Wednesday, 18 December 2024

पर्दा-हिजाब और मर्द-औरत का छूना

 

 24.32: और ईमानवाली स्त्रियों से कह दो कि वे भी अपनी निगाहें बचाकर रखें और अपने गुप्तांगों की रक्षा करें। और अपने शृंगार प्रकट न करें, सिवाय उसके जो उनमें खुला रहता है। और अपने सीनों (वक्षस्थल) पर अपने दुपट्टे डाल रहें और अपना शृंगार किसी पर ज़ाहिर न करें सिवाय अपने पतियों के या अपने बापों के या अपने पतियों के बापों के या अपने बेटों के या अपने पतियों के बेटों के या अपने भाइयों के या अपने भतीजों के या अपने भांजों के या मेल-जोल कीस्त्रियों के या जो उनकी अपनी मिल्कियत में हो उनके, या उन अधीनस्थ पुरुषों के जो उस अवस्था को पार कर चुके हों जिससें स्त्री की ज़रूरत होती है, या उन बच्चों के जो स्त्रियों के परदे की बातों से परिचित न हों। और स्त्रियाँ अपने पाँव धरती पर मारकर न चलें कि अपना जो शृंगार छिपा रखा हो, वह मालूम हो जाए। ऐ ईमानवालो! तुम सब मिलकर अल्लाह से तौबा करो, ताकि तुम्हें सफलता प्राप्त हो

 

---------------------------------------

 पर्दा 

लोग बुर्के को कोई दीन का कोई पैमाना मानते ही क्यों हैं? बुर्के, निकाब का न इस्लाम से कोई लेना देना है और न ही इस्लामिक संस्कृति से। क़ुरान जिसकी तालीम देता है वो हिजाब है और हिजाब सिर्फ कपड़ो से ही संबंधित चीज़ नहीं है। ये अपने पूरे व्यक्तित्व में ढालने वाली एक हया से सम्बंधित हिदायत है। हमारी औरतें वो तो वैसे ही रहती हैं जैसे नबी के वक़्त में तमाम मुस्लिम औरतें रहती थी। आप के घर की औरतें काला टेंट डाल के बाहर निकलती है तो उसका इस्लाम से कोई लेना देना थोड़ी है। बुर्के से अच्छा है कब्रों में चिनवा दो जो कोई ज़रा सा भी न देख पाए। मर्द खुले सांड की तरह जंहा मर्ज़ी घूमे। ये है आपका इस्लाम? क्यों इस्लाम की अपनी जहालत की वजज भद्द पिटवा रहे हो? बिना दलील के ही करना है, तो फिर आपके घरों के मर्दो को भी बुरका पहनना चाहिए।

मैं तो हदीसों को मानता हूँ, मगर क़ुरान और सुन्नत से नीचे। वैसे तमाम मुहद्दिसो ने 5 लाख से भी ज़्यादा हदीसों को ठुकराया है और उन्हें जो तहक़ीक़ में ठीक लगी उसे अपनाया। क्या यह भी मुन्करे हदीस हैं? 


हुलिए पर फोकस कर रहे हैं जबकी इस्लाम का फोकस कर्मो पर है। वो भी उस हुलिये पर जो इस्लाम में बुनियादी तौर पर है ही नहीं। टोपी इस्लाम का हुकुम नहीं है. नकाब सभी औरतें के लिए नहीं है। हिजाब, कुरान में ऐसा नहीं है जैसा हम सर ढकने वाला मानते हैं। अल्लाह का अज़ाब या भारत में मुस्लिमों से नफ़रत का असली कारण हमारा  हुलिया नहीं हमारी बद्ददीनी है। परदे के आलवा कयामत तक करना ही है तो बहुत से अहद है करने वाले. 

 --------------------------------------- 

 

 कल्चरल तौर पर औरतों के साथ हाथ मिलाना या गले लगाना

कल्चरल तौर पर औरतों के साथ हाथ मिलाने में कोई हर्ज़ नहीं है जब तक आपकी ज़हनियत पाक़ है। हाथ मिलाने के पीछे मक़सद व्यभिचार है तो फिर गुनाह है।

क़ुरान और हदीसों में कंही नहीं कहा गया है कि औरतों से हाथ मिलाना मना है। नबी ने एक हदीस में कहा कि वो औरतों से हाथ नहीं मिलाते थे। आपने यह नही कहा कि ये मेरे या सबके लिए ममनू है। हाथ मिलाने और बयत करने में फ़र्क़ होता है, बयत में लंबे वक्त तक हाथ मज़बूती से थामना होता है।

यानी ये आप का एक ज़ाती तरीका था क्योंकी आप एक नबी, मज़हबी रहनुमा, सियायी लीडर, समाज सुधारक थे। ऐसे लोगों को आज भी ऐसे मामलात से दूरी बना के रखते ताकि किसी भी तरह की साजिश, स्केंडल के ज़रा से भी इल्ज़ाम, इमकानात जड़ से खत्म कर जा सके।

एक हदीस में नामेहरम औरतों को न छूने की हिदायत दी गयी है और एक में कहा गया है कि हाथ भी ज़िना करते हैं। दोनों हदीसे बदकारी, ज़िना के तौर पर छूने के बारे में हैं, न कि कल्चरल या ज़रूरतन।

बेहतर है कि औरतों से हाथ न मिलाया जाय, मगर बेहतर का ऑपोज़िट ममनू नहीं होता। यानी इससे हाथ मिलाना हराम या नाजयज़ नहीं हो जाता। 

ज़रूरत पड़ने पर जिसे मिलाना है, मिला सकता है, अपने हुदूद में रहकर। क्योंकी बाज़ वक़्त न हाथ मिलाने पर अजीब सी सिचुएशन हो जाती है। जंहा कल्चरल है वंहा तो मिलाना पड़ता ही है। वैसे बचना बेहतर है। बाकी वसवसे किसी भी तरह से आ सकते हैं। 

यही नियम औरत को छुने के बारे में (जैसे ग्रीटिंग के वक़्त कल्चरल तौर पर गले मिलना) ध्यान रखे जायेंगे. हम जानते हैं कि मेडिकल ज़रूरतों या जान के खतरों में मर्दों द्वारा औरतों को छूने में आम तौर पर किसी को ऐतराज़ नहीं है. नबी का अमल और तालीम यही थी कि आप किसी भी ममनू अमल की तरफ ले जाने वाली ज़रा सी संभावना को भी पहले दर्जे में ख़तम कर देते थे. इसीलिए आपने मर्द और औरत को अकेले साथ होने को भी मना किया था क्योंकि किसी तीसरे के बगैर शैतान के बीच में आने की संभावना बढ़ जाती है. इसलिए देवर-भाभी के मेलजोल पर नबी ने इसे मौत कहा था, क्योंकि इस रिश्तें में अमूमन घर में ही संपर्क, मेलजोल बिना तकल्लुफ़ हो जाता है. 

नियत पीछे से साफ हो मगर आगे काम गलत हो जाये तो अल्लाह पीछे से नहीं पकड़ता। नियत पीछे से ही गलत थी और आगे काम भी गलत हो गया तो अल्लाह पीछे से आगे तक की पूरी पकड़ करेगा।

लौंडी, बांदी, गुलाम

 

23.5-6 / 70.29-30: जो अपने गुप्तांगों की रक्षा करने वाले हैं परन्तु अपनी पत्नियों तथा अपने स्वामित्व में आयी दासियों (अपनी लौंडियों) से, तो वही निंदनीय नहीं हैं।

या, और में अंतर है।

बीवी हो तो बाँदी नहीं (यह मक्की सूरत है)

33.50: ऐ नबी! हमने तुम्हारे लिए तुम्हारी वे पत्नियों वैध कर दी है जिनके मेहर तुम दे चुके हो, और उन स्त्रियों को भी जो तुम्हारी मिल्कियत में आई, जिन्हें अल्लाह ने ग़नीमत के रूप में तुम्हें दी और तुम्हारी चचा की बेटियाँ और तुम्हारी फूफियों की बेटियाँ और तुम्हारे मामुओं की बेटियाँ और तुम्हारी ख़ालाओं की बेटियाँ जिन्होंने तुम्हारे साथ हिजरत की है और वह ईमान वाली स्त्री जो अपने आपको नबी के लिए दे दे, यदि नबी उससे विवाह करना चाहे। ईमानवालों से हटकर यह केवल तुम्हारे ही लिए है, हमें मालूम है जो कुछ हमने उनकी पत्ऩियों और उनकी लौड़ियों के बारे में उनपर अनिवार्य किया है - ताकि तुम पर कोई तंगी न रहे। (बीवियाँ और बाँदियाँ, नबी के लिए था, सबके लिए नहीं था।)

4.3: और अगर तुमको अन्देशा हो कि (निकाह करके) तुम यतीम लड़कियों (की रखरखाव) में इन्साफ न कर सकोगे तो और औरतों में अपनी मर्ज़ी के मवाफ़िक दो दो और तीन तीन और चार चार निकाह करो (फिर अगर तुम्हें इसका) अन्देशा हो कि (मुततइद) बीवियों में (भी) इन्साफ न कर सकोगे तो एक ही पर इक्तेफ़ा करो या जो (लोंडी) तुम्हारी ज़र ख़रीद हो (उसी पर क़नाअत करो) ये तदबीर बेइन्साफ़ी न करने की बहुत क़रीने क़यास है.

4.25: और जो व्यक्ति तुममें से स्वतंत्र ईमान वालियों से विवाह करने की हैसियत न रखे, तो वह अपने हाथों में आई हुई अपनी ईमान वाली दासियों से (विवाह कर ले)

4.25:  दरअसल, अल्लाह तुम्हारे ईमान को अधिक जानता है। तुम आपस में एक ही हो। अतः तुम उनके स्वामियों की अनुमति से उन(दासियों) से विवाह कर लो और उन्हें नियमानुसार उनके महर (विवाह उपहार) चुका दो, वे सती हों, व्यभिचारिणी न हों, न गुप्त प्रेमी बना रखी हों। फिर जब वे विवाहित हो जायें, तो यदि व्यभिचार कर जायें, तो उनपर उसका आधा दण्ड है, जो स्वतंत्र स्त्रियों पर है। ये (दासी से विवाह) उसके लिए है, जो तुममें से व्यभिचार से डरता हो और सहन करो, तो ये तुम्हारे लिए अधिक अच्छा है और अल्लाह अति क्षमाशील दयावान् है।

23.5-6 / 70.29-30: जो अपने गुप्तांगों की रक्षा करने वाले हैंपरन्तु अपनी पत्नियों तथा अपने स्वामित्व में आयी दासियों (लौंडियों) से, तो वही निंदनीय नहीं हैं। (बीवियाँ या बाँदिया – सभी के लिए था)

4.25: और जो व्यक्ति तुममें से स्वतंत्र ईमान वालियों से विवाह करने की हैसियत न रखे, तो वह अपने हाथों में आई हुई अपनी ईमान वाली दासियों से (विवाह कर ले)

बुखारी 4138, 2542:

बुखारी 4615:

24.32: तुममें जो बेजोड़े के हों और तुम्हारे ग़ुलामों और तुम्हारी लौंडियों मे जो नेक और योग्य हों, उनका विवाह कर दो। यदि वे ग़रीब होंगे तो अल्लाह अपने उदार अनुग्रह से उन्हें समृद्ध कर देगा। अल्लाह बड़ी समाई वाला, सर्वज्ञ है

24.33: और जो विवाह का अवसर न पा रहे हो उन्हें चाहिए कि पाक  दामनी अपनाए रहें, यहाँ तक कि अल्लाह अपने उदार अनुग्रह से उन्हें समृद्ध कर दे। और जिन लोगों पर तुम्हें स्वामित्व का अधिकार प्राप्त हो उनमें से जो लोग लिखा-पढ़ी के इच्छुक हो उनसे लिखा-पढ़ी कर लो, यदि तुम्हें मालूम हो कि उनमें भलाई है। और उन्हें अल्लाह के माल में से दो, जो उसने तुम्हें प्रदान किया है। और अपनी लौंडियों को सांसारिक जीवन-सामग्री की चाह में व्यविचार के लिए बाध्य नकरो, जबकि वे पाक दामन रहना भी चाहती हों। औऱ इसके लिए जो कोई उन्हें बाध्यकरेगा, तो निश्चय ही अल्लाह उनके बाध्य किए जाने के पश्चात अत्यन्त क्षमाशील, दयावान है.

