Tuesday, 30 April 2024

रोज़ा और उपवास

 


[ब्रह्म - ईश्वर के प्रति व्रत रखो]
व्रतं कृणुताग्निर्ब्रह्माग्निर्यज्ञो ।   
हे यजमानों, ब्रह्म के प्रति व्रत का पालन करो।
(यजुर्वेद :4 : 11)   

[ख़ुदा - ईश्वर के अनुसार रोज़े रखो]
...कुतिबा अलैकुमुस्सियामु...।
हे आस्थावानों, तुम पर रोज़े अनिवार्य किए गए हैं जैसे तुम से पहले के लोगों पर किए गए थे।
(क़ुरान :2 : 183)

[नवरात्रि]
व्रतं कृणुत ।   
व्रत का पालन करो।
(यजुर्वेद :4 : 11)   

[रमज़ान]
कुतिब अलैकुमुस्सियामु ।
तुम पर रोज़े अनिवार्य किए गए हैं।
(क़ुरान : 2 : 183


रोज़ा फ़ारसी लफ्ज़ है, जो लफ्ज़ रोज़ (दैनिक) से बना है। अरबी में रोज़े को सौम कहते हैं जिसका मतलब है रुक जाना या रोक लेना। यानी खुद को उन बातों से रोक लेना जिनकी इंसान को मनाही करी गयी है (सभी बुराइयां वगैरह)। आम दिनों में भी यह मनाहियां लागू होती है मगर साथी ही रमज़ान में खाने पीने संबंधित पाबंदीयां भी लागू हो जाती है। क़ुरान कहता है रोज़े से तक़वा पैदा होता है और तक़वे के मायने है परहेज़ करना है यानी ईश्वर की नाफरमानी करने से परहेज़ करना। रोज़ो से अल्लाह का कुरब भी हासिल होता है यानी ईश्वर की निकटता।

उपवास का अर्थ है ईश्वर के निकट वास करना (रहना)। जबकि उपासना का अर्थ है ईश्वर के निकट आसान करना (बैठना)। रहना या ठहरना हमेशा बैठने से अधिक समय के लिए होता है इसीलिये उपासना थोड़ी देर के लिए की जाती है और उपवास पूरे दिन के लिए। व्रत का अर्थ होता है संकल्प, प्रण, प्रतिज्ञा करना। ऐसे संकल्पों में एक संकल्प उपवास रखना भी हो सकता है और आंशिक समय या कुछ शर्तों के साथ रखे गए छोटे उपवासों को इसीलिए व्रत भी कहते हैं।

उपवास या रोज़ो से मनुष्यों में धर्म और आत्मन संबधित गुणों के पैदा होने के अलावा, शारीरिक और मानसिक तौर पर होने वाले लाभ अलग हैं, जिन्हें विज्ञान आज सिध्द कर चुका है बल्कि भूखे रहने पर शरीर में शूरू होने वाले लाभदायक सेल Regeneration and Maintenance प्रोसेस Autophagy पर रिसर्च करने के लिए Japanese Scientist Yoshinori Ohsumi को 2016 में Nobel Prize in Medicine भी मिल चुका है। दुनिया के कई अन्य धर्मों जैसे ईसाइयत, जुडाइज़्म, बौद्ध, जैन आदि में उपवास रखने की प्रबल धारणा मौजूद है।  

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उपवास, व्रत, उपासना, पूजा का अर्थ।


उपावास का अर्थ है निकत रहना। यह शब्द उप यानी पास, निकट और वास यानी रहना से बना है। वास सदैव अधिक समय के लिए होता है। ईश्वर की कुर्बत या निकटता प्राप्त करना ही उपवास रखने का उद्देश्य है।

व्रत का अर्थ है धारण, प्रतिज्ञा, संकल्प आदि करना है। व्यवहारिक तौर पर खान पान के रिलैक्स्ड नियमों के साथ किये गए उपवास को व्रत कहते हैं। व्रत का अर्थ बार बार घुमके आने वाला भी है। स्पष्ट है कि व्रत हर वर्ष आते हैं।

उपासना का अर्थ है, निकट आसान करना यानी बैठना। बैठना थोड़े समय के लिए होता है।

पूजा का अर्थ है उचित व्यवहार या सत्कार, सम्मान आदि करना। इसका अर्थ उपासना नहीं होता जैसा आम तौर पर समझा जाता है। 

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वैदिक ग्रंथों में व्रत और उपवास

सामान्यता वैदिक काल को दो भागों में बांटा जाता है। एक प्रारम्भिक वैदिक काल (लगभग 1500-1000 ईसापूर्व) जिसमें चारों वेदों की रचना हुई और दूसरा उत्तर वैदिक काल (लगभग 1000-500 ईसापूर्व) जिसमें पहले आरण्यक फिर ब्राह्मण ग्रंथों और फिर उपनिषदों की रचना हुई। 

■ व्रत शब्द उपवास से प्राचीन है। शास्त्रों के अनुसार उपवास का अर्थ है, निकट वास करना (रहना)। जबकि उपासना का अर्थ है, निकट आसान करना (बैठना)। रहना या ठहरना हमेशा बैठने से अधिक समय के लिए होता है इसीलिये उपासना थोड़ी समय के लिए की जाती है और उपवास लंबे समय के लिए। कालांतर में धार्मिक संकल्प हेतु अन्न त्याग करने के कर्म को उपवास कहा जाने लगा। इसी तरह प्राचीन ग्रंथों में व्रत का मूल अर्थ है संकल्प प्रण, प्रतिज्ञा करना। परन्तु बाद में सीमित प्रकृति के उपवासों को व्रत भी कहा जाने लगा क्योंकि वे भी संकल्प ही तो होते हैं।

■ वेदों में व्रत शब्द आया है परन्तु वंहा इसका अर्थ स्पष्ट रूप से उपवास नही है। वेदों में व्रत का अर्थ कोई भी संकल्प लेने से है, धार्मिक या भक्ति के आधार पर। आर्य समाजी इसके यही अर्थ लेते हैं। आम हिन्दू व्रत से उपवास रखना भी अर्थ लेते हैं क्योंकि व्रत रूपी संकल्प में अन्न त्यागना भी आता है। शतपथ ब्राह्मण में व्रत की प्रक्रिया में उपवास अंग बताया गया है। इसीलिए बाद में व्रत और उपवास को समानंतर ही माना जाने लगा। हालांकि निरुक्त में यास्क मुनि ने व्रत के दोनों अर्थ लिखें है, निवृत्ति (रोकना) और अन्न (2/14)।

यजुर्वेद 4:11 में अग्नि को ब्रह्म और ब्रह्म को अग्नि मानने का व्रत (संकल्प) करने को कहा गया है। यजुर्वेद 1:5 में भी व्रत का उल्लेख संकल्प के रूप में है। यजुर्वेद 19:30 में भी इसका यही अर्थ है (कुछ भाष्यों में संदर्भ संख्या अलग)।

■ वेदों में उपवास शब्द नहीं है और न ही किसी मंत्र से स्पष्ट रूप से अन्न त्याग करके भक्ति करने का ज्ञान होता है। इसलिए आर्य समाजी उपवास को पूर्णतया भूखे रहने की बजाय शरीर, मन को शुद्ध रखने के लिए कुछ अनुचित खाद्य को त्यागने को उपवास कहते हैं। शतपथ ब्राह्मण अनुसार इनका मत है कि किसी व्रत रूपी संकल्प किये व्यक्ति के घर पर सत्संग करवाना उपवास कहलाता था जब इस दौरान गृहस्ती को निराहार रहना पड़ता था और विद्वानों के आहार के बाद ही खाना होता था।

आरण्यक, ब्राह्मण ग्रंथों, उपनिषदों में यह शब्द प्रयोग हुआ है। कुछ स्थानों पर इस शब्द के प्रयोग से भोजन त्याग, नियंत्रित या कम करके तप, भक्ति करने के अर्थ निकलते हैं। परन्तु अधिकांश जगह स्पष्ट रूप से वंहा इसके अर्थ या व्याख्या नहीं दी गई है, इसलिए इस शब्द के अर्थ पर भिन्न मत हैं। हालांकि जिन श्लोक में उपवास शब्द आया है, वंहा से इसके सामान्य व प्रचलित अर्थ सही बैठते हैं। वैसे भी यह आवश्यक नहीं है कि ग्रंथों में उन शब्दों या क्रियाओं के अर्थ या व्याख्या खुलकर समझाई जाए जो आम जन में व्यवहारिक रूप से पहले से व्याप्त है। उपवास से आम सनातनी विद्वान अन्न त्याग कर भक्ति करने के ही अर्थ सदा से लेते आये हैं। वे वैदिक शब्द तप, संयम जैसे शब्दो से प्रसंग अनुसार उपवास अर्थ भी लेते हैं। इनके बाद के काल या ग्रंथों (स्मृतियां, पुराण आदि) में इस शब्द का अन्न त्याग के अर्थों में अविवादित रूप से आया है। पौराणिक या परंपरावादी विद्वानों में उपवास (अन्न त्याग) की धारणा बेहद प्रबल रूप से विद्यमान है।

■ शतपथ ब्राह्मण 1:1:1:6-9 में बताया गया है कि एक गृहस्थ व्यक्ति व्रत में भूखा रहे या न के बराबर ही खाये। किसी व्रत को करने पर अगले दिन यज्ञ करना होता है जिसके पश्चात व्रत समाप्त होता है। उसे यज्ञ तक कुछ भी ग्रहण करना नहीं चाहिए क्योंकि देवों के खाने से पूर्व स्वयं कुछ खाना अनुचित है। उसके व्रत के कारण देवता उसके घर में आ कर उपवास (ठहरते) करते है और इसलिए इसको उपवसथ (उपवास का दिन) कहा जाता है। 
[यंहा पर स्पष्ट है कि उपवास का समय उस गृहस्त के लिए भूखा रहने का समय है।]


 

इस्लाम और हिन्दू धर्म में मुक्ति के मार्ग



मुक्ति, निर्वाण, फलाह, निजात, साल्वेशन शब्दों के अर्थो में थोडा अंतर है.  सनातन धर्म में मुक्ति के 3 मार्ग बातए गए है। भक्ति, ज्ञान और कर्म। इनमें से किसी एक पर भी मार्ग पर चलकर मुक्ति, मोक्ष या निर्वाण प्राप्त किया जा सकता है। इस्लाम धर्म में इन 3 चीजों को जोड़कर बनने वाले रास्ते को निजात, फलाह या सेलवेशन का तरीका कहा गया है। जिन्हें अरबी में तौहीद, रिसालत और आख़िरत कहा गया।

1. भक्ति यानी तौहीद (केवल एक निराकर ईश्वर या ब्रहम की उपासना करना).
2. कर्म यानी आख़िरत (धर्मानुसार अच्छे कर्म करना और बुरे कर्मों से बचना क्योंकि महाप्रलय के बाद अंतिम दिन सभी का कर्मों के आधार पर निर्णय होगा। पापियों को नरक में डाला जाएगा और पुण्यकारियों को स्वर्गे में भेजा जाएगा।)
3. ज्ञान यानी रिसालत (ज्ञान की साधना या माध्यम से। ईश्वर के भेजें ईशदूत, संदेष्टा या संदेशवाहकों द्वारा दिए गए आदेशों और शिक्षाओं का अनुसरण करना).


