विद्वान शेख इब्ने तैमिया ने अल फतवा अल कुबरा (6/301) में इस हदीस पर लिखा है कि समान्यता औरत पति से तलाक नहीं चाहती और अगर हो जाये, तो किसी दूसरे व्यक्ति के साथ रहने की बजाय पूर्व पति के पास ही वापिस जाना चाहती है।

विद्वान इमाम अल क़य्यिम ने ईलाम अल मुवक़्क़ीईन (4/45-46) में लिखा है कि पूर्व पति के पास वापिस जाने की ऐसी इच्छा स्त्री की दूसरी शादी से पहले से भी हो सकती है और बाद में भी उतपन्न हो सकती है। कोई दूसरा पति एक तलाकशुदा से शादी करके पत्नी को पूर्व पति के पास जाने देता है या पूर्व  पति, अपनी तलाक़शुदा पत्नी की शादी दूसरे से सिर्फ इसलिए करवाता है कि फिर वो उसके पास वापिस आ जायेगी (यानी कॉन्ट्रेक्चुअ या प्री प्लांड हलाला) तो ये हराम या दंडनीय है। 

अल क़य्यिम का अर्थ ये है कि जब शादी एक पवित्र रिश्ता है और दूसरे व्यक्ति ने किसी दुर्भावना से शादी नही की है तो उसका अधिकार है कि वो अपनी शादी को न टूटने दे और पूरी कोशिश  करे उसे निभाने की। यानी बात बात पर तलाक ने दे, हालांकि बहुत मजबूरी हो जाय तो फिर अलग हो सकता है। यही कारण है जुबेर ने तलाक नहीं देनी चाही और न ही नबी ने दिलवाई क्योकी शादी कोई मज़ाक नही की पहले 3-3 तलाक दे दो और फिर चौथे तलाक के बाद वापिस उसी 3 तलाक दिए बंदे के साथ रहना चाहो। ऐसा व्यवहार या तो नासमझी है या चालाकी। हो सकता है, तमीमा या उसके पूर्व पति की भी ये कोई चालाकी रही हो, ईश्वर जाने।

इब्न अब्दुल बर्र ने भी अल तमहीद (13/227) में इस हदीस पर यही राय रखी है कि स्त्री की दूसरी शादी के बाद पूर्व पति के पास जाने की इच्छा का दूसरी शादी या रिश्ते पर फर्क नहीं पड़ता और इसमें दूसरे पति का कोई दोष नही माना जायेगा। 

यानी विवाह की पवित्रता के आधार पर अब रिश्ता दिल से निभाया जान चाहिए और उसकी इच्छा मात्र पर नया रिश्ता यूंही खत्म न कर दिया जाय। हाँ, अगर सारे प्रयत्नों के बावजूद न निभाया जा सके तो अलग हो जाय।


शरीयत, हदीस शास्त, परम्परागत धर्म, नबी के किरदार पर हदीसें.

 
शरिया या इस्लामिक कानून का स्रोत।

इस्लाम के तमाम हलाल और हराम क़ानून केवल और केवल क़ुरान में है। उन क़ानूनो का व्यवहारिक रूप या किर्यान्वन मुहम्मद साहब ने अपने समय में आने वाले मुकद्दमों में कर के दिखाया। इन मुकद्दमों में आप ने हर पहलू की जांच परख के बाद अपने फैसले दिए, क़ुरान के अनुसार। जैसे चोर की सज़ा हाथ काटना है परंतु ये अंतिम और कठोरतम सज़ा है। नबी और मुख्य खलीफाओं ने चोरों को उनकी स्तिथि, नियत, चुराए समान का मूल्य आदि जैसी ढेरों बातों को मद्देनजर रखते हुए, कभी हाथ काटने की सज़ा दी और अक्सर नहीं काटने की भी दी। यहाँ तक कि बाज़ वक़्त माफ भी किया गया। ज़ाहिर है चोरी की गंभीरता और घटना की स्तिथि आदि के आधार पर ये फैसले होते है जिनमें  मिनिमम से मैक्सिमम तक सज़ा दी जा सकती है, माफी के अलावा। हज़रत अली ने फरमाया है कि अगर कोई भूख के कारण चोरी करे तो चोर की बजाय हाकिम (जिसकी हुकमत हो) के हाथ काटने चाहिए। 