24.34: हमने तुम्हारी ओर खुली हुई आयतें उतार दी है और उन लोगों की मिसालें भी पेश कर दी हैं, जो तुमसे पहले गुज़रे है, और डर रखनेवालों के लिए नसीहत भी

33.50 & 23.5-6 / 70.29-30:

24.32: और जो विवाह का अवसर न पा रहे हो उन्हें चाहिए कि पाकदामनी अपनाए रहें, यहाँ तक कि अल्लाह अपने उदार अनुग्रह से उन्हें समृद्ध कर दे। और जिन लोगोंपर तुम्हें स्वामित्व का अधिकार प्राप्त हो उनमें से जो लोग लिखा-पढ़ी केइच्छुक हो उनसे लिखा-पढ़ी कर लो, यदि तुम्हें मालूम हो कि उनमें भलाई है।और उन्हें अल्लाह के माल में से दो, जो उसने तुम्हें प्रदान किया है। औरअपनी लौंडियों को सांसारिक जीवन-सामग्री की चाह में व्यविचार के लिए बाध्य नकरो, जबकि वे पाकदामन रहना भी चाहती हों। औऱ इसके लिए जो कोई उन्हें बाध्यकरेगा, तो निश्चय ही अल्लाह उनके बाध्य किए जाने के पश्चात अत्यन्तक्षमाशील, दयावान है.

24.33: और जो विवाह का अवसर न पा रहे हो उन्हें चाहिए कि पाकदामनी अपनाए रहें, यहाँ तक कि अल्लाह अपने उदार अनुग्रह से उन्हें समृद्ध कर दे।

24.33: और जिन लोगों पर तुम्हें स्वामित्व का अधिकार प्राप्त हो उनमें से जो लोग लिखा-पढ़ी के इच्छुक हो उनसे लिखा-पढ़ी कर लो, यदि तुम्हें मालूम हो कि उनमें भलाई है। और उन्हें अल्लाह के माल में से दो, जो उसने तुम्हें प्रदान किया है।

24.33: और अपनी लौंडियों को सांसारिक जीवन-सामग्री की चाह में व्यविचारके लिए बाध्य न करो, जबकि वे पाकदामन रहना भी चाहती हों। औऱ इसके लिए जोकोई उन्हें बाध्य करेगा, तो निश्चय ही अल्लाह उनके बाध्य किए जाने केपश्चात अत्यन्त क्षमाशील, दयावान है

24.34: हमने तुम्हारी ओर खुली हुई आयतें उतार दी है और उन लोगों की मिशालें भी पेशकर दी हैं, जो तुमसे पहले गुज़रे है, और डर रखनेवालों के लिए नसीहत भी

5:70:

 

Monday, 16 December 2024

अंबेडकर-मुहम्मद स. जयंती और गणतंत्र, स्वतंत्रता दिवस


बाबा साहब अंबेडकर और मुहम्मद साहब जयंती

 

बाबा साहब अंबेडकर और मुहम्मद साहब

आज बाबा साहब अम्बेडकर की जयंती है। तमाम देशवासियों को इस अवसर पर शुभकामनाएं।

बाबा साहब अम्बेडकर जयंती की सभी को शुभकामनाएं। बाबा साहब ने भारत के संविधान का निर्माण किया जो विश्व मे सबसे बड़ा संविधान है। जिसमें सभी लोगों को बराबरी का दर्जा दिया। जातिव्यवस्था का खात्मा किया। औरतों को अधिकार दिलवाए। लोगों को मनपसन्द धर्म मानने और उसके प्रचार प्रसार की छूट दी। वो जीवन भर अलग अलग धर्मों के कट्टरवादियों से लड़ते रहे मगर अंत में भारत को उदारता की राह पर अग्रसर करके छोड़ा।

मुहम्मद साहब भी जब अरब में पैदा हुए थे तो मक्का में धर्म के नाम पर बिज़नेस चलाया जा रहा था। अंधविश्वास जड़ों में जमा हुआ था। उन्होंने इन धर्मिक पेशवाओं के खिलाफ आवाज़ उठाना शुरू की तो उन्होंने मुहम्मद साहब पर बहुत ज़ुल्म किए, मारा पीटा गया, हत्या के प्रयास हुए। यंहा तक कि आपको दूसरे शहर मदीना में जा कर बसना पड़ा। यंही पर मुहम्मद सहाब ने मदीना वासियों के लिए एक चार्टर लिखवाया जिसे आज दुनिया का सबसे पहला प्योर डेमोक्रेटिक कॉन्स्टिट्यूशन माना जाता है, जिसमें मदीना के तमाम समुदायों के लोगों के अधिकारों, कर्तव्यों, नियमों, कानूनों को डॉक्यूमेंट किया गया। इससे पहले संविधान या तो किसी राजा के थोपे नियम होते थे या किसी लेखक की किताब के रूप में होते थे या फिर धर्मिक ग्रंथ के रूप में।

खैर लगभग 2 दशकों तक अत्याचार सहने के बाद भी मुहम्मद साहब डटे रहे और  शोषण करने वाली व्यस्था का खात्मा कर, लोगों को ईश्वर और नेकी की ओर बुलाया। गुलामों को मालिकों के बराबर दर्जा दिलवाया। औरतों को जायदात में हक़ और वोटिंग राइट दिलवाया। बच्चियों को पैदा होते ही मार दिए जाने की कुप्रथा को बंद करवाया। सभी इंसानों को भाई-भाई बताया औए कहा कि किसी अरबी को किसी गैर अरबी पर कोई फ़ज़ीलत नही। रंग के आधार पर कोई ऊंचा नीचा नहीं। अगर कोई चीज़ है जो इंसान को ऊंचा उठाती है तो वो है उसके कर्म। इस्लाम का संदेश लोगों को दिया और कहा जिसे मानना हो माने, चाहें न माने। ऐसी शिक्षाओं को देख कर लगभग कुछ ही दशक में अधिकतर अरबवासी मुस्लिम बन गए। हिंदुस्तान इस्लाम आने के बाद जाति व्यवस्था से परेशान अनेकों लोग मुस्लिम बन गए। पूरे विश्व में यही सिलसिला चलता रहा और आज मुस्लिम विश्व की दूसरी सबसे बड़ी जनसँख्या है। इस्लाम का मतलब है, अपनी सभी इच्छाओं को उस ईश्वर के अधीन करके शांति प्राप्त करना।

तो आज बाबा साहब और मुहम्मद साहब दोनों को याद करने का और उनका धन्यवाद करने का अवसर है।

 

---------------------------------------------

गणतंत्र दिवस पर संदेश।

गण का मतलब होता है लोग और तंत्र का मतलब होता है व्यवस्था। यानी गणतंत्र का मतलब हुआ लोगों द्वारा स्थापित शासन। आज ही के दिन भारतीय संविधान को पूरी तरह से लागू किया गया था। संविधान वो कानून होता है जिस पर एक देश चलता है। यह देश की आत्मा है। संविधान की प्रारूप समीति के अध्यक्ष, बाबा साहब अंबेडकर ने कहा था कि कोई संविधान कितना अच्छा क्यों न हो, वो बुरा बन जायगा अगर उस पर अमल करने वाले लोग बुरे हो तो और इसी तरह कोई संविधान कितना बुरा क्यों न हो अगर उस पर अमल करने वाले लोग अच्छे हो तो वो एक अच्छा संविधान साबित हो जायगा। यानी अगर लोग सही है तो सब सही चलेगा। इसलिए हमें स्वयं की बुराईयां ख़तम करना सबसे ज़्यादा ज़रूरी है। जैसे हम यंहा अपने बुरे कार्य के लिए कानून के सामने जावाबदेह हैं, उसी तरह हम वंहा अपने हर बुरे कार्य के लिए ईश्वर के सामने जवावदेह हैं। यंहा तो जुगाड़ या सेटिंग से किसी तरह बच जाते हैं पर वंहा नहीं बच सकते.  आज़ादी से अब तक देश ने बहुत विकास कर किया है पर कुछ कमियां भी है। मगर नागरिकों के रूप में हमारी भी ज़िम्मेदारी बनती है कि हम अपने कर्तव्य और जिम्मेदारियां निभाएं। हर काम दूसरों पर नहीं छोड़ा जा सकता। समाज में जितना हो सके अपनी सेवायें दें। समाज सेवा ही देश सेवा है। करुणा, रहमत और कंपेशन के कार्य करे। साथ ही देश वासियों के बीच में समानता, एकता बढ़ाने और नफरत को ख़त्म करने के लिए कार्य करें। आइये हमारे साथ मिलकर सेवा और ख़िदमत के काम करें। जय हिंद जय भारत।  OR सलाम, आदाब, नमस्कार, जयहिंद.  सबसे पहले मैं आप सभी को और तमाम देशवासियों को गणतंत्र दिवस की मुबारकबाद और शुभकामनये देता हूँ.  इसके साथ ही आप सभी का स्वागात करता हूँ और दिल से धन्यवाद देता हूँ कि आप यंहा अपना समय निकाल कर आये. मेरा नाम वसीम है. हम वर्क नाम की संस्था से हैं. हम एक सामाजिक सेवा करने वाली संस्था है.  जैसा कि आप जानते हैं कि भारत में 3 National Festivals या पर्व है.   गांधी जयंती, स्वतंत्रता दिवस और गणतंत्र दिवस.  भारत को आज़ादी दिलाने में गाँधी जी बहुतबड़ा योगदान रहा. 15 August को हम आजाद हुए इसलिए उसे स्वतंत्रता दिवस कहा जाता है.  इसी तरह 26 January के दिन भारत में संविधान पूरी तरह से लागू किया गया था सो इसे गणतंत्र दिवस कहते है. गण का मतलब होता है लोग और तंत्र का मतलब होता है व्यवस्था.  यानी गणतंत्र का मतलब हुआ लोगों द्वारा स्थापित शासन. भारत के एक  Republic Democratic Country है.  Republic यानी पब्लिक के द्वारा स्थापित system और  Democracyयानी  of the People, by the People and for the People.अभी हमें जो गान गया उसे संविधान ने ही राष्ट्रगान घोषित किया था.  संविधान देश की आत्मा होता है.  संविधान का मतलब होता है वो कानून या लॉ जिस पर देश चलेगा.  India का Constitution तैयार करने के  लिए बनी Constituent Assembly की  Drafting Committee के  Chairman the Dr. Bhimrao Ambedkar Sahab. Baba Sahab ने संविधान पर कहा था कि कोई भी संविधान कितना भी अच्छा क्यों न हो, वो बुरा बन जायगा अगर उस पर अमल करने वाले लोग बुरे हो तो और इसी तरह कोई भी संविधान कितना भी बुरा क्यों न हो अगर उस पर अमल करने वाले लोग अच्छे तो वो एक अच्छा संविधान साबित हो जायगा. यानी अगर लोग अच्छे हुए तो कानून सही से चलेगा और लोग बुरे हुए तो क़ानून बेकार साबित होगा.  इसलिए खुद में से बुराई ख़तम करना सबसे ज़रूरी है. जैसे इस दुनिया में अपने बुरे कार्यो के लिए कानून के सामने जावाबदेह हैं, उसी तरह हर बुरे कार्यों के लिए वंहा उस ईश्वर के सामने जवावदेह हैं. यंहा तो जुगाड़ से बच जाते हैं, वंहा नहीं बच सकते. आज़ादी को लगभग 75 साल हो चुके हैं और देश ने बहतु तरक्की और विकास कर किया है. चाहे वो Infrastrucuture, Economy, Health, Poverty, Education. बहुत सी जगह सरकारें वैसे काम नहीं कर पायी जो उन्हें करना चाहिए था.  मगर नागरिकों के रूप में हमारी भी ज़िम्मेदारी बनती है कि हम अपने कर्तव्य और जिम्मेदारियां निभाए. समाज में जितना हो सके अपनी सेवायें दें, समाज सेवा ही देश सेवा है. रहमत, करुणा और कम्पशन के कार्य करें. समाज में समानता, एकता, प्रेम बढ़ाने के लिए कार्य करें. भारत जब आज़ाद हुआ था तो उसका भविष्य सुरक्षित करने के लिए ही संविधान बनाया गया था. हमें अपने भविष्य को सुनहरा बनाने के लिए हमेशा कोशिश करनी चाहिए.