भक्तिमार्ग:

1. जब निष्पक्ष और तटस्थ भाव से कोई इंसान अपने आप के बारे में और पृथ्वी पर मौजूद तमान चीज़ों और इस असीमिति युनिवेर्स के बारे में तुलनात्मक रूप से सोचता है तो उसे एहसास हो जाता है कि वो इस कायानात में कुछ भी नहीं है, एक ज़र्रा भर भी नहीं है. वो समझ जाता है कि वो खुद और हर चीज़ एक रचना मात्र है. रचना और रचियिता दोनों एक डोर के दो सिरे है.  यह बात प्राकृतिक है और यह हमारे अंदर रखी गयी है.

2. दुनिया में बहुत सी चीजें ऐसी हैं जिनका नाम लेने से ही ज़ेहन में चाह और मुंह में पानी आ जाता है। जैसे कोई मिठाई या ठंडा शरबत या बढ़िया पकवान। फ़िर ये कैसे हो सकता है कि पूरी क़ायनात के मालिक का नाम लिया जाए और जिस्म-रूह पर उसका नाम लेने से कोई असर न हो।  यक़ीनन उसका नाम लेने में भी बहुत बरक़त है।

3. कहते है कि दुनिया की खूबसूरत हक़ीक़तें, आंखों से नहीं बल्कि दिल से महसूस की जाती हैं। फ़िर मुझे वो याद आया, वो तो सबसे बड़ी हकीकत है, वो सबसे खूबसूरत है और वो भी दिखाई नहीं देता। तो फिर उसे भी आखों से नहीं बल्कि दिल से महसूस किया जायगा.

4. ईश्वर हम सब में है और नहीं भी है। वो यंहा है भी और नहीं भी। ढूंढोगे तो मिल जायेगा और नहीं ढूंढोंगे तो नहीं मिल पायेगा. वैसे ही जैसे बहुत से लोग अपने पुरे व्यस्त जीवन में लाखों लोगों से मिल लेते हैं मगर कभी अपने आप से नहीं मिल पाते.

कर्ममार्ग:

5. इसी तरह हर इन्सान के मन में अच्छाई और बुराई की मूलभूत भावना भी मौजूद रहती है. बस अक्सर उस भावना पर इंसान स्वार्थ का पर्दा पड़ जाता है. इसका सबसे बड़ा सबूत यह है की जब किसी इन्सान के साथ कोई दूसरा बुरा करत है तो उसे दुःख होता है और जब उसके साथ कोई अच्छा करता है तो उसे ख़ुशी होती है. ये दुःख सुख अच्छे बुरे की भावना इन्सान की व्यक्तित्व का हिस्सा हैं.  यह बात भी प्राकृतिक है. यह भी हमारे अंदर रखी गयी है.

6. वो परमात्मा हमसे सिर्फ अपनी भक्ति नहीं करवाना चाहता. अगर वो हमसे सिर्फ भक्ति चाहता तो हमें लोगों के समुह में नहीं बल्कि अकेले किसी जंगल में रहने के लिए भेजता.  उसने इन्सान को समाज में भेजा. वो चाहता है हम अपने अंदर उसके गुण जैसे करुणा, दया, न्याय आदि पैदा करें और आस पास वालों के साथ अच्छा व्यवहार करें। असली परीक्षा तो लोगों के बीच रहकर अपना संयम बनाये रखना और अच्छे काम करते चले जाना है।

7. सुना है कि ख़्वाब धोखा नहीं बल्कि एक छोटी हक़ीक़त होते है। क्योंकि ख़्वाब के मुताबिक़ हमारा जिस्म और ज़हन रिस्पॉन्स कर रहा होता है। ख़्वाब से जागने के बाद एहसास होता है कि यह ज़िंदगी बड़ी हक़ीक़त है। जब छोटी से बड़ी हक़ीक़त में आते है तो पिछली के छोटे होने का एहसास होता है। इस दुनिया के बाद जब उस दुनिया में आंख खुलेगी तो एहसास होगा कि यह यंहा की हक़ीक़त पिछली सारी हक़ीक़तों से बड़ी है। ख़्वाब के मुक़ाबले, दुनिया बड़ी हक़ीक़त है और दुनिया के मुक़ाबले, आख़िरत यानि परलोक.

8. जब माँ के पेट के अंदर फीटस में प्राण, नफस या आत्म, रूह आती है.  उसे लगता है कि बस यही उसकी दुनिया है मगर उसे जन्म लेने बाद में एहसास होता है की बाहर भी एक बहुत बड़ी दुनिया है और ये उसे पैदा करने वाली एक मां है. ऐसे ही लोगों को भी अक्सर यही लगता कि बस यही दुनिया जबकि दुबारा जन्म लेने पर एक और दुनिया हमारा इंतज़ार कर रही है और बनाने वाला भी।

9.  खैर, बच्चा पैदा होता है, बड़ा होता है, बुढा होता है और मर जात है. इसी धरती के तत्वों से बना इन्सान का जिस्म इस धरती के तत्वों में वापिस मिल जाता है, चाहे दफनाये या जलाये. इसी तरत जो आत्मा शरीर में आई थी, उसे भी तो वापिस वंहा जाना चाहिए जंहा से वो आई थी. आत्मा भी उस परम आत्मा यानी परमात्मा से मिलने जायगी.

ज्ञानमार्ग:

10. लगभग हर धर्म में बुराई को ख़तम करने और अच्छाई को फ़ैलाने के लिए और नया बदलाव लाने के लिए किसी के आने की  भविष्यवाणी, उनके ग्रन्थ करते हैं.  मुस्लमान कहते हैं की मेहदी और ईसा आयंगे. इसाई भी जीसस या यीशु के दुबारा धरती पर आने में आस्था रखते हैं. यहूदी भी अपने मसीहा के आने के इंतज़ार में हैं. पारसी भी सोश्यांत के आने में यकीन रखते हैं. हिन्दू कहते हैं की कल्कि अवतार आयेगे. बोद्ध धर्म में 29 बुद्ध मैत्री बुद्धा आने की बात कही जाती है. जैन धर्म में हर टाइम साइकिल में तीर्थंकरों के वापिस आने की धारणा आम है.

11.  इस बारे में इन धर्मों के अनुयायियों में 3 विश्वास मिलते हैं. पहली कि ये आयेगें जो टेक्स्ट बेस्ड व्यू है।  दूसरी कि ये तो आ कर जा भी चुके जो की हिस्टोरिकल व्यू हैं। और तीसरी है कि ये नहीं आयंगे, ये एस्तिमेशन बेस्ड व्यू है.

12.  लोग इन तीनो में से कुछ भी माने मगर एक बात सभी सामान मानते हैं कि वो आ कर सत्य, अच्छाई, सफलता का मार्ग दिखायंग। ये वही मार्ग है जो उनसे पहले आये पैगम्बर, अवतार, दूत आदि लोगों को दिखा चुके हैं. किसी भी धर्म वाले से पूछिए तो वो कहेगा कि यह मार्ग तो हमारे धर्म में बताया गया है और हमें मालूम है. कोई कहेगा ये तो श्री कृष्ण, श्री राम ने दिखाया, कोई कहेगा मोज़ेस, ईसा मसीह, मुहम्मद साहब ने दिखाया, कोई कहेगा तथागत बुद्ध, महावीर स्वामी ने दिखाया। अगर ऐसा है तो फिर किसी के आने का इंतज़ार क्यों करना, जिनको जब आना है वो तब आएंगे. मगर फ़िलहाल हमारी जिम्मेदारी यह है की हमें तो बस अपने धार्मिक मार्गदर्शक, महापुरुष के पिछले दिखाए और बताए गए मार्ग पर चलना है जिन पर वो खुद चल कर गए हैं. और हम चाहे किसी भी धर्म के हो इन सभी महापुरुषों की उन शक्षाओं को तो मान ही सकते हैं जो कॉमन है और जो अच्छी हैं।

13. बच्चो से अक्सर पूछते हैं कि बड़ा हो कर क्या बनना चाहते हो। या तो वो किसी आइडियल का नाम लेगा या किसी प्रोफेशन या फील्ड का। इसका मतलब होता है कि ये हमारे अंदर मौजूद है कि हम बड़े या महान लोगों को  फॉलो करते हैं, उन्हें रोल मॉडल, आइडियल मानके बेहतर काम करते हैं। पहाड़ों, जंगल में रास्ते पर चलने से आसान होता है उस रास्ते पर चलना जिस पर पहले ही कई लोग जा चुके हैं और वंहा चलने लायक रास्ता बना चुके है। नए रास्तों पर खोने का डर भी होता है। फिर भी कोई अपना रास्ता खुद बनाना चाहे तो उसे मनाही नहीं है। मगर हर आदमी के पास इतना समय, सामर्थ्य नहीं होता इसलिय आम आदमी के लिए आसानी भी होनी चाहिए।