हदीसों का अर्थ और इतिहास।
 
मुहम्मद साहब कहा करते थे की मेरी बातें न लिखा करो और कभी लिखने भी देते थे.  वजह यह थी कि कुरान को सही सलामत याद या रिकॉर्ड करने का अमल जारी था. उस वक़्त कुरान नाजिल हो रहा था और आप यह चाहते थे की आपकी केवल वही बाते रिकॉर्ड हो पाएं जो अल्लाह कुरान के रूप में महफूज़ करना चाहता है और उनमें अल्लाह के कलाम के अलावा मुहम्मद साहब की बात शामिल न हो जाए. आपके जाने के बाद आपकी कही बातें लोग बयान करने लगे थे और क्यूंकि यह बातें नबी की थी इसलिए इन बातों को बयान करने वाला पूरी चैन बताकर बयान करता था की किसने किस से सुनी.  लोग आप से इतनी मुहब्बत करते थे की आपकी बातें याद करने, आगे बढाने और फ़ैलाने का काम करते थे.  लगभग 2 सदी तक ये कौल (जिन्हें हदीस कहा जाने लगा) यूँही चलती रहें.  इतिहास भी ऐसे ही आगे बढ़ता हैं (कुरान की कीरातें भी यूँही आगे बढ़ी हैं).  इन हदीसो में बहुत सी बातें मिलावट हो गयी और जब यह महसूस हुआ की इन असल और झूठी फैली हुई हदीसों को अलग- अलग करना ही पड़ेगा तो इस पर तेहकीक का काम शुरू हुआ और बहुत से हदीसों के आलिम या इमाम दुनिया के सामने आये.  इन इमामों ने हदीसो को कुछ उसूलों की बुनियाद पर छांट कर अलग कर लिया. यह उसूल खुद के ही बनाए हुए थे और सभी को स्वीकार थे मगर बाज़ वक़्त इमामों के उसूलों में फर्क भी होता था.  उनके ज़माने इतना रिकॉर्ड और इतने स्रोत उपलब्ध नहीं थे जितने आज हमारे दौर में हैं इसलिए हम दीन और मजीद तहकीक कर सकते हैं.


हदीसों की व्याख्या।

नबी के वचनों से प्रेम के अलावा, हदीसों को संजोने का उद्दश्य उनसे अपनी मुकदमो के हल निकालना भी होता था। इसीलिए उनको विषय के आधार पर बाब जैसे सेक्शन में बांट कर हदीस की किताब में रखा जाता है।  हदीस नबी की एक घटना या वक्तव्य का उनके साथियों के लफ़्ज़ों में एक चित्रण होती है। उनमें बेशक असल अल्फ़ाज़ ही रिकॉर्ड करवाए जाते थे। हालांकि विद्वानों का मानना है कि बाज़ वक़्त असल अल्फ़ाज़ की बजाए बात कहने वाला अपने लफ़्ज़ों का प्रयोग भी अपनी याददाश्त के हिसाब से करते थे जबकि उनकी ऐसा करने की कोई जानबूझ कर इंटेंशन नही होती थी, हालांकि इनमें मुद्दा पूरा बयान होता था। इसलीए हर हदीस में पूरी बात यानी एक एक शब्द क्या कहे गए थे, ये रिकॉर्ड नहीं होता। वाकये की बात करे तो किसी हदीस में एक वाक्य पूरा बयान हुआ होता है, किसी मे आधा, किसी मे इससे भी कम। अक्सर हदीसों में केवल मूल बात या वाक्य ही बयान कर दिए गए है। इसका कारण भी वही है कि रावी या बयान करने वाले को कितनी बात याद है, किसी उद्देश्य के तहत पूरा वाकया याद है या केवल कुछ शब्द याद रह गए है जैसी बातों पर निर्भर करता था। हालांकि एक हदीस के सारे तुर्क (संस्करण) एक साथ रख के देखने पर पूरा मुद्दा या बात स्पष्ट हो जाती है। पर फ़ीर भी वो हमें हर हदीस के समय, स्तिथि, माहौल, लफ़्ज़ों तक 100% तक नहीं पहुँचा सकते। ये असंभव है। ऐसा बाज़ हदीसों में संभव हो सकता है पर हर हदीस में नहीं। आखीर हदीस कोई टाइम मशीन नही। आम किताबो और वेबसाइट पर हदीसों के बैकग्राउंड आदि लिखे नही होते। जबकि हदीसों की मूल किताबो में ये बैकग्राउंड, विषय, उस हदीस से संबधीत अन्य हदीसे, नोट्स आदि मिल जाते है जिससे बात काफी हद तक साफ हो जाती है। इसलिए हदीस की उचित व्याख्या किताब और विद्वानों से ही ली जा सकती है अन्यथा रिज़ल्ट और फ़हम गलत निकलने लगते है। ये भी सत्य है कि कुछ हदीसों में मिलावट भी हुई है।
 