हर देश का भविष्य होते हैं उसके युवा और उसके बच्चे. गरीब बेसहारा बच्चों को अच्छी शिक्षा देना, अच्छी सुविधायें देना बहुत ज़रूरी है.  इनके साथ साथ उनके बचपन में उनकी मासूमियत बनाए रखना और उनको खुशियों के पल देना भी उतना ही ज़रूरी है. इसलिए आज यंहा हमने  education with fun तहत बच्चों  के लिए एक  play area बनाया है.  इसके साथ ही उनके लिए drawing competition और refreshment का इंतज़ाम भी किया गया. हमारी ओर से ये हमारे भविष्य और बच्चो के लिए  छोटी से कोशिश की है.  बस इसी के साथ मैं अपनी बात ख़तम करता हूँ. आप सभी की इस ज़िन्दगी और उस ज़िन्दगी में कामयाबी मिले. जय हिन्द जय भारत. आइये हमारे साथ समाज सेवा के काम करिए. हम ने समाज और देश  को एकजुट करने के लिए कुछ सिधात या नारे बनाए हैं जो इस तरह है. दो शब्द.

---------------------------------------------


स्वतंत्रता दिवस की हार्दिक शुभकामनाएं।

आजादी का अमृत महोत्सव

मानव जाति का इतिहास मनुष्यों की दासता का एक अंतहीन विवरण है। राजा-महाराजाओं से लेकर ज़मीदार-साहूकारों की ज़ंजीरों में जकड़ी मानवता कभी स्वतंत्र नहीं रही। केवल दासता की जज़ीरों के रंग-रूप बदलते रहे हैं। इस ज़ंजीर की एक कड़ी 15 अगस्त 1947 को टूटी। हम अंग्रेज़ों की बेड़ियों से तो आजाद हो गए मगर अनैतिकता व असभ्यता के चुंगल में फँसते चले गए। सांसारिक लोभ व माया ने हमें अपने नियंत्रण में लेके अपना दास बना लिया है। हमारी भोग-विलास की इच्छाएँ हम पर राज करने लगी। आज सभी ईर्ष्या व स्वार्थ के अधीन हो चुके हैं। हम दूसरों की दासता से निकलकर अपने अंदर की बुराइयों की दासता में आ चुके हैं। यह भी मनुष्यों द्वारा जन्म दी गई एक प्रकार की दासता है। हमें इससे भी स्वतंत्र होना पड़ेगा।

जब तक हम केवल स्वयं को और अपने जीवन को ही सर्वाधिक प्राथमिकता देते रहेंगे, तब तक ये स्वयं की दासता ऐसे ही बढ़ती जाएगी। इसलिए हम सही अर्थों में आजाद तभी हो सकेंगे जब हम प्रत्येक प्रकार की सांसारिक दासता की जंजीरों को तोड़ेंगे और उस सर्वोच्चय शक्ति की दासता को ग्रहण करेंगे जिसका पूरी सृष्टि पर स्वामित्व है। जब समाज ईश्वरीय दासता को पूरी तरह स्वीकार करता है तो समाज से बुराइयाँ समाप्त हो जाती हैं। सांसारिक लाभ की बजाए पारलौकिक लाभ को दृष्टि में रख कर किए किए गए सत्कर्म मानवता के लिए हितकारी होते हैं। स्वयं सुधार ही समाज सुधार की ओर अग्रसर करता है।

सत्य प्रत्येक आदर्श समाज की नींव होतय है। इसीलिए ऐसे समाज को सतयुग कहा जाता है। इस सतयुग को लाने के लिए सत्य को अपनाना होगा। सतयुगी समाज के निर्माण के लिए भारत की धरती से उपयुक्त और भारतीयों से अधिक सक्षम अन्य कोई नहीं है। जिसकी सनातन सभ्यता के मूल संस्कार ही "वसुधैव कुटुम्बकम'' और ''सर्वे भवन्तु सुखिनः" जैसी कल्याणकारी शिक्षाओं पर आधारित है। इसी भाव के साथ भारत को फिर से विश्वगुरु और अखंड-भारत बनाया जा सकता है। हमें सत्य, सेवा व करूणा के साथ तब तक कार्य करना होगा जब तक की मानवता एक न हो जाए।

आइये, हम सब इस स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर उस स्वतंत्रता को प्राप्त करने का संकल्प लें जो मनुष्य को सांसारिक दासता से आजाद करके ईश्वर का सच्चा दास बना दे।


---------------------------------------------

तौहीद, आखिरत, रिसालत

 

 

[तौहीद]

ईश्वर एक है और निराकार है। उसका धर्म भी एक है। उसने अपने आदेश, शिक्षाएं, ग्रन्थ और संदेशवाहक विश्व के प्रत्येक भूभाग, प्रत्येक काल और प्रत्येक समुदाय में भेजे। ये शिक्षाएं हमेशा से बुनियादी तौर पर एक ही रही है। पर लोग स्वार्थ के कारण हर स्थान पर भेजे उसके एक ही धर्म में मिलावट करके अपने अलग धर्म बनाते गये इसीलिए आज सभी धर्म एक दूसरे से भिन्न दिखाई देते है। हालांकि उसकी मूलभूत मान्यताओं और सिद्धातों से छेड़छाड़ न कि जा सकी जो आज भी समान दिखाई देते हैऔर जो आज भी विभिन्न रूपों में प्रवाहित है। इसीलिए थोड़े से  बदले हुए शब्दों के साथ एक ही बात हर धर्म कहता है। संसार की सारी अच्छी शिक्षाओं का स्रोत एक निराकर ईश्वर ही रहा है।

गौर से देखने पर सभी धर्मों की शाखाएं एक ईश्वर से और सभी मनुष्यों की जड़े एक ही इंसानी जोड़े से जाकर मिलती है। उसके भेजे अनेकों संदेशवाहक या संदेष्टा भले ही किसी एक स्थान या समुदाय के लिए आये हो पर वो पूरे संसार के लिए आदर्श होते थे। इसीलिए उनमें से कुछ बहुत महत्वपूर्ण संदेशवाहको को संसार के विभिन्न ग्रंथो और सभ्यताओ में आसानी से खोजा जा सकता है जंहा उनके नामों और कथाओं में समानता ही समानता मिलती है। ईश्वर हमेशा मनुष्यों को चेतावनी और नसीहत के तौर पर ऐसे संदेष्टाओं की कथा सुनाता आया है। इसलिए ये कथा भी विभिन्न्न धर्मों और सभ्यताओं में हमारे पूर्वजों द्वारा आगे पहुचाने के कारण आज भी किसी न किसी रूप में जीवित बची हुई है।


[आखिरत]

एकेश्वरवादी हो, अनीश्वरवादी हो या बहुदेववादी, विश्व के लगभग सभी धर्मों में कर्मफल और परलोकवाद का सिद्धांत किसी न किसी रूप में पाया जाता है। भले ही इनकी धारणाएं विभिन्न प्रकार की हो। इस जीवन में अच्छे कर्म करने वाले या पुण्य-सवाब कमाने वाले इंसान, मृत्यु के पश्चात स्वर्ग के अधिकारी होंगे और बुरे कर्म वाले या पाप-गुनाह करने वाले नरक के अधिकारी होंगे। इन लोकों को ही जन्नत- जहन्नुम, हेवन- हेल या पैराडाइस- दोज़ख कहते है। ये जीवन एक टेस्ट है और इसका टर्म पूरा होने पर रिज़ल्ट आना है। एक दिन हमारे कर्मों का हिसाब किताब होगा। इसे ही विभिन्न धर्मों में अंतिम दिन, महाप्रलय का दिन, न्याय का दिन, बदले का दिन, आख़िरत, क़यामत, फैसले का दिन, हश्र का दिन, फाइनल डे, डुमस डे, जजमेंट डे आदि कहते है। जैसे माँ की कोख में पल रहे बच्चे के लिये गर्भावस्था के लघु जीवन के बाद बाहर एक अन्य लंबा और आश्चर्यजनक जीवन इंतज़ार करता है।

मेंडाइज़्म (साबीइन) धर्म में भी स्वर्ग नरक की मान्यता पाई जाती है। ग्रीक माइथोलॉजी में एलीज़ियम (Elysium) स्वर्ग का और टार्टर्स (Tartarus) नरक का ही नाम है।  कन्फ्यूशियनिज़्म, ताओइज़्म और चीनी पौराणिक मान्यताओं में  स्वर्ग को टीआन (Tian) और नरक को दीऊ (Diyu) कहा गया है। प्राचीन पर्शियन माइथोलॉजी में स्वर्ग को पेरेडाज़ा या पेरीडाज़ा और नरक को दुज़ख कहा गया, इन्ही से बाद में नए शब्द बने। विश्व की बहुत सी मायथोलॉजी और सभ्यताओं में स्वर्ग का कॉन्सेट पाया जाता है जैसे मेसोपोटामिया, हत्ती, मेक्सिकन, माओरी और पोलीनिशियम आदि। नरक का कांसेप्ट यूरोपियन सभ्यताओं जैसे केल्टिक -नॉर्स, अमेरिकी सभ्यताओं जैसे माया- एज़्टेक, प्राचीन मिस्री, अफ्रीकी और सुमेरी सभ्याताओं में भी पाया गया है।

न्याय इंसान की दृढ़ इच्छा और मूल आवश्यकता है। इसलिए अगर इस लोक में पूर्ण न्याय नहीं है तो किसी अन्य लोक में होगा। कर्म की जानकारी और फल की संतुष्टि होना पूर्ण न्याय मिलने का आधार है। पर इन दोनों बातों का इस लोक में आभाव है इसलिए यंहा पूर्ण न्याय या पूर्ण कर्मफल मिलना संभव ही नहीं है। मुक्ति, मोक्ष, निर्वाण, फलाह या साल्वेशन सभी एक अंत की ओर ले कर जाते है इसलिए जीवन और समय चक्र नहीं बल्कि एक रेखा है।

 

[रिसालत]