14. मुहम्मद साहब ने ये नहीं कहा कि वो ईश्वर के भेजे प्रथम दूत है बल्कि कहा कि उनसे पहले कई आये हैं और यही संदश लाये हैं बस उनके जाने के बाद लोग उसमे मिलावट करके बिगाड़ पैदा कर देते थे। कुछ के उन्होंने नाम बता दीया जैसे ईसा, मोसेस, अब्राहिम आदि। क़ुरान ने कहा ईश्वर ने हर समय, क्षेत्र, समुदाय में अपना संदेश और संदेश देने वाले भेजे हैं। इस्लाम कहता कि किसी के पूज्यों को बुरा न कहो और किसी भी धर्म के महापुरुष को बुरा न कहो क्योंकी शायद वो भी उसके भेजे हुए महापुरुष रहे हो।

15. सही ज्ञान के बिना भक्ति वैसे ही है जैसे सही भावना के बिना किये गए कर्म।

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मुक्ति

मुक्ति, नजात का मतलब है किसी परेशानी से बचना। जैसे कोई ट्रेफिक से बच कर रोड बदल लेता है तो यह ट्रैफिक से नजात मिलना हुईमगर मंजिल पर अभी नहीं पहुंचे हैं। इस्लाम फलाह की बात करता है। फलह का मतलब है कामयाबी यानि मंजिल तक पहुँच जाना।

ईसाइयों में अकीदा है कि इंसान जन्नत से ही पाप करके आया और ये पाप सभी को भोगना पड़ेगा। इसलिए खुदा के बेटे ईसा ने खुद पर पर ज़ुल्म सह कर सबको इस पाप मुक्ति दिला दी। यही है original sin से salvation पाना। हिन्दू धर्म में आवागमन से छुटकारा पाना मुक्ति है। बोद्ध धर्म में दुख से मुक्त होना निर्वाण है। जैन धर्म में हर मुक्त हो जाने वाली आत्मा ईश्वर है।

मोक्ष, मुक्ति, निर्वाण, निजात, फलाहका मतलब किसी परेशानी में फंसने पर बाहर निकलना। ईसाइयत में माना जाता है की एडम ईव ने गलती कर और वो गलती inherit होते होते हर बच्चा गुनहगार पैदा हो रहा है। इससे मुक्ति के लिए ईश्वर का बेटा सलीब चढ़ कर गया और सबके पाप अपने ऊपर ले गए। सबकी मुक्ति हो गई। नूह को सैलाब से बचाया गया और इससे मुक्ति हो गई। बोद्धधर्म में दुख से शुरुवात होती है और इस दुख से निवारण ही मुक्ति है। हिन्दूधर्म में बार बार जन्म लेने से मुक्ति मांगते है। इस्लाम में निजात नहीं, फलाह की बात करता है यानि कामयाबी की। फलह लफ़्ज़ बना है फललह से जिसका मतलब है किसान। क्योंकि किसान खेती में लंबे वक्त में लगे रहता है और इस मेहनत का फल उसे कटाई के बाद मिलता है। यही उसकी कामयाबी होती है। 

मौत का मतलब खात्मा नहीं है, मौत का मतलब है एक ज़िंदगी से दूसरि ज़िंदगी में दाखिल होना है।  

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बुद्ध, जैन मत इंसानी फितरत के खिलाफ जा कर निर्वाण हासिल करना चाहता है। निर्वाण इस जीवन, दुखों, इच्छाओं से। जबकि फितरत के तक़ाज़ों को अंजान देते हुए, फलाह पाना अब्राहिमिक धर्मो का सार है। जब एक इंसान अकेले में निर्वाण हासिल करने निकलता है तो उसके पास न परिवार, न रिश्तें होते, न रोज़मर्रा की परेशानियां, न सामाजिक लेन देन। इसलिए उसकी ज़्यादा समस्या तो आम जीवन की गायब ही ही गई। इसलीए उसे दुखों से दूर हो चूकना मसहूस होता है।

 

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God, Universe and Life Purpose.

There are 3 ways to find the truth.
First way is to know the truth from matter present (scientific). Second is to know it from your inner self (spirituality).
Third is to know it from the One himself, who created matter, and our innerselves (means the way of God)

The Body has to perish but not soul. But soul is perishable also. It may also perish if it needed to. Because, the only thing which is not perishable is the Creator of body and soul too. That's why a perishable object and a non perishable object can not be the same or one. It has to be different otherwise perishable will be imperishable in nature and vice versa.  Everything has been created except the one who is the creator of all the things. That's is why, He is called uncreated. Who created everything, can not be a creature himself.

The question, who create God is called a Paradox. Paradox means a question which is wrong itself in its nature such as Who came first, Egg or Hen. By adding 2+2, how answer 5 came? And many More scientific paradadoxes are there.

Science today says energy can not be created, it can only be transformed from one form to the other. Then the question arises, who created energy. Simply means that energy had also been created by him.  Who created God or the Uncreated is also a paradox or wrongly framed question. Because if u presume that everything has a creator then that creator will also have a creator and that creator will also have another creator. And this way you wil go round and round and round and round and will never reach an end. But the universe has already started, which means that there is a point when it had been started or created.  That is the point, where the creator of this creation, created it (universe and it's objects).

Who created everything can not be a created thing itself.

If you  put something in the universe, it means that something is already a thing or a mass and it has an existence. It mean it will not create itself in the universe instead it is already a created thing which may produce it's new extensions or it may change itself, transform itself, mold itself, grow itself or decrease itself. It will not do the same without any force or push but with the help of something affective to it. It cannot do anything unless made to do so.

The Universe does not work itself, it was made to work in such a way that it lives it's life or till it's time. Nothing happen itself, it happens because a form of energy forces another form to happens. Do you know who forces energy to force other form of energy to happen. The answer is He , the one and only. 

Whatever is there in this universe, has some objective, reasons to be there. There is nothing lies in the whole universe which is without an objective. Everything is serving a purpose and performing a role in nature. We all have a purpose.


Saturday, 27 April 2024

पूजा का अर्थ और मूर्तिपूजा का आरंभ।


पूजा का अर्थ होता है, उचित व्यवहार करना, सम्मान करना, सत्कार करना, अभिवादन करना आदि अर्थात जो जिस व्यवहार को पाने के योग्य है, उसके साथ वैसा ही आचरण करना। महाभारत (अनुशासन पर्व : 145 अध्याय) में मां बाप के साथ अच्छा व्यवहार करने को पूजा कहा गया है। मनुस्मृति (3: 58-59) में स्त्रियों का आभुषण, वस्त्रों व भोजन आदि से सत्कार करने को पूजा कहा गया है।

पूजा का अर्थ उपासन करना नहीं होता, न ही आरती उतारना होता है। वेदों में उपासना, स्तुति आदि शब्द प्रयोग हुए हैं। पूजा तो बहुत बाद में जा कर उपासना के समानांतर प्रयोग होना शुरू हुआ।

मूल रूप से पूजा किसी मनुष्य की, किसी वस्तु की या किसी भी पर्दाथ की हो सकती है। जैसे माता पिता का सम्मान करना और उनकी बात मानना, उनका पूजन है, अपने पुरखों के लिए प्रार्थना करना और उनके नाम पर भोज खिलना पितृपूजा है, गुरु को सम्मान देना और उनकी आज्ञा मानना, गुरुपूजा है, कन्याओं को अधिकार, उपहार आदि देना कन्यापूजा है, पेट की भूख मिटाना पेट पूजा है, भूमि में हल जोतना भूमिपूजा है, सूर्य के साथ योग, व्यायाम करना सूर्यपूजा है, तुलसी के पौधे को आगंन में लगा कर शुद्ध हवा लेना तुलसीपूजा है, प्रकृति के साथ व्यायाम करना और उसको संजोए रखना प्रकृतिपूजा है, मूर्ति बना कर अपने महापुरुषों को स्मरण करना, उन्हें यादगार बनाए रखना और उन्हें श्रद्धान्जलि देना ही मूर्तिपूजा है।

बुद्ध की मृत्यु के कुछ सदी बाद यूनानियों ने भारत पर आक्रमण किया और यहीं राजपाट चलाने के लिए बस गए, जिन्हें यवन कहा गया। कुछ समय बाद यवनों ने बौद्ध धर्म अपना लिया और उन्होंने बुद्ध की मूर्तियों का निर्माण आरम्भ किया क्योंकि यूनान में यूनानी देवताओं की मूर्तियां बनाना यूनानी संस्कृति का एक अभिन्न अंग हुआ करता था। इस मूर्ति निर्माण के साथ बुद्ध और बौद्ध धर्म की लोकप्रियता इतनी बढ़ती गयी कि अपने धर्म को पीछा छूटते हुए देख कर जैनियों ने भी महावीर की मूर्तियों का निर्माण शुरू किया। क्योंकि बौद्ध, जैन और हिन्दू धर्म लंबे समय से आपस में वैचारिक संघर्ष और एक दूसरे से श्रेष्ठ होने का प्रतियोगिता में घिरे हुए थे, इसलिए हिंदू धर्म में भी मूर्ति निर्माण शुरू हुआ। देखते ही देखते हिन्दू धर्म के महापुरुषों, देवताओं आदि की मूर्तियों की पूजा भी शुरू हो गई। इन मूर्तियों के निर्माण से पहले ही, बौद्ध और जैन धर्म के प्रवर्तकों और दिव्यजनों के लोगों पर पड़े प्रभाव को देखते हुए, हिन्दू धर्म भी अपने महापुरषों जैसे राम, कृष्ण व कई देवताओं के बारे में प्रचार-प्रसार शुरू कर चुका था।
 