मुहम्मद साहब के कानूनी फैसले।

मुहम्मद साहब एक धार्मिक, सामाजिक और राजनैतिक लीडर और व्यक्ति थे। उनकी रुचि एक अहित करने और दूसरे को हित पहुँचाने में नही थी। न ही वो किसी अन्याय का समर्थस करते थे और न ही वह अक्सर अपने परिचितों और मुक़द्दमेदारों के चरित्र, जीवन आदि से अंजान थे। लोग उनके पास अपने फेसले करवाने आते थे। वो दोनो पक्षों की पूर्ण जानकारी रखते थे या मालूम करके ही फैसले देते थे। आप 1400 साल पूर्व के एक पिछड़े समाज में ढके छुपे और खुले अल्फ़ाज़ दोनो तरह से, मौका और महल देख के ईस्तमाल करते थे जिनमें अक्सर अरबी ज़ुबान के कहावते, मुहावरे आदि का भी इस्तेमाल होता था जो आज गैर अरबी लोगों को अजीब लग सकते है। पर हर भाषा मे बात कहने के ऐसे तरीके या अंदाज़ होता है। इसीलिए हदीसों में दिए गए फैसलों के संदर्भ, स्तिथि, रीजनिंग आदि को ध्यान में रख कर ही हदीसों से निर्णय निकालने चाहिए।
 
 
परम्परागत धार्मिक दर्शन.
 
क़ुरान हो या कोई और ग्रंथ या कोई लेखन, उसे करीब से क़रीबतर समझने के लिए ये जानना बहुत ज़ुरूरी है कि उस समय के लोग उसके बारे में क्या राय रखते थे या उससे क्या मतलब या आशय लेते थे। ग्रंथ लिखने या आगे बढ़ाने वाले भी क्या राय रखते थे। इसे जाने बिना उस ग्रंथ या लेखन या बात को समझना अनुमानों के समुंदर में अधिक ले जाता है। कंही कंही तो उस समय के लोगों की समझ में कोई कमी या गलती या अधूरापन हो सकता है पर हर जगह नहीं।  धर्म की मूल रूपरेखा को उसी परिपेक्ष में समझता हूँ जो नबी ने, उनके साथियों ने और उनके बाद कि कुछ नस्लो ने समझा। इसमे कुछ गलत अवधारणाऐं हो सकती है पर ये पूरी की पूरी समझ गलत नहीं हो सकती। इससे जानने के लिए हदीसों की आवश्यकता होती है। कुछ हदीसों में गड़बड़ी है पर सब में नही। उनका संदर्भ जानना बहुत जरूरी है। दिक्कत ये है कि हम क़ुरान को संदर्भों और बैकग्राउंड को जान कर पढ़ते है पर हदीसों को नही। अगर इस परंपरा को छोड़ दिया तो आप खुद के बनाये धर्म को मनाने लगोगे। जो पसन्द आया धर्म मान लिया, जो नहीं उसकी मन माफिक व्यख्या कर दी जैसे अहले कुरान। यही तो आर्य समाज करता है जिनके पास न गुरु शिष्य परमपरा है और न पौरणिक ऋषियो की अवधारणाओं से कोई संबध. मूल धर्म को समझने के लिए ये चैन पीछे तक ले जाना जरूरी है अन्यथा नव नव मत पैदा होते है जैसे अहले क़ुरान या आर्य समाज। यही मत इस्लाम और वैदिक धर्म की बुनियाद है। यही मत बुनियाद है.  यानी गुरु शिष्य या पौराणिक विचारधारा से मूल वैदिक धर्म या सल्फए सलीहीन (नबी, उनकी पीढ़ी और उनके बाद वाली दो पीढ़ी) के मनहज (मतों) से मूल इस्लाम धर्म को समझना. ये सर्वाधिक तार्किक मत है। 