ईश्वर ने प्रकृति में एक नियम रखा है जिसके अंतर्गत जब कोई चीज़ बिना किसी देखभाल या देखरेख के यूं ही छोड़ दी जाती है तो वह चीज़ बहुत ही जल्दी बिगड़ जाती है या अव्यवस्थित हो जाती है। उदाहरण के लिए अगर किसी बग़ीचे को यूँ ही छोड़ दिया जाए तो वो जल्द ही जंगल के समान बन जायगा। इसीलिए बग़ीचे में एक माली रखा जाता है जिससे बगीचा (उसके फूल, पौधें, क्यारियां, सुदंरता आदि) भली भाँति सुरक्षित रहे। इसी नियम अनुसार अगर ये धरती भी यूँ ही छोड़ दी जाती तो यंहा भी मानव समाज और मानवीय मूल्य आदि पूरी तरह बिखर कर समाप्त हो जाते। पर ईश्वर ने प्रत्येक काल व प्रत्येक स्थान में इन सिद्धांतों को स्थापित रखने के लिए अपने संदेशवाहकों को भेजने का प्रबन्ध किया जिन्हें ईशदूत या संदेष्टा कहते है। क्योंकि ईश्वर न तो दिखाई देता है और न हम से बात करता है इसलिए वह हम में से ही कुछ सर्वोत्तम मनुष्यों को चुनाव करके उनके माध्यम से हमारा मार्गदर्शन करता है। ये मार्गदर्शक हम साधारण मानवों को ईश्वर की आज्ञानुसार जीवन जी कर दिखाते है कि सत्य के मार्ग पर चलना किसी भी मनुष्य के लिए कठिन काम नहीं है। ये सभी महापुरुष हमें धर्म का पाठ पढ़ाते है कि मनुष्य के लिए क्या सही है और क्या बुरा, किन कार्यों से मुक्ति, निर्वाण, मोक्ष, कल्याण या उद्धार है और किन से नहीं.

सबसे पहले ऐसे महापुरुष प्रथम मानव ही थे।सनातन धर्म में इस प्रथम पुरुष को स्वयम्भूमनु (आदम भी) और इस प्रथम स्त्री को शतरूपा (हव्यवती भी) कहा गया है। इस्लाम धर्म में इन दोनों को आदम और हव्वा कहा गया है। ईसाई धर्म में इन्हें एडम और ईव कहा गया है। यहुदी धर्म में  इन्हें आधाम और ख़व्वाह कहा गया है। सिख धर्म इनको आदम और हव्वा ही पुकारता है। पारसी धर्म मे इन्हें मश्य और मश्यान कहा गया है। शिंतो धर्म या जापानी पौराणिक कथाओं इन्हें इज़ानागी और इज़ानामी कहा गया है। जैन धर्म के आदिनाथ और आदम में भी कुछ समानताएं पाई जाती है।श्रीलंका में एक पहाड़ी की चोटी का नाम एडम्स पीक है और ये जगह बुद्ध, मुस्लिम, ईसाई और हिन्दुओ के लिए पवित्र स्थान है। यंहा एक जोड़ा पांव के निशान पत्थर में उकरे हुए है। मुस्लिम और ईसाई इसे आदम के पांव के निशान मानते है। हिन्दू इसे शिवजी के पांव के निशान मानते है (पुराणों में शिवजी और आदम की कहानी में कई समानता पाई जाती है)। वंही बुद्धिस्ट लोग इसे बुद्ध के पांव के निशान मानते है.

ऐसे दूसरे बड़े महापुरुष थे नौका वाले महर्षि।  एक प्राचीन कथा है जो सनातन धर्म, इस्लाम धर्म, ईसाई धर्म, यहूदी धर्म, पारसी धर्म, कई पौराणिक दंतकथाओं और प्राचीन सभ्यताओं में अनेकों समानताओं के साथ विभिन्न रूप में पाई जाती है। यानी दुनिया की तीन चौथाई से भी अधिक आबादी इस घटना में विश्वास रखती है। आज वैज्ञानिक और पुरातात्विक रिसर्चों से ये सिद्ध हो चुका है कि इस कथा में वर्णीत बाढ़ जैसा ही एक बहुत बड़ा पानी का सैलाब इतिहास के किसी कालखंड में पृथ्वी के एक भूभाग पर आया थी जिसमें वंहा सब कुछ डूब गया था। कथा ये है कि एक सत्यवान ईश्वरभक्त थे। धरती के एक बड़े भूभाग पर पाप बहुत बढ़ चुका था। ईश्वर के प्रकोप व दंड स्वरूप जलप्रलय के द्वारा समस्त पापीयों का वंहा नाश होने वाला था। ईश्वर ने अपने उस भक्त को बताया कि यंहा जलप्रलय में सब डूब जाएगा इसलिए अपने लिए एक विशाल नौका बनाओ और जब जलप्रलय आएगी तब उसमें खाद्य सामग्री, अपने निष्ठावान लोग, आवश्यक जीवों और वस्तुओं को लेकर चढ़ जाना। सो उन्होंने एक विशाल नौका का निर्माण किया। जलप्रलय आई और वे सब नौका में सवार हो गए। वो धरती जलमग्न हो गई। ईश्वर की कृपा से केवल नौका सवार जीवित बच पाए। फिर नौका एक पर्वत पर जा कर रुकी और जल स्तर घटने लगा। अंत में वे सब भी नीचे उतर आये। इसके बाद धरती पर जीवन फिर से आरंभ हुआ और आगे फैला।  इस महामानव को विभिन्न धर्मों में मिलते जुलते नामों से पुकारा जाता है जैसे:-  सनातन धर्म में न्यूह या मनु।  इस्लाम धर्म में नूह।  ईसाई धर्म में नोवाह।  यहूदी धर्म में नोअख़।  पारसी धर्म में यीमा।  सुमेरियन गाथाओं में ज़ियासुद्र। अक्काडीन महाकाव्य में अत्राहासीस।  मेसोपोटामिया के गिलगमिश महाकाव्य में उतनापिशटिम।  ग्रीक मायथोलॉजी में ड्यूकेलियन आदि।  सनातनी धर्म ग्रंथो में इनके कुछ अन्य नाम है:-  न्यूह, महामनु, महाराज मनु, वैवस्वत मनु, सप्तऋषि वाले मनु, महाजल प्लावन (महाजल प्रलय) वाले मनु, नौका वाले मनु, मछली वाले मनु, मत्स्यावतार वाले मनु, श्राद्धदेव मनु या सत्यव्रत मनु। इस महाजलप्रलय से मिलते जुलते कई प्रकार के मिथक व प्रंसग बहुत सी प्राचीन सभ्यताओं, विभिन्न जनजातियों व देशों में आज भी आसानी से देखे जा सकते है जैसे:- Waynaboozhoo or Nanabozho from Lac Courte Oreilles, K'iche' or Maya जलप्रलय मिथक, चीनी पौरणिक कथाओं में Gun-Yu, नॉर्स पौराणिक कथाओं में Bergelmir, उत्तरी अमेरिकी मूलनिवासियों की Ojibwa जनजाति में, दक्षिणी अमेरिका के Muisca लोगों में, वेल्श, तंजानिया, कोरिया, बर्मा आदि।

इनके बाद जो बड़े महापुरुष हुए। वो हैं अबिराम, राम, मुशा, कृष्ण, ईशा, जीसस, महामद, मुहम्मद हुए हैं।  जोरोस्टर, कन्फ़ुशियस, सुकरात वगैरह।  बुद्ध, महावीर, गुरु नानक देव को भी ऐसा ही सम्मान प्राप्त है।


--------------------------------------------


इस्लाम का दर्शन और उद्देश्य 

इस्लाम के अनुसार मनुष्यों को धरती पर 2 चीजें माननी और करनी थी। आस्था और कर्म। आस्था होगी तो कर्म होगा। दोनों एक दूसरे से जुड़े है।

आस्था या ईमान में 3 चीजें है: एकेश्वरवाद, परलोकवाद, ईशदूतवाद

 

 एकेश्वरवाद: 

सृष्टि नेबुला से शुरू हुई. नेबुला कंहा से आया, कंहीं से तो आया है. समय यंहा से शुरू हुआ. किसी ने 'कुछ नहीं' से 'कुछ' शुरू किया. आरंभ हुआ तो अंत भी होगा. जिसका आरंभ नहीं, उसका अंत भी नहीं होगा.

ईश्वर एक है और उसके जैसे कोई नहीं। वो आदि, अनादि है। इसलिए प्रार्थना और उपासना उसी की ही होगी। उसके कानून कभी न बदलने वाले होंगे क्योंकि वो अतीत और भविष्य जानता है। सत्ता और विधान सब उसी का है।

यंहा evolution और creation दोनों है. इन्सान evolve नहीं create हुए हैं. सबमें एक law रखा जो कभी नहीं बदलेगा (exception भी इस law का ही part है). सारे natural laws उसके कानून है. उसके कानून को आयत भी कहते हैं. आयत का मतलब वो चीज़ जो उसके सिवा कोई और न कर सके. आयात का मतलब निशानी या प्रतीक भी होता है.

जब यंहा environment रहने लायक हो गया तो मानव यंहा आया. उसे समाज के रूप में बसाया. क्योंकि उस इच्छा दी थी, जबकि बेजानों में इच्छा नहीं थी. जीवों में उसका intuition है। निर्जीव में उसके laws है। जानवर का ज्ञान उसके अंदर रख दिया गया है जैसे कोई चिप फिट हो और इसीलिए जानवर का बच्चा पहले से ही दूध पीना जानता है। जबकि इन्सान को बिना ज्ञान के बनाया और उसे ज्ञान बाहर से मिलना था. इंसानों 2 तरह से ज्ञान मिलता है, एक दुनिया से, दूसरा दुनिया बनाने वाले से. उसे ईश्वर से मार्गदर्शन मिलना था. इंसान के बच्चे को दूध पीना सीखाया जाता है। जैस मुर्गी का कुड़क होना, मुर्गी को कोई नहीं सीखाता और कछुए के बच्चों को समुद्र की ओर दौड़ना कोई नहीं सीखाता (हालांकि ये लक्षण DNA में शामिल हो सकते हैं)।

एक सवाल उठता है कि वो सम्पूर्ण है तो वो चाह क्यों रखता है। हमारे लिए वो सम्पूर्ण है। वो असीम है। उसके बारे में हम सब कुछ नहीं जानते। उसने कहा कि उसने चाहा। समय आने पर वही बताएगा कि उसने क्यों चाहा।

दूसरा सवाल होता है कि टेस्ट क्यों? असल में इस पर हमारा कोई जोर नहीं है कि हमें क्यों बनाया। जैसे computer सवाल नहीं कर सकता कि उसे क्यों बनाया गया। ये तो वक्त आने पर सही सही पता लगेगा।

शुरू से ही इंसान ऐसे सवाल करके अपनी महदूद अक्ल से समझना चाहता रहा है। जबकि ऐसे सवाल के जवाब जब नहीं मिले तो विभिन्न दर्शन और बहसे पैदा हुई। उलझने और बढ़ती गई। वो कैसा है, उसने क्यों चाहा जैसे सावलों पर अलग अलग मत हैं और मतभेद भी। इन्सान को ऐसे सवाल आखिरत के लिए बचा के रखना चाहिए जिनके जवाब उसे इस दुनिया में नहीं मिल सकते.

 

परलोकवाद: 

अगर किसी चॉइस दी जाए तो वो अच्छा और गलत दोनों कर सकता हैं। चॉइस के साथ ही दण्ड और पुरुस्कार दोनों जरूरी हो जाएगा। ये मिलकर अब टेस्ट और रिजल्ट हो गया। मनुष्य के हाथ में कर्म रखे गए है मगर उन सभी कर्मों के रिजल्ट नहीं.