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वेदों में मूर्तिपूजा नहीं है। बल्कि पूजने योग्य किसी की मूर्ति का भी उल्लेख नहीं है। वैदिक काल में पूजने के लिए मूर्तियां नहीं बनाई जाती थी। मूर्ति पूजा तो अभी 2.5 हज़ार साल पहले ही शुरू हुई, बौद्धों या यूं कहें कि यूनानियों के कारण। असल में पूजा से मुराद यंहा उपासना से है, वैसे दोनों के अर्थ अलग अलग हैं।

 सबसे पहले ये देखना होगा कि वेदों का जो अनुवाद हम पढ़ रहे हैं वो किस दृष्टिकोण से अनुवाद या भाष्य किया गया है। जैसे कि कर्मकांड, भाषीय, अध्यात्म या दार्शनिक आधार पर। हर प्रकार में वेदों के अर्थ थोड़े बदल जाते हैं बल्कि कर्मकांडी (सनातन धर्मी विद्वानों के) और भाषीय (आर्य समाजियों के) आधार के अनुवादों में तो बहुत ज़्यादा अंतर आ जाता है।

कर्मकांड वालों में प्रकृति पूजा या देव पूजा के उल्लेख भरे पड़े हैं। एकेश्वरवाद का भी कंही कंहीं उल्लेख है। जबकि भाषीय या निरुक्त आदि के आधार पर हुए भाष्यों में एकेश्वरवाद ही एकेश्वरवाद है और उन्होंने वेदों में आये सभी नामों को ईश्वर के ही गुणवाचक नाम बताए हैं। इस प्रकार से जिन प्राकृतिक चीजों या देवताओं के नाम वेदों में लिखे हैं, वो ईश्वर के गुणात्मक नाम बन जाते हैं। हालांकि इनमें से बहुत से नाम वाकई ईश्वर के गुणात्मक नाम हैं भी।

वेद की भाषा और शैली बहुत प्राचीन है और इसलिये बहुत जटिल भी। इसलिए इनके अनुवादों में भी अंतर आ जाता है। ईश्वर की धारणा वेदों में, वैदिक काल में, बाद में भी हमेशा से विद्मान रही है।
 
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सबसे बड़ा जुर्म शिर्क क्यों?

सबसे बड़ा जुर्म शिर्क क्यों है और इसकी सजा हमेशा की जहन्नुम क्यों है? क्योंकि ये सबसे बड़ा झूठ और नाइंसाफी है. इस्लाम में अनंत काल की सजा बुरे कर्म नहीं बल्कि, ईमान न होने का दंड है। ईमान और अमल दो अलग बातें हैं। अपने मालिक से वफादारी ईमान है

अगर कोई कितने भी अच्छे काम कर मगर वो दूसरे देश के लिए काम कर रहा है, जासूसी कर रहा है तो उसके अच्छे काम भी nil हो जाते हैं और उसे सजा मिलती है। देशद्रोह या गद्दारी की कठोरतम सजा है। उसके द्वारा किए जीवन भर किए गए अच्छे कर्म उसकी फांसी या उम्र कैद की सजा नहीं बचा सकते। इसलिए उसे तो सजा मिलेगी या फिर सज़ा के बाद मुमकिन हुआ तो खुशगवार समय आने पर कुछ शर्तों के तहत वापिस deport कर दिया जाएगा। मुश्रीक भी गद्दार है क्योंकि वो उस एक मालिक के निजाम में है। इससे फायदा उठाते हैं। उसे भी सजा मिलेगी। अगर किसी मुश्रीक के खुदा का कोई देश होता तो आखिरत में उसे भी वहा भेज दिया जाता पर ऐसा नहीं है। यानि ऐसा नहीं होगा कि जब नरक में जाओगे तो आपसे यह कह दिया जायगा कि जिसे आप अपना दाता मानते थे, आपको हमारे वाले नरक से उसके स्वर्ग में डेपोर्ट किया जा रहा है। क्योंकि एक ही नरक और स्वर्ग हैं। असल में जब कोई एक ही सर्वशक्तिशाली है तो उसके निजाम के मुताबिक ही सजा मिलेगी।

 

मूर्ति माध्यम है?

हिन्दू कहते हैं वो मूर्तियों को नहीं पूजते, बल्कि इनके माध्यम से उस सर्वशक्तिमान को ही पूजते है। (यह माध्यम वाली बात फिजुल है, न ऐसा उस पालनहार ने कही कहा है, न किसी ग्रन्थ में है और न ही ये natural है)। हिन्दू यह भी कहते हैं कि जब अभ्यास हो जाता है तो निराकार पर चले जाते है (मगर आज तक ऐसे किसी इंसान का example नहीं दे पाए।)

क्या ईश्वर जड़ पदार्थ में है।

ईश्वर न असंभुति में है और न संभूति में है। असंभुति, वह वस्तु है जो सृष्टि में मनुष्य की उत्पत्ति से पहले ही निर्मित थी अर्थात सूर्य, पहाड़, पेड़ आदि। और संभूति वह वस्तु है जिनका निर्माण मनुष्य ने असंभुति का ही प्रयोग कर के किया अर्थात लकड़ी, धातु, पत्थर आदि से निर्मित वस्तुएँ। दोनों को पूजना ईश्वर द्वारा प्रतिबंधित है।

अईश्वर न ठोस में है और न कठोर में। वह तो उस स्थान में विद्यमान होता है जो कोमल हो, नम्र हो, मृदु हो। वह तो मन में विराजता है।

ईश्वर न काष्ट में अर्थात न लकड़ी में है, न पाषाण में अर्थात न पत्थर में है, न मृण में अर्थात न मिट्टी में है। वह इनमें वास नही करता है। वह कंकड़, चट्टान, पहाड़, धरती में भी वास नही करता है। वे तो भाव अर्थात मन में बसता है, भावना में रहता है।

 

ईश्वर को मूर्त रूप में पूजना।

उसका एक सत्य का न तो कोई आरम्भ है, न अंत (अनन्त), उसका न ही कोई आकार है अर्थात रूप रंग या शरीर।  वह सर्वव्यापी है मतलब पूरे ब्राह्मण का कण कण वो देख रहा है, उस की दृष्टि से कुछ नही छुपा। उसका कोई रूप रंग शरीर, आकार, प्रतिमा, मूर्ति, चित्र, आदि नही बनाया जा सकता। न सोचा जा सकता है क्योंकि वो हमारी दृष्टि और समझ से बहुत बाहर का अस्त्तिव है। इसलिए उसे कोई मूर्ति या चित्र या आकार न दिया जाए वो खुद कहता है। क्योंकि चित्र में लगने वाले रंग, कागज़, कपड़ा आदि उसी का बनाया हुआ है, वह खुद नही है.  मूर्ति की मिट्टी उसकी बनाई हुई है, वो खुद मिट्टी नही है।

वंही ईश्वर खुद अपने संदेशों में कह चुका है कि मेरा न आकर है न प्रतिमा न तस्वीर। जब वो खूद कह रहा है है तो हम कौन होते है उस अपने चित्रों और मूर्तियों में ढालने वाले? जबकि ये भी सत्य है की हम ने जब उसे देखा ही नही तो हम उसे आपने शब्दों, चित्रों मूर्तियों में ढाल ही नही सकते। और देख भी होता अगर तो भी उसके अस्त्तिव को मनुष्य अपनी सीमितताओं के चलते, कैद या कैच कर ही नही सकता। सब प्रयत्न फैल है। हमने उसे रूप मनुष्य जैसा या किस वस्तु जैसा देके उसके निर्देशों का उल्लंघन किया है। उसे पता है कि हम उसे माप ही नही सकते इसलिए उसने मना किया हमें उसे आकार देने के लिए।

मैं किसी बंदर को कंहु की अपने लिए एक भगवान या देवता बना लो तो यकीनन एक बंदर जैसा देवता बनाएगा या उस चीज़ की तरह जो उसके देखी हो।  तभी तो मनुष्य ने ईश्वर को भी मनुष्य का रूप दे रखा है या उन वस्तओं का जो हमने देख रखी है हमारे आस पास है जैसे पेड़, अग्नि, सांप जानवर आदि।

कहते हूं कि आरम्भ में ध्यान केंद्रित करने के लिए मूर्तिपूजा का सहारा लिया जाता। अच्छा मान लिया तो आज तक कोई नही मिला मुझे ये कहे कि वह अब परिपक्व हो चुका है और इसलिए उसने पूर्तिपूजा छोड़ दी है। ऐसे कोई व्यक्ति नहीं हुआ आज तक। मूर्तिपूजा भी दूसरी आदतों की तसह खून में बस जाती है।

हम मुसलमान फिर तो पहले से ही परिपक्व है कि हमें ध्यान लगाने के लिए पूर्ति की आवश्यकता ही नहीं पड़ती। हम पहले ही ऊंची स्टेज में पहुंचे हुए है।

मूर्तिपूजा सबसे पहले यूनान से शुरू हुई। फिर बौद्ध धर्म और जैन धर्म से होती हुई भारत में आम जन की प्रथा बन गयी।  अरबी भाषा मे बुद्ध को बूत कहते थे जिनकी सबसे पहले बड़े पैमाने पर मूर्तिया बननी शुरू हुई थी उस समय।

अगर ईश्वर कञ कञ में है तो फांसी दिए गए अपराधी में भी ईश्वर होना चाहिए। पत्थर में ईश्वर है तो दो पत्थर को टकराओ तो क्या ईश्वर से ईश्वर टकरा जाएगा। मूर्तिया तो बाद में आई, पत्थर तो पहले से था तो फिर ईश्वर मूर्ति में नहीं पत्थर में हुआ। उसका रूप मानकर बनाई है तो उसका रूप कब  कंहा किसने कैसे देखा? भावनाओ से पत्थर में ईश्वर दिखता है तो फिर स्वामी दयानंद कह के गए है कि मिट्टी को चीनी मानने से वो चीनी नहीं हो जाएगी। आर्य समाजियो का मत है कि कञ कञ में ईश्वर है पर कञ कञ ईश्वर नहीं है।