नबी के किरदार पर कीचड़ उछालने वाली हदीसें या रिवायतें. 

हदीसों को उस दौर के लिहाज़ से तारीखी तौर पर देखना चाहिए और अपने मसाईल का हल निकालना चाहिए। हदीसों में लफ्ज़ या बात कहने में फ़र्क़ आ जाता है। कई हदीसों को देख कर साफ़ लगता है कि न जाने क्या बात कही गयी और न जाने किस गलत तरीके से बयान कर दी गयी है. इसलिए इन्हें सिर्फ लार्जली सिक्योर्ड रिकॉर्ड की तरह देखना चाहिए, क़ुरान के बराबर कभी नहीं। हदीसों को सही तरफ समझ कर अच्छी बातें निकाली जा सकती है और सिर्फ लफ़्ज़ों से बात के गलत मतलब भी निकाले जा सकते हैं। गलतियां निकालने वाले देखते ही हर चीज़ गलत निगाह से हैं। उनके लिए संदर्भ, दौर, हदीसों का असल मुक़ाम वगैरह जैसी बुनियादी बातें अहम नहीं है और न वो इन्हें जानना या समझना चाहते।

हदीसों में नबी की जाती जिन्दगी के बारे में बहुत सी भद्दी बातें, वाक्यात मौजूद हैं। एक हदीस में  हैज़ के दौरान ह. आयेशा की गोद में नबी के सर रखकर कुरान पढ़ने का ज़िक्र हुआ है. पुराने ज़माने में हर जगह हेज़ में औरतों को अपवित्र, अछूत माना जाता था, जो कुछ वो छू लें वो अपवित्र हो जाता था। भारत में तो रसोई तक में घुसने की आज्ञा नहीं थी, बल्कि घर के बाहरी हिस्से में भी ये दिन गुजारने के लिए भेज दिया जाता था और न जाने क्या क्या। यंहा धार्मिक क्रियाकलापों पर तो पहले से ही कई पाबंदियां थी और मासिक धर्म में ये और शदीद हो जाती थी। इसके ज़रिए ह. आयशा बता रही हैं कि पर नबी ऐसा नहीं मानते या करते थे, वो आपकी गोद में सिर भी रख देते थे, उन्हें छु भी लेते थे बल्कि मज़हबी कार्य भी कर लेते थे, वगैरह वगैरह। इसी तरह आप दोनों का एक ही बर्तन से नहाने का जिक्र मिलता है और नबी द्वारा ह. आयेशा को हैज़ में इजार पहनने का हुकुम देने का भी. 

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हदीसों में दोनों तरफ शिद्दत करने वाले गिरोह मौजूद हैं. एक वो हैं जो कोई भी हदीस नहीं मानता, दुसरे वो हैं जो सभी हदीसों को मानते हैं, तीसरे वो हैं जो सहीह हदीसों के कुरान के बराबर मानते हैं. 

साइंस, नेचर की बुनियाद पर सही सनद वाली हदीसों को भी रद्द करने वाले मुहद्दिस, उलेमा हमेशा से रहे हैं. जैसे इब्ने हर्ज अल अस्कलानी (14वी सदी) ने ह. आदम की उंचाई वाली हदीस को रद्द किया है और जैसे इब्ने उमर अल ज़मकशरी (11वीं सदी) ने कुरान की पहली नाजिल आयतों (इकरा) वाली हदीस को रद्द किया है. 
 