मनुष्यों का एक उद्देश्य है, इसलिए मनुष्य यंहा है। कर्मों के नतीजे लगातार आते रहते हैं, मगर इकट्ठे होते जाते हैं। कुछ सामने आ जाते हैं और कुछ आगे चले जाते हैं और कुछ बहुत बाद में आते हैं। हर कर्म का एक effect होगा, पर वो फ़ौरन नहीं मिलेगा. उसे भी महसुसू हो गया है किस कर्म का रिजल्ट कब मिलता है. चाहे दुनिया के laws हो या धर्म के. जैसे ब्लड प्रेशर या सुगर के effect accumulate होते रहते हैं. रिजल्ट प्रत्यक्ष रूप में नहीं  fix time तक नहीं आएगा. उस चीज़ की fix limit cross होने पर ही results सामने आते हैं. Limit cross होने तक ही बच सकते हैं. एक समय के बाद के बाद कोई वापसी या सुधार या माफ़ी नहीं है. यह मौत है यानि अंत. असली रिजल्ट क्या हैं, वो तो वंही जा कर पता लगेंगे.

समय कोई circle या cycle नहीं है जिसमें हर चीज़ लौट के आना चाहिए (जिसमें बार बार जन्म हो सकता है.) मगर समय एक लाइन है, जिसके 2 सिरे हैं. इस लाइन पर एक बॉर्डर आता है उसे पार कर करके जीवन आगे बढ़ जाता है, वापिस या ख़त्म नहीं होता. दूसरे लोक में जीवन आरंभ होगा। इस टाइमलाइन में पृथ्वी ख़तम तो यंहा जीवन ख़तम. सृष्टि का कण कण जब इसी सृष्टि में रहेगा तो फिर फिर दुबारा assemble करना कोई अचम्भा नहीं होगा.

बाज़ लोग अल्लाह की मार्फत हासिल करने चले जाएंगे और वहा बदले में सुख भी मिलेगा मगर वहा ऐसी भौतिक बॉडी नहीं रहेगी। यंहा बॉडी material नहीं बल्कि non material होगी. जो वहा नहीं जा पाएंगे, बच जाएंगे उनको waste, throw, recycled or some other use कर लिया जाएगा।

सारा रिकॉर्ड universe में available है. मरने के बाद वो यानि जीवन playback कर दिया जाएगा। उसके आधार पर नयी लाइफ तय होगी. उसे ये बता दिया गया है और वो  खुद भी ये समझता है. हवा में बहुत सारी waves messages घूम रहे हैं। मगर इन waves को सिर्फ वही पकड़ सकता है जो सही frequency पर system set कर ले। इस तरह हमारी recording इस सृष्टि में मौजूद है। उन्हे catch कर लिया जाएगा और दिखा दिया जाएगा। टेस्ट में पास हुए उनके लिए इनाम, आनंद और परलोक है.

सबके सामने इंसाफ इसलिए होगा क्योंकि इंसाफ वो है जो सबके सामने हो, बंद कमरे में न हो। ताकि किसी को शक न रहे और कोइ पक्षपात का आरोप न लगे।

underage बच्चों का टेस्ट नहीं होगा। retarded का टेस्ट नहीं होगा। मगर लोग उन्हें पत्थर मारते हैं, परेशान करते हैं क्योंकि असल में वो दूसरों के लिए टेस्ट बनके आते हैं। बीमारियां भी अक्सर हमारे कमियों को यंही माफ़ करने के लिए दी जाती है.

कोई बच्चा अंधा या retarded हो तो लोग सोचते हैं कम से कम इसकी आखें होती या थोड़ी समझ होती तो अच्छा होता। मगर वो ये नहीं सोचते कि अगर इसकी आखें होती तो यह दूसरों को देख कर और ज्यादा तड़पता और अगर थोड़ी अकल होती तो भी बाहर की चीजें देख कर भी और ज्यादा तड़पता।

कब्र के इतने अज़ाब है तो क्या जलने वाले बच जाएंगे। ये बीच की जीवन की बातें हैं, बीच और बाद वाले जीवन की सभी बातें मुशाबिहात है.

 

ईशदूतवाद:

ईश्वर ने श्रेष्ट मानवों को अपना संदेश दिया।  ये संदेश श्रुति थी जिसे बाद मे लिख लिया गया। उसके कानूनों पर अमल करने में थोड़ा थोड़ा बदलाव होता रहा है। कोई प्रथम दूत हुआ और कोई अंतिम और कुछ बीच में। इन सभी दूतों में आस्था मुस्लिम आस्था रखते हैं और इन सभी को रोल मोडल मानते हैं। अंतिम इसलिए क्योंकि पहले रेकॉर्ड्स या संदेश शुद्ध नहीं रह पाता था। मुहम्मद साहब के बाद रिकार्ड को सही तरह रखना संभव हो गया। जैसे आज कोई भी किताब में मिलावट होती है तो पता लग जाती है। मुहम्मद साहब के बाद पेपर का आविष्कार होने जा रहा था और दुनिया एक global village होने जा रही थी यानि Globalization का दौर शुरू होने वाला था। मुस्लिम चीन गए और कागज का इल्म लाए। कागज की इंडस्ट्री मुस्लिम वर्ल्ड में डवेलप हुई। मुहम्मद साहब ईश्वर की वाणी को साथ साथ लिखवाते जाते थे। पहले के दूत भी ईश्ववाणी लोगों को पहुंचाते थे। इन सभी संदेशों में समानता होती थी। इसलिए अलग अलग ग्रंथों से इन समानता को ले और इसे ईश्वर वाणी माने। 

नबियों,रसूलों को इंसानों को ईमान वाला बनाने के लिए नहीं भेजा जाता. कुरान ने तो मुहम्मद साहब को सिर्फ अपना काम करने का हुकुम दिया. मुहम्द साहब के वक्त में ही बेशुमार इन्सान आपकी हिदायतों को तिरस्कार करते रहे. हिदायत तो उन्ही कानूनों के तहत मिलेगी जो बनाये गये है, यानि हक की तलाश करने वाले के लिए सही रास्ता आसान कर दिया जायगा और हक़ को दरकिनार करने वाले के लिए एक सीमा के बाद गुमराही का रास्ता खोल दिया जायेगा. अम्बिया तो ऐसे हक की तलाश करने वालो के लिए हक वाज़ेह करने के लिए आते थे.

Thursday, 12 December 2024

जहद के सही मायने

 


जिहाद शब्द बना है मूलधातु, ज ह द से जिसका अर्थ है जद्दो जहद करना यानी संघर्ष करना। इस्लामी फ़िक़्ह में जिहाद का अर्थ है जीवन में लगातार, निरंतर प्रयास या संघर्ष करना, शांति के लिए। ईश्वर और उसके सत्य मार्ग में भी संघर्ष करना पड़ता है। इसलिए असल मे जिहाद एक पॉजिटिव वर्ड है जिसे मीडिया द्वारा नेगेटिव बना दिया गया है।

जिहाद का अर्थ होली वॉर नहीं होता बल्कि होली वार को तो अरबी भाषा मे हरबू मुक़दस्सा कहते है जो क़ुरान या हदीस में एक बार भी नहीं आया है। सबसे पहले पवित्र या धार्मिक युद्ध शब्द का प्रयोग ईसाई क्रूसेडर के लिए हुआ था। अरबी में लड़ाई या युद्ध के लिए किताल या गज़वा शब्द आता है। 

उसी तरह मजबूर किए जाने पर अगर सशस्त्र संघर्ष करना पड़े या आत्मरक्षा में तो उसे भी जिहाद कहा जाता है क्यूँकि वो भी एक संघर्ष है शांति प्राप्त करने के लिए। पर लड़ाई या युद्ध के लिए किताल या गज़वा ही मूल शब्द है।

इसलिए जिहाद के इच्छुक शख्स से  मुहम्मद साहब ने फ़रमाया तुम्हारी माँ ज़िंदा हैं तो उनकी सेवा करो, उसी में तुम्हारी जन्नत है। तुम्हारे लिए वही जिहाद है। मुहम्मद साहब ने तो ये भी कहा है कि दुष्ट शासक के सम्मुख कटु सत्य कह देना भी एक जिहाद है। इस्लाम मे सबसे बेहतरीन या सबसे बड़ा जिहाद, खुद की नफ़्स यानी खुद की इच्छाओं के विरुद्ध लड़ने को कहा गया है।

यंहा तक की 1857 की आज़ादी की क्रांति भी एक जिहाद थी। अंग्रेजों के खिलाफ जिहाद का फ़तवा मौलाना फ़ज़्ले हक़ खैराबादी ने दिया था और मुसलमानों ने इस जिहाद में बढ़ चढ़ कर हिस्सा लिया और जानों की कुर्बानी दी जो कि मूलतः एक अन्याय के विरुद्ध संघर्ष ही था।

■■■

निरंतर शांति के लिए गए प्रयास या संघर्ष को जिहाद कहते है। कभी शांति स्थापित करने के लिए सशस्त्र संघर्ष करने को भी जिहाद कहते है।  क्योंकि ये भी एक शांति का प्रयास हुआ। हालांकि लड़ाई को अरबी में जिहाद नहीं बल्कि किताल शब्द आता है।


मुहम्मद सल्ल को खबर मिली कि रोमन सेना मुसलमानों पर हमला करने वाली है। मुसलमानों ने तबूक नामक सीमा पर जाके पड़ाव डाल दिया कि लड़ाई होनी है तो सीमा पर हो। बड़ी मुश्किल से वंहा भूखे प्यासे रहे थे। 21 दिन बाद वंही रहे। ये समय सीमा पर बीत गया था। कुछ दिन बाद दोनों सेना वापिस लौट आए बिना लड़े क्योंकि रोमी भी लड़ाई नहीं कर पाए।  तकलीफ़ उठा के गए थे और वापिस आते थे बहुत लंबा समय था। इस पूरे कार्य मे लगभग दो-ढाई महीने लग गए थे।

बस्ती में वापिस दाखिल होते हुए नबी ने कहा कि अब हम जिहादे असगर (छोटे) से जिहादे अकबर (बड़े) में जा रहे है। यानी रोज़मर्रा की ज़िंदगी सही से जीना है। अपनी जान, नफ़्स से जिहाद करना है।


■■■

जिहाद और क्रूसेड लफ़्ज़ों पर प्रोपगंडा

जिहाद शब्द का अर्थ होता है शांति के लिए निरंतर संघर्ष करना। अगर शांति स्थापित करने के लिए कभी जंग की नोबत आ गयी तो उसे भी जिहाद कहा गया क्योंकि वो भी एक संघर्ष है। हालांकि अपनी इच्छाओं के विरुद्ध संघर्ष करने को सबसे बड़ा जिहाद कहा गया है। बीमार मां की सेवा करने को और निर्दयी राजा के सामने कटु सत्य कहने को भी जिहाद कहा गया है। इसमें पहली खता ख़ुद मुसलमान है जिन्होंने जिहाद को उसके असली मायनों से ज़्यादा जंगी मायनों में ईस्तमाल किया और वंहा से इस्लामोफोबिया के शुरआती प्रचारक इस लफ्ज़ को ले उड़े।

फिर उन्हींने ऐसा घमासान प्रचार किया गया कि जिहाद का अर्थ केवल और केवल पवित्र युद्ध होता है। एक जाली प्रोपगैंडा खड़ा किया गया और इसे एक नेगेटिव शब्द बना दिया गया। आज जिहाद और आतंकवाद एक दूसरे के पर्यायवाची बन चुके है।

वंही दूसरी और इसका उलट हुआ। ईसाईयों द्वारा सदियों तक मध्यकाल में लड़े गए भयंकर धर्म युद्धों को क्रूसेड कहा गया जिनमें भारी कत्लेआम हुआ, जिसका इतिहास गवाह है। पर आज इस शब्द को पॉज़िटिव रूप में प्रयोग होता है क्योंकि ऐसा नैरेटिव खड़ा किया गया। मीडिया ने इसमें अहम रोल निभाया। क्रुसेड अगेंस्ट करप्शन, क्रुसेड अगेंस्ट कैंसर, क्रुसेड अगेंस्ट ट्यूबरक्लोसिस,  क्रुसेड अगेंस्ट सेल्वेरी, क्रुसेड अगेंस्ट ड्रिंक जैसे जुमले और टाइटल बनाये गए जिससे क्रूसेड शब्द की छवि साफ की गई। क्रूसेड में आए क्रूस शब्द के कारण इसकी पवित्रता बनाये रखने में सहायत मिली।

--------------------------------------

जिहाद किसी को करने की इजाज़त नहीं है. सिर्फ इस्लामिक state ही यह declare कर सकता है. 