महाभारत काल से पतन शुरू हुआ और मूर्तिपूजा शुरू हुई। इससे पहले मूर्तिपूजा नहीं थी। यूनान से शुरू और यंहा बौद्ध ने शुरू की, देखम देख जैन ने अपने तीर्थंकरों की और फिर हिन्दुओ ने अपने महापुरुषों की जैसे शंकर, राम और कृष्ण। इन्ही मूर्तियों को देखने के लिए मंदिर में रखा जाए लगा। कमरे में अंधरे के कारण दीपक जलाना, सत्कार और दीर्घायु, विजय प्राप्ति और रक्षा के लिए आरती और भेंट के बदले चढ़ावे शुरू हुए। मूर्तिपूजा कुछ लोगों की आय का साधन बन गया। 

जड़ मूर्ति हम बनाते है और चेतन मूर्ति हम है जो ईश्वर ने बनाई है। प्राण प्रतिष्ठा केवल ईश्वर कर सकता है जो वो हमारे साथ करता है।

पूजा के कई अर्थ होते है जो वस्तु संबंधित अर्थों में प्रयोग होते है जैसे आदर, सम्मान, सेवा, पालन करना, इच्छाओं को पूर्ण, योग्य व्यवहार करना, उपदेश सुनना, वस्तु का उचित प्रयोग करना, सुधार हेतु दंड देना, शिक्षा लेना देना, आपूर्ति करना और तृप्त करना आदि।

जड़ मूर्ति की पूजा से मतलब उसका सही प्रयोग करना है। जैसे पेट पूजा का मतलब भूख मिटानी है। तुलसीपूजा का मतलब उसका औषधीय उपयोग करना है। गंगाजल पूजा का मतलब उसका सेवन करना है। माता पिता की पूजा उनका सम्मान करना है। भगवान की पूजा से मतलब उनका सम्मान और अनुसरण करने से है।  महाभारत के अनुशासन पर्व (13) के 145 अध्याय में मां बाप की पूजा करना उनका सत्कार, सम्मान, आदर करने को बताया गया है।

उपासना बना है शब्द उप (निकट) और आसन (बैठना) से और इसका अर्थ है समीप बैठना यानी ईश्वर के समीप आ जाना। किसी वस्तु के समीप आने पर उस वस्तु के गुण हमें अनुभव होने लगते है और हम में भी पैदा होने लगते है। आग या बर्फ के पास बैठने से ऐसा ही होता है। वेदों में यही शब्द प्रयोग हुआ है। रामायण महाभरत पुराणों आदि में श्रीराम और श्रीकृष्ण द्वारा की जाने वाली आराधना के लिए संध्या शब्द भी प्रयोग हुआ है।



दीन में हज या ज़ियारत की क्या ज़रूरत है?

दीन में हज या ज़ियारत की क्या ज़रूरत है? क्या है गैरों की तरह तीर्थस्थल पर जाना, उनकी तरह रसुमात निभाना नहीं है? नमाज़, रोज़े, ज़कात के फायदे तो वाज़ेह हैं मगर हज के क्यों नहीं हो पाते?

इंसान अपनी चीजों, पहचान, प्रतीकों, बुनियाद, जड़ो, परम्पराओं आदि से बहुत ज़्यादा जुड़ाव, लगाव, अपनापन महसूस करता है। ये एक प्राकृतिक गुण है जो इंसानों में आम तौर पर पाया जाता है। इसलिये ऐसी भावुकता और संबध, इंसानों के द्वारा हर क्षेत्र में प्रदर्शित होती है। ऐसी चीज़ें इंसान की असल बुनियादें होती हैं और बुनियादों से मोहब्बत महसूस करना इंसानी फितरत है। ऐसी बुनियादों, परंपराओं, धरोहरों से जुड़ा रहना एक इंसानी ज़रूरत भी है क्योंकि इंसान सिर्फ जिस्म ही नहीं बल्कि जज़्बातों का पुतला भी है। इंसान को अपने भावुक पहलुओं की पूर्ति करने की ज़रूरत होती है वर्ना एक कमी, खला इंसान में बाकी रहती है। आम तौर पर ऐसी चीज़ें इंसान पर गहरा रूहानी और जज़्बाती असर डालती हैं।

ऐसी चीजों से हर इंसान एक सा ही महसूस करें ये ज़रूरी नहीं, कुछ में ये भावना कम महसूस हो सकती है, जिसकी कई वजह हो सकती हैं। शायद सभी को वंहा ऐसी अनुभूति न हो, मगर बहुतों को होती हैं।

ऐसा ही अनुभव इंसान को परंपरागत रसुमात, तहज़ीबी रिवाजों, धार्मिक रीतियों को निभाते हुए भी होता है। इनसे इंसान को उन चीजों से जुड़े होने का, अपनेपन का, लगाव होने का महसूस होता है। ये चीज़ें उसकी बुनियादीफितरत या ज़ुरूरतों को पूरा करती हैं।


प्रत्येक संस्था, आंदोलन, विचारधारा (धर्म का भी) का एक केंद्र होता है जंहा से वो पूरा सिस्टम जुड़ा होता है या चलाया जाता है या जहाँ से वो शुरू हुआ होता है। अक्सर ये केंद्र उस जगह होते हैं जंहा पर उस विशेष संस्था के संस्थापक रहे होते हैं या उस विचारधारा का सबसे बड़ा गढ़ होता है। अगर ऐसा कोई केंद्र ने हो तो ऐसे संस्थान शक्ति, प्रेरणा, सामूहिक एकता आदि का अभाव महसूस करते हैं और जल्दी बिखर भी सकते हैं। इनके कार्यकर्ता, अनुयायी, भक्त आदि उस केंद्र से जुड़ाव, लगाव रखते हैं बल्कि केंद्र से जुड़े रहने के लिए प्रयासरत रहते हैं और वंहा अक्सर आते जाते भी रहते हैं। जैसे किसी राजनैतिक पार्टी के कार्यकर्ता अपने मुख्यालय या हाई कमान के घर के प्रति भी यही भाव और व्यवहार रखते हैं। 

बल्कि पार्टी के सबसे बड़े नेता या संस्थापक, सूत्रधारक जैसे गांधी, सावरकर, लेनिन आदि से सम्बंधित स्थानों, प्रतीकों, धरोहरों के प्रति भी ऐसी ही आस्था रखते हैं। 

बच्चें अपने माता पिता, दादा दादी आदि के ज़ाती सामानों, पुराने घरों या शहरों या देशों से भी ऐसा ही लगाव और चाह रखते हैं। उन समान को संजोना और उन जगहों पर जाना पसंद करते हैं बल्कि बहुत से लोग तो उन जगह को बेचते नहीं हैं। माइग्रेशन करने वाले लोग अक्सर अपने पुराने स्थानों पर घूमने जाना बेहद पसंद करते हैं। बहुत से फिल्मी स्टार्स पाकिस्तान में अपने पुराने घरों, गलियों में जाना अपनी ज़िंदगी की आखिरी ख्वाहिश बताते हैं। यही हाल उनका भी है जो बहुत पहले दूसरे देशों में जा कर बस गए थे। उनकी नई पीढ़ी वंही पैदा हुई, वंहा के माहौल में पली, आज के फ़ास्ट लाईफ़स्टाइल के प्रभाव में बढ़ी हुई है। उन्होंने उस भाव से अपने बुजुर्गों या उनकी बुनियादों सेअधिक लगाव महसूस ही नहीं किया। इसलिए अक्सर उनमें अपने बढ़ो और अपनी जड़ों के प्रति वो भावना पैदा नहीं हो पाती है। जबकि शहरों में गांव देहात छोड़कर आये लोग, आज भी अपने मूल स्थानों से जुड़े रहते हैं।

इसी तरह जो लोग इतिहास पढ़ते, पढ़ाते हैं, इतिहास के जानकर होते है, जो लोग पुरात्तव विज्ञान, एंथ्रोपोलॉजी आदि से जुड़े हुए हैं, वो भी पुराने स्थानों, पुरानी चीजों आदि से बेहद जुड़ाव, लगाव रखते हैं। अक्सर ऐसे लोग जब किसी ऐसे स्थान पर जाते हैं जिसके बारे में बहुत पढ़ा, सुना था तो वंहा जा कर वो अनुभव करते हैं कि जैसे उनका जीवन सफल हो गया। वो हर चीज को गौर से देखते हैं, चप्पा चप्पा घूमते हैं, लंबा समय वंहा बिताते हैं, उनसे जुड़ी चीजों को याद करते हैं। उनके लिए ये विज़िट एक शानदार तजुर्बा बन जाता है। ऐसी विज़िट उनके दिलों दिमागों में इतना ज़्यादा असर डालती है कि वो लोग इसे ज़िंदगी भर याद रखते हैं बल्कि यंहा हुए एहसासात को बयान भी करते हैं। प्रसिद्ध आर्कियोलॉजीसट के.के मुहम्मद ने एक बार कहा था कि जब भी वो आगरा के किले में जाते हैं तो उन स्थानों पर समय बिताते हैं जंहा बादशाह अकबर समय बिताया करता था और जिन पगडंडियों पर अकबर चला करता था, उन पर चलकर उन्हें ऐसा लगता है जैसे कि वो भी अकबर के साथ चल रहे हैं। 

यंहा तक कि बच्चों और नवयुवक स्टूडेंट्स को भी ज़ू, म्यूज़ियम, हिस्टोरिकल प्लेसेज का दौरा करवाया जाता है ताकि उन्होंने जो पढ़ा, सुना है, उसे वो हकीकत में भी एक्सपीरिएंस कर सकें।