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हदीस शास्त्र

क़ुरान के खिलाफ होने के अलावा हदीसों को क़ाबिले एतबार मानने के लिए मैं आम तौर पर 3 बातों को बुनियाद बनाता हूँ।

1. उसका मत्न कुरान-सन्नत और इल्म-अकल  (के मुसल्ल्मात) के खिलाफ न हो।
2. उसका मत्न दीन की रूह के खिलाफ न हो।
3. उसका मत्न नबी के किरदार के खिलाफ न हो।

(कुरान और नबी के किरदार से टकराती हुई नहीं होनी चाहिए, यह पहले से एक उसूल है मगर इसका सही तरह से निफाज़ नहीं हो पाता है.)

जब क़ुरान को समझने के लिए आयातों का पसमंज़र देखा जाता है तो फिर हदीसों को समझने के लिए पसमंज़र की ज़ुरूरत क्यों नहीं पड़ती?

मौज़ू रिवायत को तो हिक़ारत से देखना समझ आता है पर सिर्फ कमज़ोर सनद की बुनियाद पर ज़ईफ़ हदीसों को हिक़ारत से क्यों देखा जाए। सनदें बाद कि तेहक़ीको में दुरुस्त हो सकती है पर मत्न नहीं। 

क़ुरान को डिफेंड करना जितना आसान है, उतना ही मुश्किल कई हदीसों को डिफेंड करना है। शायद कभी ऐसा वक़्त आये की जैसे आर्य समाजी ने पुराणों से अपना पीछा छुटा लिया वैसे ही मुसलमान कुछ मनघडंत हदीसों से पीछा छुटा लिया। 

उमर टीवी सीरीज़ में उमर र. अबु हुरैरा (जो सबसे ज़्यादा हदीसों के रावी है गालिबन शायद 5 हज़ार से भी ज़्यादा और इन्हें उमर र. ने हदीसें बयान करने से मना भी किया था।) कहते है कि आपकी कई हदीसें हमने खारिज की है ताकि लोग क़ुरान पर जमा हो सके और इख़्तलाफ़ न हो सके।


इमाम बुखारी की किताब का नाम है:  अलजामी अलमुसनद अससहीह अलमुख़्तसर मिन उमुरी रसुलुल्लाही सल्ल. वा सुननिही वा अय्यामिही , जिसके आसान लफ्जों में मायने हैं, The Referenced Collection of Prophet's "Practices and Times".

ईमाम दार्कुतनी ने अपनी किताब अलततब्बू में बुखारी और मुस्लिम शरीफ की 200 रिवायतों पर सनद और मतन की बुनियाद पर तनक़ीद करी है. इब्ने हजम ने भी ऐसी तनक़ीद करी है.  इमाम बुखारी और इमाम मुसिलम एक दुसरे के उस्ताद और शागिर्द थे. दोनों के हदीसों के उसूलों में फर्क था. दोनों ने एक दुसरे की हदीसों पर सेहतमंद  तनक़ीद करी है और उन्हें छोड़ा है.  इमाम मुस्लिम ने अपनी किताब के इंट्रो में बिना नाम लिए बुखारी के उसूलों पर तनक़ीद करी है. कुरान के बाद बुखारी को सबसे दुरुस्त किताब कहना गलत है. कुरान दीन की किताब है.

तीन बुनियाद: 

रावियों की ईमानदारी या अदल, याददाश्त और रीवायत का सिलसीला कटा हुआ न होना।


सहाबा: यह first generation है और इनके किरादर और इल्म पर testimony की जरूरत नहीं है।

Awthaqun Nas/Thiqa/सिकह: सहाबा के बाद, सबसे trustworthy.  

Thiqat: उनके बाद

Saduq: फिर उनके बाद

Saduq Yahim: जिन्होंने बयान करने में गलती करी।

Maqbool/Layyin: acceptable, no proof against their reliability or soundness.