कोई इस्लामिक state है ही नहीं आज.

जिहाद लड़ाई को नहीं कहते है. हक़ के लिए मौके आते हैं जब हथियार उठाने पड़ जाते हैं.

जैसे कृष्ण ने कहा था कि अब लड़ना पड़ेगा.

कुरान के मुताबिक बिना ऐलान के जंग नहीं छेढ़ी जायगी या हमला नहीं किया जायगा.

सिर्फ 3 जगह सशस्त्र संघर्ष की इजाज़त, एक selfdefence, दूसरा जब कंहीं सामूहिक अत्याचार हो रहा है तो वंहा जाके अल्लाह की राह में लड़ते क्यों नहीं है. तीसरा इस्लामे में संधि को बहुत महत्व दिया गया है. अगर सामने वाले संधि तोड़ दे तो लड़ सकते हो.

 

इसके बाद अगर वो बाज़ आ जाये तो युद्द रोक देना. फिर कहा कि युद्द में दुश्मन शांति की बात पेश करे तो कुबूल कर लेना. दुशमन तभी करेगा जब दब रहा होगा. अगर धोखा देने का इरादा हो तो भी अल्लाह के लिए कर लेना. शरण मांगने वाले को सुरक्षित जगह पंहुचाना.

--------------------

जहद

गैर मुस्लिम के खिलाफ जंग छेड़ना जहद नहीं। जहद का अर्थ लड़ाई नहीं बल्कि अच्छे काम के लिए लगातार संघर्ष करते जाना है। लड़ाई को किताल कहते हैं। कभी शांति के लिए कोई लड़ाई मजबूरी में करनी पड़ जाए तो उसे भी जहद कहते हैं। जैसे गीता, वेद आदि में आवश्यकता पड़ने पर हिंसा अपनाने के आदेश दिए गए हैं और जैसे आत्मसुरक्षा में हिंसा जायज होती है। इसमें भी लड़ाई पहले सामने वाले शुरू करेंगे। इस्लाम फैलाने के लिए हथियार नहीं उठाए जा सकते। इस्लामी हुकूमत बनाने के लिए भी जंग नहीं शुरू करी जा सकती। कुरान तो जगह जगह कहता है कि चाहे इस्लाम मानों या न मानो। ये तो विचारों की बात है। कुरान तो कहता है कि धर्म के मामले में कोई जबरदस्ती नहीं, अगर अल्लाह चाहता तो सब ईमान वाले होते, तो क्या अब तुम जबरदस्ती करोगे, तुम्हें कोई दरोगा बनाके नहीं भेजा गया है।


सशस्त्र संघर्ष के लिए कुरान में 3 शर्ते दी गई हैं, केवल इन्हीं स्तिथि में सशस्त्र संघर्ष किया जा सकता है:

1st शर्त में लड़ाई की शुरुवात ही अनुमति शब्द से हो रही है...

22:39-40 : अनुमति दी गई उनको जिनके विरुद्ध युद्ध किया गया, ज़ुल्म किया गया, जिन्हे अपने घरों से नाहक निकाला गया केवल इसलिए कि वे कहते थे, हमारा रब अल्लाह है।

[यह आत्मसुरक्षा की बात है। पूरी दुनिया में आत्मसुरक्षा के लिए हिंसा सर्वमान्य और स्वीकार है, चाहे court  हो या UNO हो।]


2nd शर्त में कुरान ने offensive लड़ाई करने को कहा है...

4.75: तुम्हें क्या हो गया है कि  उन कमजोर पुरुषों, औरतों, बच्चों के लिए युद्द क्यों नहीं करते जो प्राथनाएं करते हैं कि उन्हें उनकी बस्तियों से निकालो जहा लोग अत्याचारी है।

[जब बड़े स्तर पर कही, किसी भी धर्म वाले पर अत्याचार हो रहा है और कोई रास्ता न हो सिवाये लड़ाई के तो उन ज़ालिमों से लड़ना है। तुम ताकत रखने के बावजूद भी अगर हाथ पर हाथ धर के नहीं बैठ सकते। ऐसी लड़ाई को इस्लाम शांति के अर्थों में लेता है क्योंकि इससे मज़लूमों के लिए शांति आती है]

 

3rd शर्त के मुताबिक लड़ाई जायज है जब कोई आपसे संधि तोड़ लें। मगर इसमें आपकी मर्जी है कि उससे चाहो तो युद्द करो और चाहे न करो...

9.4: सिवाये उन मुशरीकों के जिन्होंने तुमसे समझौते किये और पूरे किये।

[इस्लाम में संधि को बहुत महत्वता दी गई है क्योंकि यह एक विश्वास तोड़ना, धोखा देना बहुत बड़े बड़े फ़ितने पैदा करता है]

 

अक्सर जो आयतें कुरान की हिंसा पर पेश की जाती है, वो युद्ध क्षेत्र की है। जाहीर है युद्द में ऐसे ही आदेश आएंगे जब दुश्मनों को समाप्त करने की बात होगी. जैसे श्रीकृष्ण ने गीत में लड़ने के आदेश दिए, जैसे बड़े बड़े Generals लड़ाई के आदेश देते हैं। मगर कुरान के इन आदेशों के साथ या इनके बाद में आने वाली guidelines को छोड़ दिया जाता और उन्हें पेश नहीं किया जाता है। इस्लाम के खिलाफ भड़काने वाले और आतकी बनाने वाले दोनों इन आयतों को दिखा कर दिमाग हरते हैं। पूरी बात नहीं बताते। पृष्ठभूमि भी नहीं बताते। इस्लाम का नाम लेकर आतंक करने वाले खुद इस्लाम के सबसे बड़े दुशमन और दोषी हैं। अपने हितों या कामों को धर्म का रंग दे देते हैं और दूसरे लोग समझते हैं यह धर्म कह रहा है।

 

ऐसे कुछ उदाहरण इस प्रकार है:

2.190: अल्लाह की राह में उनसे लड़ो, जो तुमसे लड़े, लेकिन ज्यादती न करना। अल्लाह को ज्यादती पसंद नहीं है।

2.191: जहा भी उन पर काबू पाओ, उनका कतल करो, और जहा से उन्होंने तुम्हें निकाला तुम भी उन्हें वहा से निकालोंक्योंकि फ़ितना, कतल से भी गंभीर है। लेकीन मस्जिद हराम के निकट उनसे नहीं लड़ो जब तक वो खुद युद्ध न करे। और अगर वो युद्ध करे तो उनका कत्ल करो।

2.192: अगर वो बाज आ जाए (यानि लड़ाई से रुक जाए) तो अल्लाह भी क्षमावान है।

2.193: तुम उनसे लड़ो जब तक फ़ितना शेष न रह जाए (यानि फसाद रुक जाए) और दीन अल्लाह के लिए हो जाए। मगर वो बाज आ जाए तो अत्याचारियों के सिवाय किसी के खिलाफ कदम उठाना ठीक नहीं (यानि फिर लड़ाई नहीं करनी है)।

8.61-62: अगर वो संधि की ओर झुके तो तुम भी झुक जाओ। अगर वो तुम्हें धोखा देना चाहे तो तुम्हारे लिए अल्लाह ही काफी है।

[हमला उन्होंने किया था यानि वो संधि तभी करंगे जब वो हार रहे होंगे मगर फिर भी संधि करने का आदेश दिया गया है।]

 

अगर इन शर्तों के साथ कोई लड़ाई छिड़ गई तो युद्ध में क्या आचरण होगा, ये कुरान बताता है जैसे:

कुरान ने कहा संधि टूटने पर दुशमन को मौका देना होगा यानि 4 महीने का समय दोगे तैयारी के लिए। जाहिर है, इतने लंबे समय के बीच में सुलह भी आसानी से हो सकती है। यानि इस्लाम ने छापेमार यानि गोरिल्ला वार करना भी मना कर दी है। पहले युद्द का ऐलान होगा और अचानक हमला नहीं होगा।

मुहम्मद साहब ने कहा की युद्ध में महिला, बच्चों, बूढ़ों, मजदूरों को नहीं मारा-पीटा नहीं जाएगा। जबकि ज़ाहिर है कि मजदूर युद्द में हथियार उठाने वाले होंगे, महिला nursing कर रही होंगी, बच्चें भी back-end पर मदद कर रहे होंगे।

मुहम्मद साहब ने कहा कि युद्ध में जानवरों को नहीं मारा जाएगा और फलदार वृक्ष भी नहीं काटे जाएंगे।

All is fair in war में इस्लाम यकीन नहीं रखता। इसलिए दुश्मन के हिमायतियों पर हमला नहीं किया जा सकता जब तक की वो दुश्मन के साथ मिलकर खुद लड़ नहीं रहे हो या लड़ाई में किसी तरह से दुशमन की मदद नहीं कर रहे हो।

 ----------------------------------------------------------------

होली वॉर या मुकद्दस जंग का मतलब होता है धार्मिक मकसदों के लिए जंग। इस्लाम में इसके लिए कोई सही शब्द नहीं है और न ही कोई कॉन्सेप्ट। कोई इसे कुरान की बताई 3 शर्तों पर हुई जंगों को होली वॉर कहना चाहे तो कह सकता है। मगर कुरान की बताई 3 शर्तों में जंग मुकद्दस जंग नहीं है, बल्कि न्याय और नैतिकता के लिए हैं। हालांकि अगर इस्लाम की कुछ शुरुआत (फतह मक्का के बाद) जंगों को इत्मामे हुज्जत की नज़रिए से (जैसे ग़ामिदी साहब) देखोगे तो पवित्र युद्ध बन जाता है। फिर कोई इन्हें धर्मयुद्ध से मिलाकर भी देख सकता है।
 

Wednesday, 11 December 2024

आखिरत, जन्नत, जहन्नुम और समय चक्र

 


आखिरत

आखिरत का मतलब है बाद में आने वालायानी आने वाला हर लम्हा पिछले की आखिरत है. आखिरत को Law of cause and effect से समझाया जा सकता है. क़यामत करीब है. एक हदीस से यह खूब साबित है. इतिहास के मुकाबले सबसे ज्यादा दुनिया ख़त्म होने के इमकान आज है. एक Nuclear war फ़ोरन सब खतम कर सकती है. 