इस्लाम धर्म में मक्का शुरवात से ही एक केंद्र रहा है। अनेकों पैगम्बर इस जगह से जुड़े रहे हैं। इब्राहिम अलैह. के बाद तो यंहा से एक गहरा ताल्लुक बन गया था। उनकी परम्परा को मुहम्मद सल्ल. ने आगे बढ़ाया। इसमें हज भी शामिल है। इस्लाम के आखिरी नबी की पूरी ज़िंदगी मक्का, मदीना से जुड़ी रही है। हम उनके अनुयायी और उम्मत हैं। तमाम अम्बिया हमारे लीडर, रोल मॉडल हैं। उनसे जुड़े काम, चीज़ें, परम्परा, स्थान, पहलू हमारे लिए एक याददिहानी है, अलार्म, असाधारण तजुर्बा और इतिहास में टाइम मशीन विज़िट हैं।  

नबी की ज़िंदगी, हर कार्य हमारे लिए एक प्रेरणा है, जिससे रोज़ हमें सीखना है। इस सीख के लिए, इंसानी जज़्बातो की पूर्ति के लिए हमें एक ट्रेनिंग, ओरिएंटेशन करने की ज़रूरत होती है।  इस क्रेश कोर्स के लिए ही हज, उमराह पर जाते हैं।  ऐसे कोर्स हर संस्था, कंपनी अपने स्टाफ, वालंटियर्स को साल में अक्सर करवाती रहती है और उनकी स्किल अपग्रेड करती रहती है बल्कि इसके लिए उन्हें दूसरे शहरों, देशों में भी भेजती हैं।

हालांकि हज, उमराह संबंधित अरकान अदा करते हुए शिद्दत इख्तियार नहीं करनी चाहिए और ओवर इमोशनल हो कर चीजों को ऐसे अदा नहीं करना चाहिए कि दूसरों को तकलीफ हो या खुद हंसी का पात्र बन जाओ। ऐसा करने वालों को हज, उमराह से मिलने वाली रूहानी ताकत और फितरती ज़रूरतें पूरी नहीं होगी बल्कि ये सिर्फ खोखली प्रैक्टिस बन कर रह जायेगी। जैसे आज मुस्लिम नमाज़, रोज़े ज़कात के साथ कर रहे हैं। इन सभी इबादतों की हकीकत मुसलमानों की अक्सरियत खो चुकी है। जैसे क़ुरान को भी सिर्फ अरबी में पढ़ने तक सीमित कर दिया गया है।

क़ुरान में बताए गए इन इबादतों के नतीजे अगर उन लोगो में दिखाई नहीं दे रहे जो इन्हें अंजाम दे रहे हैं तो ऐसे तमाम लोगों को सोचने की ज़रूरत है उनसे कंहा पर कमी रह रही है।  

इसलिए हर धर्म में रीति रिवाज़ों, रसुमात, परम्परा आदि का एक विशेष भाग अवश्य होता है। इनके पीछे की सच्चाई जानने की और इनसे होने वाले फायदों की निष्पक्ष जांच अवश्य करनी चाहिए। 

बाकी ज़ियारत के अरकानों के उद्देश्य, रीजनिंग की कुरानिक डिटेल अलग हैं। साल में एक बार क्यों, अमीरों पर ही फ़र्ज़ क्यों, क़ुरान के अनुसार इससे क्या हासिल होता है, जैसे सवालों पर कभी और बात करंगे। यंहा अभी ज़्यादातर दुनियावी लिहाज़ से बात रखी गयी है की ज़ियारत की ज़रूरत क्या हो सकती है।
 
■ कुरान में जहा भी हज का जिक्र है, वहा दुनिया के लोगों का जिक्र है। (अननास: दुनिया के लोगों)।  दुनिया के लोगों में ऐलान कर दो। जहा काबे का हज का जिक्र है।
Purpose of Hajj: Quran (22:27-28) says Proclaim to mankind, the pilgrim. They will come to you on foot and on camel.  That they may witness for them and mention the name of Allah. On days known over what he has provided them o beast cattle.
 

Monday, 22 April 2024

सबसे बड़ा धर्म इंसानियत है या सभी धर्म समान है, ऐसा कहना कितना उचित है?

सबसे बड़ा धर्म इंसानियत है या सभी धर्म समान है, ऐसा कहना या मानना कितना उचित है? 

किसी अंतर्धार्मिक सभा में छोटे से भाषण के दौरान या फिर किसी अजनबी गैर धर्म के अनुयायी के साथ थोड़ी सी बातचीत के दौरान, ये कहना कि सबसे बड़ा धर्म इंसानियत है या सभी धर्म समान है, या इसका समर्थन करना, क्या नाजायज़ है?

■  सबसे बड़ा धर्म या मज़हब इंसानियत है। ऐसा कहने वाले अक्सर दो तरह के लोग होते हैं, पहले आस्तिक और दूसरे नास्तिक। 

● अगर कोई आस्तिक या कोई मुस्लिम या हिन्दू, ऐसी बात कहता है तो हमें समझ लेना चाहिए कि..

इस्लाम में हर अमल का दारोमदार नियत पर है। हर चीज़ पर जब हमारी पकड़ होगी तो उसमें हमारी नियतें सबसे अहम रोल निभाएंगी। किसी पर कोई हुक्म लगाने, फतवा देने या किसी को जज करने से पहले ठोस सबूतों को बुनियाद बनाने की बात भी इस्लाम करता है। इसलिये किसी के मुंह से कोई असामान्य जुमला सुनने के बाद, उस शख्स या उस जुमले के ऊपर कोई सख्त फैसला लेने से पहले कही गयी बात का मौका, मेहल या कॉन्टेक्स्ट अच्छी तरह जान लेना चाहिए।

पहली बात, धर्म के मायने सिर्फ दीन के नहीं होते, धर्म व्यक्तिगत कर्तव्य को भी कहा जाता है जैसे अहिँसा परमो धर्म या जैसे गीता में श्री कृष्ण द्वारा अर्जुन को ये बताना कि युद्ध ही उसका धर्म है। इसी तरह मज़हब लफ्ज़ भी सिर्फ दीन के लिए ही नहीं बल्कि पंथ, मत वगैरह के लिए भी इस्तेमाल होता है। दरअसल आस्तिकों द्वारा ये बात कहना कि इंसानियत सबसे बड़ा धर्म है दरअसल, इंसान के एक सामाजिक प्राणी होने के नाते, व्यक्तिगत कर्तव्य के अर्थ में कही जाती है।

दूसरी बात अगर ये मान भी लिया जाए कि वो धर्म यानी दीन की बात कर रहा है तो भी अन्य कई तर्कों के आधार पर ऐसा मानना गलत हो जायेगा। जैसे कि अगर वाकई कोई आस्तिक इंसान, इंसानियत को सबसे बड़ा धर्म मानता होता तो वो व्यक्ति अपनी ज़िंदगी में किसी भी धर्म को नहीं मान रहा होता। मतलब वो इस्लाम या हिन्दू धर्म का अनुसरण नहीं कर रहा होता, न ही ऐसा हमें दिख रहा होता और न ही वो ऐसा दिखा रहा होता। वो तो अपना मूल धर्म छोड़ चुका होता और सिर्फ इंसानियत मान रहा होता । मगर असल में ऐसी बात कहने वाला व्यक्ति अपने ही धर्म को सच्ची श्रद्धा से मान रहा होता है और इंसानियत को सबसे बड़ा धर्म भी बता रहा होता है, यानी कि उसने ऐसी बात किसी विशेष संदर्भ में कही है। 

तीसरी बात, अगर इसका मतलब यही होता कि सभी इंसानियत धर्म अपना लो और अपना अपना मूल धर्म छोड़ दो तो ऐसी बात कहने वाला किसी भी महफ़िल से शायद ही ज़िंदा वापिस आता। बल्कि किसी की ऐसी बात पर तो जनता उलटा ताली बजाती है क्योंकि इस बात का असल मतलब क्या है, ये लोग अच्छी तरह से जानते, समझते हैं। असल में लोग अच्छी तरह जान, बूझ रहे होते है कि ऐसा कहने वाला ये बात सिर्फ इंसानियत या अखलाकियात की ओर तवज्जो दिलाने के लिए कह रहा है, लोगों को आपस में प्रेम, करुणा, दया आदि पैदा करने को कह रहा है, न कि अपना धर्म छोड़ कर इंसानियत अपनाने को।

ऐसी चीज़ें अक्सर एक खास तरह के मौके, महल में कही जाती है जिनका मतलब 100% लफ़ज़न लेने से मसले पैदा हो जाते हैं। इसलिये इन्हें लफ्ज़ के ऐतबार से नहीं बल्कि कॉन्टेक्स्ट के हिसाब से देखना चाहिये। ऐसी बात कहना का मतलब सिर्फ यही होता है कि कोई भी धर्म हो, उसमें सबसे बड़ा हिस्सा इंसानियत यानी अखलाकियात का होता है और सभी को इंसानियत पर सबसे ज़्यादा ज़ोर देना चाहिये। यानी ये बात इंसानों के इंसानो से संबंध और व्यवहार के मामलो में कही जाती है। लिहाज़ा किसी खास मौके, महल के मुताबिक ऐसा कहना या इसका समर्थन करना गलत नहीं है।


अगर कोई नास्तिक या लामज़हब टाइप का व्यक्ति ऐसी बात कह रहा है तो आमतौर पर उसका मतलब यही होता है कि सब धर्म बेकार है, उन्हें छोड़ो और सिर्फ इंसानियत अपनाओ। वो ये बात 'अक्सर' धार्मिक लोगो को तंज़ के अंदाज़ में कहते हैं।

ऐसे लोगों की बात आप खामोशी से सुन सकते हैं या फिर उन्हें प्यार से बाद में समझा सकते है कि धर्म ने ही इंसानियत की नींव रखी है। इंसानियत पर सबसे अधिक जोर धर्म ही देता है भले ही लोग प्रक्टिकली ऐसे नहीं दिखते हो क्योंकि लोग आज नकली धार्मिक बने जो घूम रहे हैं। हालांकि ये धर्म ही जिसने लोगों को पूरी तरह से बुरा बनने से रोक रखा है अगर धर्म नहीं होता तो ये दुनिया इससे भी ज़्यादा बुरी होती।