Majhool al-haal/Mastur: जिनके बारे में ज़्यादा जानकारी न हो हालांकि उनसे कई लोगों ने बयान कर रहे हो और उनके trustworthy होने पर पुख्ता यकीन न हो।

Da’eef (weak): जिसके खिलाफ negative बातें सामने आ रही हो

Majhool (unknown): Majhool al-haal जैसे ही और जिससे सिर्फ एक रावी बयान कर रहा हो।

Matruk (abandoned): जिसने बयान करने में बहुत गलती करी हो, जिसकी काफी आलोचना हुई हो, जो किरदार पर खरा न उतरे।

Fasiq: जिसने कोई बड़ा गुनाह किया हो या जो बुद्धिहीन हो।

Muttaham bi’l kadhib: जिस पर झुट बोलने, हदीसे गढ़ने का इल्जाम हो। इनकी हदीसे बातिल कहलाती हैं।

Kadhdhaab, waddaa: जो जूठा और गढ़ने वाला साबित हो। इनकी हदीसे मौजू कहलाती है। 

 

रिवायत: सहीह, हसन, जईफ, मावज़ू। 


कुदसी (Divine): ऐसी बात जो अल्लाह ने सीधा आपको दी।

मुतवातिर (Succesive): कई trusted सहाबियों से बयान, उनका गलत पर जमा होना नामुमकिन।

मशहूर (Famous): जिसे हर generation के दो लोगों ने बयान किया हो।

मरफू (Elevated): सीधा नबी से सहाबा ने सुनी।

मौकूफ (Stopped): जो नबी ने सहाबा को दी और उन्होंने आगे बढ़ाई या साहबी की लफ़्ज़

मकतू (Severed , Sectioned): सनद नबी से न जुड़ती हो, साहबा ने अपने लफ्जों में बयान कर दिया हो या ताबी के लफ़्ज़।

अहद (Isolated): बेहद कम लोगों से बयान।

मुनकर (denounced): जो किसी दूसरी सहीह हदीस के खिलाफ हो।

मुदरज (interpolated): रावी ने कुछ अतिरिक्त लफ्जों को जोड़ दिया हो।

गरीब (Scarce, Strange): सिर्फ एक साहबा ने बयान किया हो।

मकबूल (accepted): सभी पैमानों पर खरी।

मरदूद (rejected): जो खरी न उतरे।

Mutlaq (Absolute):

Mursal: narrator b/w Successor and Muhammad is omitted)

Munqati: Chain is disconnected

 

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Some Sahaba were permitted by the Prophet in his later times to write his Ahadith. The earliest hadith collections are mostly lost in original form, but much of their content survives because their students or successor transmitted them in written (ultimatly lost) and often verbatim which were later on collected by many Muhaddis in their books. 

■ Hijri calandar [622 AD]
■ Prophet died [632 AD]

∆ Sahifa of Amar Bin Aas [Sahabi]
∆ Sahifa of Jabir ibn Abdullah [a Sahabi]
∆ Sahifa of Abu Huraryra, a famous Sahabi (his student Hammam bin Munabbih partly preserved his records) [Sahabi]
∆ Sahifa of Hammam bin Munabbih (survived through later copies and works of succdeegin compilers) [660–719/748 AD] [Tabii]
∆ Sahifa of Said ibn Jubayr [665–714 AD] [Tabii]

∆ Sunan of Al Shabi [641–723 AD]
∆ Kitab al Maghazi by Urwab bin Zubayr [644–713 AD]
∆ Collection of Ibn Shihab al Zuhri (pioneering the development of Sira-Maghazi and hadith literature, his student was Ibne Ishaq) [669/673-742 AD]

■ Muwatta Malik [711-795 AD]: Accepted Mursal (where a Tabii skips the Sahabi) if transmitted by trustworthy Tabiin. Rejected Gharib reports that went against established Madinan practice.