अगर किसी ने तौहीद मान ली है तो अमल में लान ज़रूरी हैऔर इसलिए आखिरत बताना ज़रूरी है। (आम धारणा यह है की तौहीद और आखिरात को मानने वाला रिसालत का इनकार कर ही नहीं सकता। हालांकि रिसालत को अगर बिना किसी objection के clearly समझा सको तो वो सबसे बेहतर है)

कुरान के 2 तरह की आयतें है एक, मोहकम जो अपने मायनों में बिलकुल वाज़ेह हैं और सभी उनसे एक जैसी ही मुराद लेते हैं। दूसरी मोशाबिहात आयतें हैं, ये वो हैं जो वाज़ेह तो हैं मगर साथ ही इनकी interpretation कई तरह से हो सकती है.मुशाबिहात यानी जैसे किसी चीज़ या मुद्दे की असल को कोई मिसाल दे कर समझाना क्योंकि अभी उसे हम exactly समझ नहीं सकते. मोहकम की तफ़सीर होती हैऔर मुशाहाबिहात की तावील होती है. कुरान में आया जन्नत, जहन्नुम, बरज़ख का ज़िक्र भी मुशाबिहात है.

इन्सान का इल्म महदूद है. बहुत सा इल्म सिर्फ तजुर्बा करके ही समझा जा सकता है. कुरान के मुताबिक़ इन्सान को बहुत कम इल्म दिया गया है. विज्ञान भी इसका इंकार नहीं करता कि इंसान आज भी बहुत कम जानता है.

 

जन्नत -जहन्नुम की लोकेशन

कुरान से इशारतन पता लगता है कि जन्नत आसामानों में है और जहन्नुम इसी जमीन के अंदर है.

जमीन के सेंटर या ग्रविटी से जितनी दूर जाएंगे वो बुलंदी है, वो ऊपर है, वो ऊंचाई है. सेंटर के अंदर या पास जाते हैं तो वो गहराई कहलाती है। जमीन से दूर ऊंचाई होती है तो गहराई जमीन के करीब होगी।

[space में खरबों galaxies है. अब तक space में अरबों km की दूरी तय कर चुके हैं। इस Solar system पार करने में एक spaceship को 25+ साल से ज्यादा लगे, 16 अरब km का सफ़र था. हालाँकि ऐसी अरबो खरबों galaxies है. कुरान 7 आसमानो की बात करता है। यह पहला असामान है जिसका सिरा अभी भी वैज्ञानिको को नहीं मिल रहा है।

जमीन में भी कई layers होती हैं. जबकि ज़मीन के अंदर अब तक रशिया में एक जगह सिर्फ drill से approx.12km तक ही खोद पायें हैं, फिर machine पिघलने लगती है. जबकि ज़मीन की गहराई कुल 6400  kmहै, अन्दर क्या क्या है यह जानकारी तो हमें ज्वालामुखी और जलजालों से पता लगी जब ज़मीन मलबा बाहर उगल देती है.

इंसान समुन्द्र में भी बहुत ज़्याद नहीं जा पाया है. समुद्र की भी 5% ही खोज कर पाए हैं, एकहद के बाद नीचे गुप अँधेरा औरपानी का बहुत pressure है.]

 

कुरान में जन्नत singular और plural दोनों में आया है. 69 जगह पर जन्नते लफ्ज़ आया है। आखिर सबकी अलग अलग जन्नते होंगी. जन्नते आकाश में है. दुसरे धर्मों में भी स्वर्ग आसमान में बताया जाता है. कुरान जन्नत के बारे में कहता है कि ईमानों वालों को उरुज मिलेगा या उरुज दिया जायगा। उरुज से ही मेराज बना है। यानि उन्हें मेराज, उरुज हो जायगा।

लाइट या बिजली की स्पीड है 3 लाख km per second है। बर्क का मतलब बिजली है। बर्क से ही बुर्राक बना है। बुर्राक की भी यही स्पीड थी। फरिश्तों की भी इतनी स्पीड होती है। फरिशते नूर यानि लाइट से बने है। मगर इस स्पीड से बुर्राक भी दूसरी कहकशा में नहीं पहुँच पाएगा, उसे लाखों-करोड़ों साल लगेंगे। जमीन का गहरा या circumference ही 40 लाख km का है।

यानि इंसान को यंहा से निकलने के लिए कोई द्वार या दरवाजा भी चाहिय। ऊपर कुछ entry points है। वैज्ञानिक कहते हैं एक universe से दूसरे  universe में जाने के भी entry point है, shortcut हैं हालांकि इन्हे वो अभी मिले नहीं है। इसे wormhole नाम दिया गया है। wormhole के दोनों किनारों पर suck करने की क्षमता होती है, जो एक तरफ से suck करके दूसरी तरफ निकाल देती है। और यह transportation zero time में होगा यानि कोई वक्त नहीं लगेगा।

मगर वैज्ञानिकों वो दरवाजे नहीं मिलेंगे क्योंकि कुरान ने कहा है कि हम इन्हें खोल देंगे। ये बस जन्नती लोगों को मिलेंगे, गुजरने के लिए।

 

कुरान में जहन्नुम हर जगह singular में आया है और लिखा है कि उसमें ठूँसा जायगा यानी की एक है. कुरान हदीस से जहन्नुम गहराई में साबित होती है। दूसरे धर्मों में भी नरक को पाताल में बताया गया है. कुरान हदीस से साबित है कि हश्र का मैदान इसी जमीन पर होगा और ज़मीन चटियल मैदान हो जाएगा। जलजले से निचले भाग ऊपर आ  जाएंगे, आसमानी लेयर्स खतम हो जायगी तो पानी भाप बनके उड़ जायगा, जमीन के लावा, लोहा आदि ऊपर जाएंगे, ज़मीन सब उगल देगी। हरियाली खतम, सूरज सीधा सर पर। जमीन अंदर से खाली हो जाएगी।

ज़मीन के अंदर कितने लोग आ सकते है ये पता करने के लिए जमीन  के पूरे वॉल्यूम को इंसानी जिस्म के वॉल्यूम से डिवाइड कर दें। एक आदमी को हजार आदमी के बराबर जगह दे दे तो 41 लाख ख़राब इसमें समा सकते हैं। अनुमानों के मुताबिक़ दुनिया में अब तक सिर्फ 1 खरब लोग ही पैदा हुए हैं. यानी ज़मीन के volumeके आगे तमाम इंसानों का volumeकुछ भी नहीं है. 


जन्नत/जहन्नुम में कौन और कब?

 

7.42: जो लोग ईमान लाए और अच्छे कर्म करे.. वही लोग जन्नत वाले है, वो उसमें हमेशा रहेंगे।

[मौत के अलावा जन्म का समय, जन्म का स्थान, आपका परिवार, सेहत वगैरह इन्सान के हाथ में नहीं होता इसलिए जन्नत के लिए अमल देखे जायंगे]

17:18-20: जो कोई इस दुनिया के जल्दी मिलने फ़ायदों की खवाहिश रखता है, उसे हम यही देते हैं,जो कुछ भी जिसे देना चाहे, फिर उसकी किसमत में जहन्नुम लिख देते हैं। जो आखिरात की ख्वाहिश रखे और कोशिश करे और वो ईमान वाला हो उसकी कदर की जाएगी। इनको भी और उनको भी हम दुनिया में ज़िंदगी का सामान दिए जा रहे हैं।

2.81: जिसने भी कोई बुरा किया और उसकी बुराई ने उसे चारों ओर से घेर लिया तो ऐसे लोग ही जहन्नुम मे पड़ने वाले हैं और सदा ही वही रहेंगे।

16.61: यदि अल्लाह लोगों को उनके अत्याचार पर पकड़ने ही लग जाता तो धरती पर किसीजीवधारी को न छोड़ता, किन्तु वह उन्हें एक निश्चित समय तक टाले जाता है।फिर जब उनका नियत समय आ जाता है तो वे न तो एक घड़ी पीछे हट सकते हैं और नआगे बढ़ सकते हैं।

35.45: यदि अल्लाह लोगों को उनकी कमाई के कारण पकड़ने पर आ जाए तो इस धरती की पीठपर किसी जीवधारी को भी न छोड़े। किन्तु वह उन्हें एक नियत समय तक ढील देताहै, फिर जब उनका नियत समय आ जाता है तो निश्चय ही अल्लाह तो अपने बन्दों कोदेख ही रहा है।

17.14: पढ़ ले अपनी किताब (कर्मपत्र)! आज तू स्वयं ही अपना हिसाब लेने के लिए काफ़ी है।

 

जन्नत-जहन्नुम की मिसालें और अबदीयत

 

2.25: जो फल वहा मिलेगा, वो कहेंगे कि ये तो वही है जो पहले हमे मिला था और उन्हे मिलता जुलता ही फल दिया जाएगा और उनके लिए वहाँ पाक-साफ़ जोड़े होंगे, और वे वहाँ सदैव रहेंगे।

[Mutshabihan word is used here– जिसके बारे में accurate experience करके ही मालूम किया जा सकता है]

47.15: उस जन्नत की  मिसाल ऐसी है….

[मिसाल देके समझाया भी गया है]

32.17: कोई नहीं जानता कि जो वो करते रहें, उसके बदलेक्या आखों की ठंडक उनके लिए रखी गई है।

41.31: हम सांसारिक जीवन में भी तुम्हारे सहचर मित्र हैं और आख़िरत में भी। औरवहाँ तुम्हारे लिए वह सब कुछ है, जिसकी इच्छा तुम्हारे जी को होगी और वहाँतुम्हारे लिए वह सब कुछ होगा, जिसकी तुम माँग करोगे।

11.106-108: तो जो अभागे होंगे, वे आग में होंगे; जहाँ उन्हें आर्तनाद करना और फुँकार मारना है। वहाँ वे सदैव रहेंगे, जब तक आकाश और धरती स्थिर रहें, बात यह है कि तुम्हारे रब की इच्छा ही चलेगी। तुम्हारा रब जो चाहे करे। रहे वे जो भाग्यशाली होंगे तो वे जन्नत में होंगे, जहाँ वे सदैव रहेंगे जब तक आकाश और धरती स्थिर रहें। बात यह है कि तुम्हारे रब की इच्छा ही चलेगी।यह एक ऐसा उपहार है, जिसकासिलसिला कभी न टूटेगा।

[यानि जब तक जमीन-आसमान की existence होगी।]

84.19: निश्चय ही तुम्हें मंज़िल पर मंज़िल चढ़ना है।

[ये दुनिया और आखिरत दोनों के बारे में हैं, वहा भी evolve होते चले जाना है।]

  

परलोक में राबते

 

7.43: उनके सीनों में जो एक दुसरे के लिए रंजिश होगी,  उसे हम दूर कर देंगेऔर वो कहंगे यदि अल्लाह हमारा मार्गदर्शन न करता तो हम कदापि मार्ग नहीं पा सकते थे। हमारे रब के रसूल निस्संदेह हक लेकर आए थे। और उन्हें आवाज़ दी जाएगी कि यह जन्नत है, जिसके तुम वारिस बनाए गए हो।उन कर्मों के बदले में जो तुम करते रहे.