तमाम धर्मों के बुनियाद में इंसानियत या अखलाकियात हैं सो इंसानियत को सबसे बड़ा धर्म या दीन बनाने वाले और इस पर सभी इंसानो का इत्तिफाक करवाना चाहने वाले, इस तरह दुनिया में एक और धर्म पैदा कर रहे हैं। क्योंकि इस पर भी सभी इत्तेफाक नहीं कर पाएंगे। कल को इसके मानने वाले भी बिगाड़ पैदा कर लेंगे तो फिर एक और धर्म पैदा करना पड़ेगा। फिर शायद विज्ञान एक नया धर्म बना देंगे। जब भी कोई नया मत किसी के खिलाफ खड़ा होता है तो अक्सर पुराने मत भी खत्म नहीं हो जाते इसलिए इंसानियत या विज्ञान को धर्म बनाने के बाद भी बाकी धर्म भी कायम रहंगे।


जिसके नज़दीक जो सबसे अहम चीज़ होती है, वो वही चीज़ सबसे बड़ा काम बताता है। जैसे एक मां दुनिया का सबसे अहम काम मां की सेवा बताएगी और एक पत्नी अपनी सेवा। एक सिपाही देश की सेवा बताएगा और एके गरीब गरीबों की सेवा। यानी व्यक्तिगत तौर लार अलग अलग राय इस पर होती है। मगर जब इंसान एक समुदाय के तौर पर इस पे गौर करते हैं तो मजमुई तौर पर इंसानियत को ही सबसे अहम काम पाते हैं जो सही भी है। मगर इस पर आखिरी तौर पर फैसले उसका होगा जिसने इंसान को बनाया है। उसने अपने ताल्लुक़ से बता दिया है कि मुझे याद रखना, मुझे वक़्त देना और इंसानों के ताल्लुक से बता दिया कि इंसानियत पर कायम रहना। पर अगर इंसान उससे ताल्लुक को काट ले और सिर्फ इंसानों से जोड़ ले तो यही अन्याय है। जैसे कोई इंसान मां बाप से रिश्ता तोड़ ले जो उसे उसे पैदा करने है और हमेशा लोगों की सेवा में लगा रहे। वैसे इंसान को मां बाप और बाकी सब नैमतें देने वाला खुदा तो सबसे बढ़ कर है, उसके आगे तो किसी को तवज्जो नहीं दी जायेगी। उसके साथ जो रिश्ता है, वो बाकी सभी रिश्तों से बड़ा है। इस दुनिया का मालिक बता चुका है सबसे पहला सवाल वो अपने बारे में ही करेगा की मेरे बारे में क्या मानते थे और उसी ने ये भी बता दिया है कि सबसे बड़ी खिदमत इंसानियत की सेवा है। अगर लोगों को खुदा से ऊपर इंसानों को ही रखना है तो फिर लोग हर काम का सिला भी इंसानो से ले लिया करे जो अक्सर मिलेगा ही नहीं। 

इस्लाम के सभी आदेश 4 भागों में बांटे जा सकते है, एक खुदा से मुत्तालिक जो सबसे अहम हिस्सा है, दूसरा बदन की सफाई से मुताल्लिक, तीसरा खाने की पाकीज़गी से मुताल्लिक और चौथा, इंसानो के मुत्तालिक अखलाकियात जो सबसे बड़ा हिस्सा है। इनमें अखलाकियात ही दुसरो से संबंधित है बाकी तो अपने और खुदा के बीच के मामले हैं। अखलाकियात का मतलब है जो बुनियादी नैतिकता इंसान अपने बातिन में महसूस करता है। ये पूरी दुनिया में एक जैसी ही रहती हैं। अखलाकियात को ही इंसानियत कहते हैं। क़ुरान में इसे मारूफ (अच्छाई) और मुनकर (बुराई) से भी ताबीर किया गया है। इंसान केवल शरीर नहीं है बल्कि एक आत्मा भी है, इस आत्मा की तृप्ति अध्यात्म से होती है इसलिए इंसान कभी धर्म को छोड़कर सुकून नहीं पाता है। इस तृप्ति को इंसानियत या विज्ञान मुहैय्या नहीं करवा सकते क्योंकि ये उनका विषय ही नहीं है।


■ किसी मौके, महल पर अगर कोई संक्षेप में कहे कि सभी धर्म बराबर है, समान है, एक हैं और हम सबको मानते हैं तो इसमें कोई बवाल खड़ा करने की ज़रूरत नहीं है।

ऐसी बातें अक्सर दूसरे धर्म वालों से थोड़ी सी मुलाकात में भाईचारा, एकता बढ़ाने और दूसरे धर्मों के प्रति सम्मान दिखाने के लिए कह दी जाती हैं। ऐसी बातें सभी धर्मों को लोगों को एक करने और साथ लाने के लिए कही जाती है। ऐसे मेलमिलाप के माहौल में यह कहना कि मेरा धर्म अलग है और तुम्हारा अलग, मेरा धर्म बड़ा है और तुम्हारा छोटा, मेरा धर्म तो मैं पूरा मानता हूँ और तुम्हारा बिल्कुल भी नहीं, ऐसा कहना प्रेम की बजाए नफरत के बीज बो देगा। अगर ऐसी बात कहना वाला कोई व्यक्ति प्रैक्टिकली वाकई सभी धर्मों में ज़रा सा भी अंतर नहीं पाता तो वो व्यक्ति प्रैक्टिकली सभी धर्मों का अनुसरण कर रहा होता। ऐसी बातों को भी कॉन्टेक्स्ट में देखना चाहिए।

सभी धर्म नैतिकता या अखलाकियात पर ज़ोर देते हैं। सभी आस्तिक धर्मों में ईश्वर, परलोक और कर्मों के कांसेप्ट मौजूद है, किसी न किसी रूप में। सभी धर्म मूलभूत रूप से इंसान को अच्छा बनने पर ज़ोर देते हैं। आखिर ऐसे सभी धर्मों का निचोड या निष्कर्ष एक ही निकलता है। इन बातों के मद्देनजर भी कोई किसी अंतर्धार्मिक सभा में आस्तिकों की मेजोरिटी के सामने, ऐसा कह दे तो इसमें नाराज़ होने वाली बात नहीं। 

वैसे भी क़ुरान कहता है कि कोई भी धर्म वालें हो अगर वो ईश्वर, परलोक, आख़िरत में विश्वास करने वाले और अच्छे कर्म करने वाले हुए तो उनके लिये ईश्वर के पास इनाम है। गौर करने वाली बात ये है कि इसमें रिसालत को बुनियाद नहीं बनाया गया है।

अगर कोई व्यक्ति ऐसी बात सुनके ये समझ भी ले कि इस्लाम, हिंदूइस्म, ईसाइयत, सिक्खीज़्म किसी भी धर्म को मानो, बात एक ही है तो इसमें भी गुस्सा करने की ज़रूरत नहीं है। ये तो अल्लाह की ही स्कीम है कि लोगों को अलग अलग धर्म में पैदा किया और उनके इल्म, समझ, हालातों वगैरह के अनुसार ही उनका हिसाब होगा। उन तक कितना दीन पहुँचा और कितना उनको दिल से समझ आया, इसके अनुसार उनका हिसाब होगा। नहीं पहुँचा या कतई समझ नहीं आया तो भी अल्लाह इसी के अनुसार हिसाब लेगा।

ख़ैर अगर ऐसी बात सुनके कोई ये भी समझने लगे कि सब धर्म अपनी जगह सही है, तो ये उसकी कम समझी का नतीजा भले हो मगर नतीजे के ऐतबार से अच्छा ही है। क्योंकि आज के पूरे विश्व में फैले इस्लामोफोबिया माहौल में और भारत मे चालू प्रोपगंडा की आग, हिंदुत्व की लपटों में जंहा हिन्दू धर्म को ही एकमात्र सत्य माना और थोपा जा रहा हो, वंहा पर कोई आपकी बात सुनके इस्लाम के प्रति ये नज़रिया पैदा कर ले कि इस्लाम भी हक़ हो सकता है तो ये एक बड़ी कामयाबी होगी।

वैसे अगर कोई ये कहे कि हम सब एक हैं या सारे इंसान बराबर है तो इस बात को भी हम कॉन्टेक्स्ट में समझते हैं जबकी इंसान अलग अलग होते है और सभी बराबर भी नहीं होते। हम इस बात का मतलब यही लेते हैं कि हम सब एक साथ हैं और कोई ऊंचा नीचा नहीं है।


■ ऐसे ही सब धर्म सम्मानीय है, कहना भी कतई गलत नहीं।

किसी भी धर्म या उसके पूज्यों को गलत नहीं कहना चाहिए। सभी धर्मों का सम्मान करना चाहिए। यही हर धर्म की शिक्षा है।


■ सबसे पहले देश है, ऐसा कहना कितना सही है.