∆ Jami of Mamar ibn Rashid (his student Abdul Razzak al Sanani preserved his records) [714-770 AD]
∆ Musannaf of Abdul Razzak al Sanani (a larg collection which also survived) [744-827 AD]
∆ Musnad of al Humaydi (survived) [740-834 AD]
∆ Muṣannaf of Waki ibn al Jarrah [745/47–812 AD]
∆ Musnad al Tayalisi [750-819 AD]
∆ Sunan of Said ibn Mansur (partly survived) [754-842 AD]

★ Musannaf Ibne Abi Shaibah [777-849 AD]
■ Ahmed Hanbal [780-855 AD]: Accepted weak narrations for Faḍail (virtues) if not fabricated and no stronger alternative. Accepted mursal narrations with supporting evidence.
★ Sunan al Darimi [797-869 AD]

{Kutub al Sittah}
● Bukhari [810-870 AD]: Strongest in scrutiny, hence his book is considered the most authentic. Required proof of direct meeting (liqa) between narrators. Rejected Shadh (contradicts a more reliable or numerous body of narrations) narrations even if Isnad is technically sound.
● Muslim [817/822- 875 AD]: His book is next in reliability afte Bukhari. Possibility of meeting enough. Sometimes accepts narrators who are slightly weaker.
● Dawood Sijistani [817/818-889 AD]: Included weak narrations if there was no stronger alternative.
● Tirmizi [824-892 AD]: Introduced the category Hasan as a middle category.
● Majah [824-886 AD]: Included some weak narrations but valuable because it preserves reports not found elsewhere.
● Nasai [829/830-915 AD]: Next to Bukhari & Muslim in authenticity.

★ Kulayni (Kitab al Kafi - Shia) [864-941 AD]
★ Hakim Nishapuri [933-114 AD]
■ Ibne Ishaq's [699-769 AD] survived only in Ibn Hisham's [796-833 AD] and Al Tabari's works [839–923 AD].


Components of a Hadith:- 
Isand (sequence of reporters): Chain of narrators.
Taraf (introductory text): Beginning of the text which refers to the Prophet.
Matn (content): Actual speech.

Types according to authenticity of the narrators:-
Sahih (sound): Reported by a trustworthy reporter.
Hasan (good): Reporters are known and have solid character but weak memory.
Daif (weak): Ranking under Hasan category because of a shortcoming in the Isnad.
Maudu (fabricated): Having wording opposite to the confirmed Prophetic traditions.

Types according to the number of reporters:-
Mutawatir (consecutive): Reported by a large number of companions that it is agreed upon as authentic.
Ahad (isolated): Narrated by a countable number of people.
Mashhur (famous): Related by more than two individuals from each generation.
Aziz (rare yet strong): Only two reporters in the Isnad.
Gharib (strange): Only one narrator in the Isnad.

Types according to Matn & Isnad:-
Munkar (denounced): Contradicts an authentic Hadith and belongs to a weak narrator.
Mudraj (interpolated): With some additional words to the authentic Hadith.

Types according to authority:-
Qudsi (divine): Directly from Allah.
Marfu (elevated): Directly heard from the Prophet by the companions.
Mauquf (stopped): Direct command given by Prophet to the companions.
Maqtu (severed): Instruction which cannot be traced back to the Prophet but to one of the companions who explained it in their own words.

Types according to chain:-
Musnad (supported): Reported by a well known companion but the final narrator might not have been with the Prophet at that time.
Muttasil (continuous): With undisturbed Isnad which only goes back to a companion or successor.
Mursal (hurried): Directly in the name of the Prophet without the name of any of the Companions.
Munqati (broken): One or more narrators missing but not consecutively.
Muadal (perplexing): Two or more narrators missing successively.
Muallaq (hanging): One or more narrators are not known at the beginning of the Isnad or none of the narrators are known.

शैख़ अल्बानी और शैख़ अर्नौत दौरे हाल में बुखारी, मुस्लिम किताबों पर तनक़ीद करते रहे हैं.  इमाम अल हाकिम ने अपनी हदीस की किताब में वो हदीसे ली जो इमाम बुखारी और इमाम मुस्लिम की शर्तो पर खरी उतरने के बाद उन दोनों ने सहीयेन (बुखारी, मुस्लिम किताबें) में नहीं ली थी (क्यों, इस पर कभी और बात करेंगे). इसलिए इनकी किताब का नाम है, अल मुस्तदरक अला अल सहियेन. 

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दर्शन विज्ञान और ईश्वर

   दर्शनशास्त्र की 3 शाखाएँ हैं:- I. तत्वमीमांसा/ तत्वज्ञान (Metaphysics - beyond physics/theory of reality) [तत्व, अस्तित्व, वास्तविकता का ...