[वंहा एक दुसरे की जन्नतों को देख कर रंजिश नहीं होगी, अहसास तो होगा कि उन्होंने ऐसा खुद क्यों नहीं किया. हम खुद से हिदायत नहीं पा सकते. जन्नत कर्म करने के बाद ही मिलेगी, ऐसे ही नहीं मिल जाएगी. ये रिसालत की भी एक दलील है, दार्शनिकों के लिए जो अपने मन में उलझ कर रह जाते है और सत्य मार्ग नहीं पा पाते]

57.12: उस दिन तुम मोमिन पुरुष और स्त्रियों को देखोगे की उनका नूर या प्रकाश उनके आगे आगे दौड़ रहा है और उनके दाएं हाथ में है।

[उनके कर्म एक एनर्जी के रूप में उन्हे लीड करते हुए उन्हें इस स्टम से दूसरे सिस्टम यानि जन्नत तक ले जाएंगे मगर किसी गाइडन्स या दूसरी बड़ी एनर्जी के मुताबिक]

 57.13: कपटचारी पुरुष और स्त्रियाँ मोमिन से कहेगी की हमारी प्रतीक्षा करो, हम भी तुम्हारे नूर मे से कुछ नूर ले लें। उनसे कहा जायगा पीछे हटो और फिर अपने नूर की तलाश करो।

[जैसे एक गाड़ी की हेडलाइट में खराब हेडलाइट वाली गाड़ी निकलनी चाहती है।]

 

7.38-50: इन आयातों में जन्नत और जहन्नुम वालों की परस्पर बहस और एक दूसरे पर आरोप हैं. यह भी लिखा है कि इन दोनों के मध्य एक ओट होगी।

[जन्नत और जहन्नुम वालो का आपस में communication होगा मगर एक दुसरे तक पहुँच नहीं पाएंगे इसलिए ये बातचीतऐसी ही होगी जैसे किसी छोड़े गए सेटेलाईट या राकेट से दुनिया वालों की होती है]

जन्नत के बारे में बुनियादी बात कही गयी है, मकसद नहीं बताया गया. जैसे आम तौर पर किसी को नौकरी पर रखते हुए बेसिक बेनिफिट बताये जाते हैं, चेलेंजस नहीं. वंहा आपको हर तरह से ग्रो करने का मौका मिलेगा क्योंकि माहौल ऐसा होगा. जैसे वेस्ट में इन्सान को अपनी कला, शौक पुरे करने के भरपूर मौके मिलते हैं क्योंकि वंहा डेवेलोपमेंट, इन्फ्रा पहले से है. 


परलोक के द्वार और दोनों में आड़

 

57.14: उनके बीच एक दीवार खड़ी कर दी जाएगी जिसमें एक द्वार होगा।

[इस द्वार से नूर वाले निकल कर दूसरी ओर चले जाएंगे। नूरानी जिस्म मिल जायगा यानि energy में बदल जाएंगे, जो strong energy बन पाएंगे वो पार पा जाएंगे और और उनका नूर या energy स्पष्ट रूप से दिख रही होगी। जैसे समुन्द्र का fresh और salty पानी एक दुसरे से नहीं मिल पाता क्योंकि दोनों की properties अलग अलग होती हैं। अगर दोनों पानी की properties एक हो जाए तो मिल जाएगा।]

 

7.40: जिन लोगों ने हमारी आयतों को झुठलाया...  उनके लिए आकाश के द्वार नहीं खोले जाएंगे।

[यानि जन्नत और उसके द्वारा आसमान में हैं।]

15.14: अगर हम उन पर आसमान में कोई द्वार खोल दें तो वह उसमें चढ़ते चले जाएंगे।

[यंहा उरुज लफ़्ज़ है। लिखा है कि हम खोल दे तो, यानि ये द्वार खुद नहीं खुलेंगे]

15.15: फिर भी वो कहंगे किहमारी आँखें मदमदाती है बल्कि हम पर जादू कर दिया गया है।

[द्वार खोलने पर चड़ने के बाद वो यह कहेंगे]

 

15.16: हमने आकाश में सुरक्षा चौकियाँ बना रखी है और देखने वालों के लिए उसे सूसज्जित भी किया है।

[जिसे नहीं आने देना चाहते उनके लिए यह security posts बनाई हुई है]

15.17: हमने हरफिटकारे हुए शैतान को उससे सुरक्षित रखा है।

[इन द्वारा से वहिय आती है। फरिशतें उनसे आते जाते है, नबी गए थे। जन्नती जाएंगे। बाकी कोई नहीं जा पाएगा]

15.18: अगर किसी ने चोरी छिपे कुछ सुनगुन ले ली तो एक प्रत्यक्षअग्निशिखा ने भी झपट कर उसका पीछा किया।

[यह तारे, सितारे, ग्रह वगैरह सब आग के गोले है या दहकते हुए पत्थर है, कहकशाओं ने set होने से पहले कुछ जिन्न वहिय सुनने के लिए आसमान में पहुँच जाते थे और कोई ऐसा ही गोला या दहकता पत्थर उनका उनसे टकराने वाला होता था. मगर जब मौजूदा हाल में universe set हुआ तो फिर जिन्नों के लिए भी यह नामुमकिन हो गया. यह बात कुरान में कई जगह आई है]

23.99-100: यंहा यह ज़िक्र है कि लोग मौत के बाद वापिस भेजे जाने की दरख्वासत करंगे ताकि अच्छे कर्म करके आ सके मगर यह उनकी फ़िज़ूल बात होगी और उनके बीच एक आड़ या पर्दा या रोक या ओट रहेगा उनके दुबारा जिंदा उठाए जाने तक.

[यंहा बरज़ख लफ्ज़ इस्तेमाल हुआ है.आलमे बरज़ख, आलम मतबल हालत है न की दुनिया. वो वंहा से देखते सुनते हैं. इधर नहीं आ सकते]

 

इन सुरक्षा चौकियाँ हैं जहाँ से कोई भी जिन्न अब भविष्य की खबर नहीं ले सकता। यहाँ से सिर्फ़ वही लोग बाहर जा सकते हैं जिनके पास इजाज़त हो, जैसा कि क़ुरान 15:14-18 में बताया गया है। इसे उन लोगों के लिए भी सजाया जाता है जो इन्हें देखते हैं यानी जो ज्योतिष या खगोल विज्ञान के अनुसार इन्हें देखते हैं। 

------------------------------------------

कुरान 55: 33-35: ऐ जिन्नों और मनुष्यों के समुदाय! यदि तुममें आकाशों और धरती के क्षेत्रों से गुजरने की शक्ति हो तो गुजर जाओ। तुम बिना शक्ति (bisultanin/ authrotiy) के नहीं गुजर सकते। तुम दोनों पर अग्नि की ज्वाला और धुआँ (wanuhasun/pieces of iron, melted copper, धुंवा वाला अंगारा)) छोड़ा जाएगा, जिसका तुम सामना न कर सकोगे।

कुरान 72:8-9: हमने आकाश को टटोला, तो उसे पहरेदारों और उल्काओं से भरा पाया। हम पहले सुनने के लिए आकाश में कुछ स्थानों पर बैठा करते थे। अब जो कोई भी सुनने की कोशिश करता है, वह अपने लिए एक जलता हुआ अंगारा पाता है।


------------------------------------------

 

परलोक का स्थान

 

55.7. उसने आकाश को ऊँचा किया और संतुलन स्थापित किया.

[The heaven is above the earth]

50.30 : जान्नुम से पूछा जाएगा पूरी भर गई क्या, वो कहेगी और है क्या कुछ?

[यानि यह जमीन के अंदर की बात है]

21.98: तुम और वो तुम जिनकी अल्लाह को छोड़ कर पूजा करते हो, वो सब जहन्नुम के ईंधनहो।

[उलेमा यंहा मूर्तियों से मुराद लेते हैं कि जहन्नुम में मूर्तियों को आग बनाया जाएगा, वंहा पत्थर जलेंगे। मगर मूर्तिया तो पत्थर, मेटल, प्लास्टिक वगैरह की भी होती है। यह सब धातु  जमीन में से निकलती हैं। यानि ये पत्थर या जमीन ही जहन्नुम है।]

 

--------------------------------------------------------

बरज़ख

बरज़ख का मतलब आड़ है.

तोते की हालत में हैं।

सीजजीन और इललीयीन।

मेराज अगर जिस्मानी होता तो जिस्म जल कर राख हो गया होता इतनी तेज स्पीड की वजह से। इसीलिए नबी के दिल का आपरेशन किया गया था।

कुरान – नेकों का रेकॉड सीजजीन में है।

40:46 – सुबह शाम आग पर पेश किया जाता है। (जबकि कब्र नहीं है, न ही जहन्नुम है। फिरोन और आले फिरोन को पेश किया जाता है। यह दरअसल आलमे बरजख है)।

जब बाकी लोग इस हालत में हो सकते हैं तो नबी क्यों नहीं।

 

---------------------------------------------------------

समय चक्र है या रेखा।


समय एक चक्र नहीं पर रेखा है जिसका सबसे बड़ा प्रमाण बिग बैंग है जंहा से ये आरम्भ हुआ अगर किसी का आरम्भ है तो अंत भी होगा।  विज्ञान और वैज्ञानिक से मानते है कि जैसे सृष्टि का फैलाव हुआ और निर्माण हुआ उसी प्रकार सृष्टि एक विशेष समय बाद वापिस संकुचित होने लगेगी और अंत कर जायगी। जब समय रेखा है चक्र नहीं तो समय भी एक सृष्टि है जैसे जीवन एक सृष्टि है। सभी सृष्टि उतपत्ति है यानी उनका आरम्भ है अगर आरम्भ है तो अंत भी है। तो जन्म और जीवन भी एक रेखा है चक्र नहीं। इसलिए पुर्नजन्म चक्र नहीं रेखा है। जन्म का आरम्भ और अंत है। हर उतपत्ति का आरम्भ और अंत है। गीता में आत्मा को न मरने वाला बताया गया है। 


हमेशगी/ हूर/जोड़े/अज़वाज/शराब

अल्लाह के हमेशा और आपके हमेशा में फरक है। अल्लाह की eternityऔर आपकी eternity में फरक है। जैसे उसकी हर सिफ़त और हमारी सिफ़ातों मे जमीन आसमान का फरक है। उससे हमारी किसी चीज़ में बराबरी ही नहीं है। जिसकी beginningहै उसका end भी होगा।

कुरान में जितनी चीजें जन्नत जहन्नुम के सुखों, दुखों के बारे में बताई गई हैं, वो सिर्फ मार्फत है यानि हमारी समझ के अनुसार एक अनुमान दिया गया है। ये closest चीज़ है मगर exact नहीं है। जैसे केले का स्वाद नहीं समझाया जा सकता तो उसे कटहल से समझाया जात है। जैसे जन्नत में हूर का जिक्र आता है जिसके मायने अप्सरा नहीं है बल्कि संगी-साथी है।

2.25: उनके लिए वहा पवित्र जोड़े होंगे, वे वहा सदैव रहेंगे।

[यंहा आए लफ़्ज़ अज़वाजून का तर्जुमा उलेमा, बीवियाँ करते हैं जबकि  इसके मायने जोड़े के हैं, जिसे spouse कहते हैं।]

51.49 : हमने हर चीज के जोड़े बनाए हैं.

[यहाँ भी जोड़े के लिए यही लफ़्ज़ ज़वजा आया है।]

 

शराब का मतलब दारू नहीं है बल्कि पेय है यानि ड्रिंक। नशे को तो खमर कहते हैं। यंहा जिस चीजों से रोका गया है उनसे खुद को और दूसरों को नुकसान पहुंचता है। वहा ये नुकसान नहीं होगा और वो चीजें भी यंहा जैसी भी नहीं होगी।

------------------------------------------------- 

दर्शन विज्ञान और ईश्वर

   दर्शनशास्त्र की 3 शाखाएँ हैं:- I. तत्वमीमांसा/ तत्वज्ञान (Metaphysics - beyond physics/theory of reality) [तत्व, अस्तित्व, वास्तविकता का ...