कोई कहे कि सबसे पहले देश है, हिंदुस्तान है और कोई धर्मिक कहे हमारे लिये तो सबसे पहले इस्लाम है या हिन्दुधर्म है। हो सकता है कोई कह दें मेरे लिए तो सबसे पहले मेरे मां बाप या बच्चें हैं। असल में इस तरह की बातों को भी उसके मौके महल के मुताबिक समझना चाहिए।

जैसे जिन्नाह को पाक ने कायदे (क़यादत करने वाला) आज़म (सबसे बड़ा) कहा। फिर मज़हबी लोगों ने शुरू किया कि सबसे बड़ा कायद तो सिर्फ अल्लाह का पैगम्बर ही हो सकता है। जबकि लक़ब देने वालों ने कभी सोचा भी नहीं होगा कि इस नाम से उनका रुतबा नबी के बराबर हो गया है। दरअसल ये लक़ब सियासत के मैदान में था। ऐसे ही जब कोई बच्चा अपने फादर को वर्ल्ड का बेस्ट फादर कहता है तो वो अपने दायरे की बात कर रहा होता है।

● वैसे देश के संविधान ने हर धर्म को मनाने की छूट दी है। भारतवासियों को अपना देश, संविधान भी प्यारा है और अपना धर्म भी। दोनों में किसी एक को चुनने का सवाल ही पैदा ही नहीं होता क्योंकि दोनों ही एक दूसरे का रास्ता नहीं काटते हैं बल्कि एक दूसरे के सहायक हैं। ऐसे सवाल उतने ही बचकाने है जितना किसी से ये पूछना कि आपको दोनों आंखों में से कौन सी आंख प्यारी है या मां बाप में से कौन ज़्यादा प्यारे हैं। 


■ निष्कर्ष 

किसी अंतर्धार्मिक सभा में 2-4 मिनट के भाषण में या किसी गैर धर्म वाले से 2-4 मिनट की बातचीत में ऐसा कुछ भी कहना या इनका समर्थन करना गलत नहीं होता। हर जगह, हर समय, हर बात नहीं समझाई जा सकती। हम सिर्फ मुसलमान ही नहीं है कि इस्लाम का ही पैगाम देंगे बल्कि हम एक इंसान भी है और सामाजिक प्राणी भी जिनकी अपने आस पड़ोस वालो के प्रति ज़िम्मेदारी भी है, उनसे एक रिश्ता भी है और उनके लिए इंसानियत के संदेशवाहक भी। बाद में जब मौका या समय मिलेगा तो पूरी बात समझायी जायगी। 

अगर कोई इंसान ऐसी कोई बात बोलना पसन्द नहीं करता तो वो ऐसा हरगिज़ न बोले। मगर कोई दूसरा व्यक्ति ऐसा कहे और वो इंसान इसका खंडन करे या जनता इस बात पर तालियां बजाने की बजाए पिन ड्राप साइलेन्स कायम कर दें तो सरासर गलत होगा।

हालांकि ये सत्य है कि सबसे बड़ा धर्म तो ईश्वर का ही होगा और जिसे वो धर्म कहेगा, वही धर्म माना जायेगा। ईश्वर एक है तो उसका धर्म भी एक ही होगा और उसका एक धर्म ही सफलता की गारंटी होगा। ये बात समझाने की है और इसे समझने के लिए किसी को समय कम लग सकता है और किसी को ज़्यादा। कोई एक वाक्य में समझ सकता है और कोई लंबी चर्चा के बाद और कोई शायद कभी नहीं।
 
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मूल धर्म और मानवता में कोई अंतर नहीं है।

गलत चीजों का समर्थन किसी को नहीं करना चाहिए।  चाहे वो आस्था ही क्यों न हो।  धर्म और आस्था में ज़मीन आसमान का अंतर है। मैं मूल धर्म जिसमें सबसे बड़ी शिक्षा इंसानों के लिए इंसानियत बताई गई है, का समर्थन करता हूँ । देवी देवतावाद का नहीं पर हां इस आस्था का अनादार नहीं करता क्योंकि अनादर करने से इंसानी जज़्बात हर्ट होते है। धर्म के बिगड़े स्वरूप और आस्थाओं को क्रिटिसाइज करनी चाहिए पर तहज़ीब में। क्रिटिसिज़्म सही हुआ तो समझदार को ऐसी मान्यताएं फ़ौरन छोड़ देनी चाहिए वरना उसका सत्य जवाब देना चाहिए और उचित जवाब न हो तो कटु हुज्जती यानी कट्टरता या ढीढता नहीं दिखाना चाहिए वर्ना पाखंड हो जाएगा। ऐसे ही दोहरे और अंधभक्तों के कारण ही दुनिया का बेड़ा गर्क हुआ है, भारत मे भी। ये हर जगह है कंही कम कंही अधिक। कंही धर्म के, कंही वर्ण, कंही क़ौम, कंही नस्ल के आधार पर ये अन्याय करते है। धर्म, हिन्दू धर्म, ब्राह्मणवाद सब अलग अलग चीज़ें है। सेकुलरज़िम इंसानियत का तकाजा है, जो सबको अपनाना चाहिए। 

इंसानियत और धर्म (मूल रूप में) सीधा संबंध है क्योंकि जितनी भी बातें आज इंसानियत का रूप समझी जाती है वो सभी धर्म के आदेश है। अंतर इतना है कि आम लोगों की तरह आप भी धर्म में गढ़ ली गयी और मिलावट कर दी गयी फिजूल बातों को धर्म मान रहे हो। ये ऐसे ही जैसे एक तो बुद्ध का नास्तिकतावाद है और दूसरा चार्वाक का। धर्म बचाने के लिए कोई अमानवीयता नहीं बरती जा सकती है धर्म यही कहता है पर आम धार्मिक इसके उलट मानता है ये सच है और ऐसे कुकर्मों का दोष उनका अपना है, असल धर्म का नहीँ। तो सच्चा आदमी वही है जो असली धर्म और नकली धार्मिकों में फर्क कर और समझे। नामज़ या टीका, घण्टी पाखण्ड है, कैसे है। तो फिर तो विपश्यना भी पाखण्ड हो जायेगी। नास्तिकता का चोगा पहन के खुगर्ज़ी से जीवन जीना भी कट्टरता है। नास्तिकता का चोगा पहन के खुगर्ज़ी से जीवन जीना भी पाखंड और कट्टरता है। दुनिया मे बहुत चीज़ें है जो समानता पर है अपवाद के साथ। अपवाद हर जगह होते है।  अगर समानता है ही नहीं तो फिर संविधान में जगह जगह जिस समानता की बात कही गयी है वो बेमानी और खोखली हो गई। सेकुलर शब्द का इतिहास और आज उसका प्रसंग जानिए पहले। प्यार शांति इंसानियत, नॉन डीसकर्मिनेशन, सेकुलर रूलिंग ये असल धर्म की ही शिक्षाएं है। अधर्म इनसे दूर ले जाता है। अधर्म (जिसमें नास्तिकता भी शामिल है) लोगों को नफरत करना भी सिखाता है अपवाद के साथ।

हिन्दू धर्म, मूल सनातन धर्म का मिलावटी स्वरूप है जिसका मुख्य ब्राह्मण वर्ग ही है, उनकी स्वीकृति के बिना उनके धर्म में छेड़छाड़ नहीं कि जा सकती थी। जिन फायदों के तहत ऐसा किया गया वही ब्राह्मणवाद है। ये मूलतः सोच का नाम है। ये ब्राह्मणवाद दूसरी क़ौमों और नस्लों में भी देखा जाता है जंहा इनका नाम नया है। ब्राह्मण और ब्राह्मणवाद में भी अंतर है। अपवाद हर जगह है। मैंने अभी तक इस्लाम को ऊपर रखा ही नहीं, पर आपने अधर्म, नास्तिकता को सबसे ऊपर रखा है। यंहा तक कि आपने ही इंसानियत कि सिर्फ और सिर्फ नास्तिकता या अधर्म से रिलेटिविटी साबित करने की कोशिश की है। सबसे अधिक आतंक धार्मिक (नाममात्र के) फेलातें है सच है। पर अधार्मिक भी फेलातें मिलते है कुछ उदाहरण इतिहास में है। ज़यादातर लोग अपनी खुदगर्ज़ी और फायदों के लिए बुरे काम करते है और उसके लिए धर्म सहारा लेते है। ऐसे ही कुछ अधार्मिक भी यही काम करते हुए अधर्म का सहारा लेते है। डिस्क्रिमिनिएशन मूल धर्म नहीं, बनवाती धर्म सीखाता है। डिक्रिमिनशन न करने का अर्थ अपनी पहचानें खतम करना नहीं होता बल्कि पहचानों के आधार पर किसी का जायज़ हक़ ख़त्म न करना होता है। असल धर्म की असली शिक्षा लोगों को सर्वश्रेष्ठ बनाने की होती है जो बन गया वो असल धार्मिक है, जो न बन पाए वो नाममात्र का। 

अच्छा बनके दिखाना नहीं है, बनना उद्देश्य है। क्या अच्छा होना और इंसानियत अलग अलग है। अगर अलग है तो दोनों को परिभाषा दो। अगर अलग नहीं है तो फिर अच्छा बनने या खुद में इंसानियत वापिस पैदा करने के प्रयास पर आप तंज क्यो कर रहे हो। इंसानीयत इंसानों का सर्वश्रेष्ठ रूप ही है, तो फिर धर्म का उद्देश्य गलत कैसे। अगर इंसानियत सर्वश्रेष्ठ नहीं तो आप क्यों इंसानियत वापिस लोगों में पैदा करने पर ज़ोर दे रहे है। अगर सर्वश्रष्ठ है तो धर्म का और आपका उद्देश्य अलग कंहा हुआ। इंसानियत पैदा करना और अच्छा बनाना अलग अलग है फिर तो इंसानियत बुरी हो जायगी। इंसानियत प्राकृतिक है तो अच्छा होना भी तो प्राकृतिक है। या बुराई होना प्राकृतिक है। अच्छा बनना होड़ है फिर तो इंसान बनना भी होड़ हो जाएगी। मानव जब पैदा होता है तो प्राकृति पर  पैदा होता है यानी इंसनियत पर या अच्छाई पर। फिर ये दोनों अलग कैसे हो गए। तुम्हरा मतकब तो यही निकल रहा है कि अच्छा होना बुरी बात है और  इंसनियत होना अच्छा।
 

दर्शन विज्ञान और ईश्वर

   दर्शनशास्त्र की 3 शाखाएँ हैं:- I. तत्वमीमांसा/ तत्वज्ञान (Metaphysics - beyond physics/theory of reality) [तत्व, अस्तित्व, वास्तविकता का